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शनिवार, 17 नवंबर 2018

अज्ञात की ओर-(प्रवचन-04)

चौथा प्रवचन

विज्ञान और धर्म में कोई विरोध नहीं 

 

एक मित्र ने पूछा है कि विज्ञानवाद और धर्मवाद में कैसे मेल बनाया जा सकता है?

मेल उन चीजों में बनाना होता है जिनमें कोई विरोध हो। धर्म और विज्ञान में तो कोई विरोध नहीं है। इसलिए मेल बनाने की बात ही फिजूल। दो चीजों में दुश्मनी हो तो दोस्ती करवानी होती है, लेकिन दुश्मनी ही न हो तो, तो दोस्ती का सवाल क्या? धर्म और विज्ञान में विरोध नहीं है, विज्ञान और अंधविश्वास में विरोध है। और अंधविश्वास धर्म नहीं है। अंधविश्वास को ही क्योंकि हम धर्म समझते रहे हैं, तो इसलिए कठिनाई खड़ी हो गई। अन्यथा धर्म से ज्यादा वैज्ञानिक तो और कोई चीज नहीं है। विज्ञान तो एक पद्धति है, एक मेथड है सत्य की खोज का। जब उस पद्धति का हम उपयोग करते हैं पदार्थ के लिए तो साइंस जन्म जाती है और जब उसी पद्धति का उपयोग करते हैं हम चेतना की खोज में तो धर्म जन्म जाता है। विज्ञान का एक प्रयोग साइंस है, दूसरा प्रयोग धर्म है। विज्ञान एक पद्धति है, साइंटिफिक एटिट््यूड, वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखने का एक ढंग है। लेकिन यह प्रश्न इसीलिए उठ आया होगा तुम्हारे मनों ने क्योंकि जिसे हम धर्म कहते हैं वह विज्ञान से बड़े विरोध में मालूम पड़ता है। तो स्मरण रखना, वह धर्म ही नहीं है जो विज्ञान के विरोध में पड़ जाता हो। वह होगा कोई अंधापन। कोई सुपरस्टीशन और अंधविश्वास विज्ञान के मार्ग में ही बाधा नहीं है, धर्म के मार्ग में भी बाधा है। इसलिए दुनिया में बढ़ रही वैज्ञानिक रुचि उस सारे धर्म को जला कर नष्ट कर देगी जो धर्म नहीं है। और इस वैज्ञानिक क्रांति से गुजर जाने के बाद जो शेष रह जाएगा वही खरा सच्चा सोना होगा, वही धर्म होगा।

विरोध नहीं है इन दोनों बातों में। और दुनिया के जो लोग सच में धार्मिक थे उनसे ज्यादा वैज्ञानिक आदमी खोजना कठिन है। महावीर, या बुद्ध, या क्राइस्ट इनसे ज्यादा वैज्ञानिक मनुष्य खोजना कठिन है। इन्होंने विज्ञान की खोज अपनी ही चेतना पर की, खुद के भीतर जो रहस्य छिपा है उसे जानना चाहा। रहस्य बाहर ही नहीं है, भीतर भी है। पत्थर-कंकड़ में, पानी में, मिट्टी में ही रहस्य नहीं है, रहस्य मुझमें भी है। हमारे भीतर भी कुछ है तो हम पदार्थ को ही जानते रहेंगे या उसको भी जो हमारे भीतर छिपी हुई चेतना है, जीवंत है? जिसे हम अभी विज्ञान करके जानते हैं वह जो बाहर है उसे खोजता है। और जिसे हम धर्म करके जानते हैं वह उसे जो भीतर है। आज नहीं कल दोनों की खोज एक हो जाने वाली है। यह खोज बहुत दिन तक दो नही रह सकती। तब दुनिया में वैज्ञानिक पद्धति होगी। उसके दो प्रयोग होंगेः पदार्थ पर और परमात्मा पर।
निश्चित ही तथाकथित धर्म इसके विरोध में खड़े होंगे। वे इसलिए खड़े होंगे कि हिंदू और मुसलमान, जैन और ईसाई, अगर विज्ञान का प्रयोग हुआ आत्मा के जीवन में भी तो ये सब नहीं बच सकेंगे। धर्म बचेगा, हिंदू नहीं बच सकेगा, मुसलमान, जैन, ईसाई नहीं बच सकेगा। क्योंकि विज्ञान जिस दिशा में भी काम करता है वही युनिवर्सल पर, सार्वलौकिक पर पहुंच जाता है। कोई हिंदू गणित हो सकता है, या मुसलमान कैमिस्ट्री हो सकती है, या ईसाई फिजिक्स हो सकती है? कोई हंसेगा अगर कोई यह कहेगा कि मुसलमानों की फिजिक्स अलग, हिंदुओं की अलग, तो हम हंसेंगे, हम कहेंगे, तुम पागल हो। पदार्थ के नियम तो वही हैं, एक ही हैं सारी दुनिया में, सब लोगों के लिए, तो एक ही फिजिक्स है, न हिंदुओं की अलग है, न मुसलमानों की, न ईसाईयों की। धर्म भी कैसे अलग-अलग हो सकते हैं? जब पदार्थ के नियम एक हैं, तो परमात्मा के नियम कैसे अलग-अलग हो सकते हैं?
जो बाहर की दुनिया है जब उसके नियम सार्वलौकिक हैं, युनिवर्सल हैं, तो मनुष्य के भीतर जो चेतना छिपी है, जीवन छिपा है, उसके नियम भी अलग-अलग नहीं हो सकते, उसके नियम भी एक ही होंगे। इसलिए वैज्ञानिक धर्म के जन्म में ये तथाकथित धर्म सब बाधा बने हुए हैं। वे नहीं चाहते कि वैज्ञानिक धर्म का जन्म हो। साइंटिफिक रिलीजन का जन्म दुनिया के सभी संप्रदायों की मृत्यु की घोषणा होगी। इसलिए वे विरोध में हैं। इसलिए वे विज्ञान के विरोध में हैं। क्योंकि वैज्ञानिकता का अंतिम प्रयोग उन सबको बहा ले जाएगा और समाप्त कर देगा। और मुझे तो लगता है इससे शुभ घड़ी दूसरी नहीं हो सकती। कि ये सब बह जाएं, दुनिया से संप्रदाय बह जाएं--हिंदू, मुसलमान, जैन, ईसाई का फासला बह जाए, आदमी बच रहे। क्योंकि इस फासले ने बहुत खतरा पैदा कर दिया है, इस फासले ने मनुष्य को मनुष्य से तोड़ दिया है। और जो चीज मनुष्य को मनुष्य से ही तोड़ देती हो वह चीज मनुष्य को परमात्मा से कैसे जोड़ सकेगी? वह नहीं जोड़ सकती। इसलिए धर्मों के नाम पर जो कुछ हुआ है, चर्च और मंदिर और शिवालय ने जो कुछ किया है, उसने मनुष्य को कल्याण और मंगल की दिशा नहीं दी, बल्कि हिंसा, रक्तपात, युद्ध और घृणा का मार्ग दिया है। सारी जमीन पर मनुष्य मनुष्य को एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया है। धर्म तो प्रेम है, लेकिन धर्मों ने तो घृणा सिखा दी। धर्म तो सबको एक कर देता, लेकिन धर्मों ने तो सबको तोड़ दिया है।
एक छोटी सी घटना मैं तुम्हें कहूं, शायद उससे मेरी बात समझ में आ जाए। एक काले आदमी ने एक चर्च के द्वार पर संध्या जाकर द्वार खटखटाया, पादरी ने द्वार खोला, लेकिन देखा काला आदमी है, वह चर्च तो सफेद लोगों का था, काले आदमी के लिए उस चर्च में कोई जगह न हो सकती थी। पुराने दिन होते तो वह पादरी उसे हटा देता और कहता कि यहां तुमने आने की हिम्मत कैसे की? तुम्हारी छाया पड़ गई इन सीढ़ियों पर, सीढ़ियां अपवित्र हो गईं, इन्हें साफ करो। उसकी हत्या भी की जा सकती थी। ऐसे शूद्रों के कानों में तथाकथित धार्मिक कहे जाने वाले दुष्ट लोगों ने सीसा पिघलवा कर भरवा दिया है जिन्होंने जाकर मंदिर के पास खड़े होकर वेद-मंत्र सुन लिए हों। क्योंकि शूद्रों के कान पवित्र वेद-मंत्रों को सुनने के लिए नहीं हैं। ऐसे आदमियों की छाया पड़ जाना भी पाप और अपराध रहा है इस देश में भी, इस देश के बाहर भी। पुराने दिन होते तो शायद उस काले आदमी की जिंदगी खतरे में पड़ जाती। लेकिन दिन बदल गए हैं, लेकिन आदमी का दिल तो नहीं बदला।
उस पादरी ने कहाः मित्र, यह शब्द बिलकुल झूठा रहा होगा, क्योंकि जो उसके इरादे थे वे मित्र के बिलकुल नहीं थे। लेकिन उसने कहाः मित्र, जैसे हम सब झूठी भाषाएं बोलते हैं, वह भी बोला, और जो हमारे बीच सबसे ज्यादा चालाक, सबसे ज्यादा कनिंग हैं, वे ऐसी भाषा को बहुत, बहुत कुशल होते हैं, उसने उस नीग्रो को कहाः मित्र, इस चर्च में आए हो स्वागत है, लेकिन जब तक हृदय पवित्र नहीं है तब तक चर्च में आने से भी क्या होगा? परमात्मा के दर्शन तो तभी हो सकते हैं जब हृदय पवित्र और शांत हो। तो जाओ, पहले हृदय को करो पवित्र और फिर आना।
नीग्रो वापस लौट गया। उस पुरोहित ने मन में सोचा होगा, न होगा कभी मन पवित्र और न यह आएगा। उसके आने की कोई संभावना नहीं है। दिन आए और गए, माह आए और गए और वर्ष पूरा होने को आ गया। एक दिन चर्च के पास से निकलता दिखाई पड़ा वही नीग्रो, वही काला आदमी। वह पुरोहित हैरानी में पड़ा कि कहीं वह चर्च में तो नहीं आना चाह रहा? लेकिन नहीं, उसने तो चर्च की तरफ आंख भी उठा कर न देखा और वह चला गया अपनी राह। पुरोहित देखता रहा। हैरानी हुई उसे देख कर। उस आदमी में तो कोई बड़ी चीज जैसे बदल गई थी। उसके आस-पास जैसे शांति का एक मंडल चल रहा था। जैसे उसकी आंखों में कोई नई ज्योति, कोई नई लहर आ गई थी, कोई नई खबर। जैसे वह कुछ दूसरा आदमी हो गया था, एकदम शांत और मौन। उसकी काली चमड़ी से भी जैसे कोई चमक पैदा हो गई थी, कोई पवित्रता उससे झलकने लगी थी, उसके उठते कदमों में भी जैसे कोई अलग ही बात थी।
वह चर्च का पादरी दौड़ा और उसे रोका और कहाः महानुभाव, आप फिर दुबारा आए नहीं? वह नीग्रो हंसने लगा, उसने कहाः मैंने तुम्हारी बात मान कर मन को शांत और पवित्र करने की साधना की। और एक दिन रात जब मैं प्रार्थना करके सो गया और मेरा हृदय एकदम मौन था, तो रात मैंने सपने में देखा कि परमात्मा आए हैं और मुझसे पूछते हैं कि तू क्यों इतनी प्रार्थनाएं कर रहा है? क्यों इतनी साधना कर रहा है? क्या चाहता है? तो मैंने कहाः मैं उस चर्च में जाना चाहता हूं जो हमारे गांव में है। तो वह परमात्मा हंसने लगा और उसने कहाः तू पागल है, तू उस चर्च में कभी न जा सकेगा, क्योंकि मैं खुद दस साल से वहां जाने की कोशिश कर रहा हूं, वह पादरी मुझे घुसने नहीं देता। वह पादरी मुझे भीतर नहीं आने देता। तो जब मैं ही नहीं घुस पा रहा हूं, जिसका कि वह कहता है पादरी, यह मंदिर है, वही नहीं घुस पा रहा है, मंदिर का मालिक बाहर, तो तू कैसे घुस सकेगा? तेरी क्या हैसियत है? तो यह वरदान न मांग, कुछ और मांगना हो तो मांग ले। जब मैं ही नहीं घुस पाता हूं, तो मैं तुझे कैसे वरदान दूं कि तू जा सकेगा? इसलिए उसने कहा कि फिर मैंने आने की हिम्मत न की। जब परमात्मा भी अपने पुरोहित से डरता है तो मेरी क्या सामथ्र्य है।
मैं आपसे कहता हूं, दस साल की बात होती, तो हम किसी तरह सह भी लेते, यह दस साल की बात नहीं है, यह हजारों-हजारों साल की बात है। आज तक परमात्मा किसी पुरोहित के मंदिर में प्रवेश नहीं पा सका है, न कभी आगे भी पा सकेगा। पुरोहित और परमात्मा दोस्त नहीं हैं। पुरोहित शोषण कर रहा है, परमात्मा का दोस्त कैसे हो सकता है? पुरोहित दुकान चला रहा है परमात्मा की, दोस्त कैसे हो सकता है? पुरोहित बेच रहा है परमात्मा को, दोस्त कैसे हो सकता है? और क्योंकि हरेक पुरोहित दुकान चला रहा है, इसलिए दो पुरोहितों में भी दोस्ती नहीं हो सकती। दो दुकानदारों में दोस्ती हो सकती है? जो एक ही धंधा करते हों--प्रतिस्पर्धा हो सकती है, दोस्ती कहां? दुश्मनी हो सकती है, गला-काट प्रतियोगिता हो सकती है, दोस्ती नहीं हो सकती है। इसलिए हिंदू और मुसलमान में झगड़ा है, यह धर्मों का झगड़ा नहीं, यह हिंदू और मुसलमान पुरोहित का झगड़ा है। यह परमात्मा का झगड़ा नहीं, यह परमात्मा के नाम पर बनी हुई दुकानों का झगड़ा है। और इन दुकानों ने हजारों साल में हजारों तरह के अंधविश्वास प्रचलित किए हैं। और आदमी की आंख बंद करने की कोशिश की है। क्योंकि जब लोगों की आंखें खुल जाएंगी, उनका शोषण धर्म के नाम पर नहीं हो सकेगा।
और आई हुई विज्ञान की रोशनी ने इन सारे पुरोहितों को बड़ी घबड़ाहट पैदा कर दी है, वे बड़े बेचैन हो गए हैं। और वे कह रहे हैं कि धर्म और विज्ञान में दुश्मनी है। धर्म बात अलग है, विज्ञान बात अलग है। वह तो पूरी कोशिश उन्होंने यह की है कि विज्ञान विकसित न हो पाए। गैलीलियो से लेकर आज तक धर्म का पुरोहित हर कोशिश कर रहा है कि विज्ञान विकसित न हो पाए। क्योंकि विज्ञान का हर बढ़ता हुआ कदम अंधविश्वास की मौत लाता है। लेकिन इससे धर्म को भयभीत होने का कोई भी कारण नहीं है। धर्म तो है सत्य, विज्ञान की हर जीत सत्य की जीत है। धर्म को उससे कोई नुकसान पहुंचने वाला नहीं है। धर्मों को नुकसान पहुंचेगा, धर्म को नहीं।
तो मैं निवेदन करूं, धर्म और विज्ञान के बीच मेल खोजने की भूल मत करना। अगर मेल करने की कोशिश की तो वे मेल धर्मों और विज्ञान के बीच होगा, जो कभी नहीं हो सकता। लेकिन धर्म और विज्ञान के बीच तो सदा से मेल है। वह तो एक ही सत्य के दो पहलू हैं। इसलिए उस संबंध में मैं नहीं बता सकता कि कैसे मेल हो सकता है, क्योंकि मुझे आज तक यही समझ में नहीं आ पाया कि कोई झगड़ा हुआ है।
एक छोटी सी घटना और दूसरे प्रश्न को मैं लूंगा।
हैनरी थारो मरणशय्या पर पड़ा हुआ था। कभी किसी ने उसे चर्च जाते नहीं देखा। कोई भला आदमी कभी नहीं जाता। भला आदमी था। कभी किसी ने उसे प्रार्थना करते नहीं देखा। कौन सज्जन आदमी कब प्रार्थना करता है? कभी किसी ने उसे बाइबिल की पूजा करते नहीं देखा। मरणशय्या पर पड़ा था। तो गांव के पादरी ने सोचा कि अब यह क्षण अच्छा है, यह मौका अच्छा है, इस वक्त मौत करीब है, घबड़ा गया होगा, अब चलें। मौत का फायदा उठाते रहे हैं पुरोहित, पादरी, तथाकथित धार्मिक लोग। जवानी में तो आदमी को नहीं पकड़ पाते तो फिर बुढ़ापे में पकड़ लेते हैं। मौत करीब होती है, भय सामने होता है, तो प्रलोभन दिया जा सकता है कि आ जाओ हमारी तरफ, मान लो हमारी बात, तो भगवान से तुम्हारे लिए सिफारिश कर देंगे कुछ, अच्छा इंतजाम कर देंगे। मरते वक्त अकेला आदमी घबड़ा उठता है। इसलिए तो चर्चों और मंदिरों में बूढ़े और बुढ़ियां दिखाई पड़ते हैं, कोई जवान आदमी दिखाई नहीं पड़ता। यह आकस्मिक नहीं है, यह कोई एक्सिडेंटल बात नहीं है। इसके पीछे कोई राज है। सोचा कि थारो अब पड़ गया है बीमार और लोग कहते हैं बचेगा नहीं।
तो गांव का पादरी इस मौके को स्वर्ण अवसर समझ कर उसके पास गया। और उसने कहा कि हैनरी थारो, महाशय, अब पश्चात्ताप कर लो। और भगवान से अपना मिलाप कर लो। प्रेम कायम कर लो। उसने जो शब्द कहे पादरी ने वे ये थे कि क्या तुमने परमात्मा और अपने बीच मेल कायम कर लिया है? हैनरी थारो ने आंख खोली, बिलकुल मरने के करीब था, लेकिन बड़ा बहादुर और धार्मिक आदमी रहा होगा, उसने कहाः क्या कहते हैं आप? मुझे याद नहीं पड़ता कि मुझमें और परमात्मा के बीच कभी झगड़ा हुआ हो, मेल करने का सवाल कहां है? मुझे याद नहीं पड़ता कि मैं कभी उससे लड़ा भी हूं, हम सदा के दोस्त हैं। तो मेल किससे करूं और कैसा करूं जब हमारा कोई झगड़ा ही कभी न हुआ हो? कभी जिंदगी में मुझे याद नहीं आता है कि हमारे और उसके बीच कोई कटुता पैदा हुई हो? जिनके मन में कटुता पैदा हुई हो वे जाएं और मेल पैदा करें और प्रार्थनाएं करें, मैं किस बात के लिए प्रार्थना करूं? किस मेल की प्रार्थना करूं।
यही मैं आपसे कहता हूं, मुझे नहीं दिखाई पड़ता है कि विज्ञान और धर्म में कभी कोई शत्रुता है। इसलिए मेल कैसा और किसका? रह गए वे धर्म जिनसे उसकी शत्रुता है, तो जितनी जल्दी उनकी अरथी निकल जाए उतना शुभ है। उतना मनुष्य-जाति के इतिहास में उससे बड़ा कोई स्वर्णिम अवसर न होगा जिस दिन धर्मों की अरथी निकल जाएगी। क्यों? क्योंकि तब धर्म का जन्म हो सकता है, एक ऐसे धर्म का जो सबका होगा और जिसमें सब होंगे। एक ऐसे धर्म का जो वैज्ञानिक होगा, अंधविश्वासी नहीं। एक ऐसे धर्म का जो श्रद्धा पर नहीं बल्कि विचार और विवेक पर खड़ा होगा। एक ऐसे धर्म का जो इस खंड का और उस खंड का नहीं होगा बल्कि अखंड और सार्वलौकिक होगा। वैसे धर्म के जन्म में धर्मों ने ही अटकाव दिया है। इसलिए वे जाते हैं तो बहुत अच्छा है। जो भी धार्मिक लोग हैं उन्हें उनकी विदाई का तत्क्षण आरंभ कर लेना चाहिए, उन्हें विदा दे देनी चाहिए।

पूछा हैः अणु-युग में आत्मा की साधना कहां तक समर्थनीय है?

मेरी पहली बात से कुछ तो खयाल में आया होगा कि अणु और आत्मा का कोई विरोध नहीं है, बल्कि अणु विज्ञान ने, एटामिक साइंस ने यह बात बड़े अदभुत रूप से सिद्ध कर दीः एक छोटे से अणु में परम शक्ति निवास करती है। एक छोटे से पदार्थ के खंड में जिसे हम आंख से भी न देख सकेंगे, जिसे बड़ी-बड़ी दूरबीनें भी देखनें में समर्थ नहीं हैं, जो इतना छोटा है अणुखंड कि अगर हम एक लाख अणुओं को एक के ऊपर एक रखते चले जाएं तो हमारे बाल की मोटाई के बराबर होंगे। एक लाख अणु एक के ऊपर एक रख दिए जाने पर हमारे बाल की मोटाई लेंगे, इतना छोटा सा जो अणु है, उसमें विज्ञान ने इतनी विराट शक्ति खोज निकाली है कि आज सारी दुनिया भयभीत है कि कहीं अणु बमों का विस्फोट हुआ तो फिर मनुष्य बच नहीं सकेगा। इसका क्या अर्थ है? इससे किस बात की सूचना मिलती है? इससे इस बात की सूचना मिलती है कि छोटे को छोटा मत समझ लेना, कोई छोटा, छोटा नहीं है, क्षुद्रतम में विराटतम छिपा हुआ है। जो क्षुद्रतम है उसमें विराट शक्ति का निवास है। क्षुद्र कुछ भी नहीं है, सभी कुछ विराट है। इससे यह खबर मिलती है। और इससे यह भी खबर मिलती है कि जब पदार्थ के एक अणु में इतनी ताकत है तो चेतना के एक अणु में कितनी शक्ति न हो सकेगी?
आत्मा चेतना का अणु है। जैसे पदार्थ को हमने खोजते-खोजते आखिरी जगह जाकर अणु को पकड़ लिया है, वैसे ही जिन लोगों ने चेतना की खोज की है, खोज करते-करते उन्होंने अंततः जाकर आत्मा के अणु को पकड़ लिया। आत्मा इकाई है चैतन्य की और अणु इकाई है पदार्थ की। विज्ञान अणु पर पहुंचा है, धर्म आत्मा पर। दोनों की खोजें हैं। दोनों की खोजें बड़ी वैज्ञानिक हैं। और ऐसी दुनिया में जब कि अणु खोज लिया गया है।

पूछा है मित्र ने कि आत्मा की साधना की क्या सार्थकता है? क्या समर्थता, क्या उसका समर्थन किया जा सकता है?

अणु तक जब तक मनुष्य नहीं पहुंचा था तब तक अगर आत्मा को न भी जानता तो चल सकता था, अब नहीं चल सकेगा। क्योंकि पदार्थ की शक्ति जिस मनुष्य के हाथों में आ गई हो विराट और अपने भीतर जो कुछ भी न जानता हो और अज्ञान से भरा हो, अज्ञान के हाथों में इतनी शक्ति खतरनाक ही सिद्ध हो सकती है, और क्या होगा? एक छोटे बच्चे को हम तलवार पकड़ा दें, तो क्या होगा? ऐसे ही छोटे से बच्चे को जो आत्मा की दृष्टि से बिलकुल बच्चा है, उस आदमी के हाथ में एटम आ गया है, क्या होगा? हिरोशिमा, नागासाकी होंगे। युद्ध होंगे, आज नहीं कल सारी दुनिया को डुबाने का आयोजन होगा। मनुष्य के हाथ में उतनी ही शक्ति शुभ है जितनी उसके भीतर शांति हो। भीतर शांति न हो बाहर शक्ति हो तो बहुत खतरनाक है यह मेल। और भीतर शांति पैदा होती है उसी मात्रा में जिस मात्रा में मनुष्य चेतना से परिचित होता है। बाहर शक्ति उपलब्ध होती है उसी मात्रा में जितना मनुष्य पदार्थ के अंतिम से अंतिम खंड को समझ पाता है। और भीतर शक्ति उपलब्ध होती है, शांति उपलब्ध होती है उसी मात्रा में जितना वह स्वयं की अंतिम से अंतिम,े गहरी से गहरी अवस्था को समझ पाता है।
तो अब तो बहुत जरूरी है अगर आदमी ने आत्मा को न समझा, तो अणु को समझना बहुत महंगा पड़ जाने वाला है। इस नासमझ आदमी के हाथों में अणु सिवाय आत्मघात के और कुछ भी न बन सकेगा। शायद तुम्हें अंदाज भी न हो कि हमने अपने आत्मघात की बड़ी तैयारी कर रखी है। पचास हजार उदजन बम हमने बना रखे हैं, ये उदजन बम बहुत ज्यादा हैं। एक जमीन बहुत छोटी है, इस तरह की सात जमीनों को बिलकुल नष्ट कर देने के लिए काफी हैं। आदमी की संख्या तो बहुत थोड़ी है अभी, कोई तीन, साढ़े तीन अरब, इससे सात गुने आदमी हों तो उन सबको मारने का हमने इंतजाम कर रखा है।
अगर आदमी के भीतर कोई शांति का सुराग नहीं खोजा जा सका तो क्या होगा? यह सारी तैयारी का क्या होगा? एक राजनीतिज्ञ पागल हो जाए, और मजे की बात यह है कि बिना पागल हुए कोई राजनीतिज्ञ कभी कोई होता ही नहीं, और अगर एक राजनीतिज्ञ पागल हो जाए, तो सारी दुनिया के विनाश की ताकत उसके हाथ में है। और राजनीतिज्ञ को हम भलीभांति जानते हैं कि यह किस तरह का आदमी होता है? दुनिया अच्छी होगी तो इस तरह के आदमी का हम चिकित्सालय में इलाज करवाएंगे। लेकिन अभी हम उसको मुख्यमंत्री बनाते हैं, प्रधानमंत्री बनाते हैं। हमारे बीच जो आज सबसे रुग्ण मस्तिष्क का आदमी है उसके हाथ में सबसे ज्यादा ताकत है। और उस ताकत के पास विज्ञान ने अणु की शक्ति दे दी है, अब क्या होगा? अमरीका का एक राजनीतिज्ञ गुस्से में आ जाए, रूस का एक राजनीतिज्ञ गुस्से में आ जाए, क्या होगा? उसका गुस्सा सारी दुनिया की मौत बन सकता है। उसके हाथ में अपरिसीम ताकत मिल गई। इस ताकत के विरोध में सारे जगत मे आत्मिक शक्ति का अविर्भाव होना चाहिए। नहीं तो मनुष्य के जीवन के दिन बहुत इने-गिने हैं। यह जिंदगी बहुत दिन चलने वाली नहीं है। तैयारी हमारी पूरी हो गई है, विस्फोट किसी भी दिन हो सकता है।
इसलिए यह मत पूछो कि अणु-युग में आत्मा की साधना की क्या सार्थकता है? पुराने दिनों में आत्मा न भी साधी जाती तो चल जाता, लकड़ी वगैरह से लड़ाई करनी पड़ती थी, तीर-भाले चलाने पड़ते थे, कुछ बड़ा खतरा नहीं था, हिंसा बहुत सीमित थी। अशांत आदमी के पास बहुत बड़ी ताकत नहीं थी। लेकिन आज तो बहुत बड़ी ताकत है। और आदमी बिलकुल अशांत है। यह आदमी शांत होना चाहिए। इसका शांत हो जाना एकदम अपरिहार्य हो उठा है। एक क्षण भी इसे खोना खतरनाक है।
इसलिए दुनिया में जो भी विचारशील हैं उन्हें यह समझना होगा कि आत्मा की दिशा में जितना काम हो सके और जितनी तीव्रता से हो सके, और जितने लोगों के भीतर आत्मा की प्यास को, खोज को, गहराई को जगाया जा सके, और जितनी तीव्रता से जगाया जा सके, क्योंकि कोई हिसाब नहीं है कि क्षण हमारे हाथ में कितने हैं, उसी मात्रा में, उसी मात्रा में मनुष्य का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। अणु की शक्ति खड़ी हो गई है, आत्मा की शक्ति को भी खड़ा करना जरूरी है। और यह बिना आत्मा की तरफ साधना किए नहीं होगा। इसलिए बहुत-बहुत जरूरी है आज, आज से ज्यादा जरूरी यह बात कभी भी नहीं थी, और शायद आगे भी कभी भी न हो। ये क्षण शायद मनुष्य के जीवन में सबसे बड़े संकट के, सबसे बड़ी क्राइसिस के दिन हैं। इसी वक्त अगर हम आत्मिक शक्ति को भी जगा सकें, तो अणु की शक्ति विनाश न बन कर सृजन बन सकती है। उससे बहुत बड़ा सृजन हो सकता है। शायद दुनिया में किसी आदमी के भूखे रहने की अब कोई जरूरत नहीं है। और न किसी आदमी को घातक बीमार होने की जरूरत है। और शायद इतनी जल्दी मरने की भी किसी को कोई जरूरत नहीं है।
अगर अणु की शक्ति का हम सृजनात्मक, क्रिएटिव उपयोग कर सकें, तो यह जमीन वह स्वर्ग बन सकती है जिसकी कहानियां पुराणों में हैं। यह जमीन वह स्वर्ग बन सकती है। इतनी बड़ी शक्ति हमारे हाथ में आ गई है। लेकिन अगर मन हमारा बेचैन और अशांत रहा, तो इसका हम एक ही उपयोग कर सकेंगे, और वह यह कि इसी में हम जल जाएं और नष्ट हो जाएं। जो ताकत सौभाग्य बन सकती थी, वही हमारा दुर्भाग्य बन जाएगी। जो शक्ति हमारे लिए वरदान सिद्ध होती वही अभिशाप हो सकती है। इसलिए बहुत-बहुत जरूरत है कि आत्मा की खोज उस दिशा में साधना हो और उसे पाया जाए। और बहुत लोगों के भीतर वह दीया जल सके।

एक युवक ने पूछा हैः आपकी बातें ठीक मालूम पड़ती हैं, लेकिन उनसे तो क्रांति हो जाएगी, उससे तो विद्रोह पैदा हो जाएगा, उससे तो अराजकता पैदा हो सकती है।

अगर हम ठीक से देखें, तो हमारे समाज में जितनी अराजकता है, जितनी अनार्की है, इससे ज्यादा भी अनार्की किसी समाज में कभी हो सकती है? यह समाज जितना बीमार और रुग्ण, जितना अशांत, अभिशापग्रस्त है, कोई और समाज भी इससे ज्यादा अभिशापग्रस्त हो सकता है? क्या है इसमें जो बचाने जैसा है? क्या है इसमें? सब कुछ सड़-गल गया है, सब कुछ कुरूप हो गया है। तो घबड़ाहट क्या है अगर कोई बात ऐसी मालूम पड़ती हो कि उससे क्रांति हो जाए? क्रांति तो चाहिए, परिवर्तन तो चाहिए। जो समाज परिवर्तित होना बंद कर देता है वह असल में जीवित ही नहीं रह जाता। परिवर्तन तो रोज, जितना जीवित समाज होगा उतने तीव्र परिवर्तन होते हैं उसके भीतर। जितना जीवंत होता है प्रवाह उतनी ही दूर की यात्रा करता है, उतने ही नये पथों को खोजता है। क्रांति तो जीवन है, उससे क्या घबड़ाना? और युवक होकर कोई ऐसी बात करे कि क्रांति हो जाएगी और डरे, तो उसे समझ लेना चाहिए वह बूढ़ा हो चुका है, वह युवक नहीं है। एक बूढ़ा आदमी भयभीत हो सकता है। लेकिन जरूरी नहीं होता कि कोई शरीर से बूढ़ा हो गया हो तो बूढ़ा ही हो गया।
मैं एक गांव में अभी था, उस गांव के एक धनपति ने मुझे फोन किया और कहाः मैं अपनी मां को भी लाना चाहता हूं आपको सुनने, लेकिन उसकी उम्र नब्बे वर्ष है और पिछले चालीस वर्षों से वह चैबीस घंटे माला जपती रहती है, मुझे डर लग रहा है कि कहीं आपकी बातों से उसे चोट न पहुंच जाए, और इस उम्र में कहीं उसके मन को बेचैनी न पैदा हो जाए, तो मैं लाऊं या न लाऊं ? मैंने उनसे कहाः अगर तुम्हारी मां जवान होती तो मैं कहता न भी लाओ तो कोई हर्जा नहीं है, अभी वक्त है, लेकिन तुम्हारी मां के आगे कोई वक्त नहीं है इसलिए तुम जल्दी ले आओ। क्योंकि कुछ हो सकता हो तो हो जाना चाहिए। वह अपनी मां को डरते हुए लेकर आया। सभा के बाद मुझे मिले और कहने लगे, मैं बहुत हैरान हूं, सभा से उठने के बाद उन्होंने अपनी मां को पूछा होगा, कैसा लगा? उनकी मां ने कहाः चालीस साल से मैं माला जपती थी, वह माला हमेशा हाथ में रखती थी, उन्होंने कहाः माला जपने से कुछ भी नहीं होगा, मेरा अनुभव भी कहता है कि कुछ भी नहीं होता, तो मैं माला वहीं छोड़ आई हूं उसी सभा में, उसको वापस नहीं लाई हूं अपने साथ। वह बात खतम हो गई।
मैंने उनके लड़के को कहाः तुम बूढ़े हो, तुम्हारी मां जवान है। नब्बे साल की उम्र में वह माला छोड़ आई उसी भवन में। और उसने कहा कि उन्होंने कहाः माला जपने से कुछ न होगा, यह बात ठीक है, पचास साल का मेरा अनुभव भी कहता है कि कुछ भी नहीं हुआ। मैंने पचास साल जप कर देख लिया। यह बात ठीक है, बात खत्म हो गई। मैं माला वहीं छोड़ आई हूं।
इस स्त्री को कोई बूढ़ा कह सकता है? लेकिन जवान आदमी जब विद्रोह और कं्राति से डरे तो उसे कोई जवान कहेगा? जवानी का मतलब क्या है? जवानी का मतलब हैः जिसका हृदय अभी परिवर्तन के लिए तैयार है। जो नये की खोज में निकल सकता है, जो नये की खोज का साहस कर सकता है, वह जवान है। जो नये से भयभीत होता है और पुराने से चिपट जाता है, वह बूढ़ा हो गया, मन से बूढ़ा हो गया।
हिंदुस्तान में जवान बहुत दिनों से पैदा होने बंद हो गए हैं, यहां बूढ़े आदमी ही पैदा होते हैं, जवान पैदा ही नहीं होता। हमारी सारी भाषा बूढ़ी हो गई। मेरा मतलब समझे बुढ़ापे से? क्रांति से क्या घबड़ाना? क्रांति तो होनी चाहिए, जरूर होनी चाहिए। क्योंकि क्रांति तो जिंदगी को रोज नया-नया करने की प्रक्रिया का नाम है। रोज नई-नई जिंदगी होती जानी चाहिए। ठहर नहीं जाना चाहिए जीवन का प्रवाह।
एक तालाब होता है, उसमें प्रवाह रुक गया होता है। एक नदी होती है, उसमें प्रवाह खुला और मुक्त होता है। नदी बड़ी क्रांतिकारी है, जो नये-नये रास्ते खोजती रहती है, अनजान सागर की तरह उसकी यात्रा चलती जाती है। तालाब शायद डर गया है। तालाब शायद बूढ़ी हो गई नदी, वह घबड़ा गया है, उसने अपने को बंद कर लिया है एक जगह, वह डरता है आगे जाने से। परिवर्तन करना पड़ेगा, न मालूम किन रास्तों पर चलना पड़े, न मालूम सुख हो कि दुख हो, यही ठीक है, जहां हैं वहीं ठीक है। एक स्टेट्स-को पैदा करता है। वहीं रुक जाता है, वहीं बंध जाता है। फिर पता है जो तालाब बंध जाता है तो क्या होता है? सिर्फ मरता है। फिर उसमें कोई जिंदगी नहीं रह जाती। सूखता है और मरता है। सूखता है और मरता है और गंदा होता चला जाता है। क्योंकि गंदगी, जब कोई नदी बहती है तो बह जाती है और नदी रोज फिर पवित्र हो जाती है। और तालाब? तालाब में तो पानी तो उड़ता जाता है, गंदगी ठहरती चली जाती है। धीरे-धीरे पानी तो नहीं रह जाता, कीचड़ रह जाती है, कचरा रह जाता है। वह कचरा इकट्ठा होता चला जाता है।
तो तालाब की जिंदगी होती है एक, एक नदी की जिंदगी होती है। जवान आदमी वही है जो उद्याम नदी के वेग से जीता हो, जो तालाब न बन जाए। और पूरा समाज जब नदी के वेग से जीता है, तो पूरा समाज जिंदा होता है। और जब पूरा समाज ही एक डबरे की तरह हो जाता है, तो मर जाता है। कई कौमों ने अपने आप को डबरा बना लिया है। और वे बड़ी गौरवांवित भी समझती हैं अपने को कि देखो हम कहीं बहते नहीं, हम कहीं जाते नहीं, हम तो जहां के तहां हैं। हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति बड़ी महान है। इसको कहीं जाना नहीं पड़ता, जहां की तहां ठहरी रहती है। लोग आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन हम वहीं के वहीं हैं। यह कोई गौरव की बात है? यह कोई सम्मान की बात है? यह तो इस बात की खबर है कि हमने जीना छोड़ दिया है। वह जो डाइनैमिक, वह जो परिवर्तनशील, गत्यात्मक जीवन होना चाहिए, वह जा चुका है। निरंतर-निरंतर गत्यात्मक होना चाहिए।
युवक को तो सोचना चाहिए विद्रोह की भाषा में। लेकिन विद्रोह का क्या मतलब? विद्रोह का क्या यह मतलब है कि मकानों को जला दो, बसों में आग लगा दो, स्कूल के कांच फोड़ दो, शिक्षक का जीना हराम कर दो, यह विद्रोह का मतलब है? अगर यही विद्रोह का मतलब है, तो, तो बात दूसरी है, लेकिन यह विद्रोह का मतलब नहीं है, यह तो मूर्खता का मतलब हो सकता है विद्रोह का नहीं। विद्रोह तो बड़ी गहरी चीज है, विद्रोह तो मूल्यों को बदलने की बात है, वैल्यूज को बदलने की बात है। विद्रोह किसी बस पर पत्थर फेंकने का नाम नहीं है और न कहीं हड़ताल कर देने का नाम है। और जो हम चारों तरफ देख रहे हैं विद्रोह वह विद्रोह नहीं है। विद्रोह तो है जीवन जहां-जहां जकड़ गया हो, जिन-जिन मूल्यों ने जीवन को पकड़ लिया हो और उसकी गति को अवरुद्ध कर लिया हो, उन-उन मूल्यों को बदल देना। हजार-हजार जकड़नें हमारे ऊपर हैं, सारी मनुष्य-जाति के ऊपर, उनको तोड़ना है, वहां विद्रोह करना है।
लेकिन हमारे समाज के अगुआ बहुत होशियार हैं, वे विद्रोही न हो सके, असली विद्रोही न हो सके। इसलिए वे जवान को अंत्यंत टुटपुंजिया विद्रोह करना सिखा देते हैं, वे कहते हैं, पत्थर फेंको बस पर, जैसे बस पर पत्थर फेंकने से और मकान में आग लगा देने से कोई क्रांति होने वाली है। बल्कि सच यह है कि अगर लड़के यही करते रहे और उनकी ताकत इसी में लग गई, तो क्रांति कभी न हो पाएगी। और ये बहुत जो होशियार हैं हमारे समाज में शोषण करने वाले, उनके पक्ष में हैं, उनके हित में हैं। ऐसे में ऊपर से चिंता जाहिर करते हैं कि बहुत बुरा हो रहा है, लेकिन मन से वे इसे पसंद करते हैं कि यह होता रहे, युवक की ताकत इस बेवकूफी में लगी रहे। वह जिंदगी जैसी डबरे में बंद है वहीं बंद रही आएगी। वे चाहते हैं दिल से बहुत भीतर कि यही नासमझियां युवक करता रहे, तो असली क्रांति कभी नहीं कर पाएगा।
मैं तो आपसे कहूंगाः अगर अपने स्कूल के मास्टर के खिलाफ पड़ गए हैं, तो आप नासमझ हैं। अगर लड़ाई ही करनी है तो मनु महाराज से करो, बेचारे मास्टर से क्या करनी। मनु महाराज से लड़ाई लो, अगर लेनी है। मूल्य तीन हजार साल पहले जहां मनु छोड़ गए हैं वहीं रुक गए हैं, वहां से उन्हें आगे बढ़ाना है। वहां टक्कर है, वहां लड़ाई है। मुल्क को जिन्होंने गलत मूल्य दे दिए हैं उनसे लड़ाई है, उनसे टक्कर है। और वह लोगों से नहीं है वह मूल्यों से है, वैल्यूज से है, जो हमें पकड़ लेती है।
अब हिंदुस्तान में आज भी शूद्र हैं, यह बड़ी आश्चर्य की बात है! यह होना चाहिए क्या? आज भी हिंदुस्तान में अजीब-अजीब बातें हैं, जिनकी कि कल्पना करने में भी हंसी आती है। छोटी-छोटी टुच्ची बातों पर विरोध है--मराठी और गुजराती का विरोध है, हिंदी और गैर-हिंदी वाले का विरोध, हिंदू और मुसलमान का विरोध; आने वाले बच्चे हसेंगे हम पर। कैसे लोग थे? कैसे नासमझ? कैसे स्टुपिड? क्या बेवकूफियां करते थे? कैसी टुच्ची बातों पर लड़ते थे, आग लगाते थे, हत्या करते थे, हड़ताल करते थे? हैरान होंगे आने वाले बच्चे कि ये कैसे लोग थे? इन सबको तोड़ देना जरूरी है, इन सब दीवालों को तोड़ देना जरूरी है, इस तरह की नासमझियों को तोड़ देना जरूरी है। और सोचना जरूरी है। और सोचने से जो क्रांति आए, विद्रोह आए, वह बहुत शुभ होगा। इससे घबड़ाएं न।

पूछा है उन्हीं युवक नेः ऐसा जो विद्रोह है, ऐसी जो क्रांति है, ऐसा जो इंकलाब, ऐसा जो परिवर्तन है वह लाने के लिए एक अंधा विवेकहीन युवक कुछ भी नहीं कर सकेगा। चाहिए एक बहुत विचारपूर्ण, जाग्रत, बहुत ओज से भरा हुआ, बहुत विवेक से भरा हुआ, बहुत सावधान।

इतनी सावधानी और विचार से अगर युवक भरेगा तो क्रांति होगी। और उस क्रांति से हित होगा, मंगल होगा। सभी क्रांतियों से मंगल नहीं हो जाता है। अगर क्रांति करने वाला बेहोश है, नासमझ है, तो केवल तोड़-फोड़ करता है, बना कुछ भी नहीं पाता। असली क्रांति वह नहीं है जो केवल तोड़ती है, असली क्रांति तो वह है जो इसलिए तोड़ती है ताकि कुछ बनाया जा सके। जो इसलिए मिटाती है ताकि कुछ निर्मित किया जा सके। जो जमीन को इसलिए खाली करती है पुराने से ताकि नये का भवन खड़ा हो सके। लेकिन विवेक-शून्यता केवल तोड़ती है। विवेक निर्मित करता है, वह विवेक चाहिए, उस विवेक की जागृति चाहिए। वह विचार करने से जीवन के संबंध में पैदा होगी। हम तो विचार करते नहीं हैं, हमने तो मान रखी हैं बातें जो किसी ने कह दी हैं। और जब भी हम मान लेते हैं और विचार नहीं करते, तो हमारे भीतर विवेक कैसे पैदा होगा? हमें हजारों साल से कोई बात कह दी जाती है और हम मानते चले जाते हैं। न हम संदेह करते हैं, न हम विचार करते हैं, न हम ठिठक कर खड़े होते हैं और न पूछते कि यह क्या है? यह सच है? यह ठीक है? हमारा युवक भी नहीं सोच रहा है।
एक डाक्टर के साथ मैं उनके घर से निकला, किसी मरीज को दिखाने ले जा रहा था। एक बिल्ली रास्ता काट गई। वे डाक्टर मुझसे बोले, दो मिनट ठहर जाएं। मैंने कहाः आप ठहरें, मैं किसी दूसरे डाक्टर को लेकर जाऊंगा। उन्होंने कहाः क्यों? मैंने कहाः जो डाक्टर बिल्ली के काटने से रुकता हो, उसकी डाक्टरी पर मुझे शक हो गया है, यह आदमी डाक्टर होने के लायक नहीं है। इसके मन में कोई वैज्ञानिकता नहीं है। बिल्ली के काटने से रास्ता और एक डाक्टर रुकेगा? एक इंजीनियर रुक जाएगा कि उसको छींक आ गई? एक पढ़ा-लिखा आदमी? एक बेचारे ऐसे गरीब आदमी को जिसके पास एक ही आंख है, उसको देख कर दुर्भाग्य समझेगा अपना। तो फिर ऐसे युवक क्या क्रांति लाएंगे? क्या करेंगे? कौन सी वैज्ञानिकता पैदा करेंगे? तो फिर जिंदगी में बहुत विवेक और विचार चाहिए कि हम क्या कर रहे हैं? निरंतर अपने से पूछना चाहिए, निरंतर प्रश्न खड़े करने चाहिए, निरंतर संदेह करना चाहिए, सतत खोज जारी रखनी चाहिए कि यह क्या हो रहा है?
हमारे मुल्क में तो हमने विचार करना कई हजार साल से बंद कर दिया है। हमने वह तकलीफ उठानी ही बंद कर दी है। वह हमने दो-चार लोगों पर छोड़ दिया है। हे भगवान कृष्ण! तुम सोचो और गीता दे दो, हम उसी को सम्हाले रखेंगे, हमें क्यों परेशान करते हो? आपने किताब दे दी, अब हमारा काम है कि हम इसको पढ़ें, इसको सिर नवाएं और गुणगान करें। और हमें कोई करना नहीं है। हे भगवान महावीर! अब तुमने सब सोच लिया है, तुम सर्वज्ञ हो, तुमने सब बता दिया, अब हममें से किसी को भी सोचने की जरूरत नहीं। अब हम सोचने को छुट्टी देते हैं, अब सोचने-विचारने की इस देश में कोई जरूरत नहीं है,क्योंकि सर्वज्ञ हो चुके, और उन्होंने जो कह दिया, वह पूरा हो गया। इस नासमझी का हम फल भोग रहे हैं। उसकी वजह से हमारे मुल्क में कोई विवेकपूर्ण क्रांति नहीं पैदा हो पा रही। क्योंकि हमने सब छोड़ दिया है किसी और पर।
जो आदमी सोचना तक दूसरे पर छोड़ दे, उससे अभागा कोई आदमी हो सकता है? फिर उसके पास बचा क्या आदमी कहने लायक? सोचने की ही ताकत थी जो उसे मनुष्य बनाती थी, वही उसने त्याग दी। अब वह केवल एक अनुकरण करने वाला, पीछे चलने वाला हो गया है।
मैं तुमसे प्रार्थना करूंगाः निश्चित ही विद्रोही बनो, लेकिन तुम्हारा विद्रोह विवेक पर खड़ा हो, निरंतर विचार से जन्मे, तो तुम्हारे विद्रोह से अहित नहीं होगा, मंगल सिद्ध होगा, सबका हित होगा उसमें। और हर चीज पर विद्रोह की जरूरत है। कुछ ऐसा नहीं है कि किसी एक बात पर, अब मैं उस विस्तार में नहीं जा सकूंगा, लेकिन हर मुद्दे पर हर चीज पर बुनियादी विद्रोह और चिंतन की जरूरत हो गई है। पूछना जरूरी हो गया है फिर से, असल में कोई भी कौम बार-बार पूछ लेती है, बार-बार नाप-जोख कर लेती है, नहीं तो भूल में पड़ जाती है।
छोटा बच्चा है, उसके लिए हम कपड़े बनवाते हैं, फिर जवान हो जाए, और वही कपड़े पहने रहे, या तो हम उसको पागल कहेंगे कि यह आदमी पागल है, जो पांच साल के बच्चे के लिए काफी थे, वह यह पचास साल की उम्र में पहने हुए हैै। वही कपड़े पहने हुए है, इसने सोचा भी नहीं, पूछा भी नहीं कि मैं बदल गया हूं, अब कपड़े का बदल लेना जरूरी है। रोज जिंदगी बदल रही है, रोज समय बदल रहा है, जीवन की धारा रोज-रोज नई-नई जगहों को पार कर रही है। नई समस्याएं हैं, नये प्रश्न हैं और हम पुराने कपड़ों में ही कैद। और हमने जिद्द कर रखी है कि अगर गड़बड़ है तो आदमी को काट-छांट कर छोटा कर दो, लेकिन हम कपड़े नहीं बदलेंगे। आदमी के पैर थोड़े छोटे कर दो, हर्जा क्या है? थोड़े हाथ काट कर छोटा कर दो, इसको कहो कि थोड़ा व्यायाम करो, प्राणायाम करो, छोटे बने रहो, बड़े मत बनो। इसको ही समझाओ कि आसन करो, वगैरह करो। लेकिन कपड़े यही ठीक रहेंगे। तुम छोटे रहो, तुम बड़े मत हो जाना। यह आदमी की गलती है अगर यह बड़ा होता है तो। बदलता है तो कपड़े की क्या गलती, कपड़ा तो बेचारा बहुत अच्छा है। और पूर्वज जिस कपड़े को बना गए, बेटों का फर्ज है कि उसी को पहने? यही उनका कर्तव्य है? यही पिताओं के प्रति उनकी आदर-भावना है? श्रद्धा है? यह आदर है? यह श्रद्धा है? अगर वे बापदादे वापस लौट आएं, वे ऐसे नालायक बच्चों को देख कर हैरानी से भर जाएंगे कि हमने जो कपड़े इनके बचपन के लिए बनाए थे, ये बुढ़ापे में पहने हुए हैं। अगर वे वापस लौट आएं, तो हैरान होंगे कि ये कैसे लोग हैं? हमने तीन हजार साल पहले जो बात कही थी, ये उसको पकड़ कर अभी बैठे हुए हैं, बीसवीं सदी में भी वही चलाए जा रहे हैं। सिर पीट लेंगे अपना हमारे नाम पर। और हम सोच रहे हैं हम उनको आदर दे रहे हैं।
जिंदगी रोज बदल जाती है, जिंदगी की समस्याएं बदल जाती हैं, इसलिए समाधान बदलने पड़ते हैं। कौन बदलेगा यह? ये विचारशील, विचारशील युवक चाहिए, जो सोचे, देखे और बदले। तो क्रांति से भयभीत होने की जरूरत नहीं। उसका भी स्वागत जरूरी है।

एक युवक ने पूछा है कि पाकिस्तान से लड़ाई के वक्त, चीन से लड़ाई के वक्त, या सीमांत पर जब भी उपद्रव होता है, तो हम अपने अहिंसा के सिद्धांत का क्या करें?

सिद्धांतों को आग जला कर उसमें डाल देना चाहिए। सिद्धांतों की कोई जरूरत नहीं है। जिंदगी की जरूरत है। सिद्धांत सब झूठे होते हैं, वक्त पर काम नहीं आते। अगर कोई आदमी अहिंसक होगा तो वह यह पूछेगा कि अब युद्ध आ गया है तो हम अहिंसा का क्या करें? जब युद्ध नहीं था तब अहिंसा की जरूरत नहीं थी और अब युद्ध आ गया है तो हम अहिंसा का क्या करें? अगर मैं प्रेमपूर्ण हूं और आप मुझे गाली दे दें, तो मैं पूछूंगा कि अब मैं अपने प्रेम का क्या करूं? यह आदमी मुझे गाली दे रहा है, मैं शांत था और एक आदमी ने आकर मेरा अपमान कर दिया, तो मैं यह पूछूंगा कि अब मैं अपनी शांति का क्या करूं? यह आदमी मेरा अपमान कर रहा है? अगर कोई मेरा अपमान न करता तो मैं शांत बना रहता, अब तो बड़ी मुश्किल की बात हो गई, अब तो यह शांति के सिद्धांत का क्या हो? सिद्धांतों की कसौटी तब होती है जब उनके प्रतिकूल परिस्थिति खड़ी हो जाती है। चीन और पाकिस्तान के उपद्रवों ने यह जाहिर कर दिया कि हमारी सब अहिंसा की बातचीत बकवास और झूठी थी। इस सत्य को हम नहीं देखेंगे। हम फिर वही पुरानी बकवास दोहराए चले जाएंगे जो कि वक्त पर काम नहीं आई।
हमें जानना चाहिए, ठीक से जान लेना चाहिए कि हम केवल अहिंसा की बातें करने वाले लोग हैं। अहिंसा से हमारा कोई संबंध नहीं है। इसलिए यह कोई मुसीबत न हो तो हम मंदिरों में अहिंसा के प्रवचन चलाते हैं और किताबें छापते हैं और अहिंसा परमोधर्मः का गुणगान करते हैं और झंडों पर लिखते हैंः अहिंसा परमोधर्मः। और जब प्रतिकूल परिस्थिति आ जाती है, तो हम कहते हैं, अब तो हमें अहिंसा की रक्षा के लिए तलवार उठानी ही पड़ेगी। बड़ी मजे की बात है, अहिंसा की रक्षा के लिए तलवार उठानी पड़ेगी? तो अहिंसा इतनी कमजोर है कि उसको अपनी रक्षा के लिए हिंसा की जरूरत पड़ती है? तो ऐसी कमजोर अहिंसा को छुट्टी करो, इसकी कोई जरूरत नहीं है। जो वक्त पर हिंसा का सहारा जिसे खुद ही खोजना पड़ता हो तो ऐसी अहिंसा को हम क्या करेंगे? लेकिन हमने धोखा दिया है अपने आप को। हम कुछ बातें कर-कर के, शोरगुल मचा-मचा कर यह समझने लगे हैं कि हम अहिंसक हैं। अहिंसक होना इतना सस्ता नहीं है। धर्म इतना सस्ता नहीं है। अहिंसक होना बड़ी तपश्चर्या सेगुजर जाना है। अहिंसक होने का मतलब हैः जिस व्यक्ति के हृदय से घृणा के, क्रोध के, ईष्र्या के, प्रतिहिंसा के, महत्वाकांक्षा के, एंबीशन के समस्त द्वार समाप्त हो गए हैं, जिसका हृदय प्रेम की एक धारा बन गया है। फिर, फिर उसके साथ कुछ भी स्थिति खड़ी हो जाए, वह मरने को राजी हो जाएगा, लेकिन यह नहीं पूछेगा, अब अहिंसा के सिद्धांत का क्या करें। तो बात ही नहीं है पूछने की।
बुद्ध का एक शिष्य था, पूर्ण। उसकी दीक्षा पूरी हो गई, उसकी शिक्षा पूरी हो गई। उसने बुद्ध से कहाः अब मैं जाऊं और आपने जो प्राणवान संदेश मेरे हृदय में फूंका है, मैं उसकी खबर दूर हवाओं तक पहुंचा दूं, दूर किनारों तक जमीन के।
बुद्ध ने कहाः जरूर जाओ, लेकिन इसके पहले कि तुम जाओ मैं कुछ पूछना चाहता हूं। कहां तुम जाना जाहते हो? किस प्रदेश में? बिहार का एक छोटा सा इलाका था, सूखा, उसने कहा, मैं सूखा की तरफ जाऊंगा, वहां अब तक कोई भी भिक्षु नहीं गया है।
बुद्ध ने कहाः वहां न जाओ तो अच्छा है, तुम युवा हो, अभी नये हो। कहीं और जगह चुन लो तो अच्छा है।
पूर्ण ने कहाः क्यों ऐसा कहते हैं?
बुद्ध ने कहाः वहां के लोग बहुत बुरे हैं। हो सकता है, तुम जाओ, वे गाली-गलौज दें, बुरे भले शब्द कहें, तो तुम्हारे मन को क्या होगा?
पूर्ण ने कहाः यह भी आप मुझसे पूछते हैं? अगर वे मुझे गाली देंगे, अपशब्द कहेंगे, अपमान करेंगे, तो मेरे मन को होगा, भले लोग हैं, सिर्फ गाली देते हैं, इतना ही क्या कम है, मार-पीट भी तो कर सकते थे।
बुद्ध ने कहाः और यह भी हो सकता है कि वे मार-पीट करें, फिर क्या होगा?
तो पूर्ण ने कहाः होगा मेरे मन को भले लोग हैं, सिर्फ मारते हैं, मार भी तो डाल सकते थे।
बुद्ध ने कहाः अंतिम बात और पूछे लेता हूं, फिर कुछ भी नहीं पूछूंगा। और अगर उन्होंने तुम्हें मार ही डाला, तो मरते क्षण में तुम्हारे मन को क्या होगा?
पूर्ण ने कहाः धन्यवाद दूंगा उन लोगों का, भले लोग हैं, उस जीवन से छुटकारा करवा दिया जिसमें कोई भूल-चूक हो सकती थी।
बुद्ध ने कहाः अब तुम कहीं भी जाओ। अब सारा जमीन तुम्हारा घर है और सब तुम्हारे मित्र हैं। क्योंकि जिसके हृदय में ऐसी अहिंसा का जन्म हो गया हो उसका कोई भी शत्रु नहीं है।
इस आदमी को तो हम अहिंसक कह सकते हैं, लेकिन ‘अहिंसा परमोधर्मः’ की जय लगाने वालों को नहीं। बेईमान, अपने आप को धोखा देने का हम बहुत रास्ता खोज लेते हैं, हम बहुत बेईमान हैं। अहिंसा का नारा लगाते हैं, हिंसा भीतर सुलगती रहती है। उसी सुलगने की वजह से जोर-जोर से नारा लगाते हैं। वह जो भीतर सुलग रही है हिंसा, वह जो भीतर चल रहा है क्रोध, वह जो भीतर उबल रही है सब कुछ, और जोर-जोर से नारा लगाते हैं और जोर-जोर से कूदते हैं, झंडा उठाते हैं। और अगर पड़ोस में कोई दूसरा झंडा उठा ले और तुमसे जोर से नारा लगाने लगे, तो तुम दोनों में झगड़ा भी हो सकता है। कि हम श्वेतांबर अहिंसावादी हैं, तुम दिगंबर अहिंसावादी हो, यह नहीं चल सकता। हम और हैं, तुम और हो, आ जाओ फिर, कौन सबसे बड़ा अहिंसावादी है इसको सिद्ध ही करना पड़ेगा। तो अदालत में भी जा सकते हैं, लकड़ी भी चला सकते हैं, हिंसा भी कर सकते हैं, क्योंकि अहिंसा की रक्षा के लिए इन सबकी जरूरत पड़ जाती है। यह हम सब कर सकते हैं।
यह कोई अहिंसा-वहिंसा नहीं, सब झूठी बातचीत है। और बहुत झूठी बातचीत में हम पड़े रहे हैं। और जब तक इस झूठी बातचीत में हम पड़े रहेंगे तो दुनिया में अहिंसा का कैसे जन्म हो सकेगा? एक दुनिया चाहिए जिसमें अहिंसा का जन्म हो। जरूर चाहिए, बिना अहिंसा के मनुष्य का कोई हित नहीं है, कोई मंगल नहीं है। लेकिन कौन लाएगा यह अहिंसा? अहिंसा की बातचीत करने वाले लोग या वे लोग जो अपने हृदय को एक बार प्रेम की क्रांति से गुजर जाने दें? अहिंसा सिद्धांत नहीं है, अहिंसा तो जीवंत प्रेम का नाम है। सिद्धांत की मत पूछें। सिद्धांतों से क्या लेना-देना है? सिद्धांत किसके काम पड़ते हैं? जीवंत प्रेम का नाम है अहिंसा, उसे अपने भीतर पैदा होने दें। और वह जिस दिन पैदा हो जाएगी, उस दिन आपके लिए कोई पाकिस्तानी नहीं है, कोई चीनी नहीं है। तो अहिंसक के लिए कोई अपना देश नहीं, कोई पराया देश नहीं। जो यह न कहता हो कि भारत पर पाकिस्तान का हमला हुआ, बल्कि जो यह कहता है कि भारत और पाकिस्तान की लड़ाई दुर्भाग्यपूर्ण है। जब हम कहते हैं कि भारत पर हमला हुआ, तो हम भारत के हो जाते हैं और दूसरा हमलावर हो जाता है।
दुनिया में ऐसे लोग चाहिए जो हर झगड़े को गृहयुद्ध के रूप में देखें, एक-दूसरे के ऊपर हमले की शक्ल में नहीं। जैसे घर के दो आदमी लड़ पड़े हों, इस तरह से देखें। जो आदमी अहिंसक है वह ऐसे ही देखेगा कि घर के दो लोग लड़ रहे हैं, एक गृहयुद्ध हो रहा है। पाकिस्तान और हिंदुस्तान के भाई लड़ रहे हैं। कोई इस तरह देखेगा, जिसके मन में अहिंसा है। और वैसा आदमी युद्ध समाप्त हो इसका मार्ग खोजेगा। इसके लिए श्रम करेगा, हो सकता है इसके लिए उसे मरना भी पड़े, तो मरेगा। इस भाषा में वह नहीं सोचेगा कि मेरे देश पर हमला हो गया है तो अब, अब अहिंसा के सिद्धांत का क्या करें? जो आदमी कहता है, मेरा देश, उसने तो हिंसा को स्वीकार कर लिया। यह मेरा और दूसरे का देश हिंसा के आधार पर खड़ी की गई सीमाएं हैं। सब दुनिया की सीमाएं वायलेंस की, हिंसा की सीमाएं हैं। प्रेम की कोई सीमा होती है? मैं अगर प्रेम से भर जाऊंगा तो मैं यह कहूंगा कि मेरा प्रेम, देख कर चलना, पाकिस्तान की सीमा आ गई, इसके आगे मत जाना, इधर अपना देश नहीं है। मेरे भीतर प्रेम पैदा होगा तो पाकिस्तान की सीमा पर ठिठक कर रुक जाएगा कि देखना इधर बगल में मुसलमान रहता है, यह अपने वाला नहीं, इधर मत जाना। प्रेम कहीं रुकेगा, अगर पैदा होगा। प्रेम कोई सीमा नहीं मानता, प्रेम असीम है। और जहां-जहां सीमाएं हैं वहां-वहां हिंसा है, वहां-वहां घृणा है। ये देशों की सीमाएं भी हिंसा की सीमाएं हैं। इसलिए अहिंसक देश को स्वीकार नहीं करता और न अहिंसक किसी देश का नागरिक हो सकता है। नागरिक से मेरा मतलब सामान्य काम-काज के अर्थों में नहीं, राजनैतिक चित्तता के अर्थ में, पॅालिटिकल अर्थ में। कोई नागरिक किसी देश का नहीं हो सकता, अहिंसक व्यक्ति तो विश्व नागरिक होगा। दुनिया में ऐसे लोगों की जरूरत है जो छोटे-छोटे देशों की क्षुद्र सीमाओं से अपने को मुक्त करें, छोटे संप्रदायों की सीमाओं से मुक्त करें, तभी शायद एक ऐसी मनुष्यता का जन्म हो सके जहां युद्ध न होते हों, जहां युद्ध समाप्त हो जाएं।
लेकिन राजनैतिक नहीं मान सकता यह कि सीमाएं न हों। क्योंकि जिस दिन सीमाएं नहीं हैं उस दिन राजनीतिज्ञ भी नहीं। वह उसी के साथ जुड़ा हुआ है। उस दिन वह नहीं बच सकेगा। इसलिए राजनीतिज्ञ बड़ा मोह रखता है सीमा का। नक्शे बनाता है और सीमाएं बनाता है। और लड़ता है और लड़वाता है। एक-एक इंच जमीन के लिए करोड़ों-करोड़ों लोगों को कटवाता है। और बड़ा मजा यह है कि जमीन किसके लिए है यह? जमीन के लिए लोग कटते हैं। और जमीन इसलिए है कि लोग इस पर रहें। जमीन लोगों के लिए है कि लोग जमीन के लिए हैं? सीमाएं किसके हित के लिए हैं, इसलिए कि इस पर लोग रोज कटें? अगर इसीलिए ये सीमाएं हैं लोगों के कटने के लिए तो यह किसके मंगल में हैं, किसके हित में हैं? वह दुनिया करीब आ रही है, जो जवान हैं, जो नई पीढ़ी के लोग हैं वे उस तरफ देखें और उस तरफ श्रम करें। एक दुनिया आए जहां कोई सीमाएं न हों, क्षुद्र टुकड़े न हों। मनुष्यता इकट्ठी खड़ी हो सके, ऐसे श्रम में वही लग सकता है जिसका हृदय प्रेम और अहिंसा से भरा हुआ है।

प्रश्न तो और भी बहुत हैं, लेकिन अब कठिन होगा कि मैं और प्रश्नों के उत्तर दूं, एक छोटी सी बात कहूंगा और अपनी चर्चा को पूरा करूंगा।
एक युवक ने पूछा हैः पूरब के ऊपर पश्चिम का प्रभाव पड़ रहा है, क्या यह शुभ है? अध्यात्म के ऊपर भौतिकता का प्रभाव पड़ रहा है, क्या यह शुभ है?

एक छोटी सी कहानी है, मैं अपनी चर्चा पूरी कर दूंगा।
रोम में एक बादशाह बीमार पड़ा, उसकी चिकित्सा होनी कठिन हो गई। वह मरने के करीब आ गया। उसके चिकित्सकों ने अंततः कहा, किसी शांत और समृद्ध व्यक्ति का कोट लाकर यदि राजा को पहना दिया जाए, तो राजा ठीक हो सकता है। और तब तो हर घर यही बात सुनाई पड़ने लगी, वजीर घबड़ाया, साथ में भागते नौकर को उसने कहा, अब क्या होगा? उस नौकर ने कहाः मैंने तो पहले ही समझ लिया था कि यह इलाज बहुत कठिन मालूम होता है। क्योंकि जब आपने यह सुना, आप खुद अपना कोट लेकर नहीं आए, और दूसरे के घर कोट पूछने को गए, आप बड़े वजीर हो राजा के, तभी मैं समझ गया था कि यह कोट मिलना मुश्किल है। क्योंकि यह आदमी को खुद यह खयाल नहीं आता कि मेरा कोट काम आ जाए। वजीर ने कहाः कोट तो मेरे पास बहुत हैं, समृद्धि भी बहुत, लेकिन शांति कहां? फिर तो साफ था कि कोट नहीं मिला। लेकिन दिन के उजाले में कैसे जाए राजा के पास, क्या मुंह लेकर? रात हो गई, सूरज ढल गया, तो वजीर चला चुपके-चुपके अंधेरे में। जाकर राजा के पैरों में सिर रख कर रो लेगा कि यह इलाज नहीं हो सकता। नहीं कोई आदमी मिलता जो सुखी भी हो और शांत भी। समृद्ध लोग हैं, लेकिन वे शांत नहीं।
महल के पास नदी के किनारे धीरे-धीरे चलता था डरा हुआ, भयभीत, क्या मुंह लेकर जाएगा। तभी सुनाई पड़ी उस पार से बांसुरी की आवाज। कोई बहुत, बहुत मधुर स्वरों में गीत गाता था। बड़ी शांति थी उन स्वरों में। एक आशा बंधी, उसके पैर वापस लौट पड़े। वह भागा हुआ उस आदमी के पास पहुंचा, सोचा शायद यह आदमी शांत मालूम पड़ जाए। शांत हृदय से ही ऐसा संगीत पैदा हो सकता है। उसके पास गया, हाथ जोड़ कर अंधेरे में खड़ा हो गया, जैसे ही उसने बांसुरी बंद की, उसने कहा कि मेरे मित्र, कृपा करो, और देखो इनकार मत कर देना, मैं बहुत द्वारों से इनकार पा चुका हूं। राजा मरणासन्न है, बचा लो उसे। तुम्हारे कोट की जरूरत है। चिकित्सक ने कहा है किसी शांत और समृद्ध आदमी का कोट मिल जाए। तुम शांत हो न, देखो न मत करना। उस आदमी ने कहा कि मैं बिलकुल शांत हूं और मैं अपने प्राण भी दे सकता हूं बचाने के लिए, लेकिन अंधेरे में तुम देख नहीं रहे, मैं नंगा बैठा हुआ हूं, कोट मेरे पास नहीं है।
राजा उस रात मर गया। कुछ लोग मिले जिनके पास कोट थे, लेकिन शांति नहीं थी। एक आदमी मिला जिसके पास शांति थी, लेकिन वह नंगा था। राजा मर गया।
अब तक दुनिया में ऐसी ही हालत रही है। पूरब के मुल्कों ने शांति की खोज की, कोट खो दिया। पश्चिम के मुल्कों ने कोट के ढेर लगा लिए, शांति खो दी। और आदमी मरणासन्न है।
और मैं कहता हूं कि किसी ऐसे आदमी का कोट चाहिए जो शांत भी हो सुखी भी हो, तो आदमी बच सकेगा, नहीं तो अब आदमी मरेगा। और ये पूरब-पश्चिम के झगड़े मत खड़े करो, यह भौतिक और अध्यात्म का भेद मत खड़ा करो। एक ऐसा आदमी चाहिए जो सुखी भी हो और शांत भी। इसलिए आने वाली दुनिया में पूरब-पश्चिम दोनों मिट जाने चाहिए। आने वाली दुनिया में एक संस्कृति पैदा होनी चाहिए अखंड, पूरब और पश्चिम की एक, धर्म और विज्ञान की एक, शरीर और आत्मा की एक। सुख और शांति को एक साथ खोजनी वाली संस्कृति को जन्म देना है। वही संस्कृति पूर्ण संस्कृति होगी। अब तक की सब संस्कृतियां अधूरी रही हैं। और अब बड़ा खतरा हो गया है, आदमी बीमार पड़ा है, आदमी...वह राजा मर जाता तो हर्जा नहीं था, राजा पैदा होते हैं। वापस अब आदमी बीमार पड़ा है, पूरी आदमियत बीमार पड़ी है। अब पूरब और पश्चिम अगर न मिल पाए तो यह आदमी नहीं बच सकेगा।
अंत में मैं यही कहता हूं, अब तक हमने धर्म को और विज्ञान को अलग तोड़ कर देखा, शरीर और आत्मा को अलग तोड़ कर देखा, अब यह नहीं चलेगा, इनको जोड़ कर देखना पड़ेगा। आदमी अखंड है। और पूरे मनुष्य की तृप्ति चाहिए--उसके भीतर शांति होनी चाहिए, उसके बाहर सुख। उसके बाहर समृद्धि होनी चहिए और भीतर संगीत होना चाहिए। इसमें कोई दोनों में विरोध नहीं है।
फिर दुबारा आपके पास कभी आऊंगा। आपके बहुत प्रश्न कायम रह गए, उनकी चर्चा करूंगा। तब तक और भी प्रश्न पैदा हो जाएंगे। जो छूट गए प्रश्न उनके लिए क्षमा मांगता हूं, जिनके प्रश्न छूट गए हों।

मेरी बातों को इतने प्रेम से सुना, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं। मेरे प्रणाम स्वीकार करें।

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