कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-08

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

स्वाध्याय ही ध्यान है—प्रवचन-आठवां
दिनांक 08 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः।।
देहाभिमान के गलने और परमात्मा के जानने के बाद जहां-जहां मन जाता है वहां-वहां उसे समाधि अनुभव होती है।
भगवान, इस सूत्र को समझाने की कृपा करें।

 चिदानंद,
यह वक्तव्य तो सूत्र कहे जाने योग्य नहीं है। यह तो मूलतः गलत है। संस्कृत में ही होने से कोई बात सही नहीं हो जाती। शास्त्र में ही हो जाने से कोई वचन सत्य नहीं हो जाता। सत्य के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें पूरी करनी होती हैं। और यह सूत्र तो शर्तें पूरी करना तो दूर, अत्यंत मूढ़तापूर्ण भी है।
सोचो। सूत्र कहता है: "देहाभिमान के गलने से...।'
देहाभिमान कब गलता है? देहाभिमान क्या है?

मनुष्य के व्यक्तित्व को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला हिस्सा है: देह। देह सत्य है। विज्ञान देह की खोज है, पदार्थ की। दूसरा देह के बाद तल है मन का। मन न तो सत्य है न असत्य; आभास है। मिथ्या है, असत्य नहीं। मिथ्या शब्द को ठीक से समझ लेना। मिथ्या का अर्थ होता है जो सत्य जैसा भासे लेकिन सत्य हो न। जैसे सांझ के धुंधलके में, कि भोर के कुहासे में, राह पर पड़ी हुई रस्सी सांप जैसी मालूम पड़ जाए और तुम भाग खड़े होओ। जहां तक तुम्हारे भागने का संबंध है, रस्सी ने वही काम कर दिया जो सांप करता। यह भी हो सकता है तुम गिर पड़ो, हड्डी-पसली तोड़ लो। यह भी हो सकता है कि तुम इतने घबड़ा जाओ कि हृदय का दौरा पड़ जाए, कि मर ही जाओ। इसका अर्थ हुआ कि जो सांप नहीं था उसने तुम्हारे प्राण ले लिए। जहां तक परिणाम का संबंध है वहां तक तो सांप सत्य मालूम होता है।
सूफी कहानी है, जुन्नैद नाम का अलमस्त फकीर--मंसूर का गुरु था जुन्नैद--बगदाद के बाहर ठहरा हुआ था। और एक सांझ उसने देखा कि जब रास्ता सो गया और गांव नींद में खो गया तो एक काली छाया, बड़ी विकराल, झोपड़े के पास से गुजरी--बगदाद में प्रवेश करने के लिए। जुन्नैद ने आवाज दी, ठहर, तू कौन है? उस काली छाया ने कहा, तुमसे क्या छिपाना! फकीरों से क्या छिपाना! और छिपाओ तो भी तो फकीरों से छिपेगा नहीं। मैं मौत हूं।
जुन्नैद ने पूछा, किसे मारना है?
मौत ने कहा, नाम-पते बताने बैठूंगी तो सुबह हो जाएगी। कम से कम पांच सौ व्यक्ति मारे जाने हैं। सुना तो होगा ही तुमने कि गांव में प्लेग फैली है!
फकीर ने कहा, जैसी प्रभु की मर्जी। जा, तू अपना काम कर।
लेकिन आठ दिन के भीतर कोई पांच हजार आदमी मर गए। तो जुन्नैद थोड़ा नाराज हुआ कि मुझसे झूठ बोलने की क्या जरूरत थी। और जब आठवें दिन मौत वापस लौट रही थी, वही समय था, जुन्नैद ने फिर आवाज दी कि बेईमान, मुझसे झूठ बोलने की क्या जरूरत थी? अरे मुझे तो जैसे पांच सौ वैसे पांच हजार। मुझे तो जैसा जीवन वैसी मृत्यु। तू क्यों झूठ बोली? कहे थे पांच सौ और मारे पांच हजार!
मौत ने कहा, क्षमा करें। मैंने तो पांच सौ ही मारे, शेष घबराहट में मर गए। अपने आप मर गए। दूसरों को मरते देख कर मर गए। मेरा उसमें कुछ हाथ नहीं है। लेकिन जब मर गए तो मुझे ले जाना पड़ा। उलटे मुझे ढोना पड़ा।
यह हो सकता है कि तुम बीमार को देख कर बीमार हो जाओ। अक्सर यूं होता है कि चिकित्सक की शिक्षा पा रहे विद्यार्थी जिस बीमारी के संबंध में अध्ययन कर रहे होते हैं वही बीमारी विद्यार्थियों में फैल जाती है। यह आम मेडिकल कालेजों का अनुभव है: जिस बीमारी का अध्ययन कर रहे होते हैं, उसका ही आभास उन्हें अपने भीतर होना शुरू हो जाता है। इसलिए तुम भी जरा अखबारों में और साप्ताहिक पत्रिकाओं में वे जो चिकित्सा के संबंध में जानकारियां होती हैं, बन सके तो उनसे बच जाया करो। नहीं तो अक्सर उनको पढ़ते-पढ़ते जैसे पेट-दर्द की बीमारी और तुम्हें अचानक लगेगा कि यह हुआ दर्द वह हुआ दर्द, क्योंकि तुम पेट में तलाश करने लगोगे कि अपने पेट में तो कोई गड़बड़ नहीं है! और आभास शुरू हो जाएंगे।
मिथ्या का अर्थ होता है: है तो नहीं, लेकिन प्रतीति हो सकती है। जो नहीं है उसकी भी प्रतीति हो सकती है। आखिर रोज हम स्वप्न देखते हैं, वह मिथ्या है। उसका अस्तित्व नहीं है, ऐसा तो नहीं कह सकते। अस्तित्व तो है, लेकिन अस्तित्व ऐसा नहीं है जैसा पहाड़ों का, पर्वतों का, चांदत्तारों का। अस्तित्व और अनस्तित्व के बीच में है। शरीर है, उसका अस्तित्व है। और जिस अर्थ में शरीर का अस्तित्व है उस अर्थ में आत्मा का अस्तित्व नहीं है। शरीर का आकार है, आत्मा निराकार है। वह तीसरा सत्य है--तीसरा पहलू। शरीर सगुण है, आत्मा निर्गुण है। शरीर दिखाई पड़ता है, आत्मा देखने वाला है। शरीर का विज्ञान बन सकता है, आत्मा विज्ञाता है। शरीर दृश्य है, आत्मा द्रष्टा है। इसलिए शरीर जिस अर्थ में है, आत्मा उस अर्थ में नहीं है।
यही कारण है कि विज्ञान आत्मा को अस्वीकार करता है, क्योंकि उसकी परिभाषा अस्तित्व की, शरीर के द्वारा निर्धारित होती है। और शरीर की भांति आत्मा नहीं है। और यही कारण है कि आत्मज्ञानी शरीर को इनकार करता है, क्योंकि उसकी परिभाषा आत्मा के द्वारा निर्धारित होती है। उसके लिए अस्तित्व का अर्थ है जो सदा रहे; जो शाश्वत हो; जिसका न जन्म हो न मृत्यु हो; जो कालातीत हो। यह परिभाषा शरीर पूरी नहीं कर सकता। इसलिए शरीर को वह कहता है: नहीं है, माया है।
लेकिन मेरे देखे शरीर भी है, आत्मा भी है। उनके होने के ढंग अलग-अलग हैं, मगर दोनों हैं। इसलिए मेरे लिए विज्ञान भी यथार्थ है और धर्म भी। जगत भी सत्य है और ब्रह्म भी। इन दोनों के बीच में मन है, जो कि न तो है और न नहीं है। मन मिथ्या है। मन माया है। और मन ही दोनों को जोड़े हुए है। मन ही दोनों के बीच सेतु है। मगर इंद्रधनुष जैसा सेतु। देखते हो न, इंद्रधनुष पृथ्वी को और आकाश को जोड़ देता है! लेकिन अगर तुम जाओ इंद्रधनुष के करीब तो कुछ भी न पाओगे। कुछ भी नहीं। पकड़ोगे तो हाथ सिर्फ गीले हो जाएंगे। सूखे हाथ और गीले हो जाएंगे, क्योंकि इंद्रधनुष कुछ भी नहीं है।
इंद्रधनुष घटता कब है? वर्षा के दिनों में, जब सूरज निकल आता है, तब घटता है। वर्षा के दिनों में पानी के छोटे-छोटे जल-कण हवा में लटके होते हैं, हवा आर्द्र होती है। सूरज निकल आए और हवा में पानी के जल-कण लटके हों तो उन जल-कणों से सूर्य की किरणें प्रविष्ट होकर सात रंगों में विभाजित हो जाती हैं। वे जल-कण प्रिज्म का काम करते हैं। वे सूर्य की किरणों को सात खंडों में तोड़ देते हैं। ऐसे इंद्रधनुष निर्मित होता है। दूर से ही दिखाई पड़ेगा; जैसे-जैसे पास जाओगे, खोने लगेगा; बिलकुल पास पहुंचोगे, दिखाई ही न पड़ेगा; हाथ से पकड़ोगे तो हाथ गीले हो जाएंगे, सिर्फ थोड़े-से जल-कण हाथ पर छूट जाएंगे, कोई रंग नहीं। लेकिन पृथ्वी को और आकाश को जोड़ता हुआ मालूम पड़ता है।
ठीक ऐसे ही मन एक इंद्रधनुष है, जो शरीर को और आत्मा को जोड़ता हुआ मालूम पड़ता है। उस प्रतीति में जो डूब गया उसे देहाभिमान पैदा होता है। देहाभिमान का अर्थ है कि मैं देह हूं, ऐसी अस्मिता जगती है। जिसकी यह अस्मिता टूट गई, जिसका यह भाव टूट गया कि मैं देह हूं, उसका तो मन टूट गया। अब मन को जाने की गुंजाइश कहां रही? मन बचा ही नहीं। मन टूटा तभी तो देहाभिमान टूटा।
और यह सूत्र कहता है: "देहाभिमान के गलने और परमात्मा के जानने के बाद जहां-जहां मन जाता है...।'
अब तो गजब हो गया! अब कैसे मन जाएगा? अब कहां मन जाएगा? अब तो मन बचा नहीं, जाएगा तो कैसे जाएगा?
"...वहां-वहां उसे समाधि अनुभव होती है।'
तो पहली तो बात, देहाभिमान के गलने पर मन बचता नहीं। दूसरी बात, परमात्मा के जानने के बाद समाधि तो सतत रहती है। परमात्मा से मिलन ही तो समाधि है। समाधि का और अर्थ क्या है? बूंद सागर में खो गई, बूंद अलग न बची, बूंद भिन्न न रही। इधर शरीर से संबंध छूटा उधर परमात्मा से संबंध जुड़ा। शरीर से वियोग और परमात्मा से योग--एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन्हीं दो पहलुओं के कारण महावीर और पतंजलि ने अलग-अलग भाषा का प्रयोग किया है। पतंजलि कहते हैं: योग; परमात्मा से मिलना है तो योग साधना होगा। और महावीर कहते हैं: परमात्मा से मिलना है तो अयोग साधना होगा। दोनों सही कहते हैं, मगर दोनों की बात बड़ी भिन्न-भिन्न है, अलग-अलग पहलू की है।
महावीर कहते हैं: अयोग। अयोग अर्थात शरीर से वियोग। शरीर से जो संबंध है वह तोड़ देना होगा, फिर बाकी तो बात अपने आप हो जाएगी। शरीर से संबंध टूटा कि परमात्मा से संबंध जुड़ा। बूंद ने अपनी सीमाएं खो दीं तो सागर हो गई। इसलिए महावीर कहते हैं: अयोग।
पतंजलि को मानने वालों को महावीर का वचन बहुत घबड़ाता है कि यह तो बड़ी उलटी बात हो गई, यह तो महावीर पतंजलि का खंडन कर रहे हैं। जो परम अवस्था है, उसको महावीर ने कहा है, अयोग केवली की अवस्था। कहां पतंजलि जो कहते हैं योग की परम अवस्था, महावीर कहते हैं अयोग की परम अवस्था। मगर दोनों एक ही बात कह रहे हैं, जरा भी भिन्न नहीं, जरा भी, किंचित मात्र भी भेद नहीं। एक तरफ से अयोग, शरीर से संबंध टूटा--महावीर का जोर इस पर है कि मन समाप्त हो जाए, शरीर से नाता छूट जाए। ऐसी प्रतीति न रह जाए कि मैं शरीर हूं, बस बात पूरी हो गई। पतंजलि दूसरे पहलू पर जोर देते हैं: परमात्मा से मिलन हो जाए, योग हो जाए। योग यानी जोड़।
परमात्मा को जान लेने के बाद, मिलन हो जाने के बाद, अब मन को जाने को जगह कहां बची? न मन बचा, न जाने को जगह बची। क्योंकि परमात्मा तो सभी जगह है। जो है सब परमात्मा है। उसे छोड़ कर जाओगे कहां? इसलिए यह सूत्र तो बड़ा मूढ़तापूर्ण है। फिर कहना कि जहां-जहां मन जाता है, वहां-वहां उसे समाधि अनुभव होती है--यह तो मूढ़ता पर भी और ऊपर सिरताज, और शृंगार कर दिया। और मुकुट पहना दिया। वहां-वहां उसे समाधि अनुभव होती है। किसे? क्या मन को समाधि अनुभव होती है?
"जहां-जहां मन जाता है वहां-वहां उसे समाधि अनुभव होती है।'
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः।
मन को और समाधि का अनुभव! यह तो बात निपट गंवारी की हो गई। मन को समाधि का अनुभव नहीं होता; मन का मिट जाना ही समाधि का अनुभव है। और मन मिट गया तो परमात्मा से मिलन हो गया। अब कहां जाना है? अब तो सांस लोगे तो उसमें, उठोगे तो उसमें, बैठोगे तो उसमें, चलोगे तो उसमें, जीओगे तो उसमें, मरोगे तो उसमें। अब तो वही है, केवल वही है! तुम तो नहीं हो। इसलिए चिदानंद, यह सूत्र किसी ने भी कहा हो, इतना तय है, जिसने भी कहा है उसे समाधि का कोई अनुभव नहीं है।


दूसरा प्रश्न: भगवान,
स्वाध्यायान मा प्रमदः।
स्वाध्याय प्रवचनाभ्यम् न प्रमदितव्यम्।।
अर्थात स्वाध्याय में प्रमाद मत करो, स्वाध्याय और प्रवचन में भी प्रमाद मत करो।
उपनिषद के इन बोध-वचनों को जीवन-विकास के लिए अनिवार्य बताते हुए बंबई स्थित श्री पांडुरंग शास्त्री आठवले जी बहुत समय से स्वाध्याय के नाम से सारे भारत में और विदेशों में भारतीय तथा वैदिक संस्कृति का पुनरुत्थान कार्य कर रहे हैं। गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि शास्त्रों का एक जगह इकट्ठे होकर अभ्यास करना, पठन करना और प्रवचन द्वारा दूसरों को समझाने को वे स्वाध्याय कहते हैं। चित्त-एकाग्रता को ही वे ध्यान समझते हैं और मूर्ति-पूजा को ध्यान के लिए अनिवार्य मानते हैं। गीता के कृष्ण श्री योगेश्वर उनके आराध्य देव हैं। गांव-गांव कुटीर मंदिर बनाने की उनकी योजना है।
वे मानते हैं कि यदि इस तरह हर गांव में भक्ति शुरू हो जाए तो समाज का नव-निर्माण होगा। और समाज के बदलने पर व्यक्ति आप ही बदलेगा। व्यक्तिगत रूप से साधना-ध्यान आदि करने की कोई जरूरत नहीं है। वे मानते हैं कि व्यक्ति को परिवार की, समाज की, देश की और विश्व की हरेक समस्या का समाधान सिर्फ गीता में से मिल सकता है। और इसलिए गीता का संदेश घर-घर तक पहुंचाना चाहिए।
भगवान, आपको मिलने के पूर्व मैं भी बचपन से इस कार्य में उनके साथ था। तपोवन पद्धति पर आधारित उन्हीं के तत्वज्ञान-विद्यापीठ में मैंने चार साल तक शास्त्रों का अध्ययन किया। किंतु केवल शब्दों की जानकारी से सत्य का कोई अनुभव जीवन में न आते देख मैं विद्रोह करके वहां से निकल भागा। और इस कारण वे आज तक मुझसे नाराज हैं। मेरी मां भी उनके विचार को मानती हैं, वे भी नाराज हैं। आपके सान्निध्य में आज मुझे जो समाधान और आनंद मिला है, मैं चाहता हूं कि वह मेरे उन मित्रों को भी, जो मेरे साथ थे, मिले। वे आपकी किताबें भी पढ़ते हैं। आपके प्रवचनों के टेप्स भी सुनते हैं, आपके विचारों को भी वे अपना अर्थ निकाल कर अपने प्रवचनों में दोहराते हैं। किंतु वे यहां आकर इस गैरिक गंगा में डूबने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। अब भी वे गीता और अन्य शास्त्रों को दोहराते हैं और इसी को प्रभु-कार्य मान कर जीते हैं।
भगवान, इन बातों पर प्रकाश डाल कर मार्ग-दर्शन करने की अनुकंपा करें।

 आनंद किरण,
पहली बात, "स्वाध्यायान मा प्रमदः। स्वाध्याय में प्रमाद मत करो।'
यह सूत्र तो बहुमूल्य है। अमृत-घट है! एक घूंट भी कोई पी लेगा तो नौका पार हो जाएगी। लेकिन श्री पांडुरंग शास्त्री आठवले इसका जो अर्थ कर रहे हैं, वह अर्थ नहीं है, अनर्थ है।
"स्वाध्याय में प्रमाद मत करो।'
इसमें दो शब्द समझने जैसे हैं। पहला तो स्वाध्याय। इतना सीधा-सादा शब्द, मगर पंडितों के हाथ में जाकर हर चीज तिरछी हो जाती है। स्वाध्याय का अर्थ तो साफ हुआ: अपना अध्ययन, स्वयं का अध्ययन, स्वयं का निरीक्षण। साक्षी-भाव स्वाध्याय का अर्थ है। न इसका कोई संबंध उपनिषद से है, न वेदों से, न गीता से, न कुरान से, न बाइबिल से, न धम्मपद से, न जिन-सूत्रों से। लेकिन पंडित यही करते हैं। अगर जैन पंडित से पूछोगे तो स्वाध्याय का अर्थ है: महावीर की वाणी का अध्ययन, जिन-वाणी का अध्ययन। अगर बौद्धों से पूछोगे तो स्वाध्याय का अर्थ है: धम्मपद का पठन-पाठन, मनन-चिंतन। अगर मुसलमान से पूछोगे तो स्वाध्याय का अर्थ है: कुरान का पाठ, नियमित पाठ। और स्वाध्याय शब्द इतना सीधा-साफ है कि किसी से पूछने की कोई जरूरत भी नहीं।
स्वाध्याय का अर्थ है: हमारे भीतर जो जगत है, चेतना का जो लोक है, उसका निरीक्षण। वहां ठहर कर देखना, अध्ययन करना, क्योंकि वहां बहुत कुछ घट रहा है। विचार चल रहे हैं, स्मृतियां गतिमान हैं, कल्पनाएं उठ रही हैं, वासनाएं जग रही हैं। बहुत भीड़-भाड़ है भीतर। कुंभ का मेला सदा ही लगा हुआ है। उसका अध्ययन, उसका निरीक्षण, अवलोकन। उसके प्रति जागरूक होना। यह स्वाध्याय का अर्थ है। इसका शास्त्रों से कुछ लेना-देना नहीं है।
हां, यह सच है कि जो स्वयं को जान लेगा वह सब शास्त्रों के अर्थ भी जान लेगा। लेकिन सब शास्त्रों का भी कोई अर्थ जान ले तो भी स्वयं को नहीं जान सकेगा। सच तो यह है सब शास्त्रों का अर्थ ही कैसे जान सकेगा? कुंजी ही हाथ नहीं, ताला कैसे खुलेगा? कुंजी तो है साक्षी-भाव। अपने भीतर बैठक मारनी है। और अपने भीतर परदे पर मन के जो चलता है उसे देखना है--बिना किसी पक्षपात के, बिना किसी निर्णय के, निष्पक्ष। जैसे वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में निरीक्षण करता है, ठीक वैसा ही निरीक्षण करना है स्वयं के भीतर।
और उस निरीक्षण का एक चमत्कार है, चमत्कारों का चमत्कार घटित होता है। इस जगत में इससे बड़ी और कोई चमत्कृत करने वाली घटना नहीं है कि मन का अगर सम्यक निरीक्षण किया जाए, सम्यक दर्शन किया जाए तो मन तिरोहित होने लगता है। यही आभास का लक्षण है। जिसको ठीक से देखने से जो तिरोहित होने लगे, वह आभास था। जैसे रस्सी में सांप दिखाई पड़ा था, अगर तुम लालटेन ले आते और गौर से देखते, क्या फिर भी तुम्हें सांप दिखाई पड़ता? लालटेन ले आते तो रस्सी दिखाई पड़ती, सांप दिखाई नहीं पड़ता। निरीक्षण करते कि सांप विलीन हो जाता; था ही नहीं, सिर्फ तुम्हारी भ्रांति थी; निरीक्षण में भ्रांति मर जाती, गल जाती।
स्वाध्याय का अर्थ है: आत्म-निरीक्षण। और अप्रमाद का अर्थ है: जाग कर, होशपूर्वक।
स्वभावतः, अगर स्वयं का निरीक्षण करना है तो जागरूकता चाहिए, अवेयरनेस चाहिए। कृष्णमूर्ति ठीक कहते हैं: च्वाइसलेस अवेयरनेस, चुनावरहित जागरूकता। क्योंकि चुनाव किया अगर तुमने कि यह अच्छा, इसको बचा लूं, यह विचार अच्छा, यह कल्पना अच्छी, यह तो बड़ी मधुर, यह तो बड़ी प्रीतिकर; यह देखो कृष्ण कन्हैया बांसुरी बजा रहे हैं, इनको तो बचा लूं; यह दुष्ट फिल्म अभिनेत्री पीछे पड़ी है, इसको भगाऊं, यह यहां कहां घुस आई, इसको दो धक्के! मगर जिसको तुम धक्के दोगे वह लौट-लौट कर आएगा। जिसे तुम हटाओगे उससे तुम उलझ जाओगे। और जिसे तुम पकड़ कर रखना चाहोगे वह भागेगा।
मन के ये नियम हैं, क्योंकि मन का स्वभाव गति है। तुम किसी चीज को पकड़ कर नहीं रख सकते। तुमने अगर कृष्ण की प्रतिमा को पकड़ कर रखना चाहा, बस तिरोहित हो जाएगी, भाग जाएगी; फिर तुम रोओगे, गिड़गिड़ाओगे। इसको तुम भक्ति कहो, भावना कहो, जो तुम्हारी मौज हो कहो--मगर है सिर्फ रोना, गिड़गिड़ाना, कि मेरा खिलौना छिन गया। खिलौना भी नहीं था, खिलौने में भी कुछ यथार्थ होता है, सिर्फ कल्पना का जाल था। इसलिए ईसाई को क्राइस्ट दिखाई पड़ते हैं, कृष्ण नहीं दिखाई पड़ते। उसका खिलौना और है। हिंदू को कृष्ण दिखाई पड़ते हैं, क्राइस्ट नहीं दिखाई पड़ते।
अब पांडुरंग शास्त्री को क्राइस्ट दिखाई पड़ सकते हैं? दिखाई भी पड़ जाएं तो एकदम धक्के देकर बाहर निकाल देंगे, कि तुम यहां कहां घुसे चले आ रहे हो! मैं हूं पांडुरंग शास्त्री, कृष्ण का भक्त, योगेश्वर का भक्त! तुम यहां कहां चले आ रहे हो! समझो कि बुद्ध चले आएं, यूं ही टहलते हुए, सुबह तफरी को निकले हों, और पांडुरंग शास्त्री मिल जाएं तो थोड़ा झांक कर भीतर देख लें कि यहां क्या चल रहा है। फौरन क्रुद्ध हो जाएंगे पांडुरंग शास्त्री, क्योंकि बुद्ध तो वेद-विरोधी। महावीर चले आएं नंग-धड़ंग, बिलकुल जंचेंगे न, कि यह कोई बात है, यह कोई सलीका है, यह कोई भारतीय संस्कृति है! अरे कम से कम लंगोटी तो लगा लो! आदमी को लंगोट का तो पक्का होना चाहिए। यह क्या, लंगोटी भी नहीं!
कल मैं अखबार में पढ़ रहा था खबर। महाराष्ट्र में एक गांव है सिरपुर, जहां आज सत्तर साल से अदालत में एक मुकदमा चल रहा है, दिगंबर और श्वेतांबर जैनों में। सत्तर साल से तो अदालत में चल रहा है, उसके पहले तीस साल तक अदालत के बाहर चला। मतलब पूरे सौ साल हो गए। असल में इसका उत्सव मनाना चाहिए सारे देश में। शताब्दी पूरी हो गई! और गजब का काम, सत्तर साल में सब वकील मर चुके, जिन-जिन ने भी मुकदमा हाथ में लिया दोनों तरफ से। सब मजिस्ट्रेट मर चुके। मजिस्ट्रेट-वकीलों की छोड़ो, सरकार भी बदल चुकी। जिन्होंने मुकदमा शुरू किया था वे मर चुके, उनके बेटे मर चुके। मगर उनके बेटे मुकदमा लड़ रहे हैं। मुकदमा जारी है। और बात यहां तक बढ़ गई कि एक बार मंदिर की महावीर की प्रतिमा तक को अदालत में गवाही देने आना पड़ा। सुनते हो, क्या-क्या गजब होते हैं! मंदिर पर ताला पड़ा हुआ है। झगड़ा क्या है? झगड़ा तुम सुनोगे तो बहुत हंसी आएगी।
झगड़ा लंगोटी का है, क्योंकि श्वेतांबर महावीर को लंगोटी पहना कर पूजते हैं और दिगंबर लंगोटी निकाल कर पूजते हैं। सवाल यह है कि लंगोटी पहनाई जाए कि न पहनाई जाए। फिर जब श्वेतांबर पहना देते हैं तो दिगंबर निकालें तो झगड़ा खड़ा होता है; जब दिगंबर निकाल देते हैं, श्वेतांबर पहनाएं, तो झगड़ा खड़ा होता है कि तुम हमारे भगवान को कैसे लंगोटी पहना रहे हो, वे तो दिगंबर हैं! और श्वेतांबर कहते हैं कि हम बामुश्किल तो लंगोटी पहना पाए--अब पत्थर की बैठी हुई पद्मासन में मूर्ति, उसको लंगोटी पहनाओगे तो दिक्कत तो होगी ही--बामुश्किल तो हम पहना पाए, अब तुम फिर निकालने लगे। रोज का धंधा।
सौ साल पहले यूं व्यवस्था थी कि समय बंटा हुआ था कि इतने घंटे दिगंबर लंगोटी निकाल कर पूजा करें, इतने घंटे श्वेतांबर लंगोटी पहना कर पूजा कर लें। मगर एक दिन बात बिगड़ गई, कोई ज्यादा भक्ति-भाव में आ गए। लंगोटी पहना कर पूजा करते ही गए, करते ही गए। दिगंबर आ गए, उन्होंने कहा, निकालो लंगोटी। वह पूजा चलती ही रही, वे लंगोटी खींचने लगे। बात बिगड़ गई। लकड़ियां चल गईं, लहू बह गया। पुलिस के ताले पड़ गए।
फिर अदालत में सत्तर साल से मुकदमा चल रहा है। तुम हैरान होओगे, सिरपुर की छोटी-सी अदालत का मुकदमा प्रिवी कौंसिल तक जा चुका है। प्रिवी कौंसिल से फिर वापस भेज दिया गया है, क्योंकि निर्णय कैसे हो कि महावीर जो हैं वे लंगोटी पसंद करते हैं कि नहीं? दिगंबर अपने शास्त्र रख कर बताते हैं कि नंगे थे वे। श्वेतांबर अपने शास्त्र बताते हैं कि वे लंगोटी पहने हुए थे। तो फिर आखिर में यही हुआ कि उन्हीं को बुला कर देख लिया जाए। क्योंकि मूर्ति, अगर मूर्ति नंगी है तो जाहिर है कि मूर्ति बनाने वालों ने लंगोटी नहीं बनाई, नहीं तो पत्थर में लंगोटी बनाई होती। इसलिए मूर्ति को अदालत में लाया गया।
देखते हो गजब! गरीब महावीर के साथ क्या व्यवहार किया जा रहा है! एक रिक्शे में बैठ कर चले महावीर स्वामी, अदालत पहुंचे! मजिस्ट्रेटों ने निरीक्षण किया, वकीलों ने जिरह की, बड़ी भीड़-भड़क्का इकट्ठी हुई। मगर कुछ निर्णय करना मुश्किल हो गया। निर्णय करना इसलिए मुश्किल हो गया कि श्वेतांबरियों ने पलास्तर कर दिया। लंगोटी तो थी नहीं, मगर उनके पूरे शरीर पर पलास्तर चढ़ा दिया। अब तब से यह झगड़ा चल रहा है कि पलास्तर किसने चढ़ाया? और पलास्तर निकाला जा सकता है कि नहीं?
झगड़ा जारी रहेगा, इसका कोई अंत नहीं होने वाला है। झगड़ा इतना-सा है, अगर दिगंबर के ध्यान में लंगोटी लगा कर आ जाएं महावीर स्वामी, निकाल धक्के देकर बाहर करेगा कि हट, कमबख्त, यहां कहां चला आ रहा है लंगोटी लगाए? या श्वेतांबरी के मन में ध्यान कर रहे हों बेचारे और महावीर स्वामी चले आएं नंग-धड़ंग तो जल्दी से उठ कर लंगोटी पहना देगा कि भैया, कुछ तो खयाल करो!
स्वाध्याय में चुनाव नहीं किया जा सकता। जो भी मन में चल रहा हो, अच्छा या बुरा, नैतिक या अनैतिक, मान्यता के अनुकूल या प्रतिकूल, तुम निर्विकल्प, निर्विचार बने रहना। चलने देना मन के पर्दे पर, तुम निर्णय न लेना। तुम बैठे देखते रहना शांत-भाव से--निष्पक्ष, तटस्थ। जैसे कोई तट के किनारे बैठा और नदी को बहता देखता रहे, या राह के किनारे बैठा और राह को चलती हुई देखता रहे। अच्छे लोग भी निकलते हैं, बुरे लोग भी निकलते हैं, साधु-महात्मा जा रहे हैं, चोर-लफंगे जा रहे हैं। हालांकि तय करना मुश्किल है कि कौन साधु-महात्मा हैं, कौन चोर-लफंगे हैं। चोर-लफंगे साधु-महात्मा हो सकते हैं, साधु-महात्मा चोर-लफंगे हो सकते हैं। कुछ तय करना इतना आसान नहीं। निकलने दो मगर, तुम्हें क्या लेना-देना है? तुम अपने झाड़ के नीचे बैठे देख रहे हो; हाथी-घोड़े निकल रहे हैं, गधे निकल रहे हैं, सब निकल रहे हैं। गधों पर बैठे हुए भी लोग निकलेंगे।
मोरारजी देसाई ने राजकोट में कहा--किसी ने पूछा कि अगर जनता आपको दुबारा प्रधानमंत्री बनाना चाहे तो आप बनने को राजी हैं?--उन्होंने कहा, अरे क्या प्रधानमंत्री बनने को, अगर जनता मुझे गधे पर बैठने को कहे तो मैं गधे पर बैठने तक को राजी हूं।
अब मोरारजी देसाई गधे पर बैठे चले जा रहे हैं! जनता का क्या है, जनता कह दे। मैं कहता हूं कि बैठो! मैं भी जनता हूं, तुम भी जनता हो। तुम्हारे हाथ उठवा दे सकता हूं कि बैठो, भाई बैठो। मगर असली सवाल यह है कि गधे नहीं कह रहे, गधों से भी तो पूछो।
और बड़ी कठिनाई तो तब आएगी जब मोरारजी देसाई गधे पर बैठ कर निकलेंगे, तो यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कौन कौन है। सबसे बड़ी कठिनाई तब आएगी, पहचानना मुश्किल हो जाएगा।
चंदूलाल का बेटा अपने बाप से पूछ रहा था कि पिताजी, जब भी किसी की शादी होती है अपने गांव में, तो छोटे-छोटे बच्चों की भी शादी होती है तो भी उनको बड़े-बड़े घोड़ों पर बिठा देते हैं। अरे गधे पर बिठाएं तो अनुपात मालूम होता है।
चंदूलाल ने कहा, बेटा, बड़ा होगा जब तू समझेगा, ये बातें बड़ी गहरी हैं।
फिर भी बेटे ने कहा कि पापा, कुछ तो समझाओ, थोड़ा-बहुत जो समझ लूंगा, फिर याद रखूंगा, फिर बाद में पूरी बात समझ लूंगा। मगर अब जिज्ञासा उठ गई है तो कुछ तो समझाओ।
तो चंदूलाल ने कहा कि बात यह है बेटा, घोड़े पर बिठालते हैं दूल्हा को, गधे पर नहीं बिठालते, नहीं तो बेचारी वधू किसके गले में माला पहनाएगी। गधे पर गधा बैठा हुआ है, अब इसमें कौन दूल्हा है कौन गधा है? गधा न होता तो विवाह ही करने क्यों आता, पहला सवाल तो यह है। इसलिए घोड़े पर बिठालते हैं। अब तू ज्यादा बकवास न कर। बड़ा होगा, खुद ही समझ जाएगा।
बेटे ने कहा, मैं सब समझ गया। अरे मम्मी और आपका व्यवहार देख कर सब समझ में आ ही रहा है कि अगर आप गधे न होते तो क्यों विवाह किया होता!
यह जो स्वाध्याय की प्रक्रिया है, इसमें गधे निकलें, घोड़े निकलें, हाथी निकलें, निकलने दो। जैसे तुम फिल्म देखते हो, कुछ प्रयोजन नहीं। लेकिन फिल्म में भी प्रयोजन पैदा हो जाता है। फिल्म में भी ऐसे मौके आ जाते हैं कि तुम्हारी एकदम कुंडलिनी जगने लगती है। लोग सीधे होकर बैठ जाते हैं; कुर्सी पर टिके बैठे थे, फौरन समझ लो कि कुंडलिनी जग रही है, जब वे सीधे बैठ जाएं। फिल्म में ऐसे दृश्य आ जाते हैं कि फिर उनसे नहीं रहा जाता कि अब आराम से बैठे रहें। सांसें ठहर जाती हैं। एकदम सीधे होकर बैठ जाते हैं कि कहीं कोई चीज चूक न जाए।
मुल्ला नसरुद्दीन फिल्म देखने गया था, पहली दफा देखने गया था। पहला शो खतम हो गया, फिर टिकट खरीदी उसने। जाना-माना आदमी है। मैनेजर ने कहा, भई अभी ही तो तुम देख कर निकले हो!
मुल्ला ने कहा, एक दफा और। मैटिनी देख कर निकला था, फिर पहला शो देखा। और जब पहला शो भी खतम हो गया, फिर बाहर आया, फिर टिकट खरीदने लगा।
मैनेजर ने कहा, कर क्या रहे हो! बहुत देखने वाले देखे, क्या तीसरा शो भी देखोगे?
मुल्ला ने कहा, अरे तीसरा शो क्या, जब तक यह फिल्म लगी है तब तक देखूंगा। रोज देखूंगा, जितने शो होंगे उतने देखूंगा। मैं कुछ ऐसे हार मानने वाला नहीं।
मैनेजर ने पूछा, मैं कुछ समझा नहीं, क्या राज है?
उसने कहा, राज यह है, कि तुमने देखी होगी फिल्म। फिल्म में वह दृश्य आता है कि एक युवती अपने कपड़े उतार रही है तालाब के किनारे। बस सब उतार चुकी है, सिर्फ अंडरवियर रह गया है। उसका भी फीता खोल ही चुकी है और तभी एक दुष्ट रेलगाड़ी निकल आती है। तो रेलगाड़ी की वजह से स्त्री उस तरफ पड़ जाती है। और जब तक रेलगाड़ी जाती है तब तक वह स्त्री पानी में तैर रही है। मगर मैं कुछ ऐसे हारने वाला नहीं। अरे कभी तो रेलगाड़ी लेट होगी! यह हिंदुस्तान है, कोई रोज समय पर ही आएगी? कभी तो लेट होगी! मैं, जब तक लेट नहीं होने वाली, तब तक यहीं टिकूंगा। मैं तो देख कर ही जाऊंगा, पूरा ही खेल देखूंगा जब आ ही गया!
लोग फिल्म में भी तटस्थता खो देते हैं; वहां भी संयुक्त हो जाते हैं, जुड़ जाते हैं, तादात्म्य हो जाता है। और मन सिवाय फिल्म के और कुछ भी नहीं है। पुरानी याददाश्तें, स्मृतियां, भविष्य की कल्पनाएं--क्या है सिवाय मन के पर्दों पर फिल्मों का लंबा बहाव! उसे चुपचाप, शांत, मौन देखते रहने का नाम स्वाध्याय है। और स्वाध्याय की प्रक्रिया है: प्रमाद मत करो।
स्वाध्यायान मा प्रमदः।
प्रमाद न करने का अर्थ होता है: मूर्च्छा न करो। प्रमाद का अर्थ है: सोए-सोए रहना, सुस्त-सुस्त रहना, फीके-फीके जीना। अप्रमाद का अर्थ है: जागे हुए जीना, ज्योतिर्मय जीना। भीतर का दीया जले, ऐसे जीना।
महावीर ने इस शब्द का बहुत प्रयोग किया है। महावीर ने ध्यान के लिए अप्रमाद ही कहा है। किसी ने पूछा महावीर से कि आपकी मुनि की परिभाषा क्या है और अमुनि की परिभाषा क्या है? महावीर ने इतनी सरल परिभाषा की! सत्य सदा ही सरल होता है। जो जानते हैं, वे उसे सरलता से ही कहते हैं। सिर्फ पंडित उसे उलझाते हैं, क्योंकि जानते नहीं। उसे इतना गोल-मोल करते हैं कि तुम यह न जान पाओ कि वे जानते नहीं हैं। जिसको ज्ञात है वह उसे सीधा-सीधा कह देता है। महावीर ने दो छोटे-से सूत्र कहे: असुत्ता मुनि। सारे ध्यान की परिभाषा आ गई। असुत्ता मुनि! जो सोया नहीं है वह मुनि। सुत्ता अमुनि। और जो सोया है वह अमुनि। न दिगंबर आया इसमें, न श्वेतांबर आया इसमें। न रात को पानी पीयो या न पीयो, पानी छान कर पीयो कि न पीयो आया, कुछ भी न आया। बस सीधी-सी बात: जागो तो मुनि; सोओ तो अमुनि। जागो तो मोक्ष; सोओ तो संसार।
अप्रमाद शब्द का महावीर ने बहुत प्रयोग किया है। अप्रमाद से उठो। अप्रमाद से बैठो। अप्रमाद से सोओ भी। सोते में भी भीतर कोई जागा ही रहे और देखता ही रहे।
स्वाध्याय में प्रमाद मत करो, क्योंकि प्रमाद किया कि स्वाध्याय खो जाएगा।
"स्वाध्याय और प्रवचन में भी प्रमाद मत करो।'
प्रवचन शब्द को भी समझना चाहिए। प्रवचन का अर्थ सिर्फ व्याख्यान नहीं होता। व्याख्यान तो कोई भी दे सकता है। पंडित जो देते हैं वह व्याख्यान ही है। ये पांडुरंग शास्त्री जो दे रहे हैं वह व्याख्यान है, प्रवचन नहीं। प्रवचन तो केवल बुद्ध के, प्रबुद्ध के, जागरूक के वचनों को कहते हैं। जिसने अपने को जान लिया है, उसके वचन को प्रवचन कहते हैं। जो जान कर कह रहा है, जीकर कह रहा है, अनुभवसिक्त है जिसकी वाणी। जो उपनिषद बोले होंगे वे जानते थे। उपनिषद प्रवचन हैं। लेकिन जो उपनिषदों की व्याख्या कर रहे हैं और जिन्होंने कुछ भी नहीं जाना, उनके वचन प्रवचन नहीं हैं। उनके वचन तो सिर्फ व्याख्यान हैं।
स्वाध्याय में जागे रहो और अगर सदगुरु के पास बैठो तो जागे रहो। क्यों, ये दो बातें क्यों जोड़ी? क्या इतना ही काफी न था, स्वाध्याय में प्रमाद मत करो? इतने में ही बात पूरी नहीं होती थी? नहीं, नहीं पूरी होती थी। क्योंकि स्वाध्याय में तुम्हें यह पता चलेगा, मैं मन नहीं हूं। और प्रवचन से तुम्हें पता चलेगा, मैं कौन हूं। स्वाध्याय से नकारात्मक काम होगा, प्रवचन से विधायक काम होगा। आधा-आधा काम दोनों से होगा।
तुम यह तो अपने तईं जान सकते हो कि मैं मन नहीं हूं, लेकिन तब सवाल उठेगा कि मैं कौन हूं। उसका तुम्हें कौन बोध देगा? स्वाध्याय तुम्हें शून्य कर देगा, लेकिन पूर्ण कौन देगा? स्वाध्याय तुम्हें तैयार कर देगा, जैसे कि किसान खेत को तैयार करता है, घास उखाड़ देता है, जड़ें निकाल देता है, पत्थर हटा देता है; लेकिन बीज भी तो बोने पड़ेंगे। इतने से ही तो फसल न आ जाएगी। सिर्फ घास-पात उखाड़ देना ही तो गुलाब पैदा कर लेने के लिए काफी नहीं है। गुलाब के पौधे भी तो लगाने होंगे। वह कौन करेगा?
स्वाध्याय से शिष्य राजी हो जाता है, प्रवचन के योग्य हो जाता है, सुनने के योग्य हो जाता है--उपनिषद के योग्य हो जाता है। उपनिषद का अर्थ है: गुरु के सान्निध्य में बैठना। गुरु कुछ बोले तो प्रवचन है, न बोले तो मौन प्रवचन है। गुरु का उठना-बैठना, चलना, भाव-भंगिमा, सब प्रवचन है। फिर गुरु के पास जागरूक होकर रहे, सदा जागा रहे, ताकि गुरु के इशारों को समझ सके, क्योंकि अब बातें इशारों से ही हो सकती हैं। मन तो उसने स्वाध्याय से समाप्त कर दिया। अब मन से मन की बात नहीं हो सकती। अब शब्द बहुत काम के नहीं हैं। अब तो शून्य से शून्य का संवाद होगा। वही प्रवचन है। अगर शब्द बोले भी जाएंगे तो निःशब्द की तरफ इशारा करने के लिए। अगर वाणी का उपयोग भी होगा तो मौन जगाने के लिए।
इसलिए दूसरी शर्त भी जोड़ी: स्वाध्याय और प्रवचन में भी प्रमाद मत करो।
यह सूत्र तो प्यारा है। जिसने भी कहा होगा वह बुद्ध पुरुष रहा होगा। मुझे कुछ प्रयोजन नहीं कि किसने कहा। उस सब में मैं पड़ता नहीं। इतना मैं कह सकता हूं जिसने भी कहा होगा उसने जान कर कहा है, जीकर कहा है। मेरे अनुभव से मैं गवाह बन सकता हूं, साक्षी दे सकता हूं कि मैं भी यही कहता हूं।
लेकिन तुमने पूछा आनंद किरण कि "उपनिषद के इन बोध-वचनों को जीवन-विकास के लिए अनिवार्य बताते हुए बंबई स्थित श्री पांडुरंग शास्त्री आठवले जी बहुत समय से स्वाध्याय के नाम से सारे भारत में और विदेशों में भारतीय तथा वैदिक संस्कृति का पुनरुत्थान कार्य कर रहे हैं।'
यह तो बात बड़ी उलटी हो गई। स्वाध्याय से भारतीय संस्कृति का क्या लेना-देना? और स्वाध्याय से वैदिक संस्कृति का क्या लेना-देना? इन मुर्दों को उखाड़ने की क्या जरूरत है? जो गया सो गया। और इनमें निन्यानबे प्रतिशत तो कचरा है, उसका पुनरुत्थान करके क्या करोगे? लेकिन यही धोखा चलता है। अच्छे शब्दों की आड़ में, अच्छे शब्दों के पर्दे में कुछ भी चलता है, कुछ भी चलाया जा सकता है। लेबिल अच्छे लगाओ, फिर कोई फिक्र नहीं। फिर भीतर क्या है, कौन देखता है?
अब यह वैदिक संस्कृति, बीसवीं सदी में! क्या इरादे हैं? क्या फिर आदमी को घसीट कर पीछे ले जाना है? क्या फिर आदमी को उन्हीं बचकानी बातों में उलझाना है कि जब खेत में पानी न गिरे तो इंद्र देवता का आवाहन करो। वैदिक संस्कृति में और कुछ है नहीं--देवताओं का आवाहन। और देवताओं के लिए क्या-क्या नहीं करोगे, सब तरह की खुशामद और रिश्वत करो। उनके लिए सोमरस लाओ। सोमरस यानी शराब जैसी कोई चीज। सोमरस पीएंगे देवता।
आल्डुअस हक्सले ने कहा है कि सोमरस कुछ एल.एस.डी. जैसी चीज रही होगी। एल.एस.डी. नवीनतम खोज है मादक द्रव्यों में। और आल्डुअस हक्सले एक विचारशील व्यक्ति थे, बहुत विचारशील, और भारत के प्रेमियों में से थे। सोमरस को उन्होंने कहा है कि प्राचीन समय का एल.एस.डी.। और भविष्य में एक समय आएगा जब एल.एस.डी. और भी विशुद्ध हो जाएगा। तो आल्डुअस हक्सले उसके लिए नाम अभी से दे गए हैं: सोमा। बनेगा तब बनेगा, मगर उस अंतिम सुसंस्कृत मादक द्रव्य के लिए नाम वे अभी दे गए हैं: सोमा। प्यारा नाम दे गए हैं, सोमरस के आधार पर।
पानी न गिरे तो यज्ञ करो। पानी ज्यादा गिरे तो यज्ञ करो। और यज्ञ भी क्या, उसमें घोड़ों को काटो--अश्वमेध यज्ञ! गऊओं को काटो--गौमेध यज्ञ। और मनुष्यों को काटो--नरमेध यज्ञ। यह सब हत्या फिर से शुरू करवानी है? बामुश्किल महावीर और बुद्ध इस वैदिक संस्कृति से इस देश का छुटकारा करवा पाए, बामुश्किल। फिर भी छूट नहीं पाई है पूरी, कहीं न कहीं अटकी रह गई है। अभी भी तुम खबरें सुनते ही रहते हो--यज्ञ हो रहे हैं। विश्व शांति के लिए कोई भी यज्ञ करवा रहा है। और विश्व में शांति अभी तक हुई नहीं। तीन हजार सालों में पांच हजार युद्ध लड़े गए हैं और तीन हजार सालों में भारत में कितने यज्ञ न हुए होंगे, इसका हिसाब लगाना मुश्किल है। शांति कहां होती है? तुम एकाध गांव में तो शांति करवा कर बता दो। गांव की बकवास छोड़ो, जो ब्राह्मण यज्ञ करवाने इकट्ठे होते हैं उनमें ही मारा-मारी होती है पीछे, क्योंकि कोई ज्यादा ले लेता है चढ़ाव कोई कम ले लेता है; किसी को कम मिला किसी को ज्यादा मिला। वहीं लट्ठ चल जाते हैं। वहीं कुश्तम-कुश्ती हो जाती है। वहीं भुजाएं फड़क जाती हैं। विश्व शांति के लिए युद्ध हो रहा था कि यज्ञ हो रहा था? क्या हो रहा था?
क्या विचार है? वैदिक संस्कृति के पुनरुत्थान की क्या जरूरत है? आदमी बहुत आगे बढ़ आया। आदमी ने बहुत प्रौढ़ता पा ली। अब इस आदमी को फिर से बच्चों के जांघिए पहनाओगे, बड़ा भद्दा लगेगा; ऐसा लगेगा कि हनुमान जी खड़े हैं--जांघिया पहने हुए। पूंछ और लगा दो, पूरा पुनरुत्थान हो जाए। और स्वाध्याय से इसका क्या लेना-देना है?
और यहीं उपद्रव नहीं करते ये लोग, भारत के बाहर जाकर भी उपद्रव मचाते हैं। और इनकी बातें तुम्हें ठीक लगती हैं, क्योंकि सदियों-सदियों से तुम इनकी बातें सुनते रहे हो।
वे कहते हैं कि "गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि शास्त्रों का एक जगह इकट्ठे होकर अभ्यास, पठन करना, प्रवचन द्वारा दूसरों को समझाना--यही स्वाध्याय है।'
इसका कोई स्वाध्याय से संबंध नहीं है। स्वाध्याय तो ध्यान के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। ध्यान ही स्वाध्याय है।
"और चित्त की एकाग्रता को वे ध्यान समझते हैं और मूर्ति-पूजा को ध्यान के लिए अनिवार्य मानते हैं।'
अंधविश्वासों की भी हद होती है! अंधकार की भी सीमा होती है! मगर पंडितों के मन में इतना अंधकार होता है कि असीम ही कहो। चित्त की एकाग्रता और ध्यान! ध्यान है चित्त से मुक्ति, चित्त की एकाग्रता नहीं, चित्त की एकाग्रता से कैसे चित्त से मुक्त होओगे? चित्त की एकाग्रता से तो और चित्त मजबूत होगा। हां, चित्त इतना मजबूत हो सकता है कि तुम्हें कई शक्तियां उपलब्ध हो जाएं जो कल तक उपलब्ध न थीं। मगर उन शक्तियों का कोई आध्यात्मिक मूल्य नहीं है। चित्त की एकाग्रता से तुम दूसरे के चित्त के विचारों को पढ़ सकते हो। मगर अपना ही चित्त परेशान करने को काफी है, और दूसरों का कचरा पढ़ कर क्या करोगे? चित्त की एकाग्रता से ध्यान का दूर का भी नाता नहीं है।
ध्यान है चित्त के प्रति साक्षी-भाव, एकाग्रता नहीं। एकाग्रता और ध्यान की प्रक्रिया बिलकुल उलटी हैं। एकाग्रता का अर्थ होता है, चित्त को संकीर्ण करना, एक बिंदु पर केंद्रित करना, शेष सब को अलग कर देना, एक बिंदु को बचाना। और ध्यान का अर्थ होता है, चित्त के सारे ऊहापोह को छोड़ कर ऊपर उठ जाना, सारे द्वार-दरवाजे खुले छोड़ देने। सीमित नहीं करना है चित्त को, चित्त के ऊपर उठ जाना है। जैसे पक्षी उड़ता है आकाश में, तब उसकी विहंगम दृष्टि होती है। तब उसे सब दिखाई पड़ता है। जो हमें नहीं दिखाई पड़ता वह उसे दिखाई पड़ने लगता है। ऊंचाई उसकी ऐसी होती है। ध्यान ऊंचाई है, जहां से सब दिखाई पड़ने लगता है। एकाग्र चित्त तो सिर्फ एक चीज को देख सकता है, बाकी सब चीजों के प्रति अंधा हो जाता है। एकाग्र चित्त विज्ञान में उपयोगी है, धर्म में नहीं। विज्ञान का सारा का सारा आधार कनसनट्रेशन है, एकाग्रता है। और धर्म का आधार रिलैक्सेशन है, विश्राम है। और ये दोनों विपरीत यात्राएं हैं। विज्ञान जाता है बाहर की तरफ, धर्म जाता है भीतर की तरफ।
मगर यह कुछ अकेले पांडुरंग शास्त्री की ही नासमझी नहीं है। यह इस देश के पंडित-पुरोहितों की बुनियादी नासमझी है। योग पर किताबें लिखी जाती हैं, ध्यान पर किताबें लिखी जाती हैं--और परिभाषा ध्यान की: चित्त की एकाग्रता। और फिर चित्त की एकाग्रता करनी है तो मूर्ति-पूजा को निश्चित ही अनिवार्य बताना होगा, क्योंकि किसी पर तो एकाग्र करोगे। या तो जप करो, जैसे महर्षि महेश योगी करवाते हैं, राम-राम राम-राम जपो, या ओंकार का जाप करो, या नमोकार का जाप करो, या अल्लाह-अल्लाह रटो। कुछ भी शब्द पकड़ लो और उसको धुने जाओ, धुने जाओ।
उसके बार-बार दोहराने से आत्म-सम्मोहन पैदा हो जाता है, एक तंद्रा आ जाती है। तंद्रा अच्छी लगती है क्योंकि चिंता छूट जाती है थोड़ी देर को। नींद में जैसा स्वास्थ्य मिलता है, उससे भी अच्छा स्वास्थ्य तंद्रा में मिलता है। क्यों? क्योंकि नींद आठ घंटे पर फैलती है और चित्त की एकाग्रता से अगर कुछ क्षणों के लिए भी तंद्रा आ जाए तो आठ घंटों का काम पूरा हो जाता है। इसलिए बाद में आदमी अपने को बड़ा स्वस्थ और ताजा अनुभव करेगा। यह सब ठीक है। अगर ताजगी के लिए, अगर स्वास्थ्य के लिए तुम चित्त की एकाग्रता कर रहे हो तो मुझे कुछ एतराज नहीं। मगर इससे समाधि न मिलेगी, न मोक्ष मिलेगा, न आत्मा का अनुभव होगा, न परमात्मा की प्रतीति होगी।
फिर अनिवार्य हो जाता है: या तो नाम-जप करो और या फिर मूर्ति-पूजा। कोई मूर्ति, कोई प्रतिमा बाहर खड़ी करो, फिर धीरे-धीरे उसे भीतर ले जाओ। पहले आंख खोल कर कृष्ण को देखते रहो घंटों और फिर आंख बंद करके देखने लगो। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि अगर एक खिड़की के पास बैठ जाओ और आंख खोल कर देखते रहो, फिर आंख बंद कर लो तो उसका निगेटिव बनेगा; फिर आंख बंद हो जाएगी तो भी खिड़की दिखाई पड़ती रहेगी। कम से कम खिड़की का खांचा दिखाई पड़ता रहेगा।
एक फोटोग्राफर अपने एक मित्र के साथ बगीचे में बैठा था। अब हर विशेषज्ञ की अपनी भाषा होती है। फोटोग्राफर ही था। अपने मित्र के साथ बात कर रहा था--दोनों अमरीकी--और तभी एक नीग्रो वहां से निकला।
फोटोग्राफर ने कहा, अरे-अरे, देखो-देखो, निगेटिव जा रहा है!
फोटोग्राफर की भाषा, कि किसी ने बेचारे को पाजिटिव नहीं बनाया, निगेटिव ही छोड़ दिया। तुमने निगेटिव देखा है? फोटोग्राफी में अगर रस है तुम्हें तो जाकर फोटो उतरवा कर निगेटिव देखना, तब तुमको पता चलेगा कि अरे निगेटिव में तुम नीग्रो हो! वह तो अच्छा हुआ, किसी ने पाजिटिव बना दिया। इतना ही फर्क है, और कुछ नहीं। जरा रंग का फर्क है।
अगर तुम कृष्ण की मूर्ति पर ध्यान करोगे और वर्षों करते रहोगे और आंख बंद करके मूर्ति दिखेगी, तुम गदगद हो जाओगे। तुम कहोगे: अहा! आ गए भगवान। कुछ आया-करा नहीं, सिर्फ निगेटिव हो गया पैदा। अब बैठे रहो इस निगेटिव को लिए। कृष्ण को न देखते, बुद्ध को देखते, तो बुद्ध का निगेटिव बनता। महावीर को देखते, महावीर का निगेटिव बनता। जिसको देखते उसका बनता। यह कुछ धर्म नहीं है, न ध्यान है।
और तुम कहते हो, "उनका विचार है गांव-गांव कुटीर मंदिर बनाने का।'
इस देश में कुछ मंदिर कम हैं? आदमी को रहने की जगह नहीं और मंदिर ही मंदिर भरे हैं। सारा देश मंदिरों से भरा हुआ है। और क्या जरूरत है और मंदिरों की? परमात्मा तो ऐसे ही रह सकता है आकाश में, खुले आकाश में ही रह रहा है, कोई जरूरत ही नहीं है उसको मंदिरों की। क्यों परेशान कर रहे हो लोगों को, क्यों परेशान हो रहे हो? चांदत्तारों में बसा है, वृक्षों में बसा है, धूप में रचा है, पचा है, सब तरफ वही मौजूद है। क्यों इसे दीवारों में बंद करते हो? दीवारों की, छप्पर की आदमी को जरूरत है। कृष्ण की मूर्ति के लिए, कि महावीर की मूर्ति के लिए, कि बुद्ध की मूर्ति के लिए क्यों मंदिर खड़े करना?
ये सब मंदिर स्कूलों में बदल दो, अस्पतालों में बदल दो, आदमियों को दे दो। आदमी के पास छप्पर नहीं है, मकान नहीं है, रोटी नहीं है, रोजी नहीं है--और भगवान के लिए प्रसाद लग रहा है! और मंदिर खड़े किए जा रहे हैं। रोज नए मंदिर खड़े किए जा रहे हैं। और इस देश में मंदिर तो सदा से रहे हैं, मंदिर ही मंदिर हैं; किसी भी गांव में जाकर देख लो, हर मोहल्ले में मंदिर हैं। अब और कोई कमी रह गई है मंदिरों की, कि वे कहते हैं कि गांव-गांव कुटीर मंदिर बनाना है!
"वे मानते हैं कि इस तरह हर गांव में भक्ति शुरू हो जाए तो समाज का नव-निर्माण होगा।'
भक्ति कितने समय से चल रही है भैया, भक्ति से ही तो सारी बरबादी हुई! और भक्ति चलवाना है? भक्ति से ही तो पांच हजार साल में इस देश की यह दुर्दशा हो गई। काफी हो चुकी भक्ति। इतने हजार साल की भक्ति के बाद भी समाज का नव-निर्माण नहीं हुआ, अब तुम करोगे नव-निर्माण?
"और समाज के बदलने पर--उनका कहना है--व्यक्ति आप ही बदलेगा। व्यक्तिगत रूप से साधना-ध्यान आदि करने की कोई जरूरत नहीं है।'
यह तो पागलपन की बात हो गई। साधना तो सदा व्यक्तिगत ही होती है। क्योंकि आत्मा ही व्यक्ति के भीतर विराजमान है; समाज की कोई आत्मा नहीं है। सामाजिक अर्थ ही नहीं होता धर्म का कोई; धर्म तो व्यक्तिगत क्रांति है। धर्म राजनीति नहीं है। राजनीति समाज की होती है, इसलिए राजनीति में कोई आत्मा नहीं होती।
धर्म व्यक्तिगत है, वैयक्तिक है। धर्म में आत्मा की तलाश है, खोज है। व्यक्ति बदले तो समाज बदल सकता है, यह तो समझ में आता है, लेकिन समाज के बदलने से व्यक्ति नहीं बदलता। समाज तो बदलता ही रहा है, कितना नहीं बदल गया है समाज। मगर व्यक्ति कहां बदला? वही क्रोध है, वही लोभ है, वही मोह है, वही वासना है, वही अहंकार है। फिर चाहे अमरीका में रहो, चाहे रूस में रहो; समाज तो अलग-अलग हैं, मगर रूसी के पास कोई अहंकार कम है अमरीकी से? उतना ही अहंकार, वही अहंकार। वही जालसाजी।
कल मैं पढ़ रहा था कि नई से नई खोजें ये हैं कि स्टैलिन मरा नहीं, बल्कि उसकी हत्या की गई। और हत्या करने वालों में जो खास लोग थे वे उसके निकटतम लोग थे। ख्रुश्चेव उनमें एक था। चार आदमियों ने मिल कर हत्या की। ख्रुश्चेव एक था। बेरिया नंबर दो था। बेरिया उसका, गुप्त जो पुलिस थी रूस की, उसका प्रधान था। और दो और लोग। वे भी दोनों कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े ऊंचे पदों पर से थे। इन चारों आदमियों ने मिल कर उसकी हत्या की।
चाहे समाजवाद हो, चाहे साम्यवाद हो, चाहे पूंजीवाद हो, बात तो वही चल रही है--वही हत्या, वही उपद्रव, वही बेईमानी, वही जालसाजी। समाज के बदलने से कुछ भी तो नहीं बदलता। व्यक्ति बदले तो ही कुछ बदल सकता है।
"और वे कहते हैं कि व्यक्ति को परिवार की, समाज की, देश की और विश्व की हरेक समस्या का समाधान सिर्फ गीता में मिल सकता है।'
गीता में कुछ प्यारे सूत्र हैं, मगर समय इतना बदल गया, परिस्थितियां इतनी बदल गईं कि जो व्यक्ति गीता में प्रत्येक समस्या का समाधान खोजने जाएगा वह सिर्फ अपनी विक्षिप्तता की घोषणा कर रहा है। और गीता में अगर हर चीज का समाधान है तो तुम्हें कौन रोकता था? पांच हजार साल से गीता तुम्हारे पास है, तुमने अपनी कौन-सी समस्याओं का समाधान कर लिया? जितनी समस्याएं हमारे देश में हैं उतनी समस्याएं दुनिया में कहीं नहीं हैं। और गीता तुम्हारे पास है, कर लो समाधान। साइकिल का पंक्चर भी हो जाएगा, उसका भी साल्यूशन न बना पाओगे। गीता में समाधान कहां से खोज लोगे? कैंसर का इलाज कहां से ले आओगे? फैक्ट्रियां खड़ी करनी हैं, ये कैसे बनाओगे?
और गीता ने जो समाधान उस दिन दिया था वह भी समाधान कहां सिद्ध हुआ? धर्मशास्त्रों के अनुसार गीता के समाधान का कुल परिणाम इतना हुआ कि सवा अरब आदमी युद्ध में मरे; यह समाधान था! यह कृष्ण महाराज की कृपा है! यह उनकी अनुकंपा है! सवा अरब आदमी युद्ध में मरे। और कृष्ण के समझाने के बाद और कृष्ण की मौजूदगी में यह समाधान हुआ! कृष्ण कुछ भी तो हल न कर पाए, क्या हल हुआ?
और क्या तुम सोचते हो, अर्जुन को कुछ बुद्धि आई? क्योंकि कथा तो कुछ और कहती है। कथा यह कहती है कि जब इनका स्वर्गारोहण हुआ, तो सब गल गए रास्ते में ही, सिर्फ युधिष्ठिर और उनका कुत्ता स्वर्ग के द्वार तक पहुंचे। बाकी सब गल गए, अर्जुन भी गल गया! यह कृष्ण के साथ जिंदगी भर रहा, गीता इसने कृष्ण से सुनी, यह भी स्वर्ग तक न पहुंच पाया! क्या खाक समाधान? यह भी रास्ते में ही गल गया। कुत्ता भी आगे निकल गया। मतलब कुत्ता भी गीता ज्यादा समझा। ये सब गल गए रास्ते में। रास्ते में गल जाने का मतलब यह है कि स्वर्ग तक की यात्रा पूरी न हो पाई, समाधि तक की यात्रा पूरी न हो पाई। समाधान क्या हुआ?
और कृष्ण के मरने के बाद, जिन यादवों के वे नेता थे, उनकी क्या गति हुई? वे सब आपस में कट मरे। महाभारत के बाद भारत उठ ही नहीं सकता, भारत की रीढ़ टूट गई। उसका सारा जिम्मा कृष्ण पर है और गीता पर है। गीता ने भारत को जो समाधान दिया, वह समाधान नहीं था। उससे भारत की आत्महत्या हो गई। उसके बाद भारत कभी अपनी ऊंचाइयों को फिर से नहीं छू सका।
मगर हम तो अजीब लोग हैं। हम तो एक से एक बातें माने चले जा रहे हैं। मेरे पास पांच-सात दिन पहले एक पत्र आया कि अगर आप भगवान हैं और किसी स्त्री की लाज लुट रही हो और कोई उसकी साड़ी निकाल रहा हो तो आप उसकी साड़ी बढ़ा सकते हैं कि नहीं? कृष्ण भगवान ने साड़ी बढ़ा दी थी, जब द्रौपदी की साड़ी खींचने लगा दुर्योधन।
पहली तो बात यह है कि ये साड़ियां सब लाए कहां से? ये दूसरों की स्त्रियां जो नहाती रहीं यमुना में, उनकी साड़ियां इकट्ठी करते रहे। फिर उन्हीं में गांठ बांध-बांध कर द्रौपदी तक पहुंचाई होंगी। साड़ियां कहां से लाए? और बड़ा मजा यह है कि ये खुद तो स्त्रियों की साड़ियां चुरा कर झाड़ों पर चढ़ें तो लीला, और वही बेचारा दुर्योधन भी सोचा कि थोड़ी लीला मैं भी करूं, तो उसको लीला न करने देंगे! खुद ही लीला करेंगे।
न तो भैया मैं किसी की साड़ी चुराता और न किसी की साड़ी बढ़ाता। साड़ी का धंधा ही नहीं करता। यह क्या साड़ी का धंधा मचा रखा है?
और कृष्ण का जीवन कौन-सा ऐसा जीवन है जिसको कोई इतनी महिमा दो? ऐसा क्या है? और गीता में ऐसी कौन-सी नई बात है। जो भी मूल्यवान है वह सब उपनिषदों से उधार है। और जो भी मूल्यहीन है वह शायद कृष्ण का अपना हो; वह मौलिक मालूम होता है। और गीता तो इतने दिन से है, हल करके दिखाओ कुछ, कोई तो समाधान करके दिखाओ।
कुछ हल गीता वगैरह से होने वाला नहीं है। इस तरह की भ्रांतियों में अब मत जीओ। भारत को चाहिए आधुनिक टेक्नोलॉजी, आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, ताकि भारत की बाहरी समस्याएं हल हो सकें; और भीतर के लिए चाहिए ध्यान, समाधि, ताकि भीतर की समस्याएं हल हो सकें। विज्ञान और ध्यान दो चीजें पर्याप्त हैं। न गीता की कोई जरूरत है, न कुरान की कोई जरूरत है, न बाइबिल की कोई जरूरत है।



आखिरी प्रश्न: भगवान,
जिस प्रकार शंकराचार्य को प्रच्छन्न बौद्ध कहा जाता है उसी प्रकार मुझे स्वामी आनंद स्वभाव भी प्रच्छन्न सिंधी लगते हैं। आपका क्या विचार है?

 सोहन,
माई, तूने तो सच्ची बात का पता लगा लिया। मैं डरता था कि कोई न कोई पता लगा ही लेगा। और तूने गजब कर दिया। बेचारी ऊषा, उनका सत्संग करते-करते जमाना बीत गया, बाल-बच्चे पैदा हो गए, वह भी पता न लगा पाई कि ये सज्जन सिंधी हैं। और तूने दूर से ही, आकाश में उड़ते पक्षी को पहचान लिया कि हो न हो, यह स्वभाव प्रच्छन्न सिंधी हैं।
हैं! इसमें दो मत नहीं हो सकते। मैं तेरी बात पर सील-मोहर मारता हूं। और हों भी क्यों न? स्वामी आनंद स्वभाव सिद्ध पुरुष हैं। सो सिंधी तो होंगे ही। अरे जब तक बिंदु में सिंध न समाए, जब तक सिंध में बिंदु न समाए, तब तक कोई सिद्ध हो सकता है? और जिसके बिंदु में सिंध समा गया वह सिंधी! सिंधी का और क्या अर्थ होता है? पहुंचे हुए सिद्ध पुरुषों का नाम है। इसीलिए तो सिंधियों को साईं कहते हैं।
स्वामी आनंद स्वभाव जब पहले-पहल पूना आ रहे थे तब की घटना है। वे ऊपर की बर्थ पर सोए हुए थे, नीचे खिड़की के पास चिम्मणराव खड़खड़े भी बैठे हुए थे। एक जगह गाड़ी रुकी तो स्वामी ने पूछा कि भाई, कौन-सा स्टेशन है? चिम्मणराव खड़खड़े पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, सो उन्होंने कहा, मला काय माहीत! मुझे क्या मालूम! स्वामी समझे मला काय माहीत स्टेशन का नाम होगा। सो वे फिर सो गए। घंटे भर बाद फिर स्टेशन आया, स्वामी ने फिर स्टेशन का नाम पूछा और चिम्मणराव खड़खड़े ने फिर कहा, मला काय माहीत! स्वामी जरा हैरान हुए कि यह दूसरा स्टेशन भी मला काय माहीत कैसे हो सकता है! लेकिन फिर यह सोच कर कि अगर राष्ट्र में महाराष्ट्र हो सकता है तो दो मला काय माहीत भी हो सकते हैं। वे पांव पसार कर फिर सो गए। थोड़ी देर बाद फिर स्टेशन पर गाड़ी रुकी और स्वामी ने फिर स्टेशन पूछा और चिम्मणराव खड़खड़े ने फिर कहा, मला काय माहीत!
अब स्वामी से न रहा गया। अरे सिंधी तो सिंधी! कब तक सहें, उछाल मारी, कूद पड़े नीचे। आव देखा न ताव, उतर कर चिम्मणराव खड़खड़े को पीटना शुरू कर दिया। तो चिम्मणराव खड़खड़े चिल्लाए, मारतो कसाला? मारता क्यों है! स्वामी आनंद स्वभाव ने दम लेते हुए कहा, पहले ही क्यों नहीं बोला कि इस स्टेशन का नाम मारतो कसाला है! अरे जब पूछा तब बोला मला काय माहीत और अब बोलता है मारतो कसाला! बेवकूफ बनाने की भी हद होती है! अरे तूने क्या मुझे सिंधी समझा है?
छिपाने की कोशिश तो वे बहुत कर रहे हैं, मगर सोहन माई, तू पहचान गई।
स्वामी आनंद स्वभाव को एक बार उनके एक पठान दोस्त ने खाने पर बुलाया। खाने में बना था पुलाव और वह भी कम मात्रा में। थाली भी एक ही थी। स्वामी ने सोचा यदि दोनों एक साथ खाना शुरू करेंगे तो यह रहा पठान, ज्यादा खा जाएगा। इसलिए स्वामी ने दीवार की ओर इशारा करके कहा, भाई, यह तस्वीर किसकी है? और यह मर कैसे गई?
पठान गहरी ठंडी सांस लेकर बोला, भैया, यह मेरी महबूबा की तस्वीर है। और यह एक दुर्घटना में मर गई थी। फिर पठान ने विस्तार से घटना सुनाई। तब तक स्वामी थाली साफ कर चुके थे। पठान जब पूरी घटना कह चुका तो देखा कि थाली साफ। और उसने सोचा कि स्वामी ने मुझे बेवकूफ बनाया। है सिंधी, पक्का सिंधी है--पठान को भी शक हुआ। सोचा उसने, ठीक है इस सिंधी की कभी खबर लूंगा, कभी तो मेरी बारी आएगी।
फिर एक बार यूं हुआ कि स्वामी ने पठान दोस्त को खाने पर बुलाया। उसने भी पुलाव बनाया। थाली भी एक थी। पठान ने सोचा अब आई मेरी बारी। उसने भी दीवार की तरफ इशारा करके कहा, लगता है यह तुम्हारे पिताजी की तस्वीर है। और ये कैसे मरे?
स्वामी बोले, अरे भाई मौत आई सो मर गए। तुम तो खाना खाओ।
पठान दुख प्रकट करता हुआ बोला, भाई, फिर भी बताओ तो कैसे मरे?
स्वामी जल्दी-जल्दी खाते हुए बोले, भैया, अब क्या गड़े मुर्दों को उखाड़ना! अरे खाना खाओ, प्यारे! बीती ताहि बिसार दे!
बेचारा पठान फिर चूक गया। वह तो इनके पिता की ही बात करता रहा, तब तक ये तो थाली साफ कर गए।
एक बार सेठ झामनदास, खट्टू सिंधी और स्वामी आनंद स्वभाव पिकनिक मनाने गए। और तो कहां जाते--सासवड़ गए! वहीं खिचड़ी बनाई। झामनदास ने खिचड़ी का पात्र बीचों-बीच रखा और उसके मध्य में बहुत-सा घी डाला। झामनदास ने घी डालने के बाद कहा, भैया, हमारे जमाने में तो ऐसा युद्ध हुआ, ऐसा युद्ध हुआ, कि सारी पृथ्वी दो भागों में बंट गई। और ऐसा कहते हुए उन्होंने खिचड़ी के पात्र में पृथ्वी को दो भागों में बंटी हुई दिखाने के लिए एक लाइन खींच दी। घी उनकी तरफ बहने लगा।
खट्टू सिंधी भी कुछ कम तो न थे। उन्होंने कहा, भैया, तुम्हारे जमाने में कुछ भी नहीं हुआ, हमारे जमाने में ऐसा युद्ध हुआ, ऐसा युद्ध हुआ, कि सारी पृथ्वी चार हिस्सों में बंट गई। ऐसा दर्शाने के लिए उसने भी पात्र में रखी खिचड़ी को दो अंगुलियों से चार भागों में विभक्त कर दिया। घी अब खट्टू सिंधी की ओर बह चला।
स्वामी आनंद स्वभाव ने जब यह देखा तो उन्हें दोनों की बदमाशी समझ में आई और बोले, भैया, हमारे जमाने में तो गदर हुआ था। और ऐसा कह कर उन्होंने पांचों अंगुलियां खिचड़ी में डाल कर गदर मचा दी।

आज इतना ही।