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शनिवार, 14 जून 2014

गीता दर्शन--(भाग--3) प्रवचन--21


श्रद्धावान योगी श्रेष्ठ है (अध्याय—6) प्रवचन—इक्कीसवां

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।। 46।।

योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, तथा सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इससे हे अर्जुन, तू योगी हो।


पस्वियों से भी श्रेष्ठ है, शास्त्र के ज्ञाताओं से भी श्रेष्ठ है, सकाम कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है, ऐसा योगी अर्जुन बने, ऐसा कृष्ण का आदेश है। तीन से श्रेष्ठ कहा है और चौथा बनने का आदेश दिया है। तीनों बातों को थोड़ा-थोड़ा देख लेना जरूरी है।

गीता दर्शन -(भाग--3) प्रवचन--20


आंतरिक संपदा (अध्याय—6) प्रवचन—बीसवां

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्
यततेततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन।। 43।।

और वह पुरुष वहां उस पहले शरीर में साधन किए हुए बुद्धि के संयोग को अर्थात समत्वबुद्धि योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है। और हे कुरुनंदन, उसके प्रभाव से फिर अच्छी प्रकार भगवत्प्राप्ति के निमित्त यत्न करता है।


जीवन में कोई भी प्रयास खोता नहीं है। जीवन समस्त प्रयासों का जोड़ है, जो हमने कभी भी किए हैं। समय के अंतराल से अंतर नहीं पड़ता है। प्रत्येक किया हुआ कर्म, प्रत्येक किया हुआ विचार, हमारे प्राणों का हिस्सा बन जाता है। हम जब कुछ सोचते हैं, तभी रूपांतरित हो जाते हैं; जब कुछ करते हैं, तभी रूपांतरित हो जाते हैं। वह रूपांतरण हमारे साथ चलता है।

गीता दर्शन-(भाग--3) प्रवचन--19


 यह किनारा छोड़ें (अध्याय—6) प्रवचन—उन्नीसवां


श्रीभगवानुवाच

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते
हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।। 40।।

हे पार्थ, उस पुरुष का न तो इस लोक में और न परलोक में ही नाश होता है, क्योंकि हे प्यारे, कोई भी शुभ कर्म करने वाला अर्थात भगवत-अर्थ कर्म करने वाला, दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है।
र्जुन ने पूछा है कृष्ण से कि यदि न पहुंच पाऊं उस परलोक तक, उस प्रभु तक, जिसकी ओर तुमने इशारा किया है, और छूट जाए यह संसार भी मेरा; साधना न कर पाऊं पूरी, मन न हो पाए थिर, संयम न सध पाए, और छूट जाए यह संसार भी मेरा; तो कहीं ऐसा तो न होगा कि मैं इसे भी खो दूं और उसे भी खो दूं! तो कृष्ण उसे उत्तर में कह रहे हैं; बहुत कीमती दो बातें इस उत्तर में उन्होंने कही हैं।

गीता दर्शन--(भाग--3) प्रवचन--18


तंत्र और योग (अध्याय—6) प्रवचन—अठारहवां

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।। ।।

मन को वश में न करने वाले पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है अर्थात प्राप्त होना कठिन है और स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन करने से प्राप्त होना सहज है, यह मेरा मत है।


कृष्ण ने दोत्तीन बातें इस सूत्र में कही हैं, जो समझने जैसी हैं।
एक, मन को वश में न करने वाले पुरुष द्वारा योग की उपलब्धि अति कठिन है; असंभव नहीं कहा। बहुत मुश्किल है; असंभव नहीं कहा। नहीं ही होगी, ऐसा नहीं कहा। होनी अति कठिन है, ऐसा कहा है। तो एक तो इस बात को समझ लेना जरूरी है।
दूसरी बात कृष्ण ने कही, मन को वश में कर लेने वाले के लिए सरल है, सहज है उपलब्धि योग की।

गीता दर्शन--(भाग--3) प्रवचन--17


वैराग्य और अभ्यास—(अध्याय—6) प्रवचन—सत्रहवां

प्रश्न: भगवान श्री, सुबह के श्लोक में चंचल मन को शांत करने के लिए अभ्यास और वैराग्य पर गहन चर्चा चल रही थी, लेकिन समय आखिरी हो गया था, इसलिए पूरी बात नहीं हो सकी। तो कृपया अभ्यास और वैराग्य से कृष्ण क्या गहन अर्थ लेते हैं, इसकी व्याख्या करने की कृपा करें।


राग है संसार की यात्रा का मार्ग, संसार में यात्रा का मार्ग। वैराग्य है संसार की तरफ पीठ करके स्वयं के घर की ओर वापसी। राग यदि सुबह है, जब पक्षी घोंसलों को छोड़कर बाहर की यात्रा पर निकल जाते हैं, तो वैराग्य सांझ है, जब पक्षी अपने नीड़ में वापस लौट आते हैं।
वैराग्य को पहले समझ लें, क्योंकि जिसे वैराग्य नहीं, वह अभ्यास में नहीं जाएगा। वैराग्य होगा, तो ही अभ्यास होगा। वैराग्य होगा, तो हम विधि खोजेंगे--मार्ग, पद्धति, राह, टेक्नीक--कि कैसे हम स्वयं के घर वापस पहुंच जाएं? कैसे हम लौट सकें? जिससे हम बिछुड़ गए, उससे हम कैसे मिल सकें?

शुक्रवार, 13 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--31


याद घर बुलाने लगी—प्रवचन—इकतीसवां

सूत्र:

ण वि दुक्‍खं ण वि सुक्‍खं, ण वि पीडा णेव विज्‍जदे बाहा।
णवि मरणं ण वि जणणं,तत्‍थेव य होई णिव्‍वाणं।। 156।।

ण वि इंदिय उवसग्‍गा, तत्‍थेव य होइ णिव्‍वाणं
ण य तिण्‍हा णेछुहा, तत्‍थेव य होइ णिव्‍वाणं।। 157।।

ण वि कम्‍मं णोकम्‍मं, ण वि चिंता णेव अट्टरूद्दाणि
ण वि धम्‍मसुक्‍कझाणे, तत्‍थेव य होइ णिव्‍वाणं।। 158।।

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--30


एक दीप से कोटि दीप हों—प्रवचन—तीसवां

प्रश्‍नसार:

1—जिन—धारा अनेकांत—भाव और स्‍यातवाद से भरी है, फिर भी प्रेमशून्‍य क्‍यों हो गई?

2—जीसस अपने शिष्‍यों से कहते थे कि यदि मेरे साथ चलने से कोई तुम्‍हें रोके तो उसे मार डालो और मेरे साथ चल पड़ो। प्रेमपुजारी जीसस की ऐसी आज्ञा?

3—अतीत में गुरु के पास एक ही मार्ग के साधक इकट्ठे होते थे। और आपके आश्रम में सभी विपरीत मार्गों का मेला लगा हुआ है—यह कैसे?

4—त्‍वमेव माता च पिता त्‍वमेव, त्‍वमेव, बंधुश्‍च सखा त्‍वमेव
   त्‍वमेव विद्या द्रविणं तवमेव, तवमेव सर्वं मम देव देवा

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--29


त्रिगुप्‍ति और मुक्‍ति—प्रवचन—उनतीसवां

सूत्र:

जहा महातलायस्‍स सन्‍निरूद्धे जलागमे
उस्‍सिंचणाए तवणाए, कमेण सोसणा भवे।वे।।
एवं तु संजयस्‍सावि पावकम्‍मनिरासवे
भवकोडीसंचियं कम्‍मं,तवसा निज्‍जारिज्‍जइ।। 152।।

तवसा चेवमोक्‍खो संवरहीणस्‍स होई जिणवयणे
ण हु सोते पविसंते, किसिणं परिसुस्‍सदि तलायं।। 153।।

गुरुवार, 12 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--28

रसमयता और एकाग्रता— प्रवचन—अट्ठाइसवां

प्रश्‍नसार:

1—कुछ दिन ध्‍यान में जी लगता है, कुछ दिन भजन में; लेकिन एकाग्रता कहीं नहीं होती।

2—आकस्‍मिक रूप से भगवान से मिलना हुआ और संन्‍यास भी ले लिया, क्‍या यह ध्‍यान कायम रहेगा?

3—भगवान श्री कृष्‍ण के सिर र्दद के लिए ज्ञानियों ने पैर की धूल देने से इंकार कर दिया लेकिन गोपियों ने दे दी—इसका रहस्‍य क्‍या है?

4—क्‍या ध्‍यान की मृत्‍यु और प्रेम की मृत्‍यु भिन्‍न होती है?

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--27

पंडितमरण सुमरण है—प्रवचन—सत्‍ताईसवां

सूत्र:

सरीमाहु नाव त्‍ति, जीवो वुच्‍चइ नाविओ
संसारो अण्‍णवो वुत्‍तो, जं तरंति महेसिणो।। 146।।

धीरेण वि मरियव्‍वं, काउरिसेण वि अवस्‍समरियव्‍वं
तम्‍हा अवस्‍समरणे, वरं खु धीरत्‍तणे मरिउं।। 147।।

इक्‍कं पंडियमरणं, छिंदइ जाईसयाणि बहुयाणि
तं मरणं मरियव्‍वं, जेण मओ सुम्‍मओ होई।। 148।।

इक्‍कं पंडियमरणं, पडिवज्‍जइ सुपुरिसो असंभंतो
खिप्‍पं सो मरणाणं, काहिइ अंतं अणंताणं।। 149।।

समाधि के सप्‍त द्वार--(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--17


प्राणिमात्र के लिए शांति—प्रवचन—सत्रहवां

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि, 17 फरवरी, 1973

इसके अतिरिक्त, उन पवित्र अभिलेखों का और क्या आशय, जो तुझसे यह कहलवाते हैंः
", मेरा विश्वास है कि सभी अर्हत निर्वाण-मार्ग के मधुर फल नहीं चखते हैं।
", मेरा विश्वास है कि सभी बुद्ध निर्वाण-धर्म में प्रवेश नहीं करते हैं'
हां, आर्य-पथ पर अब तू स्रोतापन्न नहीं है, तू एक बोधिसत्व है। नदी पार की जा चुकी है। सच है कि तू "धर्मकाया' के वस्त्र का अधिकारी हो गया है, लेकिन "संभोग काया' निर्वाणी से बड़ा है। और उससे भी बड़े हैं "निर्माण कायावाले'--कारुणिक बुद्ध
अब ओ बोधिसत्व, अपना सिर झुका और ठीक से सुन। करुणा स्वयं बोलती हैः जब तक प्राणिमात्र दुख में हैं, क्या तब तक आनंद संभव है? क्या तू अकेला सुरक्षित होगा और सारा संसार रोता रहेगा?

बुधवार, 11 जून 2014

गीता दर्शन--(भाग--3) प्रवचन--16


मन का रूपांतरण—(अध्याय-6) प्रवचन—सोलहवां

अर्जुन उवाच

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहंपश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।। 33।।
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।। 34।।

हे मधुसूदन, जो यह ध्यानयोग आपने समत्वभाव से कहा है, इसकी मैं मन के चंचल होने से बहुत काल तक ठहरने वाली स्थिति को नहीं देखता हूं। क्योंकि हे कृष्ण, यह मन बड़ा चंचल और प्रमथन स्वभाव वाला है, तथा बड़ा दृढ़ और बलवान है, इसलिए उसका वश में करना मैं वायु की भांति अति दुष्कर मानता हूं।

समाधि के सप्‍त द्वार--(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--16


ऐसा है आर्य मार्ग—प्रवचन—सोलहवां

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; प्रातः, 17 फरवरी, 1973

और यदि तू सातवां द्वार भी पार कर गया, तो क्या तुझे अपने भविष्य का पता है? आनेवाले कल्पों में स्वेच्छा से जीने के लिए तू बाध्य होगा, लेकिन मनुष्यों द्वारा न देखा जाएगा, और न उनका धन्यवाद ही तुझे मिलेगा। और अभिभावक-दुर्गभ भ को बनानेवाले अन्य अनगिनत पत्थरों के बीच तू भी एक पत्थर बन कर जीएगा। करुणा के अनेक गुरुओं के द्वारा निर्मित उनकी यातनाओं के सहारे ऊपर उठा और उनके रक्त से जुड़ा यह दुर्ग मनुष्य-जाति की रक्षा करता है। क्योंकि मनुष्य मनुष्य है, इसलिए यह उसे भारी विपदाओं और शोक से बचाता है।
साथ ही, चूंकि मनुष्य इसे नहीं देखता है, इसलिए वह न स्पर्श कर सकता है और न प्रज्ञा की वाणी को सुन सकता है क्योंकि वह जानता ही नहीं है।

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--26


प्रेम के कोई गुणस्‍थान नहीं—प्रवचन छब्बीसवां

प्रश्‍नसार:

1— बारहवें और तेरहवें गुणस्थान: क्षीणमोह और सयोगिकेवलीजिन में क्या भिन्नता है इसे स्पष्ट करने की कृपा करें।

2—क्‍या तेरहवें गुणस्‍थान को उपलब्‍ध होकर भी उससे च्‍युत हुआ जा सकता है?

3—क्‍या प्रेम के मार्ग पर भी कोई सीढ़ियां होती है?

4—रजनीश एशो आमी तोमार बोइसागी
   आमी पूना गेलाम, आमी काशी गेलाम
   लाओ री लाओ संगे डुगडुगी।

मंगलवार, 10 जून 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--25


चौदह गुणस्‍थान—प्रवचन—पच्‍चीसवां

सूत्र:

जेहिं दु लक्‍खिज्‍जंते, उदयादिसुसंभवेहिं भावेहिं
जीवा ते गुणसण्‍णा, णिद्दिट्ठा, सव्‍वदरिसीहिं।। 144।।

मिच्‍छो सासण मिस्‍सो, अविरदसम्‍मोदेसविरदो य।
विरदो पमत्‍त इयरो, अपुत्‍व अणियट्टि सुहुमो य।
उवसंत खीणमोहो, सजोगिकेवलिजिणो अजोगी य।
चोद्दस गुणट्ठाणाणि, कमेण सिद्धा य णायव्‍वा।।145।।

गीता दर्शन (भाग--3) प्रवचन--15


सर्व भूतों में प्रभु का स्मरण—(अध्याय—6) प्रवचन—पंद्रहवां


सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।। 31।।

इस प्रकार जो पुरुष एकीभाव में स्थित हुआ संपूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानंदघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बर्तता हुआ भी मेरे में बर्तता है।

कृष्ण इस सूत्र में अर्जुन को सब भूतों में प्रभु को भजने के संबंध में कुछ कह रहे हैं। भजन का एक अर्थ तो हम जानते हैं, एकांत में बैठकर प्रभु के चरणों में समर्पित गीत; एकांत में बैठकर प्रभु के नाम का स्मरण; या मंदिर में प्रतिमा के समक्ष भावपूर्ण निवेदन। लेकिन कृष्ण एक और ही रूप का, और ज्यादा गहरे रूप का, और ज्यादा व्यापक आयाम का सूचन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति समस्त भूतों में मुझ सच्चिदानंद को भजता है! क्या होगा इसका अर्थ?

समाधि के सप्‍त द्वार-(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--15


बोधिसत्व बन!—प्रवचन—पंद्रहवां

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि, 16 फरवरी, 1973

हां, वह शक्तिशाली है। वह जीवंत शक्ति, जो उसमें मुक्त हुई है और जो शक्ति वह स्वयं है, माया के मंडप को देवताओं के भी ऊपर महान ब्रह्मा और इंद्र के ऊपर भी उठा सकती है। अब वह निश्चित ही अपने महा पुरस्कार को उपलब्ध करेगा।
क्या वह, जिसने महा माया को जीत लिया है, इन वरदानों को अपने ही विश्राम और आनंद के लिए, अपने ही सुअर्जित सुख और गौरव के लिए उपयोग नहीं करेगा?
नहीं, ओ निसर्ग के गुह्य-विद्या के साधक, यदि कोई पवित्र तथागत के चरण-चिह्नों पर चले तो वे वरदान और शक्तियां उसके लिए नहीं हैं।

सोमवार, 9 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार-(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--14


तितिक्षा—प्रवचन—चौदहवां

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि, 16 फरवरी, 1973

ध्यान-द्वार संगमरमर के कलश जैसा है--सफेद और पारदर्शी। उसके भीतर एक स्वर्णाग्नि जलती है, वह प्रज्ञा की शिखा है, जो आत्मा से निकलती है।
तू ही वह कलश है।
अब तूने अपने को इंद्रियों के विषयों से विच्छिन्न कर लिया है, तूने दर्शन-पथ तथा श्रवण-पथ की यात्रा कर ली है, और अब तू ज्ञान के प्रकाश में खड़ा है। अब तू तितिक्षा भी की अवस्था को उपलब्ध हो गया।
नारजोल (सिद्ध), तू सुरक्षित है।

गीता दर्शन--(भाग-3) प्रवचन--14


अहंकार खोने के दो ढंग— (अध्याय-6) प्रवचन—चौदहवां


सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः।। 29।।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वंमयि पश्यति
तस्याहंप्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।। 30।।

और हे अर्जुन, सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त हुए आत्मा वाला तथा सबमें समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को संपूर्ण भूतों में बर्फ में जल के सदृश व्यापक देखता है और संपूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है।

और जो पुरुष संपूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और संपूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अंतर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता हूं और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता है।

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--24


आज लहरों में निमंत्रण—प्रवचन—चौबीसवां

प्रश्‍नसार:

1— जैन मानते हैं कि जिन-शासन के अतिरिक्त सभी शासन मिथ्या हैं, जाग्रत व सिद्ध पुरुषों के बाबत बताए जाने पर भी वे उनकी ओर उन्मुख नहीं होते। क्या उन्हें सन्मार्ग पर लाना संभव नहीं है?

2—आपका विरोध करने वाले लोग यदि आपमें उत्‍सुकता लेने लगें तो हम संन्‍यासियों को क्‍या करना चाहिए?

3—महावीर की तरह आप भी अंधविश्‍वासों पर प्रहार करके सदधर्म का तीर्थबना रहे है; फिर भी अंधश्रद्धालुओं में जाग क्‍यों नहीं आती?

शनिवार, 7 जून 2014

समाधि के सप्‍त द्वार--(ब्‍लावट्स्‍की) प्रवचन--13


समय और तू—प्रवचन—तेरहवां

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि, 15 फरवरी,1973  

तैयार रह और समय रहते चेत जा। यदि तूने प्रयत्न किया और विफल हो गया, अदम्य लड़ाके, तो भी साहस न छोड़। लड़े जा और बारबार युद्ध में जुटता रह।
जिसके घावों से उसका कीमती जीवन-रक्त बह रहा हो, ऐसा निर्भीक योद्धा
प्राण त्यागने के पहले शत्रु पर फिर-फिर आक्रमण करेगा और उसे उसके दुर्ग से निकाल बाहर करेगा। कर्म करो, तुम सब जो निष्फल और दुखी हो, उसकी तरह ही कर्म करो और निष्फल होने के बाद भी अपनी आत्मा के सभी शत्रुओं को--महत्वाकांक्षा, क्रोध, घृणा और अपनी वासना की छाया तक को--निकाल बाहर करो

गीता दर्शन--(भाग--3) प्रवचन--13


पदार्थ से प्रतिक्रमण--परमात्मा पर—(अध्याय-6) प्रवचन—तेरहवां


युग्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।। 28।।

और वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्तिरूप अनंत आनंद को अनुभव करता है।


पाप से रहित हुआ व्यक्तित्व आत्मा को सदा परमात्मा में लगाता हुआ परम आनंद को उपलब्ध होता है।
पाप से रहित हुआ पुरुष ही आत्मा को परमात्मा की ओर सतत लगा सकता है। पाप से रहित हुआ जो नहीं है, पाप में जो संलग्न है, वह आत्मा को सतत रूप से पदार्थ में लगाए रखता है।