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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

उपनिषद--कठोपनिषद--ओशो (आठवां--प्रवचन)

धर्म का आधारसूत्र : मौनआठवां प्रवचन



एषु सर्वेषु भतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया सूक्ष्यया सूक्ष्मदर्शिभि:।। 12।।

यच्छेद्वामनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेचान आत्मनि।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छान्त आत्मनि।। 13।।

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गें पथस्तत्कवयो वदन्ति।। 14।।

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महत: परं ध्रुव निचाटय तत्रत्युमुखात् प्रमुच्यते।।15।।

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम्।
उक्ला श्रत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते।। 16।।

य इमं परमं गुह्य श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि।
प्रयत: श्राद्धकाले वा तदानज्याय कल्पते।
तदानज्याय कल्पते इति।। ।।




यह सबका आत्मरूप परमपुरुष समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी माया के परदे में छिपा रहने के कारण सबके प्रत्यक्ष नहीं होता। केवल सूक्ष्मतत्वों को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से देखा जा सकता है।। 12।।

बुद्धिमान साधक को चाहिए कि ( पहले) वाक् आदि ( समस्त इंद्रियों) को मन में निरुद्ध करे उस मन को ज्ञानस्वरूप बुद्धि में विलीन करे, ज्ञानस्वरूप बुद्धि को महान आत्मा में विलीन करे (और) उसको शांतस्वरूप परमपुरुष परमात्मा में विलीन करे।। 13।।


( हे मनुष्यो! ) उठो जागो (और ) श्रेष्ठ महापुरुषों को पाकर उनके पास जाकर (उनके द्वारा) उस परब्रह्म परमेश्वर को जान लो ( क्योकि ) ज्ञानीजन उस तत्वज्ञान के मार्ग को छुरे की तीक्ष्ण की हुई दुस्तर धार के सदृश दुर्गम बतलाते हैं।। 14।।

जो शब्दरहित स्पर्शरहित रूपरहित रसरहित और बिना गंध वाला है तथा ( जो) अविनाशी नित्य अनादि अनंत (असीम ), महान आत्मा से श्रेष्ठ (एवं) सर्वथा सत्य तत्व है उस परमात्मा को जानकर (मनुष्य) मृत्यु के मुख से सदा के लिए छूट जाता है।। 15।।

मेधावी मनुष्य यमराज के द्वारा कहे हुए नचिकेता के ( इस) सनातन उपाख्यान का वर्णन करके और श्रवण करके ब्रह्मलोक में महिमा को उपलब्ध होते हैं (प्रतिष्ठित होते हैं)।। 16।।

जो मनुष्य सर्वथा शुद्ध होकर इस परम गुह्य रहस्यमय प्रसंग को ब्राह्मणों की सभा में सुनाता है अथवा श्राद्धकाल में (भोजन करने वालों को ) सुनाता है (उसका ) वह कर्म अनंत होने में अर्थात अविनाशी फल देने में समर्थ होता है और वह अनंत होने की शक्ति प्राप्त करता है।। 17।।



धर्म का आधार—सूत्र, : मौन


अंग्रेज विचारक ब्रैडले की एक प्रसिद्ध कृति है : एपियरैंस एंड रिएलिटी—आभास और सत्य, या कहें माया और ब्रह्म। जो दिखाई पड़ता है, वह केवल आभास है। जो दिखाई पड़ने के भीतर छिपा है। और दिखाई नहीं पड़ता, वहीं सत्‍य है। तो यथार्थ के दो रूप है। एक तो जैसा दिखाई पड़ता है—ऊपर-ऊपर; और एक, जैसा है— भीतर।
मैं आपको देखता हूं, तो रूप दिखाई पड़ता है, आकार दिखाई पड़ता है, शरीर दिखाई पड़ता है, लेकिन आप दिखाई नहीं पड़ते। इस सबके भीतर छिपे हैं आप। यह सब जो रूप है, यह सब जो दृश्य हो रहा है, यह सिर्फ बाहर की परिधि है, यह भीतर का केंद्र नहीं है। इसलिए अगर कोई मान ले कि आपको देखकर उसने आपको जान लिया, तो भूल हो जाएगी। जो उसने देखा, वह केवल परिधि थी।
जैसे कोई किसी के घर के बाहर की दीवालों को देखकर लौट आए। ऐसे ही आपके शरीर को, आप में जो दृश्य है उसे देखकर जो समझ ले कि आपसे परिचित हो गया, वह भ्रांति में पड़ गया। आप तो भीतर गहरे में छिपे हैं, जो आंख की पकड़ में नहीं आता, हाथ के स्पर्श में नहीं आता, कान जिसे सुन नहीं सकते। इसलिए गहन प्रेम के क्षण में ही आपको जाना जा सकता है। क्योंकि प्रेम ही वहां तक पहुंच पाएगा, जहां तक इंद्रियां नहीं पहुंच पातीं।
यह पूरा जगत ही ऐसा है। और स्वाभाविक है कि ऐसा हो, क्योंकि किसी भी वस्तु की परिधि होगी और केंद्र होगा, सरकमफ्रेंस होगी और सेंटर होगा। जो बाहर से देखा जा सकता है, वह एक। और जो भीतर से ही गहन हृदय में प्रवेश करके जाना जा सकेगा, वह दो। वही सत्य है, जो केंद्र पर है। परिधि तो रोज बदलती रहती है।
आप मां के पेट में थे तो एक छोटे से अणु थे। अगर वह अणु आज आपके सामने रख दिया जाए तो आप पहचान भी न सकेंगे कि कभी मैं यह था। लेकिन भीतर के केंद्र पर उस क्षण भी आप यही थे जो आज हैं। परिधि बदल गई। आप बच्चे थे कभी, 'कभी जवान थे, कभी के हुए—परिधि बदलती चली गई। अगर आप अपने ही चित्रों को बचपन से लेकर बुढ़ापे तक देखें, तो आप पहचान न पाएंगे कि ये एक ही आदमी के चित्र हैं। सब बदलता चला गया है।
शरीर शास्त्री कहते हैं, शरीर प्रतिपल बदल रहा है और सात वर्ष में पूरा शरीर बदल जाता है। अगर आप सत्तर साल जीएंगे, तो दस बार आपको नया शरीर मिल चुका होगा।
प्रतिपल शरीर में कुछ मर रहा है। भोजन से आप नया शरीर अपने में निर्मित करते जा रहे हैं। मल से, मूत्र से, पसीने से, बाल से, नाखून से, मरे हुए हिस्से बाहर निकलते जा रहे हैं। इसलिए तो बाल काटने से पीड़ा नहीं होती, वह शरीर का मरा हुआ हिस्सा है। शरीर उसे बाहर फेंक रहा है। नाखून काटने से पीड़ा नहीं होती, वह मरा हुआ हिस्सा है।
आप जानकर चकित होंगे कि मुर्दे के भी बाल और नाखून बढ़ते हैं। मुर्दा भी रखा रहे, तो उसके बाल और नाखून बढ़ते रहते हैं, क्योंकि बाल और नाखून से जीवन का कोई संबंध नहीं है। वह शरीर का मरा हुआ हिस्सा है। मुर्दे का शरीर भी उस मरे हुए हिस्से को फेंकता रहता है।
सात वर्ष में आपके शरीर के सारे कोष्ठ बदल जाते हैं, नए हो जाते हैं। यह परिधि है आपकी। जो नदी की धार की तरह बहती चली जाती है। किसी दिन यह जन्मी थी और किसी दिन यह समाप्त भी हो जाएगी। लेकिन भीतर जो केंद्र है, वह जब आप एक छोटे से अणु थे, जो खाली आंख से देखा भी नहीं जा सकता, जिसे देखने के लिए खुर्दबीन चाहिए...। फिर कभी आप बच्चे थे, फिर जवान थे, कभी के थे और कभी फिर मिट्टी में गिर गए। वह सब शरीर के तल पर हो रहा है; केंद्र अछूता है। वह केंद्र ही सत्य है, यह परिधि आभास है। आभास इसे इसलिए कहते हैं कि इसको ही बहुत—से लोग सत्य मान लेते हैं। सत्य होने का भ्रम इससे पैदा होता है।
और ऐसा व्यक्ति के संबंध में ही नहीं, जीवन के समस्त रूपों के संबंध में सत्य है। ये जो वृक्ष खड़े हैं, इनको आप देखते हैं। इनके पत्ते हैं, इनकी शाखाएं है—ये वृक्ष का मूल नहीं हैं और न इस वृक्ष का केंद्र हैं, न ये इसकी आत्मा हैं। ये भी इसकी देह हैं। इस देह के भीतर छिपी है वैसी ही आत्मा, जैसी आपके भीतर छिपी है।
और भारत के मनीषी कहते रहे हैं कि कभी आप भी वृक्ष थे। आज आप मनुष्य हैं, वह परिधि का परिवर्तन है। आज जो वृक्ष है, कभी वह भी मनुष्य हो जाएगा। और यहां इतने वृक्ष खड़े हैं, ये भी सब एक जैसे नहीं हैं। इनके भी व्यक्तित्वों में भेद है। इनमें भी मूढ़ वृक्ष हैं, इनमें भी बुद्धिमान वृक्ष हैं। इनमें जो बुद्धिमान वृक्ष हैं, वे तीव्रता से गति कर रहे हैं, वृक्ष की परिधि को पार करके जीवन के और ऊंचे आयाम में प्रवेश करने के लिए। मनुष्यों में भी सभी मनुष्य एक जैसे नहीं हैं। मूढ़ हैं, जो जहां हैं वहीं ठहरे हुए हैं। जिन्होंने परिधि को पकड़ लिया है और उसी को सत्य मान लिया है। उनमें ज्ञानीजन हैं, जो उस परिधि को छोड्कर और श्रेष्ठतर जीवन के आयाम में प्रवेश का प्रयत्न कर रहे हैं।
रूपों के संबंध में ही नहीं, पूरे अस्तित्व को इकट्ठा भी लें, तो परमात्मा की जो परिधि है, उसका नाम माया है—आभास, एपियरेंस। संसार उसी परिधि का नाम है। और इस संसार के गहन गुह्य में छिपा हुआ जो केंद्र है, वही ब्रह्म है।
हम सभी रूप से, आकार से मोहित, सम्मोहित दौड़ते चले जाते हैं। जो व्यक्ति भी इस आकार के भीतर छिपे हुए निराकार की खोज में लग जाता है, उसे ही उपनिषद ब्राह्मण कहते हैं। ब्राह्मण कोई जन्म से नहीं होता। जन्म से कोई ब्राह्मण होकर समझ ले कि ब्राह्मण हो गया तो पागल है।
ब्राह्मण होना तो सतत साधना की उपलब्धि है। जन्म से तो सभी शूद्र पैदा होते हैं, सभी। इन शूद्रों में से कुछ ब्राह्मण हो जाते हैं, शेष शूद्र ही रह जाते हैं।
ब्राह्मण वही हो जाता है, जो परिधि को छोड्कर केंद्र की तलाश में लग जाता है, जो माया के आवृत को तोड़कर और ब्रह्म की खोज में लग जाता है। आंखे जिसे देख पाती हैं, उसमें उसकी उत्सुकता नहीं। जो अदृश्य है, जिसे आंखे नहीं देख पातीं, जिसे केवल विवेक की आंख देख पाती है, जिसे केवल अंतःप्रशा देख पाती है, उसकी खोज में जो लग जाता है, वह ब्राह्मण है। ये सूत्र कई अर्थों में कीमती हैं। इनमें हम प्रवेश करें—।
यह सबका आत्मरूप परमपुरुष समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी माया के परदे में छिपा रहने के कारण सबके प्रत्यक्ष नहीं होता। केवल सूक्ष्मतत्वों को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही अति सूक्ष्म तीक्षा बुद्धि से देखा जा सकता है।
लेकिन सूक्ष्म और तीक्ष्या बुद्धि से आप कहीं गलत न समझ लें। सूक्ष्म और तीक्ष्या बुद्धि से उपनिषदों का अर्थ, जिसे हम सामान्यत: सूक्ष्म और तीक्ष्या बुद्धि कहते हैं, उससे नहीं है। हम तो उस बुद्धि को सूक्ष्म और तीशा कहते हैं, जो गणित और तर्क में कुशल है; जो विवाद में कुशल है; जो किसी भी बात को खंड—खंड तोड़ने में कुशल है।
लेकिन उपनिषद उस बुद्धि को सूक्ष्म कहते हैं जो पवित्र है, जो शुद्ध है, जो शांत है। ये दोनों बिलकुल अलग धारणाएं हैं। उपनिषद उसे सूक्ष्म बुद्धि कहते हैं जो इतनी शुद्ध है कि जिसमें कोई विकार नहीं रह गया। क्योंकि विकार स्थूल कर देते हैं। निर्विकार बुद्धि का नाम सूक्ष्म बुद्धि है। एक भोले— भाले आदमी के पास हो सकती है सूक्ष्म बुद्धि। जरूरी नहीं है कि एक बड़े गणितज्ञ और एक तर्कशास्त्री के पास हो।
गणितज्ञ और तर्कशास्त्री के पास जो बुद्धि है, वह सूक्ष्म नहीं है। अगर ठीक से समझें, तो उसे कहना चाहिए, वह कुशल है। विचार करने की क्षमता उसके पास है, लेकिन निर्विचार की शुद्धि उसके पास नहीं है। दार्शनिक और संत में यही भेद है।
दार्शनिक किसी भी चीज को तोड़कर उसके भीतर प्रवेश करने की कोशिश करता है। संत अपने को शुद्ध करके—किसी को तोड़कर नहीं—अपनी शुद्धता के माध्यम से किसी में प्रवेश की कोशिश करता है। इसलिए बहुत बार ऐसा हो जाता है कि अपढ़ भी संत हो जाते हैं। और बहुत पढ़े —लिखे लोग भी संत नहीं हो पाते।
जीसस बढ़ई का बेटा है। कुछ भी शिक्षित नहीं है। तर्क में जीसस को कोई भी पराजित कर सकता है। रामकृष्ण दूसरी कक्षा तक पढ़े हैं। तर्क में कोई भी रामकृष्ण को पराजित कर सकता है। जिस अर्थ में हम बुद्धि को सूक्ष्म कहते हैं, और जिस अर्थ में पश्चिम के मनोवैज्ञानिक बुद्धि—अंक नापते हैं, आई क्यू. नापते हैं—उसमें रामकृष्ण कहीं टिकेंगे नहीं।
लेकिन रामकृष्ण के पास या कबीर के पास या नानक के पास या जीसस के पास एक और तरह की सूक्ष्मता है, जो शुद्धि की है, पवित्रता है। जैसे सुबह का नया खिला हुआ फूल हो। काटे की तरह तीक्ष्या नहीं है वह; किसी को चुभेगी भी नहीं। लेकिन एक फूल की पवित्रता है, एक निर्दोषता है। उस निर्दोषता की एक सूक्ष्मता है। वह सूक्ष्मता ही परम तत्व में प्रवेश कर पाती है।
तीक्ष्या बुद्धि जिसको हम कहते हैं, वैसा तीक्ष्या—बुद्धि व्यक्ति वैज्ञानिक हो जाएगा। वह पदार्थ को तोड़कर उसके रहस्यों को खोज लेगा, लेकिन आत्मा के जानने से वंचित रहेगा। जिसको उपनिषद सूक्ष्म बुद्धि कहते हैं, वैसा व्यक्ति तोडेगा नहीं, बिना तोड़े प्रवेश कर जाएगा। और निश्चित ही जब तोड़कर प्रवेश करना पड़े, तो बुद्धि आपकी बहुत सूक्ष्म नहीं है। क्योंकि जगह बनानी पडती है तब आप प्रवेश कर पाते हैं। बिना तोड़े जो प्रविष्ट हो जाए, उसकी सूक्ष्मता आत्यंतिक है।
यह भेद साफ समझ लेना चाहिए। क्योंकि इस भेद को साफ न समझने के कारण बड़ी अड़चन हुई है। कबीर को काशी के पंडित पूछते हैं कि तुम जब शास्त्र जानते नहीं, संस्कृत पढ़े नहीं, सिद्धातो का तुम्हें कुछ पता नहीं, तो तुम आत्मज्ञानी कैसे हो गए?
निश्चित ही काशी का कोई भी पंडित, साधारण से साधारण पंडित भी, कबीर से ज्यादा जानता था, शास्त्र की भाषा में। लेकिन कबीर के मुकाबले वे सब बुझे हुए दीए थे। वे कितना ही जानते हों और कबीर बिलकुल भी न जानता हो तो भी कबीर का होना सघन था। अस्तित्व सघन था। उनके पास होगी स्मृति, कबीर के पास थी आत्मा।
वह ज्योति जो कबीर के पास है, उसको सूक्ष्म बुद्धि उपनिषद कहते हैं। छोटे बच्चों के पास होती है; संतो के पास होती है। सरल—चित्त लोगों के पास होती है। इस सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा ही माया के पर्दे को कोई पार कर पाता है।
अगर कुशल बुद्धि हो तो माया के पर्दे को ही काटने में और समझने में उलझ जाता है। वह जो एपियरेंस है जो दिखाई पड़ रहा है, उसी के साथ उलझ जाती है साधारण बुद्धि। जो दिखाई पड़ रहा है उसको छोड्कर, जो नहीं दिखाई पड़ रहा है उस तक पहुंचने की क्षमता, मैंने कहा, प्रेम में है या प्रार्थना में है।
जब कोई व्यक्ति सच में ही प्रेम करे, या प्रेम में हो जाए, तो शरीर भूल जाता है। शरीर के पार सीधी छलांग लग जाती है। ऐसा ही प्रेम जब कोई सारे अस्तित्व से करता है तो उसका नाम प्रार्थना है।
ध्यान बुद्धि को सूक्ष्म करने की प्रक्रिया है। जैसे—जैसे आप ध्यान करते हैं, बुद्धि के विकार गिरते चले जाते हैं। एक घड़ी आती है जब बुद्धि परिशुद्ध हो जाती है। उसमें कुछ भी विकार, कोई भी फारेन एलिमेंट, कोई भी विजातीय तत्व नहीं रह जाता। विचार तक नहीं रह जाता। बुद्धि इतनी निर्मल हो जाती है कि विचार भी नहीं करती। सिर्फ होती है। सिर्फ एक ज्योति होती है। उस ज्योति में जरा भी धुआ नहीं होता। शुद्ध प्रकाश रह जाता है आलोक। उस शुद्ध आलोक से ही व्यक्ति माया के पर्दे में छिपे हुए ब्रह्म को जानने में समर्थ हो पाता है।
बुद्धिमान साधक को चाहिए कि पहले वाक् आदि समस्त इंद्रियों को मन में निरुद्ध करे उस मन को ज्ञानस्वरूप बुद्धि में विलीन करे ज्ञानस्वरूप बुद्धि को महान आत्मा में विलीन करे और उसको शांतस्वरूप परमपुरुष परमात्मा में विलीन करे।
यह प्रक्रिया है बुद्धि के सूक्ष्म और शुद्ध होने की। शुरू करना है वाक् से, वाणी से, विचार से, शब्द से। हमारी बुद्धि विकृत है, क्योंकि इतने विचारों का बोझ है! विचार ही विचार हैं। जैसे आकाश में बादल ही बादल छाए हों, आकाश खो जाए, दिखाई भी न पड़े, सूर्य का कोई दर्शन न हो, ऐसी हमारी बुद्धि है। विचार ही विचार छाए हैं। उसमें वह जो बुद्धि की प्रतिभा है, जो आलोक है, वह खो गया, छिप गया।
एक बादल हट जाए तो आकाश का टुकड़ा दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है। छिद्र हो जाएं बादलों में तो प्रकाश की रोशनी आनी शुरू हो जाती है, सूरज के दर्शन होने लगते हैं। ठीक ऐसे ही बुद्धि जब तक विचार से बहुत ज्यादा आवृत है.. और एक पर्त नहीं है विचार की, हजारों पर्तें हैं। जैसे कोई प्याज को छीलता चला जाए तो पर्त के भीतर पर्त, पर्त के भीतर पर्त। ठीक ऐसे विचार प्याज की तरह हैं। एक विचार की पर्त को हटाएं दूसरी पर्त सामने आ जाती है। दूसरे को हटाएं, तीसरी आ जाती है। एक विचार को हटाएं दूसरा विचार मौजूद है, दूसरे को हटाएं तीसरा मौजूद है।
यह पर्त दर पर्त विचार है। यह हमने जन्मों में इकट्ठे किए हैं, जन्मों—जन्मों में। यह धूल है जो हमारी लंबी यात्रा में हमारे मन पर इकट्ठी हो गई है। जैसे कोई यात्री रास्ते पर चले तो धूल इकट्ठी होती चली जाए। और उसने कभी स्नान न किया हो और यात्रा करता ही रहा हो, तो बहुत धूल इकट्ठी हो जाए, यात्री का पता ही न चले कि वह कहौ खो गया।
ध्यान स्नान है बुद्धि का। और जो ध्यान नहीं सम्हाल पा रहा है, उसकी बुद्धि कचरे से लद जाएगी, स्वाभाविक। प्रतिपल संस्कार पड़ रहे हैं, हर घड़ी। पूरे दिन में, वैज्ञानिक कहते हैं, कोई दस लाख संस्कार बुद्धि पर पड़ते हैं। आप सोच भी नहीं सकते कि दस लाख कहां से पड़ते होंगे। हर चीज का संस्कार पड़ रहा है। अभी मैं बोल रहा हूं यह संस्कार पड़ रहा है। पक्षी आवाज कर रहा है, वह संस्कार पड़ रहा है। एक कार का हार्न बजा, वह संस्कार पड़ा। वृक्ष में हवा दौड़ी, वह संस्कार पड़ा। पैर में एक चींटी ने काटा, वह संस्कार पड़ा। सिर में थोड़ी पीड़ा हुई, वह संस्कार पड़ा। पड़ रहे हैं दस लाख संस्कार दिनभर में, चौबीस घंटे में। और ये सब इकट्ठे होते जा रहे हैं।
यह संस्कार धूल है। और यह हम जन्मों से इकट्ठे कर रहे हैं। इसलिए बहुत पर्तें इकट्ठी हो गई हैं। जब आप सोए हैं, तब भी संस्कार पड़ रहे हैं। नींद लगी है आपकी, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि बुद्धि पूरे वक्त काम कर रही है। बाहर कोई आवाज होगी, नींद में भी संस्कार पड़ रहा है। गर्मी पड़ेगी, संस्कार पड़ रहा है। मच्छड़ आवाज कर रहे हैं, संस्कार पड़ रहा है। करवट बदली, संस्कार पड़ रहा है। गर्मी है, सर्दी है, पूरे समय बुद्धि इकट्ठा कर रही है, हर चोट। बुद्धि की क्षमता बहुत ज्यादा है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि अनंत संस्कार बुद्धि इकट्ठा कर सकती है। आपके इस छोटे—से सिर के भीतर कोई सात करोड़ सेल हैं। और एक—एक सेल अरबों संस्कार इकट्ठा कर सकता है। इसलिए कोई अंत नहीं है। सारी दुनिया का जितना ज्ञान है, वह—एक आदमी की बुद्धि में समाया जा सकता है।
ये जो इकट्ठी होती पर्तें हैं, इनके कारण आप आच्छादित हैं। इस आच्छादन को तोडना पड़ेगा। इस तोड़ने का प्रारंभ—बुद्धिमान साधक को चाहिए, पहले वाक् आदि समस्त इंद्रियों को मन में निरुद्ध करे।
इसलिए मौन का इतना मूल्य है। मौन का अर्थ है, आप बाहर और भीतर बोलना बंद कर रहे हैं। क्योंकि बोलना बुद्धि की बड़ी गहरी प्रक्रिया है। बोलने के द्वारा बुद्धि बहुत कुछ इकट्ठा करती रहती है। और जो भी आप बोलते हैं, वह आप सिर्फ बोलते नहीं हैं, बोला हुआ आप सुनते भी हैं, उसके संस्कार और सघन हो जाते हैं।
जब आप एक ही बात बार—बार बोलते रहते हैं, तो आपको पता नहीं कि आप बार—बार सुन भी रहे हैं। संस्कार गहरे होते जा रहे हैं। और आप कचरा बोलते रहते हैं। सुबह अखबार पढ़ लिया, फिर दिनभर उसी को लोगों को बोले चले जा रहे हैं। कोई व्यर्थ की बात, जिसका कोई भी मूल्य नहीं, जिससे किसी को कोई लाभ नहीं होगा, उसको आप बोले चले जा रहे हैं। अगर आप अपने चौबीस घंटे का विश्लेषण करें, तो आप पाएंगे कि निन्यानबे प्रतिशत तो कचरा था, जो आप न बोलते तो किसी का कोई हर्ज न था।
ध्यान रहे, जिसे बोलने से किसी को कोई लाभ नहीं हुआ है, उसे बोलने से हानि निश्चित हुई है। क्योंकि न केवल आपने दूसरे के मन में कचरा डाला है—जो कि हिंसा है, जिसका कोई मूल्य नहीं है वह आप बोलकर दूसरे के मन में डाल दिए हैं—जब आप बोल रहे थे तो आपने फिर से सुन लिया है। वह आपके भीतर दुबारा गहरा हो गया। उसके फिर से संस्कार पड़ गए, फिर कंडीशनिंग हो गई।
अगर आप एक असत्य को भी बार—बार बोलते रहें, तो आप खुद ही भूल जाएंगे कि वह असत्य है। इतने संस्कार भीतर पड़ जाएंगे कि वह लगने लगेगा कि सत्य है। एडोल्फ हिटलर ने कहा है कि कोई भी असत्य को सत्य करना हो तो एक ही तरकीब है, उसे बोले चले जाओ। दूसरे ही मान लेंगे ऐसा नहीं है, आप खुद भी मान लेंगे।
आप अपनी जिंदगी में देखें, कई असत्य आपको सत्य मालूम पड़ने लगे हैं, क्योंकि आप इतने दिनों से बोल रहे हैं कि अब आपको भी स्मरण नहीं रहा कि पहले दिन यह बात असत्य थी। बहुत बार संस्कार पड़ जाने से गहरे हो जाते हैं; लीक बन जाती है। 
पहला काम है साधक के लिए कि वह वाणी को संयत कर ले। वही बोले जो बिलकुल अनिवार्य हो, अपरिहार्य हो, जिसके बिना चल ही न सकेगा।
यह दुनिया बड़ी शांत हो जाए, अगर लोग अपरिहार्य को बोलें, व्यर्थ को न बोलें। और व्यर्थ को बोलकर बड़ी झंझट में पड़ते हैं। क्योंकि बोलकर आप ही थोड़े ही बोलते हैं, दूसरा जवाब भी देगा।
थोड़ा आप सोचें कि अगर आप संयत रहे होते, मौन रहे होते, तो कितने उपद्रव आपके जीवन से बच गए होते! बोलकर आप न मालूम कितने उपद्रवों में पड़ रहे हैं। फिर उनको बचाने के लिए और बोलना पड़ता है। फिर यह सिलसिला बढ़ता चला जाता है। एक विसियस सर्किल है, एक दुष्टचक्र है, जिसका फिर कोई अंत नहीं है।
इसलिए साधु चुप हो जाता है। उतना ही बोलता है, जितना अनिवार्य है। और उतना ही बोलता हैं, जिससे किसी का हित हो सके। अन्यथा मौन रह जाता है।
वाणी को जब आप बाहर से रोकेंगे, तो भी जरूरी नहीं कि भीतर रुक जाए, क्योंकि आप दूसरे से न बोलें तो खुद से बोलते रहते हैं! बैठे हैं और खुद ही से बात चल रही है। यह खुद ही से चलने वाली बात भी संस्कार निर्मित करती है। क्योंकि जब आप अपने से बोल रहे हैं तब भी मन सुन रहा है। और जो भी आप बोल रहे हैं, उसकी आप लकीर जोर से खोद रहे हैं अपने भीतर। खुद से भी बोलना बंद करें।
वाणी बड़ा उपद्रव है। जरूरी नहीं है कि उपद्रव ही हो, हमने उपद्रव बना लिया है। भीतर भी धीरे— धीरे बोलना बंद करें। चुप्पी साधें, मौन को फैलने दें। जितना—जितना मौन फैलेगा, उतना—उतना मन विसर्जित होता चला जाएगा। जैसे—जैसे मौन घना होगा, वैसे—वैसे बादल तिरोहित होने लगेंगे। जगह—जगह से छिद्र टूटने लगेंगे और रोशनी भीतर की आने लगेगी।
धर्म का, सारे धर्मों का आधार मौन है। महावीर बारह वर्ष मौन रहे। बुद्ध ने अनेक—अनेक दिन मौन में बिताए। जीसस बोलने के पहले मौन में चले गए। मुहम्मद को कुरान का अवतरण हुआ, जब वे परम मौन की अवस्था में थे। इस जगत में जो भी सत्य का अवतरण हुआ है, वह तब हुआ है जब भीतर चुप्पी है, सब शांत है।
उस शांत क्षण में ही हमारा तालमेल हमारी टधूनिंग ब्रह्म से जुड़ जाती है। वह मौन का कांटा ही हमें आभास से भीतर ले जाता है और सत्य से जोड़ देता है। इसलिए हमने साधु को मुनि कहा है। मुनि का अर्थ है. जो मौन हो गया है। जो भीतर चुप हो गया है।
असल में वही बोलने का अधिकारी है, जो भीतर चुप हो गया हो। क्योंकि उसके बोलने का कुछ मूल्य होगा। क्योंकि बोलने का अर्थ होगा। उसने कुछ जाना है, जिसे वह दे रहा है। जो चुप नहीं है, वह बोलने का अधिकारी नहीं है। जो भीतर बोले चला जाता है, उसका बोलना एक बीमारी है।
आप जब दूसरों से बात करते हैं, तो आप सच में उनसे बात नहीं कर रहे हैं, आप अपने को उलीचना चाहते हैं। इसलिए कोई न मिले आपको सुनने को, तो बेचैनी शुरू हो जाती है। बातचीत, बकवास के लिए कोई चाहिए। लेकिन दूसरा भी आपकी बकवास इसीलिए सुन रहा है कि जब तुम चुप होओगे, तो वह भी शुरू करेगा। और कोई प्रयोजन सुनने का नहीं है।
मैंने सुना है कि एक सभा में एक नेता व्याख्यान कर रहा था, लेकिन धीरे— धीरे लोग उठकर जाते गए। व्याख्यान पूरा होते—होते एक ही आदमी बचा। उस नेता ने कहा, धन्यवाद तुम्हारा। इस गांव में लोग बिलकुल नासमझ मालूम पड़ते हैं। एक तुम ही बुद्धिमान हो उसने कहा, ऐसा कुछ भी गी। असल में आपके बाद मेरे बोलने की बारी है। आपको सुनने को नहीं रुका हूं। मेरा भी व्याख्यान होने वाला है, इसी सभा में।
कोई किसी को सुन नहीं रहा है। किसी को किसी से सुनने का प्रयोजन नहीं है। सुनना पड़ता है, क्योंकि बोलना है। सुनना रिश्वत है। जब आप किसी की बात सुन रहे हैं, तब अपने भीतर देखना—आप प्रतीक्षा कर रहे हैं, कब ये सज्जन चुप हौं। और अगर कोई सज्जन चुप ही न हों, तो आप कहते हैं, बिलकुल बोर है। बोर का मतलब, आपको बोर करने का उसने बिलकुल मौका नहीं दिया! अपनी ही बोले चला जा रहा है। आप अपनी बोलना चाहते थे, उसने आपको मौका ही नहीं दिया। जौ सुसंस्कृत लोग हैं, वे आपको बोर भी करते हैं और आपको भी बोर करने का मौका देते हैं। थोड़ा बोलते हैं, थोड़ा आपको बुलवाते हैं। इससे सत्संग बना रहता है। इससे आप घबड़ाते भी नहीं। यह लेन—देन है। लेकिन यह बीमारी है।
अगर बोलना आपकी मजबूरी हो और आपको बोलने में राहत मिलती हो, कि आप हल्के होते हैं, तो समझना कि आप जो बोल रहे हैं, वह कचरा है। इससे किसी का कोई लाभ होने वाला नहीं है।
हम अपना कचरा दूसरे में डालते हैं; दूसरे अपना कचरा हममें डालते हैं। दोनों के पास कचरा बढ़ जाता है! कचरा घटना चाहिए। इसलिए अगर साधक को बहुत बार जंगल में भाग जाना पड़ा है, तो वह आपसे कम भागा है, आप जो कचरा उसके ऊपर उंडेलते हैं, उससे ज्यादा भागा है। जंगल में मौन होने को उसे सुविधा मिल गई।
लेकिन जंगल भागने की जरूरत नहीं है। अगर समझ हो तो आप यहीं धीरे— धीरे मौन होते जा सकते हैं। एक बात भर स्मरण रखें; व्यर्थ न बोलें।
जब तक पक्का न हो जाए कि इससे किसी का लाभ होगा, तब तक न बोलें। जब तक ऐसा न लगे कि यह बोलना बिलकुल ही अनिवार्य है, तब तक न बोलें। और भीतर भी धीरे— धीरे बोलने की प्रक्रिया को शांत करें। जब मन बोलने लगे, तो आप उसको कोआपरेट न करें, सहयोग न दें। आप दूर खड़े हो जाएं, और कहें कि बोलो, लेकिन मैं कोई साथ न दूंगा। मैं साक्षी रहूंगा। मैं देखता रहूंगा कि तुम बोल रहे हो, लेकिन तुम्हारा कोई रस नहीं लूंगा। तटस्थ हो जाएं। एक उपेक्षा भीतर बना लें।
बुद्ध ने कहा है कि साधु के लिए भीतरी उपेक्षा बड़ी जरूरी है। उपेक्षा का मतलब है इनडिफरेंस। उसका मतलब है कि चल रहा है मन, ठीक है, चलने दो, लेकिन हमें कोई प्रयोजन नहीं है। हम इसमें बीच में उतरकर रस न लेंगे।
ध्यान रहे, मन तभी तक चलता है, जब तक आप उसमें रस लेते हैं। रस दो तरह के हैं, या तो पक्ष में हों, या विपक्ष में हों। दोनों रस हैं।
आपके मन में कोई विचार चल रहा है, आप उसके पक्ष में हैं, तो आप उसमें जुड़ जाते हैं। आप विचार के साथ बहने लगते हैं। आप विचार को प्राण दे रहे हैं, क्योंकि विचार अपने आप में निर्जीव है, आपका साथ हो तो सजीव हो जाता है। या आप उसके दुश्मन हो जाएं। जब आप दुश्मन हो जाते हैं, तब भी आप प्राण देते हैं। यह जरा कठिन समझ में आएगा। क्योंकि जब आप किसी विचार के दुश्मन हो जाते हैं, तब आपने लड़ना शुरू कर दिया। आपने संघर्ष शुरू कर दिया। संघर्ष का मतलब है कि आप विचार में रस ले रहे हैं। दुश्मन का रस, लेकिन रस ले रहे हैं।
न मित्र, न शत्रु—उपेक्षा। कि ठीक है, चलो। न तुम्हारे चलने में मेरी उत्सुकता है, न तुम्हारे न—चलने में मेरी उत्सुकता है। तुम चलो तो ठीक, तुम न चलो तो ठीक; मैं दूर खड़ा हूं। ऐसे तटस्थ— भाव को जो साधता है, उसे भीतर मौन उपलब्ध हो जाता है।
वाक् आदि इंद्रियों को मन में निरुद्ध करके...।
तब वाणी मन में खो जाती है। तब शब्द निर्मित नहीं होते हैं। मन शून्य हो जाता है। लेकिन वाक् ही अकेला नहीं है। वाक् आदि इंद्रियों में वाक् प्रमुख है। लेकिन और इंद्रियां भी यही काम कर रही हैं।
आप जबान से नहीं बोलते, आंख से भी बोलते हैं। आंख से इशारा करते हैं, आंख से वासना पता चल जाती है। आंख से उपेक्षा पता चल जाती है, मित्रता पता चल जाती है, शत्रुता पता चल जाती है। आंख से भी मत बोलें।
और आप कान से ही नहीं सुनते, आंख से भी बहुत—सी बातें सुनते हैं। आंख से भी पकड़ते हैं संस्कार। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि आदमी उठते, चलते हर वक्त बोलता है, न बोल रहा हो तो भी। शरीर से भी बोलता है। उसके उठने, बैठने, चलने के ढंग से भी प्रगट करता है।
पश्चिम में बड़ी खोज चल रही है बॉडी लैंग्वेज पर, शरीर की भाषा पर। अगर आप किसी के प्रति प्रेम से भरे हैं, तो आप उसके पास झुककर खड़े होते हैं। अगर एक स्त्री आपसे बचना चाहती है, तो वह पीछे की तरफ झुककर खड़ी होगी जब आपसे बात करेगी, अगर आपसे नहीं बचना चाहती, तो आगे की तरफ झुककर खड़ी होगी। वह बोल रही है।
अगर आप जरा शरीर की भाषा समझें, तो आप समझ सकते हैं कि यह स्त्री आपके प्रेम में पड़ना चाहती है कि आपसे बचना चाहती है। कुछ बिना कहे, सिर्फ उसका शरीर बता देगा। अगर कोई स्त्री आपके प्रेम में पड़ना चाहती है, तो दोनों पैर अलग रखकर बैठेगी। अगर वह आपसे बचना चाहती है, तो वह एक—दूसरे पैर के ऊपर पैर रखकर बैठेगी। वह खबर दे रही है कि मेरे द्वार बंद हैं।
आप ट्रेन में चल रहे हैं, आसपास लोगों को बैठे हुए देखें। आप हैरान होंगे। सबके शरीर कुछ खबर दे रहे हैं। प्रतिपल इशारा कर रहे हैं। आप वाणी से ही नहीं बोलते, कान से ही नहीं सुनते, पूरे शरीर से भी सुनते हैं; पूरे शरीर से भी बोलते हैं। आप थोड़ा—सा अपने पर ध्यान देंगे तो आपको ख्याल में आना शुरू हो जाएगा कि आपका शरीर भी इशारा करता है।
इसलिए बुद्ध ने मुद्राओं पर बड़ा जोर दिया है। यह बॉडी लैंग्वेज, शरीर की भाषा का सवाल है। बुद्ध को आप बैठे देखते हैं। वे जिस ढंग से बैठे हैं, उस बैठने पर आपने शायद कभी विचार न किया हो। वह बैठना बता रहा है, वे इस ढंग से बैठे हैं, जैसे अपने में पूरे हैं। जैसे अपने से बाहर जाने की कोई इच्छा नहीं है। अपने से बाहर जिसे कोई उत्सुकता नहीं है। अपने में घिरे, एक वर्तुल के भीतर, शांत। उनके बैठने का जो ढंग है, वह बता रहा है कि उनकी दूसरे में कोई इच्छा, कोई उत्सुकता, कोई वासना नहीं है।
आप बैठे हों, खड़े हों, सोए हों, हर हालत में आप खबर दे रहे हैं। भीतर का मन इंगित कर रहा है, इशारे कर रहा है। आप किसी आदमी का हाथ हाथ में लेते हैं, आपका हाथ, आपके हाथ की गर्मी, आपके हाथ से दौड़ती हुई जीवन की धारा, कई खबरें देती है।
जब आप किसी का हाथ प्रेम से हाथ में लेते हैं, तब आपके हाथ की गर्मी और होती है। तब आपके हाथ से जीवन—ऊर्जा उस दूसरे हाथ में दौड़ती हुई होती है, स्वागत करती हुई होती है।
जब आप बेमन से किसी का हाथ हाथ में लेते हैं, तो आपके हाथ में कोई गर्मी नहीं होती। ऊर्जा जाती हुई नहीं होती, भीतर की तरफ खिंची हुई, लौटती हुई होती है। हाथ ठंडा होता है। उसमें कोई स्वागत, कोई स्वीकार नहीं होता। 
प्रतिपल सारी इंद्रियों से हम बोलते हैं और सारी इंद्रियों से सुनते हैं।
अहंकारी आदमी की नाक बता देगी कि कितना अहंकार भीतर है। आंख बता देगी कि वह आपको तुच्छ समझता है, दो कौड़ी का समझता है। उसके खड़े होने, उठने का ढंग बता देगा कि तुम कुछ भी नहीं हो। आपने कभी खयाल किया, जब आप अपने घर में अपने नौकर के पास से गुजरते हैं, तो आपके गुजरने का ढंग दूसरा होता है। जब आप अपने मालिक के पास से गुजरते हैं, तो गुजरने का ढंग दूसरा होता है। शरीर की भाषा बदल जाती है।
नौकर के पास से आप ऐसे गुजरते हैं, जैसे वह है ही नहीं, ना—कुछ। उसकी मौजूदगी कोई अर्थ नहीं रखती। वह कोई आदमी नहीं है, कोई यंत्र है। जब आप मालिक के पास से गुजरते हैं, तो आप ऐसे गुजरते हैं जैसे मैं बिलकुल नहीं हूं र तुम ही हो! यह सब कहा नहीं जाता, लेकिन यह सब समझा जाता है। इसको कहने की कोई भी जरूरत नहीं है।
पति घर में प्रवेश करता है और वह जानता है कि आज पत्नी कलह करेगी कि नहीं। प्रवेश करते ही! उसके खड़े होने का, बैठने का, उसके चेहरे का, उसकी आंख का ढंग, उसका जोर से बर्तन रखना कि आहिस्ता बर्तन रखना, सब बता देता है।
मनसविद कहते हैं कि घर में जिस दिन पत्नी पीड़ित है, दुखी है, परेशान है, उस दिन छह गुनी ज्यादा आवाजें होती हैं। बर्तन गिरते हैं, चीजें जोर से रखी जाती हैं। कुछ उसे पता नहीं, लेकिन भाषा है, वह प्रगट कर रही है अपनी भाषा से।
वह कह रही है कि आज सब अस्तव्यस्त है, सब अराजक है। जब पत्नी प्रेम में होती है तो घर में आवाजें बिलकुल नहीं होतीं। चीजें आहिस्ता से रखी जाती हैं, प्रीति से रखी जाती हैं। वह जो पति पर प्रेम है, या घृणा है, वह चीजों पर भी प्रगट होती है। उसके सारे व्यक्तित्व का जो तरंगायित रूप है, जो वायब्रेशस हैं, वे सब बदल जाते हैं। पति घर में प्रवेश करते ही जान लेता है कि हवा कुछ और है। तापमान ठीक नहीं! इसके लिए न कहना पड़ता है, न बताना पड़ता है।
ऋषि कह रहा है इस उपनिषद में यम के द्वारा कि पहले वाक् आदि समस्त इंद्रियों को मन में निरुद्ध करके..। सारी इंद्रियों को उनकी भाषा से मुक्त करके। कोई इंद्रिय कुछ भी न कहे। किसी इंद्रिय से कुछ भी प्रगट न हो, किसी इंद्रिय में कोई गति न हो, कोई हलन—चलन न हो। सारी इंद्रियां मन में लीन हो जाएं। फिर उस मन को, ज्ञानस्वरूप बुद्धि में विलीन करके..। फिर यह जो मन शेष रह जाएगा मौन, इस मौन मन को और भीतर ले जाना है।
जैसे इंद्रियों के पीछे मन है, ऐसे मन के पीछे बुद्धि है, विवेक है। सिर्फ मौन रहना काफी नहीं है। इस मौन में जागना भी जरूरी है। वह जागना बुद्धि में ले जाएगा। तो पहले मौन हो जाना जरूरी है, ताकि ऊर्जा व्यर्थ न हो, भटके न बाहर, अपव्यय न हो। और जब ऊर्जा संगृहीत होने लगे, तो इस ऊर्जा को सजग करना जरूरी है, होशपूर्वक। भीतर एक होश जगाना जरूरी है कि कुछ भी हो, मैं जागा हुआ देखूं। मैं एक शिकार न रहूं र बल्कि एक द्रष्टा हो जाऊं। क्रोध आए तो मैं देखूं कि क्रोध आया, उठा, छा गया, फिर विलीन होने लगा। क्योंकि कोई चीज स्थिर तो नहीं है।
बुद्ध ने कहा है, चीजें आती हैं, रुकती हैं, चली जाती हैं। तुम जरा जल्दी करके उलझ जाते हो। थोड़ा रुको और थोड़ा देखते रहो। क्रोध उठा, कोई क्रोध शाश्वत तो है नहीं, सदा रहेगा नहीं। थोड़ा धैर्य रखो, उठने दो। बुद्ध कहते हैं, आंख बंद कर लो, देखो कि क्रोध पूरे शरीर पर धुएं की तरह फैल गया; रोआ—रोआ उत्तप्त हो गया। देखो, जल्दी मत करो। थोड़ी देर में पाओगे कि जो धुएं की तरह उठा था, वह धुएं की तरह ही लीन भी होने लगा, खोने भी लगा। शरीर का उत्ताप वापस लौट आया अपनी जगह पर। हृदय की धड़कन अपनी जगह आ गई। अब बादल विसर्जित हो गए। तुम जरा रुको, और देखते रहो। क्रोध आएगा और चला जाएगा, और तुम अछूते रह जाओगे।
और एक बार भी कोई व्यक्ति किसी एक वासना को देखने में समर्थ हो जाए, तो समस्त वासनाओं से मुक्त हो जाता है। क्योंकि कुंजी उसके हाथ में आ गई। अधैर्य के कारण हम उलझ जाते हैं, बड़ी जल्दी कर  लेते हैं।
गुरजिएफ का बाप मरा तो उसने गुरजिएफ को कहा कि तू एक वचन दे दे, कि जब भी तुझे क्रोध आए, तो तू चौबीस घंटे बाद उसका जवाब देना। कोई गाली दे, तो तू चौबीस घंटे बाद जाकर जवाब देना। गुरजिएफ ने कहा, यह भी बड़ी अजीब बात है! लेकिन आप कहते हैं..। मरते हुए पिता—तो उसने स्वीकार कर लिया।
फिर बाद में गुरजिएफ ने कहा कि मेरी पूरी जिंदगी बदल दी मेरे मरते बाप ने। क्योंकि चौबीस घंटे बाद कोई मतलब ही नहीं रह जाता। किसी ने गाली दी, अब उससे उसको कहकर आना पड़ता है कि ठहरिए, मैं जरा पिता को वचन दे दिया हूं र चौबीस घंटे बाद आकर जवाब दूंगा। पर चौबीस घंटे में बात इतनी राख हो जाती कि कई बार तो ऐसा लगने लगता कि उसकी गाली बिलकुल सही थी, जाकर धन्यवाद दे आएं, आदमी मैं ऐसा ही हूं। कई बार ऐसा लगता है कि उसने गाली दी, यह उसके भीतर का रोग है, इससे मेरा क्या प्रयोजन? मैं तो सिर्फ निमित्त था।
लेकिन गुरजिएफ ने कहा, ऐसा मौका कभी नहीं आया कि मैं चौबीस घंटे बाद जाकर गाली का उत्तर दिया हूं। चौबीस घंटा बहुत वक्त है; चौबीस क्षण भी अगर आप रुक जाएं, जिंदगी दूसरी होने लगेगी। मौन को जागरण बनाना है, और मन को बुद्धि में, विवेक में विसर्जित कर देना है।
फिर ज्ञानस्वरूप बुद्धि को महान आत्मा में विलीन करे।
फिर यह जो जागरण है, फिर यह जो विवेक है, यह जो अवेयरनेस है, यह भी अंत नहीं है। क्योंकि इस जागरण के लिए भी चेष्टा करनी पड़ती है। और जो भी चेष्टित है, वह स्वभाव नहीं बन पाता। जिसमें भी प्रयास करना पड़ता है, वह ऊपर—ऊपर ही रह जाता है। इसकी भी कोशिश करनी पड़ती है। भीतर साधना साधना पड़ता है। जागे रहो, होश रखो, यह भी द्वंद्व है। एक तरह का संघर्ष है।
उपनिषद कह रहा है कि फिर इस संघर्ष को भी, इस चेष्टा को, आत्मा में लीन करना। आत्मा का अर्थ है. बीइंग, और चेष्टा का अर्थ होता है : डूइंग, जो भी हम करते हैं, वह। और आत्मा का अर्थ होता है, जो है, जिसको करना नहीं पड़ता, जिसमें कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। इस जागरूकता को आत्मा में लीन करने का अर्थ है, यह स्वभाव बन जाए। इसकी कोई चेष्टा न करनी पड़े। यह रहे, इसको साधना न पड़े। जिसको भी साधना पड़ता है, वह कृत्रिम है, वह ऊपर—ऊपर है। जरा ही छोड़ देंगे, खो जाएगा।
एक सूफी फकीर को मेरे पास लाया गया। उस सूफी फकीर को सभी जगह परमात्मा के दर्शन होते थे कोई तीस वर्ष से निरंतर। उसके भक्त थे। और भक्तों ने कहा कि आदमी अनूठा है। वृक्ष हो, कि पत्थर हो, कि पहाड़ हो, सब जगह इसे परमात्मा के दर्शन होते हैं। मैंने उस सूफी को कहा कि तुम अभी भी इसकी चेष्टा तो नहीं करते हो? उसने कहा, क्या मतलब? यह परमात्मा को देखने की चेष्टा तो नहीं करते हो? मैंने कहा, तीन दिन तक तुम चेष्टा छोड़ दो, और फिर भी अगर परमात्मा दिखाई पड़ता रहे, तो समझना कि कुछ हुआ। अन्यथा चेष्टा से अगर दिखाई पड़ता रहे तो अभी कुछ भी नहीं हुआ।
तीन दिन बाद वह फकीर मुझ पर बहुत नाराज हो गया। उसने कहा कि मेरी तीस साल की साधना खराब कर दी। मुझे वृक्ष में फिर वृक्ष दिखाई पड़ने लगा! मैंने कहा, कुछ खराब नहीं हुआ, जो था ही नहीं वही खोता है। तुम चेष्टा कर—करके देख रहे थे, तीस साल में आदत हो गई थी। वह आदत थी, अनुभव नहीं था। आदत और अनुभव में बड़ा फर्क है। आदत ऊपर से थोपी गई व्यवस्था है, अनुभव भीतर से आया हुआ प्रवाह है।
इसलिए चेष्टा से जो जागरूकता सधती है, वह अंतिम नहीं है। प्रारंभ में तो चेष्टा करनी पड़ेगी, लेकिन जल्दी ही उसे निश्चेष्ट आत्मा में लीन कर देना है। उसे भी भूल जाना है। उसकी भी याद नहीं रखनी है। वह रहे सहज। इसका ही स्मरण रखना है कि बिना चेष्टा के सहज रहे। यहंहो जाता है।
अगर मन की सारी ऊर्जा इकट्ठी हो जाए, तो वह ऊर्जा विवेक बन जाती है। विवेक जब पूरी तरह जगने लगता है, तो उसे सहज कर लेना कठिन नहीं है। ऐसे ही जैसे कि आप तैरना सीखते हैं। जब पहले सीखते हैं, तो वह चेष्टा होती है। जब सीख जाते हैं, तो फिर स्वभाव—आदत नहीं। यही फर्क है। क्योंकि अगर तैरना आदत हो, तो आप तीस वर्ष के बाद फिर दुबारा तैरें तो आपको फिर सीखना पड़ेगा। तीस साल में आदत टूट जाएगी। लेकिन आप तीन सौ जन्मों के बाद भो, अगर आपको होश हो कि आप एक दफा तेरे हैं, तो फिर कोई सीखने की जरूरत नहीं। आप पानी में गए कि आप तैरने लगौ।
तैरना कोई कभी भूल नहीं सकता। एक दफा जान लिया, स्वभाव बन जाता है। उसको मूलने का कोई उपाय नहीं। दुबारा सीखने की कभी कोई जरूरत नहीं पड़ती। आदत तो छूट जाती है। आप किसी चीज की आदत बना लें, फिर कुछ दिन अभ्यास न करें, छूट जाएगी। लेकिन स्वभाव नहीं छूटता।
विवेक जब पूरी तरह जगता है, तो धीरे— धीरे उसकी चेष्टा छोड़ते जाना है, और निश्चेष्ट विवेक को साधना है। विवेक बना रहे, यह देखना है। कोशिश न करनी पड़े। कोशिश हटा देनी है। कोशिश के हट जाने पर एफर्टलेस अवेयरनेस, तब प्रयत्नरहित विवेक सधता है। वह आत्मा में लीन हो जाना है। लेकिन आत्मा भी अंत नहीं है।
उसको भी शांतस्वरूप परमपुरुष परमात्मा में विलीन करे
अब क्या बचा विलीन करने को? पहले वाणी थी, शब्द थे, इंद्रियां थीं, उन्हें लीन किया। मन बचा—मौन मन बचा, फिर उस मौन मन को लीन किया, विवेक बचा। फिर उस विवेक को लीन किया, शुद्ध अस्तित्व—आत्मा बची। अब इसको किसमें लीन करे? और अब बचा क्या?
आत्मा के बचने का अर्थ है, अभी भी मुझे खयाल है कि मैं हूं — अस्मिता। एक सूक्ष्म, शुद्ध अहंकार अभी भी बचा—कि मैं हूं। इसको भी लीन कर दें—मैं नहीं हूं। इसका नाम है परमात्मा में लीन करना। इतना भी खयाल न रह जाए कि मैं हूं। होना तो बचेगा, लेकिन मेरा होना नहीं बचेगा। उस शुद्ध होने का नाम, जहां मैं का कोई भाव नहीं उठता, परमात्मा है। वह आपके भीतर है केंद्र। वहा कोई मैं का भाव नहीं, कोई इगो, कोई अस्मिता नहीं है। यह परम उपलब्धि है।
और यम कह रहा है— हे मनुष्यो। उठो जागो और श्रेष्ठ महापुरुषों को पाकर उनके पास जाकर उनके द्वारा उस परब्रह्म परमेश्वर को जान लो क्योकि ज्ञानीजन उस तत्वशान के मार्ग को छुरे की तीक्षा की हुई दुस्तर धार के सदृश दुर्गम बतलाते हैं।
निश्चित ही जैसे —जैसे हम भीतर प्रवेश करते हैं, वैसे —वैसे मार्ग दुर्गम होता जाता है, सूक्ष्म होता जाता है—नाजुक। जरा—सी भूल और आप भटक जाएंगे। जैसे —जैसे मार्ग भीतर जाता है, वैसे—वैसे रहस्यपूर्ण होता जाता है। और जैसे—जैसे मार्ग भीतर जाता है, वैसे—वैसे आप अकेले होते जाते हैं।
इस भीतर के रास्ते पर भी किसी का साथ मिल जाए...। वह साथ किसका हो सकता है? वह उसका हो सकता है, जो भीतर ठीक अपने केंद्र पर स्थापित हो गया हो, जो पूरी तरह अपने केंद्र को पा लिया हो; जो इस मार्ग से गुजर चुका हो, जो इस मार्ग की कठिनाइयां, भटकन, उलझाव जानता हो; जो इस मार्ग के पास से गुजरने वाले दूसरे मार्ग जानता हो, जिन पर भटक जाने की बहुत संभावना है।
जैसे आप एक पहाड़ी यात्रा पर जाते हैं। तो दो तरह के उपाय हो सकते हैं। या तो आप एक नक्यग़ ले लें। पहाड के सारे मार्गों का, सारे मोड़ों का, भटकाव का, खाई—खड्ड का, उलझन का, सारा नक्यग़ ले लें। और नक्यग़ लेकर पहाड़ पर चल पड़े। शास्त्रों के अनुसार जो लोग चलते हैं ?r वे नक्यग़ लेकर चलते हैं। लेकिन ध्यान रहे, नक्यग़ मुर्दा है। और नक्यग़ कभी भी गाइड का काम पूरा नहीं कर सकता।
एक पहाड़ी आदमी, जो पढ़ा—लिखा भी न हो, जिसको नक्यग़ देखना भी न आता हो, जिसे शास्त्र का कोई पता भी न हो, अगर पहाड़ का रहने वाला निवासी आपको गाइड की तरह मिल जाए तो हजार नक्ययें से बेहतर है। क्योंकि सारी भूमि उससे परिचित है। उसे कोई हिसाब लगाने की जरूरत नहीं। वह उस भूमि में बड़ा हुआ है, पला है। वह उस भूमि के रत्ती—रत्ती से वाकिफ है। वह पर्वत, वह पहाड़ उसके लिए मित्र है। मूलने— भटकने का कोई सवाल नहीं है।
वेद भी उतना काम न देंगे, कबीर जैसा बेपढा—लिखा गाइड भी काफी है, वह उस भूमि के चप्पे—चप्पे से परिचित है। वह वहां हुआ है, वहां बढ़ा, वहां प्रवेश पाया है। वह उस आखिरी मंजिल तक हो आया है, जहां तक रास्ते ले जा सकते हैं।
जीवित गुरु मिल सके, तो मुर्दा शास्त्रों की कोई भी कीमत नहीं है।
शास्त्रों के साथ एक और बड़ी कठिनाई है। और वह कठिनाईयह है कि शास्त्रों का अर्थ आप लगाएंगे। नक्यग़ भी आपके हाथ में हो, तो भी नक्यो की व्याख्या तो आप ही करेंगे। और आप क्या व्याख्या करेंगे? आप वही अर्थ निकाल लेंगे जो आप निकाल सकते हैं। आपका अर्थ आपसे बड़ा तो नहीं हो सकता।
इसलिए जितने लोग गीता पढ़ते हैं, उतने ही अर्थ होते हैं। जिस भांति का आदमी गीता पड़ेगा, उसी भांति का अर्थ निकाल लेगा। वह अर्थ कृष्ण का कभी भी नहीं हो सकता। वह अर्थ आपका ही होगा। तो गीता से आप कहां जाएंगे? क्योंकि अर्थ आप अपना निकाल लेंगे। वह अर्थ कृष्ण का होता तो शायद आप कहीं जा भी सकते थे।
इसलिए शास्त्र सार्थक नहीं हो पाते। शास्त्र तो बहुत हैं। नक्यो कितने हैं! कोई तीन सौ धर्म हैं जमीन पर, तो तीन सौ नक्यो हैं परमात्मा तक जाने के। लेकिन कोई नक्यग़ काम नहीं आ रहा है। सबके पास नक्यो हैं, सब अपना—अपना नक्यग़ लेकर बैठे हुए हैं! लेकिन नक्यो का अर्थ वह खुद ही निकालना पड़ता है। नक्यो की भाषा...।
नक्या। तो प्रतीक है। नक्यग़ कोई असली चीज तो नहीं है। नक्यो के हाथ में होने से कुछ भी नहीं होता। कई बार तो यह भी हो सकता है कि नक्यग़ ही भटकाने का कारण हो जाए। बिना नक्यो के शायद आप पहुंच भी जाते। र्क्योंकि अपनी बुद्धि से थोड़ा खोजबीन करते। नक्यो पर आंख गड़ाए बैठे हैं, भूमि को तो देखते ही नहीं कि कहां जा रहे हैं?
फिर ये नक्यो भी हजारों साल से चल रहे हैं। हजारों लोगों ने उनमें चीजें जोड़ दी हैं, घटा दी हैं। मौलिक नक्यो कहीं भी बचे नहीं हैं। बच नहीं सकते, क्योंकि आदमी के हाथ में जो भी नक्यग़ रहेगा, वह उसमें कुछ जोड़ेगा, घटाएगा, कुछ अपनी तरफ से बनाएगा, कुछ रंग भर देगा, खूबसूरत कर लेगा। पूजा के योग्य बना लेगा, लेकिन चलने के योग्य नहीं रह जाएगा।
सभी शास्त्र पूजा के योग्य हो गए हैं। उनको मंदिर में रखकर हम पूजा कर सकते हैं, उतना काफी है। लेकिन उनको लेकर चल नहीं सकते।
शास्त्र से भरा हुआ मन कई बार तो सीधे तथ्य भी नहीं देख पाता, क्योंकि शास्त्र बीच में आ जाते हैं। इसलिए यम कह रहा है, और समस्त सदगुरुओं ने कहा है, किसी ऐसे व्यक्ति को खोज लेना जो जीवित शास्त्र हो। उसके भरोसे यात्रा आसानी से हो सकती है। क्योंकि आपको व्याख्या नहीं करनी पड़ेगी। और आप पूछ भी सकते हैं। और धीरे—धीरे वह आपको अपनी तरफ उठाने लगेगा।
बुद्ध या महावीर या कृष्ण या क्राइस्ट जीवित शास्त्र हैं। लेकिन बाद में उनके वचन भी मुर्दा शास्त्र हो जाते हैं। फिर लोग उन मुर्दा वचनों को खोजकर ढोते रहते हैं।
समझदार साधक पहले तो यही कोशिश करेगा कि कोई जीवित व्यक्ति मिल जाए, जो गाइड हो सके। और ऐसा कभी भी नहीं होता पृथ्वी पर कि ऐसे जीवित व्यक्ति न हों—ऐसा कभी होता ही नही—जो आपको मार्ग न दे सकें।
यम कह रहा—हे मनुष्यो! उठो जागो और श्रेष्ठ महापुरुषों को पाकर उनके पास जाकर उनके द्वारा उस परब्रह्म परमेश्वर को जान लो। क्योकि ज्ञानीजन उस तत्वज्ञान के मार्ग को छुरे की तीक्षा की हुई दुस्तर धार के सदृश दुर्गम बतलाते हैं।
अकेले में उपद्रव भी हो सकता है। अकेले में तय करना बहुत मुश्किल है कि कहौ जा रहे हैं? क्या कर रहे हैं? जो हो रहा है, वह ठीक हो रहा है, या नहीं हो रहा? और भीतर की शक्ति से खेलना उपद्रव है। क्योंकि बड़े जाल हैं भीतर भी। और भीतर की ऊर्जा जग जाए और ठीक मार्ग न पकड़े, तो विक्षिप्त आप हो सकते हैं। न मालूम कितने साधक विक्षिप्त हो जाते हैं। और विक्षिप्त होने का कुल कारण इतना होता है कि कोई वहा मौजूद नहीं, जो उनको भीतर व्यवस्था दे सके; जो भीतर उन्हें अनुशासन दे सके। भीतर बड़ा जटिल जाल है।
एक युवक को मेरे पास लाया गया। वह अकेले ही शार्षासन कर रहा है। व्याख्या खुद ही करनी पड़ेगी। और जब शीर्षासन से उसको लगा कि आनंद आता है, स्वास्थ्य मालूम पड़ा, एक तरह का वेल—बीइंग चौबीस घंटे रहने लगा, तो वह बढ़ाता चला गया समय। एक सीमा के बाद स्वास्थ्य भी खो गया, वह जो सुख मालूम होता था वह भी खो गया, और सिर सदा भारी रहने लगा और पत्थर की तरह बोझिल हो गया। तब वह घबड़ाया।
अब भीतर सब सूक्ष्म है व्यवस्था। मस्तिष्क में एक सीमित मात्रा में ही खून की धारा बढ़ाई जा सकती है, उससे ज्यादा बढ़ाने पर मस्तिष्क के सूक्ष्म तंतु टूट जाते हैं। टूट जाने पर भारी नुकसान है। असल में आदमी इतना मस्तिष्क को विकसित कर सका इसीलिए कि उसने चार हाथ—पैर से चलना छोड्कर दो पैर पर वह खड़ा हुआ। जानवरों का मस्तिष्क विकसित नहीं हो सकता, क्योंकि खून की इतनी धारा तेजी से मस्तिष्क में बह रही है कि सूक्ष्म तंतु टूट जाते हैं। जैसे जोर से नदी की धार आ जाए, तो सूक्ष्म चीजें नष्ट हो जाएंगी।
जब आप सिर के बल खड़े होते हैं, तो खून की धारा नीचे की तरफ बहनी शुरू हो जाती है, क्योंकि जमीन में कशिश है। जब आप ऊपर की तरफ खड़े हैं, तो सबसे कम खून मस्तिष्क में पहुंचता है। इसलिए तो मस्तिष्क इतना विकसित हो पाया; उसमें सूक्ष्म तंतु टिक पाए।
जानवर जमीन के साथ, चारों हाथ—पैर जमीन पर रखकर चल रहे हैं। उनके सिर पर कशिश उतनी ही पड़ रही है जमीन की, जितनी उनके पूरे शरीर पर पड़ रही है। इसलिए आप खड़े—खड़े सोने में बड़ा मुश्किल अनुभव करेंगे। लेटकर सोना आसान होता है, क्योंकि आप फिर जानवर की स्थिति में आ गए। सोने के लिए लेट जाना जरूरी है। आराम के लिए लेट जाना जरूरी है।
असल में कोई भी पशु की अवस्था में जाने में आराम मिलेगा। क्योंकि मनुष्य की जो तकलीफ है, तनाव है वह छूट जाता है।
उस युवक के सूक्ष्म तंतु टूट गए। और मस्तिष्क एक विक्षिप्तता की हालत में है।
शीर्षासन लाभ कर सकता है, लेकिन व्यक्ति और जीवित गुरु के करीब। क्योंकि वह तय करेगा कि कितनी देर, कितना समय, कितना और कब? क्योंवि सभी समय भी नहीं हो सकता। अगर आप रात शीर्षासन कर रहे हैं, तो अलग परिणाम होंगे। सुबह कर रहे हैं, तो अलग परिणाम होंगे। सूरज के उगने के साथ शीर्षासन के अलग परिणाम होंगे, सूरज के डूबने के साथ अलग परिणाम होंगे। चांद किस अवस्था में है, उसके अनुसार अलग परिणाम होंगे। पूर्णिमा की रात अलग परिणाम होंगे, अमावस की रात अलग परिणाम होंगे। क्योंकि जीवन कोई छोटी घटना नहीं है, बड़ा विराट जाल है।
आपको पता है, पूर्णिमा की रात दुनिया में सर्वाधिक लोग पागल होते हैं। पूर्णिमा की रात दुनिया में सबसे ज्यादा पाप होते हैं। पूर्णिमा की रात दुनिया में सबसे ज्यादा हत्याएं होती हैं, आत्महत्याएं होती हैं। क्योंकि पूरा चांद आदमी के मन को उसी तरह खींचता है, जैसे सागर में लहरों को। इसलिए पुराना शब्द है पागल के लिए—चादमारा। अंग्रेजी में शब्द है लूनाटिक। लूनाटिक कार से बना है, चांद से।
चांद किमी तरह आदमी को पागल कर रहा है। और इसलिए प्रेमी पूर्णिमा के दिन बड़े प्रसन्न होते हैं, क्योंकि पागलपन की सुविधा हो जाती है। कवि पूर्णिमा के गीत लिखते हैं, क्योंकि कवियों में थोड़ा तो पागलपन होता ही है। पूर्णिमा ज्यादा खींचती है। पूर्णिमा को जैसी कविता उतरती है, वैसी अमावस को नहीं उतर सकती। अमावस बड़ी शांत रात्रि है। जमीन पर सबसे कम अपराध अमावस की रात होते हैं। यह बड़ी उलटी बात मालूम पड़ेगी। हमको लगता है कि अंधेरी रात में ज्यादा होने चाहिए। लेकिन लोग सोते हैं, क्योंकि चांद खींचता नहीं। लोग आराम में होते हैं, झगड़े—कलह कम होती है।
चांद का भारी प्रभाव है। आपके रोएं—रोएं पर प्रभाव है। आपके शरीर में पचहत्तर प्रतिशत पानी है। और उस पानी का वही गुणधर्म है, जो सागर के पानी का है। तो चांद आपको आपके पचहत्तर प्रतिशत छाक्तित्व को खींचता है और आदोलित करता है।
पृर्णिमा की रात शीर्षासन बड़ा खतरनाक हो सकता है। अमावस की रात उतना खतरनाक नहीं होगा। लेकिन यह कोई जीवित गाइड के पास...। किसी शास्त्र में यह लिखा हुआ नहीं है। और बहुत—सी सूक्ष्मताएं है जो लिखी नहीं जा सकतीं। क्योंकि एक—एक व्यक्ति में भेद पड़ेगा। अगर बहुत बुद्धिमान आदमी है, तो बहुत थोड़े शीर्षासन से फायदा होगा। अगर मूढ़ है, तो लंबे शीर्षासन से फायदा होगा। इस बात पर निर्भर करेगा कि मस्तिष्क के तंतु कितने मोटे और कितने सूक्ष्म हैं। मोटे तंतु ज्यादा देर तक शीर्षासन करें, तो हर्जा नहीं होगा।
और बात आप जानकर चकित होंगे, कि शीर्षासन करने वाले किसी आदमी ने अब तक नोबल  प्राइज न ही पाई है। और शीर्षासन करने वालों ने कोई बहुत बडी बुद्धिमत्ता का प्रमाण नहीं दिया है। कुछ मामला है, कुछ कारण है। शीर्षासन जटिल प्रयोग है। और जब तक जीवित व्यक्ति के करीब न किया जाए, फायदे की जगह नुकसान ज्यादा संभव है।
यह ऐसा ही है जैसे कि आप एक ऐलोपैथी के दवाखाने में घुस जाएं, जहा कि सब पायजन हैं और अपने ही दिल से मिक्सचर तैयार करके पीने लगें। और डाक्टर से कहें कि तुम क्या जानोगे! मैं बीमार हूं। मैं अपनी बीमारी को ज्यादा जानता हूं कि तुम मेरी बीमारी को ज्यादा जानते हो? या एक मेडिकल की किताब उठा लें और पढ़—पढ़कर दवाइयों का प्रयोग करें। आपकी बीमारी तो न जाएगी, बीमार चला जाएगा।
लेकिन शरीर के साथ आप इतना उपद्रव नहीं करते। म्रप मजे से डाक्टर के पास चले जाते हैं और वह जो प्रिस्काइब करता है, वह जो लिख देता है, उसको आप वेदवाक्य मानकर उसका अनुसरण करते हैं। मन शरीर से बहुत सूक्ष्म है। इसके लिए किसी महापुरुष के पास ही जाकर प्रिस्किपान खोजना चाहिए। उसके प्रिस्किपान आप खुद ही लिख लेते हैं।
अनेक लोग कुछ न कुछ करते रहते हैं! कोई किसी तरह का ध्यान करता रहता है; कोई किसी तरह का आसन करता रहता है। कोई कुछ, कोई कुछ। लोग अपना—अपना खोजकर बनाते रहते हैं। आपके बनाए हुए नक्यो और आपकी व्याख्याएं खतरनाक हैं। आप अपने से थोड़े सावधान रहें।
लेकिन क्यों ऐसा होता है? एक महापुरुष के पास जाने में क्या अड़चन है?
अहंकार को अड़चन होती है। किसी महापुरुष के पास जाने में अहंकार को बड़ी पीडा होती है। वह पीड़ा वैसी ही है जैसे ऊंट को पहाड़ के पास जाने में होती है। क्योंकि वहां उसको पहली दफा पता चलता है कि हम कुछ भी नहीं।
तो ऊंट पहाड़ से बचता है। आदमी भी महापुरुष के पास जाने से बचते हैं। और पहुंच भी जाएं, तो भी ऐसा इंतजाम करते हैं सुरक्षा का कि महापुरुष कुछ कर न पाए। कहीं कोई बदलाहट न कर दे। कहीं कोई जीवन की धारा न बदल दे। हम इतने भयभीत हैं! भयभीत का कारण हमारा अहंकार है।
महापुरुषों के पास तो केवल वे ही जा सकते हैं, जो अपने को मिटाने को, खोने को, छोड़ने को राजी हैं। जो शब्दरहित स्पर्शरहित रूपरहित रसरहित और बिना गंध वाला है तथा जो अविनाशी नित्य अनादि अनंत असीम महान आत्मा से श्रेष्ठ एवं सर्वथा सत्य तत्व है उस परमात्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु के मुख से सदा के लिए छूट जाता है।
मेधावी मनुष्य यमराज के द्वारा कहे हुए नचिकेता के इस सनातन उपाख्यान का वर्णन करके और श्रवण करके ब्रह्मलोक में महिमा को उपलब्ध होते हैं प्रतिष्ठित होते हैं।
जो मनुष्य सर्वथा शुद्ध होकर इस परम गुह्य रहस्यमय प्रसंग को ब्राह्मणों की सभा में सुनाता है अथवा श्राद्धकाल में भोजन करने वालों को सुनाता है उसका वह कर्म अनंत होने में अर्थात अविनाशी फल देने में समर्थ होता है और वह अनंत होने की शक्ति प्राप्त करता है।
इस अंतिम बात को बहुत गौर से समझ लेना चाहिए। क्योंकि इसकी बड़ी भ्रात व्याख्याएं हो गई हैं। पहली तो बात, ब्राह्मणों की सभा का अर्थ ब्राह्मणों की सभा नहीं है। ब्रह्म—संसद। ब्रह्म की खोज करने वालों की सभा।
ये वचन ऐसे नहीं हैं कि सभी को सुनाए जाएं। क्योंकि जिनके भीतर कोई प्यास नहीं है, उनके लिए ये वचन व्यर्थ मालूम पड़ेंगे। जिनके भीतर कोई 'प्यास नहीं है, उनके लिए इन वचनों का कहना नासमझी है। बीमार को औषधि की जरूरत है। प्यासे को इन वचनों की, प्रवचनों की जरूरत है। प्यास बिलकुल जरूरी है। सभी के लिए यह नहीं है। और अध्यात्म कभी भी सभी के लिए नहीं हो सकता है।
एक विशिष्ट विकास की अवस्था में ही अध्यात्म सार्थक है। उसके पहले आप सुन भी लेंगे, तो भी लगेगा व्यर्थ है, बेकार है। जैसे एक छोटे से बच्चे को, सात साल के बच्चे को, कोई वात्सायन का कामसूत्र पढ़कर सुनाने लगे। बिलकुल व्यर्थ है। वह बच्चा कहेगा, कहां की बकवास है। अभी परियों की कथाएं, भूत—प्रेत, टारजन, अभी ये सार्थक हैं। अभी वात्सायन के कामसूत्र का क्या अर्थ है? अभी कामवासना जगी नहीं। तो उस बच्चे को बड़ी हैरानी होगी कि क्या बातें आप कर रहे हैं! क्यों कर रहे हैं? निरर्थक है।
लेकिन यही बच्चा चौदह साल का होगा, कामवासना जगनी शुरू होगी। और आप कितना ही बचाएं, यह वात्सायन का कामसूत्र खोज लेगा। गीता में छिपाकर रखकर पड़ेगा। अब सार्थक होना शुरू हुआ। वासना की प्यास जगी तो वात्मायन का कामसूत्र सार्थक होता है।
ठीक अध्यात्म की प्यास..। लेकिन कामवासना तो प्रकृति के हाथ में है। चौदह साल में वह सभी को कामवासना से भर देती है। अध्यात्म की प्यास प्रकृति के हाथ में नहीं है। कभी—कभी जन्म—जन्म लग जाते हैं, तभी आप उस प्यास को उपलब्ध होते हैं। यह आपके हाथ में है।
अध्यात्म चुनाव है, और इसलिए स्वतंत्रता है। कामवासना परतंत्रता है, वह आपके हाथ में नहीं है। प्रकृति आपको कर ही देगी प्रौढ़, क्योंकि प्रकृति का कुछ प्रयोजन है। कामवासना से प्रयोजन है, आपसे कोई प्रयोजन नहीं है। आप मिट जाएं, लेकिन संतति जारी रहे, जीवन चलता रहे। तो प्रकृति सब उपाय करती है कि जीवन अवरुद्ध न हो जाए। थोड़ी देर को सोचें, चौबीस घंटे के लिए जगत से कामवासना तिरोहित हो जाए—चौबीस घंटे में जगत नष्ट हो जाएगा।
तो प्रकृति बड़े प्रबल वेग से कामवासना को पैदा करती है। और आप कितना ही लड़े, कितना ही संघर्ष करें, कामवासना आपको पकड़ेगी ही। वह आपकी ग्रंथियों में, आपके हारमोन्स में, आपके शरीर के रोएं—रोएं में छिपी है। वह एक घड़ी पर आपको जकड़ लेगी।
लेकिन अध्यात्म प्राकृतिक घटना नहीं है। अध्यात्म प्रकृति के पार जाने की कला है। और अपने अनुभव, विचार, चिंतन, मनन, अपनी ही खोज से आप एक दिन पकेने। और उसके पहले कोई उपयोग नहीं है।
इसलिए यम कहता है कि ब्राह्मणों की सभा में—वे जो ब्रह्म के तलाशी हैं, वे जो ब्रह्म के प्रार्थी हैं, वे जो ब्रह्म के कामी हैं, वे जो ब्रह्म को ही चाहते हैं, अब जो परम सत्य की खोज के लिए उत्सुक हैं—सर्वथा शुद्ध होकर इस परम गुह्य रहस्यमय प्रसंग को जो ब्राह्मणों की सभा में सुनता है, वह अनंत शक्ति प्राप्त करता है। अथवा श्राद्धकाल में भोजन करने वालों को सुनाता है, उसका वह कर्म अनंत होने में और अविनाशी फल देने में समर्थ होता है।
दूसरी बात भी समझ लेनी जरूरी है। श्राद्ध एक परंपरा बन गई है। उसमें लोग कुछ धर्म—वचन, उपनिषद या कठोपनिषद सुनाते हैं। परंपराएं जड़ हो जाती हैं। यह उनका स्वभाव है। बहुत बार पुनरुक्त करने से उनके अर्थ खो जाते हैं। लेकिन अर्थ फिर—फिर खोजे जा सकते हैं।
यम कह रहा है, श्राद्ध के क्षणों में....। असल में यह पूरा उपनिषद मृत्यु और मृत्यु के पार कैसे जाएं, इससे संबंधित है। एक भी व्यक्ति जब मर जाता है, प्रियजन, परिजन, आपके निकट का, तो मृत्यु आपके लिए पहली दफा महत्वपूर्ण हो उठती है। जब भी कोई मरता है आपके निकट का, तो आपके भीतर भी कुछ मरता है। आपका भी एक अंश टूट जाता है, खंडित हो जाता है।
एक स्त्री को आप प्रेम करते हैं, आपकी पत्नी है—या आपका बेटा है, या आपका पति है, या आपकी मां है—जिस दिन आपकी पत्नी मरेगी, उस दिन पत्नी ने जो—जो आपके भीतर भर दिया था, और आपके व्यक्तित्व में जो—जो जगह घेर ली थी, और आपके हृदय के जिन—जिन कोनों में वह प्रवेश कर गई थी, वह सब एकदम टूट जाएंगे। पत्नी ही नहीं मरती, पति भी उसी दिन मरेगा, आधा तो मरेगा ही। घाव छूट जाएगा। मौत बड़ी अर्थपूर्ण हो जाएगी।
और सच तो यह है कि आपकी मौत के समय तो आप होश में नहीं रहेंगे, इसलिए उस वक्त कठोपनिषद सुनाना बहुत सार्थक नहीं होगा। सुनने वाला बेहोश होगा। लेकिन जब प्रियजन मरता है, तब आप आधे मरते हैं और होश भी रहता है, उस वक्त कठोपनिषद सार्थक हो सकता है। वह क्षण संवेदनशील है। उस क्षण आप ग्राहक हैं। उस क्षण आप समझना चाहते हैं—क्या है मृत्यु? और उस क्षण आप यह भी जानना चाहते हैं—क्या मृत्यु के पार कुछ बचता है? आपकी प्रेयसी, आपका प्रिय, आपका बेटा, आपकी मां, आपका पिता, आपका मित्र, क्या सच में ही बिलकुल मिट गया, या कुछ बच रहता है। उस क्षण आपकी पूरी चेतना मृत्यु के इर्द—गिर्द घूमती है।
श्राद्ध के क्षणों में ये विचार सार्थक हो सकते हैं, उपयोगी हो सकते हैं। क्योंकि मौत के प्रति जब आप संवेदनशील हैं, तभी अमृत की तलाश शुरू हो सकती है।
कुछ क्षण जीवन में बड़े महत्वपूर्ण हैं। एक तो जीवन में वह क्षण महत्वपूर्ण है, जिस दिन आप पैदा होते हैं, मां के गर्भ से छूटते हैं। अति महत्वपूर्ण क्षण है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि उससे महत्वपूर्ण क्षण फिर दूसरा खोजना मुश्किल है। क्योंकि पहली बार आप स्वतंत्र होकर श्वास लेते हैं। एक परिधि थी मां की, उससे आप झटके से बाहर आ जाते हैं। जगत में आपका प्रवेश होता है। वह क्षण ट्रामैटिक है।
विल्हेम रेक, एक बहुत बड़े मनोवैशानिक का तो कहना है, कि जब तक हम उस क्षण को न बदलें, तब तक आदमियत को बदला नहीं जा सकता। उस क्षण में आदमी दुख से भर जाता है। इसलिए सभी बच्चे रोते—चीखते पैदा होते हैं। वह बड़े गहन दुख का क्षण है। क्योंकि सारा सुख जो गर्भ का था, छिन गया। सारी शाति गर्भ की छिन गई। वह जो गर्भ में एक सहज आनंद का क्षण था, वह नष्ट हो गया। चिंता, उपद्रव का जगत शुरू हो गया। बच्चे के कान में पहली दफे शोरगुल सुनाई पड़ता है। वह नौ महीने तक परम शून्य में था। साउडलेसनेस थी, कोई ध्वनि न थी। नौ महीने तक कोई चिंता न थी, कोई दायित्व न था। न भोजन की तलाश करनी थी, न नौकरी करनी थी, न श्वास लेनी थी। कुछ भी नहीं करना था। वह सिर्फ था। और होना पर्याप्त था, पूर्ण था। उस पूर्णता के सुख के क्षण से अचानक जगत में आना कष्टपूर्ण है।
ओटो रैंक कहता है, जब तक हम जन्म के क्षण को आनंद का क्षण न बना सकें, आदमी दुखी रहेगा। उसकी बात में सचाई है।
फिर दूसरा एक क्षण है, जब आप प्रेम में पड़ते हैं। वह भी बहुत महत्वपूर्ण है, जैसे गर्भ का क्षण महत्वपूर्ण है, क्योंकि आप किसी व्यक्ति से मुक्त होते हैं, वैसे प्रेम का क्षण महत्वपूर्ण है, क्योंकि आप फिर से किसी व्यक्ति से बंधते हैं। फिर आप अपने हृदय को, अपने को, किसी से जोड़ते हैं। वह एक नया जन्म है। उस क्षण में आप पूरे खुले होते हैं।
और तीसरा क्षण है, जब आपका प्रियजन मरता है। तब फिर आप टूटते हैं। और चौथा क्षण है, जब आप मरेंगे। ये चार क्षण अति बहुमूल्य हैं। और इन चार क्षणों को ठोक से सम्हाल लेना जीवन की कला का हिस्सा है। लेकिन ये चारों क्षण ही हमे करीब—करीब गंवा देते हैं।
बच्चा जिस क्षण पैदा होता है...। अभी कुछ जीवशास्त्री एक सिद्धात विकसित किए हैं। उनका सिद्धात यह है कि बच्चा जैसे ही पैदा होता है, उस क्षण उसके आस—पास जो भी वातावरण होता है, जो भी घटना घट रही होती है, वह बच्चे पर सदा के लिए संस्कारित हो जाती है। उस क्षण का इंपैक्ट बहुत गहन है। फिर उससे छुटकारा बहुत मुश्किल है।
एक वैज्ञानिक प्रयोग कर रहा था मुर्गियों के ऊपर। तो जैसे ही मुर्गी का बच्चा अंडे से निकलता है, उसको पहला दर्शन अपनी मां का होता है। वह अंडे को सम्हालकर बैठी है; उसको से रही है। बस वह मां के पीछे भागने लगता है। एक वैज्ञानिक प्रयोग कर रहा था, उसने मां की जगह एक रबर का गुब्बारा अंडे के ऊपर रखा हुआ था। और जैसे ही अंडे से द्या निकला, उसने मां को तो नहीं देखा, रबर के गुब्बारे को देखा। बस रबर का गुब्बारा उसकी मा हो गया! रबर का गुब्बारा जहां भी ले जाओ, वह उसके पीछे भागता हुआ चला जाता। मां की उसे कोई चिंता ही नहीं। मां पास भी आए तो वह फिकर न करे। और यह फिर उस चूजे के लिए जिंदगीभर के लिए उपद्रव हो गया। वह चूजा फिर किसी मुर्गी को प्रेम नहीं कर सका। रबर का गुब्बारा ही उसका प्रेम हो गया।
इस तरह के बहुत प्रयोग हुए हैं अभी, और उनसे यह पता चलता है कि वह जो जन्म का क्षण है, वह बड़ा कीमती है। अगर उस क्षण में जो भी प्रभाव हम पर पड़ते हैं, वे जीवनभर हमारे साथ रहते हैं।
इसलिए मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हर बेटा उस स्त्री की तलाश में है, जो उसकी मां जैसी होगी। चाहे उसे पता हो, चाहे न हो। और कोई भी स्त्री मां जैसी तो खोजना मुश्किल है। इसलिए सभी स्त्रियों से दुख मिलेगा। अड़चन होगी। क्योंकि आकांक्षा  जिसकी तलाश की है, वह तो मिलने वाला नहीं।
और कोई स्त्री आपको बेटा बनाने के लिए आपसे विवाह कर भी नहीं रही है। वह अपने पिता को खोज रही है; आप अपनी मां को खोज रहे हैं। यह एक उपद्रव का धंधा है। इसमें कहीं भी शाति होने वाली नहीं है। इसलिए विवाह नर्क है। उसमें अचेतन प्रभाव काम कर रहे हैं और संघर्ष खड़ा कर रहे हैं।
इस पहले क्षण में जो भी प्रभाव पड़ेंगे, वे जीवनभर साथ रगै ' प्रेम के क्षण में जो प्रभाव पडेंगे, वे भी जीवनभर साथ रहेंगे। प्रियजन की मृत्यु के क्षण में जो प्रभाव पड़ेंगे, वे भी जीवनभर साथ रहेंगे। और आपकी मृत्यु के क्षण में जो प्रभाव पड़ेंगे, वे अगले जन्म में साथ रहेंगे।
यह उपनिषद मृत्यु से संबंधित है। इसलिए श्राद्ध के क्षणों में पढ़ने जैसा है, श्राद्ध के क्षणों में समझने जैसा है। जब मृत्यु आप पर प्रभावी हो, और चारों तरफ मौत की छाया ने आपको घेर लिया हो, और जीवन व्यर्थ मालूम पड़ता हो, उन क्षणों में अगर इस उपनिषद को कोई जानने वाला पुरुष इसके रहस्य को आप में खोल दे, तो वह संस्कार गहन हो जाएगा, वह आपके पूरे जीवन को बदलने की कीमिया सिद्ध हो सकता है।
अब ध्यान के लिए तैयार हों।

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबु राजस्‍थान।