कुल पेज दृश्य

सोमवार, 30 जनवरी 2012

ध्‍यान में प्रथम अनुभूति--स्‍वामी आनंद प्रसाद

ध्‍यान के प्रथम कदम मनुष्‍य के एक नर्म मुलायम मिट्टी पर पड़ें कदमों की तरह होते है जो बहुत गहरी छाप छोड़ जाते है। फिर आप उसमें श्रद्धा की गुड़ाई की हो तो सोने पे सुहागा समझो। अगर उस भूमि में अपने बीज बो दिया तो वह बहुत गहरा और उँचा वृक्ष जरूर बनेगा। जिसे कोई भी मीलों दूर से भी देख सकेगें। इस लिए प्रथम अनुभूतियों को आज भी में अपने बिलकुल पास महसूस करता हूं, जैसे वो अभी कोरी और अनछुई है। ध्‍यान के पहले दिन ही चित मुझे अचेतन की उन गहराइयों में ले गया। जिस की अनुभूति आज मैं रोंए रेशे में मांस मज्‍जा बन कर समा गई है। कितनी मधुर और ठोस धरातल पर वह अनुभूति मुझे एक स्‍वप्‍न तुल्‍य लगती है। परन्‍तु मैं जानता हूं कि वह कोई कोरी कल्‍पना नहीं थी।
और न ही वह एक स्‍वप्‍न। बस यूं समझो मेरे अंदर एक प्‍यास थी और सामने अमृत गागर मिल गया। और में डूब गया उस में, छोड़ अपने को पूरी तरह से बिना कुछ सोचे विचारे किये की क्‍या होगा और कैसे..;। डूबने वाले को क्‍या पता क्‍या किनारा और क्‍या गहराई। मैंने तो बस छलांग लगा दी और छोड़ दिया आस्‍तित्‍व के हाथ में। वैसे मुझे में लाख खराबियां थी पर एक संकल्प और साहस की कमी नहीं थी। मैं बचपन से जो भी काम करता, उस के अंदर पूर्णता से डूब जाता था। शायद यही सोच और संकल्प मुझे ध्‍यान की धारा में ले गई। जब भी में ध्‍यान करने  जाता था तो झोक देता था पूरी ताकत और अपने आप को। पूरे शरीर की उर्जा लगा देता, और  चूकने का इंतजार करता की कहां पर वह खत्‍म होती है। पर ऐसा दिन कभी नहीं आया आज तक, वह कभी नहीं चुकी, कभी-कभी ध्‍यान करते हुए मन यह कल्‍पना या भय जरूरी दिखाता की अगर अभी एक भी हूं...हूं...और किया तो हूं के साथ प्राण निकल जायेगे। परन्‍तु मैंने एक नहीं हजार किये....लेकिन कभी कुछ नहीं हुआ। ये सब मन का खेल होता है। मन को जब लगता है कि मैं मरा। वह लाख बहाने बाजी करता है। यही उसके बच निकलने का एक मात्र उपाय है, जिस में वो कभी-कभी कामयाब हो जाता है। परन्‍तु मैंने उसकी एक नहीं चलने दि और फिर वह बेचारा लाचार एक कोने में दूबक कर बैठ गया। उसकी बंदर वाली उछल कूद कुछ ही महीनों में थक हार गई।
      ध्‍यान करते समय किसी अनुभव या कल्‍पना पर मेरा कोई जोर या विश्‍वास नहीं था। क्‍योंकि ओशो ने साफ कहां था, ‘’ये सब मार्ग के दृश्‍य है इन्‍हें देखो पर रुको मत।‘’ पहले दिन जब में ध्‍यान करने के लिए गया तो, किसी ने कुछ नहीं बताया कि ध्‍यान क्‍या है और कैसे करना है। मैंने चोगा पहना और अंदर चला गया ध्‍यान केन्‍द्र में। वहां और मित्र भी ध्‍यान के लिए आये हुए थे। ध्‍यान का संगीत चालू हुआ। मुझे मजबूरन देखना पडा की ये सब क्‍या हो रहा है और कैसे करना है। परन्‍तु आँख खोल कर किसी को देखा शोभा दाई बात नहीं होती। परन्‍तु यह मेरी मजबूर या असह्यता समझो। क्‍योंकि क्‍या करना है मुझे कुछ भी पता नहीं था। वैसे अकसर ध्‍यान में जाने से पहले नये मित्र को ध्‍यान कराने वाला बता देता है कि किसी तरह से ध्‍यान करना है। पर होना कुछ और ही था....जो मेरे लिए विस्मयकारी ही था। लेकिन एक बार सब देखने के बाद मैनें आंखें बंद कर ली और प्रथम चरण के संगीत खत्‍म होने तक मैं वह क्रिया करता रहा। अब दूसरा नृत्‍य कर चरण आया। तब भी मैंने आंखें खोल कर देखा और कुछ झिझक के साथ नाचने लगा। कुंडलिनी का संगीत चमत्कारी है। ओशो के दिशानिर्देश पर तैयार संगीत किसी और ही लोक का लगता है। आज भी उसे हजारों बार सून कर ऐसा लगता वह एक दम नया और अनछुआ है। जबकि आप किसी भी संगीत को दस-पाँच बार सुनने के बाद बोर हो जाते हो। और ये मेरा अकेले का अनुभव नहीं है। लाखों करोड़ो....जो 30-35 साल से रोज इस संगीत पर ध्‍यान करते है। पूना आश्रम में साय चार बज कर पंद्रह मिनट पर।
सालों से ये ध्‍यान नित नियम से हो रहा है।     
      नृत्‍य ने मेरे पूरे शरीर को एक दम हलका और भार रहित कर दिया। तोड़ दिया मैंने सारे बंधन जो सालों से कही दबे हुए थे। क्‍योंकि वहां पर सब मौज से नाच रहे थे, न वहां कोई देखने वाला ही था, सब ही तो नृत्‍य में डूबे हुई थे। फिर आप को क्‍या झिझक और शर्म। ये अनुभव मुझे तीसरे चरण में हुआ। जब ध्‍यान के लिए एक खास संगीत बजने लगा। इस चरण में आप को बैठ कर या खड़े रह कर संगीत तो सुनना होता है। घंटियों हजार-हजार ध्‍वनि के साथ और भी बाद यत्र बज रहे थे। जो हमारे सुनने की पूर्णता पर चोट कर रहे थे। हजारों लाखों घ्वनियां इधर उधर से आ रही थी और वह सब मेरी नाभि में डूब रही थी। और मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मेरा पूरा शरीर कान बन गया है। और घ्वनियां मुझे में से होकर गुजर रही है। कुछ देर में मेरा शरीर मानों मिट गया। शरीर का एक भार जो हमेशा महसूस करते है हम, अचानक गायब हो गया। कितना हल्‍कापन पहली बार मुझे लगा आपको बात नहीं सकता।
      मैं आंखें बंद किये...थिर खड़ा था। शरीर की सभी प्रकार की हलचल समाप्‍त हो गयी थी। या यूं कह सकते है की में शरीर को हीला-झूला पाने की स्‍थिति में नहीं था। मानों पहली बार शरीर ने में मेरी आज्ञा माननी बंद कर दी। मैने एक दो बार हाथ हिलाने की कोशिश की पर मैं कामयाब नहीं हो सका। मरना क्‍या होता है.....शरीर का मिटना क्‍या होता है, उसे पहले बार मैने जाना। हम नाहक मोत से डरते है। सच ही मुझे उस मिटने पर जरा भी डर नहीं लगा क्‍योंकि मैं देख रहा था अपने को पूरा का पूरा।  और मेरी स्‍वास भी चल रही थी, पर वो कही दूर थी। जिन पर मनुष्‍य का वैसे भी कोई नियंत्रण नहीं है। और हम नियंत्रण करने को योग आसन मानते है कैसा विरोधा भास है। जो स्‍वय चल रही है, अविरल। धीरे-धीर मुझे लगने लगा की मेरे शरीर ने एक वृक्ष का रूप ले लिया है। एक पहाड़ी ढलान पर खड़ा मैं नीचे खाई की और झांक रहा हूं। दूर दराज तक बर्फ ही बर्फ है। और नरम मुलायम बर्फ मेरे तनों और टहनियों पर अब भी गिर रही थी। वहां हवा का एक झोंका भी नहीं था। आस पास के छोटे मोटे पेड़ों को में निहार रहा था। दूर पहाड़ियों पर बादल तैर रहे थे। मेरे आप पास जो छोटे-छोटे पेड़ पौधे थे। मैं उन पर ज़मीं बर्फ को देख रहा था। पूरा रास्‍ता एक दम सून-सान था। केवल बर्फ की सफेद चादर पर हल्‍की-हल्‍की सूर्य की रोशनी पड़ने के कारण वह चाँदी के समान चमक रही थी। मैं बहुत विशाल और ऊँचा था। परंतु मैं देख रहा था, मेरे टहनियों पर कोई पत्‍ते नहीं थे। जिसके कारण मैं देख नहीं पाया की मैं कौन सा वृक्ष था। रूई की तरह गिरती बर्फ के साथ एक प्राणी जो ऊदबिलाव की तरह दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे मेरे उपर चढ़ रहा था। उस समय मेरे मन कि अवस्‍था कैसी थी, एक हलका पन....ऐसा जिसे इससे पहले मैंने कभी महसूस नहीं किया था। बोझ रहित.....जहां पर विचारों की दौड़ नहीं थी। एक दम सूना पथ। मीलों दूर तक कोई विचार नहीं।  सब कुछ खाली हो गया हो जैसे शायद वृक्षों के जगत में विचार नहीं होते केवल भाव होते है। न वहां कोई तरंग थी, न कोई विचार, न कोई शब्‍द.......ओर न ही थी वहां कोई उत्‍तेजना। कितना सुखद लग रहा था वह क्षण....
      वह प्राणी जो मेरे उपर चढ़ रहा था शायद इस बर्फ और ठंड में किसी आश्रय की आस में था। उसका छूना, उसका रेंगना। मुझे बहुत भला लग रहा था। जैसे कोई मेहमान हमारे घर आये और हम आनंद और उत्‍साह से भर जाये। वह प्रेम ऐसा था, मातृत्‍व लिये, आपका पूरा शरीर प्रेम की तरंगों से तरंगाइत हो रहा हो। मैं अपने को पूर्ण प्रेम की छूआन से लबरेज होता हुआ महसूस कर रहा था। ऐसा शायद कोई मनुष्‍य के शरीर में कभी अनुभव नहीं कर सकता।  क्‍यों मनुष्‍य के शरीर में हमारा मन कार्य करने लगा है। यहां पर विचारों ने उत्पत्ति शुरू हो जाती है। मनुष्‍य के ऊपर लाखों सालों की यात्रा ने विकास का एक जाल फैला लिया है। आज भी हम आपने जीवन में इसे देख सकते है। जब भी आप किसी को कुछ समझाना चाहते हो तो आप बात करते हो विचारों से और सुनने वाला उन्‍हें लेता है आपने भाव से। आ डांट रह रहे है उसकी भलाई के लिए और वो कहता है तुमने मेरे दिल को ठेस पहुँचाई। कहीं कोई तालमेल नहीं। तब हम कहते फिरते है कि मुझे कोई समझ नहीं रहा ......सभी को ऐसा लगा है। वो शायद भाव का लोक है, जो विचारों के ठीक नीचे बह रह है। जिसे कभी कोई प्रेम में गोता मार कर महसूस कर लेता है। प्रत्‍येक मनुष्‍य अपने भाव देखता है और दूसरे के विचार। विचार मन और बुद्धि के जगत के है। और भाव ह्रदय के जगत का। पहली बार विचारों के भार रहित मन में जो हलका पन होता है उसे मैंने महसूस किया। उसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता। उस स्‍थिति के बाद घंटो किसी से बात करने या मिलने को मेरा मन नहीं किया। मैं दूर एक एकांत में किसी वृक्ष से टेक लगा कर बैठ गया। कब मेरी आँख लगी और कितना समय बिता मुझे कुछ पता नहीं चला। जब आंख उठा कर सामने देखा तो आसमान पर पूरा चाँद चमक रहा था। इतना खुबसूरत चाँद मेंने पहले कभी नहीं देखा। आस पास झींगुरों की आवाज मानों मन को गुदगुदा रही थी। चाँद की छांव में पेड़ों की पड़ती परछाई झूम रही थी। घंटो बाद भी तन भार रहित.....अपने हल्‍के पन को लिए रहा। और मैं एक अद्भुत सिहरन सी महसूस करता रहा था। एक खामोशी मेरे दामन पर मानों लिपट गई थी। जो मेरे अंदर से गुद-गुदा हट से भर रही थी। कितनी देर में तो मुझे महसूस हुआ की मैं कौन हूं और यहां पर क्‍या कर रहा हूं...मस्‍तिष्‍क को ये सब ताल मेल बिठाने में बहुत देर लगी। जैसे हमें कभी-कभार स्‍वप्‍न से बहार आने पर पता नहीं चलता की हम कहां पर है। पर वह स्‍थिति बहुत सुनंद थी।
      दूसरी अनुभूति को मैं ‘’मांग’’ ही कहूंगा। वैसे मैंने ध्‍यान के इन 21 वर्षो में केवल दो ही मांग रखी थी। जो दोनों ही पूर्ण हो गई। दूसरी का जिक्र आगे करूंगा आज पहली मांग की बारी है। ध्‍यान शुरू किये करीब 6 महीने हो गये थे। पर एक बात मुझे बहुत चुभती थी। जब भी में आँख बंद कर के बैठता। तो मेरी आंखों की पुतलियाँ हिलती रहती और हरकत करती थी। और अंदर देखने में जो गहरा मटियाला गाढ़ा अँधेरा साफ नहीं दिखाई देता था। जब भी मैं आँख बंद कर के उसे देखता तो वह हमेशा हिलती रहता। हमारी आंखों की पुतलियों कि हलचल हमारे बेचैन मन का प्रतीक है। मन जितना बेचैन होगा पुतलियाँ उतनी ही अधिक हिलती रहेगी। वह अजीब काला मटियाला अंधकार, एक धुएँ और समुद्र की लहरों को तरह अंदर हिलोरे ले रहा था । कुछ ऐसा अजीब सा था जैसे कि कोई अंधकार से भरा समुद्र हिलोरे मार रहा है। मेरे मन में अचानक एक कल्‍पना आई कि काश ऐसा हो जाता की मेरी आँखो की पुतलियाँ हिलना बंद कर दे।  तब इस अंधकार को देखना कितना सुखद लगेगा भला लगेगा।  पर ये सब मेरे बस की बात नहीं थी। मैं चाहता था मेरी आँख एक दम से जड़ वत हो जाये। एक पत्‍थर की आँख बन जाए। जो मात्र हो वहां उसमें कोई हलचल न हो। क्‍या फिर भी वह अंधकार इस तरह से हिलेगा। या उस मैं जब थिर आंखों से देखूँगा तो वह मुझे कैसा लगेगा।
      इस बात को मैं जानता था, मांग हमेशा मन की होती है, और वह ध्‍यान में बाधा डालने के लिए मन की ही एक कल्‍पना होती है, या उसे कहे लालच, कहीं....किसी मांग.....पर मैं रूक न जाऊं या अपने-आप को रोक नहीं लूं। पर लाख जतन कर उस वासना को मैं दबा नहीं पा रहा था। सच तो यह था की वह मेरी पकड़ से बहार हो गई थी। इस तरह से पुतलियों का हिलना प्रत्‍येक साधक की पहली बाधा होता होगा। क्‍योंकि लाखों सालों से उर्जा आँखो के द्वारा से लगातार बाहर बहती रही है। जब हम आँख बंद करते है। तो उर्जा लगातार आंखों की पुतलियों से टकराती है। उर्जा कभी थिर रह सकती। तब वह वहां मार्ग न पा कर वह वापस लोटती है। और उस उर्जा को संभालने के लिए आंखों की पुतलियों को हलचल करनी होती है। क्‍योंकि तीसरी आँख उस समय तक सोई होती है। उसके द्वार बंद होते है। वैसे तो वह आँख ध्‍यान के लिए हमेशा प्‍यासी रहती है। पर शायद साधक को उर्जा इन आंखों से उस आँख तक हस्तांतरण करने में कुछ समय लगता है। फिर तो वह तीसर आँख यह कार्य खुद-ब-खुद कर लेती है। इसमे साधक को कुछ भी नहीं करना होता। उसके बाद तो आपको केवल ध्‍यान को तीसरी आँख पर केंद्रित करना है और वह चूस लगी सारी उर्जा को अपने अंदर। क्‍यों तब तक आपकी आंखे जड़वत थिर हो चुकी होती है।
      इस सब को महसूस करेने के लिए मुझे तीन महीने का समय लगा। अचानक एक दिन जैसे ही मैं ध्‍यान के चरण में खड़ा हुआ। तो क्‍या देखता हूं मेरी दोनों आंखे आपस में चिपक गई। न तो बाहर की तरफ हलचल थी और न अंदर की तरफ। कितना अभूतपूर्व क्षण था। उस समय आंखों से देखना। चाहें वहां प्रकाश नहीं था। पर हम उस अंधकार को भी कहां देख पाते है। मैं देखता रहा उस काले-मटमैले अंधकार को। जो लहरों की भाति हिलडूल रहा था। मानों अंदर एक अंधकार का समुद्र लहरा रहा है। वहां अंदर अब केवल अंधकार में हलचल थी। पर में केवल देख रहा था। वो हिलती छाया.....कितनी सौम्य और सुखद लग रही थी। अंदर तक सब शांत हो गया। शायद वहीं दर्व है जिसे विज्ञान कोई नाम दे रहा है। मैटर या और कुछ। पर यह मानने की बात है, हम प्रकाश करते है। तब भी अंधकार होता है। और प्रकाश को बुझा देते है तब भी। प्रकाश आता जाता है। परन्‍तु अंधकार न आता है जाता। जो आता नहीं वह जा भी कैसे सकता है। अब ध्‍यानियों ने परमात्‍मा को प्रकाश रूप कहा है। और कितने ही धर्म अपनी साधना के पहले चरण में ही प्रकाश की साधना से शुरू करते है। परन्‍तु मेरा तो पहला साक्षात्कार एक अंधकार से होता है। वह भी महीनों हिलते-डुलती आंखों से आज पहली बार में उन थिर आंखों के बाद में देख पा रहा था, उस तरल अंधकार को जो जम गया था बर्फ की तरह......
ओशो ने एक जगह कहां है...
      ‘’जब भी कोई साधक भीतर प्रविष्‍ट होता है, तो प्रकाश से उसकी सीधी मुलाकात कभी नहीं होती। होगी भी नहीं, क्‍योंकि प्रकाश तो बहुत गहरे में छिपा है। हमारे और हमारे ही प्रकाश के बीच अंधकार की गहरी पर्त है। तो पहले तो भीतर आँख बंद करते ही अंधकार हो जाता है। इस अंधकार से भयभीत मत होना। और इस अंधकार में काई कल्‍पित अंधकार निर्मित मत करना। इस अंधकार में प्रवेश करते ही जाना....कल्‍पित प्रकाश भी हम निर्मित कर सकते है। लेकिन इस कल्‍पित प्रकाश के कारण असली प्रकाश का कोई पता नहीं चलेगा।
      बहुत सी साधनाएं, जो प्रकाश की कल्‍पना से शुरू होती है; वे साधनाएं इस अंधकार के पार नहीं ले जाती। .......बंद आँख करके हम उस प्रकाश को देखने की कोशिश भी कर सकते है। और कोशिश की तो सफल भी होगें। क्‍योंकि वह प्रकाश हमारी कल्‍पना ने निर्मित किया है। वह आपके ही मन की उत्पती है। वह आपकी ही संतति है। उससे ये अंधकार नहीं कटेगा।
      हां वहां एक और भी प्रकाश है; जब हम अंधेरे में प्रवेश करते चले जाते है। तब वह एक दिन उपल्‍बध होगा। जिसे हमने सोच और चाह कर निर्मित नहीं किया। लेकिन अंधकार में डूबते-डूबते एक दिन अंधेरे की वह पर्त टूट जाती है। और हम प्रकाश के लोक में प्रवेश कर जाते है।
      पहली मुलाकात वास्‍तविक साधक को अंधकार से होगी....झूठे साधक को प्रकाश से भी हो सकती है।...
ओशो
समाधि के सप्त द्वार
प्रवचन पहला ध्‍यान शिविर, अंबर नाथ
रात्रि 9 फरवरी 1973
      वो दिन था और उसके बाद मेरी आंखों की पुतलियाँ थिर हो गई। अब कभी भी कहीं पर भी आंखें जैसे बंद करता हूं मेरी आँख चिपक जाती है।...ओर दोनों आँखों के बीच.....माथे के अंदर एक अजीब सा चुंबकीय खिचाव महसूस होता है। एक मधुर सुगंध मुझे घेर लेती है। और चारों और थिरता का कोहरा फैल जाता है। मन के परदे पर आते जाता विचारों का रेला...रुकता चलता रहता है। जब होश बढ़ता है तब विचार गायब हो जाते ह। मार्ग मीलों तक सूनसान। कोई मुसाफिर नहीं...ओर जैसे ही होश इधर उधर होता है। विचार अपनी दौड़ शुरू कर देते है। मार्ग कितना ही लंबा क्‍यों न हो...ओर एक हिसाब से होना भी चाहिए। ताकि मार्ग में चलने का आनंद मिल सके। वहां का सौंदर्य...वहां की सीतलता...वहां गीत...वहां सुगंध और सरसता में एक प्रकार की मादकता है। लगता ही नहीं हम चर रहे है। कोई अंजान सी शक्‍ति हमे बहाए लिए चली जा रही है। परन्‍तु एक बात है इसके बदले में हम कुछ मेहनत नहीं करनी पड़ रही है। जैसे संसार में हमेशा जीने के लिए जद्दो जहद मारा मारी करनी होती है। ये मार्ग कितना आराम दाई है सरल है। शायद ध्‍यान दुनियां का सबसे सरल क्रत्‍य है। और सबसे कठिन भी। क्‍योंकि सबसे सरल जिसके लिए कुछ भी नहीं करना होता। परन्‍तु हमारा मन तो कार्य को करने में विश्‍वास रखता है। इस लिए उसे न कुछ करना अति जटिल लगता है।
      नहीं करता मैं मंजिल का इंतजार....चलना ही इतना मधुर है। मार्ग ही इतना आनंद दाई है। फिर क्‍यों रूकने के बार में सोचें।

बस चलना ही है लक्ष्‍य मेरा
फिर तूफ़ानों से क्‍या डरना
कांटों की झोली भर ली जब
अब फूलों से भी क्‍या डरना
इस सुने अनंत पथ पर चल कर
पलकों से कांटों को चून कर
है झूल रहा अंब्‍बर नित दिन
आनंद की झोली है भर कर
वो नदिया हो या हो सरिता
फिर खोने से अब क्‍या डरना....
है राग वहीं और सुर भी वहीं
पर तान बदलनी पड़ती है
उस आंगन के वो थिर जो कदम
अब झूम-झूम इठलाते है
मन मार मगन हो जाता है
है मधुरस तान लगाते है
आलाप वही, है स्‍थाई वहीं
पर सूर खरज बन जाते है
उन गहरे जाती बंदिश के
गाने से भी अब क्‍या डरना....
स्‍वामी आनंद प्रसाद ‘’मनसा’’
(मार्ग की अनुभूति)