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मंगलवार, 24 सितंबर 2013

कठोउपनिषद--प्रवचन-06

ज्ञान अनंत यात्रा हैछटवां प्रवचन



आसीनो दूर वजति शयानो याति सर्वतः।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति।।21।।

अशरीर शरीरेध्वनवस्थेष्यवस्थितम्।
महान विभुमात्मान मत्वा धीरो न शोचति।।22।।

नायामात्मा प्रवचनेन लथ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूंस्वाम्।।23।।

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमामुयात्।।24।।

यस्य ब्रह्म च क्षत्र च उभे भवत ओदनः।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः।।25।।

तृतीय वल्ली :

ऋतं पिबनौ सुकृतस्य लोके गुहा प्रविष्टी परमे परार्धे।।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पंचाग्नयो ये च त्रिणाचिकेता:।।1।।

यः सेतुरीजानानामक्षर ब्रह्म यत् परम।।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेत शकेमहि।।2।।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धि तु सारथि विद्धि मन: प्रग्रहमेव च।।3।।


इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाञ्जेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्त भोक्तेत्याहुर्मनीषिण:।।4।।

यस्लविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथे:।। 5।।


वह परमेश्वर बैठा हुआ ही दूर पहुंच जाता है सोता हुआ ( भी) सब ओर चलता रहता है। उस ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त न होने वाले देव को मुझसे भिन्न दूसरा कौन जानने में समर्थ है।। 21।।

(जो) स्थिर न रहने वाले (विनाशशील) शरीरों में शरीररहित (एवं) अविचलभाव से स्थित है (उस) महान सर्वव्यापी परमात्मा को जानकर बुद्धिमान महापुरुष (कभी किसी कारण से) शोक नहीं करता।। 22।।


यह परब्रह्म परमात्मा न तौ प्रवचन से न बुद्धि से (और) न बहुत सुनने से ही प्राप्त हो सकता है। जिसको यह स्वीकार कर लेता है उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है; (क्योकि) यह परमात्मा उसके लिए अपने यथार्थ स्वरूप को प्रगट कर देता है।। 23।।

सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा भी इस परमात्मा को न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है जो बुरे आचरणों से निवृत नहीं हुआ है न वह प्राप्त कर सकता है जो अशांत है न वह कि जिसके मन तथा इंद्रियां संयत नहीं हैं। और न वह प्राप्त करता है जिसका मन शांत नहीं है। 24।।

(संहारकाल) में जिस परमेश्वर के ब्राह्मण उगैर क्षत्रिय—थे दोनों ही अर्थात संपूर्ण प्राणिमात्र भोजन बन जाते हैं (इrतथा7ए सबका संहार करने वाली मृत्यु ( भी) जिसका उपसेचन (अर्थात भोज्य वस्तु के साथ लगाकर खाने का व्यंजन तरकारी आदि ) बन जाता है वह परमेश्वर जहां (और) जैसा है यह ठीक— ठीक कौन जानता है।।। 25।।

तृतीय वल्ली :

शुभ कर्मो के फलस्वरूप मनुष्य— शरीर में परब्रह्म के उत्तम निवास— स्थान (हृदय—आकाश) में बुद्धिरूप परम गुफा में छिपे हुए सत्य का पान करने वाले (व अवश्यभावी कर्म का भोग करने वाले दो भिन्न तत्व है)। (वे) छाया और धूप की भांति परस्पर भिन्न है (यह बात) ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष कहते है। तथा जो तीन बार नाचिकेत अग्नि का चयन कर लेने वाले (और) पंचाग्निसंपन्न गृहस्थ हैं वे भी यही बात कहते हैं।। 1।।

यश करने वालों के लिए जो दुख—समुद्र से पार पहुंचा देने योग्य सेतु है उस नाचिकेत अग्नि को (इrऔर) संसार— समुद्र से पार होने की इच्छा. वालों के लिए जो भयरहित पद है उस अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम को जानने और प्राप्त करने में हम समर्थ हों।।2।।

(है नचिकेता तुम) जीवात्मा को तो रथ का स्वामी (उसमें बैठकर चलने वाला ) समझो और शरीर को ही रथ बुद्धि को सारथि (रथ को चलाने वाला) समझो और मन को लगाम (समझो)।। 3।।

ज्ञानीजन (इस रूपक में) इंद्रियों को घोड़े बतलाते हैं (और) विषयों को उन घोड़ों के विचरने का मार्ग (बतलाते तथाता) शरीर इंद्रिय और मन—इन सबके साथ रहने वाला जीवात्मा ही भोक्ता है ऐसा कहते हैं।। 4।।

जो सदा विवेक हीन बुद्धि वाला और अवशीभूत (चंचल) मन से युक्‍त रहता है, उसकी इंद्रियां असावधान साररथि के दुष्‍ट घोड़ो की भांति वश में न रहने वाली हो जाती है।।5।।


ज्ञान अनंत यात्रा है 


रमेश्वर के संबंध में कुछ आधारभूत बातें समझ लें। एकपरमेश्वर समस्त विरोधों का समन्वय है। इस जगत में प्रत्येक वस्तु अपने विरोधी के साथ मौजूद है। यही प्रकृति के होने का ढंग है। प्रकृति का तनावप्रकृति का होना विरोध के बिना नहीं हो सकता। रात न हो, तो दिन न होगा। स्‍त्री न हो तो, पुरूष न होगा। मृत्‍यु न हो तो, जीवन नहीं होगा। दुःख न हो, तो सुख न होगा।सारा जीवन विपरीत से जूड़ा और बना है।
इसलिए जीवन द्वंद्व हैएक संघर्ष है। और विपरीत के आधार पर ही यहां कुछ भी हो सकता है। यहां आपने किसी को मित्र बनाया कि आपने शत्रु बनाने शुरू कर दिए। यहां आपने प्रेम किया कि घृणा का प्रारंभ हो गया। यहां आप कुछ भी नहीं कर सकते हैंजिसके विपरीत की उपस्थिति साथ ही मौजूद न हो जाए।
बुद्ध ने कहा हैमैं मित्र नहीं बनाताक्योंकि मैं शत्रु नहीं बनाना चाहता हूं। बुद्ध ने कहा हैमैं प्रेम नहीं करताक्योंकि मैं घृणा नहीं करना चाहता हूं।
जीवन पदार्थ है और साथ ही चेतना भी। चेतना का अर्थ हैपदार्थ से विपरीत। तत्वचिंतक पूरब के निरंतर इस द्वंद्व को स्वीकार किए हैं। इसलिए उन्होंने कहा हैजगत द्वैत हैडुआलिटी है।
पश्चिम में नई विज्ञान की खोजें भी इस द्वैत को अंगीकार करने लगी हैं। और उनकी तो धारणा अब यह हो गई है कि अगर हमें एक का पता हो और दूसरे का पता न भी होतो भी दूसरा होगा ही।
इसलिए एक बहुत अनूठी खोज हैवह है एंटी मैटर की। वे कहते हैंपदार्थ हैतो पदार्थ के विपरीत पदार्थ भी होना चाहिए। अभी तक वह पकड़ में नही आयालेकिन होना चाहिए। क्योंकि जहा सभी चीजें विपरीत के साथ निर्मित होती हैंवहा पदार्थ के विपरीत भी कुछ होना चाहिए।
चूंकि टाइम हैसमय हैइसलिए एंटी टाइमसमय के विपरीत भी कोई धारा होनी चाहिए। समय जाता है आगे की तरफ। तो वह जो विपरीत समय होगावह जाएगा पीछे की तरफ। यहां बच्चा पैदा होता हैफिर जवान होता हैफिर का होता है। अगर कोई विपरीत समय होगातो वहा का होगाफिर जवान होगाफिर बच्चा होगा। उलटी यात्रा होगी।
और यह कोई तत्वचिंतक नहीं कह रहे हैं। आधुनिक फिजिसिस्टभौतिकशास्त्री कह रहे हैं कि इस समय की धारा के ठीक पास विपरीत समय की धारा होनी चाहिए। क्योंकि समय हो नहीं सकता बिना विपरीत के कुछ हो ही नहीं सकता।
आप देखते  हैं कि एक पत्थर रखा हुआ है। तो पत्थर एक ठोस वस्तु है। विज्ञान कहता है कि जिस तरह पत्‍थर एक ठोस वस्तु हैऔर स्थान घेरता हैऐसे ही स्थान में छिद्र भी होने चाहिएहोल्स—पदार्थ के विपरीत। अभी तक वे पकड़े नहीं जा सके हैंलेकिन इस के ऊपरइस सिद्धात के ऊपर एक व्यक्ति को नोबल प्राइज उपलब्ध हो गई है।
आकाश में छिद्र भी होने चाहिए। बड़ा कठिन है सोचना भी कि छिद्र का क्या अर्थ होगाआकाश भरा हुआ हैएक भराव है। ठीक इसके पास ही खालीशून्य छिद्र भी होने चाहिए।
महावीर ने आज से पच्चीस सौ साल पहले ठीक ऐसी बात कही थी। उन्होंने कहा थालोक है और अलोक है। अलोक इसके विपरीत है। यह जो अस्तित्व दिखाई पड़ रहा हैयह मैटर—लोक। इसके विपरीत जो हैअलोक—एंटी मैटर।
यह तो जगत की व्यवस्था हैदृश्य की। परमात्मा है अदृश्य। वहां कोई भी विरोध न होगा। वहां सभी विरोध समन्वित हो जाएंगे। वहां विपरीत अपनी विपरीतता खो देंगे।
परमात्मा है एक। तो एंटी गाडपरमात्मा के विपरीत अगर कुछ होतो परमात्मा भी जगत का हिस्सा हो गया। लेकिन परमात्मा जगत से बड़ा है। लोक और अलोकदोनों को घेर लेता है। पदार्थ और विपरीत—पदार्थकाल और काल के विपरीत धाराजन्म और मृत्युदोनों को एक साथ घेर लेता है। वह एक हैजिसमें दोनों ही समाविष्ट हैं।
यह पहली बात परमेश्वर के संबंध में समझ लेनी चाहिए कि वह समग्रता का जोड़ है। उसके भीतर जन्म भी है और उसके भीतर मृत्यु भी है। इसलिए वही स्रष्टा है और वही विध्वंसक है। वही मित्र हैवही शत्रु है। वही बनाता हैवही मिटाता है।
जब ऐसे शब्दों का हम प्रयोग करते हैंतो एक कठिनाई है। ऐसा लगता हैजैसे वह कोई व्यक्ति है। यह भाषा की भूल है। और भाषा के पास और कोई उपाय नहीं है। परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है। परमात्मा केवल ऊर्जा का विराट विस्तार है। इस ऊर्जा के विराट विस्तार में दोनों संयुक्त हैं। जो हमें विपरीत दिखाई पड़ते हैंदिन और रातवे दोनों ही परमात्मा में समाविष्ट हैं। रात भी उसकीदिन भी उसका। इस बात को आज नहीं कल विज्ञान को भी स्वीकार कर ही लेना पड़ेगा।
विज्ञान यह तो स्वीकार करता है कि विपरीतता हैएक डुआलिटी हैएक द्वैत है। उसे यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि जहां भी दो होंउन दोनों को जोड़ने वाला एक तीसरा सेतु चाहिएअन्यथा उन दोनों के बीच कोई संबंध न रह जाएगा। और उन दोनों के बीच एक तारतम्य हैएक गति हैएक संगीत है। निश्चित ही कोई तीसरा चाहिएजो दोनों को घेर लेता हैदोनों को समाविष्ट कर लेता है।
परमात्मा का अर्थ हैटोटलिटीसमग्रताजहां सभी द्वंद्व एक साथ मौजूद हैं। यह हमें समझने में बड़ा कठिन है। क्योंकि तर्क तोड़ता हैजोड़ने की कला तर्क के पास नहीं है। जैसे कैंची काटती हैलेकिन कैंची के पास जोड़ने का कोई उपाय नहीं है। और अगर आप कैंची से जोड़ने का उपाय करेंतो आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। जितना आप जोड़ेंगेउतना ही कटता चला जाएगा।
तर्क कैंची है। इसलिए हमने तर्क के देवता को—गणेश तर्क के देवता हैं भारतीय पुराण—कथा में—चूहे पर सवार किया है। चूहा कैंची हैवह काटता है। चूहा जोड़ नहीं सकता। इसलिए चूहे को उनका वाहन बनाया है। सिर्फ एक प्रतीक है।
और आप जानकर हैरान होंगे कि आप गणेश का हर काम में स्मरण करते हैंशुभ का काम में। आपको पता नहीं होगा कि कारण बड़ा अजीब है। क्योंकि गणेश खतरनाक हैंविध्वंसक हैं। वे  उपद्रवी है, तर्क की सवारी है। तो ऐसी कथा है कि गणेश हर तरह के शुभ कार्यों में बाधा उपस्थित करते रहे हैं,प्रचीन समय में। फिर लोग उनसे इतने डरने लगे कि उनका पहले ही स्मरण कर लेना उचित हैताकि वे बाधा न बनें। इसलिए—श्री गणेशाय नम:! वह पहले से जो याद कर रहे हैंउसका मतलब यह है कि तुम कृपा करना, तुमसे भय है।
धीरे—धीरे लोग भूल ही गए कि वे विध्वंसक हैंअब तो वे मंगल के प्रतीक हो गए। लंबे समय में मनुष्य की चेतना में ऐसा हो जाता है। उनकी याददाश्त उनके उपद्रवी होने के कारण थी। फिर धीरे—धीरे बात भूल गई। और अब तो वे मंगल—सूचक हैं। अब तो उनकी याददाश्त हम करते हैं इसलिए कि उनसे सभी काम मंगलकारी होंगे। लेकिन उनके उपद्रव का कारण है उनकी तर्कनिष्ठातोड़ने की कलाकाटने की बात।
विज्ञान तर्क पर निर्भर है। वह तर्क का ही फैलाव है। इसलिए विज्ञान तोड़ता है। इसलिए एनालिसिसविश्लेषण उसकी विधि है। विज्ञान को कोई भी चीज देंवह तोड़कर उसको खंड—खंड में बांट देगा। इसलिए विज्ञान परमाणु तक पहुंच गया—तोड़ते—तोड़तेकाटते—काटते।
धर्म तर्क के पार जाता है। क्योंकि धर्म कहता हैतोड़ने से तुम पूर्ण को कभी भी न जान सकोगे। तोड़ने से खंड तो जान लिया जाएगाअखंड कैसे जाना जाएगापरमाणु को तो तुम जान लोगेलेकिन परमेश्वर को कैसे जानोगे?
ये दो छोर हैं। परमाणु—तोड़ते चले जाएं तो परमाणु बचता है। जोड़ते चले जाएं तो—परमेश्वर। परमेश्वर का अर्थ हैसबका जोड़जिसके आगे जोड़ने को 'नहीं बचता। और परमाणु का अर्थ हैआखिरी तोड़जिसके आगे तोड़ने को नहीं बचता। इसलिए विशान की आखिरी निष्पत्ति परमाणु हैएटम है। धर्म की आखिरी निष्पत्ति परमेश्वर है। ये दो छोर हैं। विज्ञान द्वैत से शुरू होता है और अनेक पर समाप्त होता है। धर्म भी द्वैत से शुरू होता है और एक पर समाप्त होता है।
धर्म की विधि का नाम है सिथिंसिससंश्लेषणजोड़ना। और जोड़ते चले जानाजब तक कुछ भी शेष रहे। जब सभी जुड़ जाएतो उस समग्रता का नाम परमेश्वर है। वह कोई व्यक्ति नहीं है। वह इस पूरे अस्तित्व की अखंडता का नाम है। उस अखंडता में सभी भेद समाप्त हो जाएंगेक्योंकि वह जोड़ है। और वितान में सभी भेद प्रगट हो जाएंगेक्योंकि वह तोड़ना है।
इसलिए विज्ञान न केवल वस्तुओं को तोड़ता हैबल्कि खुद भी टूटता चला जाता है। आज से कोई पांच सौ साल पहले विज्ञान का कुछ अर्थ थाशब्द का। अब तो कोई अर्थ नहीं है। विज्ञान जैसी कोई चीज अब नहीं है। फिजिक्स हैकेमेस्ट्री हैबायोलाजी हैविज्ञान जैसी अब कोई चीज नहीं है। आप अगर पूछें कि. साइंटिस्ट कौन हैतो बताना मुश्किल है। कोई बायोलाजिस्ट हैकोई फिजिसिस्टकोई केमिस्ट हैसाइंटिस्ट तो कोई भी नहीं है। विज्ञान तोड़ते—तोड़ते खुद भी टूट गयाछोटी—छोटी शाखाओं में विभाजित हो गया। और इन शाखाओं के बीच भी कोई तालमेल नहीं रह गया है।
इस समय मनुष्य की सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हमारे शान की शाखाओं के बीच कोई समन्वय नहीं रह गया हैकोई संबंध नहीं रह गया है। वह जो भौतिकशास्त्री हैउसे कुछ भी पता नहीं कि रसायनशास्‍त्र क्या कर रहा है। क्योंकि भौतिकशास्त्र ही इतना बड़ा शास्त्र है कि आदमी हजार साल भी जीए तो उसे पूरा नहीं जान पाएगा। और रसायनशास्त्र खुद इतना बड़ा शास्त्र है कि उसे भी कोई आदमी पूरा नहीं जान पाएगा।
पूराने समय में एक ही वैद्य या एक ही डाक्टर सभी का इलाज कर देता था। अब वैसी बात नहीं है। अंग अगर आपकी आंख खराब हैतो अलग डाक्टर है। कान खराब हैपैर खराब हैपेट खराब हैतो बंटता जा रहा है। पश्चिम में एक मजाक है कि इक्कीसवीं सदी में एक आदमी अपनी आंख  के इलाज के लिए एक डाक्टर के पास गया। उस डाक्टर ने पूछाआपकी कौन—सी आंख  खराब हैबायीं कि दायीं? क्योंकि मैं बायीं आंख का डाक्टर हूं। 
इसकी संभावना है। चीजें टूटती चली जाती हैं।
विज्ञानजो दूसरे को खंडित करता हैवह स्वयं भी खंडित होता चला जाता है। इसलिए वैज्ञानिकों के बीच कोई संवाद नहीं रहा है। एक वैज्ञानिक की बात दूसरा वैज्ञानिक नहीं समझ सकताइतना स्पेशलाइजेशन है। विज्ञान का डर अब यही है कि कहीं ऐसा न हो जाए कि ज्ञान की एक शाखा दूसरे से बिलकुल अपरिचित होतो कठिनाई खड़ी हो जाए।
जैसा हुआ है। पिछले महायुद्ध में जब एटम के प्रयोग शुरू हुएतो फिजिसिस्ट ने कहा कि कोई खतरा नहीं है। क्योंकि फिजिसिस्ट को बायोलाजी काजीवशास्त्र का कोई पता नहीं थाजीवशास्त्रियो से पूछा नहीं गया। हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराने के वक्त भौतिकशास्त्रियों से पूछा गयाक्योंकि उन्होंने एटम बम बनाया थाऔर जीवशास्त्रियों से पूछा नहीं गया कि जीवन 'पर इसका क्या परिणाम होगा।
यह तो परिणाम बाद में पता चलेकि परिणाम बड़े भयंकर हैं। और परिणाम एक दिन में समाप्त हो जाने वाले नहीं हैं। जो स्त्रियां गर्भवती थीं और बच गईंउनके गर्भ के बच्चे रेडियो—एक्टीविटी से भर गए। उनके बच्चे अब हजारों सदियों तकजब तक उनके बच्चों के बच्चे होते रहेंगेरुग्ण और बीमारपंगु होंगे।
जहां एटम गिरावहा तो लोग समाप्त हो ही गए लेकिन उस एटम से जो धुआ उठा और उसके साथ जो रेडियो—एक्टीविटी चारों तरफ फैल गई। सागर में गिरी वह राखमछलिया उससे विषाक्त हो गईं। अब उन मछलियों को शुद्ध करने का कोई उपाय नहीं। उन मछलियों को जिन लोगों ने खायाउनकी हड्डियों में रेडियो—एक्टीविटी प्रविष्ट हो गई। उनकी हड्डियां विषाक्त हो गईंउनका खून विषाक्त हो गया। उन मछलियों की खाद जिन वृक्षों में डाली गईवे विषाक्त हो गए। चल पड़ी यात्रा।
अब वैज्ञानिक कहते हैं कि उसे सम्हालने का कोई उपाय नहीं है। इतना विस्तार है जीवन का कि वह सब जगह प्रविष्ट हो गई। और लोगों ने सोचा थाभौतिकशास्त्रियों नेकि एक सीमा में प्रभाव होगा। लेकिन जगत इतना जुड़ा हुआ हैइतना जुड़ा हुआ है कि आप कल्पना ही नहीं कर सकते कि उसका प्रभाव किस भांति फैलता चला जाएगा। गायों के दूध में प्रविष्ट हौ गया। गायों का दूध बच्चों ने पीयावह बच्चों में प्रविष्ट हो गया। उन गायों के जो बच्चे होंगेवे पहले से ही आण्विक—प्रक्रिया से विषाक्त हो गए। यह पीछे पता चला कि जीवशास्त्री से पूछ लेना चाहिए था कि जीवन पर इसका क्या परिणाम होगा?
इसलिए पश्चिम में एक नया आंदोलन हैइकोलाजी। वे कहते हैं कि कोई भी काम करना हो तो समस्त शान की शाखाओं से पूछकर ही करना चाहिएक्योंकि जीवन इतना जुड़ा हुआ है। आपने तोड़ लिया है अलग—अलग विज्ञानलेकिन जीवन नहीं टूट गया हैजीवन इकट्ठा है। यहां छोटी—सी बात के परिणाम होंगे।
अब जैसे कि अभी चांद पर आदमी गयातो जो चांद पर ले जाने की व्यवस्था कर रहे थेअंतरिक्ष यात्री और यात्रा से संबंधित जो विज्ञान थेउनसे पूछ लिया गया। लेकिन जीवन इतना बड़ा है कि कोई विज्ञान उसे पूरा नहीं घेर पाता।  
सारी व्यवस्था के बाद भी एक भूल हो गईजो पीछे ही पता चली। जैसे ही चांद की यात्रा पर हमारे राकेट जाते हैंतो हमारे वायुमंडल में छिद्र कर जाते हैं। कोई दो सौ मील का वायुमंडल में छेद कर जाते है। और उस वायुमंडल के कारण आपको श्वास ही नहीं मिलतीउस वायुमंडल के कारण अंतरिक्ष से आने वाली जो विषाक्त किरणें हैंवे रोक ली जाती हैं। यह दो सौ मील की हवा का घेरा खतरनाक किरणों को भीतर नहीं आने देताइसलिए आप जीवित हैं। नहीं तो अंतरिक्ष सेचांद—तारों से बहुत तरह की किरणें आ रही हैजो अगर सब प्रविष्ट हो जाएं तो हम अभी समाप्त हो जाएं।
जब हमारे राकेट निकले वायुमंडल सेतो वे छेद कर गए। उन छिद्रों सेपहली दफा पृथ्वी के इतिहास मेंविषाक्त किरणें प्रविष्ट कर गईं। लेकिन जब वे प्रविष्ट कर गईंतब पता चला। कुछ वैज्ञानिकों का खयाल है कि कैंसर की बढ़ती हुई हालत वायुमंडल में हुए छिद्रों के कारण है। अब उसे रोकने का कोई उपाय नहीं है। और अब रोज अंतरिक्ष में जाने की बात चल रही है। और इन सारे तथ्यों को छिपाया जाता हैताकि आम आदमी को पता न चले।
सारे समुद्र विषाक्त होते जा रहे हैं। क्योंकि जो हमारी मिलें और फैक्ट्रियां जो जहर छोड़ रही हैंवह सागरों को विषाक्त कर रहा है। लेकिन जीवन संयुक्त है। सागर कोई ऐसी जगह नहीं है कि उसमें हमने छोड़ दिया...। सागर में पौधे हैंवे पौधे आक्सीजन पैदा करते हैं और वह आक्सीजन हम पीते हैं। उनके बिना हम जी नहीं सकते। वे पौधे मरते जा रहे हैं। उनके मर जाने पर हमारी आक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही है। वैज्ञानिक कहते हैं कि इन तीन सौ वर्षों में आक्सीजन इतना कम हुआ है कि यह आश्चर्य है कि आदमी जिंदा कैसे हैतो मुर्दा—मुर्दा जिंदा हैस्वास्थ्य खो गया है।
जीवन एक अखंडता है। सब चीजें जुड़ी हैं। जैसे कि मकड़ी का जाल हो और आप उस मकड़ी के जाल के एक धागे को हिला देंतो पूरा जाल हिल जाता है। ऐसा ही जीवन में आप जरा—सा कुछ करेंतो पूरे जीवन का जाल हिल जाता है। उस अखंड जाल का नाम परमेश्वर है।
विज्ञान तोड़ता हैखुद भी टूटता है। धर्म जोड़ता है और खुद जुड़ता है। इसलिए जिस दिन आदमी ठीक—ठीक प्रौढ़ होगाइस पृथ्वी पर एक ही धर्म रह जाएगा। और जितना विज्ञान बढ़ता जाएगाउतने अनंत विज्ञान होतें चले जाएंगे '
दूसरी बातपरमात्मा कोई सिद्धात नहीं हैपरमात्मा एक अनुभव है जैसे प्रेम एक अनुभव है। और जिसने कभी प्रेम नहीं कियावह कितने ही शास्त्र पढ़ ले प्रेम के ऊपरवह कितनी ही जानकारी इकट्ठी कर लेतो भी प्रेम का उसे कुछ भी पता नहीं चलेगा। और जिसने प्रेम किया हैउसने चाहे कोई भी शास्त्र न पढ़ा होतो भी प्रेम क्या हैइसका उसे अनुभव होगा।
परमात्मा कोई सिद्धात नहीं है। गणित में सिद्धात होते हैंउनको अनुभव करने की कोई जरूरत नहीं है। अनुभव का उनसे कोई संबंध नहीं है। धर्म में अनुभव होता हैसिद्धात नहीं। सिद्धात से उसका कोई संबंध नहीं है। इसलिए जो लोग सैद्धांतिक खोज करते हैंवे लोग व्यर्थ ही भटक जाते हैं। लेकिन जो अनुभव से अपने को बदलकर और किसी नई दिशा में प्रवेश करने की कोशिश करते हैंवे जरूर उसे उपलब्ध हो जाते हैं।
तीसरी बातआपके पास जो बुद्धि हैवह बुद्धि आपकी पूर्णता नहीं है। आप बुद्धि से बहुत ज्यादा हैं। जैसे मेरा हाथ सिर्फ मेरा हाथ हैहाथ से मैं बहुत ज्यादा हूं। मेरा पैर सिर्फ मेरा पैर हैमैं पैर से बहुत ज्यादा हूं। ऐसे ही बुद्धि भी मेरा एक उपकरण हैउससे मैं बहुत ज्यादा हूं। तो जो सिर्फ बुद्धि से खोज करेंगेवे परमात्‍मा तक नहीं पहुंचेंगे।

समग्र तक पहुंचना हो तो खुद भी समग्र होना पड़ेगा। बुद्धि एक अंग हैउपयोगी। लेकिन बुद्धि ने पूरी मालकियत कर ली है। और आपको ऐसा लगने लगा है बुद्धि की मालकियत से कि आप खोपड़ी के भीतर रहे हैं। अगर कोई आपसे पूछे कि आप कहां हैंतो आप इशारा करेंगे खोपड़ी के भीतर। यह एक बड़ी भारी दुर्घटना है।
बच्चा जब मां के पेट में होता हैतो मस्तिष्क न के बराबर होता हैलेकिन बच्चा पूरा होता है। और मस्तिष्क के बिना भी शरीर बढ़ता हैबड़ा होता है।
जीवन मस्तिष्क से पहले है। और जीवन की प्रक्रिया से मस्तिष्क पैदा होता है। जब बच्चा पैदा होता हैतो उसके पास केवल दस प्रतिशत मस्तिष्क होता है। फिर नब्बे प्रतिशत तो विकसित होगा। और जब मां के पेट में पहले दिन बच्चे का अणु निर्मित होता हैतब तो मस्तिष्क जैसी कोई चीज होती ही नहीं। लेकिन जीवन होता है। और जीवन फैलता है।
जिस तरह पैर बढ़ता हैहाथ बढ़ते हैंउसी तरह मस्तिष्क भी बढ़ता है। वह जीवन की एक शाखा है। शाखा को मूल मत समझें। और उस शाखा को ही सब समझकर जो जीने की कोशिश करेगाउसकी दृष्टि पंगु हो जाएगी।
इसलिए बुद्धि से जीने वाले लोग पंगु हो जाते हैंक्रिपिल्ड। जैसे कोई आदमी सिर्फ हाथ से ही जी रहा होऔर सारे शरीर को बांधकर रख दे। तो उस आदमी की क्या जिंदगी होगी! वह हाथ से ही देखने की भी कोशिश करेगा। हाथ से ही सुनने की भी कोशिश करेगा। हाथ से ही चलेगा भी। हाथ ही सब कुछ बना ले और सारे शरीर को बांधकर रख लेऐसी हमारी हालत है।
हमने मस्तिष्क को सब कुछ बना लिया है और सारे व्यक्तित्व को बांधकर रख दिया है। यह जकड़ा हुआबंधा हुआ व्यक्तित्व परम सत्य को नहीं जान सकता। इसलिए बुद्धि से थोड़ा गहरे उतरना जरूरी है। और जीवन के उस तल पर आना चाहिए जो बुद्धि के पहले थाऔर जिस दिन मस्तिष्क जल रहा होगा चिता मेंउस दिन भी होगा।
जीवन विराट शक्ति है। आप उस जीवन की विराट शक्ति का एक छोटा—सा पहलू हैं—मस्तिष्क में।
शिव ने पार्वती को दिए गए सूत्रों में एक सूत्र कहा है। और कहा है कि तू ऐसे जी जैसे मस्तिष्क नहीं है—हेड़लेस—जैसे खोपड़ी नहीं है। आप भी चकित होंगे। अगर आप चलते—उठते एक ही बात का स्मरण रख सकें कि खोपड़ी गईनहीं हैबिना खोपड़ी के सिर्फ धड़ ! अगर आप तीन महीने इसका अभ्यास कर सकें—जब भी स्मरण आ जाए तो बसखोपड़ी नहीं है—आप बहुत चकित होंगेआपकी जिंदगी में बड़े परिवर्तन हो जाएंगे।
क्योंकि खोपड़ी नहीं हैतो आप धीरे—धीरे हृदय की तरफ सरकने लगेंगेवह केंद्र बन जाएगा होने का। और खोपड़ी नहीं है तो आप बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे कि अब अशात कैसे होंखोपड़ी नहीं है तो अब बेचैन कैसे होंखोपड़ी नहीं है तो अब क्रोध कैसे करें न अब चिंतित कैसे हों?
खोपड़ी का त्याग सब उपद्रव का त्याग हो जाता है। अगर तीन महीने आप इस अभ्यास को करते रहेंआप पाएंगे आपकी चिंताए विसर्जित हो गईंआपके मन में चलने वाले तूफान और आंधिया खो गईं, और आप ज्यादा संतुलितशात और सौम्य हो गए। और हृदय में उतर आए।
लेकिन हृदय से भी नीचे एक और गहराई हैजो नाभि है। क्योंकि बच्चे के जीवन की पहली पूलक नाभि से शुरू होती है। हृदय से भी नीचे उतरने के उपाय हैं। और जब कोई व्यक्ति ठीक नाभि में पहूंच जाता हैतब अपने केंद्र परसेंटर पर आ गया। और उस केंद्र से ही परमात्मा से संबंध जुड़ सकत है।
अब हम इन सूत्रों में प्रवेश करें—
यह परमेश्‍वर बैठा हुआ ही दूर पहुंच जाता है सोता हुआ भी सब ओर चलता है। उस ऐश्‍वर्य के मद से उन्मत न होने वाले देव को मुझसे भिन्न दूसरा कौन जानने में समथ है!
यह काव्य की भाषा में द्वंद्व के ऊपर निर्द्वंद्व की सूचनाएं हैं।
वह परमेश्वर बैठा हुआ ही दूर पहुंच जाता है
यह विपरीत हो गई बातक्योंकि बैठा हुआ कोई कैसे दूर पहुंच सकता हैदूर पहुंचने के लिए चलना होगा। हम चलकर दूर पहुंच सकते हैं। यह काव्य की भाषा हैविपरीत को जोड़ने कीअपोजिट्स को एक साथ लाने की।
यम कह रहा है वह परमेश्वर बैठा हुआ ही दूर पहुंच जाता है सोता हुआ भी सब ओर चलता रहता है। उस ऐश्वर्य के मद से उन्मत न होने वाले देव को मुझसे मित्र दूसरा कौन जानने में समर्थ है!
हमने परमात्मा का एक नाम रखा हैईश्वर। ईश्वर का अर्थ होता हैऐश्वर्य से भरपूर। ईश्वर का अर्थ हैजिसके पास सारा ऐश्वर्य है। लेकिन जिसके पास थोड़ा—सा भी ऐश्वर्य होता हैउसके पास अहंकार निर्मित हो जाता है। जरा—सा धन हो तो धन गर्मी देने लगता है। जरा—सी संपदा हो तो आदमी उछलकर चलने लगता है। धन मद हैशराब है।
एक अमीर आदमी के पास से दिवाला निकल जाए तो सब नशा उखड़ जाता है। फिर उसकी चाल ऐसे हो जातीजैसे शराबी का जब नशा उतर जाता है तब चलता है—हैंगओवर। नशा भी नहीं हैलेकिन चाल लुस्त—पुस्त हो गई। पीया था कभीउसकी याद भर रह गई। लेकिन वह याद व्यथित किए जाती है। उसने एक खालीपन पैदा कर दिया।
ईश्वर परम ऐश्वर्य है। लेकिन द्वंद्व के अतीत की सूचना इस बात में है—उस ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त न होने वाले….। लेकिन मद वहा नहीं है। ऐश्वर्य वहा पूर्ण हैलेकिन मूर्च्छा और बेहोशी जरा भी नहीं है। अहंकार वहा नहीं है।
परमात्मा को अहंकार होतो समझ में आ सकता है। हमको अहंकार होता हैबिलकुल समझ में आने जैसा नहीं है। दीनदुर्बलना—कुछफिर भी अहंकार पकड़ता है कि मैं हूं। परमात्मा का अहंकार हो कि वह घोषणा करे कि मैं हूं तो समझ में आता हैलेकिन वहा कोई घोष?ग़ नहीं है। यहां हम दीन—दुर्बल घोषणा करते हैं कि मैं हूं और उसकी कोई घोषणा नहीं है!
इसीलिए आप कितना ही चिल्लाते रहें कि कहां है परमात्मामैं देखना चाहता हूं! आपकी आवाजेंआपके तर्कउसे इतना भी उत्तेजित नहीं कर पाते कि वह सामने आकर खड़ा हो जाए और कहे कि यह रहा मैं।
मैं वहा नहीं है। नहीं तो नास्तिकों ने उसे कभी का बुला लिया होता।
एक यूरोप का विचारशील नास्तिक हुआ—बर्क। वह एक विवाद में उतरा था एक पादरी के साथ। तो पहला ही तर्क बर्क ने उपस्थित किया। उसने अपनी घड़ी हाथ से निकाली और कहा कि मैं तुम्हारे परमात्मा बताना चाहता हूं कि अगर वह सर्वशक्तिमान हैतो इतना ही करे कि मेरी घड़ी को रोक दे इसी वक्तबंद कर चेले नअभी घड़ी में आठ बजा हैबस आठ पर ही काटा रुक जाए। इतना भी तुम्हारा परमात्मा कर दे, तो भी मैं समझ लूंगा कि वह है। लेकिन घड़ी चलती रही। परमात्मा ने इतना भी न किया। सर्वशक्तिमानइतनी छोटी—सी शक्ति भी न दिखा सकाजो कि एक छोटा बच्चा भी पटककर कर सकता था!
बर्क ने कहा कि प्रमाण जाहिर है। कोई परमात्मा नहीं है।
लेकिन बर्क कर क्या रहा थावह सिर्फ अहंकार को चोट पहुंचा रहा था। वह यह कह रहा है कि अगर होतो इतना—सा करके दिखा दो। बर्क समझ ही नहीं पा रहा। मुद्दे की बात ही उसकी चूक गई। परमात्मा के पास कोई अहंकार नहीं हैआप इसलिए उसे उत्तेजित नहीं कर सकते। उत्तेजित उसे किया जा सकता है जहा अस्मिता हो।
असल में क्षुद्र को ही उत्तेजित किया जा सकता हैविराट को उत्तेजित करने का कोई उपाय नहीं है। असल में सिर्फ चाय की प्यालियों में ही तूफान लाए जा सकते हैं। विराट में आपकी बातें तूफान नहीं उठा सकतीं। उनसे कोई चोट ही नहीं पड़ती। वे हों या न होंकोई भेद नहीं होता।
यह सूत्र सूचना कर रहा है कि परम ऐश्वर्यवानलेकिन ऐश्वर्य के मद से शून्य?
यह विपरीतता को जोड़ना है। छोटा—सा भी ऐश्वर्य अहंकार देता हैविराट ऐश्वर्य—अगर गणित से हम चलें—तो महान अहंकार देगा। लेकिन धर्म गणित की भाषा नहीं है। जितना बड़ा ऐश्वर्यजितना विराट अनंत ऐश्वर्यउतना ही शून्य अहंकार। इसे अगर हम मनोविज्ञान की भाषा में समझें तो बहुत आसान होगा।
पश्चिम में एक बहुत कीमती मनोवैज्ञानिक हुआएडलर। और एडलर ने अपने पूरे मनस—शास्त्र का आधार रखा—इनफिरियारिटी कांप्लेक्सहीनता का भाव। और एडलर ने कहा कि मनुष्य की सारी चेष्टाएं हीनता की ग्रंथि से पैदा होती हैं। जो आदमी बड़े पद पर पहुंचना चाहता हैएडलर का कहना हैउसको भीतर लगता है कि मैं ना—कुछ हूं। ना—कुछ की बात को पोंछने के लिए वह बड़ी कुर्सी पर बैठना चाहता है। राजनीतिज्ञों से ज्यादा हीन—ग्रंथि से पीड़ित और कोई भी नहीं होता। एडलर ने कहा है कि लिंकन या लेनिन या हिटलर या कोई औरये सब किसी न किसी हीनता की ग्रंथि से पीड़ित हैं और उस हीनता की ग्रंथि को भरने के लिए दौड़ पड़ते हैं।
लेनिन के पैर छोटे थे। ऊपर का हिस्सा बड़ा था शरीर कानीचे का हिस्सा छोटा था। वह कुर्सी पर बैठता था तो उसके पैर जमीन को नहीं छूते थे। इससे वह बड़ा पीड़ित था। तो उसने रूस के सबसे बड़े सिंहासन पर बैठकर दिखा दिया कि तुम्हारे पैर जमीन पर पहुंचते हों भलालेकिन मेरे पैर सिंहासन पर पहुंच जाते हैं।
एडलर का कहना है कि वह हीनता की ग्रंथि उसको खींचती ही रही। हिटलरशक है कि नपुंसक था। उसकी नपुंसकता शक्ति की दौड़ बन गई। और यह दौड़ इतनी बड़ी बन गई कि उसकी आकांक्षा थी कि सारी दुनिया को मुट्ठी में लेकर बता दे कि तुम्हारी पुंसकतातुम्हारी शक्ति क्या है त्र
विपरीत दौड़ पैदा हो जाती है। अगर कोई आदमी कुरूप हैतो वह किसी न किसी ढंग से उस कुरूपता को पूरा करने की कोशिश करता है। अगर कोई आदमी अंधा हैतो उसकी आंख  की सारी शक्ति कानों को उपलब्ध हो जाती है। इसलिए अंधे जितने ढंग से सुनते हैंकोई आंख  वाला नहीं सुन सकता। और अंधे अक्सर संगीत में प्रवीण हो जाते हैं। क्योंकि आंख  की शक्ति दौड़कर कान को मिल जाती है। वह जो आंख  की कमी थीकान से अंधा पूरा करने लगता है। जहा—जहा कमी हैउसको ढांकने के लिए उससे विपरीत हमें कुछ करना पड़ता है।
 एडलर ने कहा है कि आदमी को जो अहंकार पैदा होता हैवह हीनता के कारण है। धन की कमी के कारण हो जाती है। जिन लोगों के जीवन में भी प्रेम की कमी हैवे धन के दीवाने हो जाते हैं। जिन्हें प्रेनहीं मिलावे फिर कंकड़—पत्थर वाला स्वर्ण इकट्ठा करने में लग जाते हैं।
यह बड़े मजे की बात है कि अगर कोई आदमी ठीक—ठीक प्रेम से भरा होतो कंजूस नहीं हो सकता और कंजूस आदमी प्रेमी नहीं हो सकता। क्योंकि असल में कंजूस प्रेम की कमी को ही धन से पूरा करने की कोशिश करता है। जिसके जीवन में प्रेम हैउसके जीवन में एक सुरक्षा हैं। वह जानता है कि मैं भूखा नहीं मरूंगा। वह जानता हैमैं का हो जाऊंगातो कोई न कोई मेरी सेवा कर देगा।
लेकिन जिसके जीवन में प्रेम नहीं हैवह घबड़ाया हुआ हैवह असुरक्षित है। वह जानता है कि अगर मैं का हो गयातो कोई मेरी तरफ देखने वाला भी नहीं है। उसकी पूर्ति वह धन की तरफ पकड़ से करेगा। धन इकट्ठा करने लगेगाक्योंकि अब धन ही सुरक्षा है। जिसके जीवन में प्रेम की सुरक्षा नहीं हैउसके जीवन में धन की सुरक्षा का भाव पैदा हो जाएगा।
हम पूर्ति करते हैंछिपाते हैंढांकते हैं। हमारे सारे व्यवहार को हम गौर से देखें तो एडलर की बात सच मालूम पड़ती है।
परमात्मा के पास सब कुछ हैइसलिए हीनता की कोई ग्रंथि नहीं हो सकती। इसलिए जो व्यक्ति जितना परमात्मा के करीब पहुंचने लगता हैउतना ही निरअहंकारी होता चला जाता है। जिसके पास जितना ज्यादा हैउतना. ही अहंकार कम होने लगता हैऔर जिसके पास जितना कम हैउतना ही ज्यादा अहंकार होता है। अहंकार दरिद्रभिखारी का प्रतीक है। निरअहंकारिता सम्राट होने की सूचना है।
स्वभावत:जिसके पास जगत की समग्र समग्रता हैउसके पास मैं होने का कोई भी खयाल न होगा। ये विपरीत को जोड़ने के प्रयास हैंकाव्य के ढंग से।
और एक बड़े मजे की बात यम कह रहा है कि उस ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त न होने वाले देव कोमुझसे भिन्न दूसरा कौन जानने में समर्थ है?
मृत्यु के अतिरिक्त उस परमात्मा को कोई भी जानने में समर्थ नहीं है। क्योंक्योंकि जब तक आप मरते नहींमिटते नहींखोते नहींतब तक आप उससे नहीं जुड़ सकते। जब तक आपका अहंकार जल नहीं जाताराख नहीं हो जातातब तक आप उस निरअहंकार के तत्व के साथ एकता नहीं बना सकते। उससे मिलना हो तो उस जैसे हो जाना जरूरी है। समान ही समान से मिल सकता है।
आप अभी बिलकुल उससे विपरीत हैंऔर पूछते हैंईश्वर कहां हैआप पीठ किए खड़े हैं सूरज की तरफऔर पूछते हैंसूरज कहां हैकोई उपाय नहीं हैअगर आप पीठ किए खड़े रहें। सूरज हैआपकी ही पीठ ने छिपाया है। और आप कहते हैंजब तक सिद्ध न हो जाए कि सूरज हैतब तक मैं पीठ क्यों मोडू पहले सिद्ध हो कि सूरज है तो फिर मैं चेष्टा करूं। सभी तार्किक यही कह रहे हैं।
धार्मिक कहता है कि तुम पीठ मोड़ोतभी सूरज है। तुम बदलो अपने को। इस अहंकार को छोड़ो। यह यम का सूत्र बड़ा कीमती हैकि मेरे अतिरिक्त—मृत्यु के अतिरिक्त—उसे जानने में और कोई भी समर्थ नहीं है। इसलिए जो मरने को राजी हैमिटने को राजी है...।
जीसस ने कहा हैजो अपने को खोएंगेवे ही बचेंगे। और जो अपने को बचाएंगेउनके बचने का कोई उपाय नहीं है।

एक विसर्जनजैसे बूंद गिर जाए सागर में और अपने को खो देऐसा जब कोई व्यक्ति राजी हो जाता है गिरने को,  खोने कोसमर्पितनिवेदित होने कोतत्क्षण अहंकार विसर्जित हो जाता है। और अहंकार के विसर्जित होते ही भीतर की छिपी हीनता तिरोहित हो जाती है।
जब आप अहंकार से भरे हैंआप भीतर हीन रहेंगे। हीनता को मिटा नहीं रहे हैं आपसिर्फ ढांक रहे है। जैसे कोई घाव होऔर हम घाव पर पट्टियां बांध लें सुंदर रेशम कीमखमल की। वे पट्टियां कितनी ही सुंदर होंऔर देखने वालों को कितना ही आकर्षित करेंउन पट्टियों के कारण घाव मिटता नहीं है। बल्कि खतरा यह है कि घाव खुला होता तो शायद मिट भी जाता—सूरज की किरणें पड़तीहवा पड़तीप्रकृति उसे भर देती—ढका हुआ घाव और नासूर बनता चला जाएगा।
हम अपनी हीनता को दबा रहे हैंछिपा रहे हैं। कोई धन सेकोई पद सेकोई ज्ञान सेकोई त्याग से। कोई न कोई उपाय करके हम कह रहे हैं कि मैं कुछ हूं। समबडी का हम भाव पैदा कर रहे हैं और भीतर नोबडीना—कुछ की हालत है।
धार्मिक व्यक्ति मृत्यु से गुजरता हैउसका अर्थ है कि वह इस कुछ होने की बातफिजूल बात को जो ऊपर से थोपी हैछोड़ देता है और ना—कुछ होने वाली बात से पूरी तरह राजी हो जाता है।
यह रहस्यपूर्ण सूत्र है। जो ना—कुछ होने से राजी हैवह सब कुछ के साथ एक हो जाता है। और जो कुछ बनने की कोशिश में लगा हैवह सिकुड़ता रहता हैसड़ता रहता है। वह विराट के साथ संबंधित नहीं हो पाता है। ना—कुछ की पीड़ा छोड़ देंऔर ना—कुछ के भाव को सहज स्वीकार कर लेंयही भक्त की दशा है।
इसलिए यम कह रहा है कि मेरे अतिरिक्तउसे जानने में कौन समर्थ है?
जो स्थिर न रहने वाले विनाशशील शरीरों में शरीररहित एवं अविचलभाव से स्थित है उस महान सर्वव्यापी परमात्मा को जानकर बुद्धिमान महापुरुष कभी किसी कारण से शोक नहीं करता।
जो स्थिर न रहने वाले विनाशशील शरीरों में शरीररहित अविचलभाव से स्थित है..?
शरीर तो परिवर्तनशील है। इस परिवर्तनशील के भीतर वह अपरिवर्तनशील छिपा है। विरोध को जोड़ने की निरंतर चेष्टा हैताकि अखंड का स्मरण आ जाए। परिवर्तन के भीतर नित्य छिपा है। मरणधर्मा के भीतर अमृत छिपा है। वह जो प्रवाहशील हैउसके भीतर ध्रुव छिपा है। और जो व्यक्ति इस भीतर के अमृतनित्य को जानने में समर्थ हो जाता हैफिर उसे कोई शोककोई दुख ग्रसित नहीं कर सकते।
सारा दुख एक ही बात का है कि हम परिवर्तन से बंधे हैं। और परिवर्तन का अर्थ ही है कि वह बदलेगा। और हम नहीं चाहते हैं कि वह बदले। जवान चाहता है कि शरीर बूढ़ा न हो जाए शरीर का होगा। का चाहता है कि मर न जाएशरीर मरेगा। तो जिससे हम बंधे हैं और जिसको हम रोक रखना चाहते हैंवह रुकने वाला नहीं है। जैसे कोई आदमी नदी के किनारे बैठा है और सोच रहा है कि नदी न बहेऔर बहेगी तो दुखी होगा। क्योंकि अपेक्षा पूरी नहीं होती।
सब कुछ बह रहा है। सब कुछ क्षणभंगुर है। लेकिन उस क्षणभंगुर को हम पकड़कर शाश्वत बनाना चाहते हैं। उसी से हमारा दुख पैदा होता हैक्योंकि वह शाश्वत हो नहीं सकता।
एक युवक एक युवती के प्रेम में होतो वह उससे कहता है कि सदा—सदा तुझे प्रेम करूंगा। वह युवती भी सोचती है कि सदा—सदा यह प्रेम रहेगा! लेकिन जो बोल रहा हैजहा से यह बात बोली जा रही हैवह देहवह मस्तिष्कवह मन क्षणभंगुर है। इससे कही गई कोई भी बात शाश्वत नहीं हो सकती। कल प्रेम बदल जाएगाराख रह जाएगी पीछे। दीया बुझ जाएगाबुझी हुई ज्योति रह जाएगी पीछे। तब पीड़ा होगी। तब लगेगाकिसी ने धोखा दिया। कहा था कि सदा—सदा प्रेम करूंगाऔर यह प्रेम दिनभर भी न टिका,  दुख होगा।  
लेकिन दुख का कारण यह नहीं कि किसी ने आपको धोखा दिया। किसी ने धोखा नहीं दिया। परिर्वन के साथ जो भी शाश्वत बनाने की आकांक्षा रखता हैवह दुख में पड़ता है। उस युवक को भी उस क्षण ऐसा ही लगा था कि सदा—सदा प्रेम करूंगाकोई धोखा नहीं दे रहा था। और अब लग रहा है कि प्रेम गयाअब क्या कर सकता है!
ईसाइयों का एक संप्रदाय है—क्वेकर। जमीन पर थोड़े से संप्रदाय जो सच में गहरे रूप में धार्मिक होने की कोशिश करते हैंउनमें क्वेकर्स एक हैं। वे किसी तरह का आश्वासन नहीं देतेकोई प्रामिस नहीं देते। क्योंकि वे कहते हैंक्षणभंगुर मन से क्या आश्वासन देंअपना ही भरोसा नहीं है कि कल यही रहेंगेतो आश्वासन क्या दें?
क्वेकर अदालत में कसम नहीं खातेइसलिए सैकड़ों क्वेकर्स ने सजा खाई हैसिर्फ इसलिए कि वे अदालत में कसम नहीं खाते। वे कहते हैंकसम खाए कौनकल का भरोसा नहीं है। क्षणभर के बाद हम बदल सकते हैं। कसम तो वह खाएजिसे शाश्वत का भरोसा हो। अदालत कहती है कि खाओ कसम बाइबिल पर हाथ रखकर कि तुम सत्य ही बोलोगे। क्वेकर कहता है कि मैं कसम भी खा लूं तो भी क्या फर्क पड़ता है! क्षणभर बाद मेरा मन सत्य न बोलना चाहे तो मैं क्या करूंगाइसलिए कसम नहीं खाता। इसलिए कोई आश्वासन नहीं देता। इसलिए क्वेकर कहता है कि कल का कोई भरोसा नहीं है। अपना ही भरोसा नहीं है। सब बदल रहा है। नदी की तरह सब बहा जा रहा है।
बहती हुई धारा में जो ठहरने की कोशिश करता हैवह दुख पाएगा। वह धारा ठहर नहीं सकतीवह उसका स्वभाव नहीं है।
सिर्फ वही व्यक्ति शोक के पार हो जाता हैशोकवीत हो जाता हैजो भीतर छिपे हुए अविचल को पकड़ लेता है। उसके साथ फिर कभी कोई परिवर्तन नहींइसलिए कभी कोई दुख नहीं। वह भीतर का तत्व न कभी का होता हैन कभी मरता हैन कभी बदलता है। वह सदा एकरस है।
यह जो भीतर का अविचल तत्व है यह परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से न बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही प्राप्त हो सकता है। जिसको यह स्वीकार कर लेता है उसके द्वारा ही प्राप्त कियो जा सकता है क्योंकि यह परमात्मा उसके लिए अपने यथार्थ स्वरूप को प्रगट कर देता है।
यह थोड़ा—सा कठिन सूत्र है। पर बहुत अनिवार्य है कि ठीक से समझ लिया जाए। इस पर बहुत कुछ निर्भर होता है।
न तो प्रवचन से......।
कितना ही शास्त्र को पढ़ेंसुनेंसमझेंवह परमात्मा उपलब्ध नहीं होता। कोरे शब्द ही हाथ आते हैंपांडित्य इकट्ठा हो जाता है। बुद्धि भर जाती है। स्मृति सघन हो जाती है। प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैंलेकिन कोई समाधान नहीं मिलता। आत्मा अतृप्त ही रह जाती है।
यह ऐसे ही हैजैसे किसी को प्यास लगी हो और आप उसको समझाएं कि पानी का अर्थ है—एच टू ओ। पानी आक्सीजन और हाइड्रोजन से मिलकर बनता है। और दो उदजन के परमाणु और एक अक्षजन का परमाणुतीनों से मिलकर पानी बनता है। पानी कोई तत्व नहीं हैअसली तत्व आक्सीजनउदजन है। ओर जो एच टू ओ को समझ लेता हैउसने जल को समझ लिया। वह आदमी कहेगासब ठीकलेकिन—मेरी प्‍यास।
ध्‍यान रहे, एच टू ओ से प्यास नहीं बुझती। लिखते रहें बैठकर कागज पर एच टू ओएच टू ओ...। कई लोग लिख रहे है—रामरामकृष्णकृष्ण। लिखे जा रहे हैं! एक पागल आदमी मुझे मिलाउसने एक पूरी लाईब्रेरी बना रखी है। हजारों किताबें भरी रखी हैं। और पूरे मुल्क में उनके भक्त हैं जो लिख लिख—कर—रामरामरामराम—कापियां भर—भरकर वहां भेजते रहते हैं। उनकी लाइब्रेरी में बस ये सिर्फे राम—राम लिखी हुई कापियां हैं। एच टू ओ लिखने से प्यास नहीं बुझती और न राम—राम लिखने से कोई राम को उपलब्ध होता है। समय व्यर्थ होता है। मूढ़ता के प्रतीक हैं।
लेकिन मूढ़ों की कोई कमी नहीं है। सब तरफ हैं। वह आदमी दिन में सुबह बैठकर घंटे दो घंटे खराब करके सोचता हैबड़ा काम कर लिया! क्या होगा तुम्हारे राम—राम लिखते रहने सेयह काम तो प्रेस कर दे सकता है। इसके लिए तुम्हें अपनी बुद्धि लगाने की जरा भी जरूरत नहीं है। और जो प्रेस कर देतो प्रेस कोई परमात्मा को उपलब्ध नहीं होता। आप भी उपलब्ध नहीं हो जाएंगे।
वह परमात्मा न तो प्रवचन से उपलब्ध होता है न शास्त्र से न बुद्धि से न बहुत सुनने से।
कोई उपाय नहीं हैं ये उसको पाने के। उसको पाने का तो एक ही उपाय है। और बड़ी अजीब बात यम कह रहा हैवह यह कह रहा है कि जब वह तुम्हे स्वीकार कर ले...।
वहपरमात्मा जब तुम्हें स्वीकार कर लेतब उपलब्ध होता है। बड़ी झंझट की बात है। इसका अर्थ यह हुआ कि तुम उसके योग्य जिस दिन हो जाओ। तुम अपने को बदलो और इस योग्य बनाओ कि वह तुम्हें स्वीकार कर लेबस उसी दिन उपलब्ध होता है।
तुम्हारा आत्मिक रूपांतरणतुम्हारी पात्रतातुम्हारा इस भांति हो जाना कि कोई उपाय ही न रहे कि तुम्हें अस्वीकार किया जा सके। तुम्हें उसे स्वीकार करना ही पड़े। वह तुम्हें स्वीकार कर ही ले। तुम्हारी ऐसी शुद्धता और निर्दोषता और सरलतातुम्हारे आचरण में ऐसी सुगंधतुम्हारे व्यक्तित्व में ऐसी सात्विकतातुम्हारे होने का ढंग ऐसा ध्यानपूर्ण हो जाए कि उसे तुम्हें स्वीकार करना ही पड़े। तुम उसे मजबूर कर दो। उस स्थिति के अतिरिक्त वह कभी किसी को उपलब्ध नही होता है।
शास्त्र पढ़ना बहुत आसान हैजीवन को बदलना बहुत कठिन है। और लोग हमेशा शार्टकट खोजते हैं। जिंदगी में कोई शार्टकट नहीं होते। जिंदगी में तो ठीक रास्ते से ही चलना पड़ता है। रास्ते की पीड़ा भी भोगनी पड़ती हैकष्ट भी झेलने पड़ते हैं। मार्ग के उपद्रव भी सहने पड़ते हैं। भटकनयात्रा का श्रमवह सब करना पड़ता हैतो ही कोई पहुंचता है। वह श्रम इसलिए जरूरी है कि उसी श्रम से आप रूपांतरित होते हैंबदलते हैंनए होते हैं। यात्रा सिर्फ यात्रा नहीं हैयात्रा रूपांतरण भी है।
यम यह कह रहा है कि जिसको यह स्वीकार कर लेता है उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि यह परमात्मा उसके लिए अपने यथार्थ स्वरूप को प्रगट कर देता है।
अगर आपको परमात्मा दिखाई नहीं पड़तातो आप समझना कि कहीं न कहीं आपमें कुछ ऐसी भूल हैकहीं न कहीं कोई ऐसी बाधा हैजिसके कारण परमात्मा अपने को प्रगट नहीं कर पा रहा है। शायद आप आंख  बंद किए खड़े हैं। सूरज सामने है और दिखाई नहीं पड़ रहा है। और अंधे को हम कितना ही प्रवचन दें सूरज के संबंध मेंक्या होगाआंख  खोलनी पड़ेगी। व्यक्तित्व को खोलना पड़ेगा।
ध्यान की सारी प्रक्रियाएं व्यक्तित्व को खोलने की प्रक्रियाएं हैं। प्रवचनशास्त्रसब बौद्धिक हैं। ध्यान हार्दिक है। और ध्यान आपको बदलेगा। क्योंकि ध्यान का अर्थ है कछ आपको करना पड़ है।
एक मित्र मेरे पास आए और उन्होंने कहाआपकी बातें सुनकर बहुत अच्छा लगता है। बहुत भाती हैं। मैंने कहावे कितनी ही भाएं और कितनी ही अच्छी लगेंउनसे कुछ होगा नहीं। वह मनोरंज है। अच्‍छा लगता हैठीक है। किसी को फिल्म देखनी अच्छी लगती हैकिसी को रेडियो सुनना  अच्‍छा लगता है; आपको मेरी बात सुननी अच्छी लगती हैपर होगा क्याजब तक आप कुछ न करेंगेकुछ भी न होगा। जब तक आप न बदलेंगेकुछ भी न होगा। मेरी बातें इतना ही कर सकती हैं कि आपको बदलनें के लिए, प्रेरित कर देंबस और कुछ भी नहीं कर सकतीं।
बुद्धपुरुष प्यास जगाते हैंसत्य नहीं दे सकते। लेकिन अगर आप प्यास के जगने में ही मजा लेने लगें तो भी मुश्किल हो गई। प्यास ही जग जाए तो क्या होगासागर की यात्रा तो आपको करनी पड़ेगी। इसमें कभी झंझट भी हो सकती है। प्यास जगते—जगते आप झंझट में पड़ सकते हैं। यह प्यास ही अगर रस बन जाए कि सुनने में अच्छा लगता हैपढ़ने में अच्छा लगता हैबुद्धि तृप्त होती हैतो आप जल की तरफ कब जाएंगेसरोवर कब खोजेंगे?
यम ठीक कह रहा है सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा भी इस परमात्मा को न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है जो बुरे आचरणों से निवृत्त नहीं हुआ...।
कितनी ही सूक्ष्म बुद्धि होऔर कितना ही प्रगाढ़ चिंतन होऔर कितना ही तर्कनिष्ठ व्यक्तित्व होतो भी परमात्मा को मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकताजो बुरे आचरणों से निवृत्त नहीं हुआ है।
न वह प्राप्त कर सकता है जो अशांत है न वह कि जिसके मन तथा इंद्रियां संयत नहीं हैं। और न वही प्राप्त करता है जिसका मन शांत नहीं है।
आचरण भी एक तरह की मूर्च्छा या जागृति है। आप बुरा करते हैं इसलिए कि बेहोश हैं। होश में होंगेतो बुरा न कर पाएंगे। जागे हुए होंगे तो बुरा होना बंद हो जाएगा। सोए हुए हैंइसलिए बुरा होता है।
एक आदमी शराब पी लेता हैफिर वह जो भी व्यवहार करता हैवह जो गालियां बकने लगता हैया किसी को चोट पहुंचा देता है—तो हम उससे नहीं कहते कि तू गालिया बकना बंद करतू किसी को चोट मत पहुंचा। यह कहना व्यर्थ है। वह शराबी हैउसे कुछ सुनाई भी नहीं पड़ रहा हैसमझ भी नहीं पड़ रहा है। ज्यादा से ज्यादा यही हो सकता है कि वह आपको गालियां देने लगेकि आपको ही चोट कर बैठे। हम अगर समझाएं भी तो हम यह समझाते हैं कि तू शराब मत पी। क्योंकि हम जानते हैं कि जब वह शराब में ज़हीं होताबेहोश नहीं होतातो न गालियां बकता हैन दुराचरण करता है। इसलिए असली सवाल उसका आचरण कमउसके होश को बढ़ाना ज्यादा हैउसकी बेहोशी को कम करना ज्यादा है।
यम कह रहा है कि आप कितना ही सोच—विचार की बातें करेंकितनी ही समझदारी की बातें करेंलेकिन अगर आपका आचरण नहीं बदलता हैतो वह खबर दे रहा है कि आप भीतर से बेहोश हैं। यह बेहोशी जब तक न टूट जाए! और इस बेहोशी के साथ जुड़ी है अशांतिइस बेहोशी के साथ जुड़ा है इंद्रियों का असंयम! जब तक यह टूट न जाए असंयमइंद्रियां संयत न हो जाएँमन शात न हो जाएआप थिर न हो जाएं भीतरतब तक कोई उस परमात्मा को उपलब्ध नहीं होता है।
संहारकाल में जिस परमेश्वर के ब्राह्मण और क्षत्रिय ये दोनों ही अर्थात संपूर्ण प्राणिमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करने वाली मृत्यु भी जिसका उपसेचन अर्थात भोज्य वस्तु के साथ लगाकर खाने का व्यंजन तरकारी आदि बन जाता है वह परमेश्वर जहां और जैसा है यह ठीक— ठीक कौन जानता है।
यह भी थोड़ा समझ लेने जैसा है। परमात्मा को जाना जा सकता हैलेकिन ठीक—ठीक कभी नहीं जाना जा सकता है। क्योंकि ठीक—ठीक जानने का अर्थ हुआ कि जानने वाला बड़ा हो जाएगा। आप ठीक—ठीक उसे ही जान सकते है, जो आपसे छोटा होजिसको आप चारों तरफ से घेर लेंजिसको आप सब तरफ से घेर लें, जिको आप सब तरफ से समझ लें।
परमात्‍मा को ठीक—ठीक कभी भी कोई नहीं जान सकता। वह रहस्य है और रहस्य ही रहेगा। आप उसमें कूद सकते हैंजान सकते हैं कि जान लियापहचान सकते हैं कि पहचान लियाएक हो गए। लेकिन फिर भी आप यह नहीं कह सकते कि ठीक—ठीक जान लिया। आपके जानने में थोड़ी कमी सदा ही रह जाएगी। क्योंकि वह आपसे बड़ा है। वह विराट है। उससे संबंध हो जाएगालेकिन उसका पूरा ज्ञान कभी नहीं हो सकता।
यह थोड़ा समझ लेने जैसा है।
जैसे एक आदमी सागर में कूद जाए। तो सागर में कूद जाना एक बात है। सागर में डुबकी लगा लीयह एक बात है। और लौटकर वह यह भी कहे कि मैं सागर में स्नान करके लौटा हूं सागर को जान कर लौटायह भी ठीक है। लेकिन सागर बहुत बड़ा है। उस सागर के एक किनारे एक छोटे से जल की परिधि को जानकर लौटा है। और वह आदमी सागर में ही रहने लगेतो भी सागर के एक अंग को और हिस्से को जानेगा। एक अर्थ में तो जान लिया उसनेक्योंकि सागर की एक बूंद भी कोई जान ले तो पूरे सागर का समझ में आ गया। क्योंकि सागर की एक बूंद में भी वह सब कुछ छिपा हैजो सागर में विराट है। लेकिन
इसे थोड़ा समझें।
विज्ञान का पूरा जोर है इस बात पर कि हर चीज जानी जा सकती हैपूरी—पूरी जानी जा सकती है। और धर्म का जोर है इस बात पर कि सब कुछ जाना जा सकता हैलेकिन पूरा—पूरा कभी भी नहीं। रहस्य शेष रहेगा। दि मिस्ट्री रिमेन्स।
धर्म इसलिए रहस्यवादी है। और विज्ञान रहस्य का शत्रु है। वैज्ञानिक कहते हैं कि विज्ञान की परिभाषा हैडिमिस्ट्रीफिकेशन—जहा—जहा रहस्य हैउसको तोड़ना। जहां—जहा रहस्य हैवहा साफ—साफ करना। जहां—जहां चीजें धुंधली हैंउनको प्रगट करना। और उस दिन विज्ञान पूरी तरह सफल होगाजिस दिन जगत में कोई रहस्य नहीं रह जाएगा। जिस दिन आप कुछ भी पूछेंउसका उत्तर विज्ञान के पास होगा। धर्म कहता हैऐसा कभी भी नहीं होगा। और जो विज्ञान में भी बहुत गहरे गए हैंजैसे आइंस्टीन या प्लांक या ओपनहोइमर जैसे लोगवे भी यही कहते हैं।
विज्ञान जो स्कूल में पढ़ाता हैवह कोई वैज्ञानिक नहीं है। या कालेज मेंयूनिवर्सिटी में जो विज्ञान पढ़ाता हैवह कोई वैज्ञानिक नहीं है। ये तो सिर्फ विज्ञान के पंडित हैं। ये प्रश्न और उत्तर जानते हैं। आइंस्टीन जैसा व्यक्तिजो कि विज्ञान का संत हैजो विज्ञान में बहुत गहरे गया हैवह आखिरी क्षण में कहता है—अपने जीवन की अंतिम ऊंचाई पर कहता है—कि रहस्य कभी समाप्त न होगा। और हम जितना ही खोज लेते हैंउतना ही रहस्य बड़ा होता जाता हैकम नहीं होता। क्योंकि जो भी हम खोजते हैंउस पर नए प्रश्न खड़े हो जाते हैं।
धर्म की यह प्रतीति है कि जगत अनंत रहस्य है। इसलिए यम कहता हैठीक—ठीक कौन जान सकता है! उससे बड़ा कोई भी नहीं है। ज्ञाता हमेशा ज्ञेय से बड़ा होतो ही पूरा—पूरा जान सकता है। लेकिन यहां ज्ञात है छोटाऔर ज्ञेय है बड़ा। यहां एक तितली के पंख हैंऔर विराट आकाश हैअंतहीन। इन तितली के पंखो से इस पूरे विराट आकाश को कैसे जाना जा सकता है!
इसका यह मतलब नहीं है कि कोई निराश हो जाए। तितली आकाश में उड़ सकती है। और आकाश में उड़ने का पूरा आनंद ले सकती है। और पूरे को जानने की जरूरत भी क्या है! अपने पंख जहां तक ले जाएं उसके लिए काफी हैकाफी से ज्यादा है।
ज्ञान अनंत यात्रा हैकभी भी चुकता नहीं और समाप्त नहीं होता। यही अर्थ है अनंत सत्य काअंनत सत्‍य का जिसका न कोई प्रारंभ हैन कोई अंत है।
शुभ कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य शरीर में परब्रह्म के उत्तम निवासस्थान हृदय—आकाश में बुद्धिरूप परमगुफा में छिपे हुए सत्य का पान करने वाले व अवश्यंभावी कर्म का भोग करने वाले दो भिन्न तत्व हैं। वे छाया और धूप की भांति परस्पर भिन्न हैं यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष कहते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति के भीतरउपनिषदों की धारणा हैकि दो तत्व हैं। और वह धारणा अत्यंत सही है। एक तो है आपके भीतर ज्ञाता और एक है आपके भीतर भोक्ता। उपनिषदों ने कहा हैजैसे एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हों। एक पक्षी ऊपर बैठा हो और एक नीचे बैठा हो। नीचे का पक्षी उछलता हैकूदता हैफल चखता हैनाचता हैप्रेम करता हैपुकार देता है प्रेयसी कोसब करता है। ऊपर का पक्षी सिर्फ बैठकर नीचे के पक्षी को देखता रहता है। वह कुछ करता नहींया सिर्फ देखना ही उसका करना है।
उपनिषद कहते हैंप्रत्येक व्यक्ति के भीतर दो तत्व हैं। एक उसके भीतर द्रष्टा है जो सिर्फ देखता हैजस्ट विटनेसिंगसिर्फ साक्षी हैवह कुछ नहीं करता। और एक उसके नीचे तत्व है जो कर्ता है—दुकान चलाता हैलड़ता हैझागड़ता हैमित्रता बनाता हैप्रेम करता हैगृहस्थी बनाता हैसंन्यास लेता है। वह कर्ता है। और पीछे एक सिर्फ देखता है—राग—विरागअच्छा—बुराअधार्मिक—धार्मिकशुभ कर्मअशुभ कर्म। और दूसरा कर्ता है।
करने वाला तत्व आप नहीं हैं। करने वाला तत्व आपके अनंत जन्मों के कर्मों का जोड़ है। और जब तक वह करने वाला तत्व पूरा न बिखर जाएतब तक मुक्ति नहीं होती। उसे चाहें आप मन कहें—बौद्धों ने उसे संघात कहाजैनों ने उसे कर्म—मल कहा—या उसे आप कर्ता—तत्व कहेंजैसा उपनिषद कहते हैं। लेकिन उससे भी गहरे में एक देखने वाला है।
इसे ऐसा समझेंएक चोर चोरी करने जा रहा है। जब चोर चोरी करने जा रहा हैतब भी उसके भीतर कोई जानता है कि मैं चोरी करने जा रहा हूं। यह जानने वाला है भीतर। आप दुकान चला रहे हैं। कोई भीतर जानता है कि आप दुकान चला रहे हैं। आप जवान हैं। कोई भीतर जानता है कि आप जवान हैंऔर के होते जा रहे हैं। बीमार हैं। कोई जानता हैआप बीमार हैं।
लेकिन यह जानने वाला तत्व बहुत साफ नहीं हैयही हमारी अड़चन है। इसे हम भूल—भूल जाते हैं और कर्ता के साथ एक हो जाते हैंआइडेंटिटी हो जाती है। जब आप जवान से बूढ़े हो रहे हैंतो आप कहने लगते हैंमैं का हो रहा हूं। बस वहीं भूल हो जाती है। जब आप क्रोध से भरते हैंतो आप कहते हैंमैं क्रुद्ध हो रहा हूं। जब आप दुकान करते हैंतो आप कहते हैंमैं दुकान कर रहा हूं।
बुद्ध ने कहा हैभूख पहले भी लगती थीभूख अब भी लगती है। लेकिन पहले मैं समझता था कि मुझे भूख लग रही है। अब मैं समझता हूं कि मैं देख रहा हूं शरीर को भूख लग रही है। इतना फासला है। जरा—सा फासला हैलेकिन बहुत बड़ा है। सूक्ष्मलेकिन अंतहीन।

बीमार होते हैं तो आपको लगता हैमैं बीमार हो गयायहां भूल है। इतना ही स्मरण आ जाए कि मैं बीमार नहीं हूं शरीर बीमार हो गया है। तो आपके भीतर दो तत्‍व हो जायेगें। एक कर्ता के तल पर और द्रष्‍टा के तल पर।
 वह द्रष्टा ही जितना निखरता आएउतने आप परमात्मा के करीब पहुंचने लगे। और द्रष्टा जितना खोता है, और कर्ता मजबूत होता जाएउतना आप संसार में प्रविष्ट होते चले गए। कर्म के साथ एकता जुड़ जाते है तो आप संसार में होते हैं। कर्म के साथ एकता टूट जाएतो आप परमात्मा के साथ एक हो जाते हैं। यश करने वालों के लिए जो दुख— समुद्र से पार पहुंचा देने योग्य सेतु है उस नाचिकेत अग्नि को और संसार—समुद्र से पार होने की इच्छा वालों के लिए जो भयरहित पद है उस अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम को जानने और प्राप्त करने में हम समर्थ हों
हे नचिकेता। तुम जीवात्मा को तो रथ का स्वामी उसमें बैठकर चलने वाला समझो शरीर को रथ बुद्धि को सारथि रथ को चलाने वाला समझो और मन को लगाम
ज्ञानीजन इस रूपक में इंद्रियों को घोड़े बतलाते हैं और विषयों को उन घोड़ों के विचरने का मार्ग बतलाते हैं तथा शरीर इंद्रिय और मन—इन सबके साथ रहने वाला जीवात्मा ही भोक्ता है ऐसा कहते हैं।
जो सदा विवेकहीन बुद्धि वाला और अवशीभूत चंचल मन से युक्त रहता है उसकी इंद्रियां असावधान सारथि के दुष्ट घोड़ों की भांति वश में न रहने वाली हो जाती हैं
बहुत पुराना भारतीय प्रतीक है कि मनुष्य जैसे एक रथ है। उसके भीतर एक मालिक हैगहरे में बैठा हुआ रथ केवह साक्षी है। फिर घोड़े हैंवे इंद्रियां हैं। घोड़ों को सम्हाल रखने वाली लगाम हैवह मन है। घोड़े जिस पथ पर दौड़ रहे हैंवह वासना है। सारथि हैजो लगाम को सम्हाले हुए हैवह मन है। और उन सबके पीछे गहरे में रथ में छिपा बैठा जो साक्षी हैजो द्रष्टा हैवही परम तत्व है। जो उसको पहचानने लगता हैउसके सारे रथ की यात्रा संयत हो जाती है।
लेकिन हम उसको पहचानते ही नहीं। हम घोड़ों के पास ठहरे हुए हैंया घोड़ों में रमे हुए हैं। फिर बहुत घोड़े जुते हैं रथ में। सब घोड़े अलग—अलग भगा रहे हैं। एक घोड़ा एक तरफदूसरा घोड़ा दूसरी तरफ। तो जीवन बड़ा द्वंद्व और कलह है। एक मन कहता हैयह करो। और दूसरा मन कहता हैयह करो। तीसरी इंद्रिय पुकारती हैयह करो। उन सबके बीच इतना कनफ्यूजनइतना विभ्रम हो जाता है कि आपको कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करोक्या न करोगीता पढ़ने बैठे हैंएक इंद्रिय पुकारती है कि फिल्म देखने चलो। एक इंद्रिय कहती हैक्या व्यर्थ समय खराब कर रहे हो! यह बुढ़ापे में करने का काम है। गीता बाद में पढ़ लेना। और जल्दी भी क्या हैऔर यह सबचल रहा है भीतर। तो गीता भी पढ़ रहे हैंयह भीतर चल भी रहा है। सब घोड़े अलग—अलग भाग रहे हैं। रथ इन घोड़ों के साथ घसिट रहा है।
अगर कोई आदमी थोड़ा—सा सम्हलता हैतो घोड़ों से हटकर मन में अपने को केंद्रित करता है। मन है सारथि। अगर कोई आदमी और थोड़ा सम्हलता हैतो सारथि से भी पीछे हटता है। क्योंकि सारथि भी मालिक नहीं हैवह भी नौकर है। और नौकर के साथ अपने को एक कर लेना खतरे में जाना है।
सरकते—सरकते आदमी रथ के ठीक भीतर आ जाता हैजहा साक्षी बैठा हुआ हैजहा देखने वाला बैठा हुआ है। उस मालिक के साथ एक होते ही जीवन का स्वामित्व उपलब्ध होता है। आप पहली दफा अपने सम्राट हो जाते हैं। उसके बाद भूल—चूक अपने आप बंद हो जाती है। उसके बाद दुराचरण गिर जाता है। एक ही यात्रा है कि घोड़ों से हटकर धीरे—धीरे साक्षी तक पहुंच जाएं। साक्षी पर जो ठहर गयाउसके जीवन में फिर कोई दुखकोई पीड़ाकोई संताप नहीं है।

अब ध्यान के लिए तैयार हों।

ध्‍यान योग शिविर,
माउंट आबू, राजस्‍थान