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रविवार, 11 जनवरी 2026

49 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -49

जीवन के पंख

इस समय जो मैं जीवन जी रहा था। वह जमीन पर चलता सा तो लगता था, परंतु उसके पंख लगे थे। इतना खूबसूरत जीवन होगा मैंने कभी सोचा भी नहीं था। कितनी खुशियाँ कितनी रमणीयता पूर्णता से इस जीवन में समाई हुई  थी। हर पल, हर दिन मानों कुछ नया लेकर आ रहा था। बदला कुछ भी नहीं था सब पहले की ही तरह से चल रहा था। परंतु संग बदलने से मानो आप किसी उत्तुंग या ऊँचा में प्रवेश कर गये हो। मम्मी-पापा जी के संग साथ रहने के कारण जो मेरे दिन कट रहे थे वो शब्दों में नहीं पिरोए जा सकते। वह

वह दिन सुबह से रात तक कैसे अपने में एक सम्पूर्णता समेटे चल रहे थे। मानो आप आज जो जी लिए है बस अब पूर्ण है कल की जरूरत नहीं है। चाहे अगले पल ही मैं जीवन से मुक्त हो जाऊं। जितना मैं पकड़ छोड़ता जा रहा था, उतना जीवन में रस्सा स्वाद बढ़ रहा था। सुबह उठ कर या तो मम्मी पापा ध्यान करते या घूमने चल देते मैं तो उनकी पूंछ था। पल भर भी उनका साथ नहीं छोड़ता था। उसके बाद पापा जी कम्पयूटर पर बैठ कर कुछ खटर-पटर (टाईप) कर रहे होते या बांसुरी का रियाज कर रहे होते मेरा आसन उनके चरणों में ही होता था। तब हर हाल में अपनी जीवन उर्जा का बहाव हो गया। हर हाल में।

अब मैं एक पल-पल उनके संग को पी लेना चाहता था। जितना उनके संग साथ मिल जाये वहीं मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। और सच पापा मम्मी का जीवन भी कुछ ऐसा था जैसे मैं चाहता था। मैं तो उनके संग होते हुए एक परछाई की तरह मात्र उनके साथ रहता था। तब आप सोच रहे होगे की मैंने मम्मी पापा को कैद कर लिया है। सच में ऐसा नहीं था। दीदी आज कल बाहर ही रहती थी। जब वह आती तब ही मम्मी पापा कहीं घूमने के लिए चले जाते थे। तब मैं दीदी के साथ भी मस्त रहता था। एक ऐसा खिंचाव जीवन में बह रहा था पापा मम्मी दूर होकर भी दूर नहीं रहते थे मेरे। वह दूर रहे या पास मेरा अंतस उन्हें महसूस करता ही रहता था, लगता वो इतने पास है की मेरी श्वास भी उन्हें छू रही है, मेरे प्राण उन्हें महसूस कर रहे, हर पल हर क्षण उन्हें अपने अंग संग महसूस कर सकता हूं। एक अदृश्य प्रेम महीन तार की तरह से बह रहा हम तीनों के बीच में। कभी-बीच में पापा मम्मी के जाने के बाद बुआ जी आ जाती थी। जब वह आती तो मुझे और भी बहुत अच्छा लगता था। वह खाने को मेरे लिए मिठाई जरूर लाती थी। दीदी के साथ बुआ जी की अच्छी दोस्ती थी। इस तरह से एक संतुलन सा बन गया था। और एक परिवर्तन भी हो जाता था। ये सब मेरे लिए भी बहुत अच्छा था। की मैं मम्मी-पापा की उर्जा से जब अधिक भर जाता था तो अब क्या करूँ छोड़ने का अलग होने का मन नहीं करता था एक लालच बना रहता था। लेकिन कुछ ही दिनों में अपनी प्यास को फिर तैयार कर लेता था। बस दीदी के साथ एक ही कमी थी की वह मुझे घुमाने नहीं ले जा पाती थी। और ये ठीक भी था अब गांव में इतने जालिम कुत्ते हो गए थे। की मुझे भी अब उनसे डर सताने लगा था। न जाने इन एक दो साल में इतने कुत्ते कहां से आ गये मानो सारी दिल्ली के कुत्ते हमारे दसघरा गांव में आ गए थे।

मैं सोचता था पहले तो इतने कुत्ते नहीं थे, इतनी जल्दी ये सब कहां से आ गए। बच्चे नहीं बड़े-बड़े कुत्ते भी। मुझे लगता है एम. सी. डी वाले कहीं से भी कुत्तों को पकड़ कर नसबंदी करते और सब को एक साथ गांव में उतार जाते। भारत में ऐसा चलता है। ये कुतो के साथ अन्याय है और अलग-अलग स्थान के कुत्ते नई जगह पर अपने अधिकार के लिए वहां के कुतो के लड़ते और खूंखार हो जाते है। यहां के सभी कुत्ते तो आपस में एक दूसरे को जानते थे। ये किस गली से आया है परंतु वे एक प्रकार से विदेशी घुसपैठिया हो गए। लेकिन अब क्या किया जा सकता था। मम्मी पापा के साथ भी दोनों को डंडा लेकर मेरे साथ चलना होता था। वह दोनों तरफ से घेरना शुरू कर देते थे। अब तो पापा जी अकेले मुझे घुमाने के लिए ले भी नहीं जा सकते थे। क्योंकि एक मैं बंधा हुआ दूसरा वह आगे पीछे से हमला बोलते थे। तीसरा में भी उन पर हमला बोलता अपने बचाव के लिए तो पापा जी बेचारे बीच में धीर जाते हम राक्षसों के हाथों में।

पापा जी जब पेड़ पौधों की देख भाल कर रहे होते तो मैं उपर उनके पास ही सामने वाले कमरे में बैठा होता वहां वह पंखा चला देते लाख कहते की नीचे जा यहां क्यों गर्मी में मर रहा है, परंतु मन नहीं करता था पापा जी संग छोड़ने का। पापा-मम्मी आज कल जब बहुत जल्दी उठ जाते तो छत पर तारों की छांव में बैठ कर चाय पीते थे। वहां मेरे लिए दो ब्रेड लाई जाती जो मैं कूर-कूर कर बड़े मजे ले-ले कर खाता था। अब मैं कितने सालों से केवल दूध ब्रेड ही खान लगा था। और कुछ हजम ही नहीं होता था। अगर घर में कुछ बनता तो पहले की तरह जिद्द नहीं करता था। प्यार से स्वाद के तोर पर एक छोटा सा टुकड़ा ले कर संतोष कर लेता था। मात्र स्वाद बदलने के लिए इस लिए इस मेरे मन के इस परिवर्तन को मम्मी पापा जान गए थे। और वह खुद ही खुश थे कि पोनी कितना समझदार हो गया है। अब मैं देख चूका था की अगर मैं नियम कायदे में रहकर खाना पीना करूंगा तो कुछ दिन अधिक जी सकता हूं। वरना अगर इस जीभ की गुलामी की तो फिर ज्यादा दिन का मेहमान नहीं रहूंगा।

अब इतनी सुंदर और शांत जगह को, इतने प्यारे इंसान को कौन छोड़ना चाहेगा। हाँ मैं मानता हूं की छोड़ना तो होगा परंतु एक मूर्खता के कारण नहीं। श्याम के समय अगर मम्मी पापा के पास समय होता तो वह संध्या ध्यान करते तब वह सफेद चोगा पहनते थे। और मैं काफी पहले ही समझ जाता था की आज संध्या ध्यान होगा। और ए. सी. चलते ही मैं पिरामिड के दरवाजे के पास जाकर खड़ा हो जाता। बस वह खुला नहीं की पोनी अंदर। और ठीक पिरामिड के बीचों-बीच मेरी दरी बिछी होती थी। जहां लगभग मेरा स्थान होता था। पापा जी ने एक छोटा सोफा भी आज कल पिरामिड में दाई दीवार से सटा कर बिछा दिया था। एक तो वह गद्दा था जिस पर वह पहले पापा जी सोते थे। इसके अलावा वैसे तो बैठ की कुर्सियां भी थी। दूसरी जमीन से सटी ध्यान की कुर्सियाँ भी थी। बस आज कल ध्यान में मैं इतना डूब जाता की बस लगता था सब यहीं खत्म हो जाये। एक-एक दिन मुझे इतना सुखद अनुभव होता जा रहा था की आज तो सारा प्याला भर गया। अब क्या करूं। मानो परमात्मा संपूर्णता से मेरे उपर बरस रहा था। ये बात मुझे महसूस हो रही थी परंतु वह वहां बरस ही रहा था सब पर ही। फिर ध्यान के बाद कुछ भी नहीं खाने का मन नहीं होता था। मुख में ऐसी मधुरता भर जाती थी की लगता कुछ भी मुख में डाला तो इसका स्वाद कम हो जायेगा। रात को मैं जो दूध पीता था उस दिन वह भी नहीं पी पाता था। और सब ध्यान से जब उठ जाते तो मेरे न तो उठने को मन करता था और सच कहूं तो मुझसे उठा ही नहीं जाते था। लगता ये शरीर मेरी बात मानने को तैयार ही नहीं है। शायद एक दिन ये शरीर मिट्टी हो जायेगा तो मैं इसे ऐसे ही देखता रहूंगा। ये पड़ा रहेगा और सब इसके आस पास होगे और में मुक्त हो गया हूंगा। मुझे लग रहा है ये मेरा अभ्यास हो रहा है जाने का। कई बार तो पापा जी बाद में आकर मुझे उठाते की चलो महाराज ध्यान खत्म हो गया। अब पिरामिड को बंध भी करना है। तब मैं मरे मन से आंखें खोलता और डगमगाते कदमों से उठता और टी. वी वाले कमरे जाकर लेट जाता। मानो में किसी तरह से इस शरीर को खींच कर यहां से वहां ले गया हूं। कितना सूखद क्षण होते है वो देख कर बहार से नहीं जाना जा सकता। परंतु पापा-मम्मी तो आराम से उठ कर आ जाते है। तब मेरे साथ ऐसा क्यों...शायद मेरा प्याला पशु शरीर के कारण पूर्ण भर गया है। और सच ही लगता है अब एक ध्यान की बूंद भी इस प्याले में आने वाली नहीं है।

इस बीच कभी-कभी शालव भैया भी ध्यान करने के लिए आ जाते थे। वैसे तो वह अकसर कम ही आते था परंतु किसी खास दिन जैसे ओशो का जन्म दिन हो या मम्मी का जन्म दिन हो तो वह जरूरत पापा जी से पूछ कर आते था। वह आते थे तो श्याम को संध्या सत्संग भी जरूर ही करते और यहीं पर खाना कर देर तक यही पापा मम्मी के संग साथ गुजार कर जाते थे। आज कल उसकी उर्जा भी एक दम से बदल गई है। कितना चमत्कार है न ध्यान कैसे आपने अंतस को स्वच्छ सुंदर करता जाता है। ठीक एक दम से दूसरा ही शालव नजर आता है मुझे। पहले जब मैं उसकी उर्जा को सुंघता तो उसमें चालाकी, पागलपन और एक खास धूर्तता की गंध आती थी। परंतु अब उसकी उर्जा एक गंध हीन पारदर्शी होती जा रही थी। उस दिन जब मैं नाले में गिर गया था तब उसी ने पापा जी के साथ मुझे ढूंढा था। बीच में दुकानें के ऊपर चिनाई का काम चल रहा था तो हम तीनों ही वहां सुबह-सुबह जाते थे। क्योंकि मजदूरों के लिए पानी वगैरह भरना पड़ता था। और तब मैं वहां पर खुब मस्त होकर घूमता रहता था। वह छत बहुत बड़ी थी परंतु इस समय तो उस पर इधर उधर सामान बिखरा होने के कारण ध्यान से चलना पड़ता था। और तब मैं सोचता कि देखो ये भी तो हमारा ही मकान है। तब शालव रोज घंटों पापा जी के साथ मिल कर काम रहा होता था। फिर हम तीनों घर आ जाते ठंड होने और तराई कारण हम थोड़े भीग भी जाते थे। उसके बाद हम छत पर बैठ जाते थे, वहां जो उगते सूर्य की धूप आ रही होती वह कितनी मीठी सूखद लगती थी। थोड़ी ठंड से बचने के लिए शालव भैया हल्की सी चादर ओढ़ लेते थे और मेरे नीचे मेरी नरम मुलायम दरी बिछा दि जाती थी। ऊपर ही छत पर बैठ कर सब चाय आदि पीते तब थे। उसके बाद पापा जी और शालव मिल कर कोई किताब साथ पढ़ते थे। मैं भी पास लेट कर उस संग का सत्संग का आनंद लेता था। पापा के शब्द उस समय एक खास मदहोशी लिए हुए होते थे। जैसे की मैं ओशो के प्रवचनों के समय मदहोश हो जाता था। अब पापा जी वाणी में भी वही ओज आता जा रहा था। सुबह की वो मीठी धूप कितनी अच्छी लगती थी जब वह शरीर से गुजर रही होती थी। किताब तो मेरी समझ में कुछ नहीं आती थी। परंतु वो मुलायम धूप वो संग साथ लोरी और ध्यान का अदभुत मिश्रण बन जाता था मेरे लिए।

मैं तो केवल उस सत्संग तरंगों की आनंद लहर पर बस तैर रहा होता था, जो उस हवा में, उस वातावरण वहां बह रही होती थी। शायद महीनों से एक ही पुस्तक को पढ़ रहे थे शालव भैया और पापाजी। मैं सोचता था एक किताब पढ़ने के लिए इतना समय क्यों लगता है। क्या ही अच्छा लगाता होगा एक ही किताब को रोज-रोज पढ़ने में। परंतु मुझे तो पढ़ना आता नहीं तब मैं कैसे अंदाज लगा सकता हूं की एक किताब को पढ़ने कितना समय लगना चाहिए। लेकिन वो समय बहुत ही शांत और आनंदमय होता था। इस सब के कारण शालव की तरंगें रोज-रोज बदलती जा रही थी। पहले तो मैं उसको मंद बुद्धि और थोड़ा पागल भी समझता था। सच कहूं तो मैं उसके अंदर दिमाग ही नहीं समझता था। लगता था की क्यों यहां हमारा दिमाग और समय खराब करने के लिए आ जाता है। परंतु किसी खास मोके पर जब वह आता तो खाने के लिए मम्मी जी कुछ बहुत अच्छा बनती थी। कभी राजमा चावल, छोले भटूरे, या कुछ भी तब मैं भी खाता परंतु केवल प्रसाद की तरह। लेकिन मैं जानता था अधिक मेरे लिए खतरनाक है, इसलिए मैं जिद्द बिलकुल नहीं करता था। तब शालव भैया अपनी पुरानी आदत के अनुसार मुझे कहते की पोनी और ले परंतु में अपने स्थान पर आकर लेट जाता था। वह भी अचरज से मुझे देखता की पहले तो पोनी खाना मांगने के लिए कितनी जिद करता था। बार-बार मुझे पंजा मार कर मांगता था। कि थोड़ा और दे दो भैया, परंतु अब उसे अचानक क्या हो गया था। संग को अगर आप ग्रहण करते हो उसे अपने अंतस में जाने दो तो वह आपको जरूर बदल देगा। 

वह मेरे इस परिवर्तन को देख कर हतप्रभ था। परंतु परिपक्वता भी जीवन में कुछ देती है। इसी सब से तो विकास होता है। आप कहां चल रहे है, उसकी क्या पहचान है। कि हमारे अंदर कुछ चीजें बदलती सी लग रही होती है। थिरता का नाम ध्यान थोड़े है। सब चलायमान है। जीवन ही नहीं चल रहा यहां पर हर स्थूल सूक्ष्म सब बदल रहा है। दोनों भैया भी अपने काम में अब रस ले रहे थे। शायद उन्हें पता चल गया की अपने पेरो पर खड़ा होना ही होगा। उसके बिना अब काम नहीं चलेगा अब हम बड़े हो गए हमारा भार हमें खुद ही उठाना होगा। और ये अच्छी बात भी थी उनके लिए भी और मम्मी पापा के लिए भी। बीच में कभी-कभी उनकी कोई यार दोस्त भी आ जाती थे। वैसे तो पापा-मम्मी मिलने मिलाने वाली बात थोड़ी कम ही रखते थे। उन्हें देख कर मैं बहुत परेशान हो जाता था। लो अब फिर करो चोकीदारा मन मेरा बड़ी उलझन में फंस जाता था। और सच ही अंदर से सोचता था की ये भी इसी घर में आ जायेंगे तो फिर मेरा काम कितना बढ़ जायेगा। जब वह चले जाते तब जाकर कही चैन मिलता था।  इतने बड़े घर में हम मात्र चार-पाँच प्राणी। इस लिए खुला पन अधिक होने के कारण मन का विस्तार भी अधिक ही हो रहा था। जैसे आपने देखा की जब हम किसी खुले स्थान पर चले जाते है तो हम अपने आपको कितना फैला हुआ पाते है। अब ये तो भैया हर का जीवन को गति देने का समय था। पापा जी तो केवल सहयोग ही करते थे उनके संग साथ में। धीरे ही सही परंतु जीवन बदल और बहाव ले रहा था।

इस बीच एक बात और घटी की एक दिन हिमांशु भैया के साथ मम्मी जी न जाने कहां चली गई वैसे मम्मी जी अकेली कभी जाती नहीं थी। वह तो पापा जी के साथ ही जाती थी। इस लिए मेरी फिक्र होना एक स्वाभाविक बात थी। अब नीचे केवल मैं और पापा जी ही रहे गए। मेरी समझ से बाहर था की मम्मी जी को अकेले पापा जी ने क्यों भेजा वह अगर खो गई या रास्ता न जान पाई तो हम कैसे उन्हें ढूंढेंगे। इन्हीं सब बातों के कारण मैं इस आदमी (पापाजी)  को नहीं समझ पाता था। अगर मैं तो अकेला कहीं रह जाता तो कितना फिक्र करते थे। और बताओ मम्मी जी को अकेला भेज दिया। इन दिनों ठंड कुछ कम थी दीदी तो आई हुई थे। हम छत पर बैठ जाते या जंगल में चले जाते अब जंगल में थोड़ी धूप होने पर ही जाते थे। कभी-कभी शालव भैया हमारे साथ आ जाता तब हम तीनों हो जाते थे। भैया लोग अपने काम में अधिक व्यस्त रहने लगे थे इसलिए अब जंगल में हमारे साथ नहीं जोते थे। उन्हें  अब घूमने तक की फुरसत ही नहीं मिलती थी। अब तो बुलबुल कैद में फंस गई थी। तब मैंने देखा की यहां पर भी वही लाल-लाल बेर थे। जो उस जंगल में लगते थे जहां मेरा जन्म हुआ था। क्या ये जंगल एक है यहां से वहां जाया जा सकता है। ये अगर दीवार न होता हम जा सकते है। मन में एक लालच ने जन्म लिया था। अचानक मुझे बचपन की याद आई उस जंगल की भी अपनी मां की भी। इतने दिन से तो उस सब को भूल ही गया था। मानो फिर किसी ने मन के एक हिस्से को कुरेद दिया हो।

मन एक दम से उदास हो गया एक तो मम्मी जी यहां नहीं दूसरा मुझे अपनी मां की भी याद आ गई। कितना समय बीत गया मम्मी जी को वहां गए हुए। क्या वहां पर उनका मन हमारे बिना लग गया होगा। या वह भी हमें याद करती होगी। वही पुरानी यादें फिर से ताजा हो गई। जैसे बच्चे खेल रहे है, दीदी और मम्मी कपड़े धो रही है। मन कर रहा था एक बार उस जगह को फिर देख आऊं परंतु अब वहां नहीं जाने दिया जाता था। और अब जगह भी कितनी घनी हो गई होगी जहां मानव के पैर नहीं पड़ी तो प्रकृति अपने पैर बड़ी तेजी से पसारती है। इसी तरह से बीच में कभी पापा जी भी चले जाते। वह भी अकेले। तब मम्मी घर पर रह जाती। शायद घर की देख भाल के लिए। या कोई और कारण भी हो सकता है। इस तरह से मम्मी तीन-चार बार अकेली गई परंतु जब वहां से आती तो और भी प्रेम पूर्ण होकर आती थी। उनके चेहरे पर एक ताजगी होती। भैया हर के विछोह का दूख उनके चेहरे पर मैं देख पाता था वहां से आने के बाद वह कुछ कम हो जाता था। अब मम्मी जी भैया हर की क्यों चिंता कर रही है। उनकी चिंता करने वाली उनकी पत्नी आ गई वह दोनों आपस में मस्त है। तब मम्मी नाहक नासमझी की बाते करती है। परंतु मैं ये नहीं जानता की उनके अंदर एक मां की ममता भी है।

इसी तरह से एक दिन पापा जी बाईक से बड़ी सुबह-सुबह कही चले गये। पापा जी जब बाई से जाते तो एक दम हीरो बन कर जाते थे। हाथ में दस्ताने हेलमेट आप देखते तो बस देखते ही रह जाते। अभी रात ही थी इस लिए मैं समझ गया की जरूर कहीं दूर जा रहे होंगे। क्योंकि हमेशा ऐसा नहीं होता की जब मोटर साइकिल के कर बिना बैग के जाते है तो दूर नहीं जाते थे। परंतु जब वह बैग बांसुरी आदि लेकर जाते थे मुझे तुरंत पता चल जाता था। अब कई दिनों बाद ही वापस आयेंगे। इंतजार तो होता था, मन भी नहीं लगता था। परंतु सच अब मैं पापा जी को बांधना नहीं चाहता था। परंतु श्याम को अचानक मुझे मेरे शरीर में कुछ परिवर्तन सा लगा। जाने मेरी स्वांस ने कोई गियर बदला हो, बहार से देखने में तो सब ठीक ही लग रहा था। परंतु अंदर कुछ गहरे में एक गांठ सी खुल गई। हालांकि स्वांस अभी भी उसी तरह से लय में चल रही थी। परंतु उसके आव गमन में कुछ खाली-खाली सा लग रहा था। शरीर किसी अपूर्णता को महसूस कर रहा था। जैसे सांस से एक पूर्णता में सालों से महसूस कर रहा था। ठीक इसके उलटे यानि की जैसे आपका शरीर भूखा रह रहा है। उसे पर्याप्त स्वांस नहीं मिल  रही। एक दम भोजन की तरह से जैसे आप जितना खा रहे होते है ठीक उसकी मात्रा कम हो गई। पूरा दिन में इस उधेड़ बुन में लगा रहा की मैं बीमार तो नहीं हूं। परंतु मुझे कोई तकलीफ भी नहीं थी। कोई थकावट शिथिलता भी नहीं थी। फिर ऐसा क्यों लग रहा था। अचानक रह-रह कर एक भय घेर लेता था मुझे। कि मैं एक अंडे में बंद हो गया हूं। आँख बंद करने पर भी अंदर सब खाली-खाली सा लगने लगा था। मैं लेटे हुए आँख बंद कर के अपने को लाख ढूंढने की कोशिश कर रहा था। परंतु पोनी नाम का कोई प्राणी मुझे नजर नहीं आ रहा था। तब दो दिन से मेरा कुछ भी खाने को मन नहीं कर रहा था। या शायद मुझे भूख ही नहीं लगी थी, हो सकता है इसी परिवर्तन के कारण। तब दीदी ने सोचा की मैं पापा जी को याद कर रहा हूं। दीदी ने मुझे कहा की पापा जी की याद आ रही है। फोन कर के बुलाऊं पापा जी को। पापा जी का नाम सून कर मेरी आंखों में चमक आई क्या ऐसा हो सकता है। की दीदी पापा जी को फोन करे और वो आ जाए। उस समय रात के नौ बजे थे। तब दीदी ने पापा जी को फोन किया और कहां की पोनी तो बहुत उदास है। आपको याद कर रहा है आप उससे बात कर लो। तब मेरे कान के फोन लगा दिया। अब पापा जी आवाज तो मैं सून रहा था परंतु पापा जी तो आस पास कहीं नहीं थे। मैं खड़ा होकर इधर उधर देखने लगा नीचे भी चला गया। की शायद नीचे से आवाज आ रही हो। परंतु मेरी समझ में ये नहीं आ रहा था की इस छोटे से फोन से ये आवाज कैसे आ रही थी। जब पक्षियों की आवाज टी. वी से आती थी तब भी  मैं बड़े ध्यान से इधर उधर कान कर सुनने की कोशिश करता था। की यहां कहां पक्षी आ गए।

अब बेचारे पापा जी को जब मेरी बीमारी का पता चला तो वह कहने लगे मैं कल आता हूं। और फिर सुबह ही मैंने खाना खा लिया। तब दीदी ने शायद सोचा की पापा जी के आने की बात सून की मैंने खाना खाया है। और ये बात सच ही है कि अब दीदी मम्मी या पापा जी जब बात कर रहे होते थे तो में समझ लेता हूं। पोनी को नहला दो, पोनी को दवाई दे दो....आदि ...आदि। इसलिए अब सब बातें इशारों में की जाती थी। ताकि मैं सुन न लूं। जब मुझे नहलाना होता है तो चुप से पानी भर कर पापा जी मुझे अगले दोनों पैरो से उठाकर चलाते हुए ले जाते है। दीदी तो आज भी मुझे दवाई या नहलाने से डरती है। बस पापा जी नहीं डरते। नहाने को मन तो नहीं कर होता था। इस उम्र में ठंड और डर दोनों ही लगते थे। नहाने के बाद बहुत आनंद आता था खास कर गर्मियों में...सारा शरीर फूल की तरह से हल्का हो जाता था। इसलिए सर्दियों में कम ही नहलाया जाता था। गर्मी में तो शरीर से अधिक दुर्गंध आने लग जाती है। फिर नहाने से थोड़ी राहत भी मिल जाती है। इसलिए मैं डरने या न नहाने का केवल नाटक करता था अंदर से तो मन करता था मुझे नहला दिया जाये। मन भी कितना दोगला होता है। 

पापा जी भी श्याम तक घर पहुंच गए थ। पापा जी ने मेरा चेहरा देखा तो कुछ परेशान हो गए। मैं इस बात को समझ नहीं पाया। परंतु पापा जी ने कुछ ऐसा देखा है जो नहीं देखना चाहिए। परंतु ये बात पापा जी ने किसी को नहीं बताई। मुझे प्यार किया और कहने लगे तु मुझे एकांत वास नहीं करने देगा। तब में पापा जी के हाथ को चाट कर कुछ कहना चाह रहा था। कि नहीं मेरे अंदर से कुछ आवाज आ रही है। ऐसा लग रहा है के अब मेरे जाने का समय हो गया है। न जाने क्यों पापा जी आते ही मेरे मन ने इस विचार को किलिक किया। जैसे सब साफ हो रहा है। जो धुंध थी वह एक कुहासा बन कर छितर रही है। और मैं उस भविष्य को देख रहा हूं जो मेरे सामने खड़ा था। इस सब को मैं घटते हुए एक चलचित्र की तरह से देख रहा हूं, अपने तन पर महसूस कर रहा हूं। परंतु एक बात बिलकुल सत्य थी कि मुझे जरा भी डर नहीं लग रहा था। बस अगर कुछ चाहता था तो इतना ही कि जीवन के जो अंतिम दिन है घंटे है क्षण है वह पापा जी के संग साथ उनकी गोद में घटे। यही में चाह रहा थी जिसे में अपने जीवन की अंतिम वासना कह सकता हूं। परंतु इस डोर को मैं नहीं पकड़े था मैंने इसे पापाजी के संग बाँध दिया था मैं अब इसका मालिक नहीं था। केवल एक दर्शक मात्र था। और मैं जानता था पापा जी इस डोर को पतंग की तरह से पकड़े होगे जब मैं जाने लगूंगा तो हंसी खुशी इस डोर को छोड़ देंगे। यही मेरे लिए उत्तम था क्योंकि मैं तो कमजोर पड़ सकता था परंतु पापाजी मालिक होने के कारण मेरे मन में जरा भी भय नहीं है अपने मुक्ति का।

समय फिर उसी गति से चल दिया और हम सब उसके हमजोली बन कर उसके साथ हील मिल कर साथ-साथ चल रहे थे। वहीं घूमना और वहीं मेरे खाने के लिए पहले पनीर आता था। बीच में अब शाकाहारी पेडिग्री (पेटफूड्स) भी मंगवाई गई। परंतु वह मुझे अच्छी नहीं लगती थी। उसकी गंध मेरे को नहीं भाती थी। पहले मैं उसे किस चाव से खाता था। दूसरा इसके खाने से मेरे पेट में कुछ गड़बड़ होनी शुरू हो जाती थी। जिसके लिए मुझे नारियल का तेल पापा जी इंजेक्शन भर कर पिला देते थे। उससे मुझे काफी आराम मिलता था साथ-साथ उससे मुझे मोशन आसानी से हो जाता था। वरना पेट काफी गड़बड़ रहने लगा था। जंगल में जब जाता तो घास भी खाता था। परंतु पहले तो मुझे एक या दो बार में आराम हो जाता था। अब एक दम से कब्ज रहनी शुरू हो गई। फिर धीरे-धीर वह ऐंठन बननी शुरू हो गई। बीच-बीच में हलका दर्द भी शुरू हो गया था। जिसकी पहले में ज्यादा परवाह नहीं करता था। परंतु ये दर्द कुछ अलग था। अब तो दूध या ब्रेड खाने पर भी यह दर्द शुरू होने लगा था। इसलिए में दिन में केवल एक बार ही दूध और ब्रेड खाता था। परंतु पानी बहुत पिता था। जिसके कारण मेरा बाथरूम अधिक आता था जिससे मेरे पेट को कुछ आराम मिल जाता था। धूम कर आने के बाद तो मैं नल के नीचे ही खड़ा हो जाता था। पापा जी मुझे बुला कर कहते थे पोनी आजा पानी पी ले। और मैं जीभ से चपड़-चपड़ मस्त पानी पीता ही रहता था, जब की सार पेट भर नहीं जाता। परंतु इससे जो मेरे पेट में जो जलन होती थी। वह कुछ समय के लिए कम हो जाती थी।

अब जहां मैं बैठा होता तो वह जगह अति गर्म हो जाती थी। पापा जी पैर या हाथ से छूकर कहते थे की देखो पोनी जहां पर बैठा है वह जगह कितनी गर्म है इसके पेट में कितनी गर्मी है या जैसे हमारे शरीर में कोई फोड़ा पकता था तो  वह गर्म हो जाता है। लेकिन न तो मुझे दही ही अच्छी लगती थी और न ही छाछ जो मेरे लिए अमृत का काम करती परंतु जो चीज पहले कभी खाई न हो अब इस उम्र में उसे शुरू करना कितना कठिन था। अब तो जो खाया हुआ था वह भी छूट रहा था।

अब जीवन उस मोड़ पर आ गया था कि इसकी पूर्णता को जी लूं पल-पल को पी लूं। आज कल पापा जी श्याम को जरूर संध्या ध्यान करते थे कि यह सब पोनी को बहुत अच्छा लगता है। अब चक्रासाउंड ध्यान की ध्वनि भी मुझे चुभती थी, और नाद ब्रह्मा की ध्वनि से तो मैं कांप जाता था। पापा जी जब बांसुरी बजाते तो मैं उनके पास जाकर उनकी गोद में अपना सर रख कर कहता की मुझे डर लग रहा है। तुम मुझे अपनी गोद में छुपा लो। सच बांसुरी कि आवाज भी अब मेरे प्राणों को छेदती हुई निकल जाती थी। पापा जी मेरा चेहरा देख कर अपनी बांसुरी बजाना बंद कर देते थे।

शरीर ने सुकड़ना शुरू कर दिया था। पहले जब भी मैं बीमार होता था तो चेहरा सबसे पहले सुकड़ता था। सर पर चुंजी निकल आती थी। दीदी मेरा मजाक बनाती थी। परंतु अब शरीर सुकड़ रहा था। उर्जा अपने स्त्रोत की और लोट रही थी। मैं अंदर से जान गया की इस घर का ध्यान का जो आनंद लेना है जल्दी से ले लो। नहीं तो समय नहीं मिलेगा। दीदी जाने के लिए कह रह थी। परंतु दीदी को पापा जी ने कहा की जान है तो जा सकती है परंतु तीन महीने के बाद तुरंत आ जाना। ये बात सून कर शायद दीदी को अजीब लगा होगा। की पापा जी ने ऐसा क्यों कहा। उसने सोचा होगा कि शायद पापा मम्मी कही घूमने जाना चाहत होंगे। तब पापा जी ने कहा अब जाओ परंतु जुलाई के अंत तक तुम जरूर आ जाता। दीदी सोच रही होगी की जुलाई में तो बरसात होती है भला बरसात में पापा-मम्मी कैसे घूमने जायेंगे।

दीदी चली गई और फिर हम तीनों प्राणी रह गए। हिमांशु भैया तो नौकरी के चक्कर में काफी दिन बहार ही रहते थे। वरूण भैया अपनी अब अपनी दुकान की मारा मारी में ही पीसता रहता था। हम तीन पापा-मम्मी और मैं ही का 24 घंटे का साथ रहता था। अब सुबह का ध्यान जो हम करते थे वह बंद हो गया। केवल कभी-कभी डायनेमिक जरूरत कर लेते थे। श्याम का ध्यान रोज नियम से होता था। पापा जी का जन्म दिन आया सात जुलाई, उस दिन शालव भैया भी आया मम्मी ने बढ़िया खाना बनाया। वरूण भैया को भी कहां की ध्यान करेगा तब वह कहने लगा दुकान से आना मुश्किल है। तब पहले ध्यान इसलिए नहीं करते थे की बाद में कर लेंगे। उन्हें नहीं पता की जितनी देर करोगे उतना ही कठिन होता चला जायेगा। उस दिन मम्मी ने छोले भटूरे बनाये क्योंकि शालव भैया को ये बहुत पसंद थे। पसंद तो ये मुझे भी बहुत थे परंतु अब ये मेरे काम के नहीं रहे थे। परंतु फिर भी मुझे भी एक भटूरा खाने को मिला मन तो नहीं कर रहा था। परंतु पापा जी का जन्म दिन था इस खुशी में खा गया। फिर अगले साल शायद मैं यहां हूँ या न हूं। इसलिए आज ध्यान भी बहुत अच्छा हुआ। शालव तो ध्यान के बाद रोता रहा, उसके अंतस का जमा सब बह गया। मैं भी कितनी बार उसे बुलाने के लिए पिरामिड में गया परंतु वह अति शांत हो गया था। फिर उसने मुझे अपने गले से लगा कर खुब प्यार किया। और मम्मी-पापा के पैरों में सर रख कितनी देर वह रोता रहा। लेकिन खाना खोने के बाद जब वह गया तो शालव का चेहरा ही और था। वह एक दम से बदल गया था। इस बात की मुझे बहुत खुशी थी, क्या भैया हर ध्यान करते तो वह भी इतने भावुक और प्रेम पूर्ण नहीं हो जाते। या कि दूसरे लोग। अब मुझे लग रहा था कि सच ध्यान में बहुत ताकत है। शालव भैया ने मेरे इस इरादे को और मजबूत कर दिया था।  की सालों बाद इतना अच्छा ध्यान हुआ।

जीवन की ये संध्या भी कितनी सुंदर बन गई थी। मेरे लिए अब संध्या नहीं थी। मैं तो दूर एक चमकते प्रकाश को देख रहा था। इस बुझते दीपक में भी प्रकाश देख रहा था मुझे। मेरे शरीर से प्राण उर्जा स्नेह-स्नेह कम होती जा रही थी। परंतु में इस बात के कारण कमजोरी महसूस बिलकुल नहीं कर रहा था। इसलिए तो लोगों को अपने मरने के समय का पता नहीं चलता होगा। क्योंकि उनके शरीर को आक्सीजन तो पूर्ण मिलती रहती है परंतु उससे केवल प्राण वायु ग्रहण करना बंद कर देता है। खान तो पहले ही कम खाता था। अब तो और भी कम कर दिया था। परंतु इस बात का किसी और को पता हो न हो परंतु पापा जी तो सब जानते थे। वह मेरे लिए मेरी पसंद की चीजें लाकर खिलाते मुझे बर्फी बहुत पसंद थी। मम्मी के लाख मना करने के बाद भी वह लेकर आते और मुझे चोरी से खिलते। मेरी पसंद का चूरमा भी उन्होंने बनाया जो मुझे पसंद था। वह मेरे मन में दबी प्रत्येक चीज से मुक्त करना चाहते थे। मुझे चॉकलेट या गुड बहुत पसंद था इसलिए वह मुझे चॉकलेट भी देते। गुड़ खिलाते मैं समझ गया की पापा जी मेरी बिदाई कर रहे है। सच ये सहयोग लाखों में किसी एक को नसीब होता है।

मम्मी जी गुस्सा करती थी की तुम इसे बीमार करोगे। वह नहीं जान रही थी की मेहमान की सेवा हो रही थी। बाद में जब पता चलेगा तब पछताएगी। परंतु पापा जी किसी को पछताने का मोका ही नहीं देंगे। वह सब कर रहे थे जो-जो मेरे मन की चेतन अचेतन की चाहता थी। मन अंदर से अति शांति हो रहा था। तब की न अब की किसी की भी परवाह नहीं करनी थी। वह तो पीछे छूट रहा है एक टूटा महल था जो अब खंडर बनने जा रहा था। कितने दिन का मेहमान था। उसे अगर लीप पोत भी दिया जाये तो वह बचने वाला नहीं था। इसलिए अकसर लोग जब मरने लगते है तो उस टूटी दीवारों को सजाने लग जाते है अच्छा खाने लगते है बढ़िया खाने लग जाते है। परंतु वो सब बेकार का कार्य है। मैं दीवार के सहारे चारों टांगें उपर कर के सोने लगा था। पापा जी इस मुद्रा को जानते थे कि इस से पोनी के पेट का दर्द कम हो जाता है। परंतु उनके चेहरे पर कभी सिकन सिलवट तक नहीं आई। रात को जब कभी बहुत दर्द होता तो मैं रोने लग जाता था। जो जीवन में कितने ही दूख दर्द में कभी नहीं रोया। इस बात से मम्मी जी जरूर परेशान थी की पोनी तो कभी रोता नहीं था अब क्यों रोता है। हां ध्यान के बीच में जब संगीत बजता तब भी पेट में उसी स्थान पर दर्द होता जैसे वहां कोई सूई चुभो रहा हो। मैं इसका कारण भय समझता रहा। परंतु संगीत की उर्जा वहां टकराने के कारण ऐसा होता था।

इस लिए बीच-बीच में मम्मी कहती की इसे चलो डाक्टर के पास ले कर चलते है। मुझे पोनी बीमार नजर आता है। पापाजी बात को टाल जाते। शायद मेरे जाने के बाद मम्मी को ये पछतावा जरूर रहेगा की जब में कह रही थी तब अगर डाक्टर के पास ले जाते तो वह ठीक हो जाता। परंतु तब मैं तो हूंगा नहीं परंतु पापा शायद मम्मी को सारी बात समझ देंगे। की नहीं पोनी जा रहा था। ये उनके अंतिम क्षण के चिन्ह थे। जो वह मिटा रहा था।

भू.... भू..... भू.....

आज इतना ही।

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