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मंगलवार, 24 जनवरी 2012

दि सूफीज़—ओशो की प्रिय पुस्‍तकें

समुंदर ने पूछा किसी ने कि ‘’तुम नीला रंग क्‍यों पहले हुए हो ? यह तो मातम का रंग है। और तुम निरंतर उबलते क्‍यों रहते हो ? वह कौन सी आग है जो तुम्‍हें उबालती है ? समुंदर ने कहा, ‘’मेरे महबूब से बिछुड़ कर में उदास हूं इसलिए नीला पड़ गया हूं, और वह प्‍यार की आग है जिससे मैं खोलता रहता हूं।‘’
     यह है सूफी तरीका। सीधा सी बात को प्रतीक रूप में कहना और उस कहने में अर्थों के समुंदर को उंडेलना सूफियाना अंदाज है।
       सूफियों की जीवन शैली, उनके तौर-तरीकों के बारे में अगर सब कुछ एक साथ जानना हो तो इस किताब की सैर करें। रहस्‍य के पर्दे में ढँके सूफियों को दिन के उजाले में लाने  का महत्‍वपूर्ण काम इदरीस शाह ने किया है।

      इदरीस शाह एक अद्भुत व्‍यक्‍तित्‍व है। वे सन 1924 में उतर भारत में जन्‍मे। उनके पुरखों में मध्‍य एशिया के महान सूफी गुरु थे। सूफी प्रणाली का मौलिक अध्‍ययन करने के बाद वह इंग्‍लैड में जा बसे थे। और जीवन के आखरी दस साल सूफी विरासत के पौधे को समकालीन पाश्‍चात्‍य चिंतन के आँगन में लगाने का बहुमूल्य काम करते रहे। इदरीस शाह के भी तर पूरब और पश्‍चिम का अनोखा संगम था। इसलिए बेबूझ, अतर्क, सूफी साहित्‍य को पश्‍चिम की बुद्धिवादी तर्क सरणी में प्रभावशाली ढंग से अभिव्‍यक्‍त कर सके। सूफी साहित्‍य पर उनकी लगभग एक दर्जन किताबें है।
      सूफी लोगों को आप कोई भी व्‍यवस्‍था नहीं दे सकते। उनके न तो मंदिर बन सकते है, न शास्‍त्र, न क्रिया कांड। इसलिए उनका स्‍कूल कॉलेजों में अध्‍ययन नहीं किया जा सकता। सूफियों का दर्शन शास्‍त्र नहीं है क्‍योंकि उनका ज्ञान शब्‍दों में संरक्षित नहीं है। वह सदगुरू के अंतरतम में समाहित है। सदगुरू अपनी आंखों में , आचरण से, खामोशी और अपने वजूद से शिष्‍यों को संप्रेषित करता है। इसलिए सूफियों में सदगुरू का महत्‍व असाधारण होता है। सूफी सदगुरू प्रतीकों में बात करते है। उनकी बातें समझने के लिए तर्क संगत मस्‍तिष्‍क को परे हटाना होता है।
      सूफी आबोहवा इदरीस शाह की रग-रग में समाई थी। साथ ही उन्‍हें पाश्‍चात्‍य शिक्षा भी नसीब हुई थी। इसलिए वे पूरब की मय को पश्‍चिम के पैमाने में उंडेलने का काम बखूबी करते रहे। इस किताब के तीस परिछेद है। और उनमें पूरा सूफी जहां समाया हुआ है। पहले तो वह सूफियों की पृष्‍ठभूमि देते है, सूफी हमेशा परोक्ष बात करते है। सीधी बात नहीं कहते। जीवन दो तरह से जिया जा सकता है। तर्क से या अनुभव से। तर्क किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचता है और हमें उसे मानना पड़ता है लेकिन उससे हमारे संदेह दूर नहीं होते। अनिश्‍चय बना रहता है। अनुभव सीधे ह्रदय में प्रवेश करता है और आदमी को एक सुकून बख़्शता है। इसलिए सूफी कभी तर्क नहीं करते, दो टूक बात करते है।
      साधारण आदमी अपने पापों का पश्‍चाताप करता है।
      विकसित व्‍यक्‍ति अपनी असावधानी पर ग्लानि करता है।
      इस किताब के सात परिच्‍छेद सात बुलंद सूफी सदगुरूओं को समर्पित है। इसमें है मुल्‍ला नसरूद्दीन, शेख सादी, फरिदुद्दीन अत्‍तार, जलालुदिन रूमी, इब्‍न–अल-अरबी, अल-गझली और उमर ख्‍याम। ये वे दैदीप्‍यमान नक्षत्र है। जिन्‍होंने सूफी पथ को अपने अलौकिक प्रकाश से आलोकित किया है। हर एक का कुछ न कुछ मौलिक योगदान रहा है। नसरूद्दीन के लतीफ़े, रूमी की कविताएं, उमर ख्‍याम की रूबाइयां। मनुष्‍य जाति के साहित्‍य और जीवन पर छाई हुई है। दूसरे को जीतने का यह भी सूफियाना अंदाज ही है। वे सीधे आक्रमण नहीं करते; हौले-हौले, दिल के दरवाजे से आपके ज़ेहन में प्रवेश करते है। आपके दिल की धड़कन बन जाते है। उनमें मुक्‍ति  पाना असंभव है। मनुष्‍य की पूरी कला सूफियों से प्रभावित है। वे लोग इस अदा से कत्‍ल करते है कि मरने वाले को पता भी नहीं चलता कि मारे गये। वस्‍तुत: हर धर्म का गहराइयों में सूफी बसता है। क्‍योंकि वह हर सृजन का स्‍त्रोत है।
      सूफी साधक निरंतर चेतना के उर्ध्व गमन का प्रयास करते है—कैसे मन के उच्‍चतर स्‍तरों की खिलावट हो और आदमी दिव्‍यता का अनुभव करे। इस प्रयास में वे कई चीजों का उपयोग करते है। इसलिए सूफी खुद को ‘’पीपल ऑफ दि पाथ’’ अर्थात राहगीर कहते है। अनंत की यात्रा है और चलते जाना है अथक अनवरत।
      मन को विकसित करने के लिए वे कुछ नंबर, कुछ अक्षर और कुछ विधियों का प्रयोग करते है। उनके अभ्‍यास से मन की जड़ता दूर होकर वह जीवन के रहस्‍यों को समझने के काबिल हो जाता है। अधिकांश लोग जीवन की टुच्‍ची क्षुद्र बातों में उलझे रहते है। इतना छोटा मन श्रेष्‍ठतर बातों का अहसास नहीं कर सकता। उसके लिए मन को संकीर्णताओं से हटाकर विशालता पर केंद्रित करना, रहस्‍यों पर ध्‍यान करना जरूरी होता है।
      सूफी जिस भाषा का प्रयोग करते है उसे वे ‘’गुह्म भाषा’’ कहते है। उनके शब्‍दों का प्रकट अर्थ कुछ होगा और भीतरी अर्थ कुछ और होगा। एक-एक शब्‍द के कई अर्थ होंगे। और सुनने वाला अपने तल से उस अर्थ को समझेगा। इसके पीछे उद्देश्‍य होता है; बंधी हुई धारणाओं को तोड़कर मन को नई ऊर्जाओं के लिए उपलब्‍ध करना।
      सामान्‍यतया माना जाता है कि सूफियों के पास चमत्‍कार आरे सिद्धियां होते है। लेकिन सूफियों के मुख्‍य धारा में, चमत्‍कार और जादू का प्रदर्शन उस व्‍यक्‍ति का पतन माना जाता है।
      चमत्‍कारों का एक खास उद्देश्‍य होता है। कुछ लोगों उनमें भ्रांति में पड़ जाएंगे। कुछ लोगों में संदेह पैदा होगा, अन्‍य कुछ लोग डर जाएंगे। तो दूसरे उत्‍तेजित हो जाएंगे। चमत्‍कार लोगों की मानसिकता को बदलने का एक साधन है।
      जीवन को देखने का सूफियों का एक खास अंदाज होता है। वे कुदरत के साथ पूरी तरह तालमेल बिठा कर जीते है। मसलन सूफी कहते है कि आप जब बीमार होते है तो फौरन दवा ढूंढने की बजाएं बीमारी की सोहबत करिए। उससे पूछिये की तू क्‍या है। कैसे ठीक होगी। इलाज बीमारी में ही छीपा होता है। जो जानकारी बीमारी के भीतर कैद होती है। उसे मुक्‍त करिये और आप स्‍वास्‍थ हो जाएंगे। शेर जब बीमार होता है तो एक खास तरह का पौधा खाता है और ठीक हो जाता है। उसे यह इलाज कौन बताता है। खुद उसकी बीमारी।
      सूफी फकीर अपने आपको दरवेश कहते है। जो अल्‍लाह की राह पर चलने लगा उसके लिए सारी दुनिया ‘’उसका’’ दर है। दरवेशों की अपनी पूरी व्‍यवस्‍था है और तल है। उनका रहन सहन थेगड़े लगे हुए कपड़े खोयी-खोयी सी मुद्रा और अतार्किक आचरण उन्‍हें आम आदमी से अलग करता है। इश्‍क उनकी जाति है। क्‍योंकि उन्‍हें अल्‍लाह से इश्‍क है। वे उसी का जिक्र करते है। खुद को इस हद तक पाक बनाने की कोशिश करते है। कि अनवर (खुदा का एक नाम, जिसका मतलब है रोशन) हो जाएं।
      इदरीस शाह की इस किताब को पढ़ना एक रहस्‍य लोक का सफर करने जैसा है। यह लोक हर एक शख्‍स के भीतर बसा है। इसमें पैठने के लिए निरंतर सतह को छोड़कर गहरी पर्तों को उघाड़ना जरूरी होता है। सूफियों की नजरों से देखते-देखते पढ़ने वाले को भी एक नई आँख मिलती है। यह कहना बेहतर होगा। कि उसकी आंखें खुल जाती है। वह पहली बार सतह पर दिखाई देने दृश्‍यों के पार देखने लगता है।
      इस किताब का नाम सूफी, सूफीवाद या सूफीज्‍म मत नहीं रखा है। इसे वे कहते है, दि सूफीज़। यह अर्थ पूर्ण है। सूफियों का कोई वाद नहीं होता। सूफी हुआ जा सकता है। जो भी खोजी है, जो भी खुद को बेहतर बनाने के रास्‍ते पर चल पड़े है। उनके लिए सूफियों को समझना बहुत काम आएगा।

किताब की एक झलक--
     
मुल्‍ला नसरूद्दीन के लतीफ़े--
      मुल्‍ला नसरूद्दीन एक आदर्श उदाहरण है। जिसे दरवेशों ने ईजाद किया है। उनका मकसद यह है कि कुछ खास परिस्‍थितियों में मन को एक झटका लगे और वह रूक जाएं। मध्‍यपूर्व में प्रचलित नसरूद्दीन की कथाएं अध्‍यात्‍म के जगत में एक अनूठी उपलब्धियाँ है। ऊपर से देखने पर नसरूद्दीन की कहानियां महज मजाक मालूम होता है। चाय खानों में, कैरेवान सराय में, घरों में, या रेडियों पर ये कहानियां निरंतर सुनाई जाती है। एक कहानी के कई तल होते है। उसमे निहित व्‍यंग्‍य, निष्‍कर्ष और उससे अधिक कुछ तत्‍व, जो रहस्‍य के खोजी को उसकी खोज में एक कदम आगे ले जाते है।
      चूंकि सूफी शैली को जीना होता है और जानना होता है, सिर्फ नसरूद्दीन की कहानी को सुनकर कोई ज्ञानी नहीं बन सकता है। हर कहानी भौतिक जीवन और चेतना के रूपांतरण के बीच की खाई को पाट देती है। विश्‍व का और कोई साहित्‍य यह काम नहीं कर सकता।
      ये कहानियां पाश्‍चात्‍य जगत में कभी पेश नहीं कही गई है। शायद इसलिए क्‍योंकि कोई गैर सूफी इनका अनुवाद नहीं कर सकता।  या संदर्भ के बाहर इनका अध्‍ययन भी नहीं कर सकता। क्‍योंकि तब वे अपना असर खो देंगी। पूरब में भी सिर्फ दीक्षित सूफी साधक ही उन पर मनन कर सकते है। इस संग्रह के मजाक विश्‍व के लगभग सभी तरह के साहित्‍य में प्रविष्‍ट हो गए है। उनकी वजह है, इन मज़ाक़ों में बहती हुई हास्‍य की धारा। हालांकि सूफियों का मकसद यह था कि आम आदमी को सूफियाना अंदाज सक वाकिफ किया जाए और मनुष्‍य जाति सूफियों के गुह्म अनुभवों को उपल्‍बध हो।
      मजाक को फैलने से रोका नहीं जा सकता। मनुष्‍य के ऊपर विचारों का जो ढांचा थोपा गया है उसकी दरारों में निकल कर मजाक फिसल जाती है। नसरूदीन मनुष्‍य जाति के विचारों के इतने तलों पर जा बसा है कि उसे निकाल बाहर करना असंभव है1 वह अमर है। कोई भी जानता है कि नसरूद्दीन कौन था। कब और कहा हरता था। यही उसका प्रयोजन है। सूफियों को ऐसा ही चरित्र गढ़ना था जो समयातित है, अनचीन्‍हा है। उनके लिए आदमी नहीं उनका संदेश महत्‍वपूर्ण है।
      नसरूद्दीन वस्‍तुत: सूफी सदगुरू है। लेकिन हर कहानी में वह मूढ़ता का दिखावा करता है। और उसके जरिए सत्‍य को उजागर करता है। आम आदमी क सोचने के सख्‍त ढाँचे होते है। और लीक से हटकर अलग नज़रिये से यह देख नहीं सकता। इसलिए जीवन के गहरे अर्थों से वंचित रह जाता है। इस तथ्‍य को यह कहानी बहुत स्‍पष्‍टता से प्रकट करती है।
      नसरूद्दीन प्रतिदिन गधे को सरहद के पर ले जाता है। उस पर घास लादी होती थी। सरहद के सिपाहियों के सामने वह स्‍वीकार करता था कि वह तस्‍कर है। इसलिए वह लोग उसकी रोज तलाशी लेते थे। उसकी घास उछालते थे, कभी जला देते थे। कभी पानी में डाल देते थे।  इधर नसरूद्दीन धनी से धनी होता जा रहा था।
      फिर वह वहां से दूसरे देश में रहने गया। वर्षों बाद उसे सरहद की रखा करने वाल पुराने अफसरों में से एक मिला। उसने कुतूहलवश पूछा, नसरूद्दीन तुम ऐसी कौन सकी चीज की तस्‍करी करते थे कि हम तुम्‍हें कभी नहीं पकड़ पाये।
      नसरूदीन ने कहां की गधे की।
शिक्षक, शिक्षा और शिक्षार्थी--
      पश्‍चिम से आया हुआ एक खोजी एक सूफी शेख से बुरी तरह जवाब तलब कर रहा था। कि वह सूफी शिक्षकों को कैसे पहचाने? क्‍या वह शिक्षक एक मसीही मार्गदर्शक होता है, जो लोगों का नेतृत्‍व करता है?
            शेख ने कहा, तुम खुद इस तरह के नेता बनोंगे। और तुम्‍हारी जिंदगी में पूरब के रहस्‍यदर्शीयों का महत्‍वपूर्ण स्‍थान होगा। विश्‍वास करो।
      बाद में शेख अपने शिष्‍यों से बोला, वह आदमी इसीलिए यहां आया था। क्‍या तुम बच्‍चों को मिठाई देने से इनकार करते हो। या पागल आदमी से कहते हो कि वह विक्षिप्‍त है। जो सीखने  के काबिल नहीं है उनका हौसला बढ़ाना चाहिए। जब कोई आदमी पूछता है, ‘’मेरा नया कोट कैसा है, तो तुम्‍हें यह नहीं कहना चाहिए कि, बिलकुल बेकार है। जब तक कि तुम उसे बेहतर कोट नहीं दे देते हो। या रहन सहन की तहजीब नहीं सिखा देते हो। कुछ लोगों को सिखाया नहीं जा सकता है।
      जलालुद्दीन रूमी कहता है: ‘’किसी का विरोधी बनकर सिखाया नहीं जा सकता है।‘’
रेत की कहानी-
      एक उछलता हुआ झरना रेगिस्‍तान पहुंचा। उसे दिखाई दिया कि वह उसे पार नहीं कर सकेगा। बारीक रेत में उसका पानी तेजी से सूख रहा था। झरने ने स्‍वयं से कहा, ‘’रेगिस्‍तान को पार करना मेरी नियति है लेकिन उसके आसार नजर नहीं आते है।
      यह शिष्‍य की स्‍थिति है जिसे सदगुरू की जरूरत होती है। लेकिन वह किसी पर श्रद्धा नहीं कर सकता। यह मनुष्‍य की दुखद हालत है।
      रेगिस्‍तान की आवाज ने कहा, ‘’हवा रेगिस्‍तान को पार करती है, तुम भी कर सकते हो।‘’
      झरना बोला, ‘’जब भी मैं कोशिश करता हूं मेरा पानी रेत में समा जाता है, और मैं कितना ही जोर लगाऊं थोड़ी दूर ही जा पाता हूं।
      हवा रेगिस्‍तान के साथ जोर नहीं लगाती।
   लेकिन हवा उड़ सकती है, मैं उड़ नहीं सकती।
      तुम गलत ढंग से सोच रही हो। अकेले उड़ने की कोशिश मूढ़ता है। हवा को तुम्‍हें ले जाने दो।
      झरने ने कहा कि वह अपनी निजता को खोना नहीं चाहता। इस तरह तो उसकी हस्‍ती खो जाएगी। रेत ने समझाया कि इस तरह सोचना तर्क का एक भाग है लेकिन यथार्थ के साथ उसका कोई ताल्‍लुक नहीं है। हवा जल की नमी को आत्‍म सात कर लेती है। रेगिस्‍तान के पार ले जाती है। और फिर बरसात बन कर पुन: नीचे ले आती है।
      झरना पूछता है, ‘’यदि ऐसा है तो क्‍या मैं यही झरना रहूंगा जो आज हूं।‘’
      रेत बोली; ‘’यों भी किसी सूरत में तुम यही नहीं रहोगे। तुम्‍हारे पास कोई चुनाव नहीं है। हवा तुम्‍हारे सार तत्‍व को, सूक्ष्‍म अंश को ले जाएगी। जब रेगिस्‍तान के पार, पहाड़ों में तुम फिर नदी बन जाओगे। फिर लोग तुम्‍हें किसी और नाम से पुकारेगा। लेकिन भीतर गहरे में तुम जानोंगे: ‘’मैं वहीं हूं।‘’
      हवा की स्‍वागत करती हुई बांहों में स्मारक झरना रेगिस्‍तान के पार चला गया। हवा उसे पर्वत की चोटी पर ले गई और फिर धीरे से, लेकिन दृढ़ता से जमीन पर गिरा दिया। झरना बुदबुदाया: ‘’अब मुझे मेरी वास्‍तविक अस्‍मिता का पता चला। फिर भी एक प्रश्न उसके मन में था। ‘’मैं अपने आप को क्‍यों नहीं जान सका।‘’ रेत को मुझे क्‍यों बताना पडा।
      एक छोटी सी आवाज उसके कानों में गूँजी। रेत का एक कण बोल रहा था: सिर्फ रेत ही जान सकती है क्‍योंकि उसने कई बार इसे घटते देखा है। क्‍योंकि वह नदी से लेकिर पर्वत तक फैली हुई है। जीवन की सरिता अपनी यात्रा कैसे करेगी इसका पूरा नक्‍श रेत में बना होता है।‘’
ओशो का नजरिया--
      एक आदमी है, इदरीस शाह। मैं उसकी किसी किताब का नाम नहीं लुंगा क्‍योंकि वे सभी अद्भुत है। मैं इस आदमी की प्रत्‍येक पुस्‍तक का समर्थन करता हूं। लेकिन उसकी एक पुस्‍तक अन्‍य सभी पुस्तकों से उभरकर दिखाई देती है। ‘’दि सूफीज़’’ यह पुस्तक कोहिनूर है। ‘’सूफीज़’’ में उसने जो काम किया है वह अपरिसीमित है। इस आदमी ने पश्‍चिम को मुल्‍ला नसरूद्दीन से परिचित कराया। उसने बहुत बड़ा काम किया है। उसने नसरूद्दीन के छोटे-छोटे किस्‍से बहुत खूबसूरत बना दिये है। वह कहानियों को सुंदरता से अनुवादित तो करता ही था। उसके साथ उनकी सुंदरता में चार चाँद लगा देता था। और उन्‍हें ज्‍यादा सारगर्भित, ज्‍यादा दिलकश बना देता है।
ओशो
बुक्‍स आय हैव लव्‍ड