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बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

06 - चट्टान-पुष्प-खग-देव तेरा रूप—(कविता) - परिजात के फूल

06 - चट्टान-पुष्प-खग-देव तेरा रूप—(कविता) - मनसा-मोहनी 

ऐ चट्टान तेरा ये एकांकी पन

कितना निष्ठुर ओर शुष्क है।

कैसा बेजान निर्जीव सा दिखता है

परंतु तुझमें भी जीवन स्पन्दन बहता है

फैली है जीवेष्णा किसी तुझमें भी

लिये पूर्णता को अपने में समेटे

तेरा विकास काल अजय है

अटल है तेरी थिरता,

और अमिट है तेरी धिराता,

कैसा साधु वाद लिए हुए रहत है

तेरा वो अकार-रहित आकार

अडिग खड़ी सुहासती-दमकती है

तेरी निरंकुश वो सुंदरता।

 

फिर देखो उस पुष्प को,

जो नाचता है इतराता है

खिंचता है अपनी और सबको

किसी आ पूर्व गंध ओर रंग से लवरेज होकर

कैसी मदहोशी भरी होती है उसके आस-पास

पुष्प का इठलाना, उसका इतराना।

उसका छूता सौंदर्य, सब को भाता है

सब को हर्षित करता है

किसी अनजान अनजाने को भी

देता है कैसी तृप्ति, की छांव वो सबको

और रस गंध भी।

 

फिर देख उस खग को,

जो उड़ जाता नभ की उतुंग उंचाई तक

उसका कलोल कोरस गान,

भिन्नता में मधुरता समेटे रहता है

कैसा दिग दृश्य होता है वह नभ में

उसकी चपलता, चुहल-चंचलता

उसकी अठखेलियां कैसी नभ

 

उसकी उत्तुंग मोहती है मन को

मन थिरक उठता है मदमस्त मदिरालय सा

उसके कोकिला गान तानों से

झूमा जाती है ये धरा भी पल भर को।

 

हे देव,

ये तेरा अनेक-में एक रूप

भिन्नता में अभिन्नता

निराकार में साकार का

कैसा भेद है.....

समेटे आपने में एक अज्ञता।

कैसे परिचित होना है उस अज्ञेय से।

अब मैं सब भूल गया हूं

वो क्‍या शायद अब मैं कहां

खुद को ढूंढ रहा हूं....पर पाता नहीं।

 (परिजात के फूल) 

मनसा-मोहनी दसघरा 


 

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