बाजार में दोनों कुछ इधर उधर कुछ देर घुमाते रहे, संतरे, कुछ अंगूर और सेब के साथ कुछ सब्जी भी खरीदी। सोनी ने तो सालों बाद बाजार में जाकर ये सब खरीदारी की थी। वह तो बाजार जाना ही बंद कर चूकी थी। उसकी तो सारी इच्छाएं मृत हो चूकी थी। जब की बाजार की खरीदारी भी आदमी के अंदर एक जीवंतता भरती है। एक प्रेम भरती है। चाहे वह आदमी फल ही खरीद रहा हो परंतु उसके मन में अपने परिवार अपने सहयोग का ध्यान होता है। उसके ह्रदय में एक प्रेम होता है, एक अपना पन होता है, जिस के लिए वह खरीदारी कर रहा है। ये भी प्रेम का एक आयाम है, जो सोनी लगभग भूल ही चूकी थी। आज उसे बहुत अच्छा लग रहा था। आज वह खूद एक-एक फल और एक-एक सब्जी आपने हाथों से चून रही थी। और पेंटल को मना कर रही थी। तुम नहीं चून सकते। ये काम औरतों का होता है। देखो आप एक संतरा चून कर दिखाओ। पेंटल ने एक संतरा उठाया तब सोनी ने कहां की ये अंदर से फोका एक दम से खाली ही होगा। क्योंकि इसमें वज़न नहीं है। पेंटल तो उसका मुख देखता रहा गया था। आज सोनी एक सम्पूर्ण औरत लग रही थी। अपने अंदर एक अल्हड़ बाल पन के साथ एक परिपक्वता जो केवल स्त्री में ही पाई जाती है। उसके चेहरे पर एक चटक नूर झर रहा था। जिस के लिए किसी मेकअप की जरूरत नहीं होती।
वह प्रेम का सिंगार
होता है। जिसे केवल प्रेमी ह्रदय ही पा सकते है। उस प्रेम अमृत से सिंचा हुआ चेहरा
अपना एक अलग ही नूर लिए रहता है। खुशी-खुशी सामना खरीदने के बाद दोनों कार में आकर
बैठ गए। और कार धीरे-धीरे घर की और चल दिये। मन रूक जाना चाहता था और साथ में चाहता
था की समय भी यहीं पर रूक जाये। ये मनुष्य का चित भी कैसा है। जो समय के साथ कभी
मेल मिलाप नहीं कर पाता कभी उससे आगे दौड़ता हुई लगेगा कभी उसके पीछे। यही सब उसे
तनाव दे रहा है। वह अगर सम में जीये तो उस पूर्णता का आनंद ले सकता है। अब ऐसा
करने से न हम कल को पा सकते है,और न बीते कल में ही कुछ बदलाव कर सकते
है। इसके अलावा जो अभी और आज वह भी हाथ से चला जाता है। इसी सब की खोज योगियों ने
की तुम अभी में जीओ। तब तुम उस पूर्णता में प्रवेश कर जाते हो। चाहे संग साथ हो,
या काम हो, चाहे खाना हो। आप अभी-में यहीं बैठ
कर उस में जी कर ही उसको जाना सकते हो। हम केवल विचारों में जीते है। ये मन का
भोजन है। आपके पास अगर शब्द कम होंगे तो आपके पास विचार भी कम आयेंगे। इसलिए आपने
देखा की लेखकों के पास शब्दों की भर मार होती है, इसलिए
विचारों की पूरी रेल भी उनके साथ चलती ही रहती है। प्रेम पर कविता तो लिखेंगे।
परंतु प्रेम को जीना और उस पर कविता लिखना एक भिन्न आयाम है।
ये विचार सोनी के
मन में उठे जा रहे थे। इतनी देर में घर आ गया। तब उसकी तंद्रा टूटी। अरे इतनी
जल्दी घर आ गया। अचानक सोनी ने पेंटल को कहा-हां सुनो। एक काम है। मैंने ये दस
हजार रूपये निकाले है बैंक से सोम प्रकाश की सैलरी के लिए। कहो तो नानी को दूं या
आप ही ले ले तो अच्छा होगा। तब पेंटल ने कहां की लेने को तो में भी ले सकता हूं।
परंतु अगर नानी के हाथ में दोगी तो अच्छा होगा। सोनी ने कहा परंतु मैं पहले भी उस
दिन नानी को पैसे देने की कोशिश करती रही परंतु उन्होंने नहीं लिए। पेंटल ने कहा
उस दिन की बात अलग थी आज मैं हूं आप दे कर देखो फिर बाकी का काम मैं खूद ही सम्हाल
लूंगा। क्योंकि मेरे जाने के बाद नानी अकेली रह जायेगी। फिर नानी की पेंशन ही
कितनी आती है। चार सो रूपये मैं नानी गुजर बरस तो कर लेगी। परंतु इस समय सोम
प्रकाश पर दवाई फल आदि का कुछ खर्च कुछ अधिक ही हो रहा है।
पेंटल ने फल सब्जी
के सब थैले उठाने की कोशिश की परंतु कुछ रह गए क्योंकि वह काफी अधिक थे। हाँ थैला
जो सब्जी आदि के वज़न से भारी था, वह उस ने उठा लिए। और बाकी के लिए सोनी
ने कहां की मैं ले कर आती हूं आप चलों। सब्जी आदि का थैला ले कर पेंटल आगे-आगे
चला। नानी खाना बना कर इंतजार कर रही थी। धूप में कुर्सियां लगी हुई थी। पेंटल को
देख कर खुशी से खड़ी हो गई की चलो अच्छा हुआ तुम समय से आ गये मैं तो समझ रही थी
पता नहीं आओगे या नहीं। और नानी एक तिलिस्म भरी हंस दी। जिससे पेंटल देख रहा था
नानी का बाल वत चेहरा कैसे खिला-खिला सा लग रहा था। और पेंटल ने हां में गर्दन
हिलाई। नानी तुम जवान हो रही हो। लगता है तुम्हारे लिए कोई नाना .....और नानी ने
उसकी पीठ पर प्यार से एक हाथ मारा मजाक करता है अपनी नानी के साथ।
अरे तेरे नाना ने
इतना प्रेम दिया है की वह खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। वह खत्म हो तो कोई
दूसरे के बारे में सोचे। अब तो तेरा नम्बर है। बोल बात करूं। और नानी आप भी
ना.....वह तो शादी शुदा है। तब तो नानी के साथ मजाक नहीं करेगा। और पेंटल ने मेरी
बला से भूल कर भी आप से जीत नहीं सकूंगा। नानी क्या सोम प्रकाश के सर पर तेल की
मालिश कर दी थी। हां बेटा तब से वह चेन से सो रहा है। मानो उसके जलते मन पर किसी
ने शीतल जल छिड़क दिया। लगता है दवा अपना काम कर रही है। और हां तू जिस काम के लिए
गया था वह हो गया। तब पेंटल ने कहां हां नानी सब बात बन गई। उस लड़की का पता मिल
गया। खाना तो बना रखा होगा आपने बहुत जोर भूख लगी है। हां बेटा बस तुम लोगों का
इंतजार कर रही थी। इतनी देर में सोनी भी फलों के थैले हाथ में लिए वहां पहुंच गई।
और थैले जमीन पर रख कर सर पर पल्लू कर उसने नानी के पैर छुए। नानी के लिए ये एक दम
नई बात थी। सदा सुहागन रहो। पुतो फलो। नानी के मुख से निकला ही था, की
सोनी एक दम से शर्मा के लाला हो गई। नानी ने उसे उठा कर गले से लगा लिया। सोनी की
आंखों में आंसू थे। मानो सालो बाद मां का प्रेम उसे मिला है। प्रेम का झरना जब
बहता है तो उसमें चारों और से कितने स्त्रोत आ कर मिल जाते है।
किचन में सामान रख
कर सोनी ने नानी को एक तरफ ले जाकर कहां की नानी एक बात के लिए तुम मना मत करना
मैं तुम्हारी बेटी के समान हूं। सोम प्रकाश की सैलरी के कुछ पैसे साहब के कहने से
लाई हूं। क्योंकि घर में दवा दारू की जरूरत है। ये उसकी मेहनत के है। आज नहीं कल
वह ठीक होकर फिर अपनी नौकरी पर चला जायेगा। और उसने दस हजार रूपये नानी के हाथ पर
रख दिये। नानी ना कहना चाह रही थी। परंतु सामने पेंटल भी देख रहा था। और उसने आँख
के इशारे से कहां की रख लो। तब नानी चाह कर भी कुछ बोल नहीं पाई। और अंदर अलमारी
में पैसे रखने के लिए चली गई। उधर सोनी ने सब्जी को किचन में सज़ा दिया। और पेंटल
ने फल आदि फ्रिज में रख दिये। तब कहां की क्या सब्जी बनी है। बहुत अच्छी खुशबु आ
रही है। इतनी देर में नानी ने प्रवेश किया की हां बेटी इस पागल के मतलब की सब्जी
बनी हुई है,
परंतु इसके आने की उम्मीद मुझे कम ही थी।
बैंगन का भर्ता और
दाल चावल के साथ सब मिल कर भोजन करते है। सोनी तुम खाना परोसो। तुम आज हमारे साथ
खाना खा कर ही जाना। सोनी ने जल्दी से हाथ धोए। और कहां की नानी मैं नहीं जानती
कितना खाना किस के लिए परोसना है, इसलिए आप परोसो में सब को देती हूं। और
पेंटल ये सब खड़ा देख रहा था। तब नानी ने कहा की बंदर की तरह से क्या देख रहा है।
जाकर हाथ मुंह धो कर कुर्सी पर बैठ कर खाने का इंतजार कर। इस सब नोक झोक को सून कर
सोनी अति प्रसन्न हुई। आज सब के साथ खाना खा कर सोनी को कितना सूखद महसूस हो रहा
था। शायद वह उसे बता नहीं सकती थी। कभी वह अपने छोटे से परिवार के साथ जब खाना
खाती थी। तो रूखा सूखे में भी कितना स्वाद था। इसलिए आपने देखा की खाना जब भी आप
साथ-संगत के मिल-झूल कर साथ खाते है, तो उसका स्वाद कई गुणा
अधिक हो जाता है। चाहे वह खाना फिर प्रकृति के संग साथ ही क्यों न हो।
जीवन भी एक रस है।
प्रेम के रस से ह्रदय के वो द्वार खुलते है। जिससे परमात्मा में भी डूबा जा सकता
है। नानी ये सब घटता हुआ देख रही थी। ये लड़की कल तक क्या थी और एक ही रात में इसे
क्या हो गया सब बदल गया। सारे समुंदर की अल्केमी रसायन की एक बूंद बदल सकती है। शरीर
की तो क्या मजाल है। क्योंकि हम सब बुद्धि से समझना चाहते है। परंतु बुद्धि से जो
समझ न आये सही मायने में वह आदमी अनंत की यात्रा की और ले जाती है। जो यात्रा
पर-रस से शुरू होती है,
वह भी जीवन का एक पड़ाव है। जब उससे उब पैदा होती है, तब मनुष्य विरस की और मुड सकता है। विरस तो नकारात्मक स्थिति है; पर-रस की प्रतिक्रिया है। तो कोई विरस में रुक नहीं सकता, वैराग्य में कोई ठहर नहीं सकता। जब राग में ही न ठहर सके तो वैराग्य में
कैसे ठहरेंगे! विधायक में न ठहर सके तो नकारात्मक में कैसे ठहरेंगे! भोग में न रुक
सके तो योग कैसे रोकेगा!
ठीक इसके विपरीत जब
विरस धीरे-धीरे विलीनता में डूब जाता है तो स्वरस पैदा होता है। स्वरस एक और सीढ़ी
है। वह पहले से बेहतर है। एक मुक्ति जैसा आभास देता है। पर रस भी समझ में आता है
विरस भी समझा जा सकता है। और इसके अलावा स्वरस में भी डूबा जा सकता है। क्योंकि यहां
तक बुद्धि अपना कार्य करती है। ठीक इसके पार कभी अमन की अवस्था में किसी उतुंग
शिखर पर जब कोई रस की बूंद पैदा होती है। तो न प्रिय रहता है न प्रेयसी ही। उसे ही
परमात्मा का रस कहा है। योगियों ने। इसलिए प्रेम परमात्मा के सबसे करीब है। वही से
झलक आती है। उतुंग सूर्य की लालिमा की तरह से। किसी गहरे तल में विभेद मिट जाता
है। और एक किरण फूट पड़ती है आकाश में। इसलिए रस अपने में एक संपूर्णता समेटे चलता
है। उस बूंद में सम्पूर्ण सागर समाया होता है। जो इसे पा लेता है वह किसी मार्ग से
ही क्यों ने हो। कला के मार्ग, कर्म के मार्ग, ध्यान
के मार्ग या प्रेम सम्पूर्ण के मार्ग से।
वह दुनियां का सबसे
भाग्य शाली इंसान होता है। और इसके लिए तड़प होनी चाहिए। तुम्हारी प्यार इस किनारे
पर पहुंच जाये की एक बूंद न मिली तो जीवन समाप्त तभी ये रस झरता है। उतना उत्ताप्त
उतनी अग्नि प्रज्वलित करनी होती है। प्रेमी को या योगी को। और ये हो गया अचानक
सोनी के साथ। शायद ये उसकी चाहत भी नहीं थी। परंतु पूर्ण प्यास ने उसे इस किनारे
से उस किनारे पर लाकर पटक दिया।
सब ने खाना खाया
फिर सोनी ने सारे बर्तन उठा कर अंदर किचन की और चल दी। नानी ने कहां अरे ये क्या
कर हो बेटी। आप को ये शोभा नहीं देता। हमारा तो रोज का काम है। आप बैठो में ले कर
चलती हूं। तब सोनी ने कहां नहीं नानी कर लेने दो बहुत दिन हो गया। सब अंदर भरा हुआ
है वह जहर बने जा रहा था। सच ही सोनी के तन मन से प्रेम झर रहा था। उसकी आंखों में
एक खुमार था। जरूरी नहीं हम सब बुद्धि से ही जाने। भाव और ह्रदय की बहुत कीमती है।
बुद्धि से तो थोथा ही जाना जा सकता है।
इतनी देर में सोनी
ने सब बर्तन साफ किए नानी ने चाय बना दी। और सब बाहर बैठ कर चाय पीने लगे। सोनी ने
सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर कहां सोनू, देख हम तेरे घर आये है,
और तुम मुझसे बात तक नहीं कर रहे हो। क्या अभी तक नाराज हो। और सोम
प्रकाश ने उस प्रेम भरी छुअन को महसूस किया और उसके चेहरे पर एक महीन मुस्कान फैल
गई। बतलाओ चाय कैसे बनी। तुम को कड़क चाय बहुत अच्छी लगती थी। जब भी मेरे यहां आते
थे तो ....। और सोनी की आंखों से झर-झर आंसू गिरने लगे। सोम प्रकाश ने उसे देखा और
अपना हाथ सोनी के हाथ पर रख दिया। ये देख का सबके मन में एक खुशी की लहर दौड़ गई
की उसके प्राणों में संवेदना फैल रही है।
जब सोनी जाने लगी
तो सब खड़े हो कर उसे विदा कर रहे थे। पेंटल तो उसे गाड़ी तक छोड़ने के लिए गया।
लेकिन एक बात अचरज भरी थी की जब गाड़ी के पास से सोनी ने सब को बाए-बाए किया तो
सोम प्रकाश भी उन्हें बाए-बाए कर रहे थे। ये देख कर सब को अच्छा लगा की सुखे वृक्ष
में कोपलें निकल रही है।

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