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बुधवार, 18 मार्च 2026

24-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-24

(सदमा - उपन्यास)

पेंटल—ने कहना शुरू किया की जो मैं कह रहा हूं उस के लिए अगर मुझ से कुछ गलत हो जाये तो केवल मेरे दोस्त के प्रति मेरा मोह समझ कर माफ करना होगा। तब मैं आप से आगे निवेदन कर सकता हूं—नेहा लता ने हां में गर्दन हिलाई। तब फिर पेंटल ने कहना शुरू किया पहले तो आपका संग साथ चाहिए मेरे दोस्त को। जो थोड़ा आपके लिए और आपके परिवार के लिए कठिन होगा। आप जवान हो और मेरा दोस्त चाहे बीमार है परंतु है तो जवान फिर दूसरा आपका उससे रिश्ता-नाता ही क्या है। अगर आप किसी तरह से अपने माता-पिता को मना भी लो तो इस बात के लिए फिर समाज में भी एक अड़चन है। अब मैं और क्या कह सकता हूं।

परंतु वैद्य ने आपके दोस्त की बीमारी के विषय में भी विस्तार से चर्चा हुई थी। तब वह क्या कह रहे थे। वे कह रहे थे कि क्या आपको लगता है कि वह लड़की (नेहालता) मेरी दवाई के कारण ठीक हुई है। देखने में ये सच लगता है। परंतु ये संपूर्ण सत्य नहीं है। ये तो ऊँट को बैठने के लिए तिनके का सहारा मात्र था। उसे तो बैठना ही था आज नहीं बैठता तो एक महीने बाद बैठ जाता। परंतु इसका असली कारण है प्रेम, विश्वास और अपनापन। वह जो आप और मेरे दोस्त के बीच घटा। वहीं से बीमारी का अंत शुरू हो गया। आप को एक विश्वास एक प्रेम एक व्यक्ति पर भरोसा हो गया। आपने अपने को उस व्यक्ति पर संपूर्णता से छोड़ दिया। आपने अंजाने में अपने ह्रदय के द्वारा खोल दिया और उर्जा ने अपना काम शुरू कर दिया। जैसे इसका इलाज या तो ध्यान था या प्रेम है दोनो के एक ही रूप। खेर जो हुआ वह अति सुंदर था।

नेहालता—परंतु आपके दोस्त यानि सोम प्रकाश की अचानक इस तरह से ऐसी हालत कैसे हो गई? इस विषय में जब आप अपने दोस्त को उसे वैद्य जी के पास लेकर गए तो उन्होंने आपको क्या कहा।

पेंटल—हां ये बात बहुत महत्व पूर्ण है। मेरे दोस्त की इस हालत का जिम्मेवार वह खूद ही है। वह अचानक इस गहरे में डूब गया की चाह कर भी खूद उससे बाहर नहीं निकल सकता। पहले तो उसके चेतन में अपराध भाव, दूसरा एक पुलिस का भय। एक नेक गलत कार्य करते हुए भी वह एक अपराधी था। मानो आप ठीक न होती तो क्या आपके माता पिता उसे माफ कर देते। शायद नहीं। वह तो आपको उसी हालत में ढूंढते हुए आये थे। उन्हें तो वही ‘’नेहालता’’ चाहिए वह तो ‘’रेशमी’’ को जानते तक नहीं थे। परंतु जब आप ठीक हो गई तो अब आप रेशमीन रह कर केवल ‘’नेहालता’’ रह गई थी। आप एक दम से ठीक हो गई थी तब आपकी वो पुरानी यादे सब अचेतन में दबी रह गई। आपका चेतन में क्रियाशील हो गया। तब तुम मेरे दोस्त को मिली तो आप दूसरी ही नेहालता थी। जिस की उस मेरे दोस्त ने कभी कल्पना तक नहीं की थी। इसलिए स्टेशन पर पागलों की जो हरकत कर रहा था उसी सब से वह घर में भी आपका दिल बहलता रहता था। आप उसे कभी घोड़ा कभी बंदर बना कर नचाती थी। उसने सोचा की आप को कैसे याद दिलाऊं की मैं कौन हूं, सो वह ये हरकत करने लगा। एक तो तनाव दूसरा वह बहुत जोर से एक खंबे से टकरा कर बेहोश हो गया जिससे उसके मस्तिष्क के अंदर गहरी चोट लगी। इसलिए उनका मन चेतन तल पर सब भूल गया। अब प्रकृति के रहस्य को कौन जान सकता है इसमें क्या छिपा है। आपकी ये हालत देख कर फिर वैद्य जी ने भी सकारात्मक बात कही थी। फिर मेरे दोस्त के विषय में भी यहीं कहां कि उसे उसी संग साथ की जरूरत चाहिए जिसे वह चेतन अचेतन में सबसे गहरा चाहता है। कई बार हमारा चेतन मन जब सो जाता है तो हम सामने अपने चिंहित व्यक्ति या वस्तु को भी भूल जाते है। क्योंकि अचेतन तो उसे जानता ही नहीं। फिर हम मन के तल पर धीरे-धीरे सब घटनाएं अंकित होती चली जाती है। ये सब होता है प्रेम के कारण विश्वास के कारण। तब कोई अपने को सामने वाले के लिए पूर्ण छोड़ दे।

नेहालता—आप बहुत ही सही कह रहे है। अगर मेरी बीमारी ठीक नहीं होती तो वह व्यक्ति नाहक अपराधी घोषित हो जाता। परंतु ये तो सब सकारात्मक मार्ग है। आगे के बारे में तो कुछ विचार करो।

पेंटल—मेरे दोस्त को अचानक जब पता चला की आप जा रही है। ऊटी से तब उसे लगा की वह क्या करें। अगर आप उससे प्रेम से मिल लेती तो शायद उसे ये ‘’सदमा’’ नहीं लगता। वह पागलों की तरह मीलों पैदल भागा। गिरा पड़ा उसे चोट भी आई परंतु शरीर की चोट तो वह सहन कर गया परंतु आपको देख मन की चोट को वह सहन नहीं कर पाया। आप इसे हादसा या सदमा भी कह सकती है। और इस का इलाज भी आप के हाथ में है। आपके भले ही चेतन मन के तार उसके साथ न जूड़े हो परंतु उसके तो चेतन और अचेतन दोनों के तार आप से जूड़े हुए है। आप ही उसे इस गहराई से बाहर निकाल सकती है।

नेहालता—की आंखों में संवेदना के आंसू थे, उसने पेंटल का हाथ पकड़ कर कहां की सच मुझे अपराध भाव महसूस हो रहा है। चाहे कुछ भी हो जाये मैं ये कार्य करूंगी। जब आपके दोस्त ने मेरे लिए अपना जीवन दाव पर लगा दिया तो मेरा भी कुछ तो कर्तव्य बनता है। और उसे में पूर्ण करूंगी अब मेरे जीवन को और कोई लक्ष्य नहीं है। आज आपके सामने संकल्प करती हूं ही में अपनी आखिरी श्वास तक भर पूरे ह्रदय की गहराई से आपके दोस्त का सहयोग करूंगी।

और नेहालता ने पेंटल के कंधे पर आपना सर रख कर फफक पड़ी उसने भी उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा की तुम्हारे साहास और संकल्प से मुझे विश्वास हो गया की हम जरूर इस में कामयाब होंगे। परमात्मा भी हमारे साथ है। चलों कुछ खाते है। और थोड़ा उपर का नजारा भी देखते है। आप उपर जाकर जब यहां का दृश्य देंगी तो आप विस्मय विमुग्ध हो उठेगी। चारों और सागर का जल है। बीच में ये टापू है। कितना सुंदर एकांत स्थान सालों पहले उन साधकों ने चुना। और उन्होंने कुछ हलका खाने के लिए एक कैंटीन को चुना खाने के बाद दोनों उपर की और चढ़ चले। मंदिर तक तो पत्थरों का रास्ता बना था। वह था तो कच्चा परंतु बरसात के मौसम में इस पर आना-जाना इस रास्ते पर आसान है। परंतु उपर जहां वो चलने लगे उसे तो मनुष्यों द्वारा बनी एक पगडंडी ही कहा जाये तो बेहतर होगा।

वह काफी बड़ा इलाका था। उसके एक ही हिस्से में ये गुफाएं खोद रखी थी। शायद यही पर शिलाएं थी। बाकी पहाड़ी पर इतनी बड़ी चटाने नहीं थी। और इस तरह से उन्हें खोदा गया था ताकि बरसात का मीठा पानी संग्रहित हो जाये। नहीं तो मीठे पानी कहां से लाया जायेगा। कम साधन सुविधाओं में भी ये जो कार्य किया है ये कोई साधारण जन नहीं होते। ये एक संकल्पवान साधक होते है उर्जा से लवरेज। अपने जीवन की उर्जा को पूर्णता से प्रयोग करते है। उसे ध्यान और कार्य ध्यान से सकारात्मक करते है।

कौन जानता है हमारे पूर्वज कितने महान थे। हम तो स्कूल में वो कचरा इतिहास पढ़ाया जाता है। जो किसी काम का नहीं है। औरंगजब, बाबर, हुमायु तेमुर लंग...अकबर...भला कोई देश कैसे मुक्त हो सकता अपनी गुलामी की परछाई से बिना छुटकारा पाये। और फिर भी मेरा देश महान है। और पेंटल नेहालता को देख कर हंस दिया की देखो में भी कितनी बकवास करता हूं। बच कर रहना मेरा दोस्त अभी तो बीमार है अगर वह ठीक हो गया तो आपको इससे भी गहरी बकवास सुनने को मिलेगी।

और नेहा लता हंस कर कहने लगी मैं तैयार हूं उनकी बकवास सुनने के लिए। दूर जहां तक नजर जाती थी वहां तक सागर ही सागर दिखाई दे रहा था। बीच में तैरते जहाज कितने सुंदर लग रहे थे। सब तरह के जहाज छोटे और बड़े दोनो। दूर धुंधली सी मुम्बई दिखाई दे रही थी। सच आज नेहालता और पेंटल का मन अति खुश है। जो उन्होंने सोचा था उससे भी अधिक सकारात्मक कार्य हुआ है।

श्याम होने को थी। सूर्य उतार पर था। उसकी किरणों में अब वो तेजी नहीं रही थी। वह मन और तन को सुमधुर लग रही थी। फिर वो दोनों वहां से नीचे की और उतरने लगे और चल दिये अपनी फेरी की और। अब सब लोग वापस उसी और जा रहे थे जहां से वह सुबह इस मंजिल की और आये थे। दूर चलते पानी के वो विशाल जहाज देखने में कितने छोटे और सुंदर लग रहे थे। तब पेंटल ने कहा की हमें चलना चाहिए। काफी देर हो गई। आपको घर पहुंचते-पहुंचते अँधेरा हो जायेगा। घर वाले फिक्र तो नहीं करेंगे।

नेहालता ने कहां नहीं वैसे तो मेरे घर वालें मुझ पर पूरा विश्वास करते है। परंतु इस दुर्घटना के बाद से उन्हें हर समय थोड़ा भय लगा ही रहता है। अब मुझे गाडी तो बिलकुल चलने के लिए नहीं दी जा रही थी। आस पा कुछ जंगली फल भी लगे थे झाड़ के पेड़ो पर जिसे पेंटन ने तोड़ कर नेहालता को दिया की आप इसे खा कर बतलाओं कैसा स्वाद है। नेहालता ने एक वो फल हाथ में ले तो लिए फिर पेंटल की और देखने लगी की क्या खाऊँ।

तब पेंटल ने कहां की बाबा खाकर देखों तब कहना कि कैसे लगे। ये कोई जहर नहीं है। और अपने हाथ के वो फल जो पेंटल ने अभी-अभी तोड़े थे अपने मुख में डाल लिए। तब नेहालता ने वह एक फल डरते हुए अपने मुख में डाला रस का माधुर्य उसके तन मन पर फैल गया। गजब का स्वाद था। ऐसा स्वाद उसने आज तक कभी किसी फल में नहीं देखा था। देखने में वह कितना छोटा फल था काला जामुन की तरह से परंतु सब से भिन्न। और फिर तो नेहालता ने वो हाथ के फल स्वाद ले कर खाये और पेंटल को कहा की और थोड़े और तोड़ कर देना। ये कम ही फल लगते है। ये एक प्रकार की ओषधिय गुणों से भरे होते है। पेट भरने के लिए नहीं होते कोई भी जंगली फल।

ये तो मानव की खोज है जो फलों के बाग़ बगीचे उसने बनाये। प्रकृति का काम एक प्रकार से भिन्न ही होता है। तब नेहालता ने कहा की आपको इन सब बातों का इतना ज्ञान कहां से प्राप्त हुआ। तब पेंटल ने कहां की मेरा बचपन गांव के जंगलों में गुजरा है। कुछ मोज मस्ती करना खेलना तालाबों में घंटो तरना यही हमारे जमाने का मनोरंजन यही खेल होता था। आपके शहर और गांव में बहुत भेद है। हम प्रकृति के थोड़ा नजदीक होते है। नहीं हम सुबह से इतने तनाव की बात कर रहे है। फिर हमारा मन तनाव रहित है। क्योंकि हम प्रकृति की गोद में है। वह एक मां का कार्य करती है। आप के ठीक होने में उस ऊटी के प्राकृतिक माहोल में भी सोने पर सुहागे का कार्य किया था।

धीरे-धीरे बात करते हुए दोनों नीचे उतर रहे थे। जब कहीं अधिक तेज ढलान आती तो पेंटल नेहालता का हाथ पकड़ कर उतरता था। कितना विश्वास और आत्मविश्वास हो गया था एक दूसरे से। एक भरोसा सा भर गया था ह्रदय में। यही तो अपना पन होता है। वह जैसे-जैसे नीचे उतर रहे थे। सूर्य भी मानो उनसे कह रहा था अब हम भी अपने घर चलते है।

और दोनों आकर फेरी में बैठ गए। आने जाने का टिकट एक ही होता है। भला यहां आकर तो वापस जाना आति कठिन है। दोनों बैठे आगे के बारे में बात करते हुए की वह आपको कुछ दिनों में आपने माता पिता से बात कर के फोन करेगी।

और इतनी देर में फेरी छूक-छूक कर के चल दी। पानी पर चलना भी कैसा रेंगना जो मन को एक अलग अनुभव देता है। धीरे-धीरे वहलहरों से टकराती शांत जल कीऔर चली जा रही थी।मन का भार भी तन को कैसे बोझल कर देता है उस का यूं अचानक उतरना दोनों को कैसा सुखद लगता है। और सच आज के दिन की यादों को उस खुशी को जो भविष्य का मार्ग दिखा रही थी उसे अपने ह्रदय में समेटे दोनों आगे बढ़ रहे थे। दोनो के ह्रदय में खुशी थी परंतु अलग-अलग आयाम में। दोनों एक ही स्थान एक ही समय पर होने पर भी मन में एक ही घटना को भिन्न से मनन और उसे महसूस कर रहे थे।

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