अध्याय -50
जीवन का प्याला
हम केवल जीवन के
भरे उस प्याले का ही अनुभव रहा है सम्पूर्ण जीवन भरा होता है। यानि जीवेषणा हम
मृत्युवेषणा थानाटोस के अनुभव से वंचित है। ये किसी-किसी भाग्य शाली को ही नसीब
होता है। हम तो जीते हुए भी नहीं जीते मृत्यु के भय से कांपते रहते है। लेकिन अगर
हमें हमारी मृत्यु का ज्ञान हो जाये तब हमारा जीवन कैसा होगा। इसलिए प्रकृति ने
उसे एक रहस्य के पर्दे में छुपा कर रखा है। मैं अब जान रहा था जीवन का वो प्याला
अब रिस चूका है। अब तो इसमें केवल एक अंधकार है। फिर भी मुझे उस से डर नहीं लग रहा
था। क्योंकि मैंने जीवन को जिस पूर्णता से जिया था वही उसकी तृप्ति है। हम जीवन को
जीते नहीं केवल भय से डर कर भागते रहते है। इसलिए हम उसे जान नहीं सकते। वह तो
कितनी सुंदर कोमल मुलायम नींद की तरह है। आप अपने जीवन में देखते नहीं दिन भर थकने
के बाद जब श्याम शरीर निष्क्रिय सा हो जाता है उस की उर्जा चूक जाती है। तब हम
गहरी नींद में चले जाते है। और सुबह उठते है तो फिर तरो ताजा एक उर्जा से सराबोर
होकर। कहां से आई वह उर्जा उस अमृत कुंड से। वही तो मृत्यु है।
रोज मेरी शरीर प्राण शक्ति शून्य होता जा रही थी। परंतु मम्मी-पापा जी एक दो दिन बाद जरूर सुबह मुझे घुमाने ले जाते थे। रास्ते में न जाने कितने ही कुत्ते हो गए थे, उसे पार करना भी कठिन होता जा रहा था। पहले तो अकेला जंगल से आ जाता था।
अब तो आना कितना कठिन है। गांव पार कर के जंगल के मुहाने पर मुझे खोल दिया जाता था। परंतु अब मैं ज्यादा दूर नहीं जाता था। न ही अब जंगल में जाने की कोशिश करता था। एक तो बहा अँधेरा घना रहता था। पता नहीं वहां मुझे कुछ दिखाई दे या न दे। फिर शरीर की भी एक भाषा है वह आपको मना करेगा की अब रहने दो। सड़क के किनारे पटरी पर चलना सुरक्षित था। वहां सड़क पर लाईट भी लगी होती थी। दीवार के आस पास कुछ पेड़ पौधे भी उगे थे। पहले तो मैं अपना पेट साफ करता था, उसके बाद कभी-कभी घास भी खाता था। पापा-मम्मी जी जब घास खाता देखते तो खड़े हो जाते थे। लेकिन मैं तो चंद मिनट में ही उनसे आगे निकल जाता था।काफी दूर जाने के
बाद एक मोड़ आता फिर एक बस स्टॉप उस पर मम्मी-पापा बैठ जाते पानी की बोतल उनके पास
होती थी। मैं थोड़ा आगे तक एक कीकर जो सड़क किनारे उगी थी उस तक घूम कर आता था।
फिर पापा जी चुलु से पानी पीता बड़े लाड़-प्यार से फिर मैं भी उनके सामने ही बैठ
जाता था। रात को कम गाड़ियां आती थी। दूर कहीं एक लाल लाईट जलती बुझती सी दिखाई
देती थी। सामने पीपल और सहमल के पड़ो पर बहुत से पक्षी सो रहे थे उसमें एक कोयल का
गीत दूसरे कुछ छोटी चिड़िया सुबह का उत्सव गीत गा रही थी। पास ही जो रास्ते में एक
कूड़े दान है वहां कुछ आवारा कुत्ते कुछ खाने की फिरक में घूम रहे थे। पास ही तार
पर कोवे की कांव-कांव का शोर चल रहा है। पक्षियों में कौवा सबसे पहले उठने वाला
पक्षी है। कुछ देर आराम करने के बाद हम घर की और चल देते थे। घर पर आकर मैं खूब सा
पानी पीता और फिर पापा जी ए. सी. चला देते और एक प्रवचन लगा देते हम सब एक गहरे
ध्यान में चले जाते थे। फिर पापा जी अलार्म के बोलने पर घेर की मोटर चलाने जाते
थे। कल अधिक बारिश होने के कारण आज सारी गलियां पानी से भरी थी। इसलिए शायद हमें
आज दुकानों की छत पर भी जाना पड़ गया था। मम्मी भी हमारे साथ थी।
मोटर चलाने के बाद
हम छत पर चले गए। वह छत बहुत बड़ी थी। मुझे याद है जब वह बन रही थी तो मैं रोज
वहां पर आता था। उसका सीढियां तो बहुत आसान थी। परंतु उसकी छत पर भी दरवाजा लगा
था। जिसे पापा जी खोलते थे। और सच ही यहां पानी भरा था जिसे निकालने के लिए पापा
जी अंदर गए तो पैर फिसल कर गिर गये उनका पाजामा सारा भीग गया। वहां पर चिकनाई जमी
थी। पापा जी ने हंसते हुए मुझे देख मैं भाग कर उनके पास गया। फिर वहां जाली से कुछ
कचरा हटाया तो पानी नाली से जाने लगा। वहां पर दो टंकी रखी थी। दोनों और पानी की
निकासी थी परंतु पानी के साथ कचरा आकर पानी को रोक देता था। एक तरफ तो सूखा था
दूसरी और ही पानी रुका था। हम वहां काफी देर खेलते रहे। मम्मी जी कबूतरों के लिए
बाजरा और कोवे के लिए बिस्किट लाई थी वह भी दीवार पर आकर कांव-कांव कर के मांग रहे
थे। परंतु यहां पर मक्खियां बहुत थी कुछ ही देर में परेशान हो गया। मन कर रहा था
की घर चले मैं बार-बार जिद कर रहा था की अब चलो।
दिन गुजर रहे थे
पेट का दर्द थोड़ा ज्यादा बढ़ गया था। मैं उस और ध्यान ही नहीं दे रहा था। एक
हफ्ता गुजर गया। आज भी पापा जी छत से पानी निकालने के लिए जाने की तैयारी कर रहे
थे तो में सीढ़ीयों की जाली में जाकर बैठ गया। पापा जी ने पूछा की नहीं चलना मैंने
सर नीचे कर लिया ये जीवन का पहला मोका था की मुझे घर पर रहना अच्छा लग रहा था।
पापा जी मेरा चेहरा देख कर समझ गए। और अकेले ही पानी निकालने के लिए चले गए। मैं
अब दीदी का इंतजार कर रहा था कि न जाने कहां चली गई एक बार मुझे मिल लेती तो कितना
अच्छा होता। मेरी दीदी से दोस्ती बहुत गहरी थी वह भी मुझे बहुत प्यार से रखती थी।
परंतु मैं मूर्ख तो कभी-कभी उसे काट भी लेता था। फिर भी देखो वह मुझसे नाराज नहीं
होती थी। पापा जी मुझे इस तरह से बैठे देख कर समझ रहे थे की जरूर दीदी का इंतजार
कर रहा है। और मेरे सर पर हाथ फेर कर कहते की आ जायेगी। एक और अब रात के समय जब सब
सो जाते तो मैं उठ कर छत पर चला जाता था। खुली छत पर आसमान में तारों की छांव में
शरीर को कुछ खुला सा महसूस होता था। अंदर एक बंधन सा एक तरह की घुटन सी महसूस होने
लगी थी। ऐसा पहले भी मैंने किया है अंजाने तोर पर मैं बहुत छोटा था। शायद सभी
प्राणी इस अवस्था में जब उन्हें मृत्यु का एहसास होने लगता है वह खुले में चले
जाते है। शायद मनुष्य इस रहस्य को भूल गया है। कमरे की एक चार दीवारी में मरना कुछ
कठिन है। शायद खुले में प्राणों को विस्तार मिल जाता है और उनकी गति भी आसान हो
जाता होगा।
जब मम्मी-पापा रात
को चाय लेकर आते तो मुझे उपर बैठा पाकर उन्हें कुछ अजीब जरूरत लगता परंतु उन्हें
भी तो खुले आसमान के नीचे बैठ कर चाय पीना कितना अच्छा लगता था। एक चमगादड़ जो
सामने के चीकू के पेड़ पर से फल खाने आता था वह पापा-मम्मी को देख कर उनके आस पास
मंडराने लग जाता था। मुझे लगता की वह हमला न कर दे। परंतु वह कुछ कहता नहीं शायद
धन्यवाद के भाव से भर कर ऐसा करता होगा। साल में कुछ दिन ही तो वह फल खाता था उसे
याद रहता था की कब उसके फल पक जायेंगे। और मुझे उन्हें खाने के लिए जाना चाहिए। आज
कल सामने जो सफेदे का वृक्ष है उस पर भी बहुत फल लगे है, काले
जामुन की तरह। उन्हें भी पक्षी बड़े चाव से खोते है। कुदरत सब का पेट भरती है।
कितनी करुणा वान है ये प्रकृति एक प्रकार से तो हम सब की मां है प्रकृति। इसे
जितना भी जानो इस में जितना भी गहरा डूबो, उतना ही रहस्य
अधिक गहराता जाता है। इस की शायद कोई थाह नहीं है। ये अनंत है।
अब एक दिन जब
मम्मी-पापा मुझे सुबह घुमाने के लिए ले जा रहे थे तो रास्ते में ही अधिक थकावट हो
गई कितनी मुश्किल से में आधे रास्ते ही जा सका। मैं समझ गया था की ये अंतिम बार है
यहां पर आना अब इसे अलविदा कहने का समय आ गया। और मैं बैठ गया पापा जी समझ गए और
मुझे कुछ आराम करने के बाद वापसी घर की और चल दिये अब दीपक में बहुत कम तेल था।
मम्मी जी कहने लगी की अब पोनी की तबीयत कुछ खराब है इस डा0 को दिखाना होगा। आकर
हमने ध्यान किया। फिर काम करने वाली अम्मा काम करके चली गई। मैं बाहर जाकर बैठ
गया। मम्मी समझ गई की किसी का इंतजार कर रहा है। और ठीक कुछ देर बाद ही दीदी आ गई।
दीदी को देख कर मेरी आंखों से आंसू आ एक की चलो भगवान ने मेरी सून ली। मेरी प्यारी
दीदी आ गई अब मैं बड़े आराम से इस संसार से बिदा ले सकता हूं।
मैं नाच-नाच कर
दीदी का स्वागत कर रहा था कोने कह सकता है कि में बीमार या कमजोर हूं। अब दीदी ने
अपना बैग खोला में तो इंतजार कर रहा था उसी चाव से मैंने उस में अपना मुख घुसाने
की कोशिश कर रहा था कि क्या लेकर आई है जल्दी से दिखा। दीदी ने केक निकाला मेरी
पसंद को चॉकलेट का केक। और आपने हाथों से मुझे खिलाने लगी। हालांकि मेरा खाने का
मन नहीं था परंतु दीदी का दिल टूट जाता। इसलिए मैंने कुछ थोड़ा सा केक खाया। दीदी
को कुछ अजीब तो लगा परंतु खुश हो गई। दीदी को कुछ भी पता नहीं चला की मैं बीमार
हूं। जब मैंने दोपहर का खाना नहीं खाया तो वह कुछ परेशान सी हुई और पूछने लगी पोनी
क्या खायेगा तेरी लिए अंडे लेकर आऊँ। और श्याम को जब वह मम्मी के साथ घूम कर आई तो
मेरे लिए दो गर्म-गर्म उबले अंडे लेकर आई। उसकी खुशबू से मेरी अंदर की भूख जग गई।
और मैं खड़ा हुआ। दीदी ने उन्हें काट कर मेरी प्लेट में रख दिया, वह
अभी भी गर्म थे। मैं पास बैठ कर ठंडे होने का इंतजार करने लगा। जब ठंडे हो गए तो
मैंने बड़े ही चाव से उन्हें खाया। की पापा जी ही नहीं दीदी जी भी मेरे मन की बात
जानती है।
दो दिन बाद अचानक
मेरे पेट में बहुत दर्द हो रहा था। मैं लेटे-लेटे दर्द को कम करने लिए रो रहा था। टी.
वी. रूम की दीवार से सट कर चारों टांगे ऊपर करने के बाद पेट को कुछ आराम मिलता था।
तब दीदी मेरे पास आई और मेरे पेट को सहलाने लगी। उसके छूने से मुझे अच्छा लगा।
मनुष्य भी कैसा प्रेम का मसीहा है। आपके दूख दर्द में कैसे वह आपका सहयोग करता है।
प्यार से वह जब तक हाथ फेरती रही मुझे दर्द का अहसास कम होता गया और न जाने कब मैं
सो गया। मेरा कुछ खाने को मन नहीं कर रहा था। इसलिए जब खाना बनता तो में किचन में
नहीं जाता था। मम्मी ने मुझे सिखा दिया था की अगर भूख लगे तो खाना बनाते समय किचन
में अपनी हाज़िरी लगा दिया करो। परंतु दो दिन से मन मार कर खा रहा था। आज तो दिल
ही नहीं किया। अगले दिन दीदी ने मम्मी को कहां की हम इसे डा0 के पास ले चलते है।
मेरा डा0 के पास जाने का बिलकुल भी मन नहीं था वह अब कुछ भी नहीं करता। अब तो दीपक
से तेल लगभग खतम ही हो गया था। वह और मेरे रास्ते की रूकावट ही बनेगा पापा ने भी
मना किया परंतु मम्मी और दीदी नहीं मानी वह मुझे एक स्कूटर में बिठा कर उसी डा0 के
पास ले गई जिस पर पहले भी मैं अनेक बार आया था।
परंतु आज का आना और
पहले के आना एक दम से भिन्न था। पहले मैं मरना नहीं चाहता था। मुझे पता था ये डा0
मुझे कुछ ऐसा देगा जिससे में मर नहीं पाऊंगा। और कितनी ही बार उसने मेरे प्राण
बचाए थे। डा0 मुझे देख कर काफी खुश हुआ। की अभी पोनी तो ठीक है, क्योंकि
सालों पहले जब मरने के कगार पर था तो उसने बहुत मेहनत से मेरी जान बचाई थी। मुझे
स्टील की टेबल के उपर लिटा दिया गया। पहले उसने मेरे पेट को चेक किया वह जब दबा
रहा था तो कुछ दर्द हो रहा था। उसने पेट को बजाकर भी देखा। फिर एक सुई मेरे पेर
में लगा कर ग्लूकोज चढ़ा दिया इस से चिर परिचित सी उसकी वही पुरानी पर क्रिया।
उसके दवाई के चढ़ने से शरीर को बहुत आराम मिलता है पेट की गर्मी और भूख प्यास कम
हो जाती थी। और दर्द भी ठीक हो जाता था। ठीक आज भी मैं लेटा रहा बार-बार मुझे नींद
आ रही थी परंतु पापा जी की याद आ रही थी। जब वह मेरे सामने होते तो मुझे कुछ भी डर
नहीं लगता था चाहे आप मुझे उस समय काट दो। वह लगभग मेरे पास खड़े रहते थे। मेरे सर
पर हाथ फेरते रहते थे।
इस काम के काफी समय
लगता है,
बूंद-बूंद पानी नलकी द्वारा आपके शरीर की नस से होता हुआ खून में
मिल जाता है। काम पूरा होने के बाद भी मुझे कोई खास आराम नहीं हुआ बहार निकलने के
बाद मुझे बाथरूम बहुत आता था। परंतु आज इतना नहीं आया। जबकि दो बोतल ग्लूकोज चढ़ा
था। शायद शरीर उसे पचा गया। बहार निकल कर हम कुछ दूर पैदल चलते रहे, एक मोड़ पर हमें तीन चार मोटे तगड़े कुतो ने घेर लिया। मुझे अपना तो डर था
ही साथ में मम्मी और दीदी की भी चिंता किस मुश्किल से दीदी ने उन्हें डंडो से
भगाया । एक दो आदमी और आ गए तब कहीं जाकर वह जालिम दूर हटे। उन्हें जरा भी दया
नहीं कि मैं उनका क्या बिगाड़ रहा हूं, एक तो बीमार हूं,
और भले लोगों मैं तो अपने रास्ते जा रहा हूं वह भी पट्टे से बँधा
हुआ भला मानस आपको मुझसे क्या खतरा हो सकता है। फिर नहा-धो कर क्यों मरने मारने पर
तुले हुए हो। परंतु ये हमारी जाति है ही ऐसी शायद इतनी ईर्षा और द्वेष किसी दूसरी
जाति में देखने को नहीं मिलता।
परंतु तब मुझे पापा
जी की याद आई की पापा जी के साथ आना ही ठीक है। घर जाकर दीदी जी मेरे लिए पनीर
लेकर आई। श्याम को एक दो पनीर के टुकड़े मैंने खाये अंदर कुछ जा ही नहीं रहा था।
फिर वह शायद अंडे लेकर आई परंतु अंडे भी मैंने नहीं खाए। अब तो पापा जी समझ गए की
पोनी के जाने का समय हो गया है। परंतु दीदी और मम्मी को कुछ भी पता नहीं था। बस
में थोड़ा पानी पी लेता था। या थोड़ा सा दूध। डा0 ने एक दवाई की शीशी भी दीदी को
दी थी जिसे पापा जी ने इंजेक्शन में भर कर पिलाया। शायद भूख लगने या कमजोरी की हो।
अगले दिन हम फिर
गए। इस बार पापा जी समझ गए की जब जाना ही है तो मैं जाता हूं। मम्मी की जरूरत नहीं
है। पापा जी के साथ जाने में मुझे जरा भी डर नहीं लगा। लेकिन पापा जी जब मुझे जाने
के लिए कहने लगे तो मैं उठा नहीं वह मेरे पास आए और कहां की चल क्या पता कुछ दर्द
कम ही हो जाए। नहीं तो दीदी और मम्मी के मन में यह बात सदा रहेगी की अगर डा0 को
दिखा देते तो पोनी ठीक हो जाता। मैं पापा जी के भाव को समझ गया और जब उन्होंने
मेरे गले में पट्टा बांधा तो मैं मरे मन से पापा जी के साथ चल दिया। इस बार जब
मुझे सुई लगाई गई तो उसमें से थोड़ा खून भी निकाला गया। जो दो तीन शीशियों में रख
लिया गया। शायद खून की जांच से पता चलेगा की क्या बीमारी है। परंतु ये सब पैसे
कमाने का खेल है। आज कल मैं देख रहा था वहां जो भी आता था, केवल
पैसे लुटा कर चला जाता था। उस डा0 के चेहरे पर कोई दया का भाव नहीं था। मैं सोच
रहा था की ये आदमी सालों पहले तो ऐसा नहीं था। क्या पैसा आने पर आदमी की भाव दशा
बदल जाती है। या और-और पैसे की भूख बढ़ती चली जाती है। वह आदमी धीरे-धीरे संवेदन
हीन होने लग जाता है।
और यही सब हो रहा
था। दवाई चढ़ने के बाद हम बहार आ गए इस बार दीदी ने जो स्कूटर वाला बुलाया था वह
वही था जो लेकर गया। वरना वहां से स्कूटर मिलना कठिन था पास ही एक खुला मैदान था
जिसमें इक्का दुक्का कार खड़ी थी। मैं पापा जी के साथ यहां वहां सुंघता हुआ घूमता
रहा कुछ बाथ रूम भी किया। और उसके बाद लगा पेट में मरोड़ मार रही है। तब थोड़ा पेट
भी साफ किया। उसके बाद पापा जी पास एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गए में थी अब
ज्यादा देर चल नहीं सकता था। उनके पेरो के पास ही बैठ गया। वहां हवा ठंडी चल रही
थी। नीचे की जमीन भी ठंडी थी। अच्छा लग रहा था उस स्कूटर वाले का इंतजार करना।
इस बीच एक आदमी
अपने कुत्ते को घुमाता वहां आया और दीदी से बात करने लगा। उसका प्यारा सा छोटा
पप्पी था। वह मुझे गोर से देख रहा था की इसे क्या हो गया है। उस बेचारे को क्या
पता एक दिन तुझे भी तो बूढ़ा होना हे। कहां कोई जान पाता हे। वह मेरे पास बार-बार
आने की कोशिश कर रहा था। वह दीदी से बात कर रहा था की क्या हो गया इसे। तब दीदी ने
बतलाया की काफी बीमार है उसे कुछ अचरज हुआ की चेहरे से तो नहीं लगता। वह भी काफी
ज्ञानी आदमी था। इतना तो पहचान गया.....इतनी देर में स्कूटर वाला आ गया। अब मुझसे स्कूटर
पर भी नहीं चढ़ा जाता था। पापा जी अपनी गोद में लेकर चढ़ाते थे और जब उतारते थे तब
भी गोद में ही लेकर उतारते थे। क्योंकि उसकी सीट पर चढ़ कर अब मुझसे मुड़ा नहीं
जाता था। इसलिए मैं उस जगह पर घूम उतर नहीं सकता था।
स्कूटर जब चला तो
रास्ते में अनेक कुत्ते मिले वह मुझे देख अचरज तो कर रहे थे परंतु भौंक नहीं रहे
थे। रास्ते में गाड़ियों की भीड़ हो गई थी जब आये थे तब तो इतनी गाड़ियां नहीं थे।
हम गांव के उसी रास्ते से घर की और आ रहे थे जहां हम सुबह-सुबह घुमाने जाते थे।
वहीं बस स्टैंड। अब कैसा लग रहा था वह रास्ता जो रात को कितना शांत और अपने अंदर
एक एकांत अपने समेटे रहता था अब कैसा बदला-बदला सा लग रहा था। सूर्य के प्रकाश ने
उसे थोड़ा कठोर बना दिया था। वहीं रात की मध्यम रोशनी में वह कैसा छूई-मुई सा लगता
था। मुझे इस बात का बड़ा अचरज हो रहा था। की हर कोई अपने प्रभाव से वस्तुओं को
कैसे प्रभावित कर देता है।
गांव के बिलकुल
अंदर आते समय पापा जी मेरे सर को अपने हाथों से पकड़े थे, ताकि
पास की किसी गाड़ी से टकरा कर जख्मी न हो जाऊं क्योंकि मैं ज्यादा ही सर निकाल कर
बाहर के नजारे देख रहा था। गांव में जब स्कूटर अंदर की और आया तब बहुत भीड़ हो गई
थी। सामने ही हमारी दुकान थी। वरूण भैया ने हमें आते देखा तो दुकान छोड़ कर बहार
आया। पापा ने पकड़ कर मुझे उतार। फिर मैं भैया की दुकान के अंदर जाकर बैठ गया।
पहले दुकान और तरह से थी उसमें खाने पीने की चीजों की खुशबु आती भी अब तो वहां
दवाइयों की गंध आ रही थी। वरूण भैया ने मुझे प्यार किया मैंने भी अपने पूंछ को
हिला कर उसे धन्यवाद दिया।
जब हम वरूण भैया की
दुकान से चलने लगे तो भैया कहने लगा की पोनी के लिए आइसक्रीम ले जाओ। ठंडी
आइसक्रीम इसके लिए अच्छी रहेगी। दीदी को भैया ने एक बड़ी सी आइसक्रीम का डिब्बा दे
दिया। पापा जी मुझे कुछ देर के लिए सामने जय भगवान के पार्क में चले गये वहां में
कुछ बाथरूम किया और इधर उधर घूमता रहा फिर हम घर पर आ गए। दीदी तो पहले ही सीधी घर
चली गई थी क्योंकि उसके हाथ में एक ता आइसक्रीम थी। नहीं तो वह खराब हो जाती। घर
आकर मैंने बहुत पानी पिया। प्यास अधिक लग रही थी। गर्मी तो थी और ये बरसात के बाद
की उमस तो और अधिक दूखी करती है।
उपर जाने के बाद
दीदी ने मेरे कटोरे में आइसक्रीम डाली जिसे मैं बैठ कर चाटता रहा गले को थोड़ी
ठंडक मिल रही थी। और ठंडी आइसक्रीम चुभ भी रही थी। मन कहा रहा था खा ले परंतु शरीर
मना कर रहा था। मन को या चीते को जो अच्छा लगता है वह जरूरी नहीं की शरीर के लिए
भी उपयोगी हो। फिर मैं धीरे-धीरे उससे जीभ से चाट रहा था। उससे जलते पेट को थोड़ा
आराम आ रहा था। लग रही थे।
भू.... भू.....
भू.....
आज इतना ही।

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