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रविवार, 9 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-01

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो
यह प्रेम का मयखाना है—प्रवचन-पहला
दिनांक 01 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
संत पलटू ने सावधान किया है: सहज आसिकी नाहिं। समझाने की अनुकंपा करें कि यह आसिकी क्या है?

 योग मुक्ता,
आसिकी तो समझाई नहीं जा सकती; समझी जरूर जा सकती है।
प्रेम की कोई परिभाषा नहीं है। प्रेम स्वाद है। स्वाद की कोई परिभाषा करे तो कैसे करे? प्रेम अनुभव है। जीकर ही जाना जाता है। और यही खतरा है। इसलिए पलटू ने सावधान किया है। पहला कदम ही खतरनाक है; बिना जाने उतरना होता है।
मन तो उन चीजों में जाना चाहता है, जो परिचित हों, जानी-मानी हों, ज्ञात हों, जिनका गणित हमारे वश में हो। मन अज्ञात में जाने से डरता है; इसी किनारे को पकड़ रखना चाहता है, जोर से! पता नहीं दूसरा किनारा हो कि न हो! दिखाई भी तो नहीं पड़ता। दिखाई तो पड़ते हैं तूफान और आंधियां। दिखाई तो पड़ता है अनंत सागर का विस्तार। जहां तक आंखें जाती हैं दूर क्षितिज तक, सागर ही सागर। इस विराट सागर में इस छोटी-सी नौका को लेकर उतरना आसान तो काम नहीं है।

अगर परिभाषा हो सके, अगर व्याख्या हो सके, अगर अंधे को समझाया जा सके कि प्रकाश क्या है, तो शायद वह आंख का इलाज करवाने को राजी हो जाए। लेकिन अंधे का डर यह है कि तुम बताते तो हो नहीं कि प्रकाश क्या है, कहीं ऐसा न हो कि उसकी तलाश में जिसका मुझे पता नहीं, वह भी खो जाए जिसका मुझे पता है। अपने अंधेपन से तो किसी तरह राजी हो गया हूं। माना कि लकड़ी से टेक-टेक कर चलना पड़ता है, पूछ-पूछ कर कदम उठाने होते हैं, सम्हल-सम्हल कर; लेकिन यह तो अब जानी-मानी बात हो गई। यह भाषा तो मुझे समझ में आती है। मगर तुम किस प्रकाश की बात छेड़ रहे हो? तुम किन आंखों की बात उठा रहे हो? जब तक पक्का न हो जाए, जब तक मुझे साफ न हो जाए--अंधा कहेगा--कि प्रकाश है, और ऐसा है, और मेरे अंधेपन से ज्यादा मूल्यवान है, कि अंधापन खोऊं तो कुछ खोएगा नहीं, लाभ ही होगा, हानि नहीं होगी...।
मन तो हिसाबी-किताबी है। मन तो मारवाड़ी है।
मैंने सुना, बंबई और दिल्ली के बीच दो मारवाड़ी भाइयों में ट्रंक काल से बात हो रही थी। छोटे भाई ने कहा, मां कह रही हैं आठ सौ रुपए भेज दो।
बड़े ने पूछा, क्या कहा? कुछ सुनाई नहीं दे रहा है।
छोटे ने और जोर से कहा, मां कह रही हैं आठ सौ रुपए भेज दो, आठ सौ रुपए।
बड़े ने वही बात दोहराई। छोटे ने और ऊंची आवाज में मां का संदेश कहा। जब चार-छह बार यही सब चलता रहा तो आपरेटर जो दोनों की बात सुन रहा था, बीच में बोला, कमाल है, इतना साफ तो सुनाई दे रहा है! आपकी मां कह रही हैं कि आठ सौ रुपए भेज दो।
बड़े भाई ने कहा, तुझे इतना साफ सुनाई दे रहा है तो तू ही भेज दे न!
मन मारवाड़ी है; एक पैसा भी छोड़ना मुश्किल। लाभ तय हो जाए तो दांव लगा सकता है। मगर वह दांव नहीं है, धंधा है। मन जुआरी नहीं है, व्यवसायी है। और मन की यह जो अवस्था है, यही पूछती है--प्रेम क्या है?
सेठ चंदूलाल अपने भाई मंगूलाल के साथ किराने का धंधा करते थे। गांव से खबर आई कि बूढ़े पिता मृतप्राय हैं। चंदूलाल ने कहा, अपने दोनों के जाने से क्या फायदा? तुम अकेले ही चले जाओ और जाकर तुरंत तार कर देना कि पिताजी की तबीयत अब कैसी है। और तुम्हें तो पता ही है कि एक तार में कम से कम आठ शब्द लिखे जा सकते हैं।
मंगूलाल जी मारवाड़ी घर चले गए। दूसरे ही दिन उनका तार आया, जो इस प्रकार था--पिताजी समाप्त, दाह-संस्कार कल; अरहर तेजी, गुड़ मंदी। आठ शब्द जब भेजे जा सकते हैं तो चार से क्यों चूकना!
पलटू कहते हैं: सहज आसिकी नाहिं!
पहली तो कठिनाई यही है कि मन के गणित में नहीं बैठता प्रेम। मन के गणित से बहुत बड़ा है। मन जीता है ज्ञात में और प्रेम है अज्ञात की यात्रा। मन की है सीमा और प्रेम है असीम। मन है तुम्हारा सोच-विचार और प्रेम है तुम्हारी भाव-दशा। यह अलग लोक है।
दिल ने इक चीज बड़ी बेशबहा मांगी है
हुस्ने-मगरूर  की  फितरत  से  वफा  मांगी  है
अब यह समझ में नहीं आता कि--
मसलहत है कि तवज्जो है या कि साजिश है
दिल ने इक चीज बड़ी बेशबहा मांगी है
हुस्ने-मगरूर की फितरत से वफा मांगी है
मसलहत है कि तवज्जो है या कि साजिश है
एक  दुश्मन  ने  मेरे  हक  में  दुआ  मांगी  है
प्रेम का तो कोई आशीर्वाद भी दे तो मन विचार में पड़ जाता है:
मसलहत है कि तवज्जो है या कि साजिश है
धन का आशीर्वाद लोग चाहते हैं, प्रेम का नहीं। प्रेम तो दुस्साहस है।
योग मुक्ता, आसिकी सहज नहीं, महंगा सौदा है। लेकिन महंगा सौदा केवल शुरुआत में। जब दूसरा किनारा मिलेगा तब पता चलता है: जो छोड़ा वह तो कुछ भी न था; जो पाया वह अपार है, अनंत है। जो छोड़ा वह तो क्षणभंगुर था; जो पाया वह शाश्वत है। जो छोड़ी वह तो ओस की बूंद थी और जो मिल गया है वह सागर है। मगर सवाल तो पहले है, छोड़ते समय है। ओस की बूंद को कैसे भरोसा दिलाओ कि तू अगर सागर में उतरेगी तो कुछ खोएगी नहीं। सारा गणित तो उसे यही कहता है कि सागर में उतरना अपने को खोना है, अपने को गंवाना है। पागल है तू? होश तेरे खो गए हैं? बच सकेगी तू?
पलटू का पूरा सूत्र है--
पलटू बड़े बेकूफ वे, आसिक होने जाहिं।
सीस उतारें हाथ से, सहज आसिकी नाहिं।।
कहा कि बड़े बेवकूफ हैं, पागल हैं, दीवाने हैं, मस्ताने हैं, मदहोश हैं, परवाने हैं!
पलटू बड़े बेकूफ वे...
जो बूंद चली है सागर में उतरने, पागल ही तो है। समझदार बूंदें, सयानी बूंदें कहेंगी: यह क्या कर रही है? मिट जाएगी। अपने हाथ से अपने को मिटाना, आत्महत्या है यह।
प्रेम आत्मघात है, क्योंकि अहंकार तो मिटेगा। अहंकार तो नेस्त-नाबूद हो जाएगा। अहंकार तो खोजे से न मिलेगा। बूंद जैसे ही सागर में उतरी कि बूंद की सीमाएं समाप्त, बूंद गई, सदा के लिए गई। अब लाख खोजो तो भी पा न सकोगे।
बुंद समानी समुंद में, सो कत हेरी जाई।
अब कैसे खोजोगे उस बूंद को जो सागर में समा गई है? जो अपने को गंवाने को राजी है, जो अपनी सूली--जैसा जीसस ने कहा--अपने ही कंधों पर रख कर चलने को राजी है, वही केवल आशिक हो सकता है। हालांकि पीछे पता चलता है कि बूंद ने कुछ भी नहीं खोया। अरे बूंद होना खोना कुछ खोना तो नहीं है; सिर्फ सीमा का खोना है, क्षुद्रता का खोना है। और हो गई विराट!
कबीर पहले तो कहे:
बुंद समानी समुंद में, सो कत हेरी जाई।
हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।।
लेकिन जब हिरा ही गए कबीर--यह पहले की बात है, यह किनारे पर खड़े होकर कहा होगा--और जब दूसरा किनारा मिला तो, जब बूंद सागर में खो ही गई तो, तो फिर दूसरा वक्तव्य कबीर का और भी अदभुत है:
समुंद समाना बुंद में, सो कत हेरी जाई।
हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराई।।
पहला वचन है किनारे पर खड़ी हुई बूंद का; दूसरा वचन है निर्वाण के बाद, समाधि के बाद, प्रेम की पराकाष्ठा के बाद, परमात्मा की अनुभूति के बाद।
रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए
जैसे सहराओं में हौले से चले वादे-नसीम
जैसे  बीमार  को  बेवजह  करार  आ  जाए
याद भी आ जाए सागर की, याद भी, तो यूं हो जाता है--
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए
जैसे सहराओं में हौले से चले वादे-नसीम
जैसे  बीमार  को  बेवजह  करार  आ  जाए
बिना किसी कारण के जैसे बीमार के भीतर स्वास्थ्य की एक लहर दौड़ जाए! बिजली कौंध जाए! जैसे अचानक रात टूट जाए! जैसे अचानक रात टूट जाए, सुबह हो जाए; नींद टूट जाए, जागरण आ जाए। सिर्फ याद भी आ जाए बूंद को सागर की, तो अपने प्राणों की याद आ गई, अपने स्वरूप की याद आ गई। क्योंकि बूंद है तो सागर ही। सागर से ही आई है, सागर में ही लीन होना है। और ये जो बीच के थोड़े-से क्षण हैं, जब सागर में नहीं है, तब भी स्वरूपतः तो सागर ही है। अगर एक बूंद के राज को भी हमने पूरी तरह समझ लिया तो हमने सारे जगत के सागरों को समझ लिया। सूत्र तो वही होगा--एच.टू.ओ.। एक बूंद का विश्लेषण और सारे सागरों का रहस्य समझ में आ जाता है। प्रेम की एक बूंद पर्याप्त है।
योग मुक्ता, मामला लेकिन दीवानों के लिए है, पागलों के लिए है; होशियारों के लिए नहीं, सयानों के लिए नहीं। परवाने को देखा न! परवाने को देखा है नाचते हुए? चल पड़ता है शमा की तरफ--मरने जा रहा है, मिटने जा रहा है! सब गंवा बैठेगा। लेकिन लाख समझाओ परवाने को, शमा जली और परवाना चला। न मालूम कैसे दूर-दूर तक उसे खबर मिल जाती है। खिंचा चला आता है, जैसे चुंबक खींचती हो। रोक ही नहीं पाता अपने को। और फिर शमा के पास आकर नाचता है।
वह रक्स, वह नृत्य अपूर्व है! अपनी ही मृत्यु के पहले वह उत्सव! वही उत्सव तो मैं संन्यास के नाम से तुम्हें सिखा रहा हूं। रक्स देखा है परवाने का! वही संन्यास है। यह अहंकार की मृत्यु के पूर्व नृत्य है, उत्सव है, समारोह है। यूं भी क्या रोते-रोते मरना! जो रोते-रोते मरा है, फिर जन्मेगा, फिर मरेगा, फिर जन्मेगा, फिर मरेगा। जो हंसते-हंसते मरा, नाचते हुए मरा, फिर उसका कोई जन्म नहीं, फिर उसकी कोई मृत्यु नहीं।
संन्यास का अर्थ है अपने अहंकार को जला देना, राख कर देना या बुझा देना। जैसे कोई दीए को फूंक मार कर बुझा दे। और आसिकी का वही अर्थ है। जिन्होंने अपने को मिटाया है उन्होंने ही परमात्मा को जाना है।
आनंद मोहम्मद ने ये गीत मुझे लिखे--

क्या अजब है मकामे-जुस्तजू भी
जहां  मैं  भी  नहींतू  ही।
निगाहें झुक गईं, पासे-अदब से
आपको देखा खुदा के रूबरू ही।

जब से तेरी निगाह ने इस दिल के दीए जलाए हैं
तेरी महफिल में हमने नगमें बहुत गुनगुनाए हैं

मोहब्बत हो गई, हो गई
वह कहानी थी और यह हकीकत हो गई
कोयल ने दी जो सदा,
कोयल की कुहू-कुहू जामे-शराब हो गई
मोहब्बत हो गई, हो गई
इस मयखाने में तेरी आंखों से हम पी रहे थे
जिंदगी यह अब शराब हो गई, हो गई
कौन जाए काबा और कौन जाए काशी
सर को झुकाया तो इबादत हो गई, हो गई
मोहब्बत हो गई, हो गई

योग मुक्ता, मत पूछ कि प्रेम क्या है। न शब्दों में समाता है, न शास्त्रों में समाता है। कितने गीत लिखे गए प्रेम के, लेकिन प्रेम अनगाया ही रह गया है। कितने बुद्धों ने जाना, जीया। कितनी मीराओं ने पहचाना, पीया। लेकिन अनकहा ही रह गया है। जिसने जाना वही गूंगा हो गया। गूंगे केरी सरकरा! कहना भी चाहो तो नहीं कहा जा सकता। बात इतनी बड़ी है, सब शब्द छोटे पड़ जाते हैं, बहुत छोटे पड़ जाते हैं। कहो, और कहते ही असत्य हो जाता है।
अनुभव करो। और अगर यहां अनुभव न हो सके, योग मुक्ता, तो फिर कहीं भी अनुभव न हो सकेगा। यह तो मंदिर ही प्रेम का है। यह तो मयखाना ही प्रेम का है। यहां मैं शास्त्र तो नहीं सिखा रहा हूं; शास्त्रों से मुक्ति सिखा रहा हूं। यहां कोई शब्द और सिद्धांत तो तुम्हें नहीं दे रहा हूं। तुम्हारे भीतर सोई हुई प्रेम की जो अभीप्सा है, उसको उकसा रहा हूं, जगा रहा हूं। सबके भीतर अंगार है, लेकिन राख में दब गया है। जरा राख झाड़ देनी है और अंगार प्रकट हो जाएगा। और एक छोटी-सी चिनगारी पूरे जंगल में आग लगा देती है।
पलटू बड़े बेकूफ वे...
पलटू ठीक कहते हैं कि हैं तो पागल बिलकुल!
                      ...आसिक होने जाहिं।
आसिक होने चले हो? पागल हो गए हो? अरे दुकान करो, धंधा करो, धन कमाओ, पद की यात्रा करो। आसिक होने चले हो? अपने हाथ से अपने को मिटाने का आयोजन कर रहे हो?
अभियुक्त शराबी था। उस पर आरोप था कि उसने नशे में अपनी सास पर गोली चलाई। वह तो निशाना चूक गया, वरना सास की जान चली जाती। अंत में जज ने अपराधी को समझाया कि देख भाई, थोड़ा सोच। शराब के कारण ही तुममें सास के प्रति इतनी घृणा पैदा हुई। शराब के कारण ही यह घृणा इस हद तक बढ़ी कि तुम पिस्तौल खरीदने पर मजबूर हुए। शराब के कारण ही तुम पिस्तौल लेकर सास के घर तक गए। शराब के कारण ही तुमने सास को पिस्तौल का निशाना बनाया। और शराब के कारण ही तुम निशाना भी चूक गए।
शराबी बेचारा निशाना चूकेगा ही। और प्रेम तो शराब है; इस जगत के सब निशाने चूक जाएंगे। न धन मिले, न पद मिले, न प्रतिष्ठा मिले। लेकिन इतना दांव पर लगाने को जो राजी न हो, वह परमात्मा को पाने का हकदार नहीं।
सीस उतारें हाथ से...
अपने ही हाथ से अपनी गर्दन काटनी है। कठिन काम है।
                    ...सहज आसिकी नाहिं।
कोई दूसरा भी गर्दन काटे तो आदमी अपने को बचाता है; अपने ही हाथ से अपनी गर्दन काटनी है। अत्यंत कठिन है।
गर्दन से मतलब है--अहंकार। सिर प्रतीक है अहंकार का। अहंकारी व्यक्ति अपने सिर में ही जीता है। अहंकारी व्यक्ति की अकड़, सिर उसका झुकता ही नहीं। कहीं भी नहीं झुकता। झुकना उसकी भाषा नहीं है। और इस सीस को उतार कर रख देना है।
सीस उतारें हाथ से...
और कोई दूसरा भी नहीं काटेगा, खुद ही। तो पागलपन चाहिए ही चाहिए। बिना पागल हुए यह असंभव है।

ऐ काश की सोजे-गम अश्कों में न ढल जाए
दामन से जो पोंछूं दामन मेरा जल जाए
हमको तो गुलिस्तां के हर गुल से मोहब्बत है
गुलचीं को जो नफरत हो गुलशन से निकल जाए
हर खार हमारा है, हर फूल हमारा है
(क्यूं?)
(कि) हमने ही लहू देकर गुलशन को संवारा है
हम डूबने वालों को काफी ये सहारा है
(क्या?)
(कि) साहिल पे तू आ जाना, हर मौज कनारा है
सौ जुल्म किए तुमने, इक आह न की हमने
(क्यूं?)
वो दर्द तुम्हारा था, ये दर्द हमारा है
हम तश्नालबी अपनी दुनिया से छुपा लेंगे
साकी से रुसवाई अब हमको गवारा है
अब उनका हसीं आंचल किस्मत में नहीं शायद
(क्यूं?)
(कि) आंसू भी हमारे हैं, दामन भी हमारा है
खामोश फजाओं में बजने लगी शहनाई
(अरे) ये तुमने सदा दी है या दिल ने पुकारा है
आंखों में जब अश्कों के तूफान मचलते थे
हमने वो जमाना भी हंस-हंस के गुजारा है
उनके लबे-नाजुक को क्या राज बताएंगे
(अरे) कुछ तू ही बता ऐ दिल क्या हाल हमारा है
(क्यूं?)
(कि) आंसू भी हमारे हैं, दामन भी हमारा है

प्रेमी का रास्ता एक दृष्टि से तो आंसुओं से भरा है और दूसरी दृष्टि से फूलों से। उसके आंसू ही फूल हो जाते हैं। और प्रेमी का रास्ता मंदिर और मस्जिदों की तरफ नहीं जाता। प्रेमी का रास्ता काबा और कैलाश की तरफ नहीं जाता। प्रेमी का रास्ता किसी परमात्मा की मूर्ति, प्रतिमा, धारणा से संबंधित नहीं है। प्रेमी का रास्ता तो यह सारे अस्तित्व से प्रेम है। ये वृक्ष, ये चांद, ये तारे, ये हवाएं, ये बादल, ये पहाड़, ये नदियां, ये लोग, ये पशु, ये पक्षी, यह सारा अस्तित्व प्रेमी के लिए मंदिर है। यही उसका काबा है, यही उसकी काशी है।
हर घड़ी अहंकार को पोंछते चलो, मिटाते चलो, जलाते चलो। टिकने न दो, रुकने न दो, सहारा न दो। भूल कर भी उसे भोजन मत दो। जाने-अनजाने भी उसकी रक्षा न करो, उसे मर जाने दो। अहंकार एक झूठ है। मर जाए तो सत्य प्रकट हो। सत्य को खोजना नहीं है। सत्य तो हमारे भीतर विराजमान है, और हमारे बाहर भी। सत्य का अर्थ--वह, जो है। और असत्य का अर्थ--वह, जो है नहीं, लेकिन भासता है कि है। असत्य मृग-मरीचिका है। दूर से लगता है कि है; पास जाओ तो कुछ भी नहीं।
अपने अहंकार को जरा गौर से देखो, अपने अहंकार पर जरा आंख गड़ाओ। अहंकार पर आंख गड़ाने की कला ही ध्यान है। ध्यान कुछ और नहीं, बस छोटा-सा राज, छोटी-सी कुंजी: अपने अहंकार पर अपनी आंखों को गड़ा लेना। और जैसे ही तुम्हारी आंखें अहंकार पर ठहरेंगी, तुम चकित हो जाओगे; इधर आंखें ठहरीं वहां अहंकार तिरोहित हुआ। वह था ही तब तक जब तक तुमने भर नजर देखा न था। तुमने देखा कि गया। जैसे ही तुम्हारे भीतर दर्शन, दृष्टि, द्रष्टा का आविर्भाव होता है, साक्षी जगता है, अहंकार बिखर जाता है। छाया मात्र है, आभास है। और अहंकार के बिखरते ही उसका तत्क्षण पता चलता है, जो आभास नहीं है; जो तुम्हारे भीतर मौजूद ही था, लेकिन अहंकार की भ्रांति में छिप गया था।
न तो रामनाम जपने से कुछ होगा, न नमोकार पढ़ने से, न ओंकार का पाठ करने से। अगर कुछ हो सकता है तो बस एक ही सूत्र है उसका, एक ही कीमिया है: अपने अहंकार को गौर से देखो। साक्षी बनो। और अहंकार गिर जाएगा तो अनुभव हो जाएगा सब। फिर उसे चाहे प्रेम कहो, चाहे परमात्मा कहो, चाहे सत्य कहो, चाहे मोक्ष कहो। ये सब एक ही अनुभव को कहने के अलग-अलग ढंग हैं।

तेरे हिज्र में मुझे ऐ सनम न सुकून है न करार है
मैं नियाजमंदे-जबान हूं मेरी जां तुझ पर निसार है
ये खिरद की मेरी इबादतें ये जुनूं की मुझ पे इनायतें
मगर इतना तो मुझको होश है मेरा दिल तो जाने-दयार है
तेरे हिज्र में मुझे ऐ सनम न सुकून है न करार है

सर हो न तो खम होगा तरफदार के लेकिन
सज्दे में नजर आएंगे जल्वे तेरे लेकिन
दिल रख दिया बाहिस्ता ये हकदार है लेकिन
हम पहले नमाज को आज खड़े हो गए लेकिन
काबे की तरफ मुंह सही दिल तेरी तरफ है
मगर इतना मुझको तो होश है मेरा दिल तो जाने-दयार है
तेरे हिज्र में मुझे ऐ सनम न सुकून है न करार है

ये तड़फ जो दिल में है वाकई तुझे क्या बताऊं मैं हमनशीं
न कतीले-खंजरे-नाज हूं मेरा गम से सीना फिगार है
वो नकाब अपनी उठाएं तो, वो जमाल अपना दिखाएं तो
मेरा शौके-सज्दा है मुज्तरिब मुझे फिक्रे-दीदे-निगार है
तेरे हिज्र में मुझे ऐ सनम न सुकून है न करार है

तू ही मेरे शेरो-सुखन की जां, है तुझी से हुस्ने-बयां मेरा
तेरी दीद ही मेरी ईद है, तू ही जिंदगी की बहार है
लबे-बाम जल्वा दिखाएं तो, मेरे होश आके उड़ाएं तो
वो गिराएं पर्दे-निगाह तो, मुझे ताबे-सब्रो-करार है

मुझे साकी मस्ते-खिराम ने जो शराबे-इश्क पिलाई थी
वही दिल में माज-सुरूर है वही अब भी कैफो-खुमार है
तेरे हिज्र में मुझे ऐ सनम न सुकून है न करार है
मैं  नियाजमंदे-जबान  हूं  मेरी  जां  तुझ  पर  निसार  है
सत्य को जाने बिना न सुकून, न करार। परमात्मा के अनुभव के बिना न शांति, न आनंद। जीवन फूलों से वंचित, जीवन आंखों से वंचित। जीवन में वसंत ही नहीं आता, बहार ही नहीं आती, सुगंध ही नहीं उड़ती, ज्योति ही नहीं जगती। फिर भी लोग जीए जाते हैं। न मालूम कैसे जीए जाते हैं। किसी तरह घसटे जाते हैं। किसी तरह बोझ को ढोए जाते हैं।
पलटू ठीक कहते हैं: सहज आसिकी नाहिं। सचेत करते हैं, मगर निमंत्रण आसिकी का ही दे रहे हैं। सावधान करते हैं कि यह मत सोच लेना कि सस्ता है रास्ता, मगर आओ, जरूर आओ। दीवाने हो तो आओ। मस्ताने हो तो आओ। परवाने हो तो आओ। सयाने हो तो मत आना। होशियारी से आना चाहो तो मत आना।
मैंने भी अपने दरवाजे होशियारों के लिए बंद कर दिए हैं। व्यर्थ उनके साथ समय खराब होता है। कोई उनके जीवन में क्रांति नहीं हो सकती। क्योंकि होशियारी कैसे क्रांति करे? होशियारी तो कौड़ी-कौड़ी का हिसाब लगा रखती है। संन्यास तो जुआरी के लिए है, शराबी के लिए है; सयानों के लिए नहीं; समझदारों के लिए नहीं। उनके लिए तो मंदिर हैं, मस्जिद हैं, गीता-कुरान हैं, बाइबिल हैं। वे शब्दों और सिद्धांतों में लिपटे रहें, शब्दों और सिद्धांतों के जाल में अपने को उलझाए रखें, अपने को भुलाए रखें। उनके लिए जीवन के परम सत्य नहीं हैं। अनुभव उनके लिए नहीं हैं, क्योंकि वे पहला काम ही न कर पाएंगे--सीस उतारे हाथ से। वहीं मुश्किल हो जाएगी खड़ी। वे झुक ही नहीं सकते।
मेरे पास आ जाते हैं पंडित, ज्ञानी। पत्र लिखते हैं कि हम संन्यास तो नहीं ले सकते, लेकिन सत्य को जानना जरूर है। मुफ्त, बिना कुछ किए। संन्यास नहीं ले सकते हैं। क्या घबड़ाहट है? अरे लोग पागल ही कहेंगे न! इसलिए तो संन्यास है। इसलिए तो यह पागलों जैसा वेश दे दिया। इतनी-सी हिम्मत न कर पाओगे तो फिर जब शमा जलेगी और पुकारेगी कि आओ और अपना सब लुटा दो, तब कैसे कदम बढ़ाओगे? फिर परवाना भाग खड़ा होगा। यह आहिस्ता-आहिस्ता एक-एक कदम, एक-एक सोपान चढ़ो। धीरे-धीरे हिम्मत जुटेगी। धीरे-धीरे साहस जगेगा।
पंडित तो कुछ का कुछ समझता रहता है। समझेगा ही। उसकी होशियारी उसे सत्य को नहीं समझने देती। पढ़ता है गीता को, लेकिन समझेगा तो अपनी। गीता को कैसे समझेगा? जब तक कोई कृष्ण न हो जाए तब तक गीता को समझने का कोई उपाय नहीं। जब तक कोई क्राइस्ट न हो जाए तब तक बाइबिल में कुछ सार नहीं।
हां, क्राइस्ट कोई हो तो बाइबिल समझ में आए। और मजा यह है कि कोई क्राइस्ट हो तो बाइबिल में समझने को रह ही क्या जाता है! सभी कुछ उसके भीतर समझ में आ गया। कोई कृष्ण हो तो गीता में क्या रखा है फिर! यही मुश्किल है। जब तक कृष्ण नहीं, गीता बेकार; जब कृष्ण हो गया तो बिलकुल बेकार।
मुल्ला नसरुद्दीन ने चंदूलाल से कहा, भई चंदूलाल बधाई हो, मैंने सुना कि कल तुमने बंबई की घुड़दौड़ में पचास हजार रुपए जीते।
चंदूलाल ने कहा, कल घुड़दौड़ बंबई में नहीं, पूना में थी।
मुल्ला नसरुद्दीन बोला, पूना में ही सही, लेकिन खबर तो खुशी की ही है।
चंदूलाल ने कहा, दूसरे, जहां तक मेरा सवाल है, मामला सिर्फ दस हजार का था, पचास हजार का नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, अरे दस हजार ही सही, बात तो फिर भी खुशी की ही है।
चंदूलाल ने कहा, तीसरे, वे दस हजार मैं जीता नहीं, हारा था।
यूं समझोगे तुम गीता। यूं ही समझोगे तुम बाइबिल। ऐसे ही समझोगे तुम कुरान।
समाचारपत्रों में मैंने एक खबर पढ़ी है। नई दिल्ली की पुलिस ने एक सरदार टैक्सी ड्राइवर को गिरफ्तार किया। उसका अपराध यह था कि उसने सड़क पार कर रहे एक आदमी को जमीन पर गिरा दिया था। पुलिस के अनुसार क्षमा मांगना तो दूर, टैक्सी के सरदार ड्राइवर ने उस आदमी के ऊपर टैक्सी को लाकर खड़ा कर दिया और बोला, उस्ताद, अब जब नीचे पड़े ही हो तो जरा आइल भी चेक कर दो।
ऐसा मौका क्या चूकना, जब पड़े ही हो तो आइल ही चेक कर दो। जब अवसर ही आ गया तो इसका उपयोग ही हो जाने दो। सरदार तो सरदार!
तुम जो पढ़ोगे, तुम ही तो पढ़ोगे न! तुम जो सुनोगे, तुम ही तो सुनोगे न! तुम जो समझोगे, तुम ही तो समझोगे न! काश तुम्हारे पास आंखें होतीं तो तुम ठीक समझते, ठीक सुनते, ठीक पढ़ते! आंख ही नहीं, तो कचरा इकट्ठा कर रहे हो। और कचरे को लोग ज्ञान समझ लेते हैं।
ज्ञान की चिंता छोड़ो, प्रेम की फिक्र लो। ज्ञान से परमात्मा नहीं मिलता, प्रेम से मिलता है। और ज्ञान और प्रेम बड़े विपरीत रास्ते हैं। ज्ञान तो थोथा है, कागजी है। कबीर ठीक कहते हैं: लिखा-लिखी की है नहीं, देखा-देखी बात। यह कोई लिखा-पढ़ी की बात है! यह कोई खाते-बही की बात है! यह तो देखा-देखी बात है। देखोगे तो।
मुक्ता, तू प्रश्न तो ठीक पूछती है कि पलटू ने सावधान किया: सहज आसिकी नाहिं! यह आसिकी क्या है?
देखा-देखी बात! और यह सारा अस्तित्व तैयार है। प्रेम करो--वृक्षों से, पक्षियों से, बादलों से, सूरज की किरणों से, चांदत्तारों से! इतना प्रेम के लिए उपाय है, इतने निमित्त हैं, और फिर भी आदमी प्रेम से वंचित है। आदमी भी गजब कर रहा है! चारों तरफ सरोवर है और प्यासा बैठा है। आनंद की वर्षा हो रही है और उसका घड़ा खाली का खाली है।
तो या तो तुमने घड़ा उलटा रखा है कि वर्षा होती है जरूर, मगर घड़े में भरती नहीं। या तुम्हारा घड़ा इतना भरा है पहले से, सीधा भी रखा हो, वर्षा होती है मगर तुम्हारे घड़े में जगह नहीं है; वहां गीता, कुरान, वेद, उपनिषदों का अंबार लगा है। अमृत जाए तो कहां जाए? बह जाता है, बाहर बह जाता है। और या फिर तुम्हारा घड़ा न तो उलटा है, न कचरे से भरा है, तो बहुत छिद्र हैं उसमें। अमृत भरता भी है तो टिक नहीं पाता। आया और गया। इधर आया, उधर गया। तुम खाली के खाली रह जाते हो।
ये तीन बातें खयाल रखनी जरूरी हैं। घड़ा सीधा हो। घड़े को सीधा कर लेना ही श्रद्धा का अर्थ है। जो नहीं कहता है, वह नास्तिक। जो हां कहता है, वह आस्तिक। हां किससे? जीवन से। तुम्हारे पुराने ढब के भगोड़े संन्यासियों को मैं आस्तिक नहीं कहता। जीवन को इनकार कर रहे हैं और तुम इनको आस्तिक कहते हो! ये नास्तिक हैं, निपट नास्तिक हैं! ये तुम्हारे अखंडानंद, मुक्तानंद, आत्मानंद और यह जो आनंदों की कतार है, ये भगोड़े हैं, ये नास्तिक हैं। ये जीवन को इनकार कर रहे हैं। ये कैसे प्रेम करेंगे?
जीवन को स्वीकार करो--आह्लाद से, अनुग्रह से, तो उस हां-भाव में, उस स्वीकृति में तुम्हारा घड़ा सीधा होगा। श्रद्धा में घड़ा सीधा होता है; उसका मुख आकाश की तरफ हो जाता है। फिर छिद्रों को बंद करो। छिद्र क्या हैं? व्यर्थ को देखते हो, यह छिद्र है। इससे आंख की ऊर्जा व्यय हो रही है। व्यर्थ को सुनते हो, यह छिद्र है। इससे कान की ऊर्जा व्यय हो रही है। व्यर्थ को पढ़ते हो, यह छिद्र है। और सब तरफ व्यर्थता की कतारें बंधी हुई हैं।
चंदूलाल से मुल्ला नसरुद्दीन ने पूछा, चंदूलाल, तुमने तलाक क्यों दिया?
चंदूलाल बोला, मेरी पत्नी ने मुझे बेवकूफ कहा।
नसरुद्दीन ने बोला, लेकिन तलाक के लिए यह कारण तो काफी नहीं है।
चंदूलाल बोला, भाई, दरअसल बात यह हुई कि एक दिन मैं दुकान से अचानक ही घर आ गया, तो क्या देखता हूं कि मेरी पत्नी मेरे पड़ोसी की बाहों में थी। मैंने पूछा इसका क्या मतलब? तो मेरी पत्नी ने जवाब दिया--बेवकूफ कहीं के, तुम्हें दिखता नहीं क्या?
यहां दिखता किसको है? यहां तो व्यर्थ को देख-देख कर आंखें थक गई हैं, दिखता किसको है? यहां तो सब बेवकूफ हैं इस लिहाज से। किसको सुनाई पड़ता है? और जो सुनाई पड़ता है वह कुछ का कुछ सुनाई पड़ता है।

कुर्बानी का गीत गाकर
नाच रही थी नतिनी
कूल्हा मटका कर,
कि ऊंचा सुनने वाली नानी ने
कहा झुंझला कर
इ गीत लिखे वाले भी अजब हैं
हमरे बखत भी किए गजब हैं,
दिल को बर्तन-भांडा बना कर
लिख दिहिन कि टुकड़े हजार हुए
कोई इहां गिरा, कोई उहां गिरा;
मगर अबरी तो हदे बेसर्मी किहिन
ऐसा अपवित्तर गीत लिख दिहिन--
कि सुने वाले को
तुरते पाप लग जाए,
जब घर की
जवान-धवान लड़की चीख के गाए--
कि आप जइसा कोई
हमरी जिंदगी में आए
तो बाप बन जाए...

कुछ का कुछ सुन रहे हैं लोग। कुछ का कुछ देख रहे हैं लोग। इस सब में जीवन-ऊर्जा क्षीण हो रही है।
जीवन को थोड़ा सत्कार दो, थोड़ा सम्मान दो, यूं न गंवाओ। यह बड़ा बहुमूल्य है; चूंकि यह अवसर है जिसमें परमात्मा मिल सकता है। इसकी सुरक्षा करो। तो छिद्रों को बंद करो। असार को मत देखो। असार को मत सुनो। असार को मत पढ़ो।
और फिर तीसरी बात ध्यान में रखो: घड़ा सीधा हो--श्रद्धापूर्वक, और घड़ा अछिद्र हो--क्योंकि व्यर्थ और असार छूट गया, तो अब घड़े को खाली कर लो। इसमें शास्त्रीयता, पांडित्य और थोथे शब्दों को मत रखे बैठे रहो। तो तुम्हारे जीवन में प्रेम का कमल आज खिल सकता है--अभी और यहीं!



दूसरा प्रश्न: भगवान,
गीता में कहा गया है कि हम जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल हमें भोगना पड़ेगा। जन्म-मृत्यु का चक्र तब तक चलता रहता है जब तक मोक्ष न मिले।
मैं इसी खोज में हूं कि जब पहली बार भगवान ने सृष्टि रची तो क्यों? हमें क्यों पैदा किया गया और हमें कर्म करने की चेतना क्यों दी गई? जो आज हमें पाप-पुण्य की परिभाषाएं सिखाई जा रही हैं, वे हमें क्यों बताई जा रही हैं?
कल आपने कहा कि मैंने बहुत संतों पर कहा है, आज तक किसी ने इतने महापुरुषों
पर नहीं कहा। क्या यह आपका अहंकार नहीं है? आप भगवान हैं तो आप इस तरह क्यों कहते हैं?
मैं उस भगवान से पूछती हूं कि यह कहां का न्याय है कि पैदा करके कहो कि यह करो वह न करो? अगर वह सृष्टि नहीं रचता तो आज कुछ भी नहीं होता। मुझे कभी-कभी न जाने क्या हो जाता है! आप मुझे स्थिर, तटस्थ रहने का कोई उपाय बताएं।

 कृष्णा पंजाबी,
बाई, तू गजब की है! हो न हो सिंधी है। सिंधी बाइयों के ज्ञान का तो क्या कहना! बाइएं तो मैंने बहुत देखीं, मगर सिंधी बाइएं तो लाजवाब हैं। और ज्ञान के पीछे तो हाथ धोकर पड़ी हैं। जरूर कोई दादा चूहड़मल फूहड़मल की तू शिष्या होगी। देखो क्या गजब की बातें पूछी हैं:
"गीता में कहा गया है कि हम जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल हमें भोगना पड़ेगा!'
मैंने गीता लिखी नहीं। मेरा कोई कसूर नहीं। जिसने लिखी हो गीता उससे पूछना। हालांकि कृष्ण की सोलह हजार पत्नियां थीं, मगर एक कृष्णा पंजाबी मिल जाती तो उन्होंने संन्यास ले लिया होता। उनमें एक भी सिंधी बाई नहीं थी, मैं तुझे पक्का कहता हूं। मैं भी बहुत शास्त्रों की खोज कर लिया कि एकाध सिंधी बाई तो थी कि नहीं, सोलह हजार में एक नहीं थी। नहीं तो तू उनकी गति कर देती।
सुना है मैंने, हर सफल लेखक के पीछे कोई स्त्री होती है और उस स्त्री के पीछे होती है उस लेखक की पत्नी। और पत्नी अगर सिंधी हो तो फिर कहना ही क्या! फिर सफलता सुनिश्चित है। वह तो ऐसे चाबुक चलाती है!
क्या गजब की बातें तू कह रही है, "गीता में कहा गया है...।'
तुझे क्या लेना-देना गीता से? गीता ने तेरा क्या बिगाड़ा है? और कोई काम नहीं? और गीता में कहा हो, इससे क्या कुछ सच हो जाता है?
कहती है कि "गीता में कहा गया है कि हम जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल हमें भोगना पड़ेगा।'
पहले तो गीता को सत्य मानो, तो फिर इस तरह की बातें उठेंगी, इस तरह के प्रश्न उठेंगे। कहा किसने कि गीता को सत्य मानो! मैं तो ध्यान के लिए कह रहा हूं; और तो कुछ गीता या कुरान या बाइबिल में अटको, यह मैं कह नहीं रहा हूं। मैं तो इस सबको कचरा कहता हूं। इससे तो छुटकारा पाओ। मगर वे दादा चूहड़मल फूहड़मल तेरी खोपड़ी में भर रहे होंगे इस तरह की बातें।
दादा चूहड़मल फूहड़मल सत्संग करवा रहे थे। एक सिंधी बाई सामने ही बैठी सत्संग कर रही थी। बगल में ही बाई का पुत्तर भी बैठा हुआ था। पुत्तर बीच में ही बोल उठा सत्संग के कि मुझे पेशाब लगी है। दादा बहुत नाराज हो गए। दादा ने सिंधी बाई को कहा कि देख, सत्संग में और ऐसे...बीच सत्संग में इस तरह के शब्दों का उपयोग? अपने पुत्तर को कुछ ज्ञान नहीं समझाती?
तो बाई ने कहा, मैं इसको क्या ज्ञान समझाऊं? इसको लगी सो लगी। अब इसमें कोई क्या कर सकता है?
तो दादा ने कहा, अरे इतना तो कर सकती है कि तू इसको कह दे कि सत्संग में इस तरह के शब्द नहीं बोलते। कोई भी सांकेतिक शब्द रख ले।
तो बाई ने पूछा, आप ही बताइए, कौन-सा सांकेतिक शब्द?
तो उन्होंने कहा, समझ लो कि इसको बता दो कि जब तुझे पेशाब लगे तो कहा करे कि मुझे गाना गाना है। बस तू समझ जाना कि क्या इसका मतलब है। एक कोड शब्द बना लिया कि गाना गाना है। तू समझ जाएगी; कोई समझेगा नहीं कि बात क्या है। सो उठा कर ले गए और गाना गवा दिया, कहीं भी गवा दिया। कोई हिंदुस्तान में गाना गवाने में दिक्कत है, कहीं भी गवा दो। इस कोने, उस कोने, सड़क पर, नाली में, कहीं भी गवा दिया। किसी को पता भी नहीं चलेगा, फिर वापस अपने सत्संग में आ गए।
बात सिंधी बाई को जंची। लड़के को समझाया। लड़के ने भी कहा कि बात तो ठीक है।
कोई छह महीने बाद दादा चूहड़मल फूहड़मल उसी बाई के घर मेहमान हुए। पड़ोस में किसी की मौत हो गई। सो बाई ने चूहड़मल फूहड़मल को कहा कि आप जरा पुत्तर को सम्हालना, मैं जरा पड़ोस में कोई मृत्यु हो गई है, वहां होकर आती हूं। चूहड़मल फूहड़मल पुत्तर को लेकर बिस्तर पर सो रहे। कोई रात के दो बजे पुत्तर ने उन्हें हिलाया कि दादा-दादा, गाना गाऊंगा। चूहड़मल फूहड़मल को बड़ा क्रोध आया कि हद हो गई बदतमीजी की! अरे रात को कोई दो बजे गाना गाता है! अरे कमबख्त, चुप हो! यह कोई वक्त है गाना गाने का? बड़े गायक बने हैं! चुपचाप सो जा!
थोड़ी देर पुत्तर चुप रहा, मगर वह चुप रहे भी कैसे। उसने फिर कहा कि दादा, गाना मानता ही नहीं, मैं तो गाऊंगा। आप कितना ही रोको, अब तो रोके नहीं रुकता।
चूहड़मल फूहड़मल ने बहुत सत्संग करवाए थे, कई गीता-ज्ञान-यज्ञ करवा चुके थे। मगर ऐसा प्रश्न किसी ने खड़ा नहीं किया था कि रुकता ही नहीं। दादा ने कहा, अरे मैं ऐसे बहुत बड़े सत्संग करवा चुका हूं, बड़े-बड़े प्रश्न करने वालों को हरा चुका हूं। वाद-विवाद में मुझसे कोई जीत नहीं सकता। और तू कह रहा है गाना रुकता ही नहीं! गाना भी कोई ऐसी चीज है कि जिसमें कोई बड़ा संयम साधना पड़ता है? चुपचाप सो जा! अरे चार-छह घंटे की बात है, सुबह उठ कर गाना। जो करना हो सुबह करना। और मुझे भी सोने दे, दिन भर मैं भी सत्संग करके थक गया हूं। आखिर साधु-संतों को भी सोना तो पड़ेगा ही, विश्राम तो करना ही पड़ेगा।
डांट-डपट दिया तो पुत्तर फिर चुप रह गए, लेकिन पुत्तर चुप रहे कैसे! उसने फिर दादा से कहा कि दादा, आप लाख कहो, अगर अब आपने रोका तो गाना यहीं निकल पड़ेगा। फिर मत कहना। पूरे बिस्तर पर गाना ही गाना हो जाएगा।
दादा ने कहा, हद तरह का गाना है! न सोने देता है दुष्ट और ऐसा कैसा गाना कि पूरे बिस्तर पर गाना ही गाना हो जाएगा! अरे मूर्ख, तुझे गाना गाना आता भी है?
उसने कहा, आता है। अरे रोज गाता हूं, कई दफे गाता हूं। और रात में तो हमेशा गाता हूं। दोत्तीन दफे तो गाता ही हूं। यह तो पहली दफे है।
दादा ने कहा, हद हो गई। वह तेरी बाई, तेरी मां कहां गई है, दुष्ट अभी तक नहीं लौटी! और इसको पीछे लगा गई मेरे। यह कह रहा है कि दोत्तीन दफे गाना ही होगा। और मोहल्ले वाले जग जाएं, कोई क्या कहेगा! और न तू खुद सोता न मुझे सोने देता।
उस लड़के ने कहा, अब आप कुछ भी कहो, अब तो मैं एक दो तीन कह कर एकदम से...तीन मैंने कहा कि आप समझ लेना गाना निकल जाएगा। एक...दो...।
दादा ने कहा, ठहर-ठहर! तू मेरे कान में गा दे चुपचाप। और गुनगुनाना, जोर से भी नहीं गाना।
तो पुत्तर क्या करे, अंधेरे में कान खोज कर उसने दादा के गा दिया। गुनगुना दिया! अरे गुनगुनाया क्या, भनभना दिया। क्योंकि रोके हुए था, संयम साधे हुए था। जैसा आदमी योग से भ्रष्ट हो, ऐसा एकदम संयम साधे हुए था, गुनगुना दिया। बिस्तर पर गाना ही गाना हो गया। दादा नहा गए। दादा ने कहा, अरे नालायक! इसको गाना कहते हैं? यह गाना है? हरामजादे! भाषा को भी भ्रष्ट कर दिया।
उस पुत्तर ने कहा, दादा, आपने ही तो मेरी मां को बताया था। मैं उसी का पालन कर रहा हूं। मुझे क्या पता कि भाषा भ्रष्ट हो गई। आपने ही बताया था!
तब दादा को खयाल आया कि धत तेरे की! अपनी ही तरकीब में फंस मरे!
अब ये तू जो बातें कर रही है, ये ऐसे ही दादाओं से सुन ली होंगी। ये चूहड़मल फूहड़मल कई स्त्रियों को सत्संग करवा रहे हैं। स्त्रियों के सिवा कोई सत्संग करने जाता ही नहीं। अब "गीता में कहा गया है कि हम जैसा कर्म करेंगे...।' तेरी मर्जी बाई, कर। जैसा कर्म करना हो कर। "वैसा ही हमें फल भोगना पड़ेगा।' अब भोग! गाओ गाना! गुनगुनाओ, भनभनाओ, जो करना हो करो। गीता में तो कहा है। अरे गीता में कहा है तो मैंने कोई गीता का ठेका लिया है?
"जन्म-मृत्यु का चक्र तब तक चलता रहता है जब तक मोक्ष न मिले।'
यह भी खूब बात कही! ये दादागण जो समझाते फिरते हैं, इनसे यह भी तो पूछा करें...ये क्या-क्या बातें समझाते हैं! पहले कहते हैं, जन्म-मृत्यु का चक्र तब तक चलता रहता है जब तक मोक्ष न मिले। मोक्ष कब मिलता है? जब जन्म-मृत्यु का चक्कर खतम हो जाता है। अब पड़ गया चक्कर पूरा। अब इसमें से बचोगे कैसे? इसमें रास्ता ही न रहा बाहर निकलने का। मोक्ष तब मिलेगा जब जन्म-मृत्यु का चक्कर छूटे! और जन्म-मृत्यु का चक्कर कब छूटेगा? तब छूटेगा जब मोक्ष मिलेगा। अब कौन आगे, अंडा कि मुर्गी? पहले चक्कर छूटेगा, मोक्ष मिलेगा? कि पहले मोक्ष मिलेगा, फिर चक्कर छूटेगा? दोनों ही बातें कह रहे हैं ये ज्ञानीजन।
और तू कह रही है, "मैं इसी खोज में हूं कि जब पहली बार भगवान ने सृष्टि रची थी तो क्यों?'
अब पहले तो मजा यह कि किसने तुझसे कह दिया कि भगवान ने सृष्टि रची? हम अजीब-अजीब बातें मान लेते हैं और फिर उनमें से प्रश्न उठने लगते हैं। इसलिए तो मैं कहता हूं: कुछ न मानो। क्योंकि तुमने कुछ माना कि चक्कर में पड़े।
अब पहले तो यह मान लिया कि परमात्मा ने सृष्टि रची। यह कैसे मान लिया? देखा तूने? कृष्णा पंजाबी, तूने देखा कि परमात्मा ने सृष्टि रची? और अगर तूने देखा सृष्टि रची, तो उसका मतलब है कि वह तो सृष्टि रच रहे थे, तू तो पहले ही से मौजूद थी। मतलब पंजाब तो पहले ही, सिंध तो पहले ही बन चुका था। पंजाबी-सिंधी मौजूद ही थे। तो देखा तो किसी ने नहीं, क्योंकि अगर किसी ने देखा हो तो उसका मतलब कि सृष्टि तो पहले से ही चल रही थी, ये भैया कहां से आए? ये खड़े होकर वहां क्या कर रहे थे?
परमात्मा ने सृष्टि रची, यह किसी ने देखा नहीं। यह लोग माने बैठे हैं। और माने क्यों बैठे हैं, क्योंकि अजीब-अजीब प्रश्न लोग उनको खड़ा करवा देते हैं। कहते हैं सृष्टि किसने रची; क्योंकि हर चीज का बनाने वाला होना चाहिए तो सृष्टि का भी कोई बनाने वाला होगा। चलो, बड़ी ऊंची बात कह रहे हो; फिर सवाल यह उठेगा: उस बनाने वाले का कौन बनाने वाला है? क्योंकि हर चीज का बनाने वाला होना चाहिए। अब चक्कर से घनचक्कर शुरू हुआ। नंबर एक का परमात्मा नंबर दो के परमात्मा ने बनाया, नंबर दो का परमात्मा नंबर तीन के परमात्मा ने बनाया। अब चले। अब इसका कहीं अंत ही न आएगा। जहां भी जाकर रुकोगे, सवाल यह उठेगा कि इस परमात्मा को किसने बनाया? क्यों बनाया?
तू कह रही है कि "मैं इसी खोज में हूं कि जब पहली बार भगवान ने सृष्टि रची तो क्यों?'
कभी रची ही नहीं। भगवान कोई व्यक्ति नहीं है। लेकिन बुद्धू इसी तरह की बातें समझा रहे हैं कि भगवान ऐसे जैसे कुम्हार घड़े रचता है। इसलिए वह भी एक कुंभकार है। जैसा कुम्हार घड़े रचता है ऐसे ही भगवान घड़े रच रहा है। काहे को रच रहा है? कायकू रचे? शांति से रहते नहीं बनता? गाना गाएगा ही गाएगा! आधी रात, मगर गाना गाना है। कायकू गाना है। कोई शांति से रहने में तकलीफ हो रही है उनको? इतना सब उपद्रव पैदा करना!
परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं है। परमात्मा कोई स्रष्टा नहीं है--सृजन की प्रक्रिया का नाम है, सृजनशीलता का नाम है।
इसलिए तू इस चिंता में न पड़ कि भगवान ने सृष्टि क्यों रची पहली बार! तो पहली बार के पहले क्या था? सन्नाटा ही सन्नाटा, कि दादा चूहड़मल फूहड़मल सो रहे हैं, कोई गाना गाने वाला ही नहीं है, सन्नाटा ही सन्नाटा। पहले के पहले भी तो कुछ होगा। और नहीं तो पहली बार एकदम से अचानक...एकदम से गाना गाने का खयाल आ गया! अनंत काल से पड़े रहे और फिर एकदम से गुनगुनाने लगे। इतनी देर तक क्यों पड़े रहे, यह भी सवाल उठेगा। दो दिन पहले गाते तो क्या हर्जा था? चार दिन पहले गाते तो क्या हर्जा था? या और दो-चार दिन रुक जाते तो क्या हर्जा था? कौन-सा कारण, कौन-सी विपदा आ गई एकदम से इनके ऊपर कि संसार बना कर रहेंगे! और संसार ही बनाते तो कम से कम कृष्णा पंजाबी को तो न बनाते! बेचारी को क्यों झंझट में डाला? इसका क्या कसूर?
अब कहते हो कि पिछले जन्म में जैसा कर्म किया उसका फल भोगना पड़ता है। मगर इसने सृष्टि के पहले तो कोई कर्म कृष्णा पंजाबी ने किया ही नहीं होगा। सृष्टि ही नहीं थी, कर्म कैसे करती? खुद ही नहीं थी, तो कर्म कैसे करती? तो फिर काहे को इस बेचारी को उलझा दिया? अब यह कैसी झंझट में पड़ी है?
कहती है, "मैं इसी खोज में हूं कि जब पहली बार भगवान ने सृष्टि रची तो क्यों?'
न कभी भगवान तुझे मिलेगा, न कभी तू पूछ पाएगी। तू नाहक परेशान न हो।
और कहती है, "हमें क्यों पैदा किया गया? और हमें कर्म करने की चेतना क्यों दी गई? जो आज हमें पाप-पुण्य की परिभाषाएं सिखाई जा रही हैं, वे हमें क्यों बताई जा रही हैं?'
सब तुम्हारी मान्यता की बात है। मैं तो यहां किसी को पाप-पुण्य की कोई परिभाषा नहीं बता रहा हूं। मैं तो यहां किसी को नहीं कह रहा हूं कि परमात्मा ने सृष्टि रची। जो है वह सदा से है और सदा रहेगा। ऐसा कभी न था कि न हो और ऐसा भी कभी न होगा कि न हो जाए। जो है वह है। उसके मिटने का कोई उपाय नहीं, न बनने का कोई उपाय है। बनेगा तो कहां से बनेगा? शून्य से कुछ बनता है? और क्या जो है वह कभी शून्य हो सकता है? असंभव। सत्य वही है जो सदा है। इसलिए पहली बार की बात छोड़। ऐसा कभी नहीं था कि संसार न हो। जीवन सदा से है। और किसी की जिम्मेवारी नहीं है, बस ऐसा है। एस धम्मो सनंतनो। ऐसा ही स्वभाव है अस्तित्व का--होना। किसी के ऊपर कोई जिम्मेवारी नहीं।
और पाप-पुण्य की कोई परिभाषा दूसरा तुम्हें क्यों देगा? पाप-पुण्य की परिभाषा तो स्वयं की दृष्टि से अनुभव में आनी शुरू होती है। अगर रास्ते पर कांटे पड़े हों तो तुम बच कर निकल जाती हो कृष्णा पंजाबी कि नहीं? कोई पूछेगा, क्यों बच कर निकलती है? तू कहेगी कि कष्ट होता है कांटों से, इसलिए बच कर निकलती हूं। फूल की माला बना लेती है। कोई पूछेगा, क्यों? क्योंकि सुगंध और आनंद आता है। बस ऐसा ही पाप-पुण्य है। पाप वह जिससे कष्ट होता है--कांटे। और पुण्य वह--फूलों की माला--जिससे सुख होता है। इसमें किसी के बताने न बताने का सवाल नहीं है। यह तुम्हारे भीतर ही, तुम्हारा अंतःकरण ही नियंता है। वह प्रतिपल कह रहा है--क्या करने से सुख होता है, क्या करने से दुख होता है। और सुख की स्वाभाविक खोज है और दुख से स्वाभाविक बचने की आकांक्षा है। इसमें किसी परमात्मा का कोई हाथ ही नहीं।
आखिर जैन धर्म है, ईश्वर को नहीं मानता, परमात्मा को नहीं मानता, फिर भी धर्म है। बौद्ध धर्म है, किसी परमात्मा को नहीं मानता। परमात्मा की तो बात छोड़ दो, आत्मा को भी नहीं मानता। फिर भी धर्म है। और फिर भी बौद्धों ने अदभुत तरह के लोग पैदा किए--अपूर्व प्रकाश से भरपूर, अपूर्व आनंद से जगमगाते हुए! खूब दीए जलाए! सच तो यह है कि बुद्ध ने जितने दीए जलाए इस पृथ्वी पर किसी ने भी नहीं जलाए। न आत्मा को मानते, न परमात्मा को मानते। मानने का सवाल ही नहीं। मानने से तो और उपद्रव खड़ा होता है।
ये तूने जितने प्रश्न पूछे हैं, ये सब माने हुए हैं। पहले तो मान लिया और फिर प्रश्न पूछने लगे। मानना ही क्यों? शून्य से शुरुआत करो। शून्य का नाम ध्यान है। अपने मन को बिलकुल खाली कर लो--सारी धारणाओं से, सारी विचारणाओं से। ये गीता, कुरान, वेद, सबको विदा दे दो, नमस्कार कर लो। चित्त को शून्य करो। और उस शून्य चित्त में तुम्हें सारे उत्तर मिल जाएंगे, उत्तरों का उत्तर मिल जाएगा।
और इस आशा में कृष्णा पंजाबी मत बैठी रह कि कभी परमात्मा मिलेगा तो उससे पूछ लेंगे। है ही नहीं कहीं कोई मिलने वाला। और अगर होता भी तो इतना मैं कहे देता हूं कि सिंधी बाई से नहीं मिलेगा। क्योंकि कौन तुझसे सिर मारेगा? इन प्रश्नों के उत्तर परमात्मा कहां से लाएगा? तुझे देख कर ही भाग खड़ा होगा। मिल भी जाता होगा कभी तो इधर-उधर बच जाता होगा, छिप जाता होगा, कि कृष्णा पंजाबी आ रही है! यह सत्संगी बाई आ रही है!
अब तूने कहा, "कल आपने कहा कि मैंने बहुत संतों पर कहा है, आज तक किसी ने इतने महापुरुषों पर नहीं कहा। क्या यह आपका अहंकार नहीं?'
निश्चित है। इसमें क्या शक है! और जब कृष्ण को तूने गीता में पढ़ा होगा और वे कहते हैं अर्जुन से--मामेकं शरणम् व्रज, सर्वधर्मान् परित्यज्य। सब धर्मों को छोड़ कर ऐ अर्जुन, मेरी शरण आ--क्या है? अहंकार है। साफ है, अरे और क्या अहंकार होगा? हद हो गई! शर्म भी न आई, लाज नहीं, संकोच नहीं! जिसके सारथी बने बैठे हैं, उसी से कह रहे हैं, मेरी शरण आ। उसके ही घोड़ों को नहलवाते हैं। उसके ही घोड़ों को साफ करते हैं, दाना डालते हैं, चारा डालते हैं। उनकी ही लगाम पकड़े बैठे हैं। अर्जुन रथ में बैठा हुआ है, कृष्ण सारथी हैं। हद हो गई!
जैसे तुम्हारा कोचवान तुमसे कहने लगे--सर्वधर्मान् परित्यज्य, मामेकं शरणम् व्रज! जैसे कृष्णा पंजाबी आई होगी रिक्शा में बैठ कर, रिक्शा वाला कहे--बाई, छोड़ सब, मेरी शरण आ! अहंकार है, साफ अहंकार है, हद हो गई! रिक्शा वाला भी हद कर रहा है! एक तो मीटर से ज्यादा पैसे ले रहा है और ऊपर से कह रहा है कि मेरी शरण आ, बाई कहां जा रही है? अरे मैं ही सत्संग करवा दूंगा। सर्वधर्मान् परित्यज्य! साफ बात है कि अहंकार है।
बुद्ध ने कहा है कि जैसा निर्वाण मैंने पाया, मुझसे पहले किसी ने भी नहीं पाया। साफ है अहंकार है। मुझसे पहले किसी ने भी नहीं पाया! अरे हद हो गई! अनंत काल बीत गया और तुम यह कह रहे हो कि जैसा निर्वाण मैंने पाया, मुझसे पहले किसी ने भी नहीं पाया। और जीसस ने कहा कि मैं परमात्मा का इकलौता बेटा हूं। देख रहे हो तरकीब--इकलौता। दूसरे को मौका ही नहीं छोड़ रहे। अहंकार है! उपनिषद के ऋषि कहते हैं: अहं ब्रह्मास्मि! अब यह तो शुद्ध अहंकार हो गया। मैं ब्रह्म हूं! हद हो गई। अगर कहा होता कि मैं भरम हूं तो ठीक था, मगर ब्रह्म हूं! भरम देवता होते तो भी ठीक था। मगर मैं ब्रह्म हूं--खुद ही कह रहे हैं, अपने ही मुंह से कह रहे हैं। अपने मुंह से मियां मिट्ठू बने हुए हैं। और अलहिल्लाज मंसूर, सूफी फकीर कहता है: अनलहक! मैं सत्य हूं! ठीक किया लोगों ने, उतार दी गर्दन, काट दिए हाथ-पैर, जबान काट दी। पापी है, काफिर है, कुफ्र बोलता है। अहंकार की बातें करता है कि मैं सत्य हूं।
ठीक कहती है कृष्णा पंजाबी कि जो मैंने यह कहा कि आज तक किसी ने इतने महापुरुषों पर नहीं कहा, तो निश्चित ही अहंकार है। मगर मैं क्या करूं, किसी ने कहा ही नहीं। मेरी भी मजबूरी समझ। मेरी भी तकलीफ समझ। अब मैं क्या करूं, किसी ने कहा ही नहीं! कहा हो किसी ने, तू बता दे। तथ्य ही बोल रहा हूं, इसमें अहंकार कुछ भी नहीं है। सीधा-सीधा तथ्य। न लाओत्सु ने कहा, न बुद्ध ने कहा, न महावीर ने कहा, न राम ने कहा, न कृष्ण ने कहा, न जीसस ने कहा, न मोहम्मद ने कहा। और मैं सत्य ही बोल रहा हूं। अब अगर सत्य बोलने में भी अहंकार आता हो तो क्या तू कहती है कृष्णा पंजाबी, झूठ बोलने लगूं? सिर्फ इस खयाल से कि कहीं किसी को यह खयाल न आ जाए कि अहंकार हो गया? क्या कहूं कि नहीं, मुझसे पहले बहुत लोगों ने कहा? और कहा किसी ने नहीं, तो फिर तो बात बिलकुल झूठ हो जाएगी। सो मैं अहंकार को स्वीकार कर सकता हूं, मगर झूठ नहीं बोल सकता।
और अहंकार तुझे दिखाई पड़ता है, मेरी तरफ से तो कोई अहंकार नहीं। अगर अहंकार होता तो बुद्ध पर बोलता ही क्यों? महावीर पर बोलता ही क्यों? कृष्ण पर बोलता ही क्यों? जीसस पर बोलता ही क्यों? अगर अहंकार ही होता तो जो बातें मुझे कहनी हैं वे सीधी ही कह देता। क्या जरूरत थी इन सब पर बोलने की?
इन सब पर इसीलिए बोल रहा हूं कि तुमसे कहना चाहता हूं, मेरी अपनी कोई बात नहीं। सत्य किसी का नहीं; मेरा नहीं, इतना तो निश्चित है। सत्य सबका है। इसलिए सबकी गवाहियां तुम्हें दे रहा हूं। इन सबमें वही है जो मैंने जाना और जो तुम भी जान सकती हो। मगर मेरे जैसे व्यक्ति तो दर्पण होते हैं; उनमें तुम्हें अपनी ही शक्ल दिखाई पड़ जाती है। तू भयंकर अहंकार से पीड़ित होगी। तुझे इसमें अहंकार दिखाई पड़ गया, सिर्फ तथ्य की सूचना थी।
अब तू कहती है, "आप भगवान हैं तो आप इस तरह क्यों कहते हैं?'
अरे इसीलिए तो कहता हूं! जब भगवान ही हूं तो अब क्या अहंकार से डरवाएगी मुझे? अब मुझे तू किसी चीज से नहीं डरवा सकती। जो तुम्हारी इन बातों से डर जाते हैं, मैं उन लोगों में से नहीं हूं। भगवान हूं, अब क्या डरना! अहं ब्रह्मास्मि! अब क्या डरना? कायकू डरना? अब जब मुझे अपनी भगवत्ता का ही पता चल गया तो अब कैसा अहंकार?
मगर तुझे दिखाई पड़ा होगा, क्योंकि तू जिन दादाओं का सत्संग करती रही होगी, वे बड़ी विनम्रता की बातें करते हैं, कि हम तो आपके पैर की धूल हैं।
मेरे पास ऐसे एक दादा आ गए, कि मैं तो आपके पैर की धूल हूं। मैंने कहा, आप कहिए ही मत। मुझे पहले से ही पता है। आप हैं।
वे तो बड़े नाराज हो गए। भन्ना गए कि आप किस तरह की बात करते हैं! आप बड़ी अहंकार की बात करते हैं।
आपने खुद कही, मैंने तो कही नहीं थी। मैंने तो सिर्फ स्वीकृति भरी। आपने कहा कि आपके पैर की धूल हूं, मैंने कहा कि बिलकुल ठीक, बिलकुल सच्ची बात कह रहे हैं। लगते ही हैं आप बिलकुल पैर की धूल! सो मेरा जी खुद ही झाड़ने का हो रहा है कि कब पैर से झाडूं! आप न कहते तो मैंने उठाई न थी बात।
मगर वे बेचारे इसलिए थोड़े ही कह रहे थे कि मान लो। वे यह इसलिए कह रहे थे कि उनसे कहो कि अहा, आप कैसे विनम्र हैं, आप कितने निरहंकारी हैं। तब प्रसन्न होता चित्त। मुझे कोई चिंता नहीं होती इस बात से कि कोई मुझे अहंकारी कहे। कहो। तुम्हारी जबान है, जो तुम्हारे दिल में आए कहो। मैं जो हूं सो हूं। अहं ब्रह्मास्मि! अनलहक! तुम्हें जो कहना हो कहो। और जब भगवान ही हूं तो अब क्या डराओगी मुझे अहंकार इत्यादि छोटे-मोटे शब्द लाकर?
तू कहती है, "मैं उस भगवान से पूछती हूं कि यह कहां का न्याय है कि पैदा करके कहो कि यह करो वह न करो?'
बाई, तू उसी से पूछ। मैंने तुझे पैदा नहीं किया, इतना पक्का है। मैं तुझे पहचानता भी नहीं, पैदा करना तो बिलकुल दूर। जिसने किया हो उसी से तू पूछ।
"अगर वह सृष्टि नहीं रचता तो आज कुछ भी नहीं होता।'
सच्ची बात! बिलकुल सत्य वचन। अरे न तू होती, न मैं होता। सृष्टि ही नहीं होती तो बात ही खतम थी। खेल खतम, पैसा हजम!
"मुझे कभी-कभी न जाने क्या हो जाता है।'
अरे कभी-कभी, तुझे होता होगा हमेशा।
"आप मुझे स्थिर, तटस्थ रहने का कोई उपाय बताएं।'
नहीं बाई, मैं तो न बताऊंगा, क्योंकि उसमें अहंकार हो जाए, कि आपने मुझे उपाय बताया, आप कौन हैं उपाय बताने वाले? आप बड़े ज्ञानी! क्योंकि उपाय तो ज्ञानी अज्ञानी को बताता है, गुरु शिष्य को बताता है। अगर मैं कहूं कि मैं तेरा गुरु हूं, तो झंझट, अहंकार हो जाए। अगर उपाय बताऊं तो झंझट, अहंकार हो जाए।
अब तू कह रही है, "मुझे स्थिर, तटस्थ रहने का कोई उपाय बताएं।'
बाई, तू उसी से पूछ लेना जिसने संसार बनाया और जिसने तुझे बनाया और जिसने ऐसी झंझटें खड़ी कीं। तू मुझे क्षमा कर। मुझे तो बहुत जोर से गाना गाना है।

आज इतना ही।