(सदमा - उपन्यास)
रात का खाना खाने के बाद सब ने प्रोग्राम बनाया की कल सोम प्रकाश को भी उसी वैद्य जी के पास ले कर जाया जाये। दूरी तो कोई खास नहीं थी केवल पाँच-छ: मील की ही थी। परंतु सोम प्रकाश के पैर इतना चल सकेंगे या नहीं कहां नहीं जा सकता। आखिर ये बात तय की गई की कुछ दूर तक चल कर देखा जायेगा अगर सोम प्रकाश को चलने में दिक्कत हुई तो वापस आ जायेंगे। उसका धीरे-धीरे चलना बहुत जरूरी है। फिर एक हफ्ते बाद जब वह ठीक से चल सकेगा तब चलेंगे। सुबह चाय पीने के बाद तीनों वैद्य जी से मिलने के लिए चल दिए। आज सोम प्रकाश की चाल में कुछ फर्क था, वह आराम से चल रहा था। एक हाथ पेंटल ने पकड़ रखा था। नानी इतनी उम्र में भी काफी तंदुरुस्त थी। आधा एक किलोमीटर चलने के बाद जब पेंटल ने सोम प्रकाश को कहां की थके तो नहीं हो। तब सोम प्रकाश न गर्दन हिला कर जवाब दिया नहीं। तब नानी और पेंटल को खुशी हुई। कुछ दूर चलने पर वह तीनों एक पत्थर पर बैठ कर विश्राम करने लगे। हवा में ठंडक थी इसलिये गर्मी लगने का तो सवाल ही नहीं था। उपर से चटक धूप निकल आई थी। और चौथा हरिप्रसाद तो उन मार्ग दर्शक था, जो उनके साथ तो कम ही चलता था। आधा मील या तो आगे या फिर पीछे कानूनी कार्यवाही किन्हीं झाडियों में करता रहता था।
करीब तीन घंटे चलने के बाद वैद्य जी कुटिया नजर आई। बीच में एक लकड़ी का पूल बना रखा था। जिससे उस पार जाना आसान हो जाये। नहीं तो बरसात के दिनों में उस और जाना अति कठिन हो जाता था।
इसे सब की सुविधा के लिए ये लकड़ी का एक काम चलाऊ पूल बनवाया गया। परंतु इस पर तीनों तो चले परंतु चौथा हरिप्रसाद तो नीचे से ही नदी को पार करने में विश्वास करता था। या उसे डर कहें या उसकी समझदारी। क्योंकि बरसात के दिनों पानी का बहाव बहुत तेज हो जाता था। अब तो उसमें केवल एक पतली महीन धारा ही बह रही थी। जो उपर से बर्फ के पिघलने के कारण पानी बन नीचे की और आ रहा था। कितनी हिम्मत दिखाई आज सोम प्रकाश ने जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी। कुटिया में पहुंच कर वह एक बैंच पर बैठ गये। अंदर से स्वामी जी निकल कर आये। और ये देख कर उन्हें बड़ा ही अचरज हुआ की अरे यह तो वह लड़का है जो उस लड़की को लेकर आया था।नानी ने कहां हाँ
स्वामी जी ये वहीं अभाग है। दूसरे की आंच में अपने हाथ जला लिये। नेकी करने के लिए
चला था हो गई नेकी। उस लड़की ने तो पीछे मुड कर भी नहीं देखा। पेंटल ने कहां
स्वामी आप इन्हें एक बार देख लिजिए। तब स्वामी सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर अंदर ले
गए। और उनकी शरीर हाथ पैर की अच्छे से जांच करने और उससे बात करने पर। वह बहार आये
और कहने लगे इनके मस्तिष्क को ‘’सदमा’’ लगा है। जिससे मस्तिष्क के कुछ स्नायु
सुप्त हो गये है। उन्हें उर्जा नहीं मिल रही है। अगर ये सदमा और थोड़ा अधिक हो
जाता तो शायद इन्हें लकवा भी मार सकता था। परंतु ध्यान रखे अब भी इस बात की अधिक
संभावना है। परंतु ये जवान है। और इनके अंदर की जीवेष्णा अति उत्तम है। इसलिए ये
इतनी दूर चल कर आ गया। इस के इतनी दूर चल कर आने से मुझे एक हिम्मत आई की ये ठीक
हो सकता है। परंतु समय के विषय में नहीं कहा जा सकता की कितना लगेगा। लेकिन भगवान
ने चाहा तो अंत अति उत्तम होगा।
तब स्वामी जी एक
बोतल सत की और हाथ पैरों में मालिश के लिए एक तेल दिया। और कुछ जड़ी बूटियां भी दी
की सुबह खाली पेट इसका काढ़ा बना कर रोज इसे पिलाओ। वो जो लड़की ठीक हो गई है। वह
कौन थी इसकी क्या यह उसे पहले भी जानता था। या वह कभी मिलने के दोबारा इसके पास आई।
पेंटल— नहीं स्वामी
जी उसे तो पता ही नहीं की इसे ये बीमारी उसके कारण हुई है। वह तो इसे पहचानेगी भी
नहीं। परंतु आप ऐसा क्या पूछ रहे हो।
स्वामी जी—मैं
इसलिए पूछ रहा हूं की,
दवा तो अपना काम करती है स्थूल तोर पर परंतु प्रेम अति संवेदन शील
होता है। वह अंतस की गहराईयों में जाकर चुप से अपना काम करता है। आप ये सोच रहे
होगे की वह लड़की मेरी दवाई से ठीक हो गई। दूर से देखने में यहीं लगता है। परंतु
वह तो किनारे पर खड़ी थी। अगर यहां नहीं भी लाई जाती तो कुछ समय पा कर वह घर पर भी
ठीक हो सकती थी। बस हमारी दवा ने समय की लम्बाई को कम कर दिया।
पेंटल—तब क्या किया
जा सकता है। स्वामी जी आप तो हर बात को जानते है। इसे आपने पहले भी देख है या ऐसे
हजारों आदमियों का आप उपचार कर चूके है।
स्वामी जी—किसी तरह
से अगर वह लड़की इनके संग रहने के लिए आ जाये। मेरा अपना विश्वास है की यह बहुत
जल्दी ठीक हो सकता है। लेकिन मैं गलत भी हो सकता हूं। परंतु उसके आने से हानि तो
कुछ होने वाली नहीं है। बाकी वह क्या आपकी कोई रिश्तेदार थी।
नानी—नहीं स्वामी
जी हम तो उसे जानते भी नहीं थे। बस ऐसे ही मिल गई। और उस से लगाव हो गया। हमें तो
ये भी नहीं पता की वह कहां की रहने वाली थी।
दवाई लेकर तीनों घर
की चलने लगे। स्वामी जी को उनकी फीस देने के बाद पेंटल ने स्वामी जी के पैर छुए और
तीनों घर की और चल दिये। जिस दूख तकलीफ से वह यहां आये थे उस से एक मार्ग तो खुलता
उन्हें नजर आने लगा था।
पेंटल—ने कहां
क्यों ने नानी जी हम उस लड़की को एक बार इसके विषय में बता दे। तब देखते है वह इस
बात पर क्या प्रक्रिया देती है। कोशिश करने में क्या बुराई है। उसके साथ जो सोम
प्रकाश ने किया है। भगवान के अलावा उसका कोई अपना रिश्तेदारी भी नहीं कर सकता था।
नानी—बेटा बात तू
ठीक कहता है। परंतु पता ठिकाना कैसे मालूम किया जायेगा। मैंने तो उससे कभी पूछा भी
नहीं। अगर पूछती तो कौन वह बतला पाती।
पेंटल—नानी पुलिस
की सहायता ली जा सकती है। मैं कल सुबह उस पुलिस इंस्पेक्टर से जाकर मिलता हूं। की
आप मुझे एक बार उस लड़की का पता अगर दे देंगे तो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। देखो
मेरे दोस्त ने एक पुण्य का कार्य किया है। परंतु उसके साथ क्या हुआ।
नानी—कहो तो बेटा
में भी साथ चलूं। परंतु सोम प्रकाश घर पर अकेला रह जायेगा।
पेंटल- नहीं नानी
आप चिंता न करें मैं सब उपाय कर लूंगा। अगर वह नहीं माना तो मैं सोनी की या उसके
पति की सहायता भी ले सकता हूं।
नानी—हां बेटा अगर
तू सोनी को साथ लेकर जायेगा तो वह इंस्पेक्टर जरूर मदद करेगा।
यहीं तय किया गया
की सुबह नाश्ता पानी करने के बाद पेंटल सोनी को लेकर इंस्पेक्टर के पास मदद के
लिये जायेगा। पेंटल के मन एक बार फिर लड्डू फूट रहे थे की एक बार फिर सोनी को जी
भर कर देखने का मोका मिलेगा। उसके संग साथ कुछ समय गुजारा जायेगा। सोम प्रकाश
धीरे-धीरे चल रहा था। फिर उन्हें घर जाने की ऐसी कोई जल्दी भी नहीं थी। सो आते-आते
श्याम के चार बज गए। आज दिन का खाना भी नहीं खाया गया। घर पहुंच कर नानी ने चाय
बनाने के लिए कहां की तब पेंटल ने कहां नहीं नानी अब पेंटल का ढाबा चलेगा। अब आप
पेंटल ढाबे के हाथ की चाय पीओ। और सच पेंटल खाना भी बहुत अच्छा बनता था। गरमा-गर्म
चाय पीने के बाद बदन को थोड़ी राहत मिल सोम प्रकाश तो थक ही गया साथ-साथ नानी की
भी तो उम्र कोई कम तो नहीं थी। तब आठ-दस मील जाना-आना वह भी पहाड़ी रास्ता पर। सच
ही नानी बहुत हिम्मत की थी।
चाय पीते हुए पेंटल
ने पूछा नानी कैसी लगी पेंटल के ढाबे की चाय। तब नानी ने कहां अरे पेंटल सच ही तू
तो जादूगर है,
इतनी स्वाद चाय तो मैंने पहली बार पी है। आज के बाद चाय केवल पेंटल
के ढाबे से ही आया करेंगी। और दोनों हंस दिये। वातावरण एक दम हलका हो गया था। तब
पेंटल ने नानी से पूछा की जब तुम्हारी शादी हुई थी क्या उम्र थी। बेटा कह नहीं
सकती रही हूंगी कोई 14-15 साल की। और तेरे नाना एक दम से जवान थे। 20 – 21 साल के
गबरू जवान ये मूँछें रखते थे। जब तक जिंदा रहे तेरी नानी को कोई दूख नहीं दिया।
अरे वो जमाना और था वहां पर सादगी का वास था। मुझे तो खाना भी नहीं बनाना आता था।
सब तेरे नाना ने ही सिखाया था। नानी के कोई ओलाद नहीं थी। नाना को मरे करीब 15 साल
हो गए। तब-से अकेली रहती है सोम प्रकाश के साथ। कुछ खेत खलिहान है। घर अपना है। और
नाना फौज में थे सो उनकी पेंशन आ जाती है। तो गुजर हो जाती है किसी के सामने हाथ
नहीं फैलना पड़ता। बेटा परंतु अगर पुण्य प्रताप जीवन का बचा था तो ये मिल गया सोम
प्रकाश। अपना बेटा भगवान ने इसी लिए नहीं दिया ताकि ये मेरा बेटा बन सके। प्रकृति
की गोद में क्या रहस्य छुपा है इसे जानना अति कठिन है।
जब से सोम प्रकाश
हमारे संग साथ आया है वह एक परिवार का सदस्य सा हो गया है। वह नानी के मकान में ही
साथ रहता है। कितनी मिन्नत करने पर भी वह नहीं मानता अपनी सारी कमाई लाकर मेरे हाथ
पर रख देता है। आज अपनी औलाद भी ऐसा नहीं करती। अरे बेटा क्या साथ जाता है। कुछ नहीं
कल तक ये लड़का कैसा था सब की मदद करता था। और आज देखो क्या हो गया। मनुष्य के
जीवन का क्या भरोसा। मुझे क्या पता था की बुढ़ापा अकेले गुजारना होगा। और ये बात
तो ठीक है अगर मैं पहले चली जाती तो तेरे नाना कितने परेशान हो जाते।
पेंटल देख रहा था
की प्रेम भी कैसी तपस्या है। त्याग का अपना ही आनंद है। अगर प्रेम के बीच में मांग
आ जाये तो प्रेम भीख के समान हो जाता है। सोम प्रकाश इतना चलने से थक गया था। अब
उसे अंदर ले जाकर बिस्तरे पर लिटा दिया। ताकी वह थोड़ा आराम कर ले। नानी रात के खाने
का बंदोबस्त करने के लिए चली गई। पेंटल ने सोचा चलो गर्म पानी कर के नहा लिया
जाये। वह बाथरूम में नहाने चला गया।

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