(सदमा - उपन्यास)
उधर एक तरफ तो
शारीरिक तृप्ति का आनंद और दूसरी और उसके मन में चोरी की नानी को क्या जवाब दूंगा।
पेंटल उलझा विचारों में डूबा हुआ अपनी मंजिल की और चला जा रहा था। सुबह का सूर्या
दूर आसमान में काफी उपर तक चढ़ गया था। जिस खाली थैले को लेकर वह गया था। वहीं अब
भी उसके हाथ में वैसे का वैसा ही था। वह मन ही मन सोच रहा था, की
नानी को क्या झूठ बोलेगा। दूसरी और सोम प्रकाश की बीमारी की आज उसे खुशी भी थी की
कम से कम उसे तो उसको कोई जवाब नहीं देना होगा। आदमी भी कितनी नीचे की सोच रख सकता
है। ये विचार उसके मन में आते ही उसे अपने से बहुत घिन्न हो उठी। वह डरा सहमा सा
घर की और चला आ रहा था। दूर से देखा तो सोम प्रकाश धूप में एक कुर्सी पर बैठा हुआ
दिखाई दिया। पास ही नानी उससे कुछ पूछ रही है। पल भर के लिए पेंटल के पैर ठिठक गए।
मानो जमीन ने उन्हें पकड़ लिया हो। परंतु यहां खड़ा भी नहीं रहा जा सकता था। एक
अपराध भाव भी मन में था। और जो प्रेम सूख की अनुभूति हुई थी। वह चाह चित को किसी
और ही लोक में ले जा रही थी। वहां कोई भय कोई शर्म नहीं थी। वह बस उस में डूब जाना
चाहता था। उस समय उसे एकांत चाहिए जहां पर वह अपने उस आनंद सागर में डूब जाये। उस
सब से उसे अब नहीं बचना।
पेंटल नानी के पास जा कर खड़ा हो गया। नानी ने एक बार उपर से उसे नीचे तक उसे देखा। नानी की आंखों में क्रोध था, परंतु चेहरा एक दम शांति था। लेकिन ध्यान से देखने पर आंखों में प्रेम बह रहा था। इस तरह का रूप नानी का इससे पहले पेंटल ने पहले कभी नहीं देखा था।
वह एक दम से भावुक हो गया और नानी के दोनों पैर पकड़ कर कहने लगा नानी मुझे माफ कर दो। नानी इस के लिए तैयार नहीं थी। वह तो मन ही मन सोच रही थी की दो चार डाट तो आज उसे लगानी ही होगी। परंतु वह खूद ही फफक पड़ा। नानी ने उसके बालों में हाथ पैरते हुए कहां नहीं बेटा ये कोई बात हुई। बस एक फिक्र थी की रात भर तू कहां था। नहीं नानी में बहुत खराब हूं। ना बेटा ऐसा नहीं कहते क्या खराब और क्या सही है ये तो सब धारणा की बात है।पेंटल की आंखों से
झर-झर आंसू झर रहे थे। सच ही वह ह्रदय की गहराई से प्रायश्चित कर रहा था।
प्रायश्चित कह लो या भूल की वह अपने स्वार्थ के लिए रात भर इतना मतलबी बना रहा।
परंतु नानी उसके सर को छू कर ही समझ गई की वह प्रेम से ओतप्रोत है। नहीं बेटा में
जानती हूं तू कहां गया था। और फिर सोनी इतनी खराब लड़की नहीं है। वह एक गरीब घर की
थी। लोगों ने उसके भोलेपन का बहुत दुरुपयोग किया अपने मतलब के लिए। आखिर तंग आकर
उसने इस बूढ़े से शादी कर ली। एक सर छिपाने को जगह तो मिल गई। आज उसकी इज्जत है
रुतबा है। उसकी और कोई उँगली उठा कर देख नहीं सकता। तू बैठ मैं चाय बना कर लाती
हूं। देख हम भी तेरा इंतजार कर रहे थे। की तू आये तो हम सब मिल कर चाय पीएंगे। और
पेंटल भरी आंखों और बोझिल शरीर को ले कर कुर्सी पर बैठ गया। नानी चाय बनाने के लिए
चली गई।
सामने बैठा उसका
दोस्त दूर आसमान की और निहार रहा था। कहीं-कहीं दूर बादलों के टुकड़े हवा के संग
तैरते हुए आ जा रहे थे। पहाड़ों की एक खास उंचाई पर कहीं-कहीं बर्फ के धब्बे अब भी
जमा थे। कितना मनोहारी दृश्य था। प्रकृति भी कितनी सुंदर है। और जब आप प्रेम से
ओतप्रोत होते हो तो चारों आपके सौंदर्य मानो बिखरा नजर आता है। रात की बात कर
पेंटल के हाथों के रोएं खड़े हो गए। उसने कुर्सी को सोम प्रकाश के पास खिंच कर
उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। सोम प्रकाश दूर कहीं खोया था। देखने में तो हमें
लगेगा वह दूर पहाड़ी के दृश्यों में उलझा है। परंतु चित तो उसे अंदर डूबो रहा था।
वह आज कल बात भी बहुत कम करता है। मानो उसकी वाणी मुक हो गई। कैसा लगता है जब आपका
बोलता चालता साथी अचानक अनबोला हो जाये। तब उसके साथ बैठना कैसा महसूस होगा। ये
केवल एक भोगता ही जान सकता है। इसके लिए शब्द शायद छोटे पड़ जायेंगे। पेंटल की इस
प्रेम भरी छुअन से मानो सोम प्रकाश के शरीर में एक सिहरन हुई। उसने पहली बार पेंटल
की और देखा। आज पेंटल के तन-मन में इतना प्रेम बह रहा था। की सुखे हुए कुएं में
फिर पानी की चार बूंदें झरने लगी। पेंटल ने आंखों में आंसू लाते हुए कहा। दोस्त तू
नहीं जानता की कल मेरे साथ क्या हुआ। मैं प्रेम की उस नदी में डूब कर आ रहा हूं।
जिसकी मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी। बस मैं मर जाना मिट जाना चाहता हूं। काश तू
मेरी बात सून लेता। अब तुझे क्या कहूं।
जिस नदी में हम
उतरने से डरते है,
शायद उसकी गहराई या उसके मचलते बहाव के कारण परंतु अगर आप एक बार
साहस कर के उतर गये तो आपको या तो वह अपने में डूबो लेगी या आप जब उससे बाहर
निकलेंगे तो दूसरे ही आदमी होगे। आपके अंदर एक विशेष साहास होगा। आप उस आयाम को
छूकर आये होते है जो बहार खड़े होकर नहीं देखा जा सकता। उसकी इस बात को सून कर सोम
प्रकाश पहली बार अपने हाथ से पेंटल के हाथ को सहलाया। पेंटल ने जब उपर गर्दन कर के
देखा तो सोम प्रकाश की आंखों में कहीं-कहीं प्रेम के बादल डोल रहे थे। पेंटल की
आंखों से झर-झर आंसू गिरने लगे और उसने अपने दोस्त का हाथ उठा कर अपने माथे से लगा
लिया। चंद आंसू सोम प्रकाश के हाथ को भी छू गए। सच पेंटल पिघल रहा था। उसके अंदर
जमा कोई बर्फ पिघल रही थी। प्रेम में कितनी ताकत है एक रात के प्रेम से आदमी क्या
से क्या होता जाता है। अगर आप उस समय पेंटल की हालत को देखते तो ही समझ सकते है।
सोम प्रकाश ने अपना
हाथ उठा कर पेंटल के सर पर रख दिया। और पेंटल फफक पड़ा तू कहां चला गया मेरे
दोस्त। मैं आज अपने को कितना असहाय महसूस कर रहा हूं। मेरा दिल फटने को है। मैं
तुझे बताना चाहता हूं,
अपने दिल का रहस्य। और जानना चाहता हूं तेरे दिल का रहस्य। परंतु तू
तो मुझ से भी पहले वो पा गया। जिसके विषय में मैं आज भी सोच नहीं सकता। परंतु सच
मुझे भी कुछ हुआ है। मुझे भी कुछ मिला है। मेरा दिल उसे पचा नहीं पा रहा लगता है
अगर वह बहार नहीं निकला तो फट पड़ेगा। और सच उस बहते प्रेम के कारण आज दोनों दोस्त
जो इतने दिन से इतने पास रह कर भी एक दूसरे से इतने दूर थे। आज एकदम से कितने करीब
आ गये थे।
नानी ने जब देखा की
दोनों दोस्त एक दूसरे में घुल मिल रह है। तो पल भी लिए खड़ी रह गई। प्रेम कोई थोथी
लकीर नहीं जो सूखने पर खत्म हो जाती है। दूर से देखने में तो लगता है। वह सूख गई
परंतु आप जरा जी एक बूंद फिर उस पर डालों वह अपना वहीं मार्ग चून लेगी। आज महीनों
बाद नानी प्रसन्न थी वह देख रही थी। पेंटल को कुछ तो हुआ है। जब ये यहां से श्याम
को गया था तो उसके चलने मात्र से समझ गई थी की कहां जा रहा है। एक बार तो उसका मन
हुआ की इसे टोकें परंतु आज कल के जवान बच्चे कहां समझते है। आज देख रही थी जिसे वह
चरित्र समझ कर पूरे जीवन महान समझ रही थी। वह इस शील के सामने तो कुछ भी नहीं है।
शील कोई थोथी और थोपी हुई परछाई नहीं होती वह आपके अंतस से उठती है। तब आप का जो
चरित्र होता है। वह दूसरा ही हो जाता है। परंतु समाज ने कुछ नियम कायदे बनाये है।
प्रत्येक आदमी तो शील को उपलब्ध नहीं हो सकता फिर चरित्र को ही महान बताया जा सकता
है। वह आदमी को ठोक पीट का सही मार्ग पर चलता हुआ तो दिख रहा होता है।
चाय के आते देख कर
पेंटल उठ कर खड़ा हो गया और चाय की ट्रे अपने हाथ में ले कर नानी को बैठ जाने के
लिए कहा। तब तीनों ने एक दूसरे को देखते हुए चाय का आनंद लिया। शब्द वहां नहीं थे।
शायद अगर वहां बीच में शब्द आ जाते तो कुछ लयबद्धता छिन्न-भिन्न हो जाती। अब वहां
मौन का एक आनंद झर रहा था। जो केवल उनके चेहरे और आंखों से ही नहीं उसके अंग के
पौर-पौर से देखा,
समझा और महसूस किया जा सकता था।

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