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मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-04

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

संन्यास यानी नया जन्म—प्रवचन-चौथा

दिनांक 04 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
गुरुरेव हरिः साक्षान्नान्य इत्यव्रबीच्छ्रुतिः।।
श्रुत्या यदुक्तं परमार्थमेतत्
      तत्संशयो नात्र ततः समस्तम्।
श्रुत्या विरोधे ने भवेत्प्रमाणं
      अवेदनर्थाय विना प्रमाणम्।।
श्रुति में कहा गया है कि गुरु ही साक्षात हरि हैं, कोई अन्य नहीं। श्रुति का कथन निस्संदेह परमार्थ रूप ही है। श्रुति का विरोधी होने पर कुछ भी प्रमाण नहीं है। जो अप्रमाण होगा वह अनर्थकारी होगा।
भगवान, ब्रह्मविद्या उपनिषद के इस सुभाषित की व्याख्या करने की कृपा करें।

 सत्यानंद,

श्रुति का अर्थ होता है, जो सुना। जो सुना वह सत्य कभी नहीं होता। जो देखा वही सत्य होता है। जो जाना वही सत्य होता है। अनुभव के अतिरिक्त और कोई प्रमाण नहीं है। श्रुति भी प्रमाण नहीं है।
लेकिन शास्त्र स्वयं के ही प्रचार में संलग्न रहते हैं। प्रत्येक शास्त्र भय भी देता है कि अगर मुझे न माना तो नर्क; लोभ भी देता है कि अगर मुझे माना तो स्वर्ग। और लोग इन्हीं भय और इन्हीं प्रलोभनों के बीच शास्त्रों को स्वीकार करते हैं। वह स्वीकृति वासना की स्वीकृति है। उस स्वीकृति में कोई आत्म-साक्षात का संबंध नहीं है।
यह सूत्र चाहे ब्रह्मविद्या उपनिषद का हो चाहे किसी और उपनिषद का--मूलतः गलत है।
गुरुरेव हरिः साक्षान्नान्य इत्यव्रबीच्छ्रुतिः।
"श्रुति कहती है कि गुरु ही साक्षात हरि हैं, कोई अन्य नहीं।'
श्रुति लाख कहे, इससे क्या होता है? निश्चित ही श्रुति कहेगी कि गुरु ही ब्रह्म और गुरु कहेंगे कि श्रुति ही प्रमाण। ऐसी साजिश है। श्रुति गुरुओं को कहेगी ये हरिरूप और गुरु कहेंगे कि श्रुति में जो है वही सत्य और जो श्रुति में नहीं है वह असत्य। मगर कौन-सी श्रुति? श्रुतियां तो बहुत हैं। जिन्होंने बुद्ध से सुना है वह भी श्रुति है। लेकिन बुद्ध तो कुछ और कहते हैं। कहते हैं: अप्प दीपो भव। अपने दीए खुद बनो, क्योंकि कहीं और कोई रोशनी नहीं है। सिवाय तुम्हारे भीतर, सिवाय तुम्हारी आत्मा के, कहीं और प्रकाश नहीं है। बुद्ध तो कहते हैं: मेरी मत मानना। जब तक न जानो स्वयं तब तक किसी की भी न मानना। तुम ही प्रमाण हो। तुम्हारे अतिरिक्त और कोई प्रमाण नहीं है। और सब प्रमाण धंधेबाजों के हाथ में पड़ जाते हैं, धोखेबाजों और बेईमानों के हाथ में पड़ जाते हैं। और सब प्रमाण शोषण का आधार बन जाते हैं। सिर्फ एक ही है उपाय कि तुम शोषण से बच सको और वह है कि तुम्हारे भीतर की ज्योति आविष्कृत हो।
तो बुद्ध ने कहा है: मैं बुद्ध हूं, इसलिए मत मानना; मेरी बात प्रीतिकर लगती है, इसलिए मत मानना। मेरी बात शास्त्रों के अनुकूल है, इसलिए मत मानना। फिर किसलिए मानना? तब तक मानना ही नहीं जब तक तुम स्वयं इसके गवाह न हो जाओ।
यह भी श्रुति है। श्रुति का अर्थ होता है--जो सुना गया। इसलिए प्रत्येक बौद्ध शास्त्र शुरू होता है, ऐसा मैंने सुना है, इस वचन से। बुद्ध के सारे शब्द आनंद ने संगृहीत किए हैं। और आनंद बहुत ईमानदार है इस अर्थों में। ईमानदारी उसकी पहले ही वचन से शुरू हो जाती है। वह कहता है, ऐसा बुद्ध ने कहा है, यह मेरा दावा नहीं। ऐसा मैंने सुना है। उन्होंने क्या कहा था वही जानें। उन्होंने जो कहा था उसे जानने की मेरी क्या सामर्थ्य थी। वे तो बोलते थे किसी दूर स्वर्ण-शिखर से, प्रकाशोज्ज्वल गौरीशंकर से। मैं सुनता था छुपा अपनी अंधेरी गुफा में। गहन अंधकार से मैंने सुना है। उन्होंने अनंत प्रकाश से कहा है। अब प्रकाश की भाषा अंधेरे की भाषा नहीं है। प्रकाश की बात अंधेरा समझेगा तो कैसे समझेगा?
इसलिए आनंद बहुत निष्ठापूर्वक, बहुत ईमानदारी से कहता है, ऐसा मैंने सुना है। उन्होंने कहा या नहीं, वही जानें। मैंने अपने बहरेपन में ऐसा सुना। मैंने अपने अंधेपन में ऐसा सुना। ऐसा समझा। जितनी मेरी समझ थी, जितनी मेरी औकात थी, जितनी मेरी बिसात थी, उतना मैं समझ पाया। मेरी बुद्धि जितनी थी। मेरे पास ध्यान तो न था, समाधि तो न थी। मैं गवाह तो न था उनके सत्य का। मैं यह तो न कह सकता था कि हां, यह सही है क्योंकि मैंने भी ऐसा देखा है। इसलिए इतना ही कह सकता हूं कि जैसा मैंने सुना है वह संगृहीत कर देता हूं।
प्रत्येक बौद्ध शास्त्र इसी वचन से शुरू होता है--ऐसा मैंने सुना है। बुद्ध विचरण करते थे वैशाली में, ऐसा मैंने सुना उन्हें कहते। बुद्ध जंगल में ठहरे थे, ऐसा मैंने उन्हें कहते सुना। बुद्ध नदीत्तट पर रुके थे, ऐसा मैंने उन्हें कहते सुना।
श्रुति, लेकिन कौन-सी श्रुति? महावीर को भी सुना है। जीसस को भी सुना है लोगों ने। मोहम्मद को भी सुना है। जिन्होंने सुना है उन्होंने लिखा है। और सुनने वाले और बोलने वाले में बहुत फर्क है, जमीन-आसमान का फर्क है। कहां आकाश के तारे और कहां जमीन पर पड़े हुए पत्थर! आकाश के तारे बोलते हैं, जमीन पर पड़े पत्थर सुनते हैं। फिर व्याख्या होती है। फिर विवाद उठते हैं। फिर तरहत्तरह की टीकाएं होती हैं, अनुवाद होते हैं, शब्दों और तर्कों का जाल फैलता है। न तो बुद्ध ने कुछ लिखा, न जीसस ने कुछ लिखा, न महावीर ने कुछ लिखा। बोले। जिन्होंने सुना उन्होंने लिखा। श्रुति का इतना ही अर्थ होता है।
शास्त्रों के लिए दो शब्दों का हम प्रयोग करते हैं--एक श्रुति और एक स्मृति। श्रुति कहते हैं उस शास्त्र को जिसे सीधा-सीधा सुना हो। बुद्ध ने कहा और आनंद ने सुना, सामने-आमने, बुद्ध के पास बैठ कर सुना--तो श्रुति। फिर आनंद ने किसी से कहा और उसने सुना, तब बात और बिगड़ गई। तब स्मृति। तब तो मात्र स्मृति रह गई, क्योंकि आनंद के पास आते तक ही वह पूर्णता न रह गई थी, वह सौंदर्य न रह गया था, वह सत्य न रह गया था। अब आनंद से जब बात और किसी के पास गई, हाथों से हाथ, हाथों से हाथ चली, तो जैसे करेंसी के नोट हाथों से चलते-चलते गंदे होते जाते हैं, ऐसे ही शब्द भी एक अंधेरे से दूसरे अंधेरे के हाथ में पड़ते हैं, एक अंधे से दूसरे अंधे के हाथ में पड़ते हैं, तो गंदे होते चले जाते हैं। उनमें धूल इकट्ठी होती जाती है। उनमें व्यर्थ का बोझ बढ़ता चला जाता है। उनमें सार तो खो जाता है, असार सघन हो जाता है। तब स्मृति। और शास्त्रों के लिए ये दो ही शब्द हैं--श्रुति और स्मृति। इन शब्दों से ही जाहिर है कि भरोसा मत कर लेना। यहां रुक मत जाना, अटक मत जाना।
यह सूत्र कहता है: गुरुरेव हरिः साक्षान्नान्य इत्यव्रबीच्छ्रुतिः। ऐसा श्रुति कहती है। श्रुति में कहा गया है कि गुरु ही साक्षात हरि हैं।
यह कोई श्रुतियों से समझने की बात है? यह तो किसी गुरु के प्रेम में पड़ कर जानने की बात है। यह तो मामला प्रेम का है। सहज आसिकी नाहिं! लेकिन प्रेम जुआरी, शराबी, दीवाने का काम है, दुकानदार का नहीं। दुकानदार तो श्रुतियों और स्मृतियों को लिए बैठे रहते हैं। होशियार हैं। शास्त्र क्या बिगाड़ लेंगे तुम्हारा? शास्त्र तुम्हारे हाथ में हैं, तुम शास्त्रों के हाथ में तो नहीं। यह तो थोड?-से साहसी लोगों ने हिम्मत करके धर्म के दीए को नहीं बुझने दिया है। साहसी व्यक्ति शास्त्रों में नहीं तलाशते; वहां तो सिर्फ कूड़ा-करकट है--सदियों का कूड़ा-करकट है। साहसी व्यक्ति तो किसी जीवंत बुद्ध में खोजते हैं, किसी जीवित बुद्ध से नाता बनाते हैं। और नाता तो एक ही हो सकता है--प्रीति का, समर्पण का, समग्रता का।
श्रुति क्या कहेगी कि गुरु ही साक्षात हरि है! और श्रुति ने कहा इसलिए तुमने माना, तो क्या खाक तुम जानोगे! ऐसा तुम्हारा हृदय कहे कि गुरु ही साक्षात हरि है। श्रुति नहीं, हृदय बोले, तुम्हारे प्राणों की वीणा झंकृत हो, तुम्हारी आत्मा की बांसुरी बजे। किसी के सान्निध्य में तुम्हारे भीतर उपनिषद घटे, तो ब्रह्मविद्या उपनिषद। किताबों में क्या रखा है!
और श्रुति स्वयं कहती है--श्रुति का कथन है कि निस्संदेह श्रुति परमार्थ रूप है।
अब यह तुम देखते हो! यह मजा देखते हो! लेकिन चूंकि सदियों से सुना है, तुम्हें इस पर हंसी भी नहीं आती।
मुल्ला नसरुद्दीन ने एक दिन बाजार में जाकर घोषणा कर दी--ढोल बजा कर, डुंडी पीट कर। भीड़ इकट्ठी हो गई। कहा कि सुन लो भाई, मेरी पत्नी से ज्यादा सुंदर इस पृथ्वी पर और कोई स्त्री नहीं है; न कभी थी, न कभी होगी। लोग थोड़े चौंके कि हद हो गई। मुल्ला से पूछा, तुमसे कहा किसने? क्योंकि सभी को पता है कि मुल्ला ने एक बदशक्ल स्त्री से विवाह किया है। असल में जिसको कोई पति न मिलता था वही तो इन सज्जन को पति मानने को राजी हुई। जो थक गई थी, हार गई थी...। और मुल्ला नसरुद्दीन भी भली-भांति जानता है, क्योंकि लोगों ने पहले जब उससे पूछा था कि तूने क्यों इस बदशक्ल स्त्री से शादी की, तो उसने कहा, बदशक्ल स्त्री में बड़े गुण होते हैं। एक तो यह, तुम उस पर निष्ठा रख सकते हो। कभी धोखा नहीं देगी। अरे धोखा देगी कैसे? तुम बेफिक्र रह सकते हो। तीर्थ-यात्रा पर जाओ, हाजी बनो, कोई फिक्र नहीं। तुम जब घर आओगे, पत्नी सदा निष्ठावान होगी, पतिव्रता होगी।
यह खुद ही मुल्ला लोगों से कह चुका था। मुसलमानों में रिवाज है कि जब विवाह करने के बाद पत्नी पहली दफा लाई जाए, तो वह पूछती है अपने पति से कि मैं किसके सामने अपना बुर्का उघाड़ सकती हूं और किसके सामने नहीं। मुल्ला ने कहा, बाई, मुझे छोड़ कर तू सबके समाने उघाड़। बस मुझे भर बचा। ऐसे भी मैं दिन भर आऊंगा नहीं, रात में ही आऊंगा। और बिजली मैं लगवाने वाला नहीं हूं। जब से तुझे देखा है तब से बिजली की कोई जरूरत ही नहीं घर में। मोमबत्ती से ही काम चला लेंगे। ऐसे ही मैं देर से आऊंगा। मेरे सामने भर तू बुर्का मत उघाड़ना। और जिसके सामने उघाड़ना हो, दिल खोल कर उघाड़। कोई भय मत रख।
ये सब बातें लोगों को पता थीं तो उन्होंने पूछा, मुल्ला, आज तुम्हें हो क्या गया? डुंडी पीट रहे हो, होश में हो कि ज्यादा अफीम खा गए हो? किसने तुम्हें कहा?
मुल्ला ने कहा, अरे किसने कहा! मेरी पत्नी ने खुद कहा है। अब उसकी तो मानना ही पड़ेगी, झंझट कौन करे!
तुम्हें हंसी आती है पत्नी ने खुद कहा इस बात पर। लेकिन तुम्हें आश्चर्य नहीं होता शास्त्रों पर? शास्त्र खुद क्या कह रहे हैं?
"श्रुति का कथन निस्संदेह परमार्थ रूप है।'
श्रुत्या यदुक्तं परमार्थमेतत्।
कैसी जालसाजी है! श्रुति स्वयं कहती है कि श्रुति के वचन परमार्थ रूप हैं। परम अर्थ का होता है अनुभव से प्रयोजन। परमार्थ तो सिर्फ अनुभव का नाम है: परम अर्थ को जान लेना, जीवन के परम अर्थ को पहचान लेना, स्वाद ले लेना। श्रुति में कहां से परमार्थ होगा? और श्रुति में अगर परमार्थ हो तो बहुत सस्ता हो जाए। फिर तो तोते भी रट ले सकते हैं, आसानी से रट ले सकते हैं। क्या अड़चन है?
कुरान को याद करने वाले लोग हैं जो पूरी कुरान याद किए बैठे हैं, लेकिन इससे मोहम्मद नहीं हो गए हैं और कभी नहीं हो पाएंगे। जब तक यह कुरान उनकी छाती पर सवार रहेगी, मोहम्मद न हो पाएंगे। मोहम्मद की छाती पर तो कोई किताब सवार न थी, इसलिए कुरान संभव हो पाई। बौद्धों में बौद्ध भिक्षु हैं जो धम्मपद को कंठस्थ किए हैं। इनको कभी बुद्ध समझ में न आएंगे। यह धम्मपद ही बाधा बन जाएगा।
और कितने हिंदू हैं जो रोज गीता का पाठ कर रहे हैं! और क्या खाक समझ रहे हैं! रोज गीता का पाठ करते हैं सदियों से--न हन्यते हन्यमाने शरीरे। यह आत्मा मरती नहीं, चाहे शरीर काट डाला जाए, छिन्न-भिन्न कर दिया जाए। नैनं छिंदंति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकाः। न तो शस्त्रों से काटी जा सकती है आत्मा और न अग्नि में जलाई जा सकती है। इसको रट रहे हैं हजारों सालों से। और बाईस सौ साल तक गुलाम रहे। हैरानी की बात है! गीता को कंठस्थ करने वाले लोग जो जानते हैं आत्मा अमर है, इनको कोई गुलाम बना सकता है? गुलाम बनाने वाला क्या कर सकता है! बहुत से बहुत शरीर को काट डालेगा। और हमें तो पता ही था कि शरीर के कटने से हम नहीं कटते हैं। अगर गीता यह देश जानता था तो कट जाता, मर जाता, मगर गुलाम नहीं होता।
मगर ये बातें हैं। यूं तो कांटा चुभ जाए तो तकलीफ होती है, फोड़ा हो जाए तो तकलीफ होती है, जरा सी बीमारी आ जाए तो घबड़ाहट होती है; मौत का नाम सुनते ही हाथ-पैर कंपने लगते हैं, बुखार चढ़ आता है। और जब बुखार चढ़ आता है तो सन्निपात में वही पुरानी गीता याद है--न हन्यते हन्यमाने शरीरे। सन्निपात में बक रहे हैं, गीता दोहरा रहे हैं कि आत्मा अमर है। मगर तुम लाख दोहराओ, तुम्हारे शब्दों में ही तुम्हारे झूठ की अभिव्यक्ति हो जाती है।
सुनो अवधूत उपनिषद के ये वचन--
धन्योऽहं धन्योऽहं नित्यं स्वात्मानमन्जसा वेदिम्।
धन्योऽहं धन्योऽहं ब्रह्मानंदो विभाति मे स्पष्टम्।।
धन्योऽहं धन्योऽहं दुःख सांसारिकं न विक्षेऽद्य।
धन्योऽहं धन्योऽहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि।।
धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किग्चित्।
धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमद्य संपन्नम्।।
धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तेर्मे कोपमा भवेल्लोके।
धन्योऽहं धन्योऽहं धन्योधन्य पुनः पुनर्धन्यः।।
अहो पुण्यमहो पुण्यं फलितं फलितं दृढ़म।
अस्य पुण्यस्य समत्तेरहो वयमहं वयम्।।
अहो ज्ञानमहो ज्ञानमहो सुखमहो सुखम्।
अहो   शास्त्रमहो   शास्त्रमहो   गुरुरहो   गुरुः।।
"मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; अपने नित्य आत्मा को अनायास ही जानता हूं। मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं, ब्रह्मानंद मुझे स्पष्ट प्रकाशित करता है। मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; अब मैं संसार का दुख नहीं देखता हूं। मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मेरा अज्ञान कभी का नष्ट हो चुका है। मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मुझे कुछ भी करना नहीं है। मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; जो कुछ प्राप्त करना है वह मैंने यहीं प्राप्त कर लिया है। मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मेरी तृप्ति की लोक में कोई उपमा नहीं है। मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मैं बारंबार धन्य हूं, धन्य हूं! अहो पुण्य! अहो पुण्य! इस पुण्य की संपत्ति फली है, दृढ़ फली है। अहो हम! अहो हम! अहो ज्ञान! अहो ज्ञान! अहो सुख! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र! अहो गुरु! अहो गुरु!'
अब इन वचनों को जरा ध्यानपूर्वक सुनो। लगता है कोई सन्निपात में है। बुखार एक सौ सात, एक सौ आठ, एक सौ नौ डिग्री के करीब है। बस जरा ही देर और है और प्रत्येक शब्द विपरीत की घोषणा कर रहा है। इसमें क्या धन्यता है, अगर आत्मा अनायास ही जानी जाती है? आत्मा निश्चित ही अनायास जानी जाती है, बिना प्रयास के जानी जाती है, मगर फिर धन्यता का क्या सवाल है? जो चीज प्रयास करके पाई जाती है उसमें धन्यता हो सकती है। जैसे कोई चांद पर पहुंच गया, इसमें धन्यता है; कोई गौरीशंकर पर चढ़ गया, इसमें धन्यता है। लेकिन आत्मा जो कि उपलब्ध ही है, न कहीं आना है न कहीं जाना है, न कुछ करना है, जो तुम्हारे भीतर मौजूद ही है, जो तुम ही हो--इसमें धन्यता की क्या बात है? धन्यता बता रही है कि अनायास सिर्फ उधार शब्द है।
यह अवधूत उपनिषद कहता है: "मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; अपने नित्य आत्मा को अनायास ही जानता हूं।'
नित्य आत्मा! क्या आत्मा भी अनित्य होती है, जो उसमें नित्य शब्द को जोड़ना पड़ रहा है? जैसे तुम अपनी पत्नी से कहो कि तू ही मेरी सच्ची पत्नी है, तो वह फौरन तुम्हारी गर्दन पकड़ लेगी कि तो फिर झूठी कौन है और? तो मतलब कोई और भी है, मेरे अलावा भी कोई और है? आत्मा अर्थात नित्यता। इसमें नित्य आत्मा जोड़ने की बात क्या है? नित्य आत्मा जोड़ने की बात इसलिए है कि पता तो कुछ भी नहीं है, शास्त्र कंठस्थ हो गए हैं तोतों की तरह। और यह बिलकुल तोतों की तरह दोहराई जा रही है बात--
"मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; ब्रह्मानंद मुझे स्पष्ट प्रकाशित करता है।'
तो इसमें धन्य होने की क्या बात है? ब्रह्मानंद तो सारे जगत को ही प्रकाशित कर रहा है, कोई तुम्हीं को थोड़े ही। हां, तुम्हीं को करता होता और सारे जगत को अंधेरे में रखता होता तो धन्यता की बात थी। जब सभी पर बरस रहा है और सभी के भीतर बसा है और सभी के घटों में भरा है, तो इसमें धन्यता की क्या बात है? विशिष्टता की तो कोई बात ही नहीं है।
"मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; अब मैं संसार का दुख नहीं देखता हूं।'
अभी भी देखते हो। नहीं तो यह बात ही क्यों उठा रहे हो? जैसे कोई आदमी कहे कि मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मुझे भूत-प्रेत बिलकुल नहीं दिखाई पड़ते। इसका मतलब क्या हुआ? इसका मतलब हुआ भूत-प्रेत दिखाई पड़ते हैं। आदमी बड़ा अजीब है। उसके मन का विश्लेषण ठीक से करोगे तो बहुत चकित होओगे। यह किसको समझा रहा है कि मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं कि मुझे दुख बिलकुल दिखाई ही नहीं पड़ता। जब है ही नहीं तो दिखाई कैसे पड़ेगा?
मगर है और दिखाई भी पड़ता है। यह झुठला रहा है। यह अपने को समझा रहा है कि नहीं है, कहीं कोई दुख नहीं है। अरे संसार में आनंद ही आनंद भरा है! सब जगह परमात्मा ही परमात्मा मौजूद है! यह अपने को समझा रहा है। यह एक तरह का आत्म-सम्मोहन पैदा कर रहा है--दोहराए जाओ; दोहराए जाओ।
"मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मेरा अज्ञान कभी का नष्ट हो चुका है।'
इसका अर्थ है कि कभी अज्ञान था। जिसने परमात्मा को जाना है वह यह भी जानता है कि अज्ञान कभी था ही नहीं, वह मेरी भ्रांति थी। जिसने परमात्मा को नहीं जाना है वही कह सकता है कि मेरा अज्ञान नष्ट हो गया। अज्ञान तो है ही नहीं। अज्ञान तो अंधेरा जैसा है, कभी था ही नहीं। जैसे अंधेरा रोशनी का अभाव है, ऐसा अज्ञान सिर्फ ज्ञान का सोया होना है। ज्ञान जग गया और पाया कि अरे, मैं व्यर्थ ही अज्ञान की बातों में पड़ा था!
बुद्ध को जब पहली दफा बुद्धत्व की किरण उतरी तो उन्होंने कहा: मैं चकित हुआ! चकित हुआ, यह बात समझ में आती है। आश्चर्यचकित हुआ कि जो अज्ञान कभी था ही नहीं उसने मुझे कितना परेशान किया! कहां-कहां नहीं भटका! किन-किन रास्तों पर नहीं खोजा! किन-किन द्वारों पर दस्तक नहीं दी--उसके लिए, जो मेरे भीतर था!
बुद्ध ने यह नहीं कहा कि मैंने बुद्धत्व पा लिया है। बुद्ध ने यही कहा कि मैंने इतना ही जाना कि मैं सदा से बुद्ध था। आश्चर्य होता है मुझे कि कैसे भूल गया था! यह बड़ी और बात है। और यह कहना कि "मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मेरा अज्ञान कभी का नष्ट हो चुका है। मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मुझे कुछ भी नहीं करना है।'
अभी भी कुछ करने की इच्छा है। है कोई इरादा। अभी इरादा मिटा नहीं। समझा रहा है यह आदमी, क्योंकि इसने श्रुतियां पढ़ ली होंगी।
"मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; जो कुछ प्राप्त करना है वह मैंने यहीं प्राप्त कर लिया है।'
प्राप्त तो कुछ भी नहीं करना है। जब अनायास घटना घटती है तो प्राप्त क्या करना है? प्राप्तव्य क्या है? प्राप्त है ही। प्राप्त था ही। तुम विस्मृत कर बैठे थे। स्मरण कर लिया। जैसे खीसे में तो रुपए रखे थे और तुम भूल गए थे। फिर खीसे में हाथ डाला और हैरानी से पाया कि अरे मैं सोचता था कि खीसे में रुपए नहीं हैं, रुपए तो हैं! एकदम से क्या चिल्लाओगे कि मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं, कि अरे मेरे खीसे में रुपए हैं, मैंने पा लिए! उलटे तुम यही कहोगे कि बड़ी हैरानी की बात है, मैं भूल कैसे गया था! धन्य तो मैं था, लेकिन मैं भूल कैसे गया था? अब धन्य होने का क्या कहना है? सुरति आ गई, स्मृति आ गई।
"मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मेरी तृप्ति की लोक में कोई उपमा नहीं है।'
अभी भी भाषा वासना की है--तृप्ति की कोई उपमा नहीं है, अद्वितीय मेरी तृप्ति है, ऐसी किसी की तृप्ति नहीं है। अभी भी वही प्रतिद्वंद्विता, वही स्पर्धा, वही दौड़, वही तुलना।
"मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं; मैं बारंबार धन्य हूं!'
देखते हो, इतनी बार कह कर भी अभी चित्त को शांति नहीं मिली। कितनी बार तो कह चुके मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं! वही-वही तो कह रहे हो। मगर नहीं, अभी भी दिल माना नहीं तो अब वे कहते हैं--
"मैं बारंबार धन्य हूं, धन्य हूं! अहो पुण्य, अहो पुण्य! इस पुण्य की संपत्ति फली है, दृढ़ फली है।'
अभी कच्चा है मन। अभी समझा रहे हैं अपने को कि बिलकुल पक्की फल गई है, अब कभी छूटेगी नहीं। अब तो पक ही गई, अब तो पा ही लिया। अब कभी खोऊंगा नहीं।
ये सब भ्रांतियां हैं!
"अहो हम! अहो हम! अहो ज्ञान! अहो ज्ञान! अहो सुख! अहो शास्त्र! अहो शास्त्र! अहो गुरु! अहो गुरु!'
और किस चीज को सन्निपात कहोगे? यह है अवधूत उपनिषद, इसका नाम होना चाहिए, सन्निपात उपनिषद। अपने ही गुणगान से शास्त्र भरे हुए हैं।
"श्रुति का कथन निस्संदेह परमार्थ रूप है। श्रुति का विरोधी होने पर कुछ भी प्रमाण नहीं है।'
तत्संशयो नात्र ततः समस्तम्।
इससे ज्यादा झूठी और कोई बात नहीं हो सकती। श्रुति का विरोधी होने पर कुछ भी प्रमाण नहीं है। श्रुति कोई प्रमाण है? प्रमाण तो अनुभव है, अनुभूति है, श्रुति नहीं। प्रमाण तो समाधि है, श्रुति नहीं। शब्द नहीं, शून्यता प्रमाण है। निर्विचार चैतन्य प्रमाण है। ध्यान प्रमाण है। लेकिन श्रुति कह रही है कि श्रुति का विरोधी होने पर कुछ भी प्रमाण नहीं है। और सब श्रुतियां एक-दूसरे की विरोधी हैं। किसकी मानो? किसकी सुनो?
उपनिषद कहते हैं: आत्मा है, परमात्मा है। महावीर कहते हैं: कोई परमात्मा नहीं, सिर्फ आत्मा है। और बुद्ध कहते हैं: न कोई आत्मा है न कोई परमात्मा है। किसकी मानो? सभी प्यारे लोग हैं। अगर श्रुति प्रमाण है तो कुरान की मानो कि बाइबिल की मानो कि तालमुद की मानो कि जरथुस्त्र की मानो, किसकी मानो? अगर श्रुति प्रमाण है तो तुम पागल हो जाओगे, क्योंकि श्रुतियां तो अनंत हैं। उपनिषद भी एक सौ आठ हैं। किस उपनिषद की मानोगे? उन उपनिषदों में बहुत विरोधाभास हैं; एक-दूसरे के विपरीत वचन हैं। वेद चार हैं, उनमें से किसकी मानोगे? उनमें बहुत विरोधाभास है। अगर मानने चले किसी को तो तुम विक्षिप्त हो जाओगे। जानने चलो, मानने की चिंता ही छोड़ो।
सत्यानंद, मैं श्रुति का पक्षपाती नहीं हूं, न स्मृति का। मैं शास्त्र-विरोधी हूं। मैं तो अनुभूति का पक्षपाती हूं। तुम्हारा अनुभव ही बस एकमात्र प्रमाण है।
और देखते हो तरकीब, यह ब्रह्मविद्या उपनिषद कहता है कि "श्रुति का विरोधी होने पर कुछ भी प्रमाण नहीं है। और जो अप्रमाण होगा वह अनर्थकारी होगा।'
डरवाया कि सावधान, अनर्थ में पड़ पाओगे! मुश्किल खड़ी हो जाएगी।
कल मैंने मेलाराम असरानी को कहा था कि अब कब तक मेलाराम बने रहोगे, अरे मेला में तो बहुत झमेला है, अब राम ही रह जाओ! तो उन्होंने क्या लिखा है? उन्होंने लिखा: भगवान, कल आपने कहा कि मुझे मेलाराम असरानी से शुद्ध राम बनाएंगे और संन्यास के लिए आपने निमंत्रण भी दिया। मैंने बरसों पहले दादा लेखराज द्वारा स्थापित ईश्वरीय विश्वविद्यालय में ब्रह्माकुमार के रूप में दीक्षा ली थी और तब से मैं सहज राजयोग की साधना करता हूं। और अगर मैं अब आप से संन्यास लेकर यह साधना छोड़ दूं तो ब्रह्माकुमारियों के अनुसार आने वाली प्रलय में नष्ट हो जाऊंगा। आने वाले पांच-दस वर्षों में प्रलय सुनिश्चित है। अभी संगम युग चल रहा है, जिसमें जो लोग ईश्वरीय विश्वविद्यालय में दीक्षित होकर पवित्र जीवन जीएंगे उनकी आत्मा का परम ब्रह्म से संगम होगा और वे परम धाम बैकुंठ में परम पद पाएंगे। मुझे आपके विचार बहुत क्रांतिकारी लगते हैं और आप भी भगवतस्वरूप लगते हैं, लेकिन आपके संन्यासियों का जीवन मुझे पवित्र नहीं लगता है। इसलिए मैं आपसे संन्यास लेने में आश्वस्त नहीं हो सकता कि मैं आने वाली इस प्रलय से बच कर बैकुंठ में परम पद पा सकूंगा।
अब बेचारे मेलाराम असरानी कैसे लोभ में पड़े हैं! कैसा डराया उन्हें! और मजा यह है कि हमारी मूढ़ता का कोई अंत नहीं है। यह पांच-दस वर्षों में प्रलय सुनिश्चित है, यह कम से कम बीस वर्ष तो मुझे सुनते हो गए। ये पांच-दस वर्ष आगे ही बढ़ते चले जाते हैं! तुम्हें भी सुनते हो गए होंगे। दादा लेखराज भी खतम हो गए और वे पांच-दस वर्ष खतम नहीं होते। मगर सिंधी गुरु क्या तरकीब लगा गए! दादा लेखराज सिंधियों को फंसा गए। और सिंधी हैं पक्के दुकानदार। उनको डरा गए वे कि देखो खयाल रखना, प्रलय सुनिश्चित है, पांच-दस वर्षों में होने वाली है। क्योंकि ज्यादा देर की कहें तो सिंधी कहेगा कि अरे अभी बहुत समय है, तब तक तो कुछ और कमाई कर लूं। पांच-दस वर्ष का ही मामला है!...घबड़ा दिया।
और यह कोई नई तरकीब नहीं है, यह बहुत पुरानी तरकीब है, बहुत पुरानी तरकीब है। पुराने से पुराने ग्रंथ में इस बात का उल्लेख है कि बस अब थोड़े ही दिन में प्रलय होने वाली है। जो ईसा के प्रथम शिष्य थे, जो उनके संवाद-वाहक बने, वे लोगों से कहते फिरते थे कि अब देर नहीं है। दो हजार साल पहले। यही बात। यही दादा लेखराज की बात कि अब ज्यादा देर नहीं है, प्रलय होने वाली है, कयामत का दिन आने वाला है। जो जीसस के साथ नहीं होंगे वे अनंत काल तक नर्कों में सड़ेंगे। अभी समय है, सावधान! जीसस के साथ हो लो। क्यों? क्योंकि कयामत के दिन, जब प्रलय होगी, तो ईश्वर जीसस को लेकर खड़ा होगा और कहेगा कि चुन लो, अपनी भेड़ें चुन लो। जो तुम्हारे मानने वाले हैं उनको बचा लो, बाकी को तो नर्क में जाना है। उस वक्त तुम बहुत मुश्किल में पड़ोगे, अगर जीसस को नहीं माना। उस वक्त जीसस अपनी भेड़ों को चुन लेंगे और अपनी भेड़ों को बचा लेंगे। और बाकी गए, गिरे अनंत नर्क में, जहां से फिर कभी कोई छुटकारा नहीं है। अनंत काल, खयाल रखना। कोई ऐसा भी नहीं कि एक साल, दो साल, तीन साल, दस साल, छूटेंगे कभी तो छूट जाएंगे। नहीं, अनंत काल तक। फिर छुटकारा है ही नहीं।
कैसा घबड़ा दिया होगा लोगों को दो हजार साल पहले। और दो हजार साल बीत गए, कयामत अभी तक नहीं आई। और बातें वे ऐसी कर रहे थे कि बस अब आई तब आई, आई ही रखी है। अब ज्यादा देर नहीं है। और यह बहुत पुरानी तरकीब है। यह सदियों से इसका उपयोग किया जा रहा है। और फिर भी अजीब आदमी है कि इन्हीं बातों को, इन्हीं जालसाजियों को फिर स्वीकार करने को राजी हो जाता है। कैसे-कैसे...!
आदिवासियों के एक गांव में मैं ठहरा था। बस्तर में आदिवासियों को ईसाई बनाया जाता है, काफी ईसाई बना लिए गए हैं। मुझे कुछ एतराज नहीं है; क्योंकि वे हिंदू थे तो मूढ़ थे, ईसाई हैं तो मूढ़ हैं। मूढ़ता तो कुछ बदली नहीं है। मूढ़ता तो कुछ मिटती नहीं है। तो मूढ़ इस भीड़ में भेड़ों के साथ रहे कि उस भीड़ में रहे और भेड़ों के साथ रहे, क्या फर्क पड़ता है? मूढ़ता तो वही की वही है। मगर किस तरकीब से उन गरीब आदिवासियों को ईसाई बनाया जा रहा है! एक ईसाई पादरी उनको समझा रहा था। उसने एक राम की प्रतिमा बना रखी थी और जीसस की, बिलकुल एक जैसी। और उनको समझा रहा था कि देखो, यह बाल्टी भरी रखी है, इसमें मैं दोनों को डालता हूं। तुम देख लो। जो डूब जाएगा उसके साथ रहे तो तुम भी डूबोगे। जो तैरेगा वही तुमको भी तिराएगा।
और बात बिलकुल साफ थी। सारे आदिवासी उत्सुक होकर बैठ गए कि भई यह देखने वाली बात है, इससे सब सिद्ध ही हुआ जा रहा है। प्रमाण सामने है आंख के। दोनों मूर्तियां पादरी ने छोड़ दीं पानी में। रामजी तो एकदम डुबकी मार गए। जैसे रास्ता ही देख रहे थे कि गोता मारें! गोता मारा और निकले ही नहीं। और जीसस तैरने लगे। जीसस की मूर्ति बनाई थी लकड़ी की और राम की मूर्ति बनाई थी लोहे की। उस पर खूब...रंग एक-सा कर दिया था दोनों पर, पुताई एक-सी कर दी थी, ऊपर से एक जैसी लगती थीं।
एक शिकारी, जो बस्तर शिकार करने आया था, मेरा परिचित व्यक्ति था। मैं जिस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था वहीं वे प्रोफेसर थे। और उनका शौक एक ही था--शिकार। उसने यह हरकत देखी। वह समझ गया फौरन कि यह क्या जालसाजी है। उसने कहा कि ठहरो, इससे कुछ तय नहीं होता। क्योंकि हमारे शास्त्रों में तो अग्नि-परीक्षा लिखी है, जल-परीक्षा लिखी ही नहीं। आदिवासियों ने कहा, यह बात भी सच है। अरे सीता मैया भी जब आई थीं तो कोई जल-परीक्षा हुई थी? अरे अग्नि-परीक्षा हुई थी! पादरी घबड़ाया कि यह बड़ा उपद्रव हो गया। यह दुष्ट कहां से आ गया और! भागने की भी कोशिश पादरी ने की, लेकिन आदिवासियों ने कहा, भैया अब ठहरो, अग्नि-परीक्षा और हो जाए। यह बेचारा ठीक ही कह रहा है, क्योंकि हमारे शास्त्रों में अग्नि-परीक्षा का उल्लेख है। सो आग जलाई गई। अब पादरी बैठा है उदास कि अब फंस गए। अब भाग भी नहीं सकते। और जीसस और रामचंद्र जी को अग्नि में उतार दिया। रामचंद्र जी तो बाहर आ गए अग्नि से, जीसस खाक हो गए। सो आदिवासियों ने कहा, भैया, अच्छा बचा लिया हमें। अगर आज अग्नि-परीक्षा न होती तो हम सब ईसाई हुए जा रहे थे।
मगर ये आदिवासियों में और मेलाराम असरानी तुम में कुछ फर्क है? तुम पढ़े-लिखे आदमी होओगे, मगर कुछ भेद है? वही बुद्धि। वही जड़बुद्धि। पांच-दस वर्ष तुम कहते हो। और तुम कह रहे हो साथ में कि मैंने वर्षों पहले दादा लेखराज द्वारा स्थापित ईश्वरीय विश्वविद्यालय में दीक्षा ली थी।
दादा लेखराज को मरे कितने साल हो गए, यह बताओ। पांच-दस साल से तो ज्यादा हो गए न। ये पांच-दस साल तो तुम खुद ही कह रहे हो कई सालों से। ये पांच-दस साल कब खतम होंगे? ये कभी खतम होने वाले नहीं हैं। मगर डर और भय। और सिंधी हो तुम, सो सिंधी को तो ये ही दो चीजें काफी प्रभावित करती हैं--एक तो डर, और डर से भी ज्यादा लोभ।
अब तुम कह रहे हो कि "ब्रह्माकुमारियों के अनुसार आने वाली प्रलय में, अगर साधना छोड़ दूंगा तो नष्ट हो जाऊंगा। आने वाले पांच-दस वर्षों में प्रलय सुनिश्चित है।'
क्या तुम खाक साधना कर रहे हो राजयोग की--सहज राजयोग की? सहज राजयोग की साधना करो और इस तरह की मूढ़तापूर्ण बातों में भरोसा करो, ये दोनों बातें साथ चल सकती हैं? सहज राजयोगी तो समाधिस्थ हो जाएगा। उसकी तो प्रलय हो गई। मन गया, प्रलय हो गई। और जहां मन गया वहीं बैकुंठ है। बैकुंठ अभी है। कोई सारा संसार मिटेगा तब मेलाराम असरानी, तुम बैकुंठ जाओगे! तुम्हारे बैकुंठ के लिए सारे संसार को मिटाओगे? जरा सोचो तो! बड़ा महंगा सौदा करवा रहे हो! मतलब जिनको अभी बैकुंठ नहीं जाना, उनको भी! अपने बाल-बच्चों से, पत्नी से ही पूछो कि पांच-दस साल में बैकुंठ चलना है? किसी को बैकुंठ नहीं जाना है। अरे मजबूरी में जाना पड़े, वह बात और है, मगर जाना कौन चाहता है? तुम भी नहीं जाना चाहते। इसीलिए तो ब्रह्माकुमारियां तारीख तय नहीं करतीं। उनसे तारीख ही तय करवा लो, एक दफा निपटारा हो जाए। पांच ही दस साल का मामला है। तारीख तय कर लो कि किस तारीख, किस महीने में, किस साल में? और ऐसे लोग मूढ़ हैं कि यह भी करवाया गया, फिर भी मूढ़ता नहीं जाती।
ईसाइयों में एक संप्रदाय है: जिहोवा के साक्षी। इन्होंने कई दफा घोषणा कर चुके हैं ये तारीखों की तक। इन्होंने अठारह सौ अस्सी में एक जनवरी को प्रलय हो जाएगी--आज से सौ साल पहले, अभी जनवरी आती है, करीब सौ साल एक जनवरी को पूरे होंगे--एक जनवरी अठारह सौ अस्सी में महाप्रलय होने वाली है, इसकी घोषणा कर दी। और उनके मानने वालों ने देखा कि जब महाप्रलय ही होने वाली है तो लोगों ने मकान बेच दिए, जमीनें बेच दीं। अरे लोगों ने कहा, गुलछर्रे कर लो जो भी करना है, अब एक जनवरी आ ही रही है। इसके आगे तो कुछ बचना नहीं है। जिसको जो करना था उसने कर लिया। और जिहोवा के मानने वाले एक पर्वत पर इकट्ठे हुए। क्योंकि सारा जगत तो डूब जाएगा, उस पर्वत पर--पवित्र पर्वत पर--जो रहेंगे उनको परमात्मा बैकुंठ ले जाएगा।
एक तारीख भी आ गई, सुबह भी हो गई। लोग इधर-उधर देख रहे कि प्रलय कहीं दिखाई नहीं पड़ रही। लाखों लोग इकट्ठे पर्वत पर। आखिर धीरे-धीरे खुस-फुस हुई कि बात क्या है अभी तक...दोपहर भी हो गई, शाम भी होने लगी। दो तारीख भी आ गई। फिर लोगों में सनसनी हुई कि अब फंसे। सब बरबाद करके आ गए। फिर लौट आए--फिर उसी दुनिया में, फिर कमाई-धमाई फिर शुरू कर दी।
मगर मजा यह है कि आदमी की मूढ़ता की कोई सीमा नहीं। वे ही पंडित-पुजारी जो इनको पहाड़ ले गए थे, जिन्होंने सब इनसे दान करवा दिया था--दान क्या, खुद ही को करवा लिया था दान--इन्होंने यह भी न सोचा कि जब एक जनवरी को सब नष्ट ही होने वाला है तो ये दान किसलिए इकट्ठा कर रहे हैं? हम से तो ले रहे हैं कि एक जनवरी को सब नष्ट ही हो जाएगा, अरे अब दे ही दो। अब भगवान के नाम पर दान कर दो, जो दान करेगा उसको अनंत गुना मिलेगा। तो ये क्या करेंगे दान लेकर? यह किसी ने भी न सोचा। और वे पंडित-पुजारी फिर समझाने लगे कि थोड़ी तारीख में हमारी भूल हो गई, फिर दस साल बाद यह होगा। फिर दस साल बाद लोग इकट्ठे हो गए। आदमी की प्रतिभा तो ऐसी क्षीण हुई जंग खा गई है।
अब तुम अगर सहज राजयोग की साधना करते हो तो यहां क्या कर रहे हो? यहां कैसे आए? अगर सहज योग से तुम्हें कुछ मिल रहा है तो यहां किसलिए आए हो? अपना बैकुंठ गंवाना है? क्योंकि अगर वहां पता भी चल गया कि तुम यहां आए थे तो कोई दादा लेखराज वगैरह साथ न दे पाएंगे। क्योंकि मैं कहूंगा, यह भेड़ मेरी है। न रही हो संन्यासी, मगर आधी मेरी है। आधी को बैकुंठ जाने दो, आधी को तो नरक ले जाऊंगा। वहां मेलाराम असरानी, आधे-आधे कटोगे। रामजी को मैं ले जाऊंगा, मेला को वहीं छोड़ जाऊंगा। वैसे तुम्हारी मर्जी। रामजी वाले हिस्से को मैं नहीं छोड़ने वाला। वह तो उस पर कब्जा मेरा है। इस दरवाजे के जो भीतर आया, एक दफा उसको मैंने पहचान लिया कि यह भेड़ अपनी है, फिर कोई दादा लेखराज वगैरह काम नहीं आने वाले। तुमसे कहे देता हूं। आधे तो फंस ही गए, अब पूरे ही फंस जाओ, अब क्या झंझट?
और तुम कहते हो कि जो ईश्वरीय विश्वविद्यालय में दीक्षित होकर पवित्र नहीं होंगे उनकी बड़ी मुश्किल होगी। जो पवित्र होंगे, उनकी आत्मा का परम ब्रह्म से संगम होगा और वे परम धाम बैकुंठ में परम पद पाएंगे।
देखते हो, परम-परम चल रहा है! धन्य ही धन्य हो रहा है! कैसा लोभ चढ़ा हुआ है छाती पर! जरा परम ब्रह्म से संगम होगा, इतने से तृप्ति नहीं है--परम धाम! उससे भी मन राजी नहीं मानता। सिंधी मन! बैकुंठ, उससे भी राजी नहीं। फिर परम पद! तो दादा लेखराज कहां बैठेंगे? जब परम पद पर तुम बैठ जाओगे तो दादा लेखराज एक धक्का नहीं देंगे, कि क्यों रे मेलाराम असरानी, कमबख्त; मैंने ही दीक्षा दी और परम पद पर तू बैठ रहा है! बामुश्किल तो हम बैठ पाए। किसी तरह परमात्मा को सरकाया। और अब तू आ गया! अरे परम पद पर कितने आदमी चढ़ोगे? परम पद पर तो एक ही बैठ सकेगा--कि कई बैठे हैं, पूरा मेला, पूरा झमेला?
मगर सिंधी हो, तुम भी क्या करो!
दादा साईं बुधरमल को सिनेमा हाल के बाहर पेशाब करने के आरोप में पकड़ कर मजिस्ट्रेट साहब के पास पेश किया गया। मजिस्ट्रेट भी था सिंधी, पहुंचा हुआ सिंधी। साईं बुधरमल पर उसने एक सौ रुपया जुर्माना किया। बुधरमल बोले, माई-बाप, यह तो अन्याय हो जाएगा। इतनी-सी गलती के लिए इतना भारी जुर्माना!
मजिस्ट्रेट बोले, बरी साईं, यह कोई ऐरे-गैरे का पेशाब थोड़े ही था, सेठ बुधरमल का पेशाब था!
यह सुनते ही सेठ बुधरमल ने जल्दी से जुर्माना भर दिया। अरे जब परम पद का मामला आ गया, सेठ बुधरमल का पेशाब!
तुम भी कैसी बातों में पड़े हो!
जब कोई आदमी किसी स्त्री के साथ बलात्कार करता है तो साधारण भाषा में कहा जाता है कि उसने उस स्त्री की इज्जत लूट ली। मारवाड़ियों में मामला अलग ही है। यदि स्त्री के साथ कोई बलात्कार कर ले और उसके पैसे-जेवर आदि न छीने तो मारवाड़ी लोग कहते हैं कि चलो कोई बात नहीं, बलात्कार किया सो किया, अरे अपना क्या गया, कम से कम इज्जत तो नहीं लूटी! इज्जत बच गई, यही क्या कम है!
सिंधी लोग और भी पहुंचे हुए हैं। एक दिन झामनदास ने आकर बताया कि कल रात एक अजनबी महिला ने उनकी इज्जत लूट ली। मैंने पूछा, झामनदास, क्या कहते? न कभी ऐसी बात कानों सुनी न आंखों देखी कि किसी स्त्री ने तुम्हारी इज्जत लूट ली! क्या कहते हो! तुम्हारा मतलब? झामनदास बोले, मैं तो उसके साथ बलात्कार करने में लगा था और उस दुष्ट ने मेरी पाकेट मार ली। हद हो गई कलियुग की भी! भगवान अब तो मनुष्य-जाति पर से मेरा बिलकुल भरोसा उठ गया है।
अब ये मेलाराम असरानी, ये परम पद पाने के पीछे पड़े हैं! और इस डर से कि कहीं परम पद न चूक जाए, संन्यास लेने में घबड़ा रहे हैं। और भी एक डर है कि मुझे आपके विचार बहुत क्रांतिकारी लगते हैं, आप भी भगवतस्वरूप लगते हैं। यह भी डर के मारे कह रहे होंगे कि भैया कौन झंझट ले! विचार तो क्रांतिकारी लग रहे हैं, खतरनाक मालूम होते हैं, मगर मान ही लेना ठीक कि हैं भगवतस्वरूप! अरे पता नहीं आखिर में कौन जीते--दादा लेखराज जीतें...। यह आदमी भी उपद्रवी मालूम होता है। कहीं दादा लेखराज को चारों खाने चित कर दे, फिर! तो होशियार आदमी सभी को सम्हाल कर रखता है कि आप भी भगवतस्वरूप हैं, कि अरे मौका अगर आ गया तो कह दूंगा कि याद रखना, मैंने कहा था कि आप भी भगवतस्वरूप हैं! और अगर दादा लेखराज जीतने लगे तो साफ कह दूंगा, मैंने तो पहले ही कहा था कि इनके विचार क्रांतिकारी हैं, अपने को जंचते नहीं।
लेकिन कहते हैं कि "आपके संन्यासियों का जीवन मुझे पवित्र नहीं लगता है।'
अरे तुम्हें संन्यासियों के जीवन से क्या फिक्र? इनको कोई बैकुंठ थोड़े ही जाना है। ये तो यहीं बैकुंठ में हैं। तुम जब बैकुंठ जाओगे और पाओगे कि दादा लेखराज के आस-पास उर्वशी और मेनका नाच रही हैं तो तुम्हें उनका जीवन भी पवित्र नहीं लगेगा, कि अरे ये दादा लेखराज क्या कर रहे हैं! अरे साईं, यह क्या कर रहे! ये उर्वशी बाई को गोदी में बिठाए बैठे हो! यह तो कोई ब्रह्मकुमारी भी नहीं। यह कर क्या रहे हो! दादा होकर यह क्या कर रहे हो!
मेरे संन्यासी तो बैकुंठ में हैं। इनको कहीं जाना नहीं। ये तो परम पद पर विराजमान हैं। इनको मैं कोई प्रलोभन नहीं दे रहा हूं। और इनको तो मैंने साफ कह दिया है कि अगर मेरे साथ रहे तो नरक की तैयारी रखना। करेंगे क्या खाक स्वर्ग में जाकर? धूल उड़ रही है वहां। मरे मुर्दा साधु-संत वहां पहुंच गए हैं बहुत पहले ही से। कोई धूनी रमाए बैठा है, कोई झाड़ से उलटा लटका है। जटा-जूट तो देखो उनके इतने बढ़ गए हैं कि उनको तुम खोजने जाओ तो मिलें ही न, कि साईं कहां हैं, जटा-जूट इतने बढ़ गए हैं अनंत काल में! कोई भूखा ही मर रहा है। इस सर्कस में कहां इनको मेरे संन्यासियों को ले जाना? इन सबको तो मैंने नरक ले जाने का विचार किया है। नरक में कुछ करने को है, कुछ काम है। और इतने लोग...अधिक लोग तो बेचारे नरक ही गए होंगे, उन सबका उद्धार भी तो करना है कि नहीं? शैतान को भी संन्यास देना है कि नहीं?
तो इन्हें तो कोई चिंता नहीं है। मेरे साथ जो हैं, वे मेरे साथ नरक भी जाने को राजी हैं। परम पद वगैरह की मैं कोई बात ही नहीं करता। क्योंकि मैं तो उसी को ध्यानी मानता हूं कि अगर वह नरक में भी हो तो वहां भी परम पद पर हो। नरक में भी हो तो उसके आस-पास स्वर्ग घटित हो। और तुम्हारे तथाकथित साधु-संन्यासी अगर ये स्वर्ग में भी होंगे तो इन्होंने कभी का उसको नर्क बना दिया होगा। इनकी शकलें तो देखो! इनके ढंग-ढौर तो देखो! ये जहां इकट्ठे हो जाएंगे वहीं मातम छा जाएगा। स्वर्ग में बिलकुल मातमी हालत होगी। कोई महात्मा चरखा चला रहे हैं। अब ये मोरारजी भाई देसाई भी बैकुंठ में रहेंगे, ये जीवन-जल ही पी रहे हैं। इन सबको इनकी तपश्चर्या का फल तो मिलेगा! अरे जिंदगी भर जीवन-जल पीया तो किसलिए पीया? कायकू पीया? अमृत की आशा में पीया; कि परलोक में अमृत मिलेगा। इनको मिलेगा अमृत।
मेरे संन्यासियों को तो स्वर्ग से कुछ लेना-देना नहीं है, क्योंकि मैं कहता हूं स्वर्ग कोई भूगोल नहीं है और स्वर्ग कोई स्थान नहीं है--चैतन्य की अवस्था है। तुम चाहो तो यहीं स्वर्ग में हो सकते हो। जब यहीं हो सकते हो तो कल पर क्यों टालना? नौ-पांच-दस साल के लिए क्यों टाल रहे हो, मेलाराम असरानी? मेरा संन्यास लो और प्रलय हुई। प्रलय का मतलब क्या होता है--तुम खतम! तुम गए, तुम मिटे, तुम समाप्त हुए। और उसी मिटने से, उसी राख से, उसी मृत्यु से, उसी सूली से एक नए जीवन का आविर्भाव होता है, एक नया अंकुरण होता है।
मैं किसी को नैतिकता नहीं सिखा रहा हूं, सिर्फ आनंद सिखा रहा हूं। मेरे लिए आनंद ही एकमात्र पवित्रता है। और इसलिए तुम्हें अड़चन लगती होगी कि आपके संन्यासियों का जीवन मुझे पवित्र नहीं लगता। तुम्हारी पवित्र की परिभाषा क्या है? तुम पवित्र से क्या अर्थ लेते हो? तुमने पवित्रता की कोई धारणा बना ली होगी। अपनी-अपनी धारणाएं हैं। उन धारणाओं के हिसाब से आदमी पवित्रता मानता है।
श्री राजशेखर नंबियार ने पूछा है, भगवान, सुना है आप भोजन में शाकाहार को तरजीह देते हैं। लेकिन पुराने शास्त्र कहते हैं कि जीव ही जीव का आहार है। और आप जानते हैं कि मछली मछली को निगलती है। क्या इस पर कुछ कहने की कृपा करेंगे?
अब इनको शाकाहार में अड़चन मालूम हो रही है! क्योंकि ये कहते हैं, "शास्त्र कहते हैं कि जीव ही जीव का आहार है।'
शास्त्र जरूर मगरमच्छों ने लिखे होंगे। छोटी मछलियों से तो पूछो कि छोटी मछलियां क्या कहती हैं! ये बड़े मच्छों ने लिखे होंगे। मगरमच्छ! ऋषि-मुनि! क्या-क्या गजब की बातें कह गए! मगर बेचारी छोटी मछली से तो पूछो।
आदमी अजीब है। अगर तुम शेर को मारो तो इसको कहते हैं--शिकार, क्रीड़ा, खेल। अरे लीला कर रहे हैं! और शेर तुम्हें खा जाए तो दुर्घटना। क्यों भाई, क्या गड़बड़ हो गई? अरे जीव तो जीव का आहार है। शेरों से तो पूछो, सिंहों से पूछो। अगर जीव जीव का आहार है तो आदमी को खाने दो, मजे से खाने दो, बेचारे कोई बुरा नहीं कर रहे हैं। और अगर जीव जीव का आहार है तो आदमी आदमी को खाए, इसमें अड़चन क्या है? फिर तो जो आदमखोर हैं वे सच्चे पवित्र लोग हैं। जब जीव जीव का आहार है और मछली मछली को खा रही है, तो आदमी आदमी को खा रहा है। अरे बड़ा आदमी छोटे को खा जाए, और क्या? बूढ़ा बच्चे को खा जाए, और क्या करोगे! कि बड़ा नेता है तो चमचे को ही खा जाए। जो मिल जाए उसको खा जाए, जो जिसके कब्जे में आ जाए।
अब राजशेखर नंबियार को शाकाहार में विरोध मालूम पड़ता है। और इसमें कुछ हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि हिंदू धर्म कोई शाकाहारी धर्म नहीं है। यह शुद्ध मांसाहारियों का धर्म है। वह तो महावीर और बुद्ध की इतनी छाप पड़ी गहरी कि ब्राह्मण संकोच से भर गए। लेकिन जहां महावीर और बुद्ध की छाप पड़ी वहीं ब्राह्मण संकोच से भरे--सिर्फ उत्तर भारत में। कश्मीरी ब्राह्मण तो मजे से मांसाहार करता है। इसलिए जवाहरलाल नेहरू को मांसाहार में कोई अड़चन न थी--कश्मीरी ब्राह्मण। शुद्ध आहार कर रहे हैं, शास्त्रीय आहार।
और देखते हो, महात्मा गांधी अहिंसा की जिंदगी भर बकवास करते रहे और जब अपना उत्तराधिकारी चुना तो जवाहरलाल को चुना। तब जरा भी खयाल न रखा कि एक मांसाहारी को चुन रहे हैं, शुद्ध मांसाहारी को। फिर फिक्र छोड़ दी। फिर गई सब अहिंसा वगैरह, एक तरफ हटा कर रख दी। कसौटियां तो तब होती हैं जब समय आते हैं।
दक्षिण भारत के ब्राह्मण भी मांसाहारी हैं, क्योंकि महावीर और बुद्ध की छाप वहां भी नहीं पड़ी। बंगाल के ब्राह्मण भी मांसाहारी हैं, क्योंकि वहां भी बुद्ध और महावीर की छाप नहीं पड़ी। बुद्ध और महावीर की छाप तो सिर्फ उत्तर प्रदेश पर पड़ी। तो जो उत्तर भारत है वह बुद्ध और महावीर के कारण संकोच से भर गया। उत्तर भारत का ब्राह्मण संकोच करने लगा कि अगर मैं मांसाहार करूं तो महावीर और बुद्ध की प्रतिमा और भी निखर कर प्रकट होगी। क्योंकि लोग कहेंगे कि अरे, तुम मांसाहारी, तुम्हें इतनी भी समझ नहीं? फिर बुद्ध और महावीर ही सच्चे भगवान हैं। इस बेचैनी में, इस परेशानी में उत्तर भारत के ब्राह्मण को मांसाहार छोड़ना पड़ा। परेशानी में छोड़ा है।
रामकृष्ण परमहंस मछलियां खाते रहे, विवेकानंद मांसाहारी बने रहे। कोई अड़चन न थी। राजशेखर नंबियार केरल से हैं, तो केरल में तो कोई अड़चन नहीं है, बुद्ध और महावीर से बहुत दूर पड़ गया, सबसे दूर पड़ गया केरल।
मैं शाकाहार को तरजीह देता हूं, निश्चित ही तरजीह देता हूं। क्योंकि जो शास्त्र कहते हैं कि जीव जीव का आहार है वे शास्त्र गलत लोगों ने लिखे होंगे। वे शास्त्र बेईमानों ने लिखे होंगे। वे उन्होंने लिखे होंगे जो हिंसा को तरजीह देना चाहते थे, जो मांस की लोलुपता नहीं छोड़ पाते थे। और यह सच है कि मांस स्वादिष्ट होता है, ऐसा मांसाहारियों का कहना है। श्रुति है, मैंने चखा नहीं। मगर श्रुति प्रमाण है! और श्रुति के विपरीत जो है वह तो प्रमाण है ही नहीं! ऐसा मैंने सुना। मेरे पास बहुत-से मांसाहारी हैं। मेरे पास तो नब्बे प्रतिशत मांसाहारी हैं। मेरे भोजन ही जो बनाते हैं वे भी मांसाहारी हैं।
विवेक मुझसे कहती है कि मांसाहार स्वादिष्ट होता है, लेकिन अब मैं कल्पना भी नहीं कर सकती कि कैसे इतने दिन तक मांसाहार करती रही! कभी सोचा ही नहीं, कभी विचार ही न उठा। पश्चिम में मांसाहारी घर में कोई पैदा होता है, बचपन से ही मांसाहार शुरू कर देता है; जैसे हम शाकाहार शुरू करते हैं, वह मांसाहार शुरू करता है। सवाल ही नहीं उठता। यह तो उसे यहां आकर...अब वह कहती है कि मुझे अगर मांसाहार करना पड़े तो असंभव। वमन हो जाएगा। देखते ही से वमन हो जाएगा। क्योंकि यह बात ही सोचने जैसी नहीं है कि आदमी और जीवन को नष्ट करे, अपने स्वाद के लिए।
और अगर स्वाद की ही बात हो तो फिर बड़ी मुश्किल हो जाएगी। ईदी अमीन बच्चों का मांस खाता रहा, क्योंकि जब ईदी अमीन भागा अपनी राजधानी को छोड़ कर तो उसके फ्रीज में छोटे बच्चों का मांस पाया गया। और उसकी राजधानी में रोज बच्चे चुराए जाते थे और ईदी अमीन की पुलिस जांच-पड़ताल करती थी कि बच्चे कहां गए। और बच्चे जाते थे ईदी अमीन के फ्रीज में। तो पकड़ें उनको कैसे? पकड़े कैसे जा सकते थे? राष्ट्रपति। लेकिन ईदी अमीन ने बाद में स्वीकार किया कि कोई कुछ भी कहे, लेकिन छोटे बच्चों का मांस जितना स्वादिष्ट होता है इतनी स्वादिष्ट चीज दुनिया में कोई और होती ही नहीं।
श्रुति है तो ठीक ही होगी। अनुभवी आदमी है वह, वह ठीक कह रहा है। उसको मैं गलत भी नहीं कह सकता। स्वाद के लिहाज से वह ठीक ही कह रहा होगा। स्वाद के संबंध में मुझे एतराज भी नहीं है। मगर स्वाद के लिए क्या बच्चों को काटोगे? स्वाद के लिए क्या जानवरों को काटोगे? स्वाद का कितना मूल्य है? स्वाद है ही क्या? तुम्हारी जीभ पर थोड़े-से दाने हैं जो स्वाद को अनुभव करते हैं, जरा-सी सर्जरी से उनको अलग किया जा सकता है। एक जीभ की छोटी-सी पर्त चमड़ी की अलग कर दी जाए और सब स्वाद समाप्त हो जाएगा।
दूसरे महायुद्ध में यूं हुआ कि एक आदमी के इस तरह के घाव पहुंचे युद्ध में कि उसके गले और शरीर का संबंध टूट गया, भीतर से संबंध टूट गया। तो वह भोजन न कर सके। क्योंकि जो भोजन को ले जाने वाली शृंखला है वही टूट गई। तो पहली दफे यह प्रयोग किया गया कि उसके पेट में सीधी ही आपरेशन करके एक नली जोड़ दी गई--रबर की एक नली जोड़ दी गई। वह उसी में चाय डाल दे; कोकाकोला पिला दे। उसी नली में डाल दे, वह सीधा पेट में पहुंच जाए। मगर उसे मजा न आए। क्योंकि मजा कैसे आए? कोकाकोला तो पिला दे, मगर स्वाद तो मिले नहीं। उसने डाक्टरों से कहा कि इसमें कुछ मजा ही नहीं आता। मतलब स्वाद तो मुझे मिलता ही नहीं। तब एक तरकीब खोजी गई कि पहले वह कोकाकोला मुंह में ले, थोड़ा बुलबुलाए, फिर नली में बुलक दे, तो स्वाद भी ले ले और पेट में भी चला जाए। वह यही करता रहा जिंदगी भर, जब तक जिंदा रहा। उन्नीस सौ साठ तक वह आदमी जिंदा था। युद्ध के बाद कोई पंद्रह साल जिंदा रहा। वह यही करता रहा। पहले मुंह में बुलबुलाए।
अब तुमको लगेगी बड़ी हैरानी की बात कि यह भी क्या गधा-पच्चीसी है। मगर यही तुम कर रहे हो; नली भीतर है, उसकी बाहर थी। बस इतना ही फर्क है। आइसक्रीम पहले मुंह में ले, पहले मुंह में मजा ले ले स्वाद का और फिर अपनी नली में बुलक दे।
तुम भी यही कर रहे हो; गले के नीचे उतरने के बाद स्वाद का तुम्हें कुछ पता चलता है? जरा-सी जीभ पर स्वाद है। और जीभ भी पूरी हर चीज का स्वाद नहीं लेती, जीभ के भी अलग-अलग हिस्से हैं। कोई हिस्सा कड़वेपन का स्वाद लेता है, कोई हिस्सा मीठेपन का स्वाद लेता है, कोई हिस्सा नमकीन का स्वाद लेता है। अलग-अलग हिस्से हैं। इसलिए तुमने अगर खयाल किया हो, जब तुम कड़वी दवा लेते हो, तो तुम उसे हमेशा--जानते होओ या न जानते होओ--हमेशा जीभ के मध्य में रखते हो। और एकदम से पानी पीकर उसको गटक जाते हो, क्योंकि जीभ का आखिरी हिस्सा कड़वेपन का स्वाद लेता है; वहां अगर छू गई वह गोली तो कड़वेपन का पता चलेगा, नहीं तो पता ही नहीं चलेगा। जहर पी जाओ, पता न चलेगा।
इतने-से स्वाद के लिए जीवन को नष्ट करोगे? और शास्त्रों की सहायता तो हर चीज में ली जा सकती है। अब पुराने शास्त्र कहते हैं कि जीव ही जीव का आधार है, वही उनका आहार है। तो ऐसे शास्त्र शास्त्र नहीं हैं। ऐसे शास्त्र बेईमानों ने लिखे हैं। ऐसे शास्त्र उन्होंने लिखे हैं जो जीव का आहार करना चाहते हैं।
अगर ईदी अमीन शास्त्र लिखें तो वे लिखेंगे छोटे बच्चों का आहार, इसके बिना तो जीवन में स्वाद ही नहीं है, आनंद ही नहीं है। अरे जब स्वाद ही नहीं है तो क्या जीवन में आनंद? तो क्या इनकी मान कर चलोगे, छोटे बच्चों की हत्या करोगे, क्या करोगे?
मगर जैसा जीवन तुम्हें प्यारा है, और पशुओं को भी प्यारा है। न तुम चाहोगे कि तुम्हारे ऊपर कोई भेड़िया हमला कर दे और खा जाए। तो तुम भी थोड़ा जो अपने साथ नहीं चाहते हो कि हो, वह दूसरों के साथ भी न करो।
जीसस का प्रसिद्ध वचन है: जो तुम नहीं चाहते कि दूसरे तुम्हारे साथ करें वह तुम उनके साथ भी न करो।
बस इतनी-सी ही तो बात है शाकाहार के पीछे, इतनी ही। मगर इतनी बात जीवन में क्रांति ले आती है।
"श्रुति में कहा गया है कि गुरु ही साक्षात हरि हैं और कोई अन्य नहीं। श्रुति का कथन निस्संदेह परमार्थ रूप है। श्रुति का विरोधी होने पर कुछ भी प्रमाण नहीं है। जो अप्रमाण होगा वह अनर्थकारी होगा।'
सत्यानंद, श्रुति तो सिर्फ श्रुति है, उसका कोई मूल्य नहीं है। अपना अनुभव चाहिए, वही प्रमाण है। और जब परमात्मा का अनुभव हो सकता है तो क्यों उधार बातें मानो? क्या जरूरत है उधार बातें मानने की? जब तुम आंख खोल कर देख सकते हो सौंदर्य को, तो क्यों आंखें बंद करे दूसरों की बातों को सुनते रहो? यही तो सदियों से तुम कर रहे हो, इसलिए वंचित रह गए हो। इसलिए तुम्हारी संवेदनशीलता धीरे-धीरे क्षीण हो गई है, अन्यथा प्रत्येक व्यक्ति अधिकारी है परमात्मा को अनुभव करने का। पर श्रुतियों से और शास्त्रों से मुक्त होना जरूरी है।

आखिरी प्रश्न: भगवान,
सिंधियों के संबंध में थोड़ी और जानकारी--
सिंधी जो न करें सो थोड़ा। कल प्रवचन के बाद साईं अरूप कृष्ण ने अदृश्य वेफर बांटे और सब संन्यासी खाकर गदगद हुए। वेफर खाकर मैं आफिस पहुंची तो एक
दूसरे सिंधी साईं सेवकराम का पत्र मिला, जिसने आपको लिखा है: प्यारे भगवान, कृपया संभोग से समाधि वी.पी.पी. द्वारा भेजें।
भगवान, आप कहते हैं तो मानना पड़ेगा कि कृष्ण को कोई सिंधी बाई नहीं मिली थी। लगता है सिंधी माइयां आपके इंतजार में थीं, अचानक कहां से प्रकट हो गई हैं, समझ में नहीं आता। आप ही समझाने की कृपा करें।
भगवान, थोड़ा लिखा ज्यादा समझना।

 धर्म ज्योति उर्फ पुष्पा पंजाबी,
बाई, थोड़ा न भी लिखती तो बहुत समझता। कोरा कागज भी भेजती तो बहुत समझता। अरे इतना ही तूने कष्ट किया, यह क्या कम है! साईं अरूप कृष्ण ने जब अदृश्य वेफर बांटे और संन्यासी गदगद हुए, तो तू खाली कागज भेज देती और मैं समझता और गदगद होता।
और अब जब ये साईं सेवकराम ने लिखा है कि संभोग से समाधि वी.पी.पी. द्वारा भेजें, तो भेजनी पड़ेगी। साईं अरूप कृष्ण से पूछ। अदृश्य वेफर जब बंट सकते हैं तो वी.पी.पी. से संभोग के द्वारा समाधि क्यों नहीं भेजी जा सकती? कोई तरकीब खोजनी ही पड़ेगी।
भारत की गरीब जनता के लिए यू. एस. ए. वालों ने--यू. एस. ए. वाले अर्थात उल्हासनगर सिंधी एसोसिएशन वाले--उन्होंने एक नए रेडियो का आविष्कार किया है, जिसकी कीमत, मात्र सौ रुपया है। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे चलाने के लिए बिजली या बैटरी की जरूरत नहीं पड़ती। शायद आपको विश्वास न आए, मगर यह सौ प्रतिशत सच है। गलत सिद्ध करने वाले को दस हजार रुपए इनाम। रेडियो अगर न चले तो दोगुने दाम की वापसी की गारंटी। आज ही आर्डर कीजिए।
चंदूलाल मारवाड़ी ने देखा विज्ञापन, तत्काल एक रेडियो का आर्डर किया। खूबसूरत पैकिंग में बंद रेडियो जैसा दिखने वाला एक गत्ते का डिब्बा आया, जिसमें नीचे चार पहिए लगे थे और सामने एक डोरी बंधी थी; लिखा था कि डोर को पकड़ कर खींचिए, यदि रेडियो न चले तो दोगुने दाम वापस। बच्चा, बूढ़ा कोई भी चला सकता है। गलत सिद्ध करने वाले को दस हजार रुपए इनाम।
धर्म ज्योति, बाई, अब तू तो खुद ही सिद्ध सिंधी है, सेवकराम की भी कुछ सेवा कर। भेज! वी.पी.पी. से कोई तरकीब निकाल।
और तू कहती है कि सिंधी जो न करें सो थोड़ा। सो अब कुछ करके दिखा। अब कल तू देख रही थी, कल क्या हुआ! कल जब मैं सिंधियों पर बोला तो दो घटनाएं घटीं, दो चमत्कार हुए। पहले तो बंदर छत पर कूदे। बंदर बड़े खुश हुए। बंदर एकदम कहने लगे--धन्योऽहं, धन्योऽहं! मैं धन्य हूं, मैं धन्य हूं, बारंबार धन्य हूं! बंदर अर्थात वे लोग जो अगले जन्म में सिंधी होने का विचार कर रहे हैं। गदगद हो गए।
और दूसरी घटना घटी कि कोयल जोर से चीखी। कोयल खुश नहीं हुई। कोयल एकदम नाराज हुई। कोयल वह है जो पिछले जन्म में सिंधी रह चुकी है। उसने मुझे एकदम डांटा कि चुप रहो, ऐसी बातें मत समझाओ, मैं भोग चुकी हूं। भोग कर ही मेरी यह हालत हुई है।

नी सिंधीपन घोषित करता, कहते ऐसा ज्ञानी
ज्यों ब्रजलानी, सजनानी, चेनानी, असरानी
चेनानी, असरानी, जय हो लालकृष्ण अडवानी
कुंदनानी, घनश्यानी, छुट्टानी, परदानानी
नी से बनाओ नाम साईं के, खूब करो मनमानी
जैसे पीकदानी, चूहादानी, एवं मच्छरदानी

सजनानी अर्थात स्वामी राज सत्यार्थी, जबलपुर। कुंदनानी अर्थात स्वामी शिवम भारती, जबलपुर। छुट्टानी यानी स्वामी दयाल भारती। अडवानी तो तुम जानते ही हो कि कौन। चेनानी--स्वामी अरूप कृष्ण। घनश्यानी--स्वामी आनंद सरस्वती। और परदानानी यानी सीता मैया।
दादा चूहड़मल फूहड़मल से एक सिंधी बाई ने पूछा, दादा साईं, मुझे रात में अकेलेपन से बहुत घबड़ाहट होती है, मैं क्या करूं? लगता है कि कोई मेरे पलंग के नीचे छुपा बैठा है। इससे कैसे छुटकारा हो?
दादा बोले, इसमें घबराने की क्या बात है री बाई, अरे बिजली जला ली और बिजली के जलते ही तू अकेली नहीं रह जाएगी, घबड़ाहट अपने आप मिट जाएगी।
बाई ने पूछा, बिजली के जलते ही वहां कोई और आ जाएगा क्या?
दादा बोले, लो, इतनी-सी बात समझ नहीं आती। अरे बिजली के जलते ही मैं पलंग के नीचे से निकल आऊंगा। अंधेरे में निकलते मुझे भी डर लगता है।
झामनदास ने एक नई राशन की दुकान खोली। राशन की दुकान में खूब भीड़ लगी। लोग एक-दूसरे को धक्कम-धक्का कर रहे थे। एक व्यक्ति लाइन में घुस जाने की कोशिश कर रहा था। दोत्तीन बार कोशिश कर चुका था। जब चौथी बार गुस्से से लाइन में घुसा तो एक पहलवान ने उसे घूंसा मारा और उठा कर बाहर फेंक दिया। वह व्यक्ति बोला, तुम मुझे नहीं जानते, छोड़ दो, मैं तो जा रहा हूं, अब मुझे नहीं घुसना।
पहलवान ने कहा, जा-जा, तू क्या कर लेगा?
तभी वह व्यक्ति गुस्से में आकर बोला, क्या कर लूंगा, अरे अब राशन की दुकान नहीं खोलूंगा। मरो, जाओ, मरो। मैं झामनदास हूं।
सिंधी जो न करें थोड़ा, तू ठीक कहती है। और जानकारी तूने खूब दी! और तू कहती है कि कृष्ण को कोई सिंधी बाई नहीं मिली। मिल जाती तो कृष्ण संन्यासी हो गए होते। अर्जुन को न समझाते कि बेटा कहां भाग रहा है, खुद ही भाग गए होते, पहले ही भाग गए होते। सिंधी बाइयां अगर न हों तो संसार में संन्यास का कोई अर्थ ही नहीं है। क्या सार? यह तो सिंधी बाइयों का ही काम है, जो उन्होंने अच्छे-अच्छों को अखाड़े से भगा दिया।
और तू कहती है, "लगता है सिंधी माइयां आपके इंतजार में थीं, अचानक कहां से प्रकट हो गईं, समझ में नहीं आता।'
बात सच है, मेरे ही इंतजार में थीं। मुझे कोई माई, मुझे कोई साईं, कोई नहीं भगा सकता। मुझे किसी से कोई डर ही नहीं है, क्योंकि मुझे बैकुंठ जाना नहीं है। सिंधी माइयों को खुद ही मैं नरक ले जाने की तैयारी कर रहा हूं कि आओ! जैसे कृष्णा पंजाबी को कितना बुलाया दो दिन कि चल बाई, आ जा; मगर अब चुप हो गई है। आज नहीं कुछ पूछा। देखा कि यह खतरे का मामला है, इसमें उलझना ठीक नहीं। वैसे पूछ रही थी कि तटस्थ कैसे होना इत्यादि-इत्यादि, अब शांत बैठी है, चुप्पी मारे, कि अपने को प्रकट न करना ही ठीक है।
कितना ही चुप्पी मार कर बैठ, अब भाग नहीं सकती। और कहीं भी भाग जा, मैं तेरा पीछा करूंगा। मैं उनमें से नहीं हूं कि मेरा कोई माइयां पीछा करें, मैं उनका पीछा करता हूं। मुझे भ्रष्ट तो किया ही नहीं जा सकता। मैं तो भ्रष्ट जहां तक आदमी हो सकता है वहीं पहुंच ही गया, पहले ही से। जीसस का वचन मान कर चलता हूं। जीसस ने कहा: अंतिम खड़े हो जाओ। सो मैं पहले ही वहीं खड़ा हो गया। मुझे क्या कोई वहां से...वहां से आगे कोई जगह ही नहीं है। कृष्ण को जैनियों ने सातवें नरक में भेज दिया। इसीलिए भेज सके कि कृष्ण चढ़ने की कोशिश कर रहे होंगे स्वर्ग में। मैं सातवें नरक में पहले ही से अड्डा जमाए बैठा हूं। मेरा जैन भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते। अब कहां भेजोगे? अब तो कोई जगह भी नहीं है।
कहते हैं कि लाओत्सू जब कहीं जाता था किसी सभा वगैरह में तो हमेशा जहां लोग जूते उतारते थे वहीं बैठता था। कई दफा उससे लोगों ने कहा, अंदर आइए, ठीक जगह से बैठिए। आप और वहां बैठें? वह कहता कि नहीं, यहीं। क्योंकि यहां से मुझे कोई हटा नहीं सकता। कोई हटाना ही नहीं चाहेगा। और कहीं बैठूं तो शायद कोई हटाने आ जाए।
जीसस ने कहा: धन्य हैं वे जो अंतिम हैं, क्योंकि अब उन्हें और हटाया नहीं जा सकता।
तो मैं तो अंतिम हूं। अब मुझे कोई हटाने का उपाय नहीं है। तो मैं किसी से क्या डरूं? सिंधी माई मेरा क्या बिगाड़ेगी? इसलिए सिंधी माइयां प्रकट हो रही हैं। और-और प्रकट होंगी, तू देखना अभी। अभी तो निमंत्रण भेज रहा हूं, धीरे-धीरे सब माइयां यहां आएंगी। ये सब ब्रह्माकुमारियां यहां आने वाली हैं, क्योंकि पांच-सात साल में कोई प्रलय होने वाली है?
मैं कहता हूं, अभी करवा दूं प्रलय, कहां की तुम बातों में पड़े हो, पांच-सात साल! इतनी क्या प्रतीक्षा करनी? संन्यास लिया कि प्रलय हुई। संन्यास यानी मृत्यु। और संन्यास यानी नया जन्म।

आज इतना ही।




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