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शनिवार, 16 मई 2026

04 - न और न छोर - (कविता)-ओशो की मधुशाला

04- न और न छोर — (कविता)

न कोई और है न छोर है उसका,

केवल एक गति भर है,

जो एक सम्मोहन बन कर छाई है।

हर और जहां-तहां,

चर-अचर, उस अनंत बिंदु के छोर तक।

बन कर एक उदासी सी शांति

जो आभा की तरह चमकती है,

और एक गहन तमस का बनती है उन्माद।

ये कोई प्रलाप के बादल नहीं है ‘’प्रिय’’,

केवल मन का छलावा मात्र है,

जो भाषा भी परिभाषा हम जानते है।

वो तो उस का झूठा प्रतिबिंब है

फैलने दो चेतना को एक बार  

मिटने दो सागर में,

सागर होने तक

तोड़ दो सारे बंधन,

किसी नाते या संबंधों के

अहं दीवारों न जकड़ा है जिन्‍हें

शायद तब मिट कर ही जान सको

तुम खूद को खुदा बनने से पहले नहीं

अपने होने ही का नाम है—‘’पूर्णता’’

एक आनंद। न होने का

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