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गुरुवार, 14 मई 2026

03-लादेन—एक काली अमावस -(कविता)-ओशो की मधुशाला

 03-लादेनएक काली अमावस (कविता)

काल बन कर निगल गई

उस काली परछाई को

हो गई जो समय के गर्त में

दफ़न जो समझता था

अपने को काल का पर्यायवाची

कलंक-कलुषित जीवन

मिटा दिया एक काल ने उस पल में

फिर एक बार कि शायद

वो ले सके कोई सुंदर रूप

कोई मां भर दे उस कुरूप चेहरे पर

फिर से एक नया रंग ओर रूप

और खिला सके उसके ह्रदय में

भी प्रेम का कोई नया अंकुर

तपिश कम कर दे उस

धधकते दावा कूल की

शायद बूझा दे उसकी कुरूप प्‍यास

और काट दे उसके सब कंटक

जो उसने उगा लिये थे

अपने आप से अपने चारों और

वो खिल सके फिर से

किसी बगिया का फूल बन कर

भर दे किलकारी

किसी सुने आँगन में फिर एक बार

पर काश ये इतना आसान होता

कर्म और प्रकृति को भेदना

क्या इतना सरल सहज है

इस लम्बी वैतरणी में उसासना 

क्या इतना आसान है

देखो फिर से कौन मां समा सकेगी

उस काल अग्नि को अपने गर्व में

नहीं उसे भटकना ही होगा

अनंत तब तक जब तक वह

प्रायश्चित कि अग्नि में न

हो जायेगा पवित्र......

तब तक उसका जीवन

बना रहेंगे वह अमावस्या ही

वो तामसी काली रात की तरह काल गर्त में

लिए एक उदित प्रकाश की प्यास

और करती रहेगी तब तक

आने वाली किसी स्वर्णिम पूर्णिमा का थिर इंतजार.....

मनसा-मोहनी दसघरा 

 

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