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रविवार, 2 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-037)

उपशांत इंद्रियां और कुशल सारथी—प्रवचन—37



सूत्र:

यस्‍सिन्‍द्रियानि समथं गतानि अस्‍सा यथा यथा सारथिना सुदंता।

पहीनमानस्‍स अनासवस्‍स देवापि तस्‍स पिहृयंति तादिनो ।।85।।


पठवीसमो नौ विरूज्‍झतिइंदरवीलूपमो तादि सुब्‍बतो।
रहदो व अपेत—कद्दमो संसारान भंवति तादिनो ।।86।।

संतं अस्‍स मनं होति संता वाचा न कस्‍स च।
सम्‍मदज्‍जा विमुत्‍तस्‍स अपसंतस्‍स तादिनो।।87।।



      संसार तो एक बाजार है; स्वयं को छोड़कर  सभी कुछ वहां मिलता है। जो पाने योग्य है, उसे छोड़कर  सभी कुछ वहां पाया जा सकता है। जिसे पाकर और पाने की सब चाह चली जाती है, बस उसी को तुम वहां न पा सकोगे। बहुत कुछ वहां मिलता है, सभी कुछ वहां मिलता है, लेकिन जो भी वहां मिलता है, उससे और पाने की चाह बढ़ती चली जाती है। जल कुछ ऐसा मिलता है कि प्यास घटती नहीं, जलन बुझती नहीं, तृप्ति आती नहीं; जैसे जल नहीं, प्यास की आग में संसार घी बनकर पड़ता चला जाता है।

और मनुष्य का मन ऐसे है, जैसे छोटा सा बच्चा बाजार में आया हो, मेले में आया हो, और हर चीज को खरीदने के लिए ठिठक जाता है; और हर चीज को खरीदने के लिए रोने लगता है, तड़फने लगता है, परेशान होने लगता है। और यह बच्चा सारी चीजें भी खरीद ले और सांझ होते—होते, दुकानें बंद होते—होते अपने घर बहुत सा खेल—खिलौना लेकर आ जाए तो भी खेल—खिलौने ही हैं; उनका कोई मूल्य नहीं है। उनसे आशा तो बंधती है, बड़ी आशा बंधती है, लेकिन आशा कभी पूरी नहीं होती। दो—चार दिन बाद बच्चा पाता है कि जिन खेल—खिलौनों के लिए इतना ठिठका, इतना रोया, इतना परेशान हुआ, उसने खुद ही उन्हें छोड़—छोड़कर कोनों में डाल दिया है। खुद ही उन्हें बाहर फेंक आया है।
लेकिन मन एक पुनरुक्ति है। बार—बार तुम वही करते हो, फिर भी जाग नहीं आता। और एक बच्चा होता तो ठीक है, तुम्हारे भीतर वासनाओं की बड़ी बचकानी भीड़ है। हर इंद्रिय की न मालूम कितनी वासनाएं हैं। हर इंद्रिय पर्त दर पर्त वासना ही वासना है। पूरे जन्म बीत जाते हैं, हाथ कुछ भी लगता नहीं। और इतनी समझ भी नहीं लगती कि जहां हम खोजते थे, वहां मिलने को ही कुछ भी न था।
जिसे यह दिखाई पड़ने लगा, जो दुकानों की तरफ से उपेक्षा से गुजरने लगा, जिसके भीतर धीरे—धीरे अपने को खोजने की तलाश पैदा हुई, जिसे यह खयाल आया कि जब अपने को ही नहीं पाया तो और कुछ पाकर करूंगा भी क्या? यह बोध जन्मा कि सब पाने के पहले अपने को पा लेना जरूरी है, तो बुनियाद बनेगी तो आधार पड़ेगा। तो ही जीवन का भवन खड़ा हो सकता है। अपने को बिना पाए रेत पर बनाते हैं हम भवन को। अगर गिर—गिर जाए तो कसूर किसका है?
बुद्ध के आज के सूत्र इंद्रियों की दौड़, मन की व्यर्थ वासनाओं की अभिलाषा; और कैसे उन वासनाओं के कोई पार होता है, उस संबंध में हैं।
जवानी, हुस्न, गमजे, अहद, पैमां, कहकहे, नगमे
रसीले होंठ, शर्मीली निगाहें, मरमरी बांहें
यहां हर चीज बिकती है, खरीददारो
बताओ क्या खरीदोगे?
भरे बालू गठीले जिस्म, चौड़े आहनी सीने
बिलखते पेट, रोती गैरतें, सहमी हुई आहें
यहां हर चीज बिकती है, खरीददारो
बताओ क्या खरीदोगे?
सभी कुछ बिक रहा है—सिर्फ एक तुम को छोड़कर ।
सभी कुछ दुकानों में सजा है—सिर्फ एक तुम को छोड़कर ।
सभी कुछ बाजार में उपलब्ध है—सिर्फ एक तुम हो कि बाजार में तुम उसे न पा सकोगे। सिर्फ एक तुम हो कि तुम उसे बाहर कहीं भी न पा सकोगे। सिर्फ एक तुम हो, जो बाजार के बाहर हो। सिर्फ एक तुम हो, जो कमोडिटी नहीं; अन्यथा सब चीजें बाजार में हैं, अन्यथा सभी चीजें अर्थशास्त्र हैं। सिर्फ एक तुम हो, जो अर्थशास्त्र के हिस्से नहीं।
इसलिए मार्क्स ने—कम्यूनिजम के जन्मदाता ने—तुम्हें स्वीकारा ही नहीं; उसने कहा, आदमी के पास कोई आत्मा नहीं है। क्योंकि जो बाजार में न बिक सके, वह उसकी समझ के बाहर है। वस्तुएं समझ में आती हैं, आत्मा समझ में नहीं आती। क्योंकि जिसका मूल्य हो सके, उसकी ही समझ हो सकती है! आत्मा का क्या मूल्य है?
मार्क्स ने जीवन के सारे पहलुओं पर बड़ी ठीक—ठीक दृष्टि दी है, लेकिन सारी दृष्टि भ्रांत हो गई, क्योंकि बुनियाद गलत हो गई। सिर्फ एक बात को इनकार कर गया—आत्मा। आत्मा को उसे इनकार करना ही पड़ेगा। वह शुद्ध अर्थशास्त्री है, इकोनामिस्ट है। आत्मा को जगह नहीं है वहां।
अर्थ के पार है धर्म। बाजार के पार हो तुम। जहां वस्तुओं की दौड़ समाप्त होती है, वहीं अपनी खोज शुरू होती है।
और जब तक तुम वस्तुएं मांगते रहोगे—फिर चाहे वे वस्तुएं तुमने जाकर मंदिर में परमात्मा से ही क्यों न मांगी हों, तुम बाजार की ही मांग कर रहे हो। फिर वे वस्तुएं चाहे तुमने स्वर्ग में ही क्यों न मांगी हों, न मांगी हों इस पृथ्वी पर, इससे भेद नहीं पड़ता। बाजार कहीं के भी हों, जमीन के हों कि इंद्रपुरी के हों, इससे क्या भेद पड़ता है? बाजार बाजार है।
जब तक तुम्हारी समझ में एक बहुत बुनियादी खयाल नहीं आ गया है कि जानने योग्य मैं हूं र पाने योग्य मैं हूं, खोजने योग्य मैं हूं फिर शेष सब खोज लेंगे इसके बाद। अपना तो ठीक—ठीक पता हो जाए कि मैं कौन हूं? कहा से हूं? क्या हूं? मालिक का तो पता लगा लूं? फिर मालकियत भी खोज लेंगे। सम्राट की तो थोड़ी पहचान कर लें, फिर साम्राज्य भी खोज लेंगे।
और मजे की बात यह है कि जिसने स्वयं को पाया, वह इस पाने में ही सभी कुछ पा लेता है, सभी खोज पूरी हो जाती है।
महावीर ने कहा है? एक को पाने से सब पा लिया जाता है। एक को जानने से सब जान लिया जाता है।
लेकिन इस एक से हम बचते रहते हैं। कारण है र कारण बड़ा उलझा हुआ है। कारण बड़ा दुरूह है, बेबूझ है, पहेली जैसा है। कारण यह है कि यह एक हमें मिला ही हुआ है, इसलिए हम इसे पाने की कोशिश नहीं करते। पाने की कोशिश तो स्वभावत: उसी के लिए होती है, जो हमें मिला हुआ नहीं है। आंख उसी को देखती है, जो हमारे पास नहीं है। दूर पर नजर जाती है, पास से चूक जाती है।
और तुम अपने इतने पास हो कि तुम्हारे और तुम्हारे बीच में कोई फासला ही नहीं है। तुम-तुम हो; मिले ही हुए हो, इसीलिए चूकते जा रहे हो। यह जो दुर्घटना घटी है कि मछली पूछती है, सागर कहां है; यह जो दुर्घटना घटी है कि आदमी अपनी खबर ही भूल जाता है, विस्मरण ही हो जाता है कि मैं भी हूं; वह इसीलिए घटी है कि तुम पहली तो बात, मिले ही हुए हो।
दूसरी बात : तुम मौजूद हो। तुम्हारा स्वभाव ही तुम हो। यह इतने निकट है, यह इतने करीब है कि देखने के लिए जगह चाहिए, फासला चाहिए। अगर आंख बहुत करीब आ जाए किसी चीज के तो देख नहीं पाती; थोड़ी दूरी चाहिए।
मुल्ला नसरुद्दीन एक गवाही के लिए अदालत में गया था। किसी ने गोली चलाकर किसी को मार दिया था। उससे न्यायाधीश ने पूछा कि तुम कितनी दूर थे? उसने कहा, यही कोई दो मील के करीब। न्यायाधीश ने कहा, दो मील! तुम्हें कितनी दूर से दिखाई पड़ता है? उसने कहा, ठीक—ठीक नहीं कह सकता, चांद—तारे मुझे दिखाई पड़ते हैं। हिसाब आप कर लो। चांद—तारे दिखाई पड़ते हैं!
असल में दिखाई पड़ने के लिए दूरी चाहिए। जैसे—जैसे चीजें निकट आने लगती हैं, धुंधली होने लगती हैं। राह पर गुजरती स्त्री दिखाई पड़ती है, अपनी पत्नी दिखाई नहीं पड़ती। जो दूसरे के पास है, दिखाई पड़ता है, जो अपने पास है, नहीं दिखाई पड़ता। जिस मकान में तुम रहते हो, वह दिखाई नहीं पड़ता, पड़ोसी जिसमें रहता है, वह दिखाई पड़ता है—दूरी चाहिए।
अब यह बड़ा मुश्किल है; तुम से तुम्हारी दूरी कैसे हो? कोई उपाय नहीं कि तुमसे तुम्हारी दूरी हो जाए। इसलिए धीरे— धीरे हम उसको विस्मरण ही कर देते हैं, जो हम हैं। खोया नहीं है हमने स्वयं को, विस्मरण किया है।
इसलिए धर्म पाने की कला नहीं है, सिर्फ स्मरण की कला है, याद की कला है। खोया कभी भी नहीं है; विस्मरण हुआ है। सुध भूल गई है, सुरति खो गई है। तुम नहीं खो गए हो, सिर्फ याद खो गई है।
जो मिला ही है, इसे पाने के लिए क्या करना पड़ेगा?
जो मिला ही है, इसे पाने के लिए वस्तुत: कुछ करना नहीं है; जो नहीं मिला है, उसे पाने की दौड़ अगर थोड़ी देर को रुक जाए, बस काफी है। विधायक रूप से इसे
पाने के लिए कुछ भी नहीं करना है, यह मिला ही हुआ है। सिर्फ तुम इसे भूलने के लिए इसकी तरफ पीठ किए जो—जो कर रहे हो, वह रुक जाए, तो तुम सन्मुख हो जाओ। विमुख होना रुक जाए तो तुम सन्मुख हो जाओ।
इसलिए सारे बुद्ध पुरुष इंद्रियों की, वासनाओं की दौड़ से तुम्हें छूटने को कहते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि इंद्रियों की वासनाओं में कुछ खराबी है; कुछ भी नहीं है वहां, सपना है; न कुछ खराबी है, न कुछ भलाई है वहां कुछ है ही नहीं—ख्वाब है, कल्पना है।
लेकिन तुम्हें बड़ी गलत बातें समझाई गई हैं। तुम्हें यह समझाया गया है कि इंद्रियों में कुछ खराबी है, इसलिए उनसे मुक्त हो जाओ। इंद्रियों में कुछ भी खराबी नहीं है, सिर्फ धोखा है, मृग—मरीचिका बस, ज्यादा से ज्यादा। दिखाई पड़ता है कि दूर सरोवर है, है नहीं। उस दिखाई पड़ने वाले सरोवर में कोई भी खराबी नहीं है, सिर्फ भ्रमजाल है। इसलिए जिन्होंने जाना, उन्होंने इसे माया कहा है।
माया का अर्थ होता है : जो मालूम होती है और है नहीं। अब जो है ही नहीं, उसमें खराबी क्या होगी? खराबी होने के लिए तो होना जरूरी है।
इंद्रियों में कुछ खराबी नहीं है। अगर तुमने इंद्रियों में खराबी देखकर उन्हें छोड़ा तो तुम कभी छोड़ ही न पाओगे। क्योंकि तुम खराबी मानकर चले, इसका अर्थ है कि तुमने इंद्रियों के यथार्थ को स्वीकार कर लिया कि वे हैं। तुम अगर बाजार से डरकर भागे तो बाजार की याद तुम्हें सताती रहेगी; फिर पहाड़ तुम्हें बाजारों से मुक्त न कर पाएंगे। हिमालय की भी वैसी सामर्थ्य नहीं। तुम जहां भी जाओगे, बाजार तुम्हारे साथ ही रहेगा। और ध्यान रखना, कल्पना के बाजार और भी मधुमय मालूम होते हैं, और भी मधुर, और भी मदिर।
एक तो सभी बाजार कल्पना के हैं। बाहर के बाजार ही कल्पना के हैं। जब तुम आंख बंद करके उन कल्पना के बाजारों को देखते हो तो उनमें और हजार रंग जुड़ जाते हैं, हजार सुगंधें आ जाती हैं।
इसलिए तो एक मजे की घटना घटती है रोज, पर तुम पकड़ नहीं पाते, कि जो चीज तुम्हारे पास नहीं होती, बड़ी सुंदर मालूम होती है, हाथ में आते ही उतनी सुंदर नहीं रह जाती। जिस महल के लिए तुम वर्षों तड़फे थे, बन जाने पर अचानक तुम थके से खड़े रह जाते हो। अब क्या करना है? जिस कार के लिए तुम पागल होकर दौड़े थे, पोर्च में आकर खड़ी हो जाती है, तुम भी थके से खड़े रह जाते हो; अब क्या करना है? जो सौंदर्य मालूम पड़ा था, जो सुख की आशा बंधी थी, हाथ में आते ही खोने लगती है। मृग—मरीचिका दूर से ही दिखाई पड़ती है, पास आने पर मिट  'जाती है।
तो पहला सूत्र तो यह खयाल रखो कि देखने के लिए दूरी जरूरी है; पास जो है, वह भूल जाता है।
दूसरा सूत्र याद रखो कि जैसे—जैसे चीजें पास आती हैं, वैसे ही पता चलता है, कौन सत्य है, कौन झूठ है! पास आने पर ही सचाई और झूठ का निर्णय होता है। जो झूठ है, वह पास आते—आते खोने लगता है, बिखरने लगता है। जो सच है, वह पास आते—आते बढ़ने लगता है।
इमर्सन ने कहा है कि महापुरुष वही है, जिसके पास आने पर वह और भी बड़ा होता चला जाए। दूर से तो हजारों महापुरुष मालूम होते हैं; पास आने की बात है। पास आने पर जो छोटा होने लगे, समझना कि महापुरुष होना मृग—मरीचिका थी। पास आने पर जो और बड़ा होने लगे, तुम जैसे—जैसे पास आओ, उसका शिखर इतना ऊंचा उठने लगे कि तुम्हारी आंखें भी वहां तक न पहुंच पाएं; जब तुम उसके बिलकुल निकट आकर खड़े हो जाओ तो वह तुम्हारी दृष्टि से बहुत दूर, अनंत आकाश में उठ जाए, तो ही जानना कि महापुरुष है।
पास आने पर ही सत्य का पता चलता है।
इंद्रियों में कुछ खराबी नहीं है; इंद्रिया सपने देखनें के ढंग हैं। सारा मन ही स्वप्न देखने का यंत्र है; स्वप्‍न देखने की बड़ी कुशल व्यवस्था है। और इसे ऐसा नहीं है कि तुम नहीं जानते हो; तुम जानते हो, लेकिन जानना नहीं चाहते हो। तुम डरते हो कि कहीं यह बात गहरी होकर भीतर बैठ न जाए।
ऐ नासेहो! बेफायदा समझाते हो मुझको
मैं खूब समझता हूं मगर दिल से हूं नाचार
कोई समझाए भी तो तुम यही कहते हो : समझता तो मैं हूं, व्यर्थ मेहनत मत करो मुझे समझाने की, मगर मैं मजबूर हूं दिल से मजबूर हूं।
यह बात झूठ है। जो समझता है, वह बाहर हो जाता है।
मेरे पास लोग आते हैं; वे कहते हैं, हम जानते हैं, क्रोध व्यर्थ है, फिर भी हो जाता है। मैं उनसे कहता हूं तब तुम जानो कि अभी तुमने जाना नहीं। क्योंकि ऐसा कभी होता ही नहीं। जो जान लिया जाए, वह जीवन बन जाता है। जो जानकर भी जीवन न बने, वह जाना ही नहीं गया। तुम वहा भी अपने को धोखा दे रहे हो। मन ने तुम्हें वहां भी भरमाया, भटकाया।
मैं खूब समझता हूं मगर दिल से हूं नाचार
ऐ नासेहो! बेफायदा समझाते हो मुझको
तुम यह भी समझ लेते हो कि तुम समझते हो; यह समझने से बचने की तरकीब हुई। तुम यह भी मान लेते हो कि जान लिया; यह जानने के बीच तुमने दीवाल खड़ी कर ली। यह सच है कि बहुत मौके आए थे जानने के, यह बात सच है; लेकिन उन मौकों को तुम चूकते गए हो। उन मौकों के कारण ही तुमको यह भ्रम होता है कि तुमने जान लिया, माना।
कितनी बार तुमने क्रोध किया, कितनी बार कामवासना से भरे, कितनी बार घृणा ने पकड़ा, कितनी बार हिंसा तुम्हारे हृदय में उठी, बहुत—बहुत मौके आए; वे जानने के मौके थे, तुम जान नहीं पाए। जान लेते तो फिर उनका आना बंद हो जाता। जाना नहीं, जागे नहीं कि क्रांति शुरू हुई। क्रांति फिर ठहरती नहीं।
ज्ञान को जीवन में बदलने के लिए कोई कृत्य नहीं करना पड़ता।
ज्ञान की परिभाषा यही है : जो अपने आप कृत्य बन जाए। जो ज्ञान कृत्य न बने, जिसे बनाना पड़े, वह ज्ञान ही नहीं; वह किसी से उधार ले लिया होगा। वह तुम्हारी समझ नहीं, तुम्हारी दृष्टि नहीं, वह किसी और की दृष्टि होगी।
बुद्ध का पहला सूत्र है :
'सारथी द्वारा दान्त किए गए घोड़े के समान जिसकी इंद्रियां शांत हो गई हैं, वैसे अहंकाररहित, अनास्रव पुरुष की देवता भी स्पृहा करते हैं। '
एक—एक शब्द को गौर से समझना, क्योंकि उनके साथ बड़ी गलत व्याख्याएं जुड़ी रही हैं। और करीब—करीब गलत व्याख्याएं इतनी प्राचीन हो गई हैं कि जाने—अनजाने, हम सभी उनकी गिरफ्त में आ गए हैं।
'सारथी द्वारा दान्त किए गए घोड़े के समान। '
अगर तुम बौद्ध भिक्षुओं से पूछो तो वे कहेंगे, जैसे सारथी घोड़े को दमन कर देता है, जैसे सारथी घोड़े पर लगाम बांध देता है, जैसे सारथी कोड़े से घोड़े को मजबूर कर देता है, ऐसे ही जिस व्यक्ति ने अपनी इंद्रियों को दमन किया है, कोड़ों से मारा है, सारथी की तरह लगामों से बाधा है, हजार तरह के कष्ट दिए हैं ताकि इंद्रिया झुक जाएं, तप किया है—ऐसा वे अर्थ करेंगे। चूक हो रही है।
तुम फिर से किसी सारथी को घोड़े को शिक्षण देते देखो। अगर सारथी कुशल है तो कोड़ा सिर्फ दिखाता है, मारता नहीं। अगर मारता है तो सारथी नहीं है। अगर सारथी और भी कुशल है तो सिर्फ कोड़ा पास ही रखता है, दिखाता भी नहीं। जो दिखाता है, वह अभी भी कुशलता के मार्ग पर जा रहा है। अगर सारथी और भी कुशल है तो कोड़े की सिर्फ अफवाह फैलाता है, साथ भी नहीं रखता।
घोड़े को ठीक—ठीक सारथी प्रेम करता है, मित्रता बनाता है, थपथपाता है, स्नान करवाता है, घोड़े से मैत्री साधता है, घोड़े और अपने बीच एक अंतर्संवाद की स्थिति बनाता है, घोड़े की भाषा समझने की कोशिश करता है, अपनी भाषा घोड़े को समझाने की कोशिश करता है।
जर्मनी में एक बहुत प्रसिद्ध घोड़ा था। हंस उस घोड़े का नाम था। उससे ज्यादा प्रसिद्ध घोड़ा दुनिया में दूसरा कभी नहीं हुआ; कुछ ही वर्ष पहले मरा। उस घोड़े की सारे जगत में ख्याति हो गई थी। दूर—दूर से उसके लोग दर्शन करने आते थे। क्योंकि उस घोड़े ने एक अदभुत चमत्कार दिखलाना शुरू किया था; और वह यह कि वह कुछ गणित के सवाल हल करने लगा था। तुम उससे पूछो, दो और दो कितने? तो वह अपने पैर से टाप मारकर चार चोट कर देता।
      बहुत दिन तक यह बात चली। लेकिन एक वैज्ञानिक ने कोई तीन वर्ष मेहनत की उसके साथ और तब वह पकड़ पाया कि मामला क्या था। घोड़ा कुछ बुद्धिमान नहीं था, घोड़े को कुछ पता ही नहीं था संख्या का और गणित का। लेकिन सारथी और घोड़े के बीच एक अंतर्संवाद बन गया था। तो वह सारथी पास खड़ा रहता। घोड़ा सिर्फ इतना जानता था कि सारथी जब सिर झुकाता, तब वह टाप रोक देता? इससे ज्यादा कुछ जानता नहीं था। लेकिन उसने सारी दुनिया के बड़े—बड़े बुद्धिमानों को धोखा दे दिया।
अब वह सिर झुकाना भी इतना बारीक था कि इस वैज्ञानिक को भी तीन साल लग गए यह बात पकड़ने में कि यह आदमी जरा सा सिर झुकाता है और घोड़ा टाप रोक देता है। जब तक वह सिर नहीं झुकाता, वह टाप मारता रहता है। हिसाब सारथी करता है, इशारा सारथी करता है, घोड़ा सिर्फ इशारा पकड़ता है। उसने बड़े—बड़े गणित के सवाल हल किए। वह सदा ठीक—ठीक उत्तर देता।
और यह वैज्ञानिक भी पकड़ न पाता, एक बार गलती हो गई; सारथी से गणित में गलती हो गई, इसलिए घोड़े से गलती हो गई। गलती के कारण सारथी थोड़ा अचकचा गया, क्योंकि घोड़ा झंझट में पड़ा जा रहा है। इससे थोड़ा खयाल उसको आया कि जरूर करता कुछ है सारथी, घोड़ा सिर्फ अनुगमन कर रहा है।
जो कुशल सारथी है, वह घोड़े से प्रेम निर्मित करता है। घोड़े की भाषा जाननी जरूरी है, अगर घोड़े की मालकियत करनी हो। मार—पीटकर जो घोड़े के ऊपर सवार हो जाता है, वह कोई सारथी थोड़े ही है, वह तो हिंसा से सवार हो गया है।
अब यह मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि दुनिया में दो तरह से लोग अपनी इंद्रियों पर सवार हो सकते हैं : एक वे, जो जबरदस्ती कोड़े मारकर, निरीह इंद्रियों को सताकर, निर्दोष इंद्रियों के साथ हिंसा का व्यवहार करके, भूखा मारकर, रतजगा करवाकर, उपवास—अनशन से, हजार तरह के कष्ट, धूप में खड़े होकर, काटो पर लेटकर, इंद्रियों के साथ हिंसा करने के द्वारा इंद्रियों को वश में करते हुए मालूम पड़ते हैं। इंद्रियां वश में होती नहीं, केवल जड़ हो जाती हैं, मृतवत हो जाती हैं।
इसलिए तुम अपने त्यागियों में जीवन की उत्फुल्लता न देखोगे, जो होनी चाहिए। जो कि भोगी में दिखाई पड़ती है, उतनी उत्फुल्लता भी तुम्हारे त्यागी में दिखाई नहीं पड़ती। तुम्हारे भोगी में भी कभी—कभी नृत्य की भनक आती है, वह भी तुम्हारे त्यागी में नहीं आती।
त्यागी तो नाचता हुआ होना था। जिसे जीवन का परम आनंद मिला हो, जिसे जीवन का सत्य मिला हो, उसकी तो गंध बदल जानी थी; उसके पास तो फूल ही फूल खिल जाने थे। जिसके जीवन में परमात्मा झांका हो, उसके जीवन में तुम कैसी उदासी देखते हो? कैसी मुर्दगी देखते हो? जैसे कब्रिस्तान चारों तरफ हो उसके। जैसे लाशों से घिरा बैठा हो—बैठा है घिरा, अपनी ही लाश से; बैठा है मरा, अपनी ही लाश से। इंद्रियां मार डालीं, मालकियत नहीं हुई। परमात्मा नहीं मिला है, संसार खो गया है।
इसे मैं फिर दोहरा दूं। संसार का खो जाना ही परमात्मा का मिलना नहीं है, यद्यपि परमात्मा का मिलना जरूरी रूप से संसार का खो जाना है। संसार खो गया है, संसार छोड़ दिया है, जबरदस्ती की है, लेकिन परमात्मा इसके हृदय की खिड़की से झाका नहीं। अन्यथा जैसे सूर्योदय हो, ऐसी इसके भीतर कोई ज्योति तुम्हें दिखाई पड़ती। इसके शब्द—शब्द में गीत होता, इसके उठने—बैठने में एक और ही हवा होती, किसी और ही लोक की खबर होती। इसका व्यक्तित्व गाता हुआ होता, जैसे एक मस्ती छाई हो। बिन पीए जैसे पूरी मधुशाला पी गया हो। एक खुमार, ऐसा कि जिसकी गहराई न आंकी जा सके; एक ऐसी मस्ती, जिसको समझने—समझाने का कोई उपाय न पाया जा सके; ऐसी अतर्क्य खुशी, जिसका बाहर कोई कारण न दिखाई पड़ता हो; जो भीतर से ही आती हो और भर—भर जाती हो। तुम इस व्यक्तित्व में झरने पाते। लेकिन वैसा कहीं दिखाई नहीं पड़ता।
कभी कोई बुद्ध, कभी कोई महावीर में दिखाई पड़ा है, लेकिन उनके पीछे चलने वाले में दिखाई नहीं पड़ता। कहीं कोई चूक हो रही है। चूक यही हो रही है कि जो बुद्धों ने कहा है, उसकी बड़ी गलत व्याख्या हो गई है। और गलत इसलिए हो गई है कि जो सरल था, जो हम कर सकते थे, वह हमने कर लिया है। यह बहुत ही आसान है। घोड़े के ऊपर कोड़े बरसा देने से आसान और क्या होगा? बड़ी तृप्ति मिलती है।
लोग दुष्ट हैं। अभी दूसरों के साथ दुष्ट हैं, वही दुष्टता अपने पर लगा देने में बड़ी देर नहीं लगती। अभी दूसरों को सताने में मजा लेते हैं, फिर इसी प्रक्रिया को अपने पर थोप लेने में कोई ज्यादा अड़चन नहीं आती। प्रक्रिया तो सधी—सधाई है, सिर्फ थोड़ी सी दिशा बदलनी होती है। हिंसा औरों के साथ बंद हो जाती है, अपने साथ शुरू हो जाती है।
तुम अपने मंदिरों में, अपनी मस्जिदों में, अपने गुरुद्वारों में न मालूम किस—किस तरह के हिंसक लोगों की पूजा कर रहे हो। तुम जरा गौर से देखो, वे कर क्या रहे हैं? जो तुमने दूसरों के साथ किया है, वही वे अपने साथ कर रहे हैं। तुम दूसरों पर क्रोधी हो, वे खुद पर क्रोधी हैं।
तुम्हारे क्रोध का पता चल जाता है, क्योंकि दूसरा क्यों बरदाश्त करे? उनके क्रोध का पता नहीं चलता, क्योंकि वहा कोई दूसरा है नहीं, खुद ही हैं। अपने को कोई सताए तो शिकायत भी किससे करे? शिकवा भी क्या हो? अपने को ही सताए तो कहने किससे जाए? और जब इस सताने के आधार पर पूजा मिल जाती हो, चरणों में फूल चढ़ने लगते हों, सिर झुकने लगते हों, तो अहंकार को मजा आ जाता है।
अहंकार ही हिंसा का सूत्र है।
तुम दूसरों के प्रति भी हिंसा से भर जाते हो, जहां तुम्हारे अहंकार को चोट लगती है। इसे समझ लेना। दूसरों के प्रति तुम हिंसा करते हो तभी, जब तुम्हारे अहंकार को चोट लगती है। अपने प्रति हिंसा करने वाले आदमी के अहंकार को बड़ा रस आने लगता है, बड़ा भरने लगता है अहंकार। लोग पूजा देते हैं, श्रद्धा देते हैं, सम्मान देते हैं। तुमने कभी खयाल किया?..
एक जैन मुनि मुझे मिलने आए थे; उन्होंने मेरी कुछ बातें सुनी होंगी, कुछ किताबें पढ़ी होंगी, उनको जमीं। सोच—विचारशील आदमी मालूम पड़ते थे। कहने लगे, छोड़ देना चाहता हूं यह। समझ में आया है कि अभी तक सिर्फ अपने को सताता रहा हूं। और अब कठिनाई हो गई है, जब से आपकी बात समझ में आनी शुरू हुई है, तब से यह एक नई बेचैनी शुरू हो गई है कि यह मैं क्या कर रहा हूं? इसे छोड़ देना चाहता हूं।
तो मैंने कहा, पूछना किससे है? इसे लेते वक्त मुझसे नहीं पूछा था, इसे छोड़ते वक्त मुझसे पूछने की क्या जरूरत है?
उन्होंने कहा, पूछना जरूरी है, क्योंकि मैं पचास साल का हुआ; अभी जो मेरे चरणों में सिर रखते हैं, वे मुझे घर में बर्तन साफ करने की नौकरी भी देने को राजी न होंगे। मुझमें कोई और योग्यता नहीं है, बस यही एक योग्यता है—अपने को सताने की, उपवास करने की, व्रत करने की, नियम करने की; यही एक योग्यता है। यही मेरी पूजा और श्रद्धा का आधार है। यह मैं छोड़ देता हूं तो जो मेरे चरणों में सिर रखते हैं, आज सब कुछ लुटाने को तैयार हैं मेरे लिए, वे मुझे घर में बर्तन साफ करने की भी नौकरी न देंगे; इसलिए पूछना जरूरी है।
उस दिन मुझे खयाल आया कि तुम जिनकी पूजा कर रहे हो, तुमने कभी सोचा कि अगर वे अपने को सताना बंद कर दें, तो तुम उनमें पूजा योग्य कुछ भी पाओगे? उनके जीवन में कोई सृजन है? उनके जीवन में स्रष्टा की कोई झलक है? वे सुंदर गीत बना सकेंगे, मूर्तियां रच सकेंगे, चित्र बना सकेंगे, कोई आविष्कार कर सकेंगे, चिकित्सक हो सकेंगे, शिक्षक हो सकेंगे—क्या हो सकेंगे? उनके जीवन मे और कुछ भी नहीं है।
तब मुझे दिखाई पड़ना शुरू हुआ; तब मैंने गौर से देखना शुरू किया तो मुझे लगा कि जीवन में जो लोग किसी भी भांति सफल नहीं हो पाते, जीवन की प्रतिस्पर्धा में जो कहीं भी टिक नहीं पाते, जो सभी तरह से प्रतिभाहीन हैं, वे ही तुम्हारे संन्यासी बन गए हैं। इतना तो कोई भी कर सकता है। खुद को सताने में कोई प्रतिभा की जरूरत है? मूढ़ से मूढ़ व्यक्ति यह कर सकता है।
वस्तुत: तो सिर्फ मूड ही कर सकता है; जिसमें थोड़ी बुद्धि हो, वह करेगा कैसे? क्या उसे यह दिखाई न पड़ेगा—जो दूसरे के साथ करना गलत है, वह अपने साथ करना सही कैसे हो सकता है
जीसस का प्रसिद्ध वचन है कि तुम दूसरों के साथ वही करना, जो तुम चाहते हो कि दूसरे तुम्हारे साथ करें।
इसके साथ ही मैं एक वचन और जोड़ देना चाहता हूं : तुम अपने साथ भी वही करना, जो तुम मानते हो कि दूसरे के साथ करना उचित है। जो दूसरे के साथ करना तक अनुचित है, वह अपने साथ तो करना अनुचित होगा ही। हिंसा को तुम आत्म—हिंसा मत बना लेना। और अक्सर हिंसा आत्म—हिंसा सरलता से बन जाती है।
इसलिए इस सूत्र के जो अर्थ किए गए हैं, वे अर्थ बुनियादी रूप से गलत हैं। उन अर्थों में ऐसा भाव है कि जैसा घोड़े को मार—पीटकर कोई बस में ले आए, ऐसे ही तुम अपने को मार—पीट करके बस में ले आना।
यह संभव नहीं है; यह असंभव है। इंद्रियों को समझना होगा, शरीर को समझना होगा, शरीर की भाषा को समझना होगा। तुम शरीर में बसे हो। तुम्हें शरीर में रहना है। तुम्हें शरीर का उपयोग करना है। भोग के लिए ही नही, तुम्हें ध्यान के लिए भी शरीर का उपयोग करना है।
इस घोड़े को मार मत डालना। इस घोड़े को ऐसा न करना कि खाना खिलाना बंद कर दो, ताकि इतना दीन—हीन हो जाए कि तुम जहां चलाओ, वहीं चले। क्योंकि इसकी ऊर्जा ही खो जाए, इसमें कोई शक्ति ही न रहे।
यह शरीर तो शक्तिशाली हो; क्योंकि इसी शरीर की तरंगों पर यात्रा करनी है। यह शरीर संसार में ही नहीं लाता, यही शरीर परमात्मा में भी ले जाता है। इसी शरीर से उसके द्वार भी खुलेंगे। यह शरीर मंदिर है।
इसलिए मैं इस सूत्र की व्याख्या करता हूं : एक कुशल सारथी घोड़े के साथ दोस्ती बांधता है, गहरी मैत्री स्थापित करता है, प्रेम का हाथ फैलाता है। धीरे—धीरे... और प्रेम का हाथ कौन नहीं समझता? घोड़े भी समझ लेते हैं। प्रेम का हाथ कौन नहीं समझता? प्रेम के हाथ को समझने के लिए बुद्धिमानी की जरूरत नहीं, केवल हृदय धड़कता हो, बस काफी है। प्रेम के हाथ को शरीर भी समझ लेता है।
तुमने कभी यह खयाल किया? शरीर शास्त्र की भाषा न समझे, प्रेम की भाषा समझ लेता है। अगर कोई तुम्हारे हाथ पर हाथ प्रेम से रखे तो क्या तुम्हें समझने में देर लगती है?
कभी मां अपने बेटे को चांटा भी मार देती है, चांटा तो वही है, लेकिन भीतर हाथ में प्रेम की ऊर्जा है। फिर कोई और उसे चांटा मार देता है, चाटा वही है, भौतिकशास्त्र कुछ भेद न कर पाएगा; दोनों में एक ही घटना घटी है, लेकिन बेटे के हृदय में व्याख्या बड़ी भिन्न है। मां के प्रति वह क्रोध से नहीं भरता, शायद और भी गहरे अनुग्रह से भर जाता है। उसने मारा, वह प्रेम के ही कारण। किसी दूसरे ने मारा, वह प्रेम के कारण नहीं। हाथ की ऊर्जा बदल जाती है। हाथ की उष्मा बदल जाती है। शरीर भी भाषा समझता है। तुमने कभी खयाल किया? किसी व्यक्ति के पास बैठकर, अचानक प्रफुल्लता तुम्हारे भीतर सरकने लगती है, सुबगने लगती है। किसी दूसरे व्यक्ति के पास बैठकर, अचानक तुम दीन—हीन मालूम होने लगते हो। कुछ तुम्हारे भीतर सिकुड़ने लगता है। किसी व्यक्ति के पास आते ही, जैसे सुबह करीब आ जाए; और किसी दूसरे व्यक्ति के पास आते ही, जैसे सुबह दूर हो जाए। किसी व्यक्ति के पास आते ही, जैसे फूल खिलने लगें, और किसी व्यक्ति के पास आते ही, जैसे सब मुर्झा जाए।
शरीर की भाषा है। शरीर की भाषा को समझना होगा। शरीर की भाषा को जिसने समझना शुरू किया, वही सारथी है। शरीर से लड़ना नहीं है, यह तो पागलपन है। जिसकी तुम सवारी कर सकते हो, जो तुम्हें दूर—दूर की यात्रा पर ले जाता है, उसके साथ संघर्ष में उतर जाना निपट अज्ञान है।
'सारथी द्वारा दान्त किए गए घोड़े के समान। '
दान्त का अर्थ, सारथी के प्रेम में शांत हो गए घोड़े के समान। सारथी के प्रेम, सारथी की समझ, सारथी के अनुग्रह में घोड़ा जैसे दान्त हो' जाता है, झुक जाता है, स्वीकार कर लेता है। क्योंकि एक बात सारथी की समझ में आ जाती है घोड़े को कि घोड़ा जितना अपने को चाहता है, उससे भी ज्यादा सारथी चाहता है। एक बात समझ में आ जाए घोड़े को कि जो मैं करूंगा, उसमें शायद भूल भी हो जाए, सारथी जो करेगा, उसमें भूल न होगी। सारथी मुझसे ज्यादा समझदार है—बस, पर्याप्त है। घोड़ा शांत होकर पीछे चलने लगता है।
जैसे छोटा बच्चा अपने पिता का हाथ पकड़ लेता है और साथ चल पड़ता है, यह जानता है कि मैं भटक जाऊं, पिता न भटकेंगे। वे ज्यादा जानते हैं, जीवन उन्होंने ज्यादा देखा, रास्ते उन्होंने ज्यादा पहचाने हैं। हाथ पकड़ लिया, बात भूल जाती है। फिर वह मस्ती से चलता है। भला पिता परेशान हो, चिंतित हो कि कहीं भूल न जाए, भटक न जाए, लेकिन बेटे को अब कोई चिंता नहीं है। वह और हजार बातें करता है, लेकिन भटकने की कोई चिंता नहीं।
जिस दिन तुम्हारा शरीर और तुम्हारे बीच मैत्री का संबंध बन जाता है, जिस दिन तुम कुशल हो जाते हो शरीर की भाषा समझने में और शरीर को अपनी भाषा समझाने में, उस दिन शरीर तुम्हारे पीछे चलने लगता है; उस दिन इंद्रियां यहां—वहां नहीं भागती, तुम्हारे पीछे चली आती हैं। जैसे गड़रिए के पीछे उसकी भेड़ें चली आती है, ऐसी तुम्हारी इंद्रियों का समूह तुम्हारे पीछे चला आता है। और यह बड़े आनंद का अनुभव है, जब तुम्हारी इंद्रियां तुम्हारे पीछे आती हैं।
अभी तो ऐसा है, सभी इंद्रियां सभी दिशाओं में भाग रही हैं। तुम कभी एक के पीछे भागते हो, कभी दूसरे के पीछे भागते हो, कभी तीसरे के पीछे भागते हो। तुम्हारा सारा जीवन आपाधापी के सिवाय और कुछ भी नहीं। अंत में तुम पाओगे कि दौड़—धूप बहुत हुई, हाथ कुछ भी न लगा। अंत में तुम पाओगे, जहां खड़े थे, वहीं समाप्त हो गए।
आए भी लोग, बैठे भी, उठ भी खड़े हुए
मैं जा ही ढूंढता तेरी महफिल में रह गया
तुम जगह ही खोजते हुए—कहां खड़े हों, कहां बैठें—एक इंद्रिय के पीछे भागे, दूसरी के भागे, तीसरी के भागे। तुम इस बिबूचन में, इस विडंबना में ही रहे। आए भी लोग, बैठे भी, उठ भी खड़े हुए
कोई बुद्ध आता है—आता भी है, बैठता भी है, उठ भी खड़ा होता है, जीवन का सार भी ले लेता है, जीवन का निचोड़ ले लेता है; और आगे की यात्रा पर निकल जाता है। और तुम!
मैं जा ही ढूंढता तेरी महफिल में रह गया
मरते वक्त जीवन हाथ से जब चूक जाए, तब कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे मन में भी यही खयाल रह जाए—
आए भी लोग, बैठे भी, उठ भी खड़े हुए
यह रह जाएगा, अगर इंद्रियों के पीछे दौड़ते रहे।
मेरी बात थोड़ी कठिन मालूम होगी। मैं तुमसे कहता हूं : इंद्रियों के पीछे मत दौड़ना। मैं तुमसे यह भी कहता हूं : इंद्रियों को मार—पीटकर अपने पीछे मत कर लेना। क्योंकि जिस व्यक्ति ने मार—पीटकर इंद्रियों को पीछे कर लिया है, वह भला लगे देखने में कि इंद्रियां उसके पीछे चल रही हैं, सच नहीं है यह। वह इंद्रियों के पीछे लगा रहेगा। क्योंकि पूरे वक्त जिसको मार—पीटकर पीछे किया है, उसका खयाल रखना पड़ेगा—भाग न निकले।
तुम्हारे साधु—संन्यासियों को गौर से देखना; तुमसे भी ज्यादा भयभीत! कैप रहे हैं, डर रहे हैं। कोई इंद्रिय छिटक न जाए। कोई वासना निकल न जाए यहां—वहां। इतने प्राण जहा कंपते हों, इतना जहां भय हो, वहां परमात्मा का प्रवेश हो सकेगा? बुद्ध ने कहा है, महावीर न कहा है, अभय उसके आगमन का द्वार है। तो इतने भय में वह आ सकेगा?
नहीं, वह आता है तब, जब तुम मस्ती से गीत गाते चलते हो। तुम अपनी बांसुरी बजाते चलते हो और इंद्रियां तुम्हारे पीछे चलती हैं।
कृष्ण का प्रतीक इसी तरफ इशारा है। लोग बड़ी गलती कर लिए हैं और गलत अर्थ कर लिए हैं। कृष्ण का बांसुरी बजाना और गोपियों का उनके चारों तरफ नाचना—रास की जो कल्पना है, वह यही है। इंद्रिया गोपियां हैं और जब आत्मा की बांसुरी बजने लगती है, वे चारों तरफ नाचने लगती हैं। रास शुरू हो जाता है।
कहते हैं, कृष्ण की सोलह हजार गोपियां थीं—सोलह हजार वासनाएं। यह तो सिर्फ प्रतीक संख्या है। इसका अर्थ होता है, हजार—हजार; बहुत वासनाएं हैं—सोलह हजार—लेकिन अगर भीतर की बांसुरी बजने लगे, कृष्ण का आविर्भाव हो, तब वे सभी गोपियां बन जाती हैं; वे सोलह हजार तुम्हारे आसपास नाचने लगती हैं।
सभी परम पुरुषों के पास रास बना है। और जहा रास न बने, समझना कहीं कोई चूक हो गई। मैं तुमसे कहता हूं? कृष्ण के पास ही गोपियां नहीं नाचती थीं, मैंने उन्हें बुद्ध के पास भी नाचते देखा है; अब भी देखता हूं। यह सदा ही होगा, यह होना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। जब आत्मा मस्ती के गीत गाती है, इंद्रियां सराबोर होकर नाचने लगती हैं।
इंद्रियां तुम्हें तभी तक भटकाती हैं, जब तक तुम कोरे हो और आनंद से शून्य हो। इसलिए इंद्रियां तुम्हें भटका पाती हैं। क्योंकि वे छोटा—मोटा सुख का जो तुम्हें आश्वासन देती हैं, वह अभी तुम्हें सुख मालूम पड़ता है। जब तुम भीतर आनंद से भरे होते हो, जब तुम उन्हें इतना आनंद दे पाते हो, जब तुम उन पर आनंद की वर्षा कर पाते हो, तब इंद्रियां कहां जाती हैं? बाजार छूट जाता है।
और जब इंद्रियां तृप्त होकर तुम्हारा पीछा करती हैं, अनुगमन करती हैं, तुम्हारे साथ नाचती हुई चलती हैं, तब जिंदगी, जिंदगी बनी; तब यात्रा, धर्म—यात्रा बनी; तब कारवां परमात्मा की तरफ चला।
'सारथी द्वारा दान्त किए गए घोड़े के समान जिसकी इंद्रियां शांत हो गई हैं। ' इंद्रिया शांत ही तब होती हैं, जब उन्हें इतना मिल जाता है, जितना उन्होंने कभी सोचा ही न था; और कोई उपाय नहीं है। तुम जबरदस्ती शांत करने की कोशिश कर रहे हो। तुम इसी तरह हो, जैसे कि कोई मां अपने बच्चे को डरा—धमका कर बैठा दे एक कोने में डंडा बताकर कि बैठ वहां कोने में; हिलना—डुलना नहीं। देखा? वह बैठा रहता है दबाए अपने को, मुंह लाल हो जाता है, आंसू बह रहे हैं, हिलता—डुलता नहीं। लेकिन भीतर देखो, तूफान उबल रहा है।
ऐसे ही तुम्हारे साधु—संन्यासी हैं; बैठे हैं नर्क—स्वर्ग के डर से, भय से—कोई डंडा सामने लिए खड़ा है, हिल—डुल नहीं सकते—लेकिन भीतर जरा उनके देखो, भीतर वे भी अपने देखने में डरते हैं, शांत नहीं हुआ है कुछ भी। क्योंकि शांति तो आनंद की छाया है।
शांति का अर्थ है : तृप्ति। शांति का अर्थ है : पा लिया जो पाना था; पा लिया जो सोचा था; पा लिया ज्यादा, जितना चाहा था। स्वप्‍न भी जिसके न देख सकते थे, वह भी पा लिया।
मेरे ख्वाबों के दरीचे से ये झांका किसने
नींद की झील पे ये किसने कमल फैलाए
जैसे ही आनंद की किरण उतरती है, कमल ही कमल फैल जाते हैं। तुम आनंदित होते हो, शांति तुम्हारे चारों तरफ घनीभूत हो जाती है। आनंदित व्यक्ति का लक्षण है शांति। शांति को सीधा मत चाहना, शांति परिणाम है।
मेरे पास लोग आते हैं; वे कहते हैं, शांत होना है। मैं कहता हूं र पहले मस्त तो
हो लो। वे कहते हैं, मस्ती वगैरह से हमें कुछ लेना—देना नहीं, हमें शांत होना है। मैं उनसे कहता हूं पहले नाच तो लो। वे कहते हैं, आप भी क्या बातें कर रहे हैं? हम शांत होने आए हैं। उनको मैं कैसे समझाऊं कि शांति जो है, वह कोई सीधा लक्ष्य नहीं है।
शांति का अर्थ है : तृप्ति, परितृप्ति, परितोष। शांति का अर्थ है ऐसी गहन तृप्ति कि अब वासना की कोई लहर नहीं उठती।
जैसे जब भूख लगी हो तो कैसे शांत होओगे, कहो? जब भूख लगी हो, कैसे शांत होओगे? जब पेट में आग जलती हो, कैसे शांत होओगे? जब प्यास लगी हो और कंठ जलता हो और चारों तरफ रेगिस्तान हो, कैसे शांत होओगे?
लेकिन जब कंठ को जल मिल जाए, क्षुधा शांत हो तो एक परितोष छा जाए। ऐसी ही भीतर की भी क्षुधा जब शांत होती है और भीतर की अतृप्ति जाती है, आनंद बरसता है, तब शांति आती है।
बुद्ध के पास शांति है जरूर, क्योंकि भीतर कोई नाच उठा है। बुद्ध के पीछे चलने वाले चूक गए बात; उन्होंने समझा, शांत होना है।
खयाल रखना, परिणाम को कभी भी लक्ष्य नहीं बनाया जा सकता; परिणाम तो परिणाम है।
जैसे समझो कि सौ डिग्री तक पानी गर्म होता है तो परिणाम में भाप अपने आप बन जाती है। अब अगर तुम भाप बनाने की सीधी ही कोशिश में लग जाओ और यह भूल ही जाओ कि सौ डिग्री तक पानी के गर्म हुए बिना भाप नहीं बनती तो तुम मुश्किल में पड़ जाओगे। तुम बड़ी अड़चन में पड़ोगे। भाप बनेगी कैसे? भाप परिणाम है। कारण मौजूद कर दो, परिणाम अपने आप घट जाता है।
आनंद की सौ डिग्री जब पूरी होती है, जब आनंद का अहोभाव होता है, तब शांति होती है। अशांति क्या है, इसे समझने की कोशिश करो। अशांति यही है कि कहीं कोई तृप्ति नहीं। अशांति यही है कि जहा भी जाते हैं, भूख मिटती नहीं, प्यास मिटती नहीं। अशांति यही है कि जो भी करते हैं, कुछ फल हाथ लगता नहीं; इसलिए अशांत हैं।
अगर ऐसे में शांत हो गए तो बड़ी कठिनाई होगी; फिर तो तुम खोज से वंचित ही रह जाओगे। परमात्मा की बड़ी अनुकंपा है कि तुम्हें शांत नहीं होने देता। शांत तो तुम तभी हो सकोगे, जब मंजिल आ जाए। शांत तो तुम तभी हो सकोगे, जब आनंद की खोज हो जाए।
यह अशांति शुभ है, इसे मिटाने की कोशिश मत करना; इसे समझने की कोशिश करना। यह अशांति सूचक है। यह तो खबर देती है कि तुम चूक रहे हो। यह तो इंगित करती है, यह तो थर्मामीटर है। यह तो बताती है भर कि तुम चूक रहे हो कहीं। कहीं जीवन गलत जा रहा है। प्यास कहीं जा रही है और जिस जल को तुम खोज रहे हो, वह जल नहीं है। जो जल तुम सोचते हो मिल गया, वह जल नहीं है। प्यास बढ़ती जा रही है, आग बढ़ती जा रही है, तुम अशांत होते जा रहे हो।
यह केवल इस बात की खबर है, कहीं और खोजो; किसी और दिशा में खोजो। चल चुके बाहर, भीतर चलो। कर चुके बहुत याद संसार की—आओ जिक्रे—यार करें—परमात्मा की याद करो। बहुत खोज चुके दूसरे में, बहुत खोद चुके दूसरे में, कुछ भी न पाया; जल आता नहीं। चलो, अब अपने में खोदें।
एक यात्रा व्यर्थ जा रही है, इसलिए तुम अशांत हो। यात्रा सार्थक होने लगे, तत्‍क्षण शांति आनी शुरू हो जाती है। दिशा में चल भी पड़ो तो तत्‍क्षण तुम पाओगे, ठंडी हवाएं आने लगीं, सुवासित हवाएं आने लगीं। उस दिशा में मुड़ते ही शांति पंख फैलाने लगती है।
'सारथी द्वारा दान्त किए गए घोड़े के समान जिसकी इंद्रियां शांत हो गई हैं। ' शांत की नहीं गई हैं, हो गई हैं। शांत कीं, चूके; शांत हुईं, पाया।
करने और होने का फर्क खयाल में रखना। करना तो जबरदस्ती भी हो सकता है—जबरदस्ती ही होता है—होना जबरदस्ती नहीं होता। तुम सिर्फ आयोजन जुटाओ, तुम सिर्फ कारण पूरे कर दो, तुम परिस्थिति बनाओ, एक दिन अचानक हो जाता है। होना सदा प्रसादरूप है। तुम्हारे करने से हो, ऐसा नहीं; तुम्हारे करने से नहीं होता, तुम सिर्फ व्यवस्था जुटा देते हो, तुम द्वार खोलकर खड़े हो जाते हो; फिर सूरज उगता है, भीतर चला आता है। तुम इतना ही कर सकते हो कि द्वार खोलकर खड़े रहो।
तुम सौ डिग्री तक पानी को गर्म कर दो, ईंधन जुटा दो, आग जला दो। फिर सौ डिग्री पर पानी अपने से भाप बन जाता है। फिर तुम्हें पानी को खींच—खींचकर भाप नहीं बनाना पड़ता।
तुम पौधों को पानी दे दो, धूप दे दो, खाद दे दो, फिर तुम्हें खींच—खींचकर फूल बाहर निकालने नहीं पड़ते; वे अपने से उमगते आते हैं। फूल पैदा नहीं किए जाते, पैदा होते हैं। ही, फूल पैदा होने के लिए व्यवस्था तुम जुटा दो, बस। माली फूल पैदा नहीं करता, फूल पैदा हो सकें, इसके लिए जरूरी व्यवस्था जुटाता है। खाद डालता है, भूमि तैयार करता है, पानी सींचता है और प्रार्थना करता है। क्या कर सकता है और? प्रार्थना करता है कि खिलें फूल, अभीप्सा करता है कि खिलें फूल, प्रतीक्षा करता है कि खिलें फूल। व्यवस्था पूरी कर देता है, किसी दिन फूल खिलते हैं। उस दिन माली यह न कहेगा कि मैंने खिलाए।
फूल तो सदा परमात्मा ही खिलाता है। फूल तो सदा अस्तित्व से खिलते हैं, हम सिर्फ आयोजन करते हैं।
अगर तुम किसी बड़े चिकित्सक से पूछो तो वह यही कहेगा कि हम दवा देते हैं, मरीज को आराम देते हैं, स्वास्थ्य नहीं देते; सिर्फ इंतजाम कर देते हैं। स्वास्थ्य तो अपने से ही आता है। स्वास्थ्य के मार्ग की बाधाएं अलग कर देते हैं, लेकिन स्वास्थ्य को खींचकर तो कोई भी नहीं ला सकता। सिर्फ बीच में कोई अड़चन न रहे, कोई द्वार बंद न रहे, कोई शिला, कोई चट्टान अटकी न रहे, वह हम हटा देते हैं; फिर हम प्रतीक्षा करते हैं।
इसलिए ठीक—ठीक चिकित्सक सदा प्रार्थना पूर्ण होता है। और जो प्रार्थना पूर्ण होता है, वही ठीक चिकित्सा कर पाता है। क्योंकि स्वास्थ्य सिर्फ बीमारी का अलग हो जाना नहीं है, बीमारी के अलग हो जाने पर कुछ घटता है अनहोना; उतरता है कुछ पार से। स्वास्थ्य की कोई व्याख्या नही है, स्वास्थ्य की कोई परिभाषा नहीं है। ज्यादा से ज्यादा हम इतना ही कह सकते हैं कि बीमार तुम न रहो तो तुम तैयार हो स्वास्थ्य के लिए; फिर शेष सब उसके हाथ में है।
'जिसकी इंद्रियां शांत हो गई हैं। '
और ध्यान रखना, बड़ी महत्वपूर्ण सूचना बुद्ध इसके बाद देते हैं।
'सारथी द्वारा दान्त किए गए घोड़े के समान जिसकी इंद्रियां शांत हो गई हैं, वैसे अहंकाररहित...। '
जिसने शांत की हैं, वह कभी अहंकाररहित हो ही नहीं सकता। उसको शांत करने का अहंकार पकड़ लेता है कि मैंने इंद्रियां शांत कर दीं। मैं त्यागी, मैं आत्मविजयी, मैं यह, मैं वह। जिसने इंद्रियों को शांत कर दिया जबरदस्ती, जिसने त्याग कर दिया जबरदस्ती, वह हिसाब गुनता रहता है भीतर, कितने लाख छोड़ दिए। पहले गिनता था, इकट्ठे करता था; अब छोड़ दिए तो भी गिनता है; गिनती जारी रहती है। कितने उपवास कर लिए, हिसाब रखता है।
अगर परमात्मा ऐसे कभी मिला तो अपने पूरे खाते—बही यह सामने रख देगा कि देखो। इसके मन में धन्यवाद शायद ही हो, शिकायत भला हो; यह कहेगा, इतना किया और तुमने इतनी देर लगा दी? न्याय नहीं मालूम होता। और लुच्चे—लफंगे और बेईमान सब मजा कर रहे हैं।
मेरे पास पुराने ढब के संन्यासी आ जाते हैं, वे यही मुझे सदा कहते हैं कि यह क्या है? अन्याय हो रहा है। साधु पुरुष दुख पा रहे हैं, असाधु मजा कर रहे हैं। मैं उनसे कहता हूं अगर तुम साधु हो तो तुम ही मजा कर रहे होओगे; कोई असाधु मजा कर नहीं सकता। वह असाधु कैसे मजा कर लेगा? अगर असाधु मजा कर रहा है तो तुम नाहक चूक रहे हो, तुम असाधु हो जाओ। साधु का अर्थ ही यह है कि वह आखिरी मजा ले रहा है।
मैं साधु को परम भोगी कहता हूं। जिनको तुम भोगी कहते हो, वे बड़े त्यागी हैं। परमात्मा को छोड़ रहे हैं, कूड़ा—करकट इकट्ठा कर रहे हैं। इनको तुम भोगी कहते हो? परम धन को छोड़ रहे हैं, ठीकरे इकट्ठे कर रहे हैं; इनको तुम भोगी कहते हो? समाधि को छोड़ रहे हैं, संभोग को पकड़े बैठे हैं; इनको तुम भोगी कहते हो? ये त्यागी हैं, ये महात्यागी हैं; इनकी पूजा करो, इनकी अर्चना करो, आरती के थाल सजाओ, इनकी रथ—यात्राएं निकालो। ये बड़ा त्याग किए हैं। कौड़ी पकड़ी है, हीरे छोड़े हैं; इनसे बड़ा और क्या त्याग होगा?
जिनको तुम त्यागी कहते हो, अगर वे सच में त्यागी हैं, तो वे महाभोगी हैं। उन्होंने कौड़ी छोड़ी, हीरा पाया; इसमें त्याग क्या? व्यर्थ छोड़ा, सार्थक पाया; इसमें त्याग कहां?
बुद्ध का सूत्र बड़ा महत्वपूर्ण है, 'वैसे अहंकाररहित...। '
बुद्ध पुरुष एक—एक शब्द भी तभी बोलते हैं, जब उसमें बड़ी गहरी सार्थकता हो। साधना अगर तुमने की तो अहंकार पकड़गा। अगर समझ जगाई तो समझ के जागने में अहंकार खो जाता है। इसलिए मैं समझ को ही एकमात्र साधना कहता हूं। क्रोध को समझो, क्रोध चला जाएगा। और पीछे, खाली जगह में यह अहंकार न छूट जाएगा कि मैं अक्रोधी हूं। क्रोध को तभी गया हुआ मानना, जब पीछे यह बात न रह जाए कि मैं अक्रोधी हूं। लोभ को तभी गया हुआ मानना, जब पीछे यह भाव न रह जाए कि मैं अलोभी हूं। भोग को तभी गया हुआ मानना, जब भीतर यह भाव न बने कि मैं त्यागी हूं। अगर विपरीत भाव बन जाए, चूक हो गई।
इसलिए तो तुम त्यागियों, संन्यासियों के चेहरे पर अकड़ देखते हो। भारी अकड़ है, उन्होंने बड़ा किया है। स्वभावत:, जब कोई करता है तो अकड़ होती है। तुमने क्या किया है? कुछ भी नहीं। उन्होंने बड़ा त्याग किया है, धन—दौलत छोड़ी, घर—द्वार छोड़ा, उन्होंने कुछ किया है; उनकी अकड़ स्वाभाविक है।
जैन मुनि किसी को नमस्कार नहीं करते। कैसे करें नमस्कार! ज्यादा से ज्यादा आशीर्वाद दे देते हैं; वह भी उनकी बड़ी कृपा है। नमस्कार नहीं कर सकते किसी को, हाथ नहीं जोड़ सकते किसी को। त्यागी और भोगी को हाथ जोड़े? त्यागी और साधारणजन को हाथ जोड़े? असंभव!
यह किस भांति का त्याग हुआ? कहीं चूक हो गई।
तो बुद्ध कहते हैं, 'वैसे अहंकाररहित?..'
जिसके जीवन में त्याग आता है समझ से; जिसने घोड़े को समझा है; शांत हुआ घोड़ा, शांत किया नहीं; वही कुशल सारथी है।
'वैसे अहंकाररहित, अनास्रव पुरुष की देवता भी स्पृहा करते हैं। '
वैसे व्यक्ति से तो देवता को भी, देवताओं को भी ईर्ष्या होगी, प्रतिस्पर्धा होगी। देवताओं को भी!
बुद्ध ने कहा है कि जब कोई बुद्धत्व को उपलब्ध होता है तो देवता उसके चरणों में सिर झुकाने आते हैं। क्योंकि देवता कितनी ही ऊंचाई पर हों सुख के, लेकिन सुख भी बंधन है। भोग की कितनी ही सूक्ष्मता हो, इंद्रियों का जाल मौजूद है।
तो जब कोई ऐसी दशा को उपलब्ध होता है, जहां इंद्रियां बिलकुल ही शांत हो ?
गई हैं, जहा मालकियत पूरी हो गई, जहां आदमी दुख के ही पार न गया, सुख के भी पार गया, जहा आनंद बरसा, जहां शांति घनीभूत हुई, जहां सब तरह की उत्तेजना क्षीण हो गई, जहां अब कोई तरंगें नहीं उठती, मन निस्तरंग हुआ, चेतना ऐसे हो गई, जैसे झील पर कोई लहर न हो, ऐसी अवस्था जहां भी घटती है, सारा अस्तित्व ही नमस्कार करता है। सारा अस्तित्व ही ईर्ष्यालु होता है। कौन न ऐसा होना चाहेगा!
      देखती है मुझे हैरानी से तारों की निगाह
उस बुलंदी पे उड़ा जाता है तौसन मेरा
ऐसी घड़ी आती है चैतन्य की, जब कि उन ऊंचाइयों पर उड़ती है चेतना कि जहां तारे भी ईर्ष्या से, हैरानी से चौंककर खड़े रह जाते हैं।
देखती है मुझे हैरानी से तारों की निगाह
उस बुलंदी पे उड़ा जाता है तौसन मेरा
'सुंदर व्रतधारी, तादि पृथ्वी के समान नहीं क्षुब्ध होने वाला और ईद कील के समान अकंप होता है, ऐसे पुरुष को कर्दम—रहित जलाशय के समान संसार नहीं होता है। '
'सुंदर व्रतधारी…...'
क्या कारण पड़ा होगा बुद्ध को सुंदर भी जोड़ने में? व्रतधारी कहने से काम न चलता था? बात तो काफी हो जाती थी : व्रतधारी।
लेकिन बुद्ध को सुंदर जोड़ना पड़ा है। क्योंकि व्रत भी असुंदर हो जाते हैं अगर अहंकार उनके पीछे पलता हो। अहंकार प्रत्येक वस्तु को कुरूप कर जाता है। व्रतों का भी एक सौंदर्य है, लेकिन वह तभी, जब व्रत घटते हों, घटाए न जाते हों। जब सारथी कोड़ा मारकर घोड़े को न चलाता हो। सारथी का इशारा समझकर घोड़ा चलता हो, तब सौंदर्य है। सारथी के पीछे—पीछे चलता हो; सारथी को कहना भी न पड़ता हो और पीछे चलता हो, ऐसा प्रेम बन गया हो सारथी और घोड़े के बीच।
शरीर पीछे आता हो छाया की तरह। शरीर छाया है आत्मा की। इसे समझना। जैसे शरीर की छाया बनती है—जब तक तुम्हें आत्मा का पता नहीं है, तब तक तुम्हारे लिए शरीर है और शरीर की बनती छाया है—जिस दिन तुम्हें आत्मा का पता चलेगा, उस दिन तुम पाओगे, अरे! आत्मा है; आत्मा की छाया शरीर है; आत्मा की छाया की छाया बाहर पड़ रही है। जिस दिन तुम्हें भीतर का पता चलेगा, शरीर छाया की तरह तुम्हारे पीछे चलने लगता है। छाया को चलाना तो नही पड़ता। तुम कोड़े तो नहीं चलाते कि छाया पीछे आए; छाया आती है। जब तक तुम्हें अपना पता नहीं है, तभी तक अड़चन है।
'सुंदर व्रतधारी...। '
कौन है सुंदर व्रतधारी? जिसके व्रत समझ से आविर्भूत हुए, प्रज्ञा से आविर्भूत हुए; जिसने जीवन को जाना, देखा, पहचाना, समझा, जीया; जो जीवन में परिपक्व हुआ; जिसका फल पका और गिरा; कच्चा नहीं टूटा; जिसके जीवन में व्रत आए हैं।
तुम कभी—कभी व्रत ले लेते हो। तुम जाकर मंदिर में व्रत ले लेते हो कि ब्रह्मचर्य का व्रत लेता हूं। तुम व्रत क्यों लेते हो? अगर तुम्हें समझ आ गई है तो व्रत की कोई जरूरत नहीं, तुम ब्रह्मचर्य को उपलब्ध हो गए हो। अगर समझ नहीं आई तो व्रत तुम अपने ऊपर जबरदस्ती करने को ले रहे हो, ताकि भय रहे कि मंदिर में व्रत लिया है, समाज के सामने व्रत लिया है, किसी साधु पुरुष के सामने व्रत लिया है; अब कैसे तोड़े?
तुम किसलिए व्रत लेते हो? मेरे देखे गलत लोग ही व्रत लेते हैं। ठीक लोग व्रत में जीते हैं, लेने का कोई सवाल नहीं। लेने का मतलब ही यह है कि तुम अपने भीतर द्वंद्व पैदा कर रहे हो। तुम कहते हो, बहुत क्रोध किया, अब जाकर कसम खा लेते है, अब क्रोध न करेंगे।
लेकिन यह कसम की जरूरत क्यों है? क्या अभी भीर क्रोध करने की संभावना है? क्या तुम सोचते हो कल तुम फिर भी क्रोध करोगे, अगर कसम न लो? तो कसम लेने से कल आने वाला क्रोध कैसे रुकेगा? कसमों से क्रोध के रुकने का क्या लेना—देना है? अगर कसमों से क्रोध रुकते होते तो सभी के रुक सकते थे। सभी कसम ले लेते, कसम लेने में क्या बनता—बिगड़ता है?
नहीं, तुम अपने साथ एक खेल-खेल रहे हो। क्रोध किसलिए आता है? जब भी अहंकार को चोट लगती है, क्रोध आता है। अब तुम उसी अहंकार का उपयोग क्रोध को दबाने के लिए कर रहे हो। तुम कहते हो, जाकर समाज के सामने, समूह के सामने, व्रत ले लेंगे खड़े होकर कि अब हम क्रोध न करेंगे। अब यह तुम्हारे अहंकार की अकड़ होगी। कि अगर तुमने क्रोध किया तो लोग कहेंगे, अरे! गिरते हो? पतित होते हो?
एक आदमी संन्यासी हो जाता है, मुनि हो जाता है, तो लोग जुलूस निकालते हैं, शोभायात्रा निकालते हैं, बड़ा उत्सव मनाते हैं। यह तरकीब है। यह तरकीब है कि अब लौटना मत; नहीं तो जूते पड़ेंगे। क्योंकि यह शोभायात्रा का उलटा हो जाएगा।
मेरे पास संन्यासी आते हैं, मैं उनको चुपचाप दे देता हूं। वे कहते हैं, आप कुछ इसके लिए उत्सव वगैरह नहीं करते?
मैंने कहा, इसलिए ताकि भागने की तुम्हें सुविधा रहे। तुम कल छोड़ना चाहो तो कोई अड़चन न आए। मैं तुम्हारे संन्यास को अहंकार नहीं बनाना चाहता। यह तुम्हारी मौज है। तुमने लिया, तुम छोड़ना चाहो, तुम छोड़ सकते हो। यह कोई व्रत नहीं है, यह कोई कसम नहीं है, यह तुम्हारा बोध है। अगर बोध ही खो गया और फिर कसम ही हाथ में रह गई तो क्या करोगे।
विनोबा जी ने एक नवविवाहित युवक और युवती को ब्रह्मचर्य का व्रत दिलवा
दिया। मैं उस आश्रम में मेहमान था तो वे दोनों मेरे पास आए। उन्होंने कहा, हम बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं; हम बड़ी कठिनाई में पड़ गए हैं। तोड़े तो कठिनाई; क्योंकि लगता है, यह तो पाप होगा, भयंकर पाप होगा। न तोड़े तो कठिनाई; क्योंकि चौबीस घंटे सिवाय कामवासना के और कोई विचार नहीं है। रात हम दो अलग कमरों में सोते हैं। मैं अपनी तरफ से ताला लगा लेता हूं और चाबी खिड़की से दूसरी तरफ फेंक देता हूं, ताकि रात कहीं मैं वासना के ज्वर में ताला खोलकर पहुंच न जाऊं। तो चाबी पत्नी के पास रहती है, वहा ताला नहीं है, वह खोल नहीं सकती। ताला मेरी तरफ रहता है, वहां चाबी नहीं है।
मगर यह ब्रह्मचर्य हुआ? असुंदर हो गया व्रत। इस ब्रह्मचर्य से शांति आएगी तुम सोचते हो? पागलपन आएगा। ये दोनों के दोनों पागल हो जाएंगे—ये पागल हो ही गए हैं। अहंकार की अड़चन आ रही है अब। अब वे कहते हैं कि व्रत ले लिया है, सब के सामने व्रत ले लिया, तालियां बजीं। हम खड़े हुए तो बड़े हम प्रसन्न हुए कि को महान कार्य कर रहे हैं; अब इसको तोड़े कैसे? अब अहंकार बाधा बन रहा है। अब रातभर सो नहीं सकते। अब बेचैन हैं। अभी युवा हैं, स्वाभाविक है; गलती उनकी नहीं; गलती होगी तो विनोबा की है।
जो स्वाभाविक है, उसको समझ से जाने दो; जल्दी मत करो। जीवन में जल्दी बड़ी घातक है। अधैर्य क्या है! परमात्मा पर भरोसा रखो। जैसे वासना आई है, वैसे ही वासना चली भी जाती है। तुम जरा साक्षीभाव रखो। देखो, भरपूर देखो हर चीज को। वासना है तो उसे भी देखो; जरूर कुछ उपयोग होगा उसका; अन्यथा होती ही नहीं। अकारण कुछ भी नहीं है। और देखने के बाद ही तुम्हारी ही अंतर्बोध की दशा बनेगी कि व्यर्थ है; फिर कसम लेने का क्या सवाल उठेगा?
तो मेरे देखे, गलत लोग कसम लेते हैं, ठीक लोग कसम लेते नहीं। ठीक को कसम की जरूरत नहीं है। गलत झंझट में पड़ जाता है।
'सुंदर व्रतधारी...। '
लेकिन इसका बौद्ध भिक्षुओं से अर्थ पूछना, तो वे बिलकुल और करते हैं। वे कहते हैं, जिन्होंने व्रत लिया, वे सुंदर हैं—सुंदर व्रतधारी। उसका यह अर्थ नहीं करते, जो मैं कर रहा हूं। वे कहते हैं, जिन्होंने व्रत लिया वे सुंदर हैं; जिन्होंने व्रत नहीं लिया, वे असुंदर हैं। सुंदर हैं व्रतधारी; व्रतहीन असुंदर हैं।
अब तुम समझ लेना; दोनों में से जो तुम्हें चुनना हो, चुन लेना। मैं यह कहता हूं कि सुंदर व्रतधारी तभी है, जब व्रत जीवन की समझ से आया हो; लिया न गया हो, आया हो, उतरा हो, बोध बना हो; फिर कोई लेने की जरूरत ही नहीं है। तुम उसे जीयोगे, क्योंकि उससे विपरीत जीना असंभव हो जाएगा। जो व्यर्थ हो गया उसे कैसे जीयोगे? लेकिन कसम क्यों लोगे?
तुम रोज सुबह घर का कचरा—कूड़ा साफ करके फेंक देते हो। तुम जाकर कसम 
लेते हो मंदिर में कि रोज घर साफ करेंगे, कचरा—कूड़ा बाहर फेंकेंगे? कचरा—कूड़ा है, इसे तुम फेंकोगे नहीं तो करोगे क्या? इसका अगर तुम व्रत लेने जाओगे तो लोग हंसेंगे। लोग कहेंगे, मामला क्या है, दिमाग खराब हुआ? कचरा—कूड़ा फेंकना ही पड़ता है, इसमें व्रत क्या है?
व्रत तो तुम तभी लेते हो, जब तुम कहते हो, सोने का त्याग करेंगे। अब समझना; अगर सोना कचरा—कूड़ा हो गया तो व्रत लेने की जरूरत नहीं; तब सुंदर व्रत का जन्म होगा। तुम सुंदर व्रतधारी हो जाओगे। व्रतधारी रहोगे, व्रत लेने वाले नहीं 1 व्रत धारण करोगे, मगर वह धारणा अंतर से जन्मेगी। किसी बाहर, किसी के सामने, किसी के अनुमोदन, किसी की तारीफ—प्रशंसा का सवाल नहीं है। इसके लिए कोई बाहर प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं है, तुम्हारी अंतःप्रज्ञा काफी प्रमाणपत्र है। चुपचाप तुम अपनी समझ को जीयोगे। धीरे—धीरे तुम्हारे जीवन में एक सौंदर्य बजने लगेगा। तुम्हारी बीन बजने लगेगी। 
'सुंदर व्रतधारी, आदि पृथ्वी के समान नहीं क्षुब्ध होने वाला। '
पृथ्वी जैसे अक्षुब्ध बनी रहती है, थिर बनी रहती है, ऐसा थिर होता है। कोई भी चीज उसे क्षुब्ध नहीं कर पाती।
'और ईद कील के समान अकंप होता है। '
जिस कील पर पृथ्वी घूमती है—सारी पृथ्वी घूमती रहती है, लेकिन कील तो ठहरी रहती है। जैसे गाड़ी के चाक में कील होती है, सारा चाक घूमता रहता है, गाड़ी चलती रहती है, कील ठहरी रहती है। जीवन चलता रहता है, चाक चलता रहता है, लेकिन भीतर सब ठहरा रहता है।
अब जिनको तुम त्यागी कहते हो, वे ऐसे हैं, जिन्होंने चाक का त्याग कर दिया, कील ही रह गए। कील का क्या मजा, जो चाक में न हो! कील-कील ही कहा, जो चाक में न हो! यात्रा ही टूट गई। फिर अगर कील न घूमती हो तो न घूमने का सार क्या? गाड़ी चलती रहे, चाक घूमता रहे, कील न घूमे। कील घूमेगी तो गाड़ी बिखर जाएगी, गिर जाएगी, टूट जाएगी, चाक गिर जाएगा, चल न पाएगा।
सब घूमने वाली चीजें किसी न घूमने के सहारे चलती हैं। गति का आधार अगति है। इस सारे संसार के घूमने का आधार उस परमात्मा में है, जो नहीं घूमता। इस तुम्हारे सारे शरीर के घूमने का आधार उस चैतन्य में है, जो ठहरा हुआ है। यह तुम्हारे मन के सारे परिभ्रमण का आधार उस आत्मा में है, जो कभी नहीं घूमती—ईद कील है; उसकी पहचान चाहिए।
चाक को रोकने की जरूरत नहीं है, चाक को चलने दो, मजे से चलने दो, तुम कील के साथ अपना तादात्म्य कर लो। तब तुम संसार में होते हो और संसार तुम में नहीं होता। तब तुम हजार रास्तों पर चलते हो, लेकिन कोई रास्ता तुम्हें विकृत नहीं कर पाता। तब तुम कितनी ही यात्रा करो, यात्रा तुम्हारे जीवन में व्याघात नहीं बनती। 
उपशांत इंद्रियां और कुशल सारथी सुंदर व्रतधारी ऐसा ही व्यक्ति है, जो संसार में हो और संसार जिसमें न हो —कमलवत।
'पृथ्वी के समान नहीं क्षुब्ध होने वाला, इंद कील के समान अकंप होता है। '
तुम तब तक कंपित होते ही रहोगे, जब तक तुम्हारी कोई मांग है। जब तक तुम्हारी कोई आकांक्षा है, जब तक तुम कुछ बाजार से खरीदना चाहते हो, तब तक तुम कंपित होते ही रहोगे।
तुमने कभी देखा, उसी बाजार से तुम कई बार निकलते हो, अलग—अलग मौकों पर, अलग—अलग ढंग से निकलते हो। कभी तुम निकलते हो फुरसत से तो हर खिड़की, हर द्वार के सामने, हर दुकान के सामने रुककर एक नजर डाल लेते हो —क्या है! कहां क्या बिक रहा है! कहां क्या हो रहा है! न भी खरीदना हो तो भी खरीदने की आकांक्षा  पैदा करते हुए बाजार से गुजरते हो।
कभी तुमने देखा कि तुमने उपवास किया हो तो उसी बाजार से गुजरते हो, लेकिन अब जूते की दुकानें नहीं दिखाई पड़ती, अब सिर्फ मिठाई की दुकानें दिखाई पड़ती हैं। तुम बदल गए, सड़क वही है। अब तुम्हें वही दिखाई पड़ता है, जो तुम्हारी मांग है; जो तुम्हारी अतृप्ति है।
कभी तुमने देखा, उसी बाजार से निकलते हो, घर में आग लग गई, भागे चले जा रहे हो। कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता। बाजार वही है, दुकानें लगी हैं, न अब जूते की दुकान दिखाई पड़ती है, न कपड़े की, न मिठाई की; कुछ नहीं दिखाई पड़ता। रास्ते पर कोई जय राम जी भी करे तो भी सुनाई नहीं पड़ता। कोई कुछ कहे, समझ में नहीं आता। बाजार में इतना शोरगुल मचा हुआ है, तुम उसमें से ऐसे निकल आते हो, जैसे कुछ भी नहीं छूता—घर में आग लगी है। यह कोई फुरसत का वक्त थोड़े ही है! कल अगर कोई आदमी तुमसे कहेगा कि रास्ते पर मिले थे, तो तुम पहचान न पाओगे, तुम याद न कर पाओगे। याद भी न बनी। इतनी भी लकीर न छूटी।
यास की बस्ती में इक छोटी सी उम्मीदे—विसाल
अजनबी की तरह से फिरती है घबराई हुई
यह जो आकांक्षाओं का संसार है, इसमें कुछ पाने की आशा, किसी से मिलने की आशा, कुछ भोग की आकांक्षा , एक अजनबी की तरह फिरती है घबराई हुई। इसलिए तुम इतने कंपित हो, इतने परेशान हो। भीतर तुम कैप ही रहे हो पूरे समय। जब तक वासना है, तब तक कंपन होगा। अगर अकंप होना हो—और अकंप हुए बिना, होना होने जैसा नहीं है—तो यह जो वासना भटकाती है एक अजनबी की तरह, द्वार—द्वार पर भिखारी की तरह भटकाती है, इस वासना के स्वरूप को समझ लेना होगा। इस वासना के स्वरूप को खूब गहरी आंख से देखना होगा। इसे आंख गड़ाकर देखना, इसके आर—पार देखना, तुम वहां कुछ भी न पाओगे। तुमने अब तक देखा ही नहीं, इसलिए तुम उलझे हो; देखते ही तुम मुका हो जाओगे।
और जब तक तुम इससे मुक्त नहीं होते, तब तक तुम उसे न देख सकोगे, जो तुम्हारे भीतर छिपा बैठा है; जो तुम हो। नजर एक ही तरफ हो सकती है—या बाहर, या भीतर। या तो घर के भीतर आओ, या घर के बाहर; तुम दोनों जगह साथ—साथ न हो सकोगे।
आईने की तरह गाफिल खोल छाती के किवाड़
देख तो कौन बारे तेरे कासाने के बीच
कौन तेरे हृदय के मंदिर में कैसा सौभाग्य लिए छिपा बैठा है।
आईने की तरह गाफिल खोल छाती के किवाड़
मगर यह फुरसत कब मिले? तुम्हारे हाथ तो कहीं और हजारों किवाड़ों को पकड़े खड़े हैं। न मालूम कितने किवाड़ों पर तुम्हारे हाथ दस्तक दे रहे हैं। फुरसत कहां?
मेरे पास लोग आते हैं, उनसे मैं कहता हूं र कुछ ध्यान करो। वे कहते हैं, समय कहां? फुरसत कहां?
ठीक ही कहते हैं। फुरसत कहां है? समय कहो है? वे कहते हैं, जब समय मिलेगा, तब करेंगे। मैं उनको कहता हूं र कभी भी न मिलेगा। क्योंकि जिंदगी जैसे—जैसे हाथ से जाने लगेगी, वैसे—वैसे तुम और भी तडुफकर और भी घबड़ाकर दौड़ने लगोगे चारों तरफ। और विक्षिप्त होकर... अभी तक कुछ मिला नहीं।
आए भी लोग, बैठे भी, उठ भी खड़े हुए
मैं जा ही ढूंढता तेरी महफिल में रह गया
तो जैसे—जैसे बुढ़ापा करीब आएगा, तुम्हारा पागलपन बढ़ेगा। तुम और घबड़ाकर भागने लगोगे। मौत करीब आने लगेगी। मौत दस्तक देगी तुम्हारे द्वार पर, तब तुम न मालूम कितने करोड़ों द्वार पर दस्तक देते फिर रहे होओगे।
मौत इसीलिए घटती है कि तुम्हें कभी घर में नहीं पाती। जिस दिन मौत तुम्हें घर में पा लेती है, उसी दिन घटती नहीं; उसी दिन तुम अमृत को उपलब्ध हो जाते हो। मौत आ जाती है और तुम नहीं मरते—पर अपने घर में तुम्हें पाए तभी।
'सम्यक ज्ञान के द्वारा विमुक्त, उपशांत अर्हत का मन शांत होता है, उसकी वाणी शांत होती है, उसका कर्म शांत होता है। '
जैसे ही आनंद भर जाता है भीतर, सब शांत हो जाता है। मन शांत होता है, वाणी शांत होती है, कर्म शांत हो जाता है।
इसे समझना। मन शांत होता है, इसका क्या अर्थ? इसका अर्थ होता है : मन का जब उपयोग करना हो, तभी गतिमान होता है; जब न उपयोग करना हो, तब शून्य रहता है, शांत रहता है।
बुद्ध भी बोलेंगे तो बोलेंगे तो मन से ही; लेकिन जब नहीं बोलते, तब मन नहीं होता है। जैसे तुम जब नहीं चलते तो पैर बैठे रहते हैं, चलते नहीं। असल में उनको,जब तुम नहीं चला रहे हो, पैर कहना ठीक नहीं; क्योंकि पैर तो वही हैं, जो चलते है। जब चलते हैं, तभी पैर हैं। जब चल ही नहीं रहे तो पैर क्या कहना! नहीं के  'बराबर हैं। नहीं हैं, ऐसा कहना भी ठीक नहीं — क्योंकि चलना हो तो चल सकते हैं। शांत हैं।
मन शांत होता है बुद्ध पुरुषों का; इसका अर्थ हुआ कि खाली बैठे हों तो चलता नहीं। तुम्हारा मन, खाली बैठे हो तब और भी चलता है और भी भागता है। तुम लाख उपाय करो रोकने के, रुकता नहीं। जितना रोकना चाहो, और दौड़ता है, और भागता है, और बेचैनी बढ़ती है। बहुत लोग हैं, जो चाहते हैं, मन शांत हो जाए। लेकिन जब तक वासनाओं की समझ नहीं आई, मन शांत होगा ही नहीं।
मन इसलिए दौड़ रहा है, मन कहता है, क्या कर रहे हो? शांत करने की बात कर रहे हो, अभी कुछ मिला तो नहीं। अभी कुछ पाया नहीं, अभी शांत कैसे हो जाएं? मिलते ही शांत हो जाता है। उसकी झलक मिलते ही शांत हो जाता है।
तो मैं तुमसे यह नहीं कहता कि तुम मन को शांत करने की कोशिश करो, मैं तुमसे कहता हूं? तुम उसकी झलक पाने की कोशिश करो। विधायक करो तुम्हारी प्रक्रिया को। मन से मत लड़ो, मन को चलने दो। उपेक्षा करो। ठीक है चले। तुम थोड़ी सी उसकी झलक पाने की सीधी कोशिश में लगो। किसी दिन झलक मिल जाएगी, उसी क्षण तुम पाओगे, मन एकदम सन्नाटे से भर गया। उस घड़ी में तुम चलाना चाहोगे तो न चलेगा। उसकी मौजूदगी में—सत्य कहो उसे, परमात्मा कहो, निर्वाण कहो, आत्मा कहो—उसकी मौजूदगी में मन एकदम शांत हो जाता है। तुम मन को शांत करने की निरर्थक कोशिश में मत लगे रहना; वह शांत होगा ही नहीं। वह शांत तभी होता है, जब मालिक आ जाता है।
जैसे किसी स्कूल की क्लास में छोटे बच्चे नाच—कूद रहे हैं, शोरगुल मचा रहे हैं, शिक्षक प्रविष्ट हुआ, शांति छा जाती है, सन्नाटा हो जाता है। सब अपनी जगह बैठ गए, किताबें उठा लीं, पढ़ने—लिखने लगे, ऐसा दिखलाने लगे कि जैसे कोई शोरगुल था ही नहीं; कहीं कोई बात ही न थी।
बस, सम्राट को भीतर बुला लो! मालिक जरा सा आ जाए, सब शांत हो जाता   'सम्यक ज्ञान के द्वारा...। '
कौन से जान को सम्यक ज्ञान कहते हैं बुद्ध? जो ज्ञान शास्त्र से मिले, वह मिथ्या; जो ज्ञान जीवन से मिले, वह सम्यक। जो ज्ञान जीवन से मिले, वही ज्ञान। जो ज्ञान और किसी ढंग से मिल जाए, वह ज्ञान का धोखा, आभास, उधार। ठीक ज्ञान वही है, जो जीवन का निचोड़ हो।
'सम्यक ज्ञान के द्वारा विमुक्त, उपशांत अर्हत का मन शांत हो जाता है, उसकी वाणी शांत हो जाती है।
बोलता है अर्हत—तत्व को उपलब्ध व्यक्ति—लेकिन उसके बोलने में भी न बोलने की गंध होती है। बोलता है, शब्दों का उपयोग करता है, लेकिन उसके शब्द निःशब्द से आते हैं।
दो तरह से बोला जा सकता है? या तो तुम्हारे भीतर बहुत ज्यादा शब्द भरे हों, उन शब्दों को तुम बाहर निकालो, जैसा कि साधारणत: हम बोलते हैं। भीतर कुछ गज रहा है, क्या करें, उसे निकालना जरूरी है! तो लोग एक—दूसरे पर अपना कचरा फेंकते रहते हैं।
एक ऐसी भी घड़ी है बोलने की, जब तुम्हारे भीतर बोलने को कुछ भी नहीं है; जब तुमने शून्य को जाना; और जब शून्य को तुम समझाना चाहते हो; जब तुम शून्य को ही समझाने के लिए शब्द का उपयोग करते हो? जब शब्द के सहारे और शब्द की नाव पर तुम शून्य को भरकर भेजते हो।
फर्क तुम्हें समझ में आ जाएगा। क्योंकि दोनों तरह के शब्दों का गुणधर्म बदल जाता है। अगर तुम शांत व्यक्ति के शब्द सुनोगे तो सुनते—सुनते तुम शांत होने लगोगे। अगर अशांत व्यक्ति के पास तुम कुछ भी न कहे, चुपचाप भी बैठ जाओगे, तो भी अशांत होने लगोगे, उसकी अशांति तरंगायित होने लगेगी।
'उसकी वाणी शांत होती है, उसका कर्म शांत होता है। '
करता है वह। अगर बुद्ध चालीस साल जीए बुद्धत्व को पाने के बाद तो कुछ न कुछ किया ही—चले, उठे, बैठे, समझाया, जगाया लोगों को, झकझोरा, एक हवा पैदा का कि उस हवा में कुछ कलियां खिल जाएं, कुछ बीज फूट जाएं, अंकुरित हों—लेकिन न करने जैसा है। उठता है और उठता नहीं। चलता है और चलता नहीं। बोलता है और बोलता नहीं।
झेन फकीर बड़े मजे की बात कहते हैं। वे कहते हैं कि यह बुद्ध कभी पैदा ही नहीं हुआ। बुद्ध के भक्त हैं वे, बुद्ध की पूजा करते हैं मंदिर में, लेकिन कहते यह हैं कि बुद्ध कभी पैदा ही नहीं हुआ। कहते यह हैं कि यह आदमी अगर पैदा भी हुआ तो कभी बोला नहीं। अगर यह बोला भी तो इसने कभी कुछ कहा नहीं।
ठीक ही कहते हैं। क्योंकि जब बुद्ध पैदा होते हैं तो बुद्ध शुद्धोधन के घर पैदा नहीं होते, महामाया की कोख से पैदा नहीं होते; बुद्ध तो उस दिन पैदा होते हैं, जिस दिन महामाया और शुद्धोधन के द्वारा पैदा हुआ बेटा मर जाता है; जिस दिन गौतम सिद्धार्थ मर जाता है, जिस दिन वह अहंकार, वह सीमाओं में बंधा हुआ रूप समाप्त हो जाता है। बुद्ध का जन्म तो समाधि में होता है। समाधि यानी महामृत्यु।
तो ठीक कहते हैं झेन फकीर, कि यह आदमी कभी पैदा नहीं हुआ। क्योंकि यह आदमी ऐसा है, यह घटना ऐसी है कि मौत में ही घटती है, जन्म में नहीं घटती। इसे थोड़ा समझना।
जन्म तो हम सबका हुआ है, हममें से सौभाग्यशाली हैं वे, जो समाधि की मृत्यु  
को उपलब्ध हो जाएंगे। मरेंगे हम सब, सौभाग्यशाली है वे, जो स्वयं मृत्यु में प्रविष्ट हो जाएंगे। मौत सबकी आएगी, लेकिन वह दुर्घटना होगी। अगर तुम मौत में अपनी स्वेच्छा से प्रविष्ट हुए, अगर तुमने अपने होने को अपने हाथ से मिटा डाला, पोंछ डाला, अगर तुमने अपने अहंकार को अपने हाथ से उतारकर रख दिया और तुमने न—कुछ होने की हिम्मत की, तो महामृत्यु घटेगी।
बुद्धत्व का जन्म तो महामृत्यु में होता है, इसलिए बुद्ध का जन्म हुआ, यह कहना गलत। बुद्ध का कभी जन्म होता ही नहीं, मृत्यु ही होती है; उसी मृत्यु में से आविर्भाव होता है। और फिर बुद्ध कुछ बोले हों, यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि बुद्धत्व का सारा स्वभाव अबोल का है, मौन का है, शून्य का है, शांत का है।
ठीक कहते हैं झेन फकीर। फिर भी पूजा करते हैं इस आदमी की, जो नहीं हुआ। पूजा करते हैं इस आदमी की, इसके शास्त्रों का वाचन करते हैं रोज मंदिर में, जिसने कभी कुछ नहीं कहा। इसके वचनों का मूल्य ही इसीलिए है कि इसके पास कहने को कुछ भी नहीं था, सिर्फ शून्य था। शब्दों का सहारा लेकर शून्य के पक्षी उड़ाए। शब्दों की सीमा बांधकर शून्य के फूल खिलाए।
शब्दों की सीमा जरूरी पड़ती है, क्योंकि तुम शब्द ही समझ पाओगे, तुम शून्य न समझ पाओगे।
मैं तुम्हारी तरफ शून्य फेंकू—फेंक रहा हूं—वह तुम्हारी झोली में नहीं पड़ता। शन्य को पकड़ने की झोली तुम्हारी तैयार नहीं। शून्य की झोली अर्थात ध्यान, वह तैयार नहीं। शब्द फेंकता हूं र तुम्हारी झोली में पड़ जाते हैं। शब्द की मछलियां तुम्हारे जाल में अटक जाती हैं। शून्य की मछलियां तुम्हारे जाल से बाहर सरक जाती हैं।
लेकिन शब्द की इन मछलियों में अगर तुमने गौर किया, अगर इन शब्द की मछलियों में तुमने खोजा, अगर शब्द की इन मछलियों में तुमने झांका, तो कहीं—कहीं अटके हुए शून्य को भी तुम पाओगे।
जैसे आंगन में भी आकाश है, छोटे से घड़े में भी आकाश है, ऐसे शब्द में भी शन्य है। वह शून्य ही तुम्हें मिल जाए, इतना ही शब्द का उपयोग है।
बुद्ध पुरुष, अर्हत पुरुष, सम्यक ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति करते हैं, लेकिन उनका करना कर्ता के भाव से शून्य है। वहां करने वाला कोई भी नहीं है।
बुद्ध ने कहा है, मैं चलता हूं लेकिन चलने वाला कोई भी नहीं है। मैं बोलता ई, लेकिन बोलने वाला कोई भी नहीं है। मैं भोजन करता हूं लेकिन भोजन करने भाला कोई भी नहीं है।
यह जरा अड़चन की बात है, तर्क के बाहर हो जाती है; समझ में नहीं आती। समझने की जरूरत भी नहीं है। ध्यान रखना, धर्म वहीं शुरू होता है, जहां तुम समझ के ऊपर उठने के लिए राजी हो जाते हो। जब तक समझ है, तब तक कुछ और ता गा। समझ की सीमा जहा आती है, वहीं से धर्म की सीमा शुरू होती है। 
हम जानते थे अक्ल से कुछ जानेंगे
जाना तो यह जाना कि न जाना कुछ भी
समझने की बहुत बात नहीं है, जागने की बात है। सोचने की बात नहीं है, होश लाने की बात है। इसलिए पर्दा नहीं है सत्य के ऊपर कि तुम्हारे सोचने में कुछ कमी है—तुम तो जरूरत से ज्यादा सोच ही रहे हो—पर्दा इसीलिए है कि तुम बहुत सोच रहे हो और आंखें विचारों से भरी हैं; और निर्विचार आंख ही देख सकती है।
सम्यक ज्ञान का अर्थ है : ऐसा ज्ञान, जो सोचने से नहीं मिलता, विचारने से नहीं मिलता; ऐसा शान, जो निर्विचार होने से फूट पड़ता है—झरने की तरह, जैसे कोई चट्टान हटा दी हो, दबा झरना प्रगट हो गया हो।
आह पर्दा तो कोई मान—ए—दीदार नहीं
अपनी गफलत के सिवा कोई दरो—दीवार नहीं
सत्य पर कोई पर्दा नहीं है। पर्दा है तो अपनी गफलत का है, अपनी बेहोशी का है। वह अपनी ही आंख पर है।
सत्य तो नग्न खड़ा है तुम्हारे सामने, तुम आखें बंद किए खड़े हो। या आखें भी खुली हैं तो आंखों  पर बड़े पर्दे हैं विचारों के, बेहोशी के। विचार एक प्रकार की बेहोशी है, जिसमें तुम खोए रहते हो—सपना है, जागते—जागते देखा गया।
बुद्ध को समझना हो तो समझ से काम न चलेगा, समझ को हटाना पड़ेगा; फिर से नासमझ होना पड़ेगा; फिर से लौटना पड़ेगा बचपन की तरफ; फिर से बचपन जैसा निर्दोष भाव, फिर से बच्चों जैसा खाली मन, फिर से जिज्ञासा से भरी आंखें—ज्ञान से भरा हुआ मस्तिष्क नहीं—फिर से उत्‍फूल्‍लता, फिर से एक ताजगी।
अगर तुम अपने बचपन को फिर लौटा लाओ—जीसस ने कहा है, जो बच्चों की तरह होंगे, वे ही मेरे प्रभु के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे—अगर तुम अपने बचपन को फिर लौटा पाओ तो ही तुम बुद्ध पुरुषों के वचन समझने में समर्थ हो सकोगे।
धम्मपद पर बहुत टीकाएं हैं, लेकिन अक्सर पंडितों की हैं, शास्त्रज्ञों की हैं। उन टीकाओं में मूल बात खो जाती है। टीकाएं कुछ खोल नहीं पातीं, जो पहले ही बंद था, उसे और बंद कर जाती हैं। टीकाओं के ऊहापोह में वह दीया, जो बुद्ध ने जलाया, उसे देखना और भी मुश्किल हो जाता है।
मैं कोई टीका नहीं कर रहा हूं। यह कोई बुद्ध के वचनों की व्याख्या नहीं है। यह जैसा मैं देखता हूं मेरी दृष्टि को ही कह रहा हूं; बुद्ध तो बहाना हैं। जैसे खूंटी पर कोई कोट को टल देता है, ऐसे मैं बुद्ध पर अपने को टल रहा हूं। इससे बुद्ध का कुछ लेना—देना नहीं है।
और इसलिए मैं तुमसे कहता हूं इसीलिए ये वचन बुद्ध के बहुत करीब हैं। इनको मैंने सोच—विचारकर नहीं तुमसे कहा है, इनके सत्य को मैंने अलग से जाना है। धम्मपद को पढ़कर मैंने धम्मपद के सत्य को नहीं जाना; सत्य को मैंने जाना है, फिर धम्मपद में देखा। धम्मपद मुझे गवाह मालूम पड़ा।
सरल होओ थोड़े; समझ से काम न होगा। समझ बड़ी नासमझी है। होशियारी गे चूकना मत। शास्त्रों को थोड़ा हटाओ, थोड़ी सरलता से, खाली आंखों  से—तर्क जाल से नहीं—देखो; और सम्यक दृष्टि बहुत दूर नहीं है।
जिस जगह सदियों के सिजदे रहे नाकामयाब
उस जगह इक आह तकमीले—इबादत हो गई
जहां सैकड़ों वर्ष तक की प्रार्थनाएं व्यर्थ हो जाएं, कभी—कभी वहा सरल हृदय से उठी एक छोटी सी आह, प्रार्थना की पूर्णता बन जाती है।
आज इतना ही।