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शनिवार, 3 जनवरी 2026

46 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -46

जीवन की थकाना

दादा जी की मृत्यु के बाद मेरे मन में एक अजीब सा बदलाव आया। दादा जी की मृत्यु इतने नजदीक से मैंने देखी है, की मुझे लगा ये मेरी ही मृत्यु थी। क्या दादा जी को अपनी मृत्यु का एहसास हो गया था। किस तरह से, क्या मुझे भी अपनी मृत्यु का पूर्व अहसास हो सकेगा। अगर होगा तो क्या मैं उसे अपने जीवन विस्तार पर फैलने दूंगा। क्या मैं उसे इस सरलता से स्वीकार कर सकूंगा। अगर कर सकूं तो मुझे बहुत ही अच्छा लगेगा। मैं अब मृत्यु से नहीं डर रहा था। एक प्रकार से दादा जी की मृत्यु ने मुझे एक साहास दिया है। मैंने कभी सोचा भी नहीं था की दादा जी मृत्यु मुझमें एक नया पन एक नई उमंग एक नया विस्तार दे कर चली जायेगी। जीवन सच ही एक विद्यालय है अगर हम सिखना चाहे तो हर घटना ही एक नये आयाम के पार तुम्हें ले जाती है। चाहे वह दूख हो या सूख। सच दादा जी महान थे। और उनकी मृत्यु ने उनके जीवन संघर्ष को परिपूर्णता से हमारे सामने खोल दिया।

अब मैं अंदर से धीरे-धीरे थक रहा था, बस अब मुझे एकांत बहुत भाने लगा था। या ध्यान का कमरा। इसके अलावा अब जंगल में भी जाने का उतना मन नहीं करता था। क्योंकि अब जंगल में ज्यादा दूर नहीं जा सकता था। वैसे दौड़ नहीं सकता था। जल्दी ही थकान होने लग जाती थी। बच्चे भी अपने काम में इतने संलग्न हो गए थे। की उनके पास अब मेरे लिए समय ही नहीं था। वरूण भैया तो कुछ ही दिनों बाद लखनऊ चले गए। मम्मी पापा दुकान पर ही लगे रहते थे।

काम भी बहुत अधिक बढ़ गया था। मैं सोच रहा था घर का जो काम अधूरा है वह अब कैसे पूरा होगा। क्या पापा जी इतनी मेहनत कर पायेगे। लेकिन और कोई मार्ग भी नहीं बचा था। इस सब के साथ मन बहुत उदास हो जाता। मैं चाह कर भी उसमें खुशी भर नहीं पा रहा था। समय की गति भी बहु मंद हो गई थी। अब तो मेरे लिए एक-एक दिन कितना बड़ा हो गया था। और रातें तो खतम होने का नाम ही नहीं लेती थी।

क्या उम्र की गति के साथ हमारे अंदर समय की गति में भी कुछ बदलाव कुछ भेद आ जाता है। क्योंकि जब मैं छोटा था तो समय के गुजरने का पता ही नहीं चला था। रात कब गुजरी, सुबह से श्याम यूं पलक झपकते ही गुजर जाती थी। क्या ये सब मेरे साथ ही हो रहा था या प्रत्येक प्राणी के साथ होता होगा। लेकिन ध्यान करने से जीवन में जो सजगता आई थी वह मेरे अंदर एक नये तरह की उर्जा का संचार भर रही थी। जब भी मुझे उदासी घेर लेती तो शरीर को एक दम सी ढीला बिना किसी तनाव के छोड़ कर लेट जाता था। कि जैसे मैं मर ही गया हूं। तब न मेरा शरीर हरकत करता था। हां मन जरूर थोड़ा बैचेन करता रहा होता था। परंतु धीरे-धीरे वह भी थिर होने लग गया था। या जैसे कोई मक्खी जब मेरे शरीर पर बैठती तो मन करता की उसे उड़ा दूं। क्योंकि मक्खी मुझे असल में बहुत बुरी लगती थी। परंतु तुरंत अंदर से आवाज आती की पागल तु तो अब मर ही गया है। तब मक्खी को कैसे उड़ा सकता है। और मैं अंदर से उस मक्खी को देखने लग जाता था। तब न जाने वह मक्खी कहां चली जाती क्योंकि अब उसकी उपस्थिति मुझे महसूस नहीं हो रही होती थी। मन तनाव रहित हो कर उसे स्वीकार कर लेता। तो परिपूर्णता की स्थिति में प्रवेश कर जाता है। तब की अवस्था को विवरण मैं आपको शब्दों में नहीं बात सकता। वह अवस्था कितनी ही देर रहती थी, वह पल अनमोल थे, अभूतपूर्व थे। न वहां समय था और न बंधन मैं अपने आप को पूर्ण मिटा हुआ सा महसूस करता था। मैं लाख कोशिश करता की मैं अपने को अंदर से देख लूं....कहां मेरे पेर है, कहां मेरा मुख है, कहां मक्खी बैठी है, कहां मेरी पूंछ है। परंतु शरीर का विस्तार लगभग खत्म सा लगता था। कभी-कभी तो बहुत डर लगता की मैं कहां हूं....परंतु तुरंत मुझे लगता की मैं तो हूं परंतु मिटा तो शायद समय और स्थान है। अगर मैं नहीं होता तो देखता कौन और सच तब सब कितना शांत हो जाता। आपके अपने शरीर का भी एक भार है, आपके विचारो और भावों का भार है। जब ये आपसे दूर हो जाये तो आपको कैसी निर्भारता की अवस्था लगेगी ये एक अनूठा और सुंदर अनुभव था।

और ये सजगता जो आज मैं अनुभव कर रहा हूं इसके पीछे है ध्यान। जिसे मैं अंदर से  एक दम से साफ देख पा रहा हूं। अगर ध्यान मेरे जीवन में न आता तो क्या मैं इसे कभी भी महसूस कर सकता था। कभी नहीं। मस्तिष्क के सचेतन से ही तन और मन के प्रति जागृति होना संभव है। जिसे हम समझ या बुद्धि मानी कहते है। वह मस्तिष्क के कोने मात्र में हलका सा प्रकाश का प्रवेश ही तो होता है। तब धीरे-धीर वह अंधकार एक धुंध का रूप ले लेती है। और अब आपके पास अंधकार की पर्त नहीं है, केवल धुंध में तैरते हुए बादल है जो कभी थिर नहीं रह सकते। वे तो आते जाते है। यहीं से साधना की गति शुरू हो जाता है, साधक एक अलग ही आयाम में प्रवेश कर जाता है। जिसका कि गुरु जन्मों से इंतजार कर रहा होता है। अब साधक की उर्जा वर्टिकल या समान्तर गति न करके होराइजन क्षितिज की और गति रूप में ले रही थी।

दादा जी के गुजरने के बाद राम रतन दीपावली के बाद काम करने के लिए आये। तब ही उन्हें पता चला की दादा जी गुजर गये। परंतु पापा जी जब बतलाया तो उन्हें बहुत दुःख हुआ की मैं कितना अभागा हूं की अंतिम समय पर दादा के पास नहीं था। अब आप आ गए हो तो काम तो करना ही है इसे न करोगे तो दादा जी की आत्मा को भी दूख होगा। केवल फर्श ही तो करना रह गया था। राम रतन काम करने के लिए उत्साहित नहीं थे। पापा जी ने कहा की यह काम न मेरा है न तुम्हारा है ये ओशो का कार्य है। दादा जी चले गए वह खुद नहीं चाहते थे कि मेरी वजह से काम रूके। इसलिए उन्होंने पहले ही मुझे बोल दिया था कि देख मनसा अगर में मर भी जाता हूं तो मेरे मरने पर भी काम मत रोकना। बस मेरी यह बात गांठ ले।

राम रतन को कुछ अजीब सा लग रहा था। परंतु ये सत्य था। पापा जी ने ठीक ही सोचा क्योंकि बीच में बरसात शुरू हो गई थी। और एक बरसात अगर गुजर गई तो अच्छा हो गया मसाला और पक्का हो गया। तराई अच्छी होने के कारण पकड़ भी अच्छी होगी। यहीं समय है काम करने का नहीं तो फिर शरदी के बाद होली पर तो गर्म दिन हो जायेगें। तब तक तो शायद राज़ी खुशी देखना काम ही खत्म कर देंगे। क्योंकि सब काम अंत पर है, पेंट हो या लकड़ी का काम। खेर यही निर्णय लिया गया की काम आप दीपावली के बाद आ गये। और मुकेश और प्रभु को भी साथ है अब वापस जाने की जरूरत नहीं है। 

हां एक काम अभी चल रहा था ईशाद मियां का। वह अपनी लकड़ी का काम बरसात में भी कर सकते थे। बस बीच में दस-पंद्रह दिन की छुट्टी कर ली थी जब दादा जी गुजर गये थे। इसलिए वह करते रहे ताकि दरवाजे खिड़की सब तैयार हो जाए तो फर्श लगाने में आसानी होगी। और दूसरा रंग पेंट वाला भी तभी तो काम करेगा जब दरवाजे और खिड़कियां बन चूकी होंगे। इस काम में पापा जी कोई खास मेहनत नहीं करनी होती थी। केवल पैसे ही देने होते थे या दिन में एक दो बार देख कर राय दे देते थे। कि कैसे सब करना है। वैसे ईशाद मियां बहुत ही मुझे हुए कलाकार थे। उनके काम में आप गलती नहीं निकाल सकते हो। कम उम्र में ही उन्होंने ये हुनर मेहनत से ही सिखा है। पहले तो उनके गुरु जी भी साथ आते थे। परंतु सत्य यही था की चेला गुरु के भी कई गुणा आगे निकल गया था। वह कहावत सत्य हो रही थी की गुरु गुड़ तो चेला चीनी हो गया।

जब हमारा शरीर कमजोर होता है तो उसमें दबे रोग उस परिधि को तोड़ कर बहार आने को तैयार ही रहते है। की कब आपकी अवरोधक शक्ति कमजोर हो और हम अपना कमाल दिखाए और दूसरा ये मौसम जो बरसात को होता है। इसमें न जाने क्यों शरीर भी घास फूस की तरह से अपने अंदर की अनेक बीमारियों को खरपतवार का काम देती है। ये सब मेरे शरीर पर घट रहा था। परंतु इतना धीरे की मैं केवल उसकी आहट ही सून पा रहा था। उसे शरीर पर महसूस नहीं कर पा रहा था। क्या शरीर के बीमार होने से पहले हमारे मन या भाव पर वह बीमारी प्रवेश कर रहती है। शायद जरूर ऐसा होता होगा। ये में ही नहीं जरूर कुछ गुणी जन इस बात को जानते होंगे।

खेर जो समय के पीछे गुजर गया उसे लोटकर नहीं लाया जा सकता था। कभी-कभी पेट में बहुत दर्द होने लग जाता था। तब मैं छत पर जाकर कुछ घास आदि खा कर उलटी करता या पापा जी मुझे नारियल का तेल पिलाते थे उससे काफी आराम आ जाता था। हफ्ते में एक बार तो मुझे जरूर तेल पिलाया जाता था। इस सब के रहते अब जंगल में जाना तो काफी कठिन था सो मम्मी पापा मुझे बहुत सुबह सड़क पर ही घूमने के लिए ले जाते थे। उस दिन तो खास कर जिस दिन तेल पिलाया जाता। क्यों तेल पीने के बाद मेरा पेट एक दम से साफ हो जाता था।  फिर वहां थोड़ा दौड़ता, घास खाता तो अच्छा लगता पहले तो मुझे सड़क के किनारे चलने की जरा भी आदत नहीं थे। परंतु पापा जी मुझे बार-बार पुकारते और डांटते रहते थे। क्योंकि पास ही सड़क थी जिस पर मोटर गाडियां आती रहती थी। रात का समय होने के कार हालांकि कम ही आती थी। परंतु जो भी आती थी वह पास से कितनी ही तेज गुजर जाती थी। कुछ क्षण के लिए तो आवक रह जाता था। कितनी खतरनाक है ये मोटर कार। कैसे मेरे भाई कुत्ते दिन में इस रोड को पार करते होंगे। तब तो गाड़ियों को मेला सा लगा रहता होगा। मैं तो एक ही दिन में मर जाता। इतनी रात को मुझे एक आधा कुता ही कहीं-कहीं दिखाई दे जाता। क्योंकि रात भर चौकीदारे के बाद अब ये उनके विश्राम का समय था। मैं जब भी किसी कुत्ते पीछे भागने की अगर कोशिश करता तो पापा जी मुझे टोक देते। तब मैं एक दम से रूक जाता था। नहीं तो सड़क पर चलना मुझे आता नहीं मेरे लिए खतरनाक था।

इसी बीच मैंने सड़क पार कर एक दो गीदड़ों को भी देखा था इस सब को पक्का करने के लिए मैंने उसके पेरो कि जगह सूंध कर देखा था। शायद उधर जो पूसा है उसके अंदर कुछ रिहायश मकान है उसके कुडे कचरे में बेचारे कुछ खाने को आ जाते होंगे। क्योंकि यहां सड़क के पार तक यह भी उसी जंगल का हिस्सा था। क्योंकि ये अरावली पर्वतमाला का जो जंगल है पूरी दिल्ली के आर पार तक चला जाता था। ये अरावली पर्वत माला राजस्थान और गुजरात के समुद्र से शुरू होकर इधर हिमालय तक चली जाती है।

इस सब के बीच एक दिन कुछ अनहोनी घटना घट गई। मैं कुछ आगे चला गया था। चार पैर होने के साथ मैं चलता नहीं केवल दौड़ता ही अधिक था। पापा मम्मी काफी पीछे रह गए थे। लेकिन मैं उनकी आंखों से जरा सा भी ओझल होता तब वह मुझे आवाज देकर बुलाते और मैं एक अच्छे बच्चे की तरह दौड कर उनके पास चला जाता था। तब वह मेरी आज्ञाकारी की तारीफ करते की देखो पानी कितना समझ दार हो गया। लेकिन कुछ देर में फिर मैं आगे भाग जाता था। मम्मी पापा के साथ तो कभी चलता ही नहीं था। पापा जी कहते कि देखो पोनी को यह बाहर आकर हमें भूल ही जाता है। यहां तो इसकी दुनियां ही अलग हो जाती है। यह कैसा बे प्रीत का बन जाता है। ये सून कर मम्मी जी केवल हंसती थी और कहती कितना कम तो बेचारा अब बाहर निकलता होता है। यहां आकर वह अपनी आजादी को पूर्णता ये जीना चाहता है।

लेकिन उस दिन कुछ गलता होना था। सड़क के किनारे-किनारे एक बहुत गहरा नाला बना रखा था। जिसमें की बरसात का पानी सड़क से बहकर पास के लेट-तालाबों में जाकर जमा हो जाता था। काम तो बहुत ठीक था। पानी की निकास तो कहीं होनी ही थी। लेकिन इस सब के बीच में कहीं-कहीं से वह नाला टूटा हुआ था। या खूला था। और आस पास घास उगने के कारण वह बहुत खतरनाक हो गया था। मैं तेजी से चल रहा था। और सच कहूं तो मेरे आंखें अब कमजोर भी हो गयी थी। जब में छत से नीचे आता तब अगर नीचे कम रोशनी होती थी। तब मुझे नीचे कुछ दिखाई नहीं देता था। मुझे बहुत सम्हल कर या खड़े रहकर इंतजार कर के नीचे आना होता था। इस सब के कारण मेरा पैर फिसला और मैं उस 8-10 फीट गहरे नाले में गिर गया।

मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था की मैं कहां आ गया हूं अभी तक तो सब दिखाई दे रहा था अचानक क्या हो गया। उस नाले में कीचड़ और पानी भी था। पापाजी को जब मैं दिखाई नहीं दिया तो उन्होंने जोर से आवाज दी। परंतु मैं दिखाई नहीं दिया तो वह मुझे ढूंढने के लिए आगे भाग गए। उस समय में ठीक उनके नीचे नाले के अंदर था। दूर तक मम्मी और पापा मुझे ढूंढते रहे। लेकिन मेरा कोई पता नहीं मिला। वापस उसी जगह आकर फिर मुझे जोर-जोर से आवाज देने लगे। पोनी....पोनी....पोनी परंतु एक बुरी आदत जो मुझे थी कि मैं कमरे में अगर बंद रह भी जाता था तो मैं रोता नहीं था। और न ही आवाज देता था की मैं यहां हूं। वहीं से पास ही जंगल के अंदर जाने का रास्ता था। जिसे देख कर पाप जी कहने लगे की जरूर वह अंदर भाग गया अब इतनी रात को इस जंगल में कैसे ढूंढे। न तो टार्च है और न ही मोबाइल फोन ही लेकर पापा जी आते थे। रात और चलती सड़क का मामला। अंदर न जाने सांप बगेरा पर पैर गिर गया तो और लेने के देने पड़ जायेगें। बरसात के बाद रास्तों पर घास उग आती थी। इसी बीच जब मम्मी पापा वहां पर जोर-जोर से आवाज दे रहे थे मैं नीचे ही नाले में चल रहा था। परंतु ये मेरी मूर्खता थी की न तो मैं रो रहा था और न आवाज दे कर बतलाने की कोशिश करता था की मैं यहां पर हूं। भला इसे कोई समझदारी कहेगा। 

और मैं अपने को अक्लमंद समझता हूं, मम्मी जी को तो दुकान पर भी जाना था। सो इंतजार कर के मम्मी पापा घर चले गए। पापा जी फोन और टार्च लेकर आए और दोबारा मुझे ढूंढने के लिए जंगल में चले गए आवाज देते हुए। मैं अंदर से आवाज को सून रहा था वह मुझसे दूर होती जा रही थी। पापा जी पूरे जंगल में घूमकर दूर सड़क पर निकले। मैं नहीं मिला इतनी देर में मम्मी ने शालव भैया को फोन कर के कहा की पोनी न जाने जंगल में कहां खो गया है। तु जाकर पापा जी की कुछ मदद कर। शालव भैया इन दिनों पापा जी के पास ध्यान करने के लिए आता था। वह तुरंत पापा जी के पास पहुंच गया। पापा जी फिर उसी जगह पर सड़क के किनारे आये जहां से मैं एक दम से गायब हुआ था। अब थोड़ी रोशनी हो गई थी। पापा जी शालव को कहने लगे की यहां तो तार बंधे है वह अंदर नहीं जा सकता। कहीं वह नाले में तो नहीं गिर गया है। तब में नीचे ही था। यह चुप रहना मेरी मौत का कारण भी बन सकता था। पापा जी ने कहां की जरा इस नाले में देख कहीं पोनी इस में तो नहीं गिर गया। परंतु न जाने क्यों शालव भैया मुझे नहीं देख सके। या अंधेरे के कारण या मेरा शरीर कीचड़ में सन गया था। उसने मना कर दिया और फिर दोबारा वह अंदर जंगल में मुझे ढूंढने चले गए। फिर दोबारा वह पूरा जंगल छानते रहे कि मैं किसी कूतियां के प्रेम जाल में तो नहीं उलझ गया हूं। और ऐसा कई बार हो गया था उनका ये शक भी एक दम से सही था। जब भी मुझे अंदर भागने का मोका लगता मैं तुरंत अंदर भाग जाता था। और घंटो जंगल में प्रेम का आनंद ले रहा होता था। परंतु तो विपरीत हालात थे। ये तो वही बात हो गई की शेर आया शेर आया और एक दिन सच ही हो गया।

इस बीच पापा जी ने मम्मी को फोन कर पूछा भी की घर तो नहीं आ गया। इस तरह की घटना पहले कई बार घट चूकी थी जब में अकेला जंगल में पीछे रह जाता था पापा जी या उनके साथ आये मेहमान मुझे नहीं दिखाई देते तब में घबरा कर घर की और भाग आता था। क्योंकि यहां कुत्ते बहुत थे जो मेरा जीना हमाम किए रहते थे। लेकिन मम्मी के मना करने के बाद हालत और भी खराब हो गई थी अब तो दिन भी निकल आया था। पापा जी और शालव भैया ने मुझे पूरे जंगल में ढूंढा और दूर सड़क तक बहार आ गए। फिर पापा जी ने शालव को कहां की इस नाले में देखते हुए चलते है। नाला बहुत गहरा और लम्बा भी था। दिन में भी इस में अंधकार रहता था और लम्बा तो सड़क के किनारे-किनारे मील भर बना था। बीच-बीच में यह जगह-जगह से टूटा होने के कारण अंदर प्रकाश आ रहा था।

शाल्व बेचारा नीचे उतरता दूर तक देखता उसके पैर और कपड़े भी कीचड़ में सन गए थे। फिर पापा जी कहते की दूर तक फोन से देख इस तरह से करीब मील भर लम्बे इस नाले में वह कितनी बार अंदर उतरा और देखने के बाद पापा जी का हाथ पकड़ कर बाहर आया। दूर से मैं उन्हें देख रहा था वह मेरे नजदीक आ रहे थे। इस बार शाल्व ने जब आवाज दी तो वह मुझे करीब 300 मीटर ही दूर होगा वह फोन की लाईट से मुझे देख रहा था। फोन की लाईट मेरे आंखों में पड़ने के बाद मेरी आंखें की चमक उसे दिखाई दे गई और उसने शोर मचा दिया कि मिल गया पोनी मिल गया। और मैंने जैसे ही शाल्व की आवाज सूनी मेरे शरीर में दोबारा जीवेषणा खड़ी हुई एक उम्मीद तो मुझे थी कि पापा जी जरूर मुझे ढूंढ लेंगे। परंतु मैंने अपनी और से जरा भी सहयोग नहीं किया। मैं कितना ज्ञानी हूं या कितना मुर्ख हूं इस बात का फैसला तो आप ही करें। सच ही मैं बहुत भौंदू हूं।

मैं शाल्व  भैया की आवाज सून का भागा वहां पर उपर से प्रकाश आ रहा था। क्योंकि वहां नाले पर ढका पत्थर शाल्व और पापा ने हटा दिया था। मैं भाग कर वहां पहुंचा और अपने दोनो पैरो के सहारे खड़ा हो गया। तब भी मैं नाले के बहुत नीचे था। पापा जी ने झूक कर मेरे सर पर हाथ फेरा और पीछे से शाल्व भैया ने मुझे पकड़ कर उपर की और धकेला और आगे से पापा जी ने मेरे अगले दोनों पैर पकड़ कर मुझे बहार खींचा। मेरे पेट पर जरा सी रगड़ लगी। परंतु ये दर्द तो ना के बराबर था। मैं खुश हो रहा था नाच रहा था और रो रहा था। पापा जी कहने लगे देख शाल्व इस पागल को देख अब रो कद दिखा राहा है। इसे इतना ज्ञान नहीं की जब अंदर था तो मुझे रोना चाहिए या भौंकना चाहिए। लेकिन मेरे जिंदा मिलने के वजह से सब खुश थे। इसके बाद पापा जी ने शाल्वा के दोनों हाथ पकड़ कर बहार निकला। सच नाला बहुत ही गहरा था। और खतरनाक भी। अगर पापा और शालव भैया न होते तो क्या कभी में निकल पाता नहीं केवल मौत की गोद में ही सो जाता जब कितनी बुरी मौत होती मेरी।

आप समझ सकते है कितना गहरा नाला होगा वह। जिस में से आदमी का निकलना भी अति कठिन है। अगर कोई जानवर गिर जाये तो उसकी मौत निश्चित ही समझो। मैं एक बार फिर चार घंटे मौत के साथ था। परंतु मुझे उम्मीद थी की पापा जी आयेंगे और मुझे बाहर निकाल लेंगे। मेरे पैर और शरीर कीचड़ से सन गया था। पापा जी के कपड़े भी कीचड़ से खराब हो गये थे। उनके हाथ भी कीचड़ में सन गए थे। मुझे फिर पट्टे से बांधा गया और में खुशी –खुशी घर की और चल दिया। रास्ते में एक दो तीन कुत्ते मिले वह मुझे बड़ी अचरज भरी नजर से देख रहे थे। भौंकना भी भूल गए थे की ये कुत्ता है या कोई भूत। शायद अंदर-ही अंदर वे हंस रहे होंगे इस पागल के साथ ठीक हुआ।

परंतु मम्मी जी मुझे देख कर बहुत खुश हुई मैं अपना एक नया जीवन पा कर अति प्रसन्न था। घर जाकर गर्म पानी से पापा जी ने मुझे नहलाया। तब मुझे नहाना बहुत भा रहा था। क्योंकि मैं अपने शरीर पर लगे कीचड़ की इस बदबू से बहुत परेशान था। शायद ये नहाना मुझे जीवन में पहली बार अच्छा लगा होगा। नहाने के बाद पापा जी ने मुझे तौलिया से पोंछ कर खुद नहाने चले गए। पापा जी भी नाहकर जब बहार निकले तो हंस रहे थे। में अपने आप को दरी पर रगड़ कर और अपने बदन को हिला कर पानी सुखाने की कोशिश कर रहा था।

ये मेरी एक और बुद्धि मानी की कथा अपने सूनी। ज्ञानी जितना मैं दिखता हूं इतना हूं नहीं। बस घर का ही ज्ञानी था। पापा मम्मी जब रात को खाना खाने के बाद कुछ देर टी वी देखने लग जाते थे तो मैं उन्हें भौंक कर आगाह करता था की अब देर हो गई आप जाकर सो जाओ इन बच्चों का क्या है, ये तो देर तक सोते रहेंगे। आप को तो सुबह जल्दी ही उठना है। और जब तक मम्मी पापा उठ नहीं जाते मुझे चेन नहीं पड़ता मैं उनके साथ नीचे तक जाता और जब वह सो जाते तो वापस भैया दीदी के पास आ जाता।

लेकिन जब अपनी बारी आई तो टांए-टांए फीस....सब मेरा मजाक उड़ा रहे थे। और में उनको भौंक कर चुप रहने के लिए कह रहा था कि क्या समझते हो मैं इतना नीचे गिरने के कारण घबरा गया था। ....परंतु सच ही मेरी जरा सी गलती से मेरे जीवन का अंत कितना बुरा आता। वहां की मृत्यु कैसी होती ये मैं सोच कर भी कांप जाता हूं। मैं ऐसे मरा नहीं चाहता मैं तो दादा जी की तरह सब के सामने मरना चाहता हूं...मुझे सब प्यार कर रहे हो। मैं बीच में लेटा हूं....इसी तरह चुप से मेरे प्राण निकल जाए। बस इतनी सी तमन्ना है। क्या पूरी होगी?

 

भू.... भू..... भू.....

आज इतना ही।

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