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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

उपनिषद--कठोपनिषद--ओशो ( नौवां--प्रवचन)

आत्‍म ज्ञान ही प्रत्‍यक्ष ज्ञाननौवां प्रवचन


द्वितीय अध्‍याय—

प्रथम वल्‍ली :

परांचि खानि व्‍यतृणत् स्‍वभंभूस्‍तस्‍मात्‍परांपश्‍यति नान्‍तरात्‍मन्।
कस्विद्धीर: प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्।। 1।।

पराच: कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य याशम्।
अथ धीरा अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमधुवेष्विह न प्रार्थयन्ते।। 2।।

येन स्वयं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शान्‍श्‍च मैथुनान्।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते।। एतद्वै तत्।।3।।

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति।।4।।

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते।। एतद्वै तत्।। 5।।

यः पूर्व तपसो जातमद्भ्य: पूर्वमजायत।
गुहां प्रविश्यतिष्ठन्तयो भूतेभिर्व्यपश्यत।। एतद्वै तत्।। 6।।

या प्राणेन सम्मवत्यदितिदेंवतामयी।
गुहा प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत।। एतद्वै तत्।। 7।।

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुमृतो गर्भिणीभि:।
दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्नि:।। एतद्वै तत्।। 8।।

यतश्चोदेति सूयोंऽस्तं यत्र च गच्छति।
तं देवा: सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन।। 9।।

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।
मृत्यो: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।। १०।।


स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं इसलिए (मनुष्य इंद्रियों के द्वारा प्राय: ) बाहर की वस्तुओं को ही देखता है अंतरात्मा को नहीं। किसी ( भाग्यशाली) बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरपद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों की ओर से लौटाकर अंतरात्मा को देखा है ।।1।।

जो बाल— बुद्धि वाले बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं वे सर्वत्र फैले हुए मृत्यु के बंधन में पड़ते हैं किंतु बुद्धिमान मनुष्य नित्य अमरपद को विवेक द्वारा जानकर इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को ( भी ) नहीं चाहते।।2।।


जिसके अनुग्रह से ( मनुष्य) शब्दों को स्पर्शों को रूप— समुदाय को रस को गंध को और स्त्री— प्रसंग आदि के सुखों को अनुभव करता है उसी के अनुग्रह से ( यह भी जानता है कि) यहां क्या शेष रह जाता है अर्थात कुछ भी नहीं। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।।3 ।।

स्वप्न के दृश्यों को और जाग्रत—अवस्था के दृश्यों को इन दोनों अवस्थाओं के दृश्यों को ( मनुष्य) जिससे बार—बार देखता है उस सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी सबके आत्मा को जानकर बुद्धिमान शोक नहीं करता।। 4।।

जो मनुष्य कर्मफलदाता सबको जीवन प्रदान करने वाले (तथा) भूत (वर्तमान) और भविष्य का शासन करने वाले इस परमात्मा को (अपने) लिए समीप जानता है उसके बाद वह (कभी) किसी की निंदा नहीं करता। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 5।।

जो जल आदि पांच तत्वों से पहले ही अजन्मा था उस सबसे पहले तप से उत्पन्न हृदय— गुहा में प्रवेश करके जीवात्माओं के साथ स्थित रहने वाले परमेश्वर को जो पुरुष देखता है ( वही ठीक देखता है)। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 6।।
जो देवी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है जो प्राणियों के सहित उत्पत्र हुई है ( तथा जो) हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके वहीं रहने वाली है उसे ( जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है)। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 7।।

जो सर्वज्ञ अग्निदेवता गर्भिणी स्त्रियों द्वारा भली प्रकार धारण किए हुए गर्भ की भांति दो अरणियों में सुरक्षित है छिपा है ( तथा जो) जाग्रत है (और) हवन करने योग्य सामग्रियों से युक्त मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन स्तुति करने योग्य ( है), यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 8।।


जहां से सूर्यदेव उदय होते हैं और जहां अस्त होते हैं सभी देवता उसी में समर्पित हैं। उस परमेश्वर को कोई (कभी भी) नहीं लांघ सकता। यही है वह ( परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था)।। 9।।

जो परब्रह्म यहां ( है), वही वहां (परलोक में भी है)। जो वहां ( है), वही यहां (इस लोक में) भी है। वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को (अर्थात बारंबार जन्म— मरण को) प्राप्त होता है जो इस जगत में (उस परमात्मा को) अनेक की भांति देखता है।। 10।।




अत्मिज्ञान ही प्रत्यक्ष ज्ञान—


नुष्य की इंद्रियां केवल बाहर की ओर उगख होती हैं और हो सकती हैं। भीतर की ओर उन्यूख होने का कोई प्रयोजन नहीं है।
जैसे कोई वैज्ञानिक दूर के तारों की खोज के लिए दूरबीन बनाता है। तो उस दूरबीन से दूर के तारे तो दिखाई पड़ जाते है, लेकिन दूरबीन के पीछे छिपा हुआ वैज्ञानिक उस दूरबीन से दिखाई नहीं पड़ता, जो बिलकुल पास ही खड़ा है। दूरबीन से जो आंखें सटाकर खड़ा है। दूरबीन उस वैज्ञानिक को नहीं पकड़ती;दूर, करोड़ो मील दूर के तारों को पकड़ लेती है। दूरबीन बनी ही है दूर को देखने के लिए। वह जो देखने वाला है, उसे देखने के लिए तो किसी भी दूरबीन की कोई जरूरत नहीं है।
इंद्रियां हैं पदार्थ को देखने के लिए। स्वयं को देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है। स्वयं को तो बिना इंद्रियों के ही देखा जा सकता है। इसलिए इंद्रियां भीतर की तरफ नहीं जातीं, बाहर की तरफ जाती हैं। पर इससे बड़ी उलझन खड़ी होती है। इससे उलझन यह खड़ी होती है कि दूर तारों को देखने वाला वैज्ञानिक धीरे— धीरे यह भूल भी जा सकता है कि वह भी है। तारे ही सब कुछ हो जा सकते हैं। दूरबीन को थामे — थामे वह जो पीछे देखने वाला है, वह विस्मरण हो जा सकता है, क्योंकि निरंतर वही दिखाई पड़ेगा जो बाहर है, सतत वही दिखाई पड़ेगा जो बाहर है। और जो भीतर छिपा है, वह दिखाई न पड़ने से स्मृति से खो सकता है।
यही हुआ है। हमारी सारी इंद्रियां बाहर की तरफ जाती हैं। मैं हाथ से आपको छू सकता हूं। मैं हाथ से अपनी देह को भी छू सकता हूं क्योंकि वह भी पराई है और बाहर है। हाथ से मैं अपने को नहीं छू सकता जो देह में छिपा है। हाथ से मैं छूने वाले को नहीं छू सकता।
जब मैं अपना हाथ आपकी तरफ बढ़ाता हूं तो सिर्फ हाथ ही नहीं बढ़ता, हाथ में छिपा हुआ मैं भी बढ़ता हूं। मैं बढ़ना चाहता हूं आपको छूना चाहता हूं इसीलिए हाथ बढ़ता है। हाथ तो छाया की तरह मेरे पीछे आता है। मैं चाहता हूं आपको छुऊं, तो मेरा हाथ अनुसरण करता है, मेरी आज्ञा का पालन करता है। लेकिन जब मैं आपको छूता हूं तब दो घटनाएं घट रही हैं—एक तो आप हैं जिसको मैंने छुआ, और एक मैं हूं जिसने छुआ; और एक हाथ है जिसके द्वारा छुआ, और एक आपका शरीर है जिसके द्वारा आपको छुआ गया।
आँख बहर की तरफ देखती है, उसे सब दिखाई पड़ जाता है। सिर्फ मैं जो भीतर छिपा हूं वह उसे दिखाई नहीं पड़ेगा। कान बाहर की तरफ सुनते हैं। स्वाद, रस,गंध, सब बाहर से संबंधित हैं।
इंद्रियों का निर्माण ही इसलिए हुआ है कि हम जगत से परिचित हो सकें। दूसरे से, अन्य से परिचित हो ने की व्यवस्था है। लेकिन वह जो भीतर छुपा है, वह इस परिचय में अपरिचित हो जाता है। जो हमारा अपना, गाना होना है, वह आच्छादित होता चला जाता है। हम वस्तुओं को जानते—जानते उसे भूल ही जाते हैं जो जानने वाला है। यह बात इस सूत्र की पहली बात है।
स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर जाने वाले ही बनाए हैं। इसलिए मनुष्य इंद्रियों के द्वारा प्राय: बाहर की वस्तुओं को ही देखता है अंतरात्मा को नहीं। किसी भाग्यशाली बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरपद को पाने की इच्छा करके चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य विषयों की ओर से लौटाकर अंतरात्मा को देखा है।
इसमें एक बात खयाल में ले लेने जैसी है, क्योंकि उससे बहुत भ्रांति साधकों के जगत में है। आंख को भीतर लौटाने का क्या अर्थ है? क्या आंख भीतर लौटाई जा सकती है? आंख भीतर लौटाई ही नहीं जा सकती। आंख बाहर ही देख सकती है। आंख के भीतर देखने का कोई उपाय नहीं। देखने वाले को आंख से देखने का कोई उपाय नहीं। लेकिन संतो ने कहा है, योगियों ने कहा है, लौटा लो आंख को, उलटी कर लो धारा।
लौटाने का कुल मतलब इतना है कि बाहर की तरफ मत जाओ। जो ऊर्जा आंख से बाहर जाती है, उसे बाहर मत जाने दो। बाहर की तरफ जाने वाला द्वार बंद हो जाए, तो जो देखने वाला बाहर की तरफ जाता है, बाहर न जाकर वह देखने वाला अपनी तरफ लौट आएगा। वहां कोई आंख न होगी, लेकिन स्वयं को देखने के लिए आंख की कोई जरूरत ही नहीं है। स्वयं का देखना बिना आंख के हो जाता है। वह चक्षुरहित दर्शन है।
स्वयं को सुनने के लिए कोई कानों को भीतर लौटाने की जरूरत नहीं है। सिर्फ कान बाहर न सुनें। बाहर की ध्वनि—तरंगों का जाल कान से छूट जाए। कान बाहर के प्रति उपेक्षा से भर जाएं। तो जो ऊर्जा कान से बाहर की तरफ जाती है बाहर न जाए, तो वह ऊर्जा भीतर की ध्वनि को अपने आप सुन लेती है। उस ध्वनि को सुनने के लिए कान की कोई भी जरूरत नहीं है।
इंद्रियां भीतर लौट आएं, इसका केवल इतना ही अर्थ है कि बाहर न जाएं, बाहर की तरफ प्रवाह न हो। तो जैसे कोई झरना बहता है और अवरुद्ध हो जाए और कहीं जाने का माग न मिले, तो झरना अपनी तरफ लौट आएगा, झरने का बहना बंद हो जाएगा और एक झील बन जाएगी। ऐसे ही चेतना बाहर जा रही है पांचों इंद्रियों से। वह बाहर न जाए तो चैतन्य की झील भीतर निर्मित हो जाती है। वह झील स्वयं—बोध—संपन्न है। वह झील स्वयं को देखने, स्वयं को सुनने, स्पर्श करने में संपन्न है। लेकिन वे सारे अनुभव अतींद्रिय हैं। उनका इंद्रियों से कोई भी लेना—देना नहीं है।
एक सूफी फकीर हुआ बायजीद। वह निरंतर कहा करता था कि मेरे गुरु ने तीन युवकों को एक—एक कबूतर दे दिया और कहा कि ऐसी जगह जाकर कबूतर को मार डालना जहा कोई देखने वाला न हो। एक युवक तो पांच मिनट बाद कबूतर को मारकर वापस आ गया। वह बगल की गली में गया। वहा कोई भी नहीं था। उसने गरदन मरोड़ी। वापस आ गया। दूसरा युवक तीन दिन बाद कबूतर को मारकर लौटा। उसने बड़ी खोजबीन की; कहीं भी भूल—चूक से कोई देख न ले। तो वह एक गहरी गुफा में गया। उसने गुफा के द्वार पर पत्थर लगा दियां। किसी के आने का कोई उपाय न रहा। गहन अंधकार था। वहां कोई देख भी नहीं सकता था, आ भी जाए तो भी। उसने गरदन मरोड़ दी।
तीसरा युवक तीन महीने के बाद कबूतर को लिए वापस लौटा। गुरु ने कहा कि क्या तीन महीने में तुम ऐसी कोई जगह न खोज पाए, जहा कोई भी न हो? उसने कहा कि तीन जन्मों में भी खोजना संभव नहीं है। तीन महीने बहुत मेहनत कर ली। गहन गुफा में गया, अंधकार था, लेकिन मैं तो देख ही रहा था; कबूतर तो देख ही रहा था। दो तो मौजूद थे। कबूतर की भी आंखे बंद कर दू तो भी मैं मारने वाला तो देखता ही रहूंगा—कितना ही गहन अंधकार हो!
बायजीद के गुरु ने कहा कि तू ही कैवल स्वयं को खोजने में सफल हो पाएगा। बाकी दो की कोई आंतरिक खोज नहीं है। दो को विदा कर दिया, उस एक को रोक लिया। क्योंकि तुझे इतना स्मरण है कि इंद्रियां भी जहा नहीं देख पातीं, प्रकाश जहां मौजूद नहीं, वहां भी तू तो देख ही रहा है। तेरे देखने के लिए इंद्रियों की कोई भी जरूरत नहीं है।
कितना ही गहन अंधकार हो कमरे में, आपको कुछ भी न दिखाई पड़ता हो, लेकिन आप हैं, इतना तो पता चलता ही रहता है। दीवाल न दिखती हो, सामान न दिखता हो, कक्ष में बैठे और लोग न दिखते हों, लेकिन आप हैं, यह तो कोई भी अंधकार मिटा न सकेगा। यह तो कोई भी स्थिति में आप रहेंगे ही और आपको पता चलता ही रहेगा कि मैं हूं। यह होना स्वयंसिद्ध है। यह किसी माध्यम से नहीं है। इसलिए आत्मज्ञानियों ने कहा है कि जगत के सारे अनुभव परोक्ष हैं, सिर्फ आत्म—अनुभव प्रत्यक्ष है।
यह बड़ी उलटी बात है। क्योंकि आमतौर से हम सोचते हैं कि सब चीजें प्रत्यक्ष हैं। वृक्ष दिखाई पड़ रहा है। आप दिखाई पड़ रहे हैं। सब चीजें प्रत्यक्ष हैं, आंख के सामने हैं। लेकिन आत्मज्ञानी कहते हैं कि जगत के सभी अनुभव परोक्ष हैं। क्योंकि बीच में आंख माध्यम का काम कर रही है। तुम पीछे छिपे हो। ज्ञेय वस्तु बाहर है, बीच में माध्यम, दलाल आंख है। आंख धोखा दे सकती है।
शान सीधा नहीं है, इमीजिएट नहीं है। शान के बीच में एक माध्यम है। तो पीलिया हो किसी को तो पीला रंग दिखाई पड़े। किसी की आंख खराब हो, कलर ब्लाइंड हो कोई, तो उसे कोई रंग दिखाई न पड़े। आंख का भरोसा क्या? आंख ठीक कह रही है—इसका सबूत क्या? आंख का भरोसा करना पड़ता है। अब यह बड़े मजे की बात है कि लोग दुनिया में सभी से प्रमाण पूछते हैं, लेकिन कभी अपनी इंद्रियों से कोई प्रमाण नहीं पूछते कि तुम्हारा भरोसा क्या? आपकी आंख ठीक देख रही है, इसका प्रमाण क्या है? चार्वाकों ने, नास्तिकों ने एक ही प्रमाण माना है—प्रत्यक्ष, कि जो आंख के सामने है, उसे ही मानेंगे।
लेकिन उन चार्वाक विचारकों ने यह कभी नहीं पूछा कि इस आंख के भरोसे का इतना क्या कारण है रा आंख सदा ठीक ही देखती है क्या? क्योंकि रात सपने भी देखती है आंख। वे प्रत्यक्ष होते हैं, लेकिन सत्य नहीं होते। कभी राह पर पड़ी रस्सी सांप दिखाई पड़ जाती है। और जब आंख सांप देखती है रस्सी में, तो सांप बिलकुल दिखाई पड़ता है। लेकिन बाद में रोशनी आने पर पता चलता है, वहा कोई सांप नहीं। मरुस्थल में मृग—मरीचिका दिखाई पड़ जाती है।
पहली दफा जब थी—डायमेंशनल फिल्म बनी, तीन—आयामी फिल्म बनी, तो जो लोग उन्हें देखने जाते थे, वे भयभीत हो जाते थे। जो पहली फिल्म लंदन में दिखाई गई, उसमें एक घुड़सवार भाला फेंकता है। पूरे हाल के लोग अपनी गरदन झुका लेते हैं। क्योंकि थी—डायमेंशनल फिल्म में वह असली भाले जैसा भाला मालूम पड़ता है। और एक क्षण को भाला पास से गुजर रहा है, ऐसा एहसास होता है। पूरा हाल दो।हस्सों में झुक जाता। परदे पर कुछ भी नहीं है। न कोई भाला है; न कुछ आने को, न कुछ जाने को। सिर्फ छाया और प्रकाश का खेल है। लेकिन आंख धोखा खा जाती है।
आंख का भरोसा क्या? इंद्रियों का इतना भरोसा क्या है? आत्मज्ञानी पुरुष कहते हैं कि सिर्फ आत्मज्ञान ही प्रत्यक्ष है, बाकी सब ज्ञान परोक्ष है। क्योंकि बीच में कोई मध्यस्थ है। मध्यस्थ का कोई भरोसा नहीं। सीधा देखा है, वही देखा है; जिसको बीच में लेकर देखा है, उसकी कोई बात नहीं। आप आकर मुझे कहते हैं कि बाहर रोशनी है। आप पर मुझे भरोसा करना पड़ेगा। आप सच बोल सकते हैं, आप झूठ बोल सकते हैं, आप खुद धोखे में हो सकते हैं। लेकिन आपका भरोसा क्या है, जब तक मैं ही बाहर जाकर न देख लू?
लेकिन पदार्थ का ज्ञान तो परोक्ष ही होगा, सिर्फ आत्मा का ज्ञान प्रत्यक्ष हो सकता है। क्योंकि वहां बीच में कोई भी नहीं है। मैं ही हूं अकेला मैं ही हूं। कोई धोखा देने वाला तत्व, कोई विकृत करने वाला तत्व बीच में नहीं है। इसलिए सामान्य अनुभव में जो प्रत्यक्ष है, आत्मज्ञानी के लिए परोक्ष है। और सामान्य अनुभव में जिसको हम बिलकुल नहीं देखते, वह आत्मज्ञानी के लिए प्रत्यक्ष है।
आत्मा स्वयं प्रकाशित है। उसे देखने के लिए इंद्रियों के प्रकाश की कोई भी जरूरत नहीं है। अंधा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना आंख वाला। बहरा भी उसे देखने में इतना ही समर्थ है, जितना कान वाला। लकवे से लगा हुआ, पड़ा हुआ मनुष्य भी उसे देखने में उतना ही समर्थ है, जितना कोई एवरेस्ट पर चढ़ जाए इतनी सामर्थ्य वाला। उससे कोई, शरीर की सामर्थ्य से कोई भेद नहीं पड़ता।
आत्मा को जानने में शरीर का उपयोग ही नहीं होता। शरीर हो दुर्बल कि सबल, स्वस्थ कि अस्वस्थ, सुंदर कि कुरूप, काला कि गोरा, कोई अंतर नहीं पड़ता। शरीर की कोई उपयोगिता आत्मज्ञान के लिए नहीं है। लेकिन शरीर की उपयोगिता पर—ज्ञान के लिए है। दूसरे को जानना हो तो शरीर की उपयोगिता है। आंखे स्वस्थ होनी चाहिए कान स्वस्थ होने चाहिए। शरीर शक्तिशाली होना चाहिए तो ही दूसरे से संबंध जुड़ेगा। अपने से संबंध तो बना ही हुआ है, उसे जोड़ने का कोई प्रयोजन नहीं है।
इसलिए यह सूत्र कहता है, परमेश्वर ने, स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने...। इसलिए परमेश्वर को जानने के लिए तो इंद्रियों की जरूरत नहीं है, वह तो स्वयं ही प्रगट हो जाता है। वह प्रगट है ही। लेकिन संसार स्वयं प्रगट नहीं होता, संसार को जानने के लिए इंद्रियों की जरूरत है। इसलिए जितनी ज्यादा इंद्रियां हों, उतना ज्यादा संसार प्रगट होता है।
जगत में बहुत इंद्रियों वाले प्राणी हैं। मनुष्य के पास पांच इंद्रियां हैं। अमीबा है छोटा—सा जीवकोष्ठ, उसके पास एक ही इंद्रिय है, केवल शरीर है। स्पर्श का भर उसे अनुभव होता है, और कोई इंद्रिय नहीं है। तो अमीबा सबसे कम विकसित प्राणी है—आत्मा की दृष्टि से नहीं, जगत को जानने की दृष्टि से। उसकी जानकारी सिर्फ स्पर्श पर निर्भर है। बस उतना ही उसका ज्ञान है। फिर दो इंद्रियों वाले, तीन इंद्रियों वाले, चार इंद्रियों वाले प्राणी हैं। जितनी ज्यादा इंद्रिया होती जाती हैं, जगत की जानकारी उतनी बढ़ती चली जाती है।
कोई आश्चर्य न होगा कि किसी चांद—तारे पर पांच इंद्रियों से ज्यादा इंद्रियों वाले प्राणी हों,. तो मनुष्य का ज्ञान उनके सामने बिलकुल फीका हो जाए। दस इंद्रिया हो सकती हैं, कोई बाधा नहीं है, कोई कारण नहीं है। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि छठवीं इंद्रिय क्या होगी? क्योंकि पांच का हमारा ज्ञान है, पांच की हमारी कल्पना है। जिन पशुओं के पास चार इंद्रिया हैं, वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि पाचवी इंद्रिय क्या होगी? उनके पास चार ही इंद्रियां हैं, चार का उन्हें ज्ञान है।
पशुओं को छोड़ दें, एक अंधा आदमी है, वह सोच भी नहीं सकता कि प्रकाश क्या होगा। वह यह भी कल्पना नहीं कर सकता कि आंख जैसी चीज किस ढंग की होती होगी, जिससे प्रकाश दिखाई पड़ता है। क्योंकि न प्रकाश का उसे कोई अनुभव है, न आंख का उसे कोई अनुभव है। उसके पास चार ही इंद्रियां हैं, तो उसका ज्ञान सीमित हो जाता है।
आप जानकर हैरान होंगे कि आपके ज्ञान का अस्सी प्रतिशत आंख से आता है, बाकी चार इंद्रियों से तो केवल बीस प्रतिशत आता है। इसलिए अंधे पर हमें बहुत दया आती है। लूले पर उतनी दया नहीं आती, बहरे पर उतनी दया नहीं आती, अंधे पर बहुत दया आती है। दया का कारण है कि उसका अस्सी प्रतिशत जीवन अंधेरे में है। अस्सी प्रतिशत ज्ञान की उसे कोई संभावना नहीं है। वह बहुत दयनीय है।
लेकिन ये पाचों इंद्रिया जो ज्ञान देती हैं, वह बाहर का है। भीतर के ज्ञान के लिए कोई इंद्रिय आवश्यक नहीं है। वहा तो सारी इंद्रियों को छोड्कर ही कोई प्रवेश करता है। वहां इंद्रियों का त्याग ही उपाय है।
स्वयं प्रगट होने वाले परमेश्वर ने समस्त इंद्रियों के द्वार बाहर की ओर बनाए हैं इसलिए अधिक मनुष्य प्राय: बाहर की वस्तुओं को देखने में ही जीवन व्यतीत कर देते हैं अंतरात्मा को नहीं किसी भाग्यशाली बुद्धिमान मनुष्य ने ही अमरत्व को पाने की आकांक्षा से चक्षु आदि इंद्रियों को बाह्य— विषयों की ओर से हटाकर अंतरात्मा को देखा है
सारे ध्यान के प्रयोग, अलग—अलग विधियों वाले प्रयोग, एक चीज को मौलिक रूप से स्वीकार करते हैं कि आपकी सारी इंद्रियां शांत हो जाएं। किस ढंग से शांत हो, इसमें भेद है, लेकिन शांत हो जाएं, इसमें कोई विवाद नहीं है। सब इंद्रिया शांत हो जाएं और आप भीतर रह जाएं। जगत बाहर रह जाए आप भीतर रह जाएं और बीच में कोई सेतु न रहे, कोई जोड़ न रहे। उस क्षण में अंतरात्मा आविर्भूत होती है, प्रगट हो जाती है।
यहां हम जो प्रयोग कर रहे हैं, तीन चरणों में आपकी पूरी इंद्रियों का उपयोग किया जाता है। जितनी ज्यादा तेजी से आप कर सकें, उपयोग कर लें; थका दें। ताकि दस मिनट के लिए इंद्रियां थककर भी शांत हो जाएं, तो भी भीतर की झलक आ जाए।
सूफी फकीर एक नृत्य करते हैं—दरवेश—नृत्य, बड़ा कीमती है। जरा आपकी हिम्मत थोड़ी बढ़ती जाएगी तो जल्दी हम दरवेश—नृत्य में प्रवेश करने लगेंगे। लेकिन दरवेश—नृत्य काफी लंबा चलता है, कोई पांच घंटे। धीरे—धीरे आप कर लेंगे। पांच घंटे फकीर नाचता ही रहता है। सब थक जाता है। जब तक अपने आप शरीर गिर नहीं जाता, तब तक नृत्य जारी रहता है। अपनी तरफ से नहीं रोकना है, अपनी तरफ से कुछ करना ही नहीं है। नाचते ही जाना है, नाचते ही जाना है। जब तक आखिरी बूंद भी शेष रह जाए शक्ति की, तब तक नाचते ही जाना है।
बेईमानी जरा भी नहीं चलेगी कि आदमी सोचे कि अब थक गए बैठ जाएं। नहीं, जब तक आपको लग रहा है कि आप बैठ सकते हैं, अभी कम से कम बैठने की ताकत बची है, इसको भी नाचने में लगा देना है। जब तक कि शरीर को आप देखें न कि गिर रहा है...।
बड़ा अनूठा अनुभव है। जब आपकी सारी शक्ति शरीर की चुक जाती है और आप देखते हैं कि शरीर गिर रहा है—आप कुछ भी नहीं कर सकते, न रोक सकते, न नाच सकते, न आप सम्हाल सकते—बस शरीर गिर रहा है। उस क्षण साक्षी का भाव अचानक जग जाता है। और जब शरीर बिलकुल थक जाता है, तो कोई भी इंद्रिय सक्रिय नहीं रह जाती, द्वार बंद हो जाते हैं, सेतु टूट जाते हैं। सूफी भीतर प्रवेश कर जाता है।
हम जो कीर्तन का प्रयोग कर रहे हैं, वह सूफी—नृत्य का ही हिस्सा है। बहुत लोग मुझसे आकर पूछते है कि भारत में ऐसा तो कीर्तन होता नहीं! इसका भारतीय कीर्तन से कोई सीधा संबंध है भी नहीं। यह कोई —पाठ नहीं है। इसका कोई संबंध कृष्ण, गोपाल से नहीं है। वह तो केवल बहाना है। वह तो केवल ग्दुंटी है। उस बहाने आपको थकाने की चेष्टा है। इसलिए जो अपने को बचाएगा, वह मूल मुद्दा ही चूक गया। थका डालना है। इतने जोर से शक्ति का उपयोग करना है कि आप बिलकुल थक जाएं, शरीर मुर्दा हो जाए। जैसे सारा प्राण सूख गया। उस क्षण में इंद्रियां बंद हो जाती हैं। अंतरात्मा की झलक..।
और एक बार झलक मिलने लगे, फिर कठिनाई नहीं है। एक दफे रास्ता साफ हो जाए, फिर जरूरत नहीं है कि आप थकाएं। फिर तो आंख भी बंद करें, आप भीतर जा सकते हैं। एक दफे वह रास्ता साफ हो जाए, पहचान में आ जाए, पगडंडी कौन—सी है। जैसे अंधेरी रात में बिजली चमक जाए और रास्ता दिख जाए एक क्षण को। फिर बिजली खो भी जाए तो भी फिर आप अंधेरे में आश्वस्त चल सकते हैं। आप जानते हैं, रास्ता है। एक दफे देखा है। अब आप खोज सकते हैं।
ये सारे ध्यान के प्रयोग मौलिक रूप से थकाने के प्रयोग हैं, ताकि इंद्रियां थककर बैठ जाएं। एक रास्ता है जबरदस्ती बिठाने का। मैं उसके पक्ष में नहीं हूं क्योंकि जबरदस्ती कोई भी इंद्रियों को बैठा नहीं सकता। हालत वैसी हो जाती है, जैसे छोटे बच्चे को कह दो कि बैठो शाति से। तो वह बैठ जाता है, लेकिन उसकी सारी ताकत शांति से बैठने में लग रही है। एक—एक चीज को खींचे हुए है। तना हुआ है। शिथिल भी नहीं हो पाता। विश्राम भी नहीं कर पाता। तनावग्रस्त है।
, उस बच्चे को कहो कि दौड़ो, एक पच्चीस चक्कर लगाओ। फिर कहने की जरूरत नहीं कि शांत बैठ जाओ। पच्चीस चक्कर के बाद वह खुद ही शांत बैठ जाएगा। वह शांति बड़ी अलग होगी। उस शाति में कोई तनाव नहीं होगा, कोई बेचैनी नहीं होगी। बल्कि शांति में एक सुख होगा, एक राहत होगी, एक झलक होगी विश्राम की।
इंद्रियों को थका डालें, इतना स्फा डालें कि क्षणभर को भी अगर वे विश्राम में पहुंच जाएं, तो उतने क्षणभर को आपका प्रवेश भीतर हो जाए।
जो बाल— बुद्धि वाले बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं वे सर्वत्र फैले हुए मृत्यु के बंधन में पड़ते हैं। किंतु बुद्धिमान मनुष्य नित्य अमरपद को विवेक द्वारा जानकर इस जगत में अनित्य भोगों में से किसी को भी नहीं चाहते
विवेक का अर्थ इतना ही है कि जो निरर्थक है, वह हमें निरर्थक दिखाई पड़ जाए; जो सार्थक है, वह सार्थक दिखाई पड़ जाए। जगत में हम कुछ भी चाहें, पहली तो बात, अगर न मिले तो दुख, और मिल जाए तो भी सुख नहीं। एक आदमी धन चाहता है। जब तक नहीं मिलता, तब तक दुखी है। और जब मिल जाता है, तब वह पाता है कि क्या मिला? धन के ढेर लग गए, अब क्या?
जो भी आपने चाहा है अपने अतीत में, अगर न मिला तो आपने दुख पाया है, अगर मिल गया तो कौन—सा सुख पाया है? बस जब तक नहीं मिलता, तभी तक सुख का आभास होता है। इस जगत में दुख वास्तविक है, सुख सिर्फ आभास है। जो चीज नहीं मिलती, बस उसमें सुख है। और जो मिल जाती है, उसमें सब सुख खो जाता है। इसलिए कोई भी आदमी कहीं भी सुखी नहीं है।
मेरे एक मित्र हैं। वे पहले एम. एल. ए. थे, तो वे मुझसे कहते थे, आशीर्वाद दें—बस और कुछ चाहिए नहीं—कि कम से कम डिप्टी—मिनिस्टर तो मुझे बनवा ही दें। मैं उनको कहता कि बन ही जाएंगे, क्योंकि जैसा पागलपन आपमें है, आप बिना बने बच नहीं सकते। लेकिन आप अगर सोचते हों कि बड़ा आनंद घटित हो जाएगा, तो आप गलती में हैं।
फिर वे डिप्टी—मिनिस्टर भी हो गए। तो वे आए मेरे पास और कहने लगे कि बस, अब एक आकांक्षा है कि मिनिस्टर हो जाऊं। मैंने उनको कहा कि आपको सुख डिप्टी—मिनिस्टर होने से मिल गया, जिसको आप वर्षों से सोचते थे? उन्होंने कहा, डिप्टी—मिनिस्टर में कुछ भी नहीं रखा है, मिनिस्टर होने से ही कुछ हो सकता है। फिर अब वे मिनिस्टर भी हो गए। तो अब वे कहते हैं कि चीफ—मिनिस्टर हो जाएं। मैंने उनको पूछा कि तुम कहां रुकोगे? पिछले अनुभव से कुछ सीखो।
आदमी जहां है, वहीं दुखी है। सुखी आदमी खोजना कठिन है। आपने कभी कोई सुखी आदमी देखा? सुखी आदमी वही हो सकता है, जो जहा है वहीं सुखी है। लेकिन जो आदमी भी कहीं और सोचता है कि सुख होगा, वह दुखी होगा। जो जहां है वहीं सुखी है, ऐसे आदमी का नाम ही संन्यासी है।
और जो जहा है वहीं दुखी है, ऐसे आदमी का नाम ही गृहस्थ है। वह हमेशा भविष्य में ही जी रहा है। कल उसका सुख है। स्वर्ग कल है, आज कुछ भी नहीं। आज को समर्पित करेगा कल के लिए। आज को लगाएगा कल के लिए। आज को जलाएगा कल के लिए, ताकि कल का स्वर्ग मिल जाए। कल कभी आता नहीं। कल जब आएगा, वह आज ही होगा। वह उस आज को फिर कल के लिए लगाएगा। ऐसे वह लगाता जाता है। और एक दिन सिवाय मृत्यु के हाथ में कुछ भी नहीं आता।
उपनिषद कह रहा है, बाल—बुद्धि वाले लोग, बचकानी बुद्धि वाले लोग, अप्रौढ़, केवल बाहर की वस्तुओं का अनुसरण करने में जीवन को गंवा देते हैं। बुद्धिमान, विवेकशील वह है जो इस सत्य को जानकर कि बाहर कभी किसी को न कोई आनंद मिला है और न मिल सकता है, अपने ही अनुभव से, अपने ही जीवन के प्रयोगों से इस रहस्य को समझकर, जो बाहर के अनित्य भोगों की आकांक्षा छोड़ देता है, वही विवेकशील है।
बाहर की वस्तुओं की आकांक्षा छोड़ देता है। कुछ नासमझ बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाते हैं। बाहर की वस्तुओं की आकांक्षा  छोड़ना बिलकुल और बात है। बाहर की वस्तुओं को छोड़ने में लग जाना बिलकुल और बात है। और ही नहीं, भिन्न ही नहीं, विपरीत है। बाहर की वस्तु को तो वही छोड़ने में लगता है, जो बाहर की वस्तु को पकड़ने में लगा था पहले। अब वह छोड़ने में लगता है। लेकिन उसकी नजर बाहर की वस्तु पर ही लगी रहती है। कुछ लोग हैं, जो धन के लिए पागल हैं। और कुछ पागल हैं, जो धन न छू जाए, इससे डरे हुए हैं।
एक संन्यासी को मैं जानता हूं। वे बड़े संन्यासी हैं। बहुत उनके अनुयायी हैं। वे पैसा नहीं छूते। अगर आप पैसा उन्हें छुला दें, तो वे बिलकुल पागल हो जाते हैं। इतने नाराज हो जाते हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं। वे स्नान करते हैं, अगर पैसा छूना हो जाए। लोग उनको मानते हैं इसीलिए—कि यह है त्याग!
यह है पागलपन, यह है विक्षिप्तता। यह रोग पुराना है, नया नहीं है। पहले पैसे को पकड़ने में बहुत रस आता रहा होगा। और इससे आप समझ सकते हैं, कि जब इतना दुख हो रहा है छूंने में, तो रस कितना आता रहा होगा! यह माप है। वह रस अब भी नहीं खो गया है, वह उलटा हो गया है। रस अब भी है, लेकिन अब विपरीत भाव पैदा हो गया है।
मुक्त नहीं हुए पैसे से, बंधे हैं अब भी। कल मित्र की तरह बंधे थे, अब शत्रु की तरह बंधे हैं। मित्र का भी ध्यान रखना पड़ता है, शत्रु का और भी ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है। वे अगर आकर बैठते हैं, तो वे सब तरफ देख लेते हैं। पैसा तो नहीं है! कोई धन तो नहीं है! चौबीस घंटे प्रभु—स्मरण नहीं चल रहा है। और ऐसे बहुत लोग हैं इस देश में, जिनकी वृत्ति सिर्फ शीर्षासन करने लगती है। होती वही पुरानी है, उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। वही का वही आदमी पहले पैर के बल खड़ा था, अब सिर के बल खड़ा है। आदमी में जरा भी फर्क नहीं है। रत्तीभर भेद नहीं हुआ है। कोई क्राति घटित नहीं हुई है। लेकिन क्राति दिखाई पड़ती है। वह झूठी है।
बाहर की वस्तु न तो पकड़ने योग्य है और न छोड़ने योग्य। बाहर की वस्तु बाहर है। न तुम उसे पकड़ सकते हो, न तुम उसे छोड़ सकते हो। तुम हो कौन? तुमने पकड़ा, वह तुम्हारी भांति थी। तुम छोड़ रहे हो, यह तुम्हारी भ्रांति है। बाहर की वस्तु को न तुम्हारे पकड़ने से कुछ फर्क पड़ता है, न तुम्हारे छोड़ने से कुछ फर्क पड़ता है।
तुम कल कहते थे, यह मकान मेरा है। मकान ने कभी नहीं कहा था कि तुम मेरे मालिक हो। और मकान को अगर थोड़ा भी बोध होगा, तो वह हंसा होगा कि खूब गजब के मालिक हो। क्योंकि तुमसे पहले कोई और यही कह रहा था। उससे पहले कोई और यही कह रहा था। और मैं जानता हूं कि तुम्हारे बाद भी लोग होंगे जो यही कहेंगे, कि वे मालिक हैं।
और फिर एक दिन तुम कहते हो कि मैंने त्याग कर दिया है इस मकान का। न मकान तुम्हारा था, न तुम त्याग कर सकते हो। त्याग करना उतना ही पागलपन की बात है, जितना मालकियत की घोषणा थी। त्याग तो मालिक कर सकता है। ज्ञानी इस सत्य को जान लेता है कि मैं मालिक ही नहीं हूं किसी चीज का—छोडंगूा कैसे? पकडूगा कैसे?
वासना का त्याग है—इस बोध का भीतर गहरा हो जाना कि न इस जगत में कुछ पकड़ा जा सकता है और न छोड़ा जा सकता है। पकड़ना, छोड़ना, दोनों ही नासमझी हैं। इस जगत में न पकड़ने योग्य कुछ है और न छोड़ने योग्य कुछ है। ऐसी तटस्थता में जो आदमी ठहर जाता है, वह विवेकशील है। उसकी वासना गिर जाती है। वह बाहर के जगत में दौड़ना बंद कर देता है।
जिसके अनुग्रह से मनुष्य शब्दों को स्पर्शों को रूप को रस को गंध को स्त्री— प्रसंग आदि के सुखों को अनुभव करता है उसी के अनुग्रह से यह भी जानता है कि यहां क्या शेष रह जाता है! अर्थात कुछ भी नहीं। यही है वह परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था।
यम नचिकेता को कह रहा है कि तूने जिस परमात्मा के संबंध में पूछा था, वह क्या है। पहली बात वह यह कह रहा है कि यहां इस जगत में जो हम भोग रहे हैं, जो रस, सौंदर्य, सुख, जिसके कारण भोग रहे हैं, जो इस सबके भीतर छिपा है, जिसके बिना यह कोई भी घटना न घट पाएगी,.। आप रस ले रहे हैं, क्योंकि भीतर आप मौजूद हैं। आप भीतर से तिरोहित हो जाएंगे, शरीर कोई रस न ले सकेगा। आपको सुगंध मालूम पड़ रही है, क्योंकि भीतर आप मौजूद हैं। आप मौजूद न होंगे, सुगंध मालूम न पड़ेगी। इस जगत के जो भी अनुभव हो रहे हैं, वे किसके आधार पर हो रहे हैं? उस चैतन्य के आधार पर, जो भीतर छिपा है।
हमारी दृष्टि लग जाती है, जब फूल में सुगंध आती है, तो हमारा ध्यान फूल पर जाता है। हमारा ध्यान उस पर नहीं जाता, जिसको सुगंध आ रही है। तीन चीजें हैं। फूल खिला, सुगंध फैली, आप पास में बैठे हैं या खड़े हैं—सुगंध आई। यहां तीन हैं। एक तो फूल है, एक आप हैं, और दोनों के बीच में तैरती हुई सुगंध है।
एक ज्ञेय है, एक ज्ञाता है, और एक ज्ञान है। हर जगह त्रिवेणी है। हर जगह ये तीन मौजूद हैं। लेकिन हमारा ध्यान हमेशा ज्ञेय पर जाता है, आब्जेक्ट पर, वह जो जाना गया। फूल पर नजर जाती है। हम कहते हैं, कैसा सुंदर फूल है! हम यह नहीं कहते कि कैसी सुंदर आत्मा है कि फूल की गंध ले सकी! कैसा सुंदर फूल! कभी खयाल नहीं आता कि कैसा सुंदर चैतन्य! वह भीतर जो छिपा है, उसका हमें स्मरण ही नहीं आता। न तो सुगंध उतनी कीमती है, न फूल उतना कीमती है, जितना वह कीमती है जिसके आधार पर ये सब घट रहा है। इस जीवन में जो भी हो रहा है, उस सबके पीछे छिपी हुई चेतना है।
यम कह रहा है, यह जो भीतर छिपी चेतना है, जो सभी सुखों का अनुभव करता है, यह जो अनुभोक्ता है, और जो यह भी अनुभव करता है कि यहां कुछ भी अनुभव करने योग्य नहीं, जो यह भी अनुभव कर लेता है कि सब व्यर्थ है, जो यह भी अनुभव कर लेता है कि यहां पाने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहा है, यहां कुछ पाया भी नहीं जा सकता है, यही है वह परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था।
तो परमात्मा की पहली व्याख्या यम कर रहा है। और वह यह कि तुम्हारे भीतर छिपा हुआ जो चैतन्य है, वह जो कांशसनेस है, वह जो बोध की शक्ति है, वह जो तुम्हारे जीवन का मूल है, यही है वह परमात्मा जिसके लिए तूने पूछा था।
तो ईश्वर की पहली व्याख्या हुई—भीतर का द्रष्टा।
स्वप्न के दृश्यों को और जाग्रत—अवस्था के दृश्यों को इन दोनों अवस्थाओं के दृश्यों को मनुष्य जिससे बार— बार देखता है उस सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी सबके आत्मा को जानकर बुद्धिमान मनुष्य शोक नहीं करता। यह थोड़ा समझने जैसा कीमती सूत्र है। यम कह रहा है कि स्वप्न के अनुभवों को, जागृति के अनुभवों को जिसके द्वारा मनुष्य बार—बार देखता है?..
यह एक बहुत मजे की बात है। शायद आपने कभी निरीक्षण न की हो, चूक गए हों। चूकने जैसी नहीं है, क्योंकि उसके आधार पर जीवन में बहुत कुछ नए आयाम खुल सकते हैं। रात आप स्वप्न देखते हैं। जब आप स्वप्न देखते हैं, तो स्वप्न बिलकुल सत्य मालूम होता है। स्वप्न में ही यह जानना कि यह असत्य है, बिलकुल असंभव है। स्वप्न जब तक चलता है, पूर्णतया सत्य होता है। असंगत से असंगत स्वप्न भी पूर्णतया सत्य होता है। आप चाहे भीख मांगते हों सड़क के किनारे, लेकिन स्वप्न में अगर सम्राट हो जाएं, तो आपको जरा भी संदेह नहीं आता कि यह मैं कैसा देख रहा हूं! मैं तो भिखमंगा हूं। भिखमंगा भी स्वप्न में सम्राट हो जाए तो बिलकुल भरोसा करता है।
स्वप्न में सभी श्रद्धालु होते हैं। स्वप्न में मैंने अब तक एक आदमी नास्तिक नहीं देखा, जो संदेह करे। मानना ही पड़ता है स्वप्न को कि वह ठीक है। और ऐसा नहीं है कि भिखारी ही मानता है कि मैं सम्राट हूं। सम्राट भी भिखारी का सपना देखे तो मानता है कि मैं भिखारी हूं। और स्वप्न में कुछ भी संगत—असंगत घटे, आपमें तर्क उठता ही नहीं। कुछ भी घटे, कैसी भी घटना हो, मन बिलकुल भरोसे से भरा होता है।
सभी स्वप्न स्वप्न के भीतर सत्य होते हैं। स्वप्न के बाहर जब आप जागते हैं, तब असत्य हो जाते हैं। जैसे ही आप जागते हैं और पाते हैं कि अपने कमरे में सोया हुआ हूं कि अपने झाडू के नीचे बैठा हुआ हूं वह सम्राट, वह भिखारी, वह सब स्वप्न का जाल एकदम टूट जाता है। आप कहते हैं, सब झूठा था।
लेकिन एक और दूसरे मजे की बात है, जब आप स्वप्न में जाएंगे रात, तो आपने जागरण में जो देखा था, वह सब झूठा हो जाता है। और ज्यादा झूठा हो जाता है। क्योंकि स्वप्न तो थोड़ा—बहुत याद भी रहता है जागकर, लेकिन स्वप्न में जागा अनुभव बिलकुल याद नहीं रहता। थोड़ा—बहुत स्वप्न तो याद रह जाता है, जब आप सुबह जागते हैं। लेकिन जब आप रात सोते हैं, तब थोड़ी—बहुत जागृति का अनुभव शेष रहता है? बिलकुल नहीं रहता।
इसलिए भारतीय मनसविदों ने तो कहा है कि स्वप्न जागृति से भी ज्यादा गहरा अनुभव है। क्योंकि जागृति स्वप्न को पूरी तरह नहीं पोंछ पाती, सुबह कुछ न कुछ याद रह जाता है। लेकिन स्वप्न पूरी तरह आपकी जागृति को पोंछ डालता है। कुछ भी याद नहीं रहता, रंचमात्र भी याद नहीं रहता। निश्चित ही स्वप्न की धारा बड़ी प्रगाढ़ है। स्वप्न में जागरण असत्य हो जाता है। जागरण में स्वप्न असत्य हो जाता है। फिर सत्य क्या है?
च्चांग्त्से की बड़ी प्रसिद्ध घटना है। उसने एक रात स्वप्न देखा और सुबह उदास होकर बैठ गया। उसके शिष्यों ने पूछा, तुम उदास! क्या हुआ? उसने कहा कि रात मैंने स्वप्न देखा कि मैं एक तितली हो गया हूं। शिष्यों ने कहा, छोड़ो भी, स्वप्नों से किसी को उदास होने की जरूरत? अब तो जाग गए। उसने कहा, नहीं, बड़ी अड़चन खड़ी हो गई है। अब मुझे यह समझ में नहीं आ रहा, रात अगर च्चांग्त्से तितली हो सकता है सपने में, तो अब यह हो सकता है कि तितली सपना देख रही हो, सो गई हो और सोचती हो, च्चांग्त्से हो गई। तो अब मैं क्या करूं? अगर च्चांग्त्से सपना देख सकता है कि तितली हो गया, तो तितली क्यों सपना नहीं देख सकती कि च्चाग्त्से हो गई? तो अब मैं कौन हूं? जागा हुआ च्चांग्त्से, या सोई हुई तितली? सपना चल रहा है, कि जो चल रहा है वह सच है?
स्वप्न असत्य कर देते हैं जागरण को, जागरण असत्य कर देता है स्वप्न को। सत्य क्या है? सत्य दोनों में से कोई भी नहीं है। सत्य तो सिर्फ देखने वाला है, जिसको दोनों ही असत्य नहीं कर पाते। रात भी एक चीज मौजूद रहती है, देखने वाला; सपने देखता है। और दिन भी वह चीज मौजूद रहती है, देखने वाला; जागृति के अनुभव देखता है। सपने बदल जाते हैं, जागरण बदल जाता है, लेकिन देखने वाला अपरिवर्तित रूप से सतत मौजूद रहता है।
वह द्रष्टा ही केवल सत्य है। जो देखा जाता है, वह तो सब असत्य हो जाता है। जो देखने वाला है, वही केवल सत्य रह जाता है। स्मरण रखें, असत्य देखने के लिए भी सत्य देखने वाला चाहिए। झूठ स्वप्न को भी देखने के लिए एक सच्चा देखने वाला चाहिए। अगर देखने वाला भीतर न हो, तो असत्य भी नहीं देखा जा सकता।
दूसरा सूत्र यम कह रहा है— स्वप्न के दृश्यों को और जाग्रत के दृश्यों को, इन दोनों अवस्थाओं के दृश्यों को मनुष्य जिससे बार— बार देखता है उस सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी सबके आत्मा को जानकर बुद्धिमान मनुष्य शोक नहीं करता।
जो उसको पकड़ लेता है जो देखने वाला है, फिर वह शोक नहीं करता।
चीन में एक बहुत प्रसिद्ध कथा है कि एक सम्राट का पुत्र बीमार है। एक ही पुत्र है, मरने के करीब है। सम्राट रातभर जागता रहा, सेवा करता रहा। चार बजे के करीब उसकी नींद लग गई। सोचा था रातभर जागता रहेगा, क्योंकि बेटा कभी भी मर सकता है। और अंतिम क्षण में बाप साथ होना चाहता था। लेकिन झपकी लग गई। झपकी में उसने एक स्वप्न देखा कि वह सारे जगत का सम्राट है, उसके बारह पुत्र हैं। हर पुत्र का एक स्वर्णमहल है। अपरंपार संपत्ति है। जब वह यह स्वप्न देख रहा था, तभी उसका बेटा मर गया। पत्नी छाती पीटकर रोई, तो उसकी नींद टूट गई।
नींद टूट गई तो बजाय रोने के वह खिलखिलाकर हंसने लगा। तो उसकी पत्नी ने कहा कि तुम पागल तो नहीं हो गए हो शोक में, हंस क्यों रहे हो? उसने कहा, मैं हंस इसलिए रहा हूं कि किसके लिए रोऊं? अभी— अभी मेरे बारह पुत्र थे। ऐसे सुंदर, जैसे मैंने कभी देखे नहीं! इतना विराट साम्राज्य था! अनंत खजाने थे। सब खो गए। और जब मैं उन बारह पुत्रों के साथ था, तब इस पुत्र का मुझे स्मरण भी नहीं था, कि यह है भी। मरने—जीने की तो बात अलग! अब बारह पुत्र मर गए, खो गए और यह पुत्र मर गया। अब मैं सोच में पड़ा हूं कि किसके लिए रोऊं? कौन सच है?
न तो रात सपने में देखे गए बारह पुत्र सत्य हैं, और न दिन के सपने में देखे गए पुत्र सत्य हैं। सत्य रो। सिर्फ देखने वाला है। जो इस देखने वाले को पकड़ने लगता है, उसने सिद्ध होने का पहला कदम उठा लिया। फिर उसे कोई शोक, कोई दुख नहीं पकड़ता। क्योंकि दुख पकड़ता है बाहर की चीजों को पकड़ ने के कारण। जो भीतर के द्रष्टा को पकड़ लेता है, उसे फिर कोई दुख का कारण नहीं है। आनंद उसकी सहज अवस्था हो जाती है।
जो मनुष्य कर्मफलदाता सबको जीवन प्रदान करने वाले तथा भूत वर्तमान और भविष्य का शासन करने वाले इस परमात्मा को अपने लिए समीप जानता है उसके बाद वह कभी किसी की निंदा नहीं करता। यही है वह परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था।
अगर आपको द्रष्टा का अनुभव होने लगे—दर्शन से आंख हटे, दृश्य से आंख हटे और पीछे छिपे द्रष्टा से थोड़ा—सा भी तालमेल बैठने लगे—तो परमात्मा को आप पाएंगे कि उससे ज्यादा समीप और कोई भी नहीं। अभी उससे ज्यादा दूर और कोई भी नहीं है। अभी परमात्मा सिर्फ कोरा शब्द है। और जब भी हम सोचते हैं, तो ऐसा लगता है कि आकाश में कहीं बहुत दूर परमात्मा बैठा होगा किसी सिंहासन पर। यात्रा लंबी मालूम पड़ती है। और परमात्मा यहां बैठा. है, ठीक सासों के पीछे!
मुहम्मद ने कहा है कि तुम्हारी गले की नस जो काट दी जाए तो तुम मर जाओ, वह जितने तुम्हारे पास है, परमात्मा उससे भी ज्यादा पास है। पास से भी पास, क्योंकि तुम स्वयं वही हो। लेकिन यह खयाल तभी आएगा जब द्रष्टा पर ध्यान जाने लगे। तो परमात्मा एकदम निकट है। और जिसको परमात्मा इतना निकट मालूम होगा अपने भीतर, ध्यान रहे, उसे सबके भीतर भी मालूम होने लगेगा।
यह एक नियम है जीवन का अनिवार्य कि जो आपको अपने भीतर दिखाई पड़ता है, वही आपको दूसरों के भीतर दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है। अगर आप चोर हैं, तो आपको चारों तरफ चोर दिखाई पड़ते हैं, और लगता है, सब साजिश कर रहे हैं। अगर आप बेईमान हैं, तो आपको कोई ईमानदार नहीं दिखाई पड़ता। लगता है कि सब बेईमान हैं। सब बने—ठने बैठे हैं। जल्दी धोखा देंगे।
मैंने सुना है कि दो युवक एक रास्ते से गुजर रहे थे। दोनों जेबकट थे। दोनों साथ जा रहे थे, मित्र थे। पहला युवक बार—बार अपने खीसे में हाथ डालकर कुछ टटोलता। दूसरा बार—बार अपने खीसे से घड़ी निकालकर समय देखता। पहले युवक ने पूछा कि इतना बार—बार समय क्यों देख रहे हो? उस दूसरे ने कहा कि तुम बार—बार खीसे में क्या टटोलते हो? मैं भी जेबकट हूं। घड़ी को बार—बार देखना पड रहा है कि अभी है कि गई! तुम क्या टटोल रहे हो? उसने कहा कि जेबकट तो मैं भी हूं। खीसे में नोट रखे हैं। वह बार—बार टटोलने पड़ रहे हैं कि गए कि बचे!
दूसरे के संबंध में, जो भी धारणा हमारी होती है, वह बहुत गहरे में अपनी ही धारणा होती है। अगर आप चोरों से बहुत सचेत रहते हैं, तो समझना कि चोर भीतर छिपा है, अन्यथा इतने सचेत आप न रहेंगे। क्या कारण है सचेत रहने का इतना? जो हमारे भीतर है, वही हमारी धारणा है मनुष्यों के बाबत।
इसलिए बुरा आदमी कभी नहीं मान पाता कि कोई अच्छा आदमी हो सकता है। बुरा आदमी मानता है कि अच्छा दिखाई पड़ता होगा। ढोंग रच रहा होगा। अच्छा हो नहीं सकता। इसलिए बुरा आदमी हमेशा कोशिश में रहता है। अगर आप उससे कहें कि फलां आदमी अच्छा है, तो अविश्वास से सिर हिलाएगा। वह कहेगा कि ठहरो, थोड़े दिन में समझोगे। ज्यादा देर तक चीजें छिपी नहीं रहतीं। पता चल ही जाएगा। उगैर वह पूरी कोशिश करेगा पता लगाने की कि आदमी बुरा होना चाहिए। बुरा होना तो पक्का भरोसा है।
अच्छा होना तो आवरण ही हो सकता है।
सिर्फ अच्छा आदमी ही भरोसा करता है कि दूसरा अच्छा हो सकता है। अच्छा आदमी मुश्किल पाता है कि कोई बुरा कैसे हो सकता है? क्यों होगा? और ध्यान रहे, अगर आपको दूसरे के बुरे होने पर तत्काल भरोसा आ जाता हो, तो भूलकर मत समझना कि आप अच्छे आदमी हैं। वह कसौटी है। अच्छे आदमी को तो बड़ा मुश्किल है यह भरोसा लाना कि दूसरा बुरा है—बुरा हो तो भी। ठीक वैसे ही जैसे बुरे आदमी को भरोसा लाना मुश्किल है कि दूसरा अच्छा है—अच्छा हो तो भी।
हम सोच ही नहीं सकते अपने से बाहर। इसलिए जिस व्यक्ति को द्रष्टा का अनुभव होने लगता है, उसे सबके भीतर भी द्रष्टा का अनुभव होने लगता है। वह आपके शरीर को नहीं देखता, आपके भीतर की झलक उसे मिलने लगती है। उसे सब तरफ परमात्मा मौजूद मालूम होता है, इसलिए निंदा असंभव हो जाती है। निंदा असंभव तभी हो सकती है, जब दूसरे में हमें परमात्मा दिखाई पड़ने लगे। तब तो स्तुति हो सकती है, निंदा होने का कोई कारण नहीं रह जाता।
हमें सब तरफ शैतान दिखाई पड़ता है, इसलिए निंदा चलती है। शैतान को शैतान दिखाई पड़ता है, परमात्मा को परमात्मा दिखाई पड़ता है। आप जो हैं, वही आपके जगत का अनुभव है। उसी का फैलाव है। उसी दिन समझना कि आपके भीतर संतत्व का उदय हुआ, जिस दिन आपको शैतान दिखाई पड़ना मुश्किल हो जाए।
राबिया एक सूफी फकीर औरत हुई। कुरान में एक जगह वचन आता है कि शैतान को घृणा करो। उसने कुरान में यह वचन काट दिया।
यह बड़ी असभ्यता की बात है, अशिष्ट है। कुरान में कोई सुधार नहीं किया जा सकता, कि गीता या वेद में, कि आप बैठें और सुधार कर दें। एक फकीर जुन्नैद राबिया के घर मेहमान था। उसने सुबह—सुबह राबिया की कुरान उठाकर पढ़ी, तो उसने देखा कि उसमें सुधार किया हुआ है! उसने काट दी है लाइन! जुन्नैद ने कहा कि किस नासमझ ने यह पाप कृत्य किया है? कुरान को कोई सुधार सकता है!
राबिया ने कहा, किसी और ने नहीं, मैंने ही वह लकीर काटी है। तो जुन्नैद ने कहा कि तूने ऐसी नास्तिकता का काम किया! राबिया ने कहा, मैं बड़ी मुश्किल में पड़ गई हूं। जब से प्रभु का अनुभव होना शुरू हुआ, मुझे शैतान दिखाई नहीं पड़ता। तो घृणा मैं किसको करूं? तो यह वचन मेरे योग्य नहीं है। यह वचन मुझसे तालमेल नहीं खाता। शैतान कहां है? अब तो शैतान भी मेरे सामने आकर खड़ा हो, तो मुझे परमात्मा ही दिखाई पड़ेगा। इसलिए अब घृणा करने का कोई उपाय नहीं। इसलिए लकीर मैंने काट दी। जिससे मेरा कोई तालमेल नहीं है अब, मेरी कुरान में वह लकीर नहीं रह सकती।      यह सूत्र कह रहा है कि जैसे ही किसी व्यक्ति को अनुभव होता है कि वह समीप है, समीपतम है, उसके बाद वह किसी की निंदा नहीं करता। स्तुति सहज हो जाती है। उसे सबके भीतर उसकी झलक दिखाई पड़ने लगती है। सब दीयों में उसी की रोशनी।
यही है वह परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था।
जो जल आदि पांच तत्वों से पहले ही अजन्मा था उस सबसे पहले तप से उत्पत्र हृदय— गुहा में प्रवेश करके जीवात्माओं के साथ स्थित रहने वाले परमेश्वर को जो पुरुष देखता है वही ठीक देखता है यही है वह परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था।
कौन देखता है ठीक? किसकी दृष्टि ठीक है? और दृष्टि ही ठीक न हो तो परमात्मा का दर्शन असंभव है। कौन देखता है ठीक? वही देखता है ठीक, जो हृदय की गुफा में छिपे हुए उसको पहचान लेता है, जो अजन्मा है।
हृदय का तो जन्म हुआ है, गुहा तो बनी है, मिट जाएगी। शरीर तो निर्मित है, बिखर जाएगा। जन्मा है, मृत्यु होगी। इस शरीर की गुफा में छिपा हुआ अजन्मा कोई है, जिसका कोई जन्म नहीं हुआ है और जो कभी मिटेगा नहीं, उसे जो देखता है, वही देखता है। बस उसके पास ही आंख है, बाकी सब अंधे हैं, भीतर की दृष्टि से—बाकी सब अंधे हैं। बाहर कितना ही दिखाई पड़ता हो, जो स्वयं को ही नहीं देख पाते, उनका आंखों का होना न—होना बराबर है।
उपनिषद कह रहा है, वही ठीक देखता है जो अजन्मा को हृदय की गुफा में पहचान लेता है। यह ही है वह परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा था।
जो देवी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है जो प्राणियों के सहित उत्पत्र हुई है तथा जो हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके वहीं रहने वाली है उसे जो पुरुष देखता है वही यथार्थ देखता है। यही है वह परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था।
प्राण की ऊर्जा का नाम अदिति है। जीवन—ऊर्जा का नाम अदिति है। यह जो भीतर जीवन की धारा बह रही है, इस धारा को जो पहचान लेता है…
हम शरीर को पहचानते हैं। शरीर नदी नहीं है, सिर्फ नदी का किनारा है। शरीर के दो किनारों के बीच नदी बह रही है। किनारे तो हमें दिखाई पड़ते हैं, नदी नहीं दिखाई पड़ती। नदी सरस्वती जैसी है, अदृश्य। किनारे भर दिखाई पड़ते हैं, सूखा बीच का मार्ग दिखाई पड़ता है, नदी दिखाई नहीं पड़ती।
शरीर किनारा है। उसके सहारे कुछ और बह रहा है, जो दिखाई नहीं पड़ता। प्रतिपल आपके रोएं—रोएं में ऊर्जा बह रही है। ऊर्जा तो कहीं भी दिखाई नहीं पड़ती। ये बिजली के बल्व जल रहे हैं। ये बल्व दिखाई पड़ते हैं, लेकिन तारों के भीतर से बहती हुई ऊर्जा दिखाई नहीं पड़ती। आज तक बिजली को किसी ने देखा नहीं है, सिर्फ बिजली का उपयोग देखा है। आज तक कोई भी शक्ति प्रत्यक्ष नहीं हो सकी है। सिर्फ शक्ति की अभिव्यक्तियां प्रगट होती हैं।
यह बिजली है—बल्व जल रहा है, पंखा चल रहा है—ये सिर्फ उपयोग हैं। लेकिन बिजली क्या है ना उसे आज तक किसी ने नहीं देखा। कोई कभी देखेगा भी नहीं। शक्ति का कोई दर्शन नहीं हो सकता। शक्ति अरूप है, निराकार है। आप चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं, बोलते हैं—यह दिखाई पड़ता है। लेकिन कौन चलता है? कौन बैठता? कौन बोलता? कौन चुप होता? वह बिलकुल दिखाई नहीं पड़ता। वह प्राण—ऊर्जा, उसका नाम अदिति है। उस प्राण—ऊर्जा को जो अपने भीतर देख लेता है, वही देखता है—वही यथार्थ देखता है। यही है वह परमात्मा, जिसके विषय में तुमने पूछा।
जो सर्वज्ञ अग्निदेवता गर्भिणी स्त्रियों द्वारा भलीभांति धारण किए हुए गर्भ की भांति दो अरणियों में सुरक्षित है छिपा है तथा जो जाग्रत है और हवन करने योग्य सामग्रियों से युक्त मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन गति करने योग्य है यही है वह परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था।
पुराने जमाने में जब आग को पैदा करने के और कोई उपाय न थे, तो दो लकड़ियों को रगड़कर आग पैदा की जाती थी। वह जिस लकड़ी को रगड़कर आग पैदा करते थे, उसका नाम अरणि था। रगड़ने से जो छिपी आग थी, वह प्रगट हो जाती। छिपी तो पहले ही थी, दोनों लकड़ियों में छिपी थी। चकमक का पत्थर आपने देखा है, उसमें छिपी है; रगड़ते हैं, पैदा हो जाती है। रगड़ से कोई चीज पैदा नहीं होती, केवल प्रगट हो सकती है। जो छिपी हो, वह प्रगट हो सकती है।
आपके भीतर भी परमात्मा छिपा है, थोड़े —से रगड़ने की बात है; थोड़े—से साधना की, थोड़े—से तप की बात है; थोड़े—से प्रयास की बात है। जो छिपा है, वह प्रगट हो जाएगा। धू—धू करके उसकी लपट जलने लगेगी। लेकिन कोई आदमी दो अरणियों को रखे बैठा रहे। सर्द रात हो। बर्फ पड़ती हो। कंपता हो। और दो लकड़ियों को रखे बैठा रहे, तो कुछ होगा नहीं।
छिपी हुई आग से कोई गर्मी नहीं मिलती। छिपी हुई आग से रोशनी भी नहीं मिलती। और आग छिपी है और सामने रखी है। जरा—सा दो लकड़ियों को रगड़ने की बात है कि प्रगट हो जाएगी। अंधेरा टूट जाएगा। सर्दी टूट जाएगी। अग्नि देवता प्रगट हो सकता है।
अग्नि की पूजा बड़ी प्राचीन है। और अग्नि की पूजा का मौलिक कारण यही था, कि जैसे अग्नि छिपी होती है पदार्थों में और प्रगट करनी पड़ती है, वैसे ही परमात्मा भी छिपा है और प्रगट करना पड़ता है।
और भी एक कारण से अग्नि निरंतर पूज्य रही। अग्नि की एक खूबी है कि वह सदा ऊपर की तरफ जाती है, उसकी गति सदा ऊपर की तरफ है। अगर आप दीए को उलटा भी कर दें, तो भी ली ऊपर की तरफ जाएगी। दीया उलटा हो जाएगा, लौ उलटी नहीं कर सकते आप।
पानी नीचे की तरफ बहता है, आग ऊपर की तरफ बहती है। आग का सहारा अगर पानी भी ले ले तो पानी तक ऊपर की तरफ बहने लगता है। गरम हो जाए, उबल जाए, भाप बन जाए यात्रा बदल जाती है। पानी का गुणधर्म बदल जाता है। वह जो नीचे की तरफ बहता था, वह भी आकाश की तरफ उठने लगता है। इस जगत में पुराने दिनों में आदमी को अनुभव हुआ कि आग के अतिरिक्त किसी चीज में ऊपर की तरफ जाने की क्षमता नहीं है। आग ग्रेविटेशन के विपरीत है। जमीन खींचती है, आग को नहीं खींच पाती। आग लेविटेशन को मानती है। आग ऊपर की तरफ जाती है, जमीन उस पर कुछ भी नहीं कर पाती।
जो चेतना ऊपर की तरफ जाने लगती है, वह आग उसका प्रतीक बन गई। और परमात्मा निरंतर ऊपर की तरफ जाती हुई चेतना का नाम है। यह आग सबके भीतर छिपी है। साधन पूरे के पूरे आपके पास हैं। थोड़ी—सी रगड़ की जरूरत है। उस रगड़ का नाम साधना है। थोड़ा—सा हिलना—डुलना पड़ेगा। थोड़ा भीतर छिपी हुई अरणियों को टकराना पड़ेगा। ये मैं जितने ध्यान के प्रयोग आपको कह रहा हूं ये वस्तुत: अरणियों का टकराना हैं।
मुझसे लोग आकर पूछते हैं कि ऐसे चुपचाप ही बैठकर करें तो क्या हर्ज है? वे यह पूछ रहे हैं कि अरणियों को ऐसे ही रखा रहने दें चुपचाप, तो आग पैदा नहीं होगी g:
नहीं होगी। रगड़ना ही पड़ेगा। आपके भीतर की ऊर्जा को थोड़ा संघर्षण से गुजरना पड़ेगा। ऐसे ही होने वाली बात होती तो हो गई होती। वह नहीं हुई है। उस आग को जगाने के लिए थोड़ा—सा श्रम जरूरी है।
जहां से सूर्य का उदय होता है जहां सूर्य अस्त होता है सभी देवता उसी में समर्पित हैं।
जहां सूर्य पैदा होता है, जहां सूर्य समाप्त होता है, जहां से जीवन का प्रारंभ है और जहा जीवन विसर्जित होता है, उस मूल उदगम या उस अंतिम पड़ाव में ही, जहां सभी देवता समर्पित हैं..।
उस परमेश्वर को कोई कभी लांघ नहीं सकता।
वह सबका मूल उदगम और सबका अंतिम अंत है। उसके पार जाने का कोई उपाय नहीं। परमात्मा का कोई अतिक्रमण नहीं हो सकता, क्योंकि सभी चीजों का अतिक्रमण करके जो उपलब्ध होता है, वह परमात्मा है। उसके पार जाने का कोई उपाय नहीं। वह अंतिम है। वह आखिरी सीमा है अस्तित्व की।
यही है वह परमात्मा जिसके विषय में तुमने पूछा था।
जो परब्रह्म यहां है —यह सूत्र थोड़ा ठीक से खयाल में ले लें— जो परब्रह्म यहां है वही वहां परलोक में भी है। जो वहां है वही यहां इस लोक में भी है। वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को अर्थात बारंबार जन्म—पराग को प्राप्त होता है जो इस जगत में उस परमात्मा को अनेक की भांति देखता है।
अगर कोई कहता हो कि परमात्मा यहां नहीं परलोक में है, तो वह अज्ञानी है। अगर कोई कहता हो कि परमात्मा यहां नहीं वहा है, तो वह भ्रांति में है। क्योंकि वह सब जगह है। सभी जगह जो है, उसी का वह नाम है। सबके अस्तित्व में जो छिपा है, वही यहां भी, वहां भी; इस पार भी, उस पार भी, जहा तक अस्तित्व है, जहा तक होना है, वहां तक वही है। परलोक में परमात्मा है, ऐसा नहीं है, इस लोक में भी वही है। देखने वाली आंख चाहिए। और जिसके पास देखने वाली आंख है, उसे यहां ही दिखाई पड़ जाएगा। और ध्यान रहे, जिसे यहां दिखाई नहीं पड़ता, उसे वहा भी दिखाई नहीं पड़ेगा। देखने वाली आंख पर निर्भर है। वह आंख पैदा हो जाए, तो सब जगह वह प्रगट हो जाता है। वह आंख पास में न हो, तो वह कहीं भी प्रगट नहीं होता।
लेकिन लोग अपने को धोखा देते रहते हैं। वे कहते हैं, वह यहां प्रगट नहीं हो रहा है क्योंकि यहां नहीं है, वहा परलोक में है। इस तरह अंधे अपना बचाव कर लेते हैं। उनको फिर यह खयाल नहीं होता कि हम अंधे हैं इसलिए दिखाई नहीं पड़ रहा।
अंधों ने बैकुंठ, स्वर्ग, परलोक, न—मालूम क्या—क्या निर्माण किए हैं। वह उनकी इस बात की कोशिश है कि हममें कोई गलती नहीं है कि वह हमें दिखाई नहीं पड़ रहा है; वह यहां है ही नहीं, वह परलोक में है। जब हम परलोक पहुंचेंगे, तब वह दिखाई पड़ेगा। इससे अंधों को बड़ी सुविधा हो जाती है, सात्वना मिलती है।
लेकिन ध्यान रहे, यह सूत्र कुछ और कह रहा है। ये यह कह रहा है, वह यहां भी उतना ही है जितना वहा। अगर नहीं दिखाई पड़ता तो गैर—मौजूदगी कारण नहीं है। नहीं दिखाई पड़ता, क्योंकि आंखे पास नहीं हैं। आंख पैदा करने की कोशिश करनी पड़े।
झेन फकीर रिंझाई का एक बहुत प्रसिद्ध वचन है। उस वचन पर सदियों तक विवाद होता रहा है। वह वचन बड़ा उलटा मालूम पड़ता है। रिंझाई ने कहा है, संसार और निर्वाण एक ही हैं। यह बड़ी उलटी बात हो गई। क्योंकि हम तो कहते हैं : संसार छोड़ो, त्याग करो। और यह रिंझाई कहता है, संसार और निर्वाण एक ही हैं। जिसने रत्तीभर भेद किया, वह अज्ञानी है। रिंझाई ने अगर यह सूत्र पढ़ा होता उपनिषद का, तो वह नाच उठता। वह कहता कि बिलकुल ठीक। जो वहा है वह यहां भी है। संसार और निर्वाण एक हैं। भेद अंधों के कारण है। उनको यहां दिखाई नहीं पड़ता, इससे वे यह नहीं सोचते कि आंखे नहीं हैं। इससे वे सोचते हैं, यहां वह मौजूद नहीं है। खोज की कोई जरूरत नहीं, जब परलोक जाएंगे...।
इसीलिए जैसे—जैसे आदमी बूढ़ा होने लगता है और परलोक करीब आने लगता है, वैसे—वैसे धार्मिक होने लगता है। मंदिरों में, मस्जिदों में, गुरुद्वारों में बूढ़े इकट्ठे हैं, जवान वहां दिखाई नहीं पड़ते। और कभी कोई जवान भी दिख जाए, तो समझना कि किसी न किसी कारण से का हो गया है। कोई न कोई गड़बड़ हो गई है। के भी चौंककर देखेंगे कि जवान आदमी यहां किसलिए? वे भी अपने बेटों को समझाते हैं कि धर्म अभी तुम्हारे काम का नहीं। इसकी एक उम्र होती है। जब बूढ़े हो जाओ, तब।
असल में मरने की घटना जब बिलकुल करीब आने लगे, जब ऐसा शक होने लगे कि अब परलोक जाना ही पड़ेगा, तो आदमी धार्मिक होना शुरू होता है। क्योंकि इस लोक में तो परमात्मा है नहीं।
लेकिन यह व्यवस्था धोखे की है। जो यहां धार्मिक नहीं है, वह मौत, सिर्फ मौत के कारण धार्मिक नहीं हो जाएगा। और जिसको परमात्मा यहां नहीं दिखाई पड़ता, मौत कोई आंखे दान नहीं देती कि परमात्मा परलोक में दिखाई पड़ जाएगा। ठीक जैसे आप हैं, अगर आपको परलोक में खड़ा कर दिया जाए, आप वहां भी संसार ही देखेंगे। जल्दी से आप वहां भी कुछ इंतजाम करना शुरू कर देंगे। दुकान खोल लेंगे, शादी—विवाह करने लगेंगे, कुछ न कुछ आप तत्थण, जो संसार आपका यहां था, आप वहां बसाना शुरू कर देंगे।
लेकिन मुक्तपुरुष को यहां इस संसार में भी मोक्ष ही दिखाई पड़ता है। कुछ और दिखाई पड़ने का उपाय नहीं है।
जो परब्रह्म यहां है वही वहां परलोक में भी है। जो वहां है वही यहां इस लोक में भी है। वह मनुष्य मृत्यु से मृत्यु को अर्थात बारंबार जन्म— मरण को प्राप्त होता है जो इस जगत में उस परमात्मा को अनेक की भांति देखता है एक की भांति नहीं
इसे भी थोड़ा समझ लेना चाहिए। हम इस जगत को अनेक की भांति देखते हैं। वृक्ष, पत्थर अलग, आप अलग, मैं अलग, पड़ोसी अलग; सब अलग; सब टूटे हुए, खंड—खंड। हमारी हालत ऐसी है जैसे रात चांद निकले और जमीन पर हजारों डबरे हैं, झीलें हैं, पानी के सरोवर हैं, और सब में चांद दिखाई पड़ता है। एक ही चांद होता है आकाश में, लेकिन सब पानी में हजारों—लाखों प्रतिबिंब बनते हैं, और हम एक—एक प्रतिबिंब को गिनते फिरें, और सोचें कि कितने चांद हैं! और नजर न उठाएं उस एक की तरफ, जिसके सब प्रतिबिंब हैं।
इस जगत में जितना भी अस्तित्व है, जितने रूप हैं, वे एक के ही प्रतिबिंब हैं। आपके भीतर, एक सरोवर की भांति आपकी चेतना में, उस एक की ही छाया बनी है।
यह सूत्र कहता है, जो यहां अनेक की भांति देखता है, वह भटकता है जन्म—मरण में। जो यहां भी एक की भांति देख लेता है उसे, वह तत्‍क्षण मुक्त हो जाता है।
एक को पहचान लेना परम ज्ञान है। अनेक को देखते रहना अशान है।
ध्यान के लिए तैयार हों।

ध्‍यान योग शिविर
माउंट आबू, राजस्‍थान।