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रविवार, 11 जनवरी 2026

15-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-15

(सदमा - उपन्यास) 

सुबह जल्दी उठ कर वैद्य जी की दवाई का काढ़ा बना कर और उसे ठंडा कर सोम प्रकाश को पिला दिया। और फिर वह बाहर आकर धीरे-धीरे खूद ही घूमने लग गया। और फिर पेंटल ने कपड़े पहने और थैला हाथ में ले कर कहने लगे नानी मैं जा रहा हूं। दोपहर के खाने तक आने की भर पूरी कोशिश करूंगा। अगर देर हो जाये तो तुम दोनों खाना खा लेना। क्योंकि वहां का पता नहीं की कितना समय लग जाये। अगर देखता हूं सोनी के पास टाइम होगा तो काम आसान और जल्दी हो जायेगा। पेंटल के चेहरे पर एक उन्माद था। वह नानी से मिल कर अपनी खुशी को छुपाने की लाख कोशिश कर रहा था परंतु नानी ने उसके चेहरे को देख कर जरा मुसकुराई। मन में तो लड्डू फूट रहे होंगे। मन चाही मुराद मिल गई। हां आप भी मजाक करती हो। हां नानी अगर कोई सब्जी तरकारी लानी हो तो बता दो। कल तो आप बैंगन का भर्ता और रोटी खाने का मन है। तब मैं बैंगन लेता हुआ आऊंगा। देखती हूं पिछली बार तो ये बेचारा थैला खाली ही घूम फिर कर आ गया था। देखते है आज अपने अंदर कुछ ले कर आता है या नहीं। इस बात से पेंटल जरा झेप कर मुसकुराता हुआ चल दिया।

पेंटल अपनी मस्ती में गीत गुनगुनाता हुआ चल दिया। पेड़ पौधों के बीच से होते हुए वह अपनी मंजिल की और जा रहा था। जैसे-जैसे सोनी का मकान नजदीक आ रहा था उसके दिल की धड़कन बढ़ रही थी। कैसे उसका सामना करेगा। अंदर से उसे एक झिझक भी हो रही थी। परंतु मन में एक उमंग एक तड़प भी थी की एक बार फिर सोनी को जी भर कर देख लेगा।

माली बगीचे में काम कर रहा था। पेंटल को आते देख समझ गया और एक कुर्सी उठा कर उनके लिए बिछा दी और कहा की मैं मालिक साहब को संदेश देता हूं। ठीक उसके पीछे-पीछे सोनी भी चली आ रही थी। पहले दिन जितनी देर नहीं लगाई थी आने में। आज जो कपड़े पहने थे वही पहने हुए उसी हाल में पेंटल से मिलने के लिए चली आई। प्रेम जब होता है तो दिखावा खत्म हो जाता है। कोई अगर कपड़ों से बनाव सिंगार से प्रेम कैसे कर सकता है। ये तो मन का एक भ्रम है।

सामने आ कर सोनी खड़ी हो गई। उसकी आंखें जमीन की और थी। मानो पल भर के लिए ये जमीन खुल जाये और वह उस में समा जाये। आज वह सोनी जो पहले पेंटल को मिली थी। वो थी ही नहीं मानो उसने एक नया जन्म ले लिया। इतना परिवर्तन असंभव है। परंतु प्रेम में अद्भुत ताकत है। सच सोनी प्रेम की भूखी थी, परंतु उसके सौंदर्य का, उसकी जवानी को लोगों में भरपूर फायदा उठाया। उस का दुरुपयोग किया। एक ही व्यक्ति उसे मिला सोम प्रकाश उसे मिला जो मनुष्य नहीं देवता अधिक लगता था। परंतु भगवान या देवता तो दूर की वस्तु होते है। वह पूजे जा सकते है। अंग संग नहीं भोगे जा सकते। आज उसके साथ किए अपने व्यवहार पर वह पछता रही थी। की वासना में आदमी कितना अंधा हो जाता है। परंतु प्रेम का प्रकाश क्या इतने घने वासना के अंधेरे को काट सकता है। इस बात की सोनी ने कभी कल्पना तक नहीं की थी। वह तो सोचती थी ता उम्र इस अतृप्त वासना में जलना होगा। इसका अब कोई उपाय नहीं है, न ही इसका कोई मार्ग उसे दिखाई नहीं दे रहा था।

पेंटल ने ही चुप्पी को तोड़ी और कहां खोई हुई हो। क्या रात भर सो नहीं पाई। और सोनी केवल सर नीचा किए खड़ी रही। तब उसे याद आया की उसने तो पेंटल को बैठने के लिए भी नहीं बोला। और कहां चाय तो पीओगे। पेंटल ने कहा हाँ। अगर आप पिला दो तो बड़ी मेहरबानी होगी। और सोनी ने माली को कहां की अंदर से बाबा को बोलो दो कप चाय इलायची वगैरह डाल कर बना कर लाये। और माली अंदर चला गया। तब पेंटल ने कहां एक काम के लिए आया हूं। क्योंकि काफी दिन हो गये यहां आये हुए। छुट्टियों भी दो बार ले ली कम से कम दो माह तो गए। अब दफ्तर में जाकर नौकरी भी ज्वाइन करनी है।

सोनी—दो महीने हो गये। समय का पता ही चला। तुम चले जाओगे तो यहां कितना अकेला पन महसूस करूंगी परंतु तुम्हारे संग जो मुझे मिला उससे जीवन में एक थिरता को महसूस कर रही हूं। न जाने तुम किस तरह के जादूगर हो। मुझे सम्मोहित कर दिया है। ये कैसा प्रेम है जैसा मैं बचपन में चाहती थी। की मुझे कोई ऐसा प्रेम करने वाला मिले। तुम एक दम से पूर्ण हो। परंतु प्रकृति का खेल तो देखो मिले भी तो किस मोड़ पर आकर। परंतु मुझे जरा भी पछतावा नहीं है। कम से कम तुम मिले तो सहीं वरना तो जीवन अधूरा का अधूरा ही रह जाता।

पेंटल—हां सोनी मैं तुम्हें बता नहीं सकता। ह्रदय में क्या हो रहा है। और कैसा मैं महसूस कर रहा हूं। परंतु एक काम करना होगा मुझे उस पुलिस इंस्पेक्टर से मिलना है। अगर तुम मेरी मदद करो तो काम थोड़ा आसान हो जायेगा। हम कल सोम प्रकाश को वैद्य जी के पास ले कर गए थे। जहां पर उस लड़की का इलाज हुआ था। कुछ दवाई भी लाये है। तब वैद्य जी कह रह थे की अगर वह लड़की सामने आ जाये तो शायद सोम प्रकाश के जीवन में नवनीत पात उग आये।

दरअसल मैंने ही इसे पागल को उस लड़की से मिलवाया था। अब तुम से क्या छिपाना। ये शर्मीला तो है तब मेरे पास गया था तो हम कोठे पर चले गए थे। वहां उसे रेशमी मिली थी। ये उसे लेकर यहां आ गया। न ये जानता है कि कहां की है वह और न मैं ही जानता था। इसलिए पुलिस के पास उस लड़की का पता जरूर होगा। अगर वह पता किसी तरह से मुझे मिल जाये तो मुम्बई शहर में मैं उस लड़की को ढूंढ कर उससे सारी बात करूं और उसे एक बार यहां आने के लिए कहूं।

ये बात सोनी को भी जमी। तो चलो चाय पीकर चलते है मुझे भी यहां कोई काम नहीं है। हां एक बात और साहब से बात हुई थी। वो कह रहे थे की सोम प्रकाश की छह माह का वेतन उसे दे दो मेरे आने में अभी देर है। क्योंकि वह बीमार है दवा दारू के लिए पैसे की जरूरत तो होती है। फिर ये तो उसका हक है। हम कोई फ्री में थोड़ा ही दे रहे है। उसने मेहनत की है। अब आप कृपया कर मेरी बात मना मन करना। क्योंकि मैंने नानी को भी देने की कोशिश की थी परंतु उन्होंने न जाने क्या सोच कर मना कर दिया। तब पेंटल के मन में सोनी के प्रति और अथाह प्रेम जाग उठा। की वह कितनी संवेदन शील है। कितना ख्याल रखने लगी है दो दिन में उसका रूप रंग हाव भाव सब बदल गए है। इतनी देर में चाय आ गई दोनों ने चाय का आनंद लिया। सोनी ने नौकर को कहा की ड्राइवर को बोलो की गाड़ी गैराज से बहार निकाल कर तैयार रखे। और चाय पीने के बाद सोनी ये कह कर अंदर चली गई की मैं अभी आती हूं, कपड़े बदल कर। पेंटल उठ कर बगीचे के फूलों को निहारते हुए माली से बात करने लगा।

माली यहां तो मौसमी फूल होते ही नहीं पूरे साल फूल खिलते रहते है। हमारे मुम्बई में तो केवल चार महीने की सुंदर फूल खिलते है। बाकी गर्मी के मौसम होने के करण फूला की बहुत कम नस्ल रह जाती है। और एक बात माली मैंने देखी आपके यहां वही फूल जो हमारे यहां पर हल्के रंग के होते है। और आकार में भी छोटे होते है। आपके यहां पर कितने चटक रंग लिए होते है। ये बाते कर ही रहे थे की इतनी देर में सोनी तैयार होकर आ गई। अचरज से पेंटल ने देखा। एक दम सीधी साधी कितनी सुंदर लग रही थी सोनी। पहले वाले तड़क भड़क के कपड़ों में तो उसे कुछ अजीब सी लगती थी। माली भी ये सब देख कर खुश थे की अब मेम साहब सरल और साधारण कपड़े पहने लगी है। इस सब का कारण पेंटल साहब ही लग रहे थे। इसलिए इनकी इज्जत उनके मन में और भी बढ़ गई थी। की सोहबत का कितना प्रभाव पड़ता है, मनुष्य पर जिस संग रहोगे वैसा रंग चढ़ना शुरू हो जाये। तब पेंटल ने माली से कहां की अच्छा माली अब चलते है आप से बात कर के बहुत अच्छा लगा। और माली ने दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें धन्यवाद दिया।

गाड़ी पेंटल को चलाने के लिए सोनी ने चाबी दी, और ड्राइवर को कहा की तुम आराम करो। हम दोनों को ज्यादा दूर तक नहीं जाना बाजार व बैंक तक ही जाना है। पेंटल ने मना किया की मैं कार नहीं चलाना जनता। केवल बाईक ही चला सकता हूं। न बाबा मुझे डर लगता है। और फिर आप के यहां के पहाड़ी रास्ते तो सर में चक्कर आने लग जाता है। अपने मुम्बई में भीड़ है, परंतु आस पास मनुष्य होने के कारण एक तरह की सुरक्षा भी तो है। परंतु आपके यहां के कटाव बहुत खतरनाक लगते है। मैं तो आंखें बद कर लेता हूं।

तब निर्णय लिया की कार सोनी ही चलायेगी। आज काफी दिनों बाद वह गाड़ी चला रही थी। पेंटल ने कहा की अगर दिक्कत हो तो ड्राइवर को साथ ले लेते है। तब सोनी ने कहां की नहीं आज आपका संग साथ मिला है तो मैं इस सब के बीच किसी दूसरे को दखल देने नहीं दूंगी। शहर शुरू होते ही, एक बैंक के सामने उसने कार को पार्क किया और कहां की मैं अभी आती हूं, आप यहीं मेरा इंतजार करें। और वह बैंक में चली गई। ज्यादा देर नहीं लगाई करीब पंद्रह मिनट ही लगाये होंगे। परंतु इंतजार के ये पल कितने बड़े हो जाते है। सोनी ने पास आकर पूछा की ज्यादा इंतजार तो नहीं करना पड़ा। तब पेंटल ने हंस कर कहां की समय तो कम लगा परंतु उसकी लम्बाई मेरे लिए बहुत अधिक थी।

अब कहां चलना है सोनी ने पूछा। पहले पुलिस वाला काम कर लेते है। उसके बाद जो बाजार आदि से खरीदारी करनी होगी वह बाद में देखेंगे। मैं अगले हफ्ते जा राह हूं। दिल बहुत भारी हो रहा है। तुम मिली भी तो बिलकुल किनारे पर जाकर। और सामने पुलिस स्टेशन था। गाड़ी खड़ी कर के वह सीधे पुलिस स्टेशन के अंदर की और चल दिये। गेट पर जो सिपाही खड़ा था। उससे सोनी ने पूछा की डेविड साहब किस कमरे में मिलेंगे। सिपाही ने नमस्ते करते हुए कहा की अभी-अभी आये है वो जो आखिरी लास्ट में जो कोने वाला कमरा है। सीधे चले जाओ। इंस्पेक्टर डेविड किसी फाइल को देख रहे थे। सोनी ने कहा की साहब अंदर आ जाये। सर उठा कर देखा तो सोनी के साथ एक अजनबी को देख कर कहां अरे सोनी जी आइये ना। और खड़े होकर उनका स्वागत किया। सोनी ने पास पहुंच कर पेंटल का परिचय कराया। की आप पेंटल जी है, अपने मास्टर सोम प्रकाश के दोस्त मुम्बई से आये हुए है।

तब इंस्पेक्टर डेविड ने कहां की इन्हें देखा था ये तब से ही यहां है। अरे गजब किया आपने। जी इंस्पेक्टर साहब दोस्त ख्याल तो रखना ही था। फिर अकेली नानी के बस की बात तो नहीं थी। अब वह चलने फिरने लग गया है। फिर मेरी छुट्टी भी पूरी होती जा रही है। अब मुझे मुम्बई जाकर नौकरी ज्वाइन करनी ही होगी। तब डेविड ने कहा की चाय काफी क्या लेंगे। तब सोनी ने कहां की घर से ही सीधे आ रहे चाय पीकर। आप से एक काम था। अगर कर सकेंगे तो बहुत भला होगा।

तब पेंटल ने कहां की कल हम उस वैद्य जी के पास सोम प्रकाश को ले कर गये थे। नानी और मैं वह चल कर ही इतनी दूर गया। इससे अब एक उम्मीद बंध रही है की वह धीरे-धीरे ठीक हो रहा है। वैद्य जी ने एक तेल और कुछ जड़ी बूटी दी है। जिस का काढ़ा बना कर पिलाने से आराम होगा। परंतु एक सुझाव भी दिया है। की जिस तरह का सदमा इनके मस्तिष्क को लगा है। उसे उस लड़की का प्रेम और संग बहुत सहयोगी हो सकता है। सो मेरी आप से इतनी सी प्रार्थना है कि आप हमें उस लड़की का पता ठिकाना बता दे तो एक आदमी का जीवन बच सकता है। सोम प्रकाश ने जो उस लड़की के लिए किया शायद वो खूद भी नहीं जानती होगी। क्योंकि जब वह यहां थी तो अपने माता-पिता को भूल गई थी। और जब ठीक हुई तो इन एक दो साल के समय और साथियों को भूल गई।

इंस्पेक्टर ने एक बार सोनी की और देखा, की है तो ये कानून के खिलाफ। परंतु जिस तरह से उसके माता-पिता ने दिलेरी दिखा कर मुकदमा वापस ले लिया था। उतनी मनुष्यता तो मैं भी दिखा सकता हूं। अब एक उम्मीद की किरण जागी। पेंटल और सोनी के मन में। तब पेंटल ने कहां की अब हम आपकी चाय पीकर ही जायेंगे। और इंस्पेक्टर उठे और जहां फाइलें रखी थी उस और चले गया। और साथ-साथ चाय लाने का आर्डर भी दे दिया। मुम्बई का पता एक कागज पर लिख कर इंस्पेक्टर ने पेंटल के हाथ में दे दिया। और कहा की आप जैसे दोस्त जिस व्यक्ति के हो उसकी परमात्मा भी मदद करता है। देखना एक दिन सोम प्रकाश जी जरूर ठीक हो जायेंगे। और उस दिन हम एक पार्टी करेंगे। तीनों ने मिलकर चाय पी और ह्रदय से आभार व्यक्त किया। ह्रदय में प्रेम भाव लिये वहाँ से बिदा हुए।

बाहर आने से दोनों का मन बहुत हल्का था। की चलो एक काम तो बना। तब वह गाड़ी मैं बैठ कर बाजार की और चल दिये। अब चलो थोड़ा बाजार ही घूम लेते है। पेंटल ने कहां की मैं कुछ सब्जी और फल भी ले लूंगा नहीं तो नानी मेरा बहुत ही मजाक बनायेगी। की थैला यूं ही घूम-घूम कर खाजी ही आ जाता है। इस बात पर दोनों दोस्त खूब खुल कर हंसे। और इस सब के बीच सोनी थोड़ा झेप गई की नानी को पता चल गया। हां जब सुबह में घर गया तो नानी सोम प्रकाश के साथ धूप में बैठी थी। मैंने मन की बात लाख छिपने की कोशिश की परंतु नानी की आंखों से नहीं बच सका। परंतु नानी सच ही प्रेम की नदी है। जो चाहे खुद प्यासा रह जाये परंतु उसके आस पास प्यासा नहीं रह सकता। तब सोनी ने कहा की नहीं आप चिंता ने करें मैं हर हफ्ते या कहो तो ड्राइवर को भेज दिया करूंगी। या खूद भी कभी-कभी मिलने के लिये चली जाया करूंगी।

हां, ये बात ठीक है। मेरे जाने के बाद तुम हफ्ता दस दिन में एक बार नानी के यहां चक्कर मार दिया करना। ये बात सून कर सोनी की आंखों में पानी आ गया और उसने अपना हाथ पेंटल के हाथ पर रख दिया। प्रेम एक दूसरे में प्रवाहित होने लगा।

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