आमंत्रण भरा भाव व नमनीय मेधा—(प्रवचन—पचीसवां)
अध्याय 10 : सूत्र 2
अद्वय की स्वीकृति
जनसमूह के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने में और शासन के
व्यवस्थापन की प्रक्रिया में क्या वह सोद्देश्य
कर्म के बिना अग्रसर नहीं हो सकता?
क्या वह स्वर्ग के अपने दरवाजे (नासारंध्र)
को खोलने और बंद करने में एक स्त्रैण
पक्षी की तरह काम नहीं कर सकता?
जब उसकी मेधा सभी दिशाओं की ओर अभिमुख हो,
तब क्या वह ज्ञानरहित होने जैसा नहीं दिख सकता?
विचारशील मनुष्य निरंतर ही पूछता है: जीवन का उद्देश्य क्या? जीएं क्यों? किसलिए? और ऐसा आज नहीं, सदा से ही विचारशील मनुष्य ने पूछा है। समस्त धर्मों का जन्म और समस्त दर्शनों का जन्म इस प्रश्न के आस-पास ही निर्मित हुआ है: उद्देश्य क्या है? प्रयोजन क्या है? लक्ष्य क्या है? अंत क्या है? और जो ऐसा नहीं पूछते हैं, विचारशील लोग सोचते रहे हैं कि वे विचारहीन हैं, अज्ञानी हैं। जो ऐसे ही जीए चले जाते हैं, बिना लक्ष्य को पूछे, उन्हें विचारशील लोग सदा से अज्ञानी समझते रहे हैं।











