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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

माटी कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन-12



बारहवां प्रवचन

माटी कहै कुम्हार सूं
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी घटना से मैं आज की चर्चा शुरू करना चाहूंगा। एक काल्पनिक घटना ही मालूम होती है, एक सपने जैसी झूठी, एक किसी कवि ने सपना देखा हो ऐसा ही।
लेकिन जिंदगी भी बहुत सपना है और जिंदगी भी बहुत कल्पना है और जिंदगी भी बहुत झूठ है।
एक बहुत बड़ा मूर्तिकार था। उसकी मूर्तियों की इतनी प्रशंसा थी सारी पृथ्वी पर कि लोग कहते थे कि वह जिस व्यक्ति की मूर्ति बनाता है, अगर उस व्यक्ति को मूर्ति के पास ही श्वास बंद करके खड़ा कर दिया जाए, तो पहचानना मुश्किल है कि कौन मूल है कौन मूर्ति है, कौन असली है कौन नकल है।

उस मूर्तिकार की मृत्यु निकट आई। वह मूर्तिकार बहुत चिंतित हो उठा। मौत करीब थी वह बहुत भयभीत हो उठा। लेकिन फिर उसे खयाल आया, क्यों न मैं अपनी ही मूर्तियां बना कर मौत को धोखा दे दूं। उसने अपनी ही बारह मूर्तियां बनाईं।
और जिस दिन मौत उसके घर में प्रविष्ट हुई वह अपनी ही बनाई हुई मूर्तियों में छिप कर खड़ा हो गया। वहां तेरह एक जैसी मूर्तियां दिखाई पड़ने लगीं। मौत तो चकित रह गई, एक व्यक्ति को लेने आई थी वहां तेरह एक जैसे लोग थे। एक को ले जाने की आज्ञा थी किसको ले जाए किसको छोड़ दे। वे बिलकुल एक जैसे थे, पहचानना मुश्किल था। मौत वापस लौट गई और उसने परमात्मा से जाकर कहा कि मैं किसको लाऊं वहां तेरह एक जैसे लोग मौजूद हैं। परमात्मा ने मौत के कान में एक सूत्र कहा और कहा, इस सूत्र का उपयोग करना, असली आदमी अपने आप बाहर आ जाएगा। वह मौत वापस आई, वह फिर उस कमरे में गई जहां मूर्तिकार छिपा था अपनी मूर्तियों में। उसने एक नजर डाली और फिर हंसने लगी और बोली, और सब तो ठीक है एक छोटी सी भूल रह गई इतना सुनना था कि वह मूर्तिकार बोला, कौन सी भूल? और उस मृत्यु ने कहा यही कि तुम अपने को नहीं भूल सकते हो! बाहर आ जाओ!
यही कि तुम यह नहीं भूल सकते हो कि तुमने इन मूर्तियों को बनाया है, यही कि तुम्हारा अहंकार विस्मरण नहीं हो सकता। तुम्हारी ईगो, तुम्हारा यह खयाल कि मैं हूं। और परमात्मा ने मुझसे कहा कि जिसे यह खयाल है कि मैं हूं, वह आदमी मृत्यु से नहीं बच सकता है। लेकिन जिसका यह खयाल मिट जाता है कि मैं हूं, उसे मृत्यु ले जाने में असमर्थ हो जाती है वह अमृत को उपलब्ध हो जाता है।
यह बात, यह घटना तो सच नहीं हो सकती, लेकिन आदमी की जिंदगी में निरंतर यही होता है। वे लोग जो मैं से भरे हुए हैं, वे जो अहंकार से भरे हुए हैं, वे एक बार मरते हों ऐसा भी नहीं, वे रोज मरते हैं और प्रतिपल मरते हैं। अहंकार बड़ी कमजोर चीज है, जरा सी हवा का झोंका और टूट जाता है, जरा सा फर्क और मिट जाता है। सम्हाले रहो, सम्हाले रखो, जरा सी चूक और छितर-बितर हो जाता है। और जिंदगी भर सम्हालने की कोशिश करो और आखिर में मौत तो उसे बिलकुल तोड़ ही देती है। अहंकार के साथ जो जीता है वह मौत के साथ जीता है। और मौत के साथ जो जीता है अगर वह भयभीत रहे, घबड़ाया रहे, चिंतित रहे, अशांत रहे, परेशान रहे, बेचैन रहे तो आश्चर्य क्या है! मौत के साथ जो भी जीएगा भयभीत रहेगा, चिंतित रहेगा, अशांत रहेगा। स्वाभाविक है। चौबीस घंटे मौत के साथ जीना कैसे? लेकिन मौत के साथ जीने की कोई जरूरत नहीं है, मौत के साथ इसलिए जीना पड़ता है कि हम अहंकार के साथ जीते हैं। अहंकार मरणधर्मा है। अहंकार मृत्यु का सूत्र है। जहां अहंकार है वहां मृत्यु है और जहां अहंकार नहीं है वहां अमृत है, वहां कोई मृत्यु नहीं।
एक फकीर से कोई पूछता था, कि मैं यह जानने आया हूं कि जीवन और मृत्यु का संबंध क्या है? जीवन और मृत्यु क्या है? क्या मुझे बताएंगे जीवन और मृत्यु के संबंध में कुछ? वह फकीर कहने लगा कि अगर जीवन के संबंध में जानना हो तो मैं कुछ बता सकता हूं, मृत्यु के संबंध में कुछ भी नहीं। क्योंकि न मैं कभी मरा और न मैं कभी मर सकता हूं। मुझे मृत्यु का कोई पता नहीं है। उन लोगों के पास जाओ जो रोज-रोज मरते हैं वे शायद मृत्यु के संबंध में तुम्हें कुछ बता सके। मैं तो केवल जीवन को जानता हूं। अहंकार को जो छोड़ देता है वह जीवन को जान लेता है, उस जीवन को जिसका कोई अंत नहीं है, जिसकी कोई समाप्ति नहीं है, जिसका कोई प्रारंभ नहीं है, जिसकी कोई सीमा नहीं है। धार्मिक जीवन का तीसरा सूत्र: अहंकार से मुक्ति है। यह अहंकार क्या है इसे हम थोड़ा समझ लें, तो शायद इससे मुक्त कैसे हुआ जा सकता है वह भी हमें दिखाई पड़ जाए। और यह अहंकार क्या है इसकी थोड़ी सूझ हमें आ जाए तो शायद इससे मुक्त होने के लिए भी हमें कुछ भी न करना पड़े। इसकी समझ ही इसकी मुक्ति भी बन सकती है। यह अहंकार क्या है।
किस-किस रूपों में हमारे प्राणों को पकड़ता है, किस-किस भांति हमारे जीवन का केंद्र बन जाता है। जीवन का सब कुछ बन जाता है। और सब भूल जाते हैं फिर हम, और सारे जीवन को समर्पित कर देते हैं एक ऐसी बात पर जिसका कोई भी मूल्य नहीं।
एक छोटा सा बच्चा रेत पर नदी की रेत पर हस्ताक्षर कर रहा है, एक बूढ़ा आदमी उससे कहने लगा पागल, रेत पर हस्ताक्षर कर रहा है? थोड़ी देर में हवा आएगी और रेत को उड़ा जाएगी। मेहनत बेकार हो जाएगी। थोड़ी देर में पानी आएगा और सब बह जाएगा। श्रम व्यर्थ हो जाएगा। रेत पर हस्ताक्षर मत कर, हस्ताक्षर करने हो तो मजबूत चट्टान पर कर। मैं भी वहां था, मैं उस बूढ़े की बात सुन कर हंसने लगा और मैंने कहा, क्या आपको पता है, जो आज रेत दिखाई पड़ रही है वह कभी मजबूत चट्टान थी और जो आज मजबूत चट्टान है वह कल रेत हो जाएगी। चाहे रेत पर हस्ताक्षर करो, चाहे मजबूत चट्टानों पर, सब हस्ताक्षर पानी पर खींची गई लकीरों से ज्यादा सिद्ध नहीं होते। अहंकार क्या है? पानी पर हस्ताक्षर करने की पागल कोशिश! मैं लिख जाना चाहता हूं कि मैं हूं! मैं कह जाना चाहता हूं जोर से कि मैं था! मैं जोर से चिल्लाना चाहता हूं कि जानो कि मैं हूं! यह आवाज शून्य में गूंज कर विलीन हो जाएगी। यह कोई भी नहीं सुन सकेगा। क्योंकि जिनको मैं सुनाना चाहता हूं वे खुद भी इसीलिए आतुर बैठे हैं कि वे चिल्ला रहे हैं कि मैं हूं! हमें सुनो! वे सुनने के लिए कोई भी उत्सुक नहीं हैं, वे सभी सुनाने को उत्सुक हैं।
मैं के पीछे आदमी दौड़-दौड़ कर अगर पागल हो जाता हो, विक्षिप्त हो जाता हो। होगा ही! किसको सुनाना चाहते हैं आप? किससे कह जाना चाहते हैं कि मैं था! मैं हूं! किससे कहना चाहते हैं? कौन सुनेगा? कौन सुनने को मौजूद है?
एक सम्राट चक्रवर्ती हो गया, उसने सारी पृथ्वी जीत ली थी। कहते हैं चक्रवर्तियों को यह अधिकार था कि वे स्वर्ग में जाकर वहां सुमेरु पर्वत पर हस्ताक्षर कर सकते थे। सुमेरु सबसे ज्यादा सख्त चट्टान है। कल्प बीत जाते हैं, महाकल्प बीत जाते हैं, सृष्टि बनती है और मिट जाती है, लेकिन सुमेरु अडिग खड़ा रहता है। चक्रवर्तियों को जो सारी पृथ्वी जीत लेते हैं उन्हें हस्ताक्षर करने का मौका मिलता है। उसने सारी पृथ्वी जीत ली। वह बैंड-बाजे लेकर स्वर्ग के द्वार पर पहुंच गया। लेकिन द्वारपाल ने उसके कान में कहा कि महानुभाव, अच्छा हो कि आप अकेले ही भीतर जाएं, इन सबको भीतर न ले जाएं। बाद में आप पछताएंगे कि इनको भीतर ले गए। इनको आप बाहर छोड़ें, आप अकेले ही हस्ताक्षर कर आएं। मैं जो कह रहा हूं बाद में इस बात की समझ, इस बात की बुद्धिमत्ता आपको पता चलेगी। सम्राट अकेला भीतर गया, विराट पर्वत था जिसके ओर-छोर न हों, आकाश को छूती हुई जिसके शिखर थे, लेकिन वह पहरेदार कहने लगा, आप जगह खोज लें कहीं अगर हस्ताक्षर लिखने को जगह बची हो। जहां तक मैं जानता हूं पहाड़ पूरा भरा हुआ है। हस्ताक्षर करने को कोई जगह नहीं। बहुत से चक्रवर्ती अतीत कालों में हस्ताक्षर कर चुके हैं।
सम्राट तो हैरान हो गया! उसने सोचा था: उस विराट पर्वत पर शायद मैं ही अकेला हस्ताक्षर करने जा रहा हूं या होंगे एक-दो और हस्ताक्षर! लेकिन वह विराट पर्वत रत्ती-रत्ती भरा है, वहां कहीं कोई जगह नहीं, सब जगह हस्ताक्षर हो गए हैं। तो सम्राट कहने लगा, यह क्या है? फिर अर्थ भी क्या है यहां हस्ताक्षर करने का? कौन पढ़ता होगा इन्हें?
वह पहरेदार कहने लगा, जहां तक मैं समझता हूं, जो लिखता है वही पढ़ता है और कोई भी नहीं पढ़ता। अपने हस्ताक्षर आदमी खुद ही पढ़ता है कोई और नहीं पढ़ता! किसको फुर्सत पड़ी है, किसको समय है, किसको सुविधा है। और जो आदमी अपने हस्ताक्षर करने को आतुर होता है वह आदमी दूसरे के हस्ताक्षर मिटा देने को आतुर होता है। पढ़ने की फुर्सत कहां होगी। उस पहरेदार ने कहा, कोई नाम मिटा दें पत्थर पर और अपना लिख दें। राजा का तो मन फीका हो गया, इतनी विजय यात्रा करके, इतनी हिंसाएं करके, इतनी हत्याएं करके, इतना दुख और पीड़ा झेल कर जीवन नष्ट करके इसलिए आया था कि सुमेरु पर हस्ताक्षर करेगा! वहां जगह नहीं; दूसरे का नाम पोंछना पड़ेगा। मन उदास और फीका हो गया। पहरेदार उसकी पीठ ठोंकने लगा और कहा घबड़ाएं न, मैं हजारों वर्षों से पहरेदार हूं, मेरे पहले मेरे पिता पहरेदार थे, उनके पहले उनके पिता।
जन्मों-जन्मों से हमने यह कहानी सुनी है कि अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि खाली जगह किसी को भी मिली हो। हमेशा हस्ताक्षर मिटा कर ही नये हस्ताक्षर करने पड़े हैं। आप चिंतित न हों, ये जो हस्ताक्षर दिखाई पड़ रहे हैं ये भी किन्हीं के मिटाए हुए हस्ताक्षरों के ऊपर किए गए हैं। आप बेफिक्री से करें। वह राजा बिना हस्ताक्षर किए वापस लौट आया। और उसने पहरेदार को धन्यवाद दिया कि तुमने अच्छा किया जो मेरी भीड़ मेरे पीछे आई थी उसको भीतर नहीं आने दिया। कहीं वह भी यह हालत देख लेती। आदमी जीवन भर क्या करता है, क्या करना चाहता है, क्या है उसकी आतुर आकांक्षा?
एक छोटी सी और बिलकुल पागल आकांक्षा! नाम खोद जाना चाहता है, मैं हूं इसकी घोषणा करना चाहता है। और इस बात का कोई पता ही नहीं कि मैं कौन हूं, किसकी घोषणा करना चाहते हैं उसका कोई पता नहीं। इस बात का पता नहीं जिसको मैं अपना नाम कह रहा हूं वह किसी का भी नाम नहीं है क्योंकि कोई भी आदमी नाम लेकर पैदा नहीं होता। सभी आदमी अनाम पैदा होते हैं--नेमलेस। कोई नाम लेकर पैदा नहीं होता। नाम कामचलाऊ है एक यूटीलिटेरियन, एक उपयोगी जरूरत, उसके बिना काम नहीं चलता। इसलिए मेरा कुछ नाम है, आपका कुछ नाम है। ऐसे नाम तो किसी का भी कुछ भी नहीं है।
जन्म बिना नाम के, मौत फिर बिना नाम में ले जाती है। और जीवन भर जिस नाम के लिए हम चेष्टा करते हैं, उसकी कहीं अस्तित्व में कोई रेखा भी नहीं बचती। वह नाम कहीं है ही नहीं, जन्म लेता हूं बिना नाम के, मरता हूं बिना नाम के। रोज रात सोते हैं और बिना नाम के हो जाते हैं। नाम रोज मिटता है, डूबता है, बनता है। और मौत तो बिलकुल बहा ले जाती है। क्योंकि मौत के साथ तो वही बचेगा जो जन्म के साथ आया हो, जो जन्म के बाद निर्मित हुआ है वह मौत के साथ नहीं जा सकता। जो जन्म के पहले से आया है वह मृत्यु में साथ हो सकता है। नाम जन्म के पहले से आपके साथ नहीं; नाम मौत के बाद आपके साथ नहीं हो सकता।
लेकिन सारा जीवन तो हम इस नाम को ही स्वर्ण अक्षरों में लिखने की चेष्टा में व्यतीत कर देते हैं। क्या-क्या नहीं करते हैं उस नाम के पीछे, कैसी यात्राएं नहीं करते हैं, कैसे दुख नहीं झेलते हैं, कैसी पीड़ाएं, कितनी रातें बिना सोए खो देते हैं, कितने सुख खो देते हैं, कितनी शांति खो देते हैं। किस बात के लिए? अगर कहीं पृथ्वी के पार कहीं भी और जीवन होगा और अगर चांदत्तारों से कोई हमें देखता होता होगा तो सोचता होगा कि यह आदमियत जो है इसे मैन काइंड कहना ठीक नहीं इसे मैड काइंड कहना ठीक है। इसे मनुष्यता कहना ठीक नहीं, विक्षिप्तता कहना ठीक है। पागल है यह पूरी जाति। पागलपन का केंद्र अहंकार है।
एक सुबह एक सम्राट जंगल में रास्ता भटक गया है वह रात शिकार करने आया और रास्ता भूल गया। छोटे से झोपड़े के सामने रुका है, सुबह का नाश्ता कर ले, उसने दोत्तीन अंडे मांगे हैं, थोड़ा दूध लिया है और नाश्ता किया है। और जब वह घोड़े पर सवार हो गया है तो उस झोपड़े के बूढ़े मालिक से कहा, कितने दाम हुए? तो उस बूढ़े मालिक ने कहा, ज्यादा नहीं; सिर्फ सौ रुपये।
सम्राट तो चकित रह गया तीन अंडों के सौ रुपये दाम! उसने कहा, क्या कहते हो? आर एग्स सो रेयर हियर? इतने मुश्किल हैं अंडे मिलने यहां? सौ रुपये दाम! उस बूढ़े ने कहा कि नहीं; एग्स आर नाट रेयर सर, बट किंग्स आर! अंडे मिलना मुश्किल नहीं; लेकिन राजा मिलने बहुत मुश्किल। दाम अंडों के नहीं; दाम राजा को देने के हैं। उसने सौ रुपये निकाल कर बूढ़े को भेंट कर दिए। बूढ़े की औरत तो चकित रह गई, उसने कहा, क्या कर दिया? क्या जादू कर दिया? तीन अंडों के सौ रुपये! उस बूढ़े ने कहा कि तुझे पता नहीं। मैं आदमी की कमजोरी जानता हूं। बस कमजोरी को छू दो, फिर आदमी से कुछ भी करवा लो। उससे कहो कि जाओ बंबई से दिल्ली तक नाक के बल चले जाओ, वह नाक के बल बंबई से दिल्ली की तरफ चला जाएगा। कमजोरी की बटन छू दो। उससे कहो, जीवन गंवा दो, एक मकान बना लो ऊंचा। वह जीवन गंवा देगा, एक मकान ऊंचा बना लेगा, वह मकान उसकी कब्र बन जाएगी, बनाते-बनाते वह खतम हो जाएगा। उसकी कमजोरी छू दो, फिर वह पागल हो जाएगा। उससे जो चाहना हो करवा लो, उससे कहो, कपड़े छोड़ो नंगे हो जाओ, भूखे-प्यासे खड़े रहो, सिर के बल खड़े रहो चौपाटी पर। वह जिंदगी भर सिर के बल शीर्षासन करता रहेगा। बस कमजोरी छू दो। जो कुछ करवाना हो आदमी से करवा लो उसकी कमजोरी भर छूने की कला आनी चाहिए और कुछ भी नहीं चाहिए।
लेकिन वह बुढ़िया नहीं समझी, उसने कहा, मैं कुछ समझी नहीं, यह कमजोरी क्या चीज है? उस बूड़े ने कहा, तू नहीं समझती तो मैं तुझे एक और घटना बताता हूं शायद उससे समझ में आ जाए।
जब मैं जवान था तब मैं एक राजधानी में गया, मैं कुछ सौदा करने गया था और सौदा वही लोग कर सकते हैं ठीक-ठीक जो आदमी की कमजोरी जानते हों। ह्यूमन वीकनेस को जो पहचानते हों, वे ही असली सौदागर हैं। वे ही असली धंधेबाज हैं। तो मैं गया एक राजधानी में धंधा करने। मैंने एक पगड़ी खरीदी पांच रुपये में, बहुत रंग-बिरंगी पगड़ी थी और पहन कर सम्राट के दरबार में पहुंच गया।
जब मैं दरबार में गया उस चमकदार पगड़ी को देख कर, वह बहुत चमकदार थी, सस्ती चीजें हमेशा चमकदार होती हैं। चमकदार चीजें दिखाई पड़ें समझ लेना कि भीतर कोई सस्तापन है। जीवन का हिसाब ऐसा है। वह चमकदार पगड़ी देख कर सम्राट ने पूछा कि बड़ी खूबसूरत पगड़ी है कितने में खरीदी? उस बूढ़े ने कहा कि मैंने कहा, दाम पूछते हैं, सुनने की हिम्मत है? पगड़ी बहुत महंगी है। राजा ने कहा, फिर भी, कितने में खरीदी होगी?
पांच हजार रुपये में। राजा हंसने लगा, आदमी पागल हो गया मालूम होता है। लेकिन उसे पता नहीं था कि वह आदमी बहुत होशियार है। राजा पागल सिद्ध होगा। वह हंसने लगा, कहा, पांच हजार रुपये? वजीर भी चौंक गया, वजीर ने राजा के कान में आकर कहा, सावधान! आदमी धोखे बाज मालूम होता है, दो-चार रुपये की पगड़ी के पांच हजार रुपये बता रहा है।
उस बूढ़े ने अपनी पत्नी को कहा, मैं भी समझ गया कि वजीर राजा के कान में क्या कह रहा है। क्योंकि जो लोग किसी को लूटते रहते हैं, तो दूसरा लूटने लगे तो बाधा देना शुरू कर देते हैं। यह दुकानदारों की होड़ प्रतियोगिता होती है, एक राजनीतिक दूसरे राजनीतिक से प्रतियोगिता करता है। एक संन्यासी दूसरे संन्यासी से प्रतियोगिता करता रहता है। एक दुकानदार दूसरे दुकानदार से। एक साहित्यकार दूसरे साहित्यकार से। एक कवि दूसरे कवि से। सारी दुनिया में...।
तो उसने कहा, हां, समझ गया कि वजीर क्या कह रहा है? मैं समझ गया कि अपने ही रास्ते का राहगीर वजीर भी है लूट रहा है राजा को, मुझको लूटने में बाधा देना चाहता है। लेकिन उस वजीर को भी पता नहीं था कि जो आदमी सामने खड़ा है वह बहुत होशियार है वह आदमी की कमजोरी जानता है। उस बूढ़े ने अपनी पत्नी को कहा, मैं लौट पड़ा और मैं हंसने लगा और मैंने कहा, अच्छा तो मैं जाऊं, मैं गलत जगह आ गया।
राजा ने पूछा, मतलब? उसने कहा कि मतलब यह कि मैंने जिससे यह पगड़ी खरीदी थी उसने मुझे यह वादा किया है कि यह पगड़ी--एक ऐसी राजधानी भी है और इस जमीन पर एक ऐसा राजा भी है जो इसे पांच हजार रुपये में खरीद सकता है। मैं उसी की खोज में निकला हूं। तो मैं समझ लूं कि यह वह राजा नहीं, यह दरबार वह दरबार नहीं जिसकी मुझे तलाश है। मैं जाऊं? राजा ने कहा, पांच हजार रुपये भेंट कर दिए जाएं, पगड़ी खरीद ली जाए।
वजीर तो पागल हो गया! पगड़ी खरीद ली गई, पांच हजार रुपये दे दिए गए।
और जब वह बूढ़ा पांच हजार रुपये लेकर निकल रहा था, तो वजीर रास्ते में मिला और उसने पूछा, महाशय! तुमने तो मुझे चकित कर दिया। आश्चर्य! तुमने वह पांच रुपये की पगड़ी पांच हजार में बेच दी! तो मैंने उस वजीर को कहा था उस बूढ़े ने कहा, तुम्हें पगड़ियों के दाम पता होंगे, मुझे आदमी की कमजोरी पता है।
पता नहीं कि वह बुढ़िया समझी कि नहीं समझी।
लेकिन मैं समझता हूं, आप समझ गए होंगे कि आदमी कि कमजोरी क्या है? क्या है आदमी की कमजोरी? अहंकार, यह भाव कि मैं कुछ हूं। समबडी। होने का भाव कि मैं कुछ हूं। यह भाव बहुत रूपों में आदमी को पकड़ सकता है।
यह भाव मेरे पास धन है तो पकड़ सकता है कि मैं धनी हूं। मेरे पास कुछ है। आदमी कुछ इसीलिए इकट्ठा करता है ताकि वह यह अनुभव कर सके कि मेरे पास कुछ है तो मैं कुछ हूं। धन इकट्ठा हो तो लगता है मैं कुछ हूं। बड़ा पद हो, बड़ी कुर्सी हो तो लगता है कि मैं कुछ हूं। बहुत उपाधियां हों, शास्त्रों का ज्ञान हो तो लगता है कि मैं कुछ हूं।
त्यागत्तपश्चर्या हो, उपवास किए हों, लाखों मालाएं फेरी हों तो लगता है कि मैं कुछ हूं। किसी भी तरह का संग्रह पास में हो तो लगता है कि मैं कुछ हूं। मैंने इतने उपवास किए, मैंने इतनी माला फेरी, मैंने इतने राम-राम लिखे तो लगता है कि मैं कुछ हूं, किसी भी तरह कि संपदा इकट्ठी हो तो लगता है कि मैं कुछ हूं। बड़ा आश्चर्य है, आदमी त्याग भी कर देता है, तो उसका भी हिसाब रखता है, उसका भी हिसाब रखता है कि मैंने इतना त्याग किया।
एक संन्यासी के पास मैं था, वे मुझसे कहते थे, मैंने लाखों रुपयों पर लात मार दी। मैंने पूछा, यह लात कब मारी आपने? वे कहने लगे, कोई तीस साल हो गए। मैंने कहा, लात ठीक से लग नहीं पाई मालूम होती है। तीस साल तक स्मृति कैसे बनी रही, तीस साल तक यह खयाल कैसे बना रहा कि मैंने लाखों पर लात मार दी। लात लग गई होती तो बात खतम हो गई थी। लेकिन बात खत्म नहीं हुई, स्मृति रस ले रही है, अहंकार आनंद ले रहा है इस बात का कि मैंने, मैं कोई साधारण आदमी नहीं, लाखों रुपयों पर लात मारने वाला संन्यासी हूं।
जब लाखों रुपये रहे होंगे तब यह खयाल रहा होगा कि मैं लाखों रुपये का मालिक हूं। तब भी अहंकार था, और जब छोड़ दिए तब भी अहंकार है कि मैंने लाखों छोड़ दिए। और पहले अहंकार से दूसरा अहंकार ज्यादा खतरनाक, ज्यादा सूक्ष्म, ज्यादा रुग्ण, ज्यादा विषाक्त है, क्योंकि पहले अहंकार को चोर चुरा कर ले जा सकते थे, दिवाला निकल सकता था, जुआ खेला जा सकता, दूसरे अहंकार को चोर नहीं चुरा सकते, दिवाला नहीं निकल सकता। कोई सरकार टैक्स नहीं लगा सकती। दूसरे पर कोई उपद्रव नहीं, दूसरा अहंकार बहुत सुरक्षित है कि मैंने लाखों त्याग दिए। त्याग से भी अहंकार भर सकता है, ज्ञान से भी, धन से भी, पद से भी। अहंकार के रास्ते बहुत सूक्ष्म, मार्ग बहुत अपरिचित, हर तरफ से आदमी को पकड़ ले सकता है।
एक आदमी मंदिर जाता है तो सोचता है कि मैं मंदिर जाता हूं, मैं विशिष्ट हूं, मैं स्वर्ग जाऊंगा। ये बिचारे लोग, ये दुनिया के लोग जो मंदिर नहीं जाते, ये सब नरक में जाने वाले हैं। मैं माला जपता हूं, मैं राम का स्मरण करता हूं, मुझे भगवान बिलकुल सिंहासन के पास में बिठाएंगे और ये बाकी लोग नरक की कढ़ाहियों में सड़ेंगे। ये सब अहंकार के रूप हैं। मैं स्वर्ग में जाऊंगा।
और आपको पता है, हम यह तो भलीभांति पहचान लेते हैं, कोई आदमी धन इकट्ठा करता है, अकड़ कर चलता है तो हम पहचान लेते हैं कि यह अहंकार है। कोई आदमी बड़ा महल बनाता है हम पहचान लेते हैं। कोई सिकंदर विजय की यात्रा पर निकलता है, हम पहचान लेते हैं। लेकिन एक आदमी मोक्ष को जीतने चलता है, और एक आदमी कहता है, मैं ईश्वर को पाकर रहूंगा, तब हम नहीं पहचान पाते की यह भी अहंकार है। मैं मोक्ष पाकर रहूंगा, मैं ईश्वर के दर्शन पाकर रहूंगा। ये भी अहंकार के रूप हैं। और ये अहंकार के सारे रूप विदा न हो जाएं जीवन से, तो जीवन सत्य की कोई अनुभूति संभव नहीं है। तो प्रभु के कोई दर्शन संभव नहीं हैं।
दो सूत्रों पर हमने बात की है, रिबेलियन अगेंस्ट नालेज, ज्ञान के प्रति विद्रोह। रिबेलियन अगेंस्ट पैसिमिज्म, दुखवाद के प्रति विद्रोह। और आज तीसरे सूत्र पर बात करनी है, रिबेलियन अगेंस्ट ईगोइज्म, अहंकार के प्रति विद्रोह। ये तीन सूत्र मनुष्य की धार्मिक साधना के मंदिर की तीन सीढ़ियां हैं। और अंतिम और सबसे अनिवार्य सीढ़ी अहंकार से मुक्त हो जाने की है। लेकिन हम मुक्त होने की तो बात दूर, हम प्रतिपल अहंकार को मजबूत करने की चेष्टा में निरंतर संलग्न होते हैं। सोते-जागते, उठते-बैठते उसे मजबूत करते रहते हैं कि वह मजबूत हो जाए। शायद वही हमारे जीवन का आधार है, वही हमारे पैरों के नीचे की भूमि है। उसको ही सम्हालना है, उसी को सजाना है, उसी को संवारना है।
चौबीस घंटे, सोते-जागते, उठते-बैठते हम क्या सम्हाल रहे? कौन सी चीज को हम सम्हाल रहे? कौन सी चीज के लिए हम चौबीस घंटे श्रम कर रहे हैं? पूछें अपने से एकांत में कभी, अपने से पूछें कि मैं क्या कर रहा हूं? मैं किसलिए जी रहा हूं? मेरी क्या आकांक्षा है? मेरे सारे जीवन की इस दौड़ का केंद्र क्या है? और आप पाएंगे कि अहंकार के अतिरिक्त कोई केंद्र नहीं है। यही अहंकार ईश्वर जीतने भी चल पड़ता है। मोक्ष को पाने भी चल पड़ता है। स्वर्ग भी जाता है। धन भी पाता है। पुण्य भी कमाना चाहता है। यह अहंकार सब कुछ कर लेना चाहता है।
और स्मरण रहे, अहंकार कमजोरी है, शक्ति नहीं। इसलिए अहंकार कुछ भी नहीं कर पाता है सिवाय इसके कि उसकी सारी दौड़ मृत्यु में ले जाती है और कहीं नहीं। जीवन भर दौड़ कर अहंकार की अंतिम परिणति, अंतिम फल, अंतिम निष्कर्ष मृत्यु होता है। लेकिन हम इसे रोज देखते हैं, शायद आंखें हमारी बंद हैं। शायद यह दिखाई नहीं पड़ता कि अहंकार आखिर में कहां गिर जाता है: कब्र में! रोज कब्र बनती है, रोज कोई गिरता है हमारे पड़ोस में चलता हुआ, और हम नहीं देख पाते कि उसकी दौड़ उसे कहां ले गई है।
सिकंदर आता था हिंदुस्तान की यात्रा पर। रास्ते में एक फकीर से मिलने चला गया। एक फकीर था डायोजनीज। एक झाड़ के पास सुबह की धूप में उसकी मुलाकात हुई। सिकंदर ने खबर भिजवाई नंगी तलवारों के सैनिकों के हाथ कि मैं आता हूं महान सिकंदर; अलेक्जेंडर दि ग्रेट। डायोजनीज खूब हंसने लगा, खूब हंसने लगा और कहने लगा, जाओ कह देना महान सिकंदर से कि जो अपने को महान कहता है, वह पागल है। सिकंदर को तो कल्पना भी न थी कि ऐसा संदेश वापस लौटेगा। लेकिन उसका दिल भी बेचैन हो उठा उस आदमी से मिलने को। जिसके पास कुछ भी नहीं है, जो नंगा एक झाड़ के नीचे पड़ा है और सिकंदर से कहलवा सकता है कि जो महान अपने को समझता है, वह पागल! यह पागलपन की शुरुआत है। सिकंदर को कहना कि कहीं और बढ़ गया तो फिर इलाज मुश्किल हो जाएगा। सिकंदर उससे मिलने गया, सिकंदर ने कहा कि मैं खुश हूं एक हिम्मतवर आदमी से मिल कर। मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं बोलो, मैं तुम्हारे लिए कुछ करना चाहता हूं। डायोजनीज हंसने लगा, उसने कहा, तेरा मैं नहीं छूटता। तू मेरे लिए कुछ करना चाहता है। तू अपने लिए ही कुछ कर ले तो बहुत है। और रही मेरी बात, मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। करने का कोई सवाल नहीं है, इतनी ही कृपा कर कि थोड़ा धूप छोड़ कर खड़ा हो जा--वह नंगा धूप ले रहा था, सुबह की सर्द हवाएं थीं--जरा थोड़ा धूप छोड़ कर खड़े हो जाएं, इतना ही बहुत है।
और स्मरण रखें कि आपके हाथ में तलवार है, खतरा है आप किसी की भी धूप छीन सकते हैं। इतना ही खयाल रखें कि किसी की धूप आपसे न छिने तो आपने बड़ी कृपा की, और बड़ी कृपा की कोई जरूरत नहीं। सिकंदर ने कहा कि अभी तो मैं एक लंबी यात्रा पर जा रहा हूं, ज्यादा देर नहीं रुक सकूंगा, लेकिन लौट कर आया तो तुम्हारे पास बैठ कर समझने की कोशिश करूंगा। डायोजनीज ने कहा कि जिस यात्रा पर तुम जा रहे हो, उससे लौट कर कोई कभी नहीं आता है। अहंकार की यात्रा से कौन कब लौट कर आता है। डायोजनीज ने कहा, रुक जाओ तो रुक सकते हो, लौट कर नहीं आ सकते। क्योंकि अगर अभी नहीं दिखाई पड़ रहा कि गलत जा रहे हो, तो कल और मुश्किल होगा देखना, परसों और मुश्किल होगा। रोज गलती में जितने जाओगे उतना मुश्किल होगा देखना। बच्चे लौट भी सकते हैं बूढ़ों को लौटना बहुत मुश्किल हो जाता है। फिर सारा रास्ता पार करना लौटने का।
लेकिन बूढ़े बहुत होशियार हैं, वे जिस बीमारी मैं खुद जीवन भर जीते हैं, बच्चों को भी उसी में दीक्षा देते हैं। बचपन से ही उनको भी दीक्षा अहंकार की दी जाती है। ये सारे स्कूल, और ये सारे विश्वविद्यालय और सारे विद्यापीठ, अहंकार की शिक्षा के केंद्रों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। वहां सिखाई जा रही है एंबीशन, वहां सिखाया जा रहा है ईगो, वहां सिखाया जा रहा है मैच। पहली कक्षा के बच्चों को भी हम कहते हैं, प्रथम नंबर आना, पहले नंबर आना। कि एक छोटा सा निर्दोष बच्चा, उसके भीतर जहर का बीज बो दिया गया, पहले नंबर आना। हो गया पागलपन का प्रारंभ, बीमारी के रोग डाल दिए गए। पहले नंबर आना।
पहले नंबर की बीमारी अहंकार की बीमारी है। डायोजनीज ने कहा सिकंदर को, काहे के लिए इतनी दौड़-धूप करते हो? किसलिए दौड़ते हो? काहे की यात्रा? क्या पाना चाहते हो? क्या जीतना चाहते हो? क्या है अंतिम इच्छा?
सिकंदर ने कहा, अंतिम! अभी फिलहाल तो एशिया माइनर जीतूंगा, उसके बाद हिंदुस्तान, उसके बाद सारी दुनिया।
डायोजनीज ने पूछा, और उसके बाद? सिकंदर एकदम उदास हो गया। क्योंकि उसके बाद कोई दुनिया जीतने को बचती नहीं थी। वह उदास खड़ा रह गया। सिकंदर ने कहा, दूसरी दुनिया कोई भी नहीं है, इसलिए मन बड़ा उदास होता है। जब इसको जीत लूंगा तो फिर, फिर सिकंदर ने कहा कि फिर मैं आराम करूंगा, फिर विश्राम करूंगा, शांति से जीऊंगा।
डायोजनीज हंसने लगा, उसने कहा, पागल हो गए हो, मैं अभी आराम से जी रहा हूं, विश्राम कर रहा हूं, तुम भी आ जाओ, झोपड़ा काफी बड़ा है, हम दोनों इसमें रह लेंगे। तुम भी विश्राम करो, अगर विश्राम ही करना है आखिर में तो अभी क्या बुरा है। विश्राम शुरू कर सकते हो, इतने दिन खराब करने की जरूरत क्या है। क्योंकि जो तुम दौड़ कर रहे हो उससे विश्राम का कोई भी संबंध नहीं, उससे शांति को कोई भी नाता नहीं। अहंकार की दौड़ शांति में कैसे ले जा सकती है? अहंकार की दौड़ आनंद में कैसे ले जा सकती है? अहंकार की दौड़ आत्मा में कैसे ले जा सकती है? दौड़ उलटी है। आत्मा दूसरी दिशा में है, आनंद दूसरी दिशा में है, शांति दूसरी दिशा में है। लेकिन हम तो छोटे बच्चे में भी जहर डालते हैं। पहले नंबर! अधर्म की शुरुआत हो गई। पहले आ जाना, सबको पीछे छोड़ देना।
जीसस क्राइस्ट कहते थे, धन्य हैं वे लोग जो अंतिम खड़े होने में समर्थ हैं। और हम सिखाते हैं, धन्य हैं वे लोग हैं जो प्रथम खड़े होने में समर्थ हैं। अगर यह सारी दुनिया पागल हो गई है तो आश्चर्य नहीं है। यह प्रथम होने की दौड़ का परिणाम है। मनुष्य जब भी किसी दूसरे के आगे होना चाहता है, तभी वह गलत दिशा में चल पड़ा। चल पड़ा वह गलत दिशा में, अब उसके जीवन में कभी चैन न होगा, कभी शांति न होगी, कभी आराम न होगा। क्योंकि ऐसा कभी भी नहीं हो सकता कि वह सबके आगे हो जाए। आदमियत एक गोल चक्कर में खड़ी है। आप एक से आगे निकलेंगे, पाएंगे आगे कोई दूसरा फिर मौजूद है। दूसरे से निकलेंगे, पाएंगे तीसरा मौजूद है। आज तक दुनिया में किसी आदमी ने यह कहा कि मैं सबसे आगे पहुंच गया, अब मेरे आगे कोई भी नहीं, सब पीछे हैं। आज तक कोई आदमी यह नहीं कह सका।
जैसे एक गोल घेरे में बच्चे दौड़ रहे हों, कितना ही दौड़ कर आगे होते हैं, फिर भी पाते हैं कि कोई आगे है, फिर भी पाते हैं कि कोई आगे है, फिर भी पाते हैं कि कोई आगे है। एक सर्कुलर दौड़ है अहंकार की, वहां कोई कभी आगे नहीं हो पाता। लेकिन आगे होने की व्यर्थ दौड़ में नष्ट जरूर हो जाता है। इसलिए अहंकार ले जाता है मृत्यु में।
धर्म अहंकार की यात्रा नहीं; आत्मा की यात्रा है। और अहंकार की व्यर्थता को जो समझता है, देखता है, वही, केवल वही आत्मा की यात्रा पर गतिमान हो पाता है। लेकिन हमारा सारा संस्कार, सारी संस्कृति, आज तक की मनुष्यता को सिखाई गई सारी बातें, घूम-फिर कर उसका मैं कैसे और बड़ा हो जाए, कैसे और आगे हो जाए, कैसे और राज सिंहासनों पर विराजमान हो जाए, बस। और दिखाई नहीं पड़ता कि मैं किसी भूल में होऊंगा, क्योंकि पड़ोसी भी उसी भूल में है, उसके बाद वाला आदमी भी उसी भूल में है, जहां सारे लोग एक ही भूल में हों, वहां दिखाई पड़ना मुश्किल हो जाता है। हम सारे लोग एक ही बीमारी में पड़ जाएं, तो पता चलना मुश्किल है कि हम किस बीमारी में हैं।
मैंने सुना है, एक छोटे से द्वीप पर सारे लोग अंधे थे। कभी-कभी भूल से कोई आंख वाला बच्चा पैदा हो जाता था। जैसे हमारे यहां भूल से कभी-कभी अंधे पैदा हो जाते हैं। आंख वाला बच्चा पैदा हो जाता तो अंधों के उस नगर के सर्जन, डाक्टर जल्दी से उसकी आंख का आपरेशन कर देते। क्योंकि वे सोचते, यह बच्चा बीमार पैदा हुआ है। सबके पास आंखें नहीं हैं, इसके पास ये क्या गड़बड़ चीजें निकल आई हैं। वे उसकी आंख का आपरेशन करके बड़े निश्चिंत हो जाते, मां-बाप बैंड-बाजा बजाते और बताशे बांटते और हरी झंडियां लटकाते घर के सामने कि बच्चे की बीमारी से छुटकारा हो गया। सब अंधे थे, तो आंख वाला बीमार मालूम पड़ता था।
जीसस क्राइस्ट बीमार मालूम पड़ते हैं। क्योंकि उनके मुल्क के सारे लोग अंधे हैं। वह आंख वाला आदमी। सूली पर लटका देते, आपरेशन कर देते उसका, इसका छुटकारा कर दो। गांधी पागल मालूम पड़ते हैं हमको। हम सब होशियार हैं। गांधी पागल। गोली मार दो इसको। सुकरात पागल पड़ता है मालूम हमको। क्योंकि एथेंस के सारे लोग समझदार हैं, ज्ञानी हैं। सुकरात गड़बड़ है। जहर पिला दो इसको।
जब भी आदमियत के बीच अहंकार से हीन कोई आदमी पैदा होगा तो हम उसकी हत्या कर देते हैं। क्योंकि हम सारे अहंकार की बीमारी से पीड़ित लोग, हमें यह समझ में नहीं आता कि हम पागल हैं, हम पीड़ित हैं। लेकिन समझने के लिए बहुत कठिनाई नहीं है। सुकरात आनंद से भरा है। जीसस क्राइस्ट सूली पर भी प्रसन्न हैं। मंसूर के हाथ-पैर काटे जा रहे हैं और वह हंस रहा है। और हम, हमारे हाथ-पैर नहीं काटे जा रहे हैं और हम रो रहे हैं। और हम सूली पर नहीं चढ़े हैं, हम राज-सिंहासनों पर बैठे हैं और हम ज़ार-ज़ार रो रहे हैं। और हमें कोई जहर नहीं पिला रहा है, न कोई हमें गोली मार रहा है, लेकिन हम चौबीस घंटा जहर पी रहे हैं और गोली खा रहे हैं।
हम पागल! पागलपन का लक्षण यह है कि जीवन का सारा परिणाम दुख निकलता हो तो हम पागल हैं। जीवन का परिणाम चिंता निकलता हो तो हम पागल हैं। जीवन का अंतिम परिणाम मौत आती हो तो हम पागल हैं। स्वस्थ चित्त कहीं और पहुंचेगा। मृत्यु पर नहीं; अमृत पर। फल बताते हैं कि बीज कैसा था। फल क्या बताते हैं? हमारी जिंदगी के फल क्या बताते हैं? हमारी जिंदगी के फल बताते हैं कि बीज कहीं गड़बड़ है। लेकिन सबका बीज गड़बड़ है तो पता नहीं चलता, दिखाई नहीं पड़ता।
एक गांव में एक बार बड़ी दुर्घटना हो गई थी। एक जादूगर आ गया और उसने एक कुएं में गांव के एक पुड़िया डाल दी और सारे गांव में चिल्ला कर कहता गया कि उस कुएं का पानी जो भी पीएगा वह पागल हो जाएगा। लेकिन गांव में एक ही कुआं था। एक कुआं और था, लेकिन वह गांव का नहीं था, वह राजा के महल का कुआं था। गांव के लोग सांझ तक किसी तरह प्यास से अपने को रोके रहे। राजा के कुएं से तो गांव के लोगों को पानी नहीं मिल सकता था। राजा की प्यास अलग, राजा का पानी अलग। आम आदमी की प्यास अलग, आम आदमी का पानी अलग। कहां राजा का कुआं, कहां आम आदमी। उस कुएं पर तो जाने का तो कोई सवाल नहीं था। फिर आखिर में उन्हें सांझ होतेऱ्होते गांव के कुएं पर ही जाना पड़ा। प्यास को तो नहीं रोका जा सकता था, पागलपन भला स्वीकार करना पड़े। सांझ होतेऱ्होते सारे गांव ने पानी पी लिया। और अगर वे दिन में पानी पीते रहते तो थोड़ा-थोड़ा पीते। दिन भर पानी नहीं पीया था तो सांझ एकदम से पी गए। और सांझ होते, सूरज ढलते-ढलते पूरा गांव पागल हो गया। राजा बड़ा प्रसन्न है, रानियां बड़ी खुश हैं, वजीर नाच रहे हैं कि हम बच गए। लेकिन उन्हें पता नहीं कि भाग्य कुछ और खेल खेल रहा है।
सांझ होतेऱ्होते महल में उदासी छा गई। सारे गांव में खबर फैल गई कि मालूम होता है राजा और रानी और वजीरों का दिमाग खराब हो गया। सारा गांव हो गया था पागल। राजा अजीब मालूम होने लगा। रानियां अजीब मालूम होने लगीं। वजीर अजीब बातें करते हुए दिखाई पड़ने लगे। राजा के पहरेदार भी पागल हो गए, सैनिक भी पागल हो गए। राजा के रक्षक भी पागल हो गए। वे सब हंसऱ्हंस कर देखने लगे कि मालूम होता है राजा का दिमाग खराब हो गया। सारे गांव में जगह-जगह लोग झुंड लगा कर खड़े हो गए और हंसी-मजाक करने लगे कि पता है, राजा का दिमाग खराब हो गया है। राजा तक खबर पहुंची, राजा घबड़ाया। रक्षा का कोई उपाय न था, पूरी बस्ती पागल थी। धीरे-धीरे बस्ती राजा के महल के सामने इकट्ठी हो गई और लोग चिल्लाने लगे कि पागल राजा को हम सिंहासन से नीचे उतारेंगे। हम तो ठीक आदमी को सिंहासन पर बिठाएंगे। उतारो राजा को नीचे! दरवाजे खोलो! राजा ने वजीर से पूछा, अब क्या होगा? वजीर ने कहा, एक ही रास्ता है कि हम भी उसी कुएं का पानी पी लें। राजा भागा महल के पीछे के दरवाजों से।
महल में पीछे के दरवाजे हमेशा होते हैं। जितना बड़ा महल, उतने पीछे के दरवाजे ज्यादा। गरीब की झोपड़ी में सामने का ही दरवाजा होता है, क्योंकि पीछे के दरवाजों की महल में बड़ी जरूरत होती है, वक्त-बेवक्त उनसे जाना भी पड़ता और निकलना भी पड़ता।
भागे राजा और वजीर और रानियां पीछे के दरवाजे से। कुएं पर जाकर उन्होंने पानी पी लिया। उस रात गांव में बड़ा जलसा हुआ। लोगों ने उत्सव मनाया, लोग नाचे और गीत गाए, और लोगों ने भगवान को धन्यवाद दिया कि हमारे राजा का दिमाग ठीक हो गया।
हम सब, यह पूरी हमारी मनुष्य की जाति इसी दशा में है। हम सब पागल हैं। हम सब बिलकुल पागल हैं। बच्चे पागल नहीं पैदा होते हैं, लेकिन हम सब जाकर अपने ज्ञान के कुओं का पानी उनको पिलवा देते हैं। जब तक बच्चों में थोड़ी समझ होती है, वे कई बातों को इनकार करते हैं। लेकिन हम उनको डांटते हैं कि तुम गैर-अनुभवी हो। बच्चे हमारी सब बेवकूफियों को इनकार करते हैं। लेकिन बूढ़ों की संख्या बहुत, बल उनका ज्यादा, समाज उनका। बच्चों को ठोंक-पीट कर हम वापस अपने कुएं का पानी पिला देते हैं। बड़े होतेऱ्होते वे हमारी जगह आ जाते हैं। और अपने बच्चों के साथ वे भी वही करने लगते हैं, जो हमने उनके साथ किया था। ऐसे दुनिया के यह दुर्भाग्य की कथा आगे बढ़ती चली जाती है। बच्चों के पास अहंकार नहीं होता, अहंकार हम सिखाते हैं। अहंकार हम ठोंक-ठोंक कर, पीट-पीट कर उनके भीतर पैदा करते हैं। हम उन्हें कांशस बनाते हैं, हम उन्हें चेतन बनाते हैं कि वे अपने अहंकार के प्रति सजग हो जाएं, अहंकार उनका चोट खाने लगे, अहंकार से वे पीड़ित हो जाएं।
एक दफा बच्चा अहंकार से पीड़ित हो गया, फिर हम उसे दुनिया की दौड़ में लगा सकते हैं। अगर वह अहंकार से पीड़ित न हो तो दौड़ में डालना बहुत कठिन है। हम उनसे कहें कि दिल्ली जाओ। वह कहेगा, काहे के दिल्ली जाएं, हम अपने गांव में मजे में हैं। अगर अहंकार होगा तो वह कहेगा, हां, जरूर दिल्ली जाएंगे। दिल्ली चलो! हमको दिल्ली जाना है। फिर उसको गांव में चैन नहीं; उसको दिल्ली जाना है। दिल्ली जाए बिना उसको चैन नहीं मिल सकता। दिल्ली पहुंच जाए तो भी कोई मामला खतम नहीं होता, दिल्ली के आगे और दिल्ली हैं, और दिल्ली के आगे और दिल्ली हैं।
यह जहर हम दीक्षित करते हैं, सिखाते हैं, पकड़ाते हैं, भय देते हैं, लोभ देते हैं। भय और लोभ के बीच में अहंकार को खड़ा करते हैं, अहंकार को खड़ा करने के लिए भय और लोभ, दोनों की कीमिया, दोनों के केमिस्ट्री का काम लाते हैं।
पीटते हैं बच्चों को, डराते हैं, उससे कहते हैं अगर प्रथम नहीं आए तो अपमानित हो जाओगे, पीटोगे, डांटे जाओगे, सम्मान खो दोगे। अहंकार तृप्त करो, आगे आ जाओ, प्रथम आ जाओ तो सम्मान देंगे, आगे बढ़ाएंगे, इज्जत होगी, आदर होगा। लोभ देते हैं, यहां से लेकर स्वर्ग तक का लोभ देते हैं कि ऐसा करो तो स्वर्ग मिलेगा, ऐसा करोगे तो नरक जाओगे। और दोनों के बीच उसके भीतर खड़ा करते हैं। कोई चीज क्रिस्टलाइज करते हैं कि कोई चीज भीतर मजबूत होती चली जाए। वह अहंकार से पीड़ित हो उठे। और एक बार वह पीड़ित हो गया--दौड़ शुरू हो गई, बीमारी पकड़ गई, उसे जीवन के अंत तक पता भी नहीं चलता कि वह किस बीमारी में, किस फीवर में, किस बुखार में दौड़ा चला जा रहा है। किस सन्निपात में दौड़ा चला जा रहा है।
इस सन्निपात के विद्रोह में हो जाना ही धार्मिक आदमी का लक्षण है। रिलीजस माइंड। धार्मिक चित्त पैदा होता है इस महत्वाकांक्षी, एंबीशस, ईगोइस्ट, अहंकारी चित्त के विद्रोह में। जीवन की सारी शिक्षा, समाज की सारी शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता के सब दावे, जब कोई आदमी इस कसौटी पर कसता है कि उनसे कहीं मेरा अहंकार तो नहीं बढ़ता, अगर बढ़ता है तो उन सारे दावों को मैं छोड़ता हूं और अपने अहंकार को भी विदा देता हूं। मैं निर-अहंकार खड़े होकर देखूं, सहज और सरल--जैसा मैं हूं। किसी से दौड़ में नहीं, किसी से आगे जाने के लिए नहीं; वहां जाने के लिए--जो मैं हूं। वहां उतर जाने के लिए जो मेरा स्वरूप है। किसी से प्रतिस्पर्धा में नहीं; बल्कि अपने भीतर स्वयं में। किसी के साथ दौड़ में नहीं; अपनी गहराई में।
अहंकार ले जाता है दौड़ में, दौड़ ले जाती है उथलेपन में। निर-अहंकार ले जाता है गहराई में, गहराई ले जाती है स्वयं में।
जब मैं किसी दूसरे के बाबत विचार छोड़ देता हूं और खयाल करता हूं कि मैं क्या हूं? कौन हूं? कहां हूं?--तो उतरता हूं नाम के नीचे, उतरता हूं धन के नीचे, उतरता हूं यश के नीचे, उतरता हूं पद के नीचे। पहुंचता हूं वहां, जहां मेरा आथेंटिक बीइंग है, जहां मेरी आत्मा है, जहां मेरे प्राण हैं। लेकिन उस तक पहुंचने के लिए अहंकार की सतह छोड़ देनी होगी।
सागर में डूबना है किसी को गहराइयों में, तो सागर की सतह को छोड़ देना होगा। अहंकार सतह है मनुष्य के व्यक्तित्व की और केंद्र है आत्मा। सतह पर ही हम डोलते रह जाते हैं, समुद्र के लहरों में ही खेलते रह जाते हैं, भीतर की गहराइयों का हमें पता ही नहीं चल पाता। समुद्र की सतह पर तूफान आते हैं, आंधियां आती हैं, नावें डूबती हैं, टकराती हैं। समुद्र की गहराइयों में न कोई तूफान है, न कोई आंधियां हैं, न कोई डूबता है, न कोई उतर आता है। समुद्र की गहराइयों में विराट शून्य है, वहां विराट मौन है, वहां शांति है। हवाएं तो दूर सूरज की किरणें भी वहां पहुंच कर उथल-पुथल नहीं कर पाती हैं। वहां सब शांत है। उस गहराई में पता भी नहीं है कि किसी तल पर लहरें उठ रहीं और आंधियां बह रही हैं।
जिस व्यक्ति को शांति जाननी हो उसे अहंकार की सतह छोड़ कर आत्मा की गहराइयों में जाना होगा। गहराइयों में जाते ही तूफान बंद हो जाएंगे, आंधियां विलीन हो जाएंगी। गहराइयों में जाते ही पता चलेगा--न कोई दुख है, न कोई चिंता है, न कोई पीड़ा है। गहराइयों में जाते ही पता चलेगा--न कोई मृत्यु है, न कोई अंत है। गहराइयां शाश्वत अनंत में प्रतिष्ठित हैं। वहां कभी कुछ बना नहीं, कभी कुछ मिटा नहीं। सब मिटने और बनने का खेल सतह पर है। और सतह मनुष्य का अहंकार है, और हम इसी को सजाते और संवारते और व्यवस्था देते रहते हैं।
सिखाते हैं पहले दिन से ही झूठ, आदमी की जिंदगी में सबसे बड़ा कोई झूठ है, सबसे बड़ा असत्य--तो एक कि मैं, और इसको सिखाते हैं। लेकिन झूठ भी अगर बार-बार दोहराए जाएं, भय के साथ दोहराए जाएं, लोभ के साथ दोहराए जाएं, सारी दुनिया दोहराए तो वे असत्य भी धीरे-धीरे सत्य मालूम होने लगते हैं।
एक सम्राट के दरबार में एक घटना घटी उसे कह कर मैं अपनी बात पूरी करूं।
एक सम्राट के दरबार में एक आदमी आया एक सुबह और उसने आकर कहा, तुमने सारी दुनिया जीत ली, तुम्हारे नाम की ध्वजाएं लोक-लोकांतर में फहराने लगीं, पर्वतों के शिखरों पर तुम्हारा नाम है, सागरों की लहरों पर तुम्हारा नाम है, सूरज की किरणों पर तुम्हारा नाम है। जहां जाता हूं वहां हवाएं तुम्हारे नाम का गीत गाती हैं और वादियां तुम्हारे नाम की धुन बजाती हैं। लेकिन एक कमी रह गई है वह मैं पूरी कर सकता हूं।
राजा ने कहा, कौन सी कमी? कैसे पूरी करोगे? क्या है कमी मेरे पास?--सब है।
उसने कहा, सब है, लेकिन एक चीज तुम्हारे पास नहीं; देवताओं के वस्त्र तुम्हारे पास नहीं हैं। मैं तुम्हारे लिए देवताओं के वस्त्र ला सकता हूं।
सम्राट ने कहा, देवताओं के वस्त्र! ये तो कभी सुने भी नहीं गए! ये कहां बनते हैं?
स्वर्ग में बनते हैं, इंद्र से ही मांग कर लाने पड़ेंगे। लेकिन मैं ला सकता हूं। मेरे नाते-रिश्ते हैं, मेरी कुछ पहचान है।
राजा ने कहा, क्या खर्च होगा?
उस व्यक्ति ने कहा, ज्यादा नहीं, लेकिन एक करोड़ तो खर्च हो ही जाए। क्योंकि आदमियों की समझदारी देख कर देवता भी रिश्वत लेने लगे हैं। आखिर आदमी से पीछे कब तक रहें। आदमी प्रोग्रेसिव, प्रोग्रेसिव होता चला जाता है, प्रगतिशील-प्रगतिशील, देवता कब तक पिछड़े रहें। वे भी रिश्वत लेने लगे। फिर देवता छोटी-मोटी रिश्वत से, पांच रुपये के नोट से काम नहीं चलता वहां। सीधा एक करोड़।
राजा ने कहा, बात तो ठीक कहते हो, देवता रिश्वत लेंगे तो एक करोड़ की लेंगे। छोटे-मोटे गांव का तहसीलदार रिश्वत लेता है पांच रुपये की। गवर्नर लेगा तो जरा बड़ी लेगा। और राष्ट्रपति लेंगे तो फिर बहुत बड़ी लेंगे। फिर देवता लेते हैं तब तो मामला ही दूसरा है। जरूर-जरूर हो सकेगा, लेकिन धोखा तो नहीं देना चाहते हो।
उस आदमी ने कहा, धोखे का सवाल नहीं, छह महीने के बाद फलां तारीख को वस्त्र लाकर रख दूंगा। मैं जिस महल में ठहरा हूं, वहां आप पहरा लगवा दें। क्योंकि बाहर के रास्तों का मुझे उपयोग नहीं करना है। देवताओं तक जाने के तो अंदरूनी रास्ते हैं। बाहर पहरा लगा दें, मैं महल के भीतर रहूंगा, धोखा देने का सवाल नहीं। करोड़ रुपये पहुंचा दें।
रुपये पहुंचा दिए गए। नंगी तलवारों का पहरा बिठा दिया गया। छह महीने बीते आतुरता बढ़ती गई। देश के कोने-कोने में खबर पहुंच गई कि देवताओं के वस्त्र पहली बार पृथ्वी पर उतर रहे हैं। दरबारी संदिग्ध थे। वजीर संदिग्ध थे। राजा भी संदिग्ध था। लेकिन धोखे की कोई गुंजाइश भी तो नहीं थी, आदमी भाग नहीं सकता था, वह भीतर बंद था।
क्या हो रहा था उस महल के अंधेरे में किसी को पता नहीं, वह आदमी क्या कर रहा था वहां, किसी को कुछ पता नहीं। द्वार बंद। छह महीने पूरे हुए, वह आदमी बाहर निकला एक सोने की पेटी लेकर, बहुमूल्य पेटी थी, हीरे-जवाहरात जड़े थे। उस पेटी को लेकर वह राजमहल की तरफ चला, नंगी तलवारें उस पर पहरा देती चलीं। अब तो धोखे का कोई कारण नहीं था वह वस्त्र ले आया।
वह आदमी जरूर वस्त्र ले आया था, वह साधारण धोखेबाज न था, वह वस्त्र ले आया था।
वस्त्र लेकर दरबार में पहुंचा, महल पर भीड़ है, दूर-दूर के नरेश आए हैं, दरबार ऐसा सजा है जैसा कभी न सजा होगा। राजा सिंहासन पर बैठा है। उसने जाकर पेटी रखी, उसने ताला खोला, उसने कहा, अब तो आपको विश्वास आ गया कि मैं वस्त्र ले आया।
राजा ने कहा कि निश्चित, मैं भूल में था कि मैंने तुम पर शक किया। निकालो वस्त्र, मैं आतुर हूं उन वस्त्रों को पहनने के लिए।
उस आदमी ने पेटी खोली, हाथ भीतर डाला, बाहर निकाला, हाथ बिलकुल खाली था। उसने राजा से कहा, यह सम्हालिए पगड़ी, लेकिन इंद्र ने कहा है, जो अपने बाप से पैदा हुआ होगा उसको ही यह पगड़ी दिखाई पड़ेगी। राजा ने देखा हाथ खाली है, लेकिन राजा को फौरन पगड़ी दिखाई पड़ने लगी। उसने कहा, अरे इतनी सुंदर पगड़ी, कभी देखी नहीं। दरबारियों ने देखा हाथ खाली है, लेकिन सब दरबारियों को पगड़ी एकदम दिखाई पड़ने लगी। सब दरबारी आगे बढ़-बढ़ कर पगड़ी को झांक-झांक कर देखने लगे। हाथ खाली है, वहां कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन जब सब कह रहे हैं कि पगड़ी है, तो कौन पागल बीच में कहे कि पगड़ी मुझे बीच में दिखाई नहीं पड़ती। और कहीं कोई यह न समझे कि मैं चुप खड़ा हूं, शायद मुझे न दिखाई पड़ती हो, तो हरेक जोर-जोर से बातें करना लगा, जोर-जोर से कहने लगा, कहना लगा, आह ऐसी पगड़ी कभी देखी नहीं, अदभुत है, अदभुत है, अलौकिक है, स्वर्ग की है, इंद्र की है। पहली दफे पृथ्वी पर उतरी है, धन्य हुए हम कि हमें दर्शन हुआ इसका और चौंक-चौंक कर चारों तरफ देख रहा है। लेकिन सभी प्रशंसा कर रहे हैं। सोचता है मैं ही भूल में हूं, सभी ठीक होंगे। लोकतंत्र है, सभी ठीक होते हैं। एक आदमी भूल में होता है।
राजा ने पगड़ी पहन ली, उसकी असली पगड़ी निकाल कर उस आदमी ने पेटी के भीतर डाल दी। उघाड़ा हो गया, लेकिन पगड़ी तक गनीमत होती तो बात थी, बातें रुकती नहीं जब बढ़ती हैं, झूठ जब आगे बढ़ता है तो पूरी यात्रा पूरी होती है।
उसने फिर कोट निकाला और राजा से कहा, निकाल दें अपना कोट, कहां का यह कचरा कोट पहने हुए, यह कोट पहने देवताओं का। हाथ खाली है, कोट निकल गया, कमीज निकल गया, धोती निकल गई। अब आखिरी वस्त्र रह गया और राजा घबड़ाने लगा कि अब तो यह नग्न होने की नौबत आ गई, लेकिन झूठ जब चलता है तो यात्रा पूरी होती है। जब एक आदमी झूठ की यात्रा पर निकल जाता है तो बीच में रुकना मुश्किल है, अब रुकना और बदतमीजी थी, अब और नासमझी होती। अब और पागलपन होता कि इतनी देर तक क्यों झूठ बोलते थे, अगर दिखाई नहीं पड़ता था। और सारे दरबारी तालियां पीट रहे हैं, महल आनंद से गुंजायमान हो रहा है, बाहर गांव में भी खबर पहुंच गई है, भीड़ इकट्ठी है महल के बाहर, वह भी दर्शन करना चाहती है। फिर आखिरी वस्त्र भी उस आदमी ने ले लिया। राज नग्न खड़ा हो गया। और दरबारी तालियां पीटने लगे कि धन्य है महाराज, आप इतने सुंदर दिखाई पड़ते हैं। महाराज सबको देखते हैं, खुद भी अपने शरीर को देखते हैं और कपड़ों पर हाथ फेरते हैं और प्रशंसा करते हैं कि बहुत सुंदर कपड़े हैं।
एक करोड़ का कोई ज्यादा खर्च नहीं हुआ लेकिन प्राण संकट में पड़े हैं। और फिर वह आदमी कहने लगा कि महाराज बाहर चलिए। आपकी शोभायात्रा, प्रोसेशन निकलना चाहिए...। क्योंकि नगर की जनता आतुर होकर बाहर खड़ी है। पृथ्वी पर पहली बार उतरे हैं देवताओं के वस्त्र, लोग न देखेंगे तो बहुत दुखी होंगे। अब यात्रा पूरी होने लगी। अब राजा बाहर आ गया। सारे नगर में तालियां पीटी जा रही हैं। लोग प्रसन्न हो रहे हैं। हर आदमी बढ़-बढ़ कर प्रशंसा कर रहा है।
सिर्फ मैंने सुना है, एक छोटा सा बच्चा भी एक बाप के कंधे पर उस भीड़ में पहुंच गया था। वह अपने बाप से कहने लगा, पिताजी राजा नंगा है! उसने बाप ने कहा, चुप नासमझ, गैर-अनुभवी तुझे पता नहीं, अनुभव नहीं जीवन का। मैं जानता हूं राजा वस्त्र पहने हुए है। और यह बात दुबारा मुंह से मत निकालना, अगर किसी को पता चल गया तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी, जब तू बड़ा हो जाएगा, तुझको भी वस्त्र दिखाई देने लगेंगे। अभी तू छोटा है, उम्र तेरी कम है। जैसा सभी बाप बेटों को समझाते हैं, ऐसा ही उसने भी अपने बेटे को समझा दिया। वह बेटा चुप हो गया। जहां इतनी भीड़, जहां बाप, जहां सारे ताकतवर लोग, जहां सब बड़े लोग प्रशंसा कर रहे हैं; वह छोटा सा बच्चा समझा, मैं ही गलती में होऊंगा।
बच्चे गलती में नहीं हैं, बूढ़े गलती में हैं। बच्चों को सच्चाइयां दिखाई पड़ जाती हैं, बूढ़ों को नहीं दिखाई पड़तीं। असत्य का लंबा अभ्यास भय के कारण, लोभ के कारण, निरंतर दोहराए गए झूठ की पुनरुक्ति के कारण एक जड़ अभ्यास पैदा हो जाता है और वह जड़ अभ्यास किसी भी असत्य के लिए सत्य बना देता है। और सबसे बड़ा असत्य जो आदमी ने सत्य बना लिया है वह अहंकार है। अहंकार के प्रति विद्रोह--इसलिए मैं धार्मिक आदमी की तीसरी सीढ़ी मानता हूं।
जो अहंकार को छोड़ता है, वह छोड़ते ही प्रभु के मंदिर में प्रविष्ट हो जाता है। जिसे यह खयाल आ जाता है कि मैं कुछ भी नहीं हूं, ना-कुछ हूं, मैं हूं क्या। न मेरा कोई नाम, न मेरा कोई पता, न मेरे जन्म का कोई पता, न मेरी मृत्यु का कोई पता। न मुझे अभी पता है कि मैं कौन हूं। जब मुझे यह भी पता नहीं कि मैं कौन हूं, मैं क्या हूं, तो मैं कैसे घोषणा करूं कि मैं हूं।
जो चुप हो जाता है, घोषणा वापस ले लेता है, जो मौन हो जाता है, जो कह देता है मैं तो जानता भी नहीं कि मैं हूं। कौन हूं? क्या हूं? कहां से आता हूं? कहां जाता हूं? मैं तो निपट ना-कुछ मालूम होता हूं। जिसको इस नॉन-बीइंग का, नो-बडी का, ना-कुछ होने का स्मरण आता है, वह प्रभु के मंदिर का अधिकारी हो जाता है। जो ना-कुछ होकर उसके द्वार पर जाता है वह सब-कुछ होकर वापस लौटता है। जो शून्य होकर उसकी तरफ आंखें उठाता है, उसके जीवन में पूर्ण की किरणें उतर जाती हैं।
वर्षा होती है बरसात में, पहाड़ खाली रह जाते हैं, क्योंकि पहाड़ भरे हुए हैं। गङ्ढे भर जाते हैं पानी से, क्योंकि गङ्ढे खाली हैं। प्रभु की वर्षा प्रतिक्षण हो रही है। जो अहंकार के पहाड़ बने हुए हैं वे उस प्रभु के जल से वंचित रह जाएंगे। और जो निर-अहंकार के गङ्ढे हो जाते हैं खाली, शून्य, ना-कुछ वे उस प्रभु के अमृत जल से भर जाते हैं।
यह अंतिम सूत्र पर ध्यान देना, इस सूत्र को जो समझ लेता है उसके लिए कुछ भी और समझने को शेष नहीं रह जाता है। और फिर जब मृत्यु आपके द्वार पर आएगी, तो आपको मूर्तियों में छिप कर खड़ा नहीं होना पड़ेगा। और जब मृत्यु आपके द्वार पर आएगी और पूछेगी, कौन हैं आप और आप चुप रह जाएंगे, तो मृत्यु आपको ले जाने में असमर्थ हो जाएगी। अमृत के आप अधिकारी हो जाते हैं।
धन्य हैं वे लोग, जो अहंकार से छूटते और परमात्मा को पा लेते हैं। अभागे हैं वे लोग जो परमात्मा को खोते और एक व्यर्थ पानी की लकीर को खींचते में जीवन गंवा देते हैं।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उससे बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें।