अध्याय -45
दादा जी की मृत्यु
मेरे मन में रह-रह
कर कुछ अजीब से विचार आ रहे थे। जिन्हें मैं एक लयवदिता में जोड़ना चाहूं तो भी
जोड़ नहीं पा रहा था। कुछ टूटे टुकड़ों की तरह जो मानो इधर उधर सब फैले हो। मुझे
अंदर से ऐसा लग रहा था की घर में कुछ अशुभ होने वाला है। और ये मेरी बीमारी का
नाटक भी मेरी मर्जी के बिना मेरे अचेतन में मुझसे कराया था। ये सब मेरे मन का वहम
था या सच ही कुछ अशुभ होने वाला था। ये तो समय की गोद में छुपा था। परंतु अगर हम
संवेदन शील है तो हम उनकी एक झलक, उन पद चापो की हल्की सी आहट तो सुनाई दे
जाती है। लेकिन इसके लिए आपका सजग होना या संवेदनशील होना आवश्यक होता है। खैर मैं
लाचार था मेरे पास शब्द नहीं थे, मैं उसे समझ भी नहीं सका था,
और न ही उसकी व्याख्या ही कर सकता था। परंतु कुछ जरूर है जो समय
मुझे दिखा रहा है। परंतु न मैं खुद ही उसे समझ पा रहा हूं और न ही उस सब से परिवार
को आगाह ही कर पा रहा था।
एक दिन गुजर गया और मुझे थोड़ी राहत मिल, चलो हो सकता है मेरे अंदर की बैचेनी किसी और कारण से हो। या मेरा चित तनाव के बाद शांत हो रहा हो तो ये मार्ग की गति भी हो सकती थी। अब पापा-मम्मी को पूना से रोकने का जो नाटक किया था वह सब भूल गया था।
क्योंकि उसके विषय में मुझे कोई डाट ही नहीं पड़ी न ही मुझ उसका दोषी ही माना गया। उसे पापा जी ने अपने प्रेम का एक आयाम मान कर ह्रदय से स्वीकार कर लिया कि जो बेचारा पोनी कर सकता है वही तो किया। वह शायद हमें अपने से दूर जाने नहीं देना चाहता था। उस समय मुझे याद है, जब मैं धूप में लेटा था। आज कल कई दिनों से दादा जी धूप में नहीं आते। क्योंकि काम तो अब चल नहीं रहा था। इसलिए पापा-मम्मी भी ऊपर छत पर ही धूप में विश्राम कर रहे थे।बच्चे अपने-अपने
काम में व्यस्त संलग्न थे। दीदी अब बड़ी हो गई थी। वह काम व खाना बनाने में मम्मी
जी की बहुत मदद करती थी। जब वह दो-चार महीने के लिए आश्रम चली जाती थी। तब तो सब
काम अकेले मम्मी को ही करना होता था। क्योंकि एक तो जब से मैं आया था घर में काम
करने वाली हमेशा से थी परंतु न तो मैंने उसे खाना बनाते कभी देखा...यानि वह केवल
बाहर का ही काम करती थी। बर्तन भी कभी नहीं धुलवाती मम्मी जी। इसके अलावा पिरामिड
में पापा या दीदी ही सफाई करते थे। बाकी जगह की सफाई काम वाली करती थी। शायद दीदी
खाना बना रही थी। आज कल वह बहुत ही अच्छा खाना बनाती है। कुछ खाने तो वह मम्मी से
भी अच्छे बना लेती है। जैसे दाल ढोलकी, राजमा, शाही पनीर....लोबिया आदि लेकिन कढ़ी तो मम्मी से अच्छी कोई बना ही नहीं
सकता।
तभी अचानक नीचे कुछ
शोर गुल सुनाई दिया और मैं अचानक खड़ा हो गया। मुझे इस तरह से खड़ा होता देख कर
पापा-मम्मी भी चौंके कि क्या बात है। और मैं भौंकता हुआ नीचे की और भागा। नीचे
जाकर देखा वह मैं आपको बता नहीं सकता। दादा जी बाथरूम में गिरे पड़े थे उनके सर से
खून बह रहा था। दीदी उन्हें उठाने की कोशिश कर रही थी। परंतु वह हिल नहीं रहे थे।
इतनी देर मैं वरूण भैया भी आ गए। उन्होंने दादा जी को उठाया वह आंखें खोल कर देख
रहे थे। सारे शरीर पर साबुन लगा था। पहले तो वरूण ने और दीदी ने बाल्टी में जो
पानी था उससे उनके शरीर का साबुन उतार। फिर उठा कर अंदर सोफे पर लिटा दिया। सर से
अब भी खून बह रहा था।
दीदी रो रही थी, घबरा
भी रही थी। इतनी देर में मम्मी-पापा भी आ गए। वह भी देख कर घबरा गए। कि क्या हो
गया। तब वरूण भैया को डा0 को बुलाने के लिए भेजा। डा0 ने आकर सब चेक किया तो कोई
खास गहरी चोट नहीं आई थी। सर पर नल लग जाने से सर से खून बह रहा था। वह इंजेक्शन
देकर, पट्टी बाँध कर और दवाई देकर चले गए। घर के लोगों को तब
जाकर थोड़ा चेन हुआ। परंतु दीदी घबरा रही थी कि ये सब उसके कारण हुआ है। पापा जी
ने उसे समझाया कोई बात नहीं आगे से इस बात का ध्यान रखना। क्योंकि पापा जी सख्त
मना किया हुआ था की आप बाथरूम में स्नान मत किया करो। क्योंकि दादा जी हमारे
जिद्दी बहुत थे अगर आपने एक बात कह दी तो वह उसे जरूर करेंगे।
अब वह होश में थे
और दूध में हल्दी डाल कर मम्मी ने गर्म कर दिया था उसमें थोड़ा घी भी डाल दिया था
उसका आनंद ले रहे थे। चारों और उनके सारा परिवार खड़ा था। तब कहने लगे कि मुझे
क्या हुआ है कुछ भी तो नहीं। अगर इस तरह से मौत अगर आये तो उससे भाग्यशाली व्यक्ति
क्या कोई हो सकता है। दादा अब अपने जीवन को किस पूर्णता से जी रहे थे। ये मैं सब
देख रहा था। उन पर किसी किस्म को कोई काम या दबाव नहीं था। और न ही किसी बात की
चिंता थी उन्हें वह एक दम से मस्त मोला की तरह से रहते थे। वह अपने लिए सजगता के
साथ-साथ पूर्णता से जी रहे थे। और इस अपने अंतिम समय अधिक से अधिक ध्यान और
प्रकृति के पास ही गुजारते थे। केवल एक समय का भोजन करते थे। अब दादा का चित एक दम
से शांत मोह रहित दिखाई देता था। हमेशा अपने पर गुजरे पुराने दिनों को याद कर खुश
ही रहते थे। आपने आस पास सारे परिवार को देख कर दादा जी अपने दुख को पल भर में भूल
गए।
वैसे दादा जी के
बचपन का जीवन अति कठिन था,
बताते थे कि जब वह मात्र 11 साल का थे तब उनके पिता की मृत्यु हो गई
थे। बड़े भाई उनसे केवल तीन साल ही बड़े थे बाकी के दो भाई और दो बहनों को बोझ
इनके दोनों के कंधे पर आ गया। सख्त मेहनत और नियमित व्यायाम और अच्छे खान पान से
आज 94 साल में भी उनका शरीर 5-6 किलोमीटर तक सेर करने में जरा भी नहीं थकता। आज भी
घी-दूध, दही बड़े चाव से खाते है। दादा जी के चेहरे पर
मृत्यु का कोई भय नजर नहीं आ रहा था।
फिर भी पापा जी ने
कहा की आपको कितनी बार मना किया की खड़े होकर मत नहाया करो। क्योंकि इस उम्र में
शरीर में लचक खत्म हो जाती है। इसलिए या तो कपड़े बदलते हुए या शरीर पर साबुन
लगाते हुए शरीर का संतुलन बिगड़ ही जाता है। दादा जी अपनी चिर परिचित मुस्कान के
साथ कहने लगे मनसा तु भी पागल ही है जो लिख है वह तो होता ही है। और अपने
छोटे-छोटे घिसे हुए दानों की हंसी चारों और बिखेर दी। दादा जी के इस उम्र में भी
काफी दांत थे। हां वह समय पाकर घिस जरूर गए थे। परंतु वह काफी मजबूत थे। दादा जी
को उसके बाद नीचे वाले ध्यान के कमरे में लिटा दिया गया। की अब तुम यहीं पर रहा
करो।
दादा ने मना कर
दिया कि पूरी जिन्दगी जब वहां कटी है तो मुझे दूसरी जगह नींद नहीं आती फिर मेरी
आंखें भी तो सुबह जल्दी खुल जाती है। सो कुछ देर आराम करने के बाद दीदी ने दादा को
खाना दिया जिसे खाकर वह चले गए। दादा जी जब खुश होते तो हमेशा कुछ गाते रहते थे।
वह हंस रहे थे कि मनवा (दीदी) तु तो अब बहुत अच्छा खाना बनाने लग गई है। परंतु
अपनी मम्मी से अच्छा कभी नहीं बना सकेगी। तेरी मम्मी के हाथ का खाना खाने के कारण
तो आज तेरा दादा इस उम्र में भी कितना स्वास्थ्य है। उसके बाद वरूण ने उन्हें कुछ
गोलियां खाने को दी जो डा0 साहब दे कर गए थे। कुछ देर और दादा ने वहां विश्राम
किया परंतु दादा को आप एक जगह बाँध कर रख नहीं सकते थे। बस कुछ देर बाद दादा जी तो
अपना डंडा उठाया और जुतिया पहनी पट्टी जो बंधी हुई थे उसके ऊपर अपना सफेद साफा
बांधा और चल दिए अपने भ्रमण पर।
यहीं था दादा का
जीवन पूरी उम्र जो मेहनत की थी उसका फल अब दादा को मिल रहा था। अब मुझे भी दादा जी
अच्छे लगते थे। जंगल मैं भी जब मुझे मिलते तो मुझे खूब प्यार करते थे। अपने खाने
में से एक टूकड़ा तो हमेशा देते थे, वह तो मेरे लिए प्रसाद का
काम करता था। दो तीन दीन में तो दादा जी ने अपनी पट्टी भी उतार दी थी। अब तो पता
भी नहीं था की उनको कोई चोट लगी थी। दवाई तो वह खाते ही नहीं थे। शरीर स्वास्थ्य
होने के कारण अपनी रक्षा वह खुद ही कर लेता है।
अब मैं भी अपने
बुरे सपने उन बुरे विचारो को लगभग भूल गया था। शायद यहीं हो की दादा जी को चोट
लगनी थी और वह कितनी अधिक लगनी थी जिसे हमारे कर्म कम या ज्यादा में बदल देते है।
लेकिन अचानक मम्मी जी जब दुकान पर जब पापा जी पहुंचें तो मम्मी जी घर आ गई थी। उसे
बुलाया और कहा की वरूण और हिमांशु को भी साथ ले आना दुकान पर जाकर पता चला की दादा
जी जब जंगल में गए तो उन्हें कुछ चोट लग गई। मैं भी सोच रहा था की जंगल में तो ऐसा
होना अति कठिन है। क्योंकि न तो वहां कोई उंचाई से गिरने का स्थान है फिर ये कैसे
हुआ। पापा जी के दोस्त जो महाशय जी है उन्हीं ने किसी चरवाहे के हाथों संदेश
भिजवाया था।
बाद में पता चला की
श्याम को दादा जी एक पेड़ के नीचे बैठ कर ध्यान कर रहे थे। और एक गाय ने न जाने
क्यों उन पर हमला कर दिया। उन्हें काफी चोट लगी थी। दादा जी अपने ध्यान की मुद्रा
में बैठे थे। शरीर भी ढीला होगा। न जाने क्या सोच कर उस पागल गाये ने दादा जी पर हमला
कर दिया। पेड़ के सहारे बैठे होने के कारण...सींग उनके दाएं पेट में घूस गया। और
मुख पर भी काफी चोट लगी थी। वह सम्हल ही नहीं पाए वरना तो दादा जी अपना डोगा हमेशा
साथ रखते थे। खड़े हुए पर अगर हमला होता तो शायद इतनी चोट नहीं लगती। शायद दादा
अपना बचाव भी कर लेते।
पापा-वरूण और
हिमांशु दादा जी को दुकान पर लेकर आये फिर उन्हें अस्पताल में गये जहां उनका इलाज
हुआ 6-7 दिन चला। अस्पताल में पापा जी उनके पास दिन-रात रहे थे। दादा जी एक की एक
टाँग भी टूट गई थी। पेट में सींग लगने से दो पसलियां भी टूट गई थी। तब डा0 लोगों
ने कहां की बस एक दो दिन का मेहमान है आपके पिता जी। चाहो तो आप इन्हें घर ले जाओ
और जो सेवा करनी हो कर लो।
अब ने तो इनका
आपरेशन किया जा सकता है। क्योंकि उनकी टाँग कूल्हे के पास से टूटी है। और अंदर की
चोट भी बहुत है। शायद उन्हें बहुत अधिक दर्द हो रहा होगा। बस अब तो ये अपना शरीर
जितनी जल्दी छोड़ दे वही से इनके दर्द से राहत मिलेगी। उन जमाने के डा0 लोग बहुत
अच्छे होते है। अब तो मैं देखता हूं जब मुझे डा0 के पास ले जाया जाता है वह तो जरा
दया नहीं करते। उसके बाद दादा जी से सब लोग मिलने के लिए आये, गांव
से या दूर से भी बुआ जी भी मिलने आई। वह तो कहने लगी की मनसा, चाचा तो ठीक है। तुम तो कह रहे थे की इसे बहुत चोट लगी है। परंतु आप दादा
जी के चेहरे को देख कर कह नहीं सकते। वह कुछ खाने नहीं थे। बस थोड़ा जूस या पानी
ही पीते थे। मुझे भी अपने पास बुलाते मैं चारपाई पर दोनों पेर रख कर उन्हें सूंघकर
देखना चाहता था की उन्हें क्या हो गया है। वह उठते क्यों नहीं खाना भी नहीं खाते
जो मुझे कुछ एक टुकड़ा ही मिल जाता। दादा जी ने मेरी गर्दन के बालों को सहलाते हुए
कहां पगले अब तो मैं रोटी भी नहीं खा सकता। मेरे अंदर का सब बंद हो गया है। अपने
मुख को घूमा भी नहीं सकता। मुझे अचरज होता था की। जब बोल सकते है तो खा भी सकते है
परंतु कुदरत का रहस्य कुछ और ही है जिस मानव नहीं समझ सकता और न खोल सकता है।
कितने ही गांव के
लोगों के साथ एक बुर्जुग जोड़ा भी मिलने के लिए आया। जो पापा जी के लिए चूरमा भी
लाया था। वह पापा जी के साले यानी की हमारे मामा जी थे और साथ में मामी जी। वह
अपने नंदेऊं के लिए प्रेम से चूरमा बना कर लाई थी दादा जी ने उसे मुख में रखा और
कितनी ही देर उसे घुमाते रहे। परंतु वह अंदर नहीं गया। ये सब देख कर मामी रो दी।
वह समझ गई की आ दादा जी का जाने का समय हो गया है।
दादा जी को अपनी
मृत्यु का पूर्ण एहसास हो गया था। उन्होंने जीवन के वो उतार चढ़ाव देखे थे। उन्हें
जिया था। और इस किनारे तक आने के लिए जा संघर्ष किया था आज वह कितना मधुर व पूर्ण
है। इसलिए मैंने ही नहीं कहना चाहा था ये बात खूद दादा जी ने पापा को बोल दि थी। देख
मनसा मेरी बात को ध्यान से सून की अब की बार अगर तुम पूना न जाओगे तो ठीक नहीं
रहेगा। कारण पापा जी ने पूछा तो वह चुप हो गए। उन्हें अपनी मृत्यु की आहट सुनाई दे
रही थी। और ये काम मेरे सर पर आया की मैंने पापा-मम्मी को जाने से रोक दिया था।
नहीं तो कितनी खराब बात हो जाती अंतिम समय पापा जी अपने पिता के पास नहीं होते।
चलो जो होता है सही ही होता है परंतु अगर उसे हम सही या गलत का नाम देते है तो
अपने मतलब के हिसाब से मान कर ही देते है। कि अगर ऐसा हो जाता तो ठीक था वैसा हो
जाता तो ठीक था।
दो दिन पहले दादा
जी थोड़ा बहुत जूस जो पीते थे वह भी बंद कर दिया। केवल थोड़ा पानी पीते रहे। उस
अंतिम रात को तीन बजे मम्मी पापा जी जब दुकान पर जाने से पहले दादा जी के पास गए मैं भी साथ था। दादा जी ने
पानी मांगा मम्मी पानी लेकर कटोरी में डाला और पापा न चम्मच से उनके मुख में डाला
एक चम्मच जल अंदर गया दूसरा चम्मच केवल दादा जी के गले में रह गया। दादा जी की
आंखों में चमक थी। उन्हें कोई भय नहीं था। वह सब कुछ देख कर जीवन से पक कर जा रहे
थे। अब उनके जीवन के स्वर्णिम दिन थे। सच ही उन्होंने अपने जीवन को परिपूर्णता से जिया
था। दादा जी के अंतिम वचन जो उन्होंने तीन दिन पहले पापा-मम्मी जी को कहे थे। तुम
भी ध्यान के मार्ग पर चल दिए। इस बात की मुझे अति प्रसन्नता है। अंतिम मेरी विदाई
में आप लोग मेरा सहयोग दो मेरा जो भी थोड़ा मोह का धागा बंधा है उस मुझे छोड़ने
में सहयोग दो। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी मेरे लिए। उन्होंने मम्मी के सर पर हाथ
रखा, मुझे भी अपने पास बुलाया और पापा-मम्मी जी आंखों से झर-झर आंसू बह रह रहे
थे। दादा जी चेहरे पर एक अनमोल हंसी थी, वह आपने होंठों पर
उँगली रख कर मम्मी-पापा को चुप करने की मुद्रा में उन्हें रुकने के लिए कह रहे थे।
और इस मुद्रा में हंसी थी उनके चेहरे पर, चेहरा चमक रहा था।
वहां भय की कोई लकीर नहीं थी। इस तरह से तुम मुझे विदा मत करो तुमने तो वो सब किया
है जो करोड़ों में कोई एक बेटा-बहु करता है। अपने साथ-साथ तुमने तो अंतिम समय पर
मुझे भी वो मार्ग दे दिया जिस पर चल कर मैं धन्य हो कर जा रहा हूं। ध्यान का मार्ग
तू मेरा बेटा तो परंतु मैं तो मन से तुझे अपना गुरु मान रहा हूं। तेरे जैसा बेटा
तो किसी भाग्य शाली के घर जन्म लेता है। मुझे क्या पता था जो नाम मैं तेरा रख रहा
हूं वह पूर्ण है। मैंने तो मन की इच्छा की पूर्णता के कारण तेरा नाम ‘मनसा’ रखा की
मेरे तन-मन के साथ आत्मा की इच्छा पूर्ण हुई।
दूर गीदड़ों की
हुंकार जंगल से आ रही थी। चारों और कैसे गहरी शांति छाई थी। वह भिन्न प्रकार का
सन्नाटा था। जिसे में अपने चारों और खड़े देख रहा था। दूर तारें आसमान पर निर्भय
होकर चमक रहे थे। यहां दादा जी जाने की तैयारी कर रहे थे ये सब मेरी आंखों के
सामने घट रहा था। दादा जी ने एक गहरी श्वास ली और तीन हिचकिया आई और शरीर निर्जीव
हो गया। मैं ये सब देख रहा था की क्या मृत्यु इतनी सरल और सहज है। तब क्यों हम
उससे डरते है। पाप रो पड़े मम्मी भी रो रही थी। रात के सन्नाटे एक क्रंदन मिल गया
था। आसमान पर पूर्णिमा का चाँद चमक रहा था। पूरा अंगन उसके प्रकाश से नहा रहा था।
मैंने मम्मी के कंधे पर अपने पंजे मार कर चुप करने को कहा। रोने को मेरा कलेजा भी
फटा जा रहा था। कि कैसे एक आदमी इस पार से उस पार पल में चला जाता है। पापा जी ने
दादा के सर पर एक चादर से ढक दिया उनकी आंखों को अपने हाथों से बंद कर दिया। दादा
जी कि आंखें मरने के बाद भी ऐसा लग रहा था की हमें देख रही थी।
बच्चों को उठाया
गया। पास के चाचा ताऊ को खबर पहुंची उस दिन दुकान नहीं खुली थी। हजारों लोग
जिन्हें दूध की जरूरत रहती थी। वो लोग परेशान थे। घर के सामने आकर खड़े हो गए। की
क्या बात है जब उन्हें पता चला की ये बात है। तब वो भी क्या कहते। पूरा घर उस दिन
लोगों से भर गया मुझे ऊपर एक चेन से बाँध दिया गया। दूर-दूर से रिश्तेदार आये थे।
और दादा जी की अर्थी को खूब सजाया गया। फूल और पैसे बिखरते सब लोग दादा जी को लेकर
चल दिये। दुकान के पास ही बड़े पापा का घर था। मैं तो उनके घर कभी नहीं गया। परंतु
अपनी दुकानों की छत पर जब जाता तो नीचे झांक कर देखता था। या जब पापाजी बड़े पापा
जी से बाते कर रहे होते थे। दोनों भाइयों की आवाज और शक्ल एक जैसी थी।
तीन दिन बाद पापा, भैया
दीदी सुबह ही तैयार होकर कहीं जा रही थी। मैंने सोचा की मैं भी साथ चलूंगा। परंतु
ये मेरा भ्रम था। पूरे दिन से गये कहीं जाकर देर रात को घर आये। तब कही जाकर मुझे
पता चला की ये लोग कहीं दूर दादा जी के फूल गंगा नदी में तर्पण कर के आ रहे है।
मैं सोच रहा था की मुझे भी साथ ले जाते तो मुझे भी कितना ही मजा आता परंतु पाप
दीदी भैया लोग ही नहीं पूरे परिवार के अलावा एक छोटी बस कर के करीब गांव चालीस लोग
गये थे। इसी लिए तो मुझे ले कर नहीं गए वरना अगर पापा-दीदी हर जाते तो मैं जरूर
जाता।
बड़े पापा का मकान
हमारी दुकान से सटकर था। मैं जब भी उनको या उनके बच्चों को देखता तो मुझे वरूण की
झलक उनके बच्चे में दिखाई देती कभी-कभी तो मुझे भ्रम भी हो जाता। बड़े पापा को देख
कर पापा जी की कितनी झलक मिलती थी। परंतु मैं उन लोगों से कभी नहीं मिला न ही कभी
उनके लोगों के घर कभी गया था। और शायद मेरी जब तक याद है बड़े पापा न तो इस मकान
को देखने ही भी कभी यहां पर आये। और बहुत लोग गांव के आते थे। परंतु ये कैसा प्रेम
जो भाई-भाई से नहीं मिलता उसके पास नहीं आता बुआ जी तो कितने-कितने दिन तक पापा जी
के पास मिलने के लिए आती है। ये भी तो बहन भाई है। और हमेशा मेरे लिए भी खाने का
सामान लाती है। मुझे भी हमेशा उनका इंतजार होता है। जब कभी मम्मी पापा कहीं चले
जाते थे तो दीदी हमेशा बुआ जी को बुला लेती थी। और बुआ जी अपना घर समझ कर आती थी, मुझे
पता नहीं उनका घर कितनी दूर है और कहां पर है? परंतु पापा जी
और दीदी में प्रेम है मम्मी भी बुआ जी को मान सम्मान और प्रेम करती है। शायद
मनुष्य ही नहीं पृथ्वी का प्रत्येक प्राणी ही प्रेम का भूखा है। बिना प्रेम के कोई
कैसे जीवित रह सकता है।
गांव में दादा जी
का एक अलग सम्मान था,
गांव में इस समय वह सबसे बुजुर्ग थे। वह अपना स्थान इस घर में ही
नहीं गांव के हर गली चौराहे को खाली कर गए। अब जब मैं दुकान पर जाता तो उनके कमरे
में भी जाता तो वहां कुछ भी सामान नहीं था। मुझे अचरज होता था की सामान कहां चला
गया। बाद में पता चला की दादा जी चारा पाई उनके कपड़े जूते संदूक सब लोगों को बांट
दिए गये जिसे जरूरत हो ले जाए। कोई दादा का हुक्का ले गया। काई चारपाई, कोई बिस्तरा, कोई कपड़े। कमरा एक दम से खाल था। पंछी
उड़ गया था पिंजरा खाली रह गया था। काफी दिन तक उनकी जगह ह्रदय में भी एक खाली पन
का एहसास करती ही रहेगी। क्यों ऐसा होता है क्या मेरे जाने के बाद भी पापा-मम्मी
आदि मुझे याद करेंगे और मेरा इतना सामान है। क्या वह भी बांट दिया जायेगा। वैसे इस
बात कि आदत मुझे बचपन से हो गई थी। जब पापा-मम्मी आदि जंगल में कुत्तों को दूध या
रस आदि खाने को देते थे तो मुझे कभी बुरा नहीं लगता था और मुझे गर्व ही होता था।
दूर तक दौड़-दौड़ कर दूसरे पिल्लों को भी बुला लाता था की चलों यहां क्या रहे हो
वहां तो माल लूट रहा है। और मैं चाहता हूं की मेरे मरने के बाद मेरा जो भी सामान
हो किसी को दे दिया जाये। चाहे वह खाने का या पहनने का हो।
अगर मेरे मरने के
बाद भी ऐसा किया जायेगा तो मुझे बहुत गर्व होगा। मेरा नरम मुलायम कोट, नर्म
बिस्तरा, कम्बल आदि को बाद में कोई उपयोग करें तो कितना ही
अच्छा होगा। एक श्याम जब सारा परिवार बैठा था जब पापा जी ने मुझे अपने पास बुलाकर
गले से लगा लिया और रोते हुए कहने लगे पोनी ने सच कितना अच्छा काम किया अगर हम
पूना चले जाते और यहां दादा जी के साथ ये सब घटता तो कितना खराब काम हो जाता।
मैंने अपनी गर्दन झुका ली। मेरी आंखों में भी आंसू थे। मेरी ही नहीं सारा परिवार
रो रहा था। ये प्रेम के आंसू थे। दादा जी का प्रेम आज भी इस घर में इस परिवार यूं
ही बरस रहा है। उनके प्रेम की वो जगह कोई नहीं भर सकता। यहां वहां जहां देखो दादा
जी याद जूडी है। परिवार का हर प्राणी उन्हें किसी न किसी बहाने याद कर लेता है।
वो चले गए। परंतु
कहीं गहरे में अमिट छाप छोड़ गए। जो विरह के साथ एक आनंद की अनुभूति भी दे रही थी।
यही जाना तो पूर्णता है। न खुद दूख उठाया और ने किसी को दिया। मैं भी इसी तरह से
इस संसार से जाना चाहता हूं। क्या ये मेरी चाहता पूर्ण होगी। अगर मेरे कर्म सच्चे होंगे
तो मेरी मृत्यु भी इतनी ही सुखद होगी।
भू.... भू.....
भू.....
आज इतना ही।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें