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गुरुवार, 10 सितंबर 2026

59 - प्रीतम तुम एक बार पुकारो - (कविता) - ओशो की मधुशाला

 59 - प्रीतम तुम एक बार पुकारो - (कविता) - मनसा - मोहनी 

प्रीतम तुम एक बार पुकारो

तब हम को आकर

मेरे होने का राज बात रे!

जीवन की इस जटिल बेल में

केवल अहं के फल लगे हमारे

बार-बार दिल ये कहता है

कोई तो हमको आज पुकारे,

आजा प्रियतम मन के द्वारे।

आस लगी है इन नयनों को

आकर इनकी प्‍यास बुझा रे।

दिल की तड़प अब बन गई धड़कन

फिर कौन सहेगा इतना क्रंदन

औस की बूंद भी सूख रही है

आस को मेरी यूं न मिटा रे...

जीवन जीना किसको कहते

एक बात मुझको बतला रे

हम तो चल-चल अनंत पथों

चल-चल अब तो हारे

दूर की तक नहीं दिखता

कोई किनारा कोई सहारे।

जिनको कहते हम अपने

जो लगते थे जग से प्यारे

फेर लिया मुझ एक ही पल में

टूट गये बंधन अब सारे

ढूंढ रहा है ये फिर नये सहारे

पर प्रियतम मैं नहीं चाहत

और नये बंधन में बंधना

एक बार दूर कहीं से

आवाज दे कर हम पुकारे

फिर ये बंधन और से संबंध

नहीं रहेंगे देख हमारे

मैं नहीं चाहता तुम दो सहारे

बस एक बार हमें दिल लगा रे। 

 (ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसघरा 


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