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शनिवार, 17 जनवरी 2026

51 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय 51

प्रेम यात्रा का सोपान

प्रेम भी एक पूर्णता एक परिपक्वता चाहता है, जिस प्रेम को हम जानते और देखते है वह प्रेम नहीं वह तो मात्र हमारी एक जरूर है। सही मायने में यह एक दूसरे का शोषण है। प्रेम को जानने के लिए मानव नहीं आपको अति मानव बनना होता है। मैं अति मानव तो नहीं बन पाया परंतु कुछ ऐसे लोगों का संग साथ अवश्य किया जो प्रेम को जानते थे उस पीते थे उसमें जीते थे। वह स्थान प्रेम का एक सरोवर था, जहां उसे पिया ही नहीं जीया जा सकता था, और उसमें डूबा भी जा सकता था। उस सरोवर का नाम था ‘ओशोबा हाऊस’। सच अगर आपने जीवन में ध्यान को नहीं जाना तो आपके जीवन कुछ भी सार्थक नहीं है। कुछ लोग इसे ध्यान कहते है मैं इसे प्रेम कहता हूं। क्योंकि ध्यान मेरे लिए सहज और सरल है। जो आज के मनुष्य के अति कठिन है। मेरे शरीर और योनि के हिसाब से प्रेम अति कठिन है। कितना विरोधाभास लगता है। परंतु सत्य यही है। प्रेम की यात्रा ध्यान के मानसरोवर से शुरू होती है लेकिन कोई मेरे जैसा भाग्यशाली भी है जो बिना मनुष्य रूपी मानसरोवर को प्राप्त किए उस में डूब सकता है। मैं ही नहीं शायद अब मेरे और भाई अनेक होंगे।

मुझे इस बात की अति खुशी है, की ये सब हो रहा है मानव के विकास के कारण, आज भी मानव में ऐसी जाति है, जो पशुओं को केवल अपना अहार समझती है। लेकिन ऐसा तो हमेशा से होता चला आ रहा है। परंतु आटा चाहे कितना ही हो परंतु चुटकी भर नमक भी उसके सुस्वाद को दोगुना कर जाता है। वही मानव इस पृथ्वी के नमक है। अब मेरे पास समय कम है, ये मैं जानता हूं, मुझे अपने दीपक से रिश्ते तेल का पता है, वह कितने दिन या हो सकता घंटे तक और उजियारा देगा।

दीदी को एक बार मिलने की इच्छा थी, उनके प्रेम ने, उनकी छुअन ने, उसके संग ने मुझे पूर्णता से तृप्त कर दिया था। इसलिए मेरा अंतस उसका इंतजार कर रहा था। और अपने वादे के अनुसार दीदी आ गई। लेकिन वह मेरे चेहरे को तो नहीं परंतु मेरे सिकुड़ते शरीर को देख कर समझ गई की मैं ठीक नहीं हूं। और वह जिद कर के मम्मी के साथ मुझे डा0 के पास ले गई जिसने मुझे ग्लूकोज चढ़ा और कुछ दवाई दी। पापा जी लाख मना कर रहे थी की रहने दो परंतु दीदी नहीं मानी।

परंतु श्याम को जो दीदी ने मुझे पनीर वे थोड़ी सी आइसक्रीम खाने को दी थी वहीं मेरा आखिरी स्वाद था। वह मेरे लिए कितने ही अंडे खरीद कर लाई थी क्योंकि वह समझ रही थी की परसों मैंने अंडे बड़े ही स्वाद के साथ खाए थे। इसलिए पनीर न सहीं अंडे ही खा ले इसलिए जब सुबह मेरे लिए अंडे बनाए गए। तो मैंने अपना मुख फेर लिया। दीदी को अब तक शायद नहीं पता था कि मेरा जहाज तैयार खड़ा है। उस ने अपने लंगर खोल लिये है। हवाएं अब मुझे ले जाने के लिए मधुर समीर बन के आने लगी है। मैं कभी उस नीलाभ अंबर को देखता की क्या इसका कोई अंत है, मेरे मरने के बाद मेरा क्या होगा। परंतु एक तो सत्य है की मिटता तो कुछ भी नहीं केवल उसका आकार बदल जाता है। तब मैं क्यों न खुश होऊं की मेरे शरीर का भी आकार बदलने के समय आ गया है। परंतु जरूरी नहीं कि मनुष्य शरीर में भी जाने के बाद ऐसे मानव मुझे मिल जाये। तब अपनी यात्रा आपको अपने पैरो सक स्वयं ही शुरू करनी होगी। मैं मन को एक दम पक्का कर उस आने समय के लिए आपने आप को तैयार कर रहा था। लेकिन इस तरह से मेरे व्यवहार को देखकर शायद वह भी अब घबरा गई थी। मैं उसके चेहरे पर भय कि लकीरे देख रहा था।

आज कल मम्मी की तबीयत भी कुछ ठीक नहीं रहती है। मम्मी की उर्जा अब पहले की तरह वैसी तरल व प्रेम पूर्ण नहीं रही। वह एक दम ठोस पत्थर की शीला सी हो गई है। न जाने मम्मी को क्या हो गया है। न अब वह मुझसे पहले सा लाड़ करती है, न ही डांटती है। कहीं मुझसे नाराज तो नहीं है। न उस तरह से मुझसे अपने पन सी बात ही करती है। कैसे मुझे पकड़ कर मेरा बेटा पोनी मेरे मुख को चूम लेती थी। न उनके हाथों के स्पर्श में वह पहले सा जादू है। न जाने ये संसार क्या-क्या रहस्य अपने में समेटे हुए है। मुझे एक फिकर तो है की मेरे चले जाने के बाद पापा कितने अकेले हो जायेंगे। कौन उनकी देख भाल करेगा। परंतु सोच विचार तो मैं ऐसे कर रहा हूं की जैसे मैं ही सब की देख भाल कर रहा हूं। और ये नहीं सोच रहा की मेरी देख भाल का जो अतिरिक्त भोज पापा जी पड़ने वाला है मेरे जाने पर वह तो कम नहीं होगा। पापा जी के पास बहुत गहराई है। जो हम जैसे न जाने कितने ही किनारों रमणीय बना सकता है। वह तो बहती हुए एक नदी है। जहां से भी वह गुजरेगी वह सम्पूर्ण हरियाली एक शीतलता का वास स्वयं होना शुरू हो  जायेगा।

शायद देखना ये भी एक समय है। जो पापा जी को घेरे है। लेकिन पापा जी इस सब से कितनी सरलता से पार होगे। खूद ही नहीं मुझे इतना विश्वास है की मम्मी भी जरूर वही मम्मी बन जायेगी। पहले जैसे ही नहीं उससे भी उतुंग। वह एक नये आयाम में प्रवेश कर गई। स्त्री मन है। एक तो बच्चों की जुदाई दूसरा हमारे घर का गहरा शांत एकांत। अगर अपने होश नहीं रखा या आपके होश की गति कम हो गई तो आप गए। आप नदी के एक ऐसे बहाव में प्रवेश कर गये हो जिसके दोनों और उतुंग पहाड़ है और जिस कस ढलान भी अति खड़ा है तो आपकी नाव की गति उस जल कि साथ कई गुणा अधिक हो जायेगी और आप सोचना भी मत की मैं इस नाव से उतर सकता हूं। अपने भय को भी देखना है बचाव का एक ही तरीका है। अपनी नाव का संतुलन बनाए रखो। वही बेहोशी और होश का खेल है। शायद इस गति में मम्मी थी थक गया आय फिर भयभीत हो गई। परंतु पापा जी भी तो उसकी नाव में उसके साथ है। वह कहां उसे अकेला छोड़ने वाले है। देखना जैसे ही ये तेज कटाव खत्म होगा फिर ये नदी एक विशाल खुले सपाट मैदान में जब प्रवेश करेगी तो इसका बहाव तो अति तीव्र होगा परंतु उसका विस्तार अधिक हो चूका होगा। चारों और उतुंग खाई नहीं सपाट हरे भरे मैदान होगे और फिर चार  कदम के बाद तो सागर उसे अपने आंचल में लेने को ललाईत ही उस का इंतजार कर रहा हे। ये जीवन का एक ऐसा मोड़ है जो भाग्यशाली साधकों के जीवन में आता है।

गुरु भी अपनी कृपा जरूर करेंगे। मुझ सच ही इस बात की जरा चिता नहीं है। हां अगर उस ना में पापा जी नहीं होते। फिर कोई भी दूसरा होता तो मुझे क्षण मात्र का भय तो बना ही रहता चाहे परमात्मा की पूर्ण अनुकंपा उन पर बरस रही हो।

श्याम के समय हम फिर डा0 के पास गए। वह स्कूटर वाला गांव में ही आस पास कहीं रहता था। पापा जी को जानता था क्योंकि पापा जी ने करीब बीस सालों से अधिक दुकान कर के लोगों का प्रेम प्राप्त किया है। शायद कभी वो भी जब छोटा ही होगा जब पापा जी दुकान से दूध लेकर जाता होगा। और उसके बाद उसके बच्चे भी दूध लेने आते होगे। हां अब तो कुछ सालों से दुकान बंध हो गई। फिर भी हमारी दुकान की से साख थी। चाहे वह घी हो या पानी हो या दूध हो। सब की एक खास गुणवत्ता थी। इसलिए पापा जी की आज भी एक साख है। वह स्कूटर वाला हमें डा0 की दुकान उतार कर चला जाता था और जब दीदी उसे फोन करती तो आ जाता था। अब वरूण भैया की कार तो खड़ी थी परंतु पापा जी कार नहीं चलते थे। नाहक वरूण भैया की दुकान बंध करनी पड़े इसलिए पापा जी ने ये बीच का रास्ता निकला। जो एक दम से सही भी था।

डा0 लोगों को आप जानते है पता कुछ नहीं होता बस ये टेस्ट करा लो वो टेस्ट करा लो। और बेचारे जानवर उनके और बच्चों के डाक्टर तो अपनी बीमारी भी नहीं बतला सकते आप कुछ भी कहो की क्या बीमारी है। वह बेचारा मूक क्या बोलेगा। आप कमाते रहो पैसा परंतु देखना ऐसा पैसा आप आपकी जेब में तो जा रहा है। परंतु आपके परिवार में आपके जीवन में वह अशांति जरूर लायेगा।  पहले के डा0 केवल हाथ देख जान जाते थे कि क्या बीमारी है। उसने जो खून का नमूना लिया था उसकी रिपोर्ट आ गई थी। वह उसे पढ़ कर समझने की कोशिश कर रहा था। जो खुद नहीं समझ रहा वह मरीज को क्या समझाएगा। कहने लगा बीमारी तो कोई नहीं है न जाने फिर इसकी तबीयत क्यों खराब हो रही है। उसके पास एक ही इलाज है कुछ दवाओं के साथ ग्लूकोज का पानी चढ़ा दो। अब पशुओं का डा0 कैसा होगा, बेचारे पशु कुछ बोल-बता तो सकते नहीं जो अपने दवाई दी वही उत्तम है। न से कुछ भला। इन्हें ही सच नीम हकीम कहना चाहिए। जो इतने सालों से जानवरों के बारे में पढ़ रहा है जान रहा अनेक बीमार आते है। उनके लक्षण देख कर अनुभव प्राप्त कर रहा है। उसे क्या पता है। मुझे इस बात को देख कर हंसी आ रही थी। की ये मुसाफिर तो जाने वाला है। तेरा कुछ कर्ज या तो मुझे पर होगा या पापा जी पर जो हम उतार रहे है। हम तो जानते है। की मृत्यु के क्या लक्षण होते हे। परंतु उसे नहीं पता की ये कुत्ता एक दो दिन बाद मरने वाला है। तब आप समझ सकते है की वह कितना बेहोश है। नींद में ही पढ़ाई की है और नींद में सब का इलाज कर रहा है। और नींद में सब ठीक भी हो रहे है। है न ये चमत्कार।

अब क्या किया जा सकता था। दीदी को मना कर के पापा जी नाराज भी नहीं करना चाहते थे। कि नाहक क्यों पोनी को परेशान कर रही है। इसे अब आराम से शरीर को छोड़ने दे। परंतु ये बात दीदी या मम्मी को कहीं नहीं जा सकती थी। सुन कर शायद वह सब घबरा ही जाते। मैं इस बात को जानता था कि परेशानी तो मुझे भी होती थी। कहीं मुझे जाना है और मैं जा रहा हूं आप ने पेट पर एक रस्सी बाँध दी और में जबरदस्ती रोक दिया गया हूं। जब शरीर ने तैयारी ही कर ली है कि। वह बंद हो रहा। उसने सब इंद्रियों को समेटना शुरू कर दिया। शरीर को अगर आप अप्रत्यक्ष रूप से भोजन दे रहे हो। तब ये एक प्रकार से आप पैसा और समय तो खराब कर ही रहे हो। उसके साथ-साथ आप उस जाने वाले की यात्रा में भी एक विधन डाल रहे हो। जिस तरह से मैं अपने शरीर को ढो रहा था। वह काफी तकलीफ देने वाला काम था मेरे लिए। एक तो अंदर प्राण तत्त्व खत्म हो हरा है। फिर शरीर में जमा उर्जा को भी समाप्त करना है। उसकी प्रत्येक इंद्री को अंतिम क्रिया तक ले जाना है। तब ये अप्राकृतिक दवाइयां बहुत खतरनाक है। मैं अब देख रहा था।  जब मेरे शरीर में कुछ विकार आ गया हो और मेरी जीवेषणा बची थी। मैं जीना चाहता था। तब ये दवा अमृत तुल्य थी परंतु वहीं कार्य इस समय विरोध कर रहा मेरे मार्ग का। परंतु बहार से देखने में दोनों समान ही लगेगी। जैसे वह डाक्टर सोच रहा था की पहले भी तो यह इसी तरह से ठीक हो गया तब तो इससे कई हजार गुणा इसके मरने की संभावना थी। तब अब मैं इसे ठीक कर सकता हूं।

वह कुछ भी नहीं जानता। तब उस दवा ने केवल मेरा सहयोग किया था। मैं एक दलदल में फंस गया था वह हाथ पकड़ कर मुझे निकाल रही थी। मैं अपने सहारे या अपनी ताकत से निकल नहीं सकता। वह मात्र मेरा सहयोग कर रही थी। और मैं जार से सहयोग से बाहर आ गया।  परंतु पापा जी संग साथ मुझे उसके सामने कुछ भी नहीं लगता था। पहले जब बीमार होता था तो शरीर की संरचना पर और तरह का प्रभाव पड़ता था। परंतु अब और तरह का यह दीदी देख रही थी, सब लोग देख रहे थे। की पोनी बीमार है परंतु इसके चेहरे पर बीमारी के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे। केवल मेरा पीछे से शरीर सुख रहा था। पहले जब बीमार होता तो सबसे पहले चेहरा कमजोर और सुख जाता था। ये एक मोटा विभाजन है जिसे एक अंधा भी देख सकता है। परंतु ये डा0 न जाने कौन सी पढ़ाई पढ़ते है। बस मेरे हिसाब से इन्हें पैसों की पढ़ाई आती है। दुकान में खाने से लेकर खिलौने तक कितना सामान रखा था कुछ लोग खरीद कर ले भी जाते थे। अपने-अपने कुत्तों के लिए मेरे लिए भी तो दीदी पापा या वरूण भैया कैसे-कैसे खिलौने लाते थे।

परंतु अब तो सब दूर की बातें लगती थी। वो तो था गुजरा हुआ एक युग। उन सुंदर पलो को केवल एक मधुरता के लिए याद किया जा सकता है। डा0 का काम हो गया हम बाहर आकर स्कूटर का इंतजार कर रहे थे। धूप थोड़ी तेज थी, परंतु छांव में बहुत अच्छा लग रहा था। शायद मेरे अंदर एक ही बड़ा परिवर्तन आया था कि मुझे गर्मी अधिक लगने लगी थी। और मन एक खुले स्थान पर जाना चाहता था। इसी तरह से हम कई दिन दवाई लेने के लिए आये। दीदी बार-बार डा0 को पूछ रही थी की ये खाना क्यों नहीं खा रहा है। वह ताकत की दवाई की बात करता की मैं इसे ताकत की दवाई देता हूं तो 48 घंटे का भोजन इसे इंजेक्शन से ही मिल जाता है। परंतु धीरे-धीरे में मुख सूख रहा था। उसके किनारों पर एक पपड़ी सी जम गई थी। जैसे मेरे मुख को बर्फ में जमाया जा रहा हो। वह केवल एक सीमा तक ही खुल पा रहा था। केवल सीधा उसे घुमाया नहीं जा सकता था। बस इतना की जीभ ही बहार आये और वह सीधा खुल जाये। तब पापा ने दीदी को कहा की अब इसे केवल दो दिन और ही लेकर आये। इसके बाद नहीं अगर ये जाना चाहता है तो हम इसे सता रहे है। जितनी दवाई के सहारे इसे रोका जायेगा उतनी ही इसे तकलीफ झेलनी होगी। जो इसके शरीर और दर्द बढ़ रहा है। शरीर अपनी पूरी ताकत से कार्य नहीं कर पा रहा था। के लिए ये सब ठीक नहीं कर रहे है हम है। दीदी जी ने पापा जी का मुख देखा और उसे लगा की कोई उसे आदेश दे रहा है। वह समझ गई की बात कुछ और ही है।

क्योंकि पिछली बार भी जब स्कूटर से उतर कर दीदी तो घर चली गई और पापा जी मुझे पास ही बने जय भगवान के पार्क में ले गये वहां जाकर मुझे खोल दिया। तब मेरी लेट रिंग से केवल खून ही आया। शायद अंदर उन दवाई ने पेट को अधिक नुकसान पहुंचाया। जो जख्म सुखाने के लिए दि जाती है। वह भी अति तेज और खतरनाक होती होगी।  ये बात तो मैं और पापा जी ही जानते थे। हमने दीदी को नहीं बतलाई थी। की इसके शरीर से अब मवाद और खून ही बहार आ रहा है। इसने चार-पाँच दिन से तो मुख कसे भोजन किया ही नहीं था। चलों खेर दर्द तो है परंतु उसे सहने की ताकत भी अंदर और बाहर दोनों से मुझे मिल रही थी। पापा दीदी का प्रेम और सहयोग मेरे साथ था।

पापा जी दीदी को समझाने लगे की अगर ये खुश मन से जायेगा तो शरीर की पकड़ कम होगी अगर यह थक गया तो उस दर्द के सहने के समय बेहोश हो जायेगा। उस हालत में तो इसके जन्म लेने में भी रूकावट आयेगी। उस ऊपर जाने वाली चेतना की और गति करने में यह सब बाधा बन सकता है।

और दूसरे दिन भी मुझे घर ले गये तब भी वही घटना दोबारा घटी। पखाने में खून के साथ मवाद था। और इस बार बहुत अधिक बदबू आ रही थी। मैं खुद उस बदबू में इतने खुले स्थान में खड़ा नहीं हो सकता था। इससे आप अंदाज लगा सकते हो कितना अंदर रोग भरा होगा। मैं इधर उधर सूंध कर घूम रहा था वहां पर पापा जी किसी अंकल से बात भी कर रहे थे। वह अंकल भी मुझे देख कर कह रहे थे की अभी तो पोनी की सेहत ठीक है, यह तो अभी आराम से घूम रहा है। कितने साल का हो गया तब पापा जी ने कहां की 16 साल का होने वाला है अब नवम्बर में। वह मेरे शरीर को देख रहे है। गजब की बेहोशी है दुनिया में। अब जितने मुख होते है उतनी ही तो बाते होती ये पापा जी मेरे से अधिक मुझे जानते है। हां हूं करते रहे कुछ देर के बाद मैं पास जाकर खड़ा हो गया की चलों अब घर चलते है। पापा जी ने मेरे गले में पट्टा बांधा और हम घर आ गए।

घर पर आकर मैंने नल के नीचे अपना मुख रख दिया कुछ पानी अंदर गया परंतु एक ठंडी सी राहत मिल रही थी मुख के माध्यम से। परंतु अंदर तक सब शांत हो रहा था। वह आखिरी बात है। साक्षी में सब ठहर गया, लेकिन अगर यह ठहरा रहना ही आखिरी अवस्था हो तो परमात्मा सृजन क्यों करें? परमात्मा तो ठहरा ही था! तो यह लीला का विस्तार क्यों हो? तो यह नृत्य, यह पक्षियों की किलकिला हट, ये वृक्षों पर खिलते फूल, ये चांदत्तारे, यह विराट विस्फोट! परमात्मा तो साक्षी ही है! तो जो साक्षी पर रुक जाता है वह मंदिर के भीतर नहीं गया।

इस पड़ाव पर आकर मैं जब जीवन की लगभग सभी सीढ़ियां पूरी पार कर गया, बस ये अंतिम आखिरी छलांग रह गई है। अब न तू बचा न मैं बचा, अब तो नाच होने दो जीवन का विस्तार होने दो। जितना मैं इसकी पकड़ को छोड़ रहा था उतना ही अन्दर एक आनंद भाव बढ़ रहा था। जैसे मेरा अंदर भी अपना कुछ नहीं है बहार भी कुछ नहीं है। मैं तो एक यात्री हूं जो एक पथ पर खड़ा है। हवा जिस और मोड़ देगी वहीं चल दूंगा। अब तो तुम खूद उस उर्जा का साथ दो अब अगर वहां पर नृत्य उठाना चाहता है, या फिर दूख दर्द उठाना चाहता है तुम केवल नाचो उसे केवल उठने दो अपने अंतस के नाच में। कभी तू के कारण न नाच सके, कभी मैं के कारण न नाच सके। अब तो दोनों न बचे, अब तुम्हें नाचने से कौन रोकता है? अब कौन-सा बंधन है? कौन-सी कारागृह की दीवाल तुम्हें रोकती है? अब तो नाचो; अब तो रचाओ रास; अब तो होने दो उत्सव! अब क्यों बैठे हो? अब लौट आओ! छोड़ दो अपनी को इस बहाव मैं ये एक छलांग है...मैं नहीं चूकना चाहता।

उस पूर्णता में। मैं ये साफ देख रहा था कि मैं अपने अंदर एक परिवर्तन के साथ एक सहयोग भी घटते हुए देख रहा था। शायद उसे ही गुरु की महिमा कहां गया होगा। लगा की कोई उर्जा मुझे मेरे मार्ग पर सहयोगी की तरह से लिये जा रहा है। और बाहर से पापा-दीदी का संग साथ तो ही। जीवन नदी के दोनों किनारों को तटबंध की तरह से सहयोग मिल रहा था। कितना सरल और सूखद समय था मेरे लिए। यहीं दर्द अगर कुछ साल पहले उठा होता तो मैं खुद भी परेशान होता और पूरे घर को शायद सर पर उठा लेता। परंतु अब सब स्वीकार है।

फिर जीवन का बूझता दीप और तमस का अंतिम चरण --जो कि करीब-करीब सब को लगता है कि धर्म की अंतिम मंजिल आ गई; लेकिन फिर भी अंतिम नहीं है—ये जो साक्षी-भाव। अब न तो दूसरा न मैं, बस दोनों को देखने वाला, दोनों के पार जो अतिक्रमण कर रहा हूं। पापा जी भी कितने प्यारे है उन्हें छोड़ कर जाना कितना कठिन है। परंतु अंदर एक ऐसा भाव का उन्माद उठ रहा था की सब कितनी सरलता और सहजता से हो रहा था। परंतु जो मुझे अब हो रहा था, ये मेरा पहले के अनुभव जैसा बिलकुल नहीं था। ये तो  अनुभवातित साक्षी, था जिसके विषय में ने मन जाता है न भाव। यहां पहुंच कर साधक को लगता है कि अब तो आ गई मंजिल परंतु वह खतरनाक है। उसे लगता है कि धर्म की आखिरी पराकाष्ठा हो गई। नहीं हुई; अभी एक कदम और बाकी है। अभी वर्तुल पूरा नहीं हुआ। जहां से चले थे, अभी वहीं वापिस नहीं आये तो वर्तुल पूरा नहीं हुआ। स्रोत ही मंजिल है। बीज चला, पौधा बना, वृक्ष बना, फूल लगे, फल लगे, फिर बीज आये; तब वर्तुल पूरा हुआ, तब यात्रा पूरी हुई। जहां से चले वहीं आ गये। बच्चा पैदा हुआ, जवान हुआ, बूढ़ा हुआ, हजार-हजार उपद्रवों में पड़ा, और फिर बालवत हो गया; यात्रा पूरी हो गई।

स्रोत ही मंजिल है। जहां से चले थे वहीं पहुंच जाना है। केवल बीज का रंग आकर अगले पड़ाव पर जाकर बदल जाती है। उर्जा तो वही रहती है। कहां से चलती है यात्रा? संसार से, बाजार से, भीड़-भाड़ से। फिर एक दिन तुम उसी भीड़-भाड़ में आ जाओ। भीड़-भाड़ वही रहेगी, तुम वही नहीं रह गये। फिर तुम नाचो।

अब यह नाच गुणात्मक रूप से और है। इसको अगर उत्सव-लीला कहा जाये तो अति सुंदर होगा। लीला का यही अर्थ होता है। और परमात्मा नाच रहा है। अगर साक्षी पर परमात्मा रुक गया होता तो जगत में इतना नृत्य नहीं हो सकता था। इस रासलीला को देखते हो? चांद नाच रहा, सूरज नाच रहे, पृथ्वी नाच रही, तारे नाच रहे, पूरा ब्रह्मांड नाच रहा है। किसी गहन अहोभाव में लीन, किसी प्रार्थना में डूबा सारा अस्तित्व नाच रहा है। सुनो इसकी झनकार, जगत के पैरों में बंधे घुंघरू की आवाज सुनो!

बस आज इतना ही थक गया। अब चिर निंद्रा पर चलने की तैयारी है। शायद कुछ अधिक जीवन के विस्तार का विवरण न दे पाऊं इस के लिए मैं माफी चाहता हूं, छोटा मुख और बड़ी बात कह गया तो एक अज्ञानी समझ कर एक भूल समझ कर माफ कर देंगे तो समझूंगा आपने मुझे प्रेम किया अपना समझा। अब मिलना न मिलना ये तो कर्म के हाथ मैं है। नमन

भू.... भू..... भू.....

आज इतना ही।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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