लो मैं अँधेरे को मिटाने आ गया।
गीत गा तुमको जगाने आ गया।।
थक गए अब है कदम चलते नहीं।
बादल दुखों के अब यूंहीं छटते नहीं।
फूल जीवन में कहीं खिलते नहीं।
बीज बंजर है
पड़े उगते नहीं।
शूल पथ के मैं हटाने आ गया।
गीत गा तुमको जगाने आ गया....
हूं धरा पर पंख नभ के ले लिये।
कल्पनाओं में बहुत हम जी लिये।
कंठ अंगारों से भर-भर पी लिये।
पैबंद दुखों के देख हमने सी लिये।
देव धरा को मैं बनाने आ गया।
गीत गा तुमको जगाने आ गया।
हैं कठिन, जीवन नदी भी है विकट।
हाथ से पतवार को अब न यूं झटक।
दो कदम चल देख आगे बस है तट।
तूफ़ानों को देख कर न डर-सिमट।
घाट को तीर्थ बनाने आ गया।।
गीत गा तुमको जगाने आ गया।
प्रीत पथ है एक, पर राहे अनंत।
सिंधु तट से न
बुझेगी ये जलन।
ध्यान मधुरस में है मीठी सी छुअन।
देख तुमको फिर पुकारें वो गगन।
राह फूलों से सजाने आ गया।
गीत गा तुमको जगाने आ गया।
हाय भरम है क्यों तुझे अभिमान का।
रह गया तुझको ये दंभ क्यों ज्ञान का।
रुला फिरेगा धूल में सर
आन का।
बीता अगर कल काल है पहचान का।
यहां कौन मिलता फिर तेरी पहचान का।
दीप पथ पर हूं जलाने आ गया।
गीत गा तुमको जगाने आ गया।।
अपना होना ही है होना एक बस।
सूखे फूलों में भी कहीं होता है रस।
जान ले तू मौन मदिरा का कलस।
उसी से बूझेगी देख जीवन की झुलस।
होश अमरत्व का पिलाने आ गया।
मैं अधरों
को मिटाने आ गया।
गीत गा तुमको जगाने आ गया।।
(परिजात के फूल)
मनसा मोहनी दसघरा

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