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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

माटी कहै कुम्हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन--01



माटी कहै कुम्हार सूं-(ओशो) 
(ध्‍यान-साधना) 
प्रवचन—पहला  

परमात्मा सरल है
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक आश्चर्यजनक दुर्भाग्य मनुष्य-जाति के ऊपर रोज-रोज अपनी काली छाया बढ़ाता गया है। अब तो शायद हमें उस दुर्भाग्य का कोई पता भी नहीं चलता है। जैसे कोई जन्म से ही बीमार पैदा हो तो उसे स्वास्थ्य का कभी कोई पता नहीं चलता। जैसे कोई जन्म से ही अंधा पैदा हो, तो जगत में कहीं प्रकाश भी है, इसका उसे कोई पता नहीं चलता। ऐसे ही हम एक अदभुत अनुभव से जन्म के साथ ही जैसे वंचित हो गए हैं। धीरे-धीरे मनुष्य-जाति को यह खयाल भी भूलता गया है कि वैसा कोई अनुभव है भी। उस अनुभव को इंगित करने वाले सब शब्द झूठे और थोथे मालूम पड़ने लगे हैं।

ईश्वर से ज्यादा आज कोई शब्द थोथा और व्यर्थ है? धर्म से ज्यादा थोथा और व्यर्थ आज कोई शब्द है? मंदिरों से ज्यादा अनावश्यक, प्रार्थनाओं से ज्यादा व्यर्थ आज कोई और भाव दशा है? मनुष्य के जीवन से सारा संबंध जैसे परमात्मा का समाप्त हो गया!
इस दुर्भाग्य के कारण मनुष्य किस भांति जी रहा है, किस चिंता में, दुख में, पीड़ा में, परेशानी में, उसका भी हमें कोई अनुभव नहीं हो रहा है। और जब भी यह बात उठती है कि ईश्वर से मनुष्य का संबंध क्यों टूट गया है? पशु-पक्षी ही ज्यादा आनंदित मालूम होते हैं। पौधों पर खिलने वाले फूल भी आदमी की आंखों से ज्यादा प्रफुल्लित मालूम होते हैं। आकाश में उगे हुए चांदत्तारे भी, समुद्र की लहरें भी, हवाओं के झोंके भी आदमी से ज्यादा आह्लादित मालूम होते हैं।
आदमी को क्या हो गया है? अकेला आदमी भर इस जगत में रुग्ण, बीमार मालूम पड़ता है। लेकिन अगर हम पूछें कि ऐसा क्यों हो गया है? ईश्वर से संबंध क्यों टूट गया है? तो जिन्हें हम धार्मिक कहते हैं, वे कहेंगे--नास्तिकों के कारण, वैज्ञानिकों के कारण, भौतिकवाद के कारण, पश्चिम की शिक्षा के कारण ईश्वर से मनुष्य का संबंध टूट गया है। ये बातें एकदम ही झूठी हैं।
किसी नास्तिक की कोई सामर्थ्य नहीं कि मनुष्य का संबंध परमात्मा से तोड़ सके। यह वैसा ही है--और किसी भौतिकवादी की यह सामर्थ्य नहीं कि मनुष्य के जीवन से अध्यात्म को अलग कर दे। किसी पश्चिम की कोई शक्ति नहीं कि उस दीये को बुझा सके, जिसे हम धर्म कहते हैं। यह वैसा ही है जैसे मेरे घर में अंधेरा हो और आप मुझसे पूछें आकर कि दीये का क्या हुआ? और मैं कहता हूं, दीया तो मैंने जलाया, लेकिन अंधेरा आ गया और उसने दीये को बुझा दिया! तो आप हंसेंगे और कहेंगे, अंधेरे की क्या शक्ति है कि प्रकाश को बुझा दे!
अंधेरा आज तक कभी किसी प्रकाश को नहीं बुझाया। मिट्टी के एक छोटे से दीये में भी उतनी ताकत है कि सारे जगत का अंधकार मिल कर भी उसे नहीं बुझा सकता।
हां, दीया बुझ जाता है तो अंधेरा जरूर आ जाता है। अंधेरे के आने से दीया नहीं बुझता; दीया बुझ जाता है, तो अंधेरा आ जाता है।
नास्तिकता के कारण धर्म का दीया नहीं बुझा; धर्म का दीया बुझ गया इसलिए नास्तिकता आ गई है। भौतिकवाद के कारण अध्यात्म नहीं बुझ गया है; अध्यात्म बुझा है, इसलिए भौतिकवाद है। फिर किसके कारण? क्योंकि जब कोई यह कहता है कि नास्तिकता, भौतिकवाद ये धर्म को मिटा रहे हैं, वह तो पता नहीं है उसे कि वह धर्म को कमजोर और नास्तिकता को मजबूत कह रहा है। उसे पता नहीं कि वह धर्म के पक्ष में नहीं बोल रहा है; वह धर्म के विपक्ष में बोल रहा है। वह यह स्वीकार कर रहा है कि अंधेरे की ताकतें ज्यादा बड़ी हैं, उजाले की ताकतों से। और अगर अंधेरे की ताकत बड़ी है और प्रकाश को बुझा सकती है, तो स्मरण रखना, फिर प्रकाश के जलने की दुनिया में कभी कोई संभावना नहीं है। क्योंकि अंधेरा हमेशा बुझा देगा; आप जलाइए और अंधेरा बुझा देगा।
अगर नास्तिकता धर्म को मिटा सकती है, तो धर्म के जन्म की अब कोई संभावना नहीं है। लेकिन मैं कहता हूं, यह बात ही गलत है। यह दलील ही गलत है, यह तर्क ही झूठा है। यह तर्क वैसा ही है जैसे भारत के लोग और तर्क भी देते हैं इसी सरणी में। भारत के लोगों से पूछें, हम अपने से पूछें--हम कमजोर क्यों हो गए? हम सारी जमीन पर दीनऱ्हीन क्यों हो गए? तो हम फौरन कहेंगे, मुसलमान आए, उन्होंने हमें हराया और कमजोर किया। अंग्रेज आए, उन्होंने हमें गुलाम बनाया और कमजोर किया। एक हजार साल की गुलामी की वजह से हम दीनऱ्हीन हो गए हैं।
यह तर्क भी उतना ही झूठा है। कोई गुलामी से कमजोर नहीं होता। जो कमजोर होता है, वह गुलाम जरूर हो जाता है। गुलामी से कोई कमजोर होता है? कमजोरी से जरूर गुलामी आ सकती है। गुलामी से कोई दीनऱ्हीन होता है? दीनऱ्हीन गुलाम हो सकता है। लेकिन इन दलीलों में होशियारी है, कनिंगनेस है, चालाकी है। इन दलीलों से हम अपने को बचा लेते हैं; जिम्मा दूसरे पर थोपते हैं।
दुनिया भर के धर्मगुरु और तथाकथित धार्मिक लोग जब भी नास्तिकों पर, अधार्मिकों पर, भौतिकवादियों पर यह जिम्मा थोप देते हैं कि तुम्हारे कारण जीवन नष्ट हो रहा है, प्रकाश बुझ रहा है, तब वे एक तरकीब काम में ला रहे हैं; वे आपकी नजरें इस बात से हटाना चाहते हैं कि उनके कारण, धार्मिकों के कारण, धर्मगुरुओं के कारण, धर्मपंथों के कारण, ईसाइयों के कारण, हिंदुओं के कारण, मुसलमानों, जैनों और बौद्धों के कारण धर्म का दीया बुझा है। इस तथ्य को झुठला देने के लिए दूसरों पर दोष दिए जाते हैं। और नास्तिकों का कहीं कोई संगठन नहीं है, जो विरोध करे। नास्तिकों का कोई शास्त्र नहीं, नास्तिकों का कहीं कोई मंदिर नहीं, जो विरोध करे। भौतिकवादियों का कहीं कोई संप्रदाय नहीं जो विरोध करे। तो यह बात चुपचाप स्वीकृत हो जाती है। एकतरफा गवाही पर बात मान ली जाती है!
मैं आपसे आज की पहली चर्चा में यह कहना चाहता हूं कि ईश्वर का संबंध मनुष्य से तोड़ लेने में जितना हाथ धर्मगुरुओं, धर्म-पुरोहितों, मंदिरों और मस्जिदों, हिंदू-मुसलमानों, ईसाइयों और जैनों का है, उतना किसी और का नहीं। और अगर इस पृथ्वी को फिर से प्रभु से जुड़ना है, तो कुछ चीजों से हाथ जोड़ लेने पड़ेंगे। संप्रदायों से हाथ जोड़ लेना पड़ेंगे, अगर धर्म का जन्म देखना चाहते हैं। और धर्मगुरु को विदा कर देना होगा, अगर प्रभु के दर्शन की तरफ आंखें उठाना चाहते हैं।
यह क्यों कहता हूं? यह मैं इसलिए कहता हूं कि जब भी कोई प्रेम का व्यवसाय करेगा।
प्रेम का व्यवसाय, पहली बात तो हो नहीं सकता है। प्रेम का कोई धंधा हो नहीं सकता। किसी दुकान पर प्रेम खरीदने से नहीं मिल सकता है। लेकिन अगर कोई प्रेम की दुकान खोल ले और प्रेम बेचता हो, तो आप समझ लेना कि धोखा दिया जा रहा है। और अगर उस दुकान पर खरीदे गए प्रेम को आप प्रेम समझ लें, तो यह भी समझ लेना कि जो प्रेम आपको उपलब्ध हो सकता था, कभी उपलब्ध नहीं होगा।
अगर प्रेम का व्यवसाय नहीं हो सकता तो प्रार्थना का व्यवसाय कैसे हो सकता है? प्रार्थना तो प्रेम का ही विराट रूप है। अगर प्रेम नहीं मिल सकता बाजार में और दुकानों पर, तो परमात्मा कैसे मिल सकता है?
लेकिन परमात्मा को बेचने वाली दुकानें हैं, जिनको हम धर्म कहते हैं। परमात्मा को बेचने वाली दुकानें हैं, जिनको हम मंदिर-मस्जिद, शिवालय और गुरुद्वारे कहते हैं। परमात्मा को बेचने वाले दुकानदार हैं, जिनको हम धर्मगुरु, पुरोहित, पादरी और ये सब देते हैं। इन सारे लोगों ने आदमी और प्रभु के बीच एक दीवाल खड़ी कर दी है, जिससे प्रभु से मिलन कठिन हो गया है।
ये दीवालें इन्होंने कैसे खड़ी कर दी हैं? यह दीवाल बहुत होशियारी से खड़ी की गई है। इस दीवाल की पहली ईंट तो यह है कि दुनिया के सारे धर्मगुरु एक बात चिल्ला-चिल्ला कर थके नहीं हैं कि परमात्मा को पाना बहुत कठिन है। सारी दुनिया में तीन हजार वर्ष से यह प्रचार किया जा रहा है कि परमात्मा को पाना अति दुर्लभ है, बहुत कठिन है। क्या आपको पता है कि इस बात ने ही आदमी और परमात्मा के बीच सबसे मजबूत पत्थर रख दिया है।
नहीं शायद आपके खयाल में न हो। जिस बात को हजारों साल तक दोहराया जाए कि कठिन है, वह इसी कारण कठिन हो जाती है। कठिनाई का प्रचार मनुष्य के मन को पकड़ लेता है और उसे लगने लगता है कि मैं कैसे पा सकूंगा इतनी कठिन बात। यह मेरी सामर्थ्य के बाहर है, यह मेरी शक्ति के बाहर है, यह मेरी सीमा के बाहर है। मैं एक छोटा सा मनुष्य हूं, मैं कैसे पा सकूंगा। और जिसे हम पा ही नहीं सकते जन्मों-जन्मों की कोशिश के बाद भी, उसे अगर हमने पाने का प्रयास छोड़ दिया हो, तो कोई गलती की है!
एक मनोवैज्ञानिक रूस में एक छोटा सा प्रयोग कर रहा था। वह इस बात का पता लगाना चाहता था कि क्या कोई बात कठिन और कठिन और कठिन दोहराए जाने से कठिन हो जाती है? विश्वविद्यालय की एक गणित की कक्षा--तीस विद्यार्थियों पर उसने एक प्रयोग किया। पंद्रह विद्यार्थियों को एक कमरे में ले गया, पंद्रह को दूसरे कमरे में ले गया। एक ही कक्षा के विद्यार्थी, एक ही बुद्धि के, एक ही बुद्धिमत्ता के। पहले पंद्रह विद्यार्थियों के सामने उसने तख्ते पर उसने गणित का एक सवाल लिखा और लिख कर कहा कि यह सवाल मैं आशा नहीं करता हूं कि तुममें से कोई भी हल कर सकेगा। यह बहुत कठिन है। यह इतना कठिन है कि जमीन पर मुश्किल से दस-पांच गणितज्ञ हैं, जो इसे हल कर सकते हैं। तुम्हारी कोई सामर्थ्य नहीं। लेकिन तुम पूछोगे कि फिर तुम्हें हल करने को दिया क्यों जा रहा है? यह इसलिए दिया जा रहा है कि हम इस बात का पता लगाना चाहते हैं कि क्या विश्वविद्यालय के इस कक्षा के वर्ग के विद्यार्थी इस सवाल को हल करने की दिशा में एकाध-दो कदम भी ठीक उठा सकते हैं या नहीं। पूरे सवाल के ठीक होने की तो कोई संभावना ही नहीं। लेकिन अगर एकाध-दो कदम भी तुम ठीक उठा लो, ठीक दिशा में, तो भी बड़े गौरव की बात होगी। देखो, कोशिश करो, शायद एकाध व्यक्ति ठीक दिशा में एकाध-दो कदम उठा सके। सवाल बहुत कठिन है। आशा कोई भी नहीं है। तुमसे बड़ी कक्षा के विद्यार्थी भी असफल हो गए हैं, लेकिन शायद!
उन विद्यार्थियों ने जब यह बात सुनी, तो उनके हाथ ढीले पड़ गए। उनके प्राणों में जो ऊर्जा उठती सवाल को हल करने के लिए, वह सो गई। जो शक्ति जगती और चुनौती को स्वीकार करती, उसने पहले ही स्वीकार कर लिया कि हल नहीं हो सकता है। जो बात हल नहीं हो सकती, फिर प्राण उससे संघर्ष लेना बंद कर देते हैं।
वे सवाल को मुर्दा, उदास, सुस्त हाथों से हल करने लग गए। पहले ही निश्चय है कि सवाल हल नहीं हो सकता। पहले से ही परिणाम जाहिर है कि असफलता होनी है।
और जब पहले ही असफलता पता हो, तो क्या सफलता की दिशा में आपके कदमों में प्राण हो सकते हैं, गति हो सकती है, शक्ति हो सकती है? वे सवाल को हल करने में लग गए हैं, जानते हुए कि सवाल हल नहीं होगा।
और वह मनोवैज्ञानिक दूसरे पंद्रह विद्यार्थियों के पास गया। तख्ते पर उसने वही सवाल लिख दिया है और उन विद्यार्थियों से कहा कि यह सवाल बहुत सरल है। यह इतना सरल है कि तुमसे नीचे की कक्षाओं के विद्यार्थी इसे पूरा का पूरा हल कर लिए हैं। लेकिन तुम पूछोगे कि फिर हमें यह सवाल क्यों दिया जा रहा है, जब इतना सरल है? उसने कहा कि मैं कोई शोधकार्य कर रहा हूं और पता लगाना चाहता हूं कि क्या इस ऊंची कक्षा में एकाध भी ऐसा विद्यार्थी आ गया है, जो इस सवाल को हल न कर सके? हम उस विद्यार्थी का पता लगा रहे हैं कि क्या हमारी परीक्षाओं को पार करके ऐसे विद्यार्थी भी आ जाते हैं, जो इतना सरल सवाल हल न कर सकें? कोई भी नहीं असफल होगा। तुमसे नीची कक्षाओं के विद्यार्थी सफल हो गए हैं। पूरा सवाल हल कर लिया है। सवाल बहुत सरल है।
वे पंद्रह विद्यार्थी भी सवाल हल करने में लग गए हैं। लेकिन उनकी हालत बहुत जुदा और भिन्न है। वे जानते हैं कि सवाल हल होगा। वे जानते हैं कि सवाल हल होना ही है। वे जानते हैं कि नीचे की कक्षाओं में सवाल हल हो गया, तो क्या हम हार जाएंगे! इतना सरल सवाल है। उनके प्राण की ऊर्जा जग गई है और वे प्रफुल्लता से, आनंद से सवाल हल करने में लग गए। सवाल वही है। और घंटे भर बाद जब उनका सवाल पूरा हो चुका, तो पहली कक्षा में, जहां कहा गया था, सवाल कठिन है, केवल तीन विद्यार्थी सवाल हल कर पाए, बारह विद्यार्थी असफल हो गए। और दूसरी कक्षा में एक विद्यार्थी असफल हुआ, चौदह विद्यार्थी सफल हो गए।
सवाल वही था, विद्यार्थी एक ही वर्ग के थे। क्या हो गया? एक भावदशा निर्मित हो गई कि कठिन है। एक भावदशा निर्मित हो गई कि सरल है। और जिस भावदशा को लेकर हम पहला कदम रखते हैं, उसी भावदशा पर अंतिम कदम पूरा हो जाता है।
पांच हजार वर्षों का इतिहास ईश्वर को कठिन, कठिन, कठिन दोहरा रहा है। फिर बात इतनी कठिन हो गई कि मनुष्य ने उस दिशा में देखना भी बंद कर दिया है। जो हमारे सामर्थ्य के बाहर है। वह हमारी आकांक्षा नहीं बन सकता है। जो हमारी शक्ति के बाहर है, हमारी अभीप्सा नहीं बन सकता। ठीक है कि कभी मंदिर में हम फूल चढ़ा दें; ठीक है कि कभी किसी व्रत-त्यौहार पर उसका स्मरण कर लें। लेकिन हमारी सामर्थ्य के बाहर है, हमसे बहुत दूर है।
जापान में कोई तीन सौ वर्ष पहले एक छोटे से राज्य पर पड़ोस के बड़े राजा ने हमला बोल दिया। राजा बड़ा है हमलावर। आक्रामक बहुत शक्तिशाली है। कोई दस गुनी ताकत है उसके पास, और राज्य छोटा है जिस पर हमला हुआ है, बहुत गरीब है। न सैनिक हैं, न युद्ध का सामान है, न सामग्री है। सेनापति घबड़ा कर राजा से बोला है कि मेरी सामर्थ्य के बाहर है कि मैं युद्ध पर जाऊं। कैसे जाऊं, यह जानते हुए कि अपने सैनिकों की हत्या करवानी है। और हार निश्चित है। मैं इनकार करता हूं, मुझे क्षमा कर दें। मैं इस युद्ध में नहीं जा सकूंगा। कोई मौका ही नहीं है जीतने का। दस गुने सिपाही हैं इसकी तरफ। दस गुनी युद्ध की सामग्री है। आधुनिक उपाय हैं और हमारे पास कुछ भी नहीं। हार निश्चित है, इसलिए हार ही जाना उचित है। व्यर्थ लोगों को कटवाने से क्या प्रयोजन?
राजा भी डर रहा है। वह भी जानता है कि बात सच है। सेनापति को कायर कहना उचित नहीं है। उसने और युद्ध लड़े हैं। आज पहली दफा वह इनकार कर रहा है और इनकार करने में कायरता नहीं काम कर रही है; सीधी बात है। साफ गणित जैसी बात है; दो और दो चार जैसी बात है। हार निश्चित है। लेकिन राजा का मन नहीं मानता कि बिना हारे और हार जाएं। वह रात भर बेचैन रहा है। सुबह उसने अपने वजीर को पूछा है, क्या करना है, दुश्मन रोज आगे बढ़ आते हैं?
उस वजीर ने कहा कि मैं एक फकीर को जानता हूं। जब भी मेरे जीवन में कोई उलझन आई है, उसी के पास गया हूं। आज तक बिना सुझाव के वापस नहीं लौटा। सुबह है, आप चले चलें। पूछ लें उससे।
वे फकीर के दरवाजे पर पहुंच गए हैं। सेनापति भी साथ है। फकीर हंसने लगा। उसने कहा कि छोड़ो, इस सेनापति को छोड़ो। क्योंकि जो जाने के पहले कहता है कि हार जाना निश्चित है, उसके जीत की तो कोई संभावना नहीं रह गई। मैं चला जाता हूं सेनापति की जगह सेनाओं को लेकर।
राजा और भी डरा। सेनापति अनुभवी है। अनेक युद्धों में लड़ा और जीता है। यह फकीर, जो तलवार पकड़ना भी नहीं जानता है! लेकिन फकीर ने कहा, बेफिक्र रहो, आठ-दस दिन के भीतर हम जीत कर वापस लौट आएंगे। फकीर सेनाओं को लेकर रवाना हो पड़ा। सेनाएं घबड़ा रही हैं, उनके हाथ-पैर कंप रहे हैं सैनिकों के। जब सेनापति इनकार कर दिया, तो एक अजनबी, अनुभवी नहीं है जो, ऐसा फकीर!
लेकिन फकीर गीत गाते हुए चला जा रहा है। फिर वे उस नदी के पास पहुंच गए जिसके उस तरफ दुश्मन का डेरा था। फकीर ने सैनिकों को एक मंदिर के पास रोका और कहा कि रुको। दो क्षण को जरा मैं जाकर मंदिर के देवता से पूछ लूं कि हम जीतेंगे या हारेंगे? मेरी हमेशा की यह आदत रही है। जब भी मुश्किल में पड़ा हूं, इसी मंदिर के देवता से पूछ लेता हूं!
सैनिकों ने कहा, लेकिन देवता--कैसे कहेगा--हम कैसे समझेंगे कि क्या कहा देवता ने? उसने कहा, रास्ता है। मंदिर को घेर कर सैनिक खड़े हो गए हैं। उस फकीर ने अपने खीसे से एक सोने का चमकता हुआ सिक्का निकाला। और कहा कि हे प्रभु! अगर हम जीत कर लौटते हों, तो सिक्का सीधा गिरे। अगर हम हार कर लौटते हों, तो सिक्का उलटा गिरे।
सिक्के को ऊपर फेंका है, हवा में, आकाश में। सूरज की रोशनी में सोने का सिक्का चमक रहा है और सारे सैनिकों के प्राण अवरुद्ध हो गए हैं, श्वास बंद हो गई अब। ठगे हुए देख रहे हैं कि क्या होता है! रुपया नीचे गिरा है। सिक्का सीधा गिरा है। फकीर ने कहा कि देख लो! जीत निश्चित है। सिक्का खीसे में रख लिया है और सैनिक एक नये उत्साह से, एक नये जीवन से युद्ध में कूद पड़े हैं। दस दिन बाद वे जीत कर वापस लौट रहे हैं।
मंदिर के पास आकर सैनिकों ने उस फकीर को कहा कि शायद आप भूल गए! मंदिर के देवता को धन्यवाद तो दे लें! वह फकीर हंसने लगा। उसने कहा, रहने दो। कोई खास जरूरत नहीं है। पर सैनिकों ने कहा, कैसी आप बात करते हैं! कम से कम अनुग्रह तो मान लें! जिसने जीत का संदेश दिया...! उस फकीर ने कहा कि छोड़ो, उस देवता का इसमें कोई संबंध नहीं। धन्यवाद देना हो तो मुझे दे दो। उन सैनिकों ने कहा, तुम्हें! उस फकीर ने खीसे से सिक्का निकाला और कहा, इस सिक्के को देखो। वह दोनों तरफ सीधा था। वह सिक्का उलटा था ही नहीं। उसमें दोनों तरफ ही सीधा था। उस फकीर ने कहा, धन्यवाद देना हो, तो मुझे दे दो। देवता का इसमें कोई हाथ नहीं है।
कैसे जीत कर लौट आए वे सिपाही? क्या हो गया उनके प्राणों को? क्या आप सोचते हैं कि इस फकीर के बिना भी वे जीत कर लौट सकते थे? क्या आप सोचते हैं, अपने सेनापति के साथ वे जीत कर लौट सकते थे? क्या आप सोचते हैं कि एक सिक्के के बिना वे जीत कर लौट सकते थे? क्या आप सोचते हैं कि बिना एक आशा के और इस विश्वास के कि जीत निश्चित है, जीत हो सकती थी?
लेकिन ईश्वर के संबंध में यही हो गया है। उस फकीर का सिक्का दोनों तरफ सीधा था, हमारा सिक्का दोनों तरफ उलटा हो गया है। फेंकते हैं, हमेशा हार! दोनों तरफ उलटा है। और मैं आपसे कहता हूं कि यह दोनों तरफ जो उलटा सिक्का है, यह धर्मगुरुओं ने निर्मित किया है। क्यों? आप कहेंगे, धर्मगुरुओं का इसमें क्या प्रयोजन हो सकता है? उन्हें क्या हित? उन्हें क्या लाभ हो सकता है कि आदमी और ईश्वर में दूरी हो जाए?
अगर आपको थोड़े भी व्यवसाय के नियम याद हैं, तो आपको समझ में आ जाएगा। अगर परमात्मा, आदमी को पाना बहुत सरल है, तो धर्मगुरु की कोई भी जरूरत बीच में नहीं रह जाती। अगर परमात्मा को पाना अति सरल है, तो बीच के दलाल की कोई गुंजाइश, कोई जरूरत नहीं रह जाती। परमात्मा को पाना जितना कठिन है, उतना ही बीच का मीडिएटर, बीच का एजेंट, बीच का दलाल, बीच का व्यवसायी उपयोगी और जरूरी हो जाता है। परमात्मा को पाना कठिन है, तो फिर बीच में गुरु जरूरी है। क्योंकि उस कठिन को पाने के लिए गुरु के बिना ज्ञान कौन बताएगा, रास्ता कौन बताएगा? जो कठिन है, उसको पाने का रास्ता भी दुर्गम है, पहाड़ पर चढ़ने जैसा है, तलवार की धार पर चलने जैसा है। तो उसे बताने के लिए कोई चाहिए रास्ता, कोई हाथ पकड़ कर ले जाने के लिए चाहिए।
ईश्वर को कठिन बता कर धर्मगुरु ने अपनी जरूरत निश्चित कर ली है। और ईश्वर जितना कठिन होता गया, धर्मगुरु का व्यवसाय उतना ही फैलता चला गया, बड़ा होता चला गया।
आज जमीन पर करोड़-करोड़ धर्मगुरु आदमी के इसी शोषण पर जी रहे हैं। सिर्फ कैथोलिक पुरोहितों की संख्या बारह लाख है। और दुनिया में तीन सौ धर्म हैं। ये एक धर्म के पुरोहित हैं, बारह लाख! दुनिया में तीन सौ धर्म हैं, तीन सौ पंथ हैं। इन सबके अपने गुरु हैं, अपने संन्यासी हैं, अपने पुरोहित हैं, अपने पंडित हैं और वे सब एक बात पर जीते हैं कि भगवान से मिलाने की तरकीब आपके लिए बताते हैं। हालांकि इन करोड़-करोड़ धर्मगुरुओं के कारण मनुष्य-जाति परमात्मा से जुड़ नहीं पा रही है।
कठिन बताने में हित है। फिर जो चीज जितनी कठिन है, उसकी कीमत उतनी बढ़ जाती है। बाजार में जो चीज मिलनी मुश्किल हो जाए, उसकी कीमत बढ़ जाती है। जो चीज मिलनी सरल हो जाए, उसकी कीमत घट जाती है। जो चीज बिलकुल सुलभ मिलती है, हम खयाल ही भूल जाते हैं कि किसी कीमत की है। हवा की कोई कीमत है? हमें खयाल ही नहीं। पानी की कोई कीमत हमें खयाल ही नहीं, लेकिन रेगिस्तान में, मरुस्थल में पानी की कीमत मालूम पड़ने लगती है। और चांद पर जब यात्री यात्रा करेंगे, तब हवा की कीमत मालूम पड़ेगी।
जो चीज जितनी सरल और सहज उपलब्ध होती है, उसकी फिर कोई कीमत नहीं रह जाती है, उसका व्यवसाय नहीं किया जा सकता है। धर्मगुरु व्यवसाय कर रहा है ईश्वर का, बेच रहा है ईश्वर को। स्वाभाविक, सीधे, इकोनॉमिक्स के, अर्थशास्त्र के सीधे नियम हैं कि ईश्वर कठिन है, न्यून, बहुत मुश्किल हो। इतना मुश्किल हो, तो उसके उतने दाम हो जाते हैं।
एक राजा एक रात भटक गया है, एक जंगल में। सुबह ही सुबह एक गांव में पहुंचा है, थका-मांदा रात भर, एक झोपड़े के सामने रुका है। और उसने कहा कि मुझे बहुत भूख लगी है, कुछ मिल जाए। झोपड़े में कुछ भी नहीं है, कोई दोत्तीन अंडे पड़े हैं। झोपड़े के मालिक ने वे दे दिए हैं। राजा ने नाश्ता कर लिया है। फिर उसे कहा, धन्यवाद। कितने पैसे हुए? उस बूढ़े ने कहा, ज्यादा नहीं, सिर्फ सौ रुपये। राजा ने कहा, सौ रुपये! दोत्तीन अंडों के! मैंने बहुत कीमती चीजें खरीदी हैं। आज तक मेरी कल्पना भी में नहीं था कि अंडे इतने मंहगे हो सकते हैं। आर एग्स सो रेयर हियर? क्या इधर बहुत मुश्किल है अंडे का मिलना? इतना मुश्किल? वह बूढ़ा हंसने लगा। उसने कहा कि नहीं। एग्स आर नाट रेयर सर, बट किंग्स आर। इधर अंडे तो रोज मिलते हैं बहुत मिलते हैं लेकिन राजा बहुत मुश्किल से मिलते हैं। उस राजा ने सौ रुपये दे दिए।
न्यूनता किसी भी चीज की उसके कीमत का मापदंड बन जाती है। ईश्वर बहुत मुश्किल है! बहुत मुश्किल है। कभी-कभी किसी को उपलब्ध होता है। सब तो उससे वंचित रह जाते हैं, तो फिर उसका मूल्य लिया जा सकता है। यूरोप में, मध्य युग में ईसाई पोप लोगों से लाखों रुपये लेता रहा है स्वर्ग पहुंचाने के। चिट्ठी लिख कर देता रहा ईश्वर के नाम। कब्र में चिट्ठी रख दी जाती थी। पता नहीं, वह चिट्ठी कभी पहुंची कि नहीं और उसका क्या हुआ! न आदमी लौटता है। लेकिन वे कब्रें खोदी जाएं, तो वे चिट्ठियां अभी भी उन कब्रों में रखी हुई मिल जाएंगी। पोप ज्यादा होशियार है, लाख रुपये लेता है। इधर हमारे गांव के ब्राह्मण-पंडित उतने होशियार नहीं। एक मरी सी गाय लेकर भी निपटारा कर देते हैं! लेकिन नीयत वही है। बेचा जा रहा है स्वर्ग, बेचा जा रहा है मोक्ष, बेचा जा रहा है धर्म, बेचा जा रहा है परमात्मा!
तो इसका कठिन होना बहुत जरूरी है। इसलिए तीन-चार हजार वर्षों से उसकी कठिनाई की रट लगाई जा रही है। और उसका परिणाम यह हुआ है कि आदमी ने इतने दिनों में स्वीकार कर लिया है कि कठिन है। इस कठिनाई के निश्चित हो जाने के दो घातक परिणाम हुए। पहला घातक परिणाम तो यह हुआ कि सीधे और सरल लोगों ने उस तरफ जाना बंद कर दिया। विनम्र लोगों ने उस तरफ आंख उठानी बंद कर दी। उन्होंने मान लिया कि यह हमारी क्षमता नहीं है। यह हमारी पात्रता नहीं है।
विनम्र और सीधे-सादे लोग ही पात्र हैं प्रभु को पाने के। लेकिन इस गलत शिक्षण का परिणाम यह हुआ है कि विनम्र और सीधे-सादे लोगों ने उस तरफ आंख उठानी बंद कर दी। और दूसरा घातक परिणाम यह हुआ कि ईगोइस्ट और अहंकारी लोगों ने उस तरफ यात्रा करनी शुरू कर दी।
अहंकार का एक ही आनंद है कि जो कठिन है, उसको पाया जाए। एवरेस्ट पर चढ़ा जाए! ऐसा जूनागढ़ की पहाड़ी पर चढ़ने में क्या रखा हुआ है! गौरीशंकर पर चढ़ना है। क्यों, क्या काम है गौरीशंकर पर? क्या जरूरत है चढ़ने की गौरीशंकर पर आपको? नहीं, लेकिन मैं पहला आदमी हूं। हिलेरी मैं हूं, तेनसिंग मैं हूं। मैं वहां झंडा गाड़ता हूं। मेरे कदम पहली बार वहां पड़ते हैं, जहां किसी मनुष्य के कभी नहीं पड़े!
तो आदमी में जो अहंकारी है सबसे ज्यादा, वह कठिन की तलाश में रहता है कि जो कठिन हो, वह मैं करूं। सरल की अपील उसके मन पर नहीं होती। तो दुनिया भर के अहंकारी ईश्वर को पाने की दिशा में लग जाते हैं। यही तो वजह है कि संन्यासियों से ज्यादा अहंकारी आदमी पाना कठिन है, मुश्किल है। राजनीतिज्ञ में भी विनम्रता हो सकती है, लेकिन संन्यासी में असंभव है।
क्यों? कोई संन्यास की भूल है? नहीं। लेकिन अहंकारी उत्सुक होते हैं, परमात्मा कठिन है इसलिए उसको पाने के लिए। उनका अहंकार बिना परमात्मा को मुट्ठी में लिए नहीं मानने को राजी है। धन से उनकी तृप्ति नहीं हो सकती। दिल्ली के पद से उनकी तृप्ति नहीं हो सकती। उन्हें अगर कोई चीज तृप्ति दे सकती है, तो वह यह कि परमात्मा भी उनकी मुट्ठी में हो तो।
यह जो अहंकार की अंतिम प्यास है, ईश्वर कठिन है, तो अहंकार उस तरफ दौड़ने लगा। और आश्चर्य यह है कि अहंकार और परमात्मा का मिलन कभी भी नहीं हो सकता है। विनम्रता तो परमात्मा को पा सकती है, अहंकार कभी भी नहीं। लेकिन विनम्र तो थक गए और हार गए और चुप हो गए, और अहंकारी त्वरित वेग से परमात्मा की तरफ, अपने आप अहंकार के घोड़ों पर सवार होकर दौड़ने लगे। तो दुनिया में एक दुर्घटना घट गई कि अहंकारी धार्मिक हुए चले जा रहे हैं और विनम्र और सीधे-सादे लोग चुपचाप मंदिरों के बाहर खड़े हैं। उन्होंने आशा छोड़ दी। और जिन्हें नहीं मिल सकता, वे उस दिशा में अग्रसर हो गए हैं।
धर्म की हत्या का मूल कारण, ईश्वर की कठिनाई का उपदेश है। यह पहला सूत्र मैं आज आपसे कहना चाहता हूं। और अगर आपके जीवन में कभी भी ईश्वर को आने देना हो, तो इस बात को बहुत ठीक से अपने मन में बिठा लेना कि ईश्वर को पाने से ज्यादा सरल और कोई बात नहीं है। ईश्वर अत्यधिक सरल है, सरलतम है, अंतिम रूप से सरल है। उससे ज्यादा सरल और कोई बात नहीं है। क्यों? क्यों मैं कह रहा हूं कि ईश्वर को पाने से ज्यादा सरल कोई बात नहीं है?
इसलिए मैं कह रहा हूं--मछली अगर पूछने लगे कि सागर कहां है? मैं उसे पाना चाहती हूं। तो हम मछली से क्या कहेंगे?
हम कहेंगे, सागर कहां है, यह पूछने का सवाल नहीं। तुम हो, और तुम बिना सागर के नहीं हो सकती हो। तुम्हारा होना हमेशा सागर में होना है। तुम जहां हो, वहीं सागर है। तुम सागर से निर्मित होती हो। सागर ही तुम हो और सागर में ही विलीन हो जाती हो।
मछली के लिए सागर जितना सरल है, मनुष्य के लिए परमात्मा भी उतना ही सरल है। क्योंकि परमात्मा का क्या अर्थ होता है? परमात्मा का अर्थ होता है--जीवन धारा। परमात्मा का अर्थ होता है, वह जो जीवंत, जो प्राण, जो चेतना, वह जो सबमें व्याप्त है--वही। तो उसके बिना तो हम एक क्षण नहीं हो सकते। हम परमात्मा में ही जीते हैं, उसी के सागर में लहर की तरह पैदा होते और विलीन हो जाते हैं। तो जिससे हम निर्मित होते हैं, जिसमें हम जीते हैं, जिसमें हम मिटते हैं, उसे पाना कठिन हो सकता है? उसे खोना कठिन हो सकता है, पाना कैसे कठिन हो सकता है?
मछली सागर को खोना चाहे, तो कठिनाई शुरू होगी। मछली सागर को खोना चाहे, तो कठिनाई शुरू होगी। पाने के लिए कौन सी कठिनाई है? पाया ही हुआ है।
मैं आपसे कहना चाहता हूं: ईश्वर को खोना कठिन है, पाना नहीं। और हम जो इतनी कठिनाई में पड़ गई है सारी मनुष्य-जाति, वह इसलिए कि हम ईश्वर को खोने की कोशिश कर रहे हैं। यह जो मनुष्य इतना उजड़ा, विजड़ित, इतना विपन्न, इतना हीन, इतना चिंतित, इतना दुख भरा दिखाई पड़ता है, यह किसलिए? यह इसलिए कि हम ईश्वर को खोने की कोशिश कर रहे हैं।
मछली सागर को खोने की कोशिश कर रही है, सागर से दूर हटने की कोशिश कर रही है, तो विपन्न होती जा रही है। उसके प्राण तड़फड़ा रहे हैं, वह तड़प रही है किनारे पर, धूप में उसके प्राण कंप रहे हैं, वह मरने के करीब खड़ी हो गई है।
आदमी भी करीब-करीब उस हालत में है। यह ईश्वर को खोने की कठिनाई है, जो हम भोग रहे हैं। लेकिन ईश्वर को पाना तो बहुत ही सरल है। इसलिए सरल है कि हम उसे पाए ही हुए हैं। उसे हमने एक क्षण को खोया नहीं, हम एक क्षण को उससे अलग नहीं हुए हैं। हम एक क्षण को भी उसके बिना जी नहीं सकते, श्वास नहीं ले सकते। लेकिन कल्पना में और विचार में हम उससे अलग हो गए हैं, खयाल में हम उससे अलग हो गए हैं। वैसे ही जैसे एक आदमी आज जूनागढ़ में सो जाए रात। और रात सपना देखे कि जूनागढ़ में नहीं है, कलकत्ते में है। देख सकता है सपना कलकत्ते में होने का। हालांकि सपना देखने से कलकत्ता पहुंच नहीं जाता। लेकिन सपना देख सकता है कि कलकत्ते में है। सुबह उठ कर पूछने लगे कि मैं कलकत्ते से वापस कैसे आया? तो लोग हंसेंगे, कहेंगे कि तुम यहीं सोए रहे हो रात भर, कलकत्ते तुम गए ही नहीं। लेकिन वह कहेगा, मैं कलकत्ते में था! मौजूद था कलकत्ते में! मैं लौटा कैसे?
जिस दिन आदमी ईश्वर को वापस उपलब्ध करता है ऐसी ही हंसी आती है उसे, कि जिसे कभी खोया नहीं था, उसको खोया कैसे था! जिससे कभी दूर नहीं गए थे, उससे दूर कैसे चले गए थे! कल्पना में, सपने में, सोने में, नींद में। आदमी मूलतः ईश्वर से एक क्षण को दूर नहीं हो सकता। क्योंकि जिससे दूर हुआ जा सकता है, वह ईश्वर ही न रहा। उससे हम दूर हो सकते हैं, जो हमारे प्राणों से अलग हो, भिन्न हो, पृथक हो। आप अपने घर को छोड़ कर भाग सकते हैं, पत्नी को छोड़ कर भाग सकते हैं, बच्चों को छोड़ कर भाग सकते हैं, गांव को छोड़ कर भाग सकते हैं, अपने को छोड़ कर कैसे भाग सकते हैं? और कहां भागेंगे? जहां जाएंगे, पाएंगे कि साथ मौजूद हो गए हैं। अपने को छोड़ कर कोई भी नहीं भाग सकता।
परमात्मा हमारा स्वभाव है। उसे छोड़ कर हम नहीं भाग सकते। छोड़ने की कोशिश कठिनाई पैदा कर देती है।
तो मैं आपसे कहना चाहता हूं: ईश्वर सरल है। अत्यंत सरल है। खोना कठिन है उसे, पाना बिलकुल सरल है। यह पहला सूत्र। जिस हृदय में गहराई से बैठ जाता है कि ईश्वर को पाना सरल है, उसकी आधी मंजिल पूरी हो गई बिना चले। उसकी आधी मंजिल पूरी हो गई बिना चले। आधी यात्रा हो गई। प्राण उसके तैयार हो गए यात्रा पर जाने के लिए। उसके चित्त ने तैयारी कर ली। यात्रा तो बहुत सरल है। एक बार हृदय की पूरी तैयारी चाहिए।
तो इन तीन दिनों में उस हृदय की पूरी तैयारी के संबंध में मुझे जो सूत्र आपसे कहने हैं, पहला सूत्र यह कि प्रभु को पाना अत्यंत सरल है, उससे ज्यादा सरल और कुछ भी नहीं है। जैसे बीज के लिए सबसे सरल बात क्या है? बीज के लिए सबसे सरल बात क्या है?
बीज के लिए सबसे सरल बात यह है कि वह अंकुर बन जाए। इससे ज्यादा सरल बात और कोई भी नहीं है। बीज के लिए कठिनाई होती होगी, तो यही होती होगी कि अगर वह बीज ही रह जाए और उसमें अंकुर न फूट सकें और पत्तियां न निकल सकें और फूल न निकल सकें। यह बीज की कठिनाई होगी कि बीज न टूट पाए, न बन पाए पौधा, जो बनने को पैदा हुआ था।
आदमी के लिए सबसे सरल क्या है? यही कि वह प्रभु हो जाए। वह उसके भीतर छिपी हुई संभावना है, उसका बीज है। आदमी एक बीज है और परमात्मा उसका प्रगट रूप है। जो उसमें छिपा है, वह प्रगट हो जाए, फूल बन जाए, अंकुर निकल आए, पौधा बड़ा हो जाए। लेकिन हम सब बीज ही रह जाते हैं, इसलिए हमारा जीवन एक कठिनाई है।
मैं आपसे कहना चाहता हूं कि बहुत सरल है। आप कहेंगे, इतना कह लेने से मान लेने से भी कुछ सरल नहीं हो जा रहा है। कुछ भी सरल नहीं हो जा रहा है! नहीं, सरल हो जाता है। इस भूमिका पर फिर आगे कुछ काम किया जा सकता है। इस भूमिका पर आगे फिर कदम रखे जा सकते हैं। इसलिए इस पहली चर्चा में इस भूमिका के संबंध में ही आपसे कह रहा हूं। अब तक उसकी कठिनाई को बढ़ाने के लिए बहुत-बहुत प्रकार के रास्ते अपनाए गए हैं।
एक रास्ता यह अपनाया गया है कि उसे पाना हो, उसे पाना हो तो किसी संगठन के हिस्से होना चाहिए, किसी संप्रदाय का सदस्य होना चाहिए। किसी भीड़ के साथ खड़े होना चाहिए--चाहे वह हिंदुओं की भीड़ हो, चाहे मुसलमानों की, चाहे ईसाइयों की, चाहे जैनों की। एक-एक आदमी को किसी भीड़ के साथ खड़ा होना चाहिए, तब वह प्रभु को पा सकता है!
यह बात बिलकुल झूठ और असत्य है। भीड़ से प्रभु का क्या संबंध है? प्रभु से संबंध हमेशा व्यक्ति का होता है, अकेली निजता में होता है। अकेलेपन में होता है, एकांत में होता है। भीड़ से क्या लेना-देना है? भीड़ कभी प्रभु के साक्षात को उपलब्ध हुई है? प्रभु का साक्षात भी कोई युद्ध तो नहीं है कि वहां सेना बना कर पहुंच जाएं, भीड़ लेकर पहुंच जाएं। वहां तो अकेले आदमी को जाना पड़ता है, अकेले को लेकर। क्राइस्ट को कब मिलता है परमात्मा? अकेले में, एकांत में। मुहम्मद को कब मिलता है? अकेले में, एकांत में। महावीर को कब मिलता है? अकेले में, एकांत में। बुद्ध को कब मिलता है? अकेले में, एकांत में। आज तक कभी भीड़ ने परमात्मा का साक्षात्कार किया है? आज तक दुनिया की कोई भी भीड़ कभी परमात्मा के सामने उपस्थित हो सकी है? उसके सामने तो एनकाउंटर जो है, साक्षात्कार जो है वह हमेशा व्यक्तिगत है, एक व्यक्ति का सीधा।
लेकिन हमें यह सिखाया गया है कि बिना हिंदू हुए कोई धार्मिक नहीं हो सकता। बिना मुसलमान हुए कोई धार्मिक नहीं हो सकता। और मैं आपको कहता हूं, जब तक कोई हिंदू है, जब तक कोई मुसलमान है, तब तक उसके धार्मिक होने की कोई संभावना नहीं है। यही तो वजह है कि धर्मों के नाम पर इतना अधर्म हो सका।
आपको पता है, अधार्मिक लोगों ने किन मंदिरों को जलाया है? किन मस्जिदों में आग लगाई है? अधार्मिक लोगों ने किन बच्चों की हत्याएं कीं और किन स्त्रियों की इज्जत लूटी? अधार्मिक लोगों ने क्या किया है उन पर? अगर किसी दिन अधार्मिक लोगों के सब पाप इकट्ठे किए गए और तथाकथित धार्मिकों के, तो आप दंग रह जाएंगे। धार्मिकों के पल्ले पाप का इतना बड़ा पलड़ा भारी है कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते!
यह कैसे हो सका? धार्मिक आदमी आग कैसे लगा सका, हत्या कैसे कर सका, खून कैसे कर सका? वह धार्मिक ही नहीं था। धर्म के नाम पर एक गलत बात ही उसे सिखाई गई। असली धर्म--जो मैं कह रहा हूं, प्रभु की सरलता का धर्म--व्यक्ति को अकेलापन सिखाएगा। नकली धर्म, झूठा धर्म, ईश्वर की कठिनता का धर्म, व्यक्ति को भीड़ का हिस्सा होना सिखाएगा। और जो आदमी भीड़ का जितना हिस्सा हो जाएगा, उतना ही ईश्वर को पाना कठिन हो जाएगा, क्योंकि भीड़ कभी ईश्वर तक जाती ही नहीं, कभी गई ही नहीं है, कभी जा भी नहीं सकती। सुनी है कोई घटना कि दस-पच्चीस लोग सीधे परमात्मा के दर्शन को उपलब्ध हो गए हैं? एक अकेला आदमी, अपने एकांत में, टोटल लोनलीनेस में उपलब्ध होता है, उस स्थिति को जाता है।
ईश्वर को कठिन बनाने के लिए जो तरकीबें काम में लाई गईं, उनमें पहली तरकीब यह है कि धर्म को भीड़ के साथ जोड़ दिया गया, जो बिलकुल ही गलत बात है। धर्म निजी और व्यक्तिगत है, इंडिविजुअल है। उसका आर्गनाइजेशन से, संप्रदाय से, पंथ से कोई दूर का भी संबंध नहीं है। इसीलिए दुनिया में हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं, जैन हैं, बौद्ध हैं, पारसी हैं, और न मालूम कितने लोग हैं, कितनी बीमारियां हैं, कितने नाम हैं। लेकिन धार्मिक आदमी कहीं भी नहीं है।
तो अगर परमात्मा की तरफ सरलता का अनुभव करना है, तो पहली बात यह है, इस बात को समझ लेना ठीक से कि वह अकेले का साक्षात है।
वहां आपका निजी मित्र भी आपके साथ नहीं जा सकता। आपकी पत्नी भी नहीं जा सकती, आपका बेटा भी नहीं जा सकता, आपके पड़ोसी भी नहीं जा सकते। जब भी आप जाएंगे, तो आप अकेले। जब भी आप खड़े होंगे, तो अकेले। जीवन के सारे गहरे अनुभव अकेले आदमी के अनुभव हैं, भीड़ से उनका कोई संबंध नहीं है।
अभी हम यहां इतने लोग बैठे हैं, अगर हमें हत्या करनी हो, तो अकेले आदमी को हत्या करने में बड़ी कठिनाई होती है, भीड़ को बहुत आसानी होती है। इतने लोग अगर हम बैठे हैं, हमें कहीं आग लगानी हो, तो अकेले आदमी को आग लगानी बहुत मुश्किल होती है। भीड़ को बहुत आसान होती है। क्यों? बुरा काम भीड़ के लिए हमेशा आसान होता है। क्यों? क्योंकि भीड़ में एक-एक आदमी को अपनी कोई रिस्पांसिबिलिटी, अपना कोई उत्तरदायित्व नहीं रह जाता। हम इतने लोग जाकर एक मकान में आग लगा दें। कोई मुझसे नहीं कह सकता कि तुमने मकान में आग लगाई है। आपमें से कोई से, कोई नहीं कह सकता। आप कहेंगे, भीड़ ने आग लगाई है। मैं तो साथ था सिर्फ। आपके भीतर, अंतःकरण को कोई चोट नहीं लगती। आप सिर्फ एक बड़ी भीड़ के हिस्से हैं! लेकिन आप अकेले खड़े हो जाएं, उसी मकान के सामने, जिसमें आपने भीड़ के साथ जाकर आग लगाई थी और अकेले आग लगाने की कोशिश करें, आपके सारे प्राण इनकार करेंगे, आप पच्चीस बार सोचेंगे कि मैं क्या कर रहा हूं। यह करना ठीक है या नहीं?
पाप के लिए भीड़ बड़ी जरूरी है, लेकिन पुण्य के लिए बिलकुल गैर जरूरी है। अगर आपको प्रेम करना है, तो आप संगठन करते हैं? पहले भीड़ इकट्ठी करते हैं कि हम प्रेम करने जा रहे हैं। आइए, भीड़ इकट्ठी करें, फिर हम प्रेम करें! प्रेम अकेला आदमी करता है। आपको एक काव्य निर्मित करना है, तो आप भीड़ इकट्ठी करते हैं कि चलो हम कविता करें? काव्य अकेले का अनुभव है। जीवन के जो भी श्रेष्ठ अनुभव हैं, वे अकेले के अनुभव हैं। जीवन के जो भी निकृष्ट अनुभव हैं, वे भीड़ के अनुभव हैं। क्राउड, भीड़ दुनिया में बड़ी खतरनाक घटना है। लेकिन धर्म भीड़ के साथ जुड़ गया है, इसलिए परमात्मा तक पहुंचना कठिन हो गया है।
धार्मिक व्यक्ति को, जिसे प्रभु की सरलता की दिशा में जाना है, यह बात स्मरण रख लेनी चाहिए कि यह अकेले की यात्रा है।
एक फकीर था--इकहार्ट। वह कहा करता था, फ्लाइट ऑफ दि अलोन, टु दि अलोन--अकेले की उड़ान, अकेले की तरफ। यहां कभी कोई किसी का साथी नहीं। वह इकहार्ट एक जंगल में बैठा था, एक झाड़ के नीचे। अकेले की उड़ान कर रहा होगा। अकेले में उड़ रहा होगा, अकेले की तरफ; कि कुछ मित्र शहर से गए थे जंगल, शिकार खेलने--वे वहां पहुंच गए। उन्होंने देखा कि बेचारा इकहार्ट! जो हमेशा भीड़ में रहते हैं, वे अकेले में रहने वाले आदमी को समझते हैं, बेचारा! असलियत उलटी है। जो अकेले में जीना जान जाता है, वह भीड़ को सोचता है, बेचारे! लेकिन उन मित्रों ने सोचा, बेचारा इकहार्ट अकेला बैठा है, ऊब गया होगा, घबड़ा गया होगा!
जो लोग भीड़ में रहते हैं, वे सोचते हैं, अकेले में ऊब पैदा होती है। उन्हें पता ही नहीं है कि अकेले में आनंद पैदा होता है। भीड़ हमेशा उबाने वाली है। लेकिन अनुभव न होने से खयाल में नहीं आता। वे इकहार्ट के पास गए। सोचा चलो कंपनी दे दें उसे, थोड़ा साथ दे दें।
वह आंख बंद किए बैठा है, वह न मालूम किस लोक में उड़ गए हैं उसके प्राण। उन्होंने उसे हिलाया और उसने आंख खोली और उन्होंने कहा, अरे, इकहार्ट! अकेले बैठे-बैठे ऊब गए होओगे। हमने सोचा कि चलो साथ दें!
इकहार्ट खूब हंसने लगा। उसने कहा, यह तो बहुत मजाक हो गई! मैं अकेला था, तो अकेला नहीं था। उससे मेरा मिलन हो रहा था और तुमने आकर मेरी आंख क्या खोल दी, मुझे फिर अकेला कर दिया। इकहार्ट ने कहा कि मैं अकेला था, तब अकेला नहीं था, उससे मेरा मिलन हो रहा था। और तुमने साथ क्या दिया, मुझे फिर अकेला कर दिया। तुम अपने रास्ते पर जाओ!
एक बाहर का मिलन भी है, और एक भीतर का भी। बाहर का सब मिलन भीड़ से मिलन है। भीतर का सब मिलन परमात्मा से है। ईश्वर कठिन हो गया, क्योंकि हमने भीड़ से धर्म को जोड़ दिया। धर्म एसेंशियली, मूलतः सारभूत वैयक्तिक है, भीड़ से उसका कोई नाता नहीं। कोई भी, दूर का भी नाता नहीं। इसलिए अगर आपको धार्मिक होना हो, तो यह अकेले की खोज है। इसमें आपके हिंदू, मुसलमान होने की कोई भी जरूरत नहीं है, कोई भी सवाल नहीं।
जिस दिन पृथ्वी पर धर्म होगा उस दिन धार्मिक लोग होंगे, अधार्मिक लोग होंगे; लेकिन हिंदू, मुसलमान नहीं हो सकते। इनकी कोई भी जरूरत नहीं है। ये बिलकुल अनावश्यक हैं। ये बाधा बने हुए हैं।
दूसरी बात। जिन लोगों ने कठिन किया धर्म को, उन्होंने परमात्मा की तरफ से आंख हटा कर सब्स्टीटयूट्स पर लगा दी, कुछ पूरक चीजों पर लगा दी। और सबसे बड़ी होशियारी की बात यह होती है कि अगर किसी चीज से आंख हटानी हो, तो किसी दूसरी चीज पर खड़ी कर दो। मुल्क अगर मर रहा हो भूखा, गरीबी बढ़ रही हो, संख्या बढ़ रही हो और दो-चार-दस साल में ऐसी महामारी आने को हो कि मुल्क को बचाना मुश्किल हो जाए, और इस तरफ से आंख फेरनी हो, तो गौ-हत्या आंदोलन चला दो, कि गऊ बचनी चाहिए! बस डायवर्शन हुआ दिमाग का लोगों का। उनके खयाल से मिट गई असली समस्या और एक सूडो प्रॉब्लम, एक झूठी समस्या सामने खड़ी हो गई कि गऊ मारनी चाहिए कि नहीं मारनी चाहिए, जब कि आदमी मरने के करीब पहुंच रहा हो! तब एक नकली समस्या पर लोगों की नजर ले जाओ।
हमेशा दुनिया के शोषक यह कोशिश करते रहे हैं कि जिंदगी के असली मसले हटा लो लोगों की आंखें। ईश्वर से आंख हटाने के लिए क्या तरकीब काम में लाई गई? मंदिर खड़े किये गए, मस्जिदें खड़ी की गईं। कहे कि ये भगवान के घर हैं, इनमें आओ। मस्जिद भगवान का घर? मंदिर भगवान का घर? आदमी के बनाए हुए मकान भी भगवान के घर हो सकते हैं? तब तो आदमी भगवान से भी बड़ा हो गया। और पत्थर की मूर्तियां रख दी गई हैं और वह भगवान है! आदमी की बनाई गई मूर्तियां भगवान हो सकती हैं? तो छोड़ दो पुरानी बात कहनी कि वह स्रष्टा है, कहो कि हम स्रष्टा हैं और हमने भगवान को बनाया!
असली जीवन जहां था वहां से आंख हटा कर, नकली सवालों पर खड़ी कर दी गई कि यहां भगवान है। इन पर लड़ो, इनकी पूजा करो।
एक नीग्रो एक रात चर्च के दरवाजे को खटखटा रहा है। अंधेरी रात है, और वह काला आदमी द्वार खड़ा है और दरवाजा ठोंक रहा है। फिर द्वार पादरी ने खोला। देखा कि काला आदमी खड़ा है, और वह चर्च तो सफेद लोगों का मंदिर था। वह चर्च तो सफेद चमड़ी वालों का था।
अब बड़े मजे की बात है, मंदिर में भी चमड़ी पहचानी जाती है कि कौन सी है। हिंदू की है कि मुसलमान की है! शूद्र की है कि ब्राह्मण की!
वह नीग्रो था और वह अंग्रेजों का मंदिर था। पादरी क्रोध से जल उठा होगा कि इस मूढ़ ने आधी रात नींद खराब की। वह हाथ मंदिर के दोनों दरवाजों पर रोक कर खड़ा हो गया और उसने कहा, कैसे आए हो, क्या चाहते हो? उस काले आदमी ने कहा, और कुछ भी नहीं, आप रास्ते से हट जाएं और मुझे मंदिर में आने दें। मैं प्रभु के दर्शन करना चाहता हूं। उस पादरी ने कहा, इतना आसान नहीं है प्रभु का दर्शन। जाओ पहले हृदय को शांत करो, मन को पवित्र करो, प्राणों को प्रार्थना से भरो। तब, तब प्रभु के दर्शन होते हैं। और द्वार उसने बंद कर लिए। नीग्रो उतर कर चला गया। उस पादरी ने सोचा, न कभी यह शर्त पूरी कर सकेगा कि हृदय पवित्र करके आ जाए, मन शांत कर ले। न दुबारा आएगा, न मंदिर अपवित्र होगा इसके अपवित्र चरणों से!
और बड़े मजे की बात है कि पवित्र भगवान का मंदिर, अपवित्र आदमी के घुसने से अपवित्र हो जाता है! होना तो उलटा चाहिए था कि अपवित्र आदमी पवित्र मंदिर में पहुंच जाए तो पवित्र हो जाए। लेकिन होता यह है कि खुद भगवान ही अपवित्र हो जाते हैं! यह अपवित्र आदमी बहुत मजबूत है, भगवान बहुत कमजोर और इंपोटेंट मालूम होते हैं। कोई बल नहीं मालूम होता उनमें। एक अपवित्र आदमी चला गया और भगवान अपवित्र हो गए, मंदिर ही अपवित्र हो गया! ऐसे कमजोर मंदिरों से धर्म कैसे आ सकेगा?
ऐसे मंदिर चाहिए, जहां अपवित्र घुसे और पवित्र होकर वापस लौट आए। उसको ही हम मंदिर कह सकते हैं। इसको कैसे मंदिर कह सकते हैं? लेकिन आदमी की बनाई हुई कोई चीज ऐसा मंदिर नहीं हो सकती। क्यों नहीं हो सकती? क्योंकि आदमी जो भी बनाएगा, वह आदमी से छोटा होगा। आदमी से बड़ा नहीं हो सकता। आदमी की बनाई कोई चीज आदमी से बड़ी नहीं हो सकती। असल में, सृष्टि कभी भी स्रष्टा से बड़ी न हुई है, न हो सकती है।
वह नीग्रो वापस लौट गया। पादरी निश्चिंत सो गया। फिर वर्ष बीत गए। दो-चार बार खयाल भी आया कि वह आया नहीं! लेकिन नहीं वह नहीं आया, तो उसने सोचा कि ठीक है, मेरा तर्क काम कर गया। लेकिन एक साल बीता था कि वह आदमी आ गया। वर्ष का पहला दिन है, पहली तारीख है, वह आदमी सुबह-सुबह चला आ रहा है। पुरोहित ने देखा और वह घबड़ा गया है। घबड़ाने का यह भी कारण है कि वह चर्च की तरफ आ ही नहीं रहा है। उसके आने से लग रहा है कि शर्त पूरी हो गई। उसकी आंखें ऐसी शांत मालूम पड़ रही हैं, जैसे कोई झील हो। उसके चेहरे पर ऐसी रोशनी, दीप्ति, ऐसी किरणें मालूम हो रही हैं, जैसे कोई ज्योति हो। उसके चलने में ऐसा लग रहा है, जैसे कोई आदमी नहीं, कोई देवता चलता हो।
वह पुरोहित घबड़ा आया। शायद शर्त पूरी हो गई! वह भागा कि दरवाजा बंद करे। लेकिन दरवाजा बंद करना व्यर्थ था। उस आदमी ने तो चर्च की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखा। वह तो आगे बढ़ गया। तो वह पुरोहित हैरान हो गया। शर्त भी पूरी हो गई मालूम होती है। फिर आया क्यों नहीं! तो वह गया, दौड़ा, जाकर उस आदमी को रोका और कहा, मेरे दोस्त, आप आए नहीं?
वह नीग्रो खूब हंसने लगा। उसने कहा, बड़ी मजाक हो गई। मैं तो आने को था, और एक वर्ष इसी मंदिर में आने की कामना में सब कुछ छोड़ कर उसका ही स्मरण किया, उसके लिए ही रोया, उसके लिए ही जागा और सोया। सपने में वह था, जागने में वह था। मन को पवित्र करने की सब कोशिश की। और कल धीरे-धीरे ऐसा लग रहा था कि आ गई है वह घड़ी। मन शांत हो गया है, शायद अब में जा सकूंगा। रात जब सोया था, तो मन बिलकुल निर्विकार था और मैं खुश था कि सुबह उठते ही वर्ष के पहले दिन मंदिर में प्रवेश कर जाऊंगा। लेकिन रात सब गड़बड़ हो गया।
भगवान मुझे रात दिखाई पड़े सपने में और कहने लगे, तू चाहता क्या है? किसलिए प्रार्थनाएं कर रहा है? किसलिए साधना कर रहा है? किसलिए आंसू बहा रहा है? तू चाहता क्या है? बोल मैं पूरा कर दूं।
तो मैंने उनसे कहा, कुछ और नहीं चाहता। वह जो गांव का मंदिर है, उसमें प्रवेश चाहता हूं। भगवान एकदम उदास हो गए और कहने लगे, इस बात को छोड़ कर तू और कुछ भी वरदान मांग ले। तो मैं बहुत कहने लगा, इतनी छोटी बात आप पूरी नहीं करेंगे! वे कहने लगे, इसको छोड़ दे, कुछ और मांग ले। मैंने बार-बार कहा, तो कहने लगे कि तू नहीं मानता तो मैं बताए देता हूं। दस साल से मैं खुद ही कोशिश कर रहा हूं उस मंदिर में घुसने की। वह पादरी मुझको ही नहीं घुसने देता है, तो तुझे कैसे घुसने देगा? यह मेरे वश के बाहर है। मैं तुझे उस मंदिर में नहीं ले जा सकता हूं। तो उस आदमी ने कहा, इसलिए मैं नहीं आया। जहां भगवान को ही प्रवेश नहीं, वहां मुझे क्या प्रवेश हो सकता है!
यह पता नहीं कहानी कहां तक सच है या कहां तक झूठ, लेकिन इतिहास यही कहता है कि यह कहानी सच होनी चाहिए। इतिहास तो यही कहता है कि आज तक किसी मंदिर में भगवान को प्रवेश नहीं मिल सका, न मिल सकेगा।
हम तो भगवान में प्रविष्ट हो सकते हैं। हम तो उस तक जा सकते हैं। बूंद है सागर में जाकर गिर सकती है, लेकिन सागर बूंद तक कैसे आए? सागर कैसे बूंद को खोजे, कैसे बूंद तक आए? हम अपनी बूंद लिए बैठे हैं और चिल्ला रहे हैं कि सागर बूंद में आ जाए। एक ही रास्ता है कि बूंद सागर में चली जाए।
आदमी परमात्मा में प्रवेश पा सकता है। बूंद सागर में मिल सकती है। लेकिन आदमी अपनी मूर्तियां, अपनी मस्जिद, अपना मंदिर बना कर बैठा है और कह रहा है कि भगवान यहां आ! बूंद में हम सागर को बुला रहे हैं! तो असफल हो गए हैं। भगवान नहीं आया, तो हमें लग रहा है कि बहुत कठिनाई हो गई है। भगवान पाना बहुत कठिन है।
भगवान को पाना कठिन नहीं है। मूढ़तापूर्ण काम कर रहे हैं, इसलिए बात कठिन हो गई है। बूंद में सागर को बुला रहे हैं और चिल्ला रहे हैं और रो रहे हैं और कह रहे हैं, भगवान को पाना बहुत कठिन है। भगवान को पाना उतना सरल है कि बूंद सागर में गिर जाए। आदमी की बनाई हुई चीजों में भगवान को लाना कठिन है, असंभव है। क्योंकि आदमी जो बनाएगा, वह इतना छोटा होगा कि उस विराट को, उस अनंत को उसमें कैसे लाया जा सकता है!
कोई मंदिर इतना बड़ा नहीं है, कोई मस्जिद इतनी बड़ी नहीं है, कोई शास्त्र इतना बड़ा नहीं है, कोई संप्रदाय इतना बड़ा नहीं है कि अनंत को, अनादि को समा ले अपने में। लेकिन हम सबका दावा यही है कि हमारी किताब में भगवान है, हमारे मंदिर में भगवान है, हमारी मूर्ति में भगवान है! इन दावेदारों ने धर्म की हत्या कर दी है। कोई दावा नहीं हो सकता। अगर वह है तो सब जगह है, और अगर नहीं है तो कहीं भी नहीं है। अगर वह है, तो फूल में है, पत्ते में है, पत्थर में है, शराबघर में है, मंदिर में है, वेश्यालय में है--सब जगह है, अगर वह है।
और जब भी कोई देखने वाली आंख पैदा होती है, तो सब जगह दिखाई पड़ जाता है। और अगर वह नहीं है, तो फिर आपके मंदिर में भी नहीं है, और मस्जिद में भी नहीं है और आपकी मूर्ति में भी नहीं है, और कहीं भी नहीं है। क्योंकि जिस आदमी को वृक्ष में नहीं दिखता, तारों में नहीं दिखता, आकाश में नहीं दिखता, फूलों में नहीं दिखता, लोगों की आंखों में नहीं दिखता, वह आदमी मंदिर की तरफ चला जा रहा है। वह कह रहा है, मैं भगवान के मंदिर जा रहा हूं! और भगवान चारों तरफ है। और जिसको यहां कहीं भी नहीं दिखता, उसको मंदिर में दिख सकेगा? असंभव है। और जिसको दिखाई पड़ जाएगा यहां, उसको कहीं मंदिर में जाने की कोई जगह रह गई, गुंजाइश रह गई! वह तो फिर जहां है, वहीं मंदिर है।
धार्मिक आदमी वह नहीं है, जो मंदिर जाता है। धार्मिक आदमी वह है जहां होता है, वहीं मंदिर होता है।
धार्मिक आदमी जहां जीता है, वहीं मंदिर है। उठता है तो मंदिर में, चलता है तो मंदिर में, जीता है तो मंदिर में, मरता है तो मंदिर में। क्योंकि वह सब तरफ है। सभी कुछ मंदिर है। सारा संसार उसका मंदिर है। लेकिन नहीं, धर्मगुरुओं ने छोटे-छोटे मंदिर बना रखे हैं, एक प्रतीक, सब्स्टीटयूट, और उन्होंने उस तरफ हमारी आंखें लगा दीं कि यहां खोजो, यहां खोजो। अब हम रेत से तेल निकाल रहे हैं हजारों साल से! वह रेत से तेल निकलता नहीं। अब हम कहने लगे, नहीं, तेल मिलना ही असंभव है! वह तिल से बहुत जल्दी से निकल जाता है और रेत से कभी नहीं निकलता है। लेकिन हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि कठिनाई उसके निकलने की नहीं है; कठिनाई हम रेत को लिए बैठे हैं, इसकी है।
मंदिरों और मस्जिदों को लिए जब तक आदमी बैठा है, तब तक परमात्मा पाना असंभव है। वह है जीवन में, वह है सब में, वह है समष्टि में। उस तक कैसे जाया जा सकता है, इन आने वाली चर्चाओं में मैं उसी दिशा में आपसे कुछ बातें करूंगा। कोई नहीं जानता, बात सुनते-सुनते भी कुछ हो सकता है। कोई नहीं जानता है, सत्य की एक किरण भी खयाल में आ जाए तो जिंदगी का अंधेरा मिट जाता है। कोई नहीं जानता कि किस क्षण में कौन सी झलक प्राणों को पकड़ ले। और इन तीन दिनों में वह जो मैं कहूंगा, अगर उसे पूरा ठीक-ठीक समझना हो, तो एक दूसरी बात जो मैं अभी आपको कहता हूं, उसे थोड़ा समझना जरूरी होगा।
जैसे, मैंने कहा, कोई नहीं जानता किस क्षण में वह पकड़ ले और बुला ले, उसका आमंत्रण आ जाए और आप खिंचे चले जाएं, और आपका प्राण उठ जाए और मिल जाए कोई मिलना हो जाए। लेकिन उसके लिए रिसेप्टिविटी, उसके लिए ग्राहकता भीतर चाहिए, कि हमारी तैयारी हो। बाहर सूरज निकला हुआ है, हम अपने दरवाजे बंद किए घर के भीतर बैठे हुए हैं। तो सूरज इतनी हिमाकत नहीं करेगा! इतना अशिष्ट नहीं है कि आकर दरवाजा पीटने लगे और कहे, दरवाजा खोलो, मुझे भीतर आने दो! सूरज बाहर ही खड़ा रहेगा। सूरज की किरणें दरवाजे पर ही पड़ती रहेंगी। प्रतीक्षा करता रहेगा कि खोलोगे कभी द्वार तो हम भीतर आ जाएंगे। नहीं खोलोगे, तो बाहर रुके रहेंगे। ऐसा अशिष्ट अतिथि नहीं है कि दरवाजा पीटने लगे और कहे कि दरवाजा खोलो, हम आ गए हैं, हम ठहरेंगे घर में!
हम दरवाजा बंद किए बैठे हैं, तो सूरज बाहर रुका रहता है--प्रतीक्षा करता है, प्रतीक्षा करता है, प्रतीक्षा करता है। हम द्वार खोलते हैं, उसकी किरणें भीतर भर आती हैं, अंधेरा विलीन हो जाता है। ठीक ऐसे ही हमारे मन के द्वार खुले हों तो परमात्मा हमेशा द्वार पर खड़ा है। लेकिन अशिष्ट नहीं है कि दरवाजा पीटने लगे। जबरदस्ती आपके घर में मेहमान नहीं बनेगा। लेकिन द्वार खुले हों, तो किरणें भीतर आ जाती हैं जहां रोशनी आ जाती है, अंधेरा मिट जाता है।
द्वार खुले हों मन के--ओपनिंग--इस द्वार खुले होने को मैं ध्यान कहता हूं। ध्यान से मेरा अर्थ है, मेडिटेशन से, ध्यान से--द्वार का खुला होना, मन का खुला होना। कभी वह आए, तो बंद दरवाजे न मिलें, कहीं वह लौट न जाए!
तो इन तीन दिनों में हम कुछ बात करेंगे, कुछ समझने की कोशिश करेंगे और साथ ही मन के द्वार खोलने की कोशिश करेंगे कि कहीं वह आए, तो घर से वापस न लौट जाए। इसे मैं ध्यान कहता हूं।
ध्यान की छोटी सी प्रक्रिया आपको अभी समझाऊंगा। दस मिनट के लिए हम यहां ध्यान में बैठेंगे और फिर विदा होंगे। बड़ी सरल--जैसा कि मेरा कहना है कि प्रभु को पाना बहुत ही सरल है, एकदम सरल है। लेकिन उन्हीं के लिए, जो सरल होने को तैयार हैं तो इसी वक्त हो सकती है बात। कल पर ठहरने की कोई जरूरत नहीं है--सरल हो सकते हैं जो...।
कैसे सरल हो सकते हैं? अभी हम एक छोटा सा प्रयोग करेंगे--सरल होने का, द्वार खोलने का, मन को शांत छोड़ देने का, मौन छोड़ देने का। कुछ भी नहीं करना है। रात बोल रही है, झींगुर बोल रहे हैं, कोई पक्षी आवाज करेगा, हवा बहेगी, कोई वृक्ष हिलेगा, तो मौन, चुपचाप बैठ कर सिर्फ सुनना है। यह जो चारों तरफ विराट की ध्वनि हो रही है। यह जो अनहद नाद हो रहा है चारों ओर, इसे चुपचाप सुनना है। इसी सुनने से, इसी लिसनिंग से--शायद इसी झींगुर की आवाज में, उसकी आवाज की झलक मिलनी शुरू हो जाए। सिर्फ सुनना है, और कुछ भी नहीं करना है। और आप हैरान हो जाएंगे, शायद आपको खयाल में भी नहीं होगा कि मात्र सुनने से मन इतना शांत हो जाता है, जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते हैं!
तो अब हम यह प्रयोग करेंगे कि हम दस मिनट के लिए आंख बंद करके बैठेंगे मौन। प्रकाश बुझा दिया जाएगा। घनघोर अंधेरे में आप अकेले रह जाएंगे। भीड़ मिट जाएगी। फिर कोई नहीं है, आप अकेले हैं। और फिर यह रात का सन्नाटा है, और ये रात की आवाजें हैं, इनको चुपचाप सुनते जाना है, चुपचाप सुनते जाना है। मन को बिलकुल खुला छोड़ देना है कि झींगुर की आवाज गूंजे मन में; गूंजे--निकल जाए। जैसे किसी खाली मकान में कोई आवाज गूंजती है, निकल जाती है। मकान फिर खाली का खाली रह जाता है। फिर कोई आवाज आती है, गूंजती है, निकल जाती है, मकान फिर खाली का खाली रह जाता है। तो इस रात की आवाज को चुपचाप सुनना है।
इस सुनने में कई बातें हो सकती हैं, वह मैं आपको कह दूं; और हों तो उन्हें रोकना नहीं है। जैसे ही मन शांत होता है, कई चीजें होनी शुरू होती हैं। मन जैसे ही शांत होगा, मन के न मालूम कितने दबे भाव बहने शुरू हो जाते हैं। उनको रोकते हैं, तो मन फिर बंद हो जाता है। यह हो सकता है, यह रोज होता है। आप जैसे ही शांत होंगे, यह हो सकता है कि आंसू आंख से बहने शुरू हो जाएं, तो उन्हें जबरदस्ती रोकें न। कोई भाव मन में पकड़ेगा, ओवरफ्लो होगा, आंख आंसू से भर जाएगी। कुछ भी हो सकती है भावदशा। हर व्यक्ति की अलग-अलग हो सकती है। तो क्या भावदशा होगी, उसे रेसिस्ट नहीं करना है, जरा भी रोकना नहीं है। जो भी हो, हो जाने दें।
हम सब इतने फासले पर बैठेंगे, क्योंकि कुछ लोग हो सकता है कि इतने शांत हो जाएं और उनका मन गिर जाने का हो, लेट जाने का हो, वे लेट जाने जाएं। भीतर से जैसा लगे, वैसा ही हो जाने देना है। बहुत से लोग गिर जाएंगे, तो अपने को रोक नहीं लेना है जबरदस्ती। अगर गिरने लगे शरीर, तो उसे छोड़ देना मुर्दे की तरह। तो वह गिर जाए, तो गिर जाए। आगे गिर जाए, पीछे गिर जाए, जहां जाना हो चला जाए। जो भी होता हो, उसे होने देना है चुपचाप। दस मिनट के लिए एक ही काम करते रहना है कि चुपचाप सुनते रहना है। फिर जो भी हो, उसे हो जाने देना है। उसे बिलकुल नहीं रोकना है। तो आप बच्चे की जैसी सरलता को उपलब्ध होंगे। आप रोक नहीं रहे हैं, आप होने दे रहे हैं।
दो बातें: एक तो झाड़ में लगा हुआ पत्ता है। हवा आती है, तो वह हिलता है, लेकिन मजबूरी से हिलता है। उसकी इच्छा हिलने की नहीं होती। वह अपनी शाखा को जोर से पकड़े हुए है। डर है उसे, कहीं टूट न जाए! हवा चली जाती है, वह फिर अपनी जगह थिर हो जाता है।
एक सूखा हुआ पत्ता है, हवा आती है, वह उड़ जाता है। वह किसी को पकड़े हुए नहीं है। उसकी कोई क्लिंगिंग नहीं; वह उड़ जाता है। हवा पूरब में जाती है, पत्ता पूरब चला जाता है। हवा पश्चिम जाती है, पत्ता पश्चिम चला जाता है। हवा बंद हो जाती है, पत्ता जमीन पर गिर जाता है। हवा फिर आ जाती है, पत्ता आकाश में उड़ जाता है। पत्ता कुछ भी नहीं कहता, पत्ता अपने को छोड़ दिया है। सूखा पत्ता उड़ता रहता है।
ठीक सूखे पत्ते की तरह हो जाना है ध्यान में। शरीर गिर जाए, गिर जाए। आंख से आंसू बहने लगें, बहने दें।

साधना शिविर, जूनागढ़; १८ मई, १९६८; रात्रि.