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शुक्रवार, 20 मार्च 2026

26-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-26

(सदमा - उपन्यास)

 रात खाने के बाद जब सब आँगन में बैठ कर बात करने के लिए आये तो सब के हाथ में काफी के मग थे। श्रीमति मल्होत्रा जी अधिक काफी नहीं पीती थी। इसलिए वह एक कप दूध ही ले लेती थी। तब तीनों में चर्चा शुरू हुई तब सबसे पहले श्रीमति मल्होत्रा न पूछा की ये बात जो तुम हमें बतला रही हो तुम्हें किस आदमी ने कही है। परंतु तुम क्या जानती हो की यह बात सच है या नहीं। जिस आदमी ने ये बात तुम्हें कही है क्या तुम पहले से उसे जानती हो। क्या पहले हमें एक बार वहां जाकर देख लेना नहीं चाहिए। हां मां आपकी बात ठीक है। परंतु इस व्यक्ति ने मुझे जो फोटो ग्राफ दिखाये है जिसमें मैं उस व्यक्ति के साथ बैठी हूं खेल रही हूं खा रही हूं। उससे तो कुछ भी गलत नहीं लग रहा। फिर समय के साथ मैं उन धूधंली यादों को अब धीरे-धीरे चिंहित करने लगी हूं। मेरे अचेतन से चेतन पर वह सब याद धीरे-धीर एक परछाई की तरह से बाहर आ रहा है। मैं साफ तोर पर तो उन्हें नहीं देख रही हूं परंतु मेरे अचेतन उन्हें जानता सा लगता है। कि मैं कैसे वहां पर रहती थी। कैसे मेरी कोई देख भाल करता था। और मेरे बारे जो बात इस व्यक्ति ने बतलाई वह तो आप भी नहीं जानते है। कि कैसे में उस नर्सिग होम से गायब हुई और कहां गई। और ये आदमी उस सब का साक्षी है। और ये मेरे कॉलिज का दोस्त भी तो है। इसे तो में दस साल से जानती हू। बहुत भला आदमी है।

पिता जी मैं आपको एक बात बतला रही हूं, उस व्यक्ति ने मुझे अपने बेटे की तरह से प्यार करता था। एक मां की तरह से मेरी देखभाल करता था। वह मेरे बाल बनाना। खाना खिलाना, मेरे गुस्से को, नाराजगी को सब बरदाश्त करता था। और एक दोस्त की तरह से मेरे साथ खेलता, मुझसे लड़ता था। उसके प्रेम के मैं कितने ही आयामों को जाना है जिया है और समझा है। शायद ये उस व्यक्ति का प्रेम और विश्वास ही है कि आपकी बेटी आपके पास बैठी है और ठीक दिखाई दे रही है। वरना ये कोई इतना आसान नहीं है की वैद्य जी ने एक पट्टी रखी और दो चार दिन में कोई ठीक हो गया।

इस सब को बहुत गहराई से जानने की समझने की मैंने कोशिश की है। परंतु जितना समझने की कोशिश करती हूं उतना ही उलझती चली जाती हूं। इसलिए मैंने इसे मस्तिष्क से समझना छोड़ा दिया है। और मेरा ह्रदय या अंतस की पुकार मुझे कह रही है की तुम्हें वहां जाना चाहिए पहले ही बहुत देर हो गई है। पिता जी आप जरा सोचिए की मेरी जो हालत थी उसे देख कर आप कितने परेशान हो रहे थे। तब की मेरे बारे में तो यह डाक्टर खूद ही कह रहे थे की लगभग प्रत्येक व्यक्ति की याद दाश्त लोट आती है। समय का केवल भेद होता है। किसी की कुछ महीने में किसी की कुछ साल में। परंतु उस व्यक्ति की याद ही नहीं गई वह तो अपने में डूब ही गया। अब वैज्ञानिक इसको न जाने कितने ही नाम दे सकते है। परंतु वह सब चेतन को छोड़ कर अचेतन में चला गया। मानो जैसे कोई गहरे में जाकर डूब गया उसे एक सहारे की एक प्रेम की जिसे वो अपना समझता हो जिस के सामने वो अपने चेतन पर आने के लिए एक भरोसा कर सके।

श्री मल्होत्रा जी देख रहे थे की जो उसकी लड़की अब उससे बात कर रही है वह उसकी लड़की तो कतई नहीं हो सकती। वह कितने सालों से देख रहे है। उसमें इतना परिवर्तन ये कैसे हो सकता है। मानो उसके तो ज्ञान चक्षु ही खुल गये है। आज जिस तरह से नेहालता बात कर रही है उसकी लड़की होते हुए भी अब उसे अपनी लड़की नहीं लग रही। तब मल्होत्रा जी ने कहां की नेहा तुम ठीक कह रहे हो। और हमारा फर्ज भी बनता है। परंतु क्या तुम अकेले ये सब कर पाओगी। या तुम्हें किसी के सहयोग की जरूर चाहिए। चाहों तो तुम अपनी माता जी को कुछ महीने के लिए अपने साथ ले जा सकती हो। या गिरधारी को ले जा सकती जैसे तुम्हें अच्छा लगे।

तब नेहालता ने कहा। हां मैं मानती हूं की मुझे तकलीफ जरूर होगी। परंतु मेरे हिस्से का कर्म है जो मैं खूद करना चाहती हूं। आप और मम्मी इस बात से अधिक परेशान है कि मुझे काम करने की जरा भी आदत नहीं है। मुझे तो चाय काफी तक बनानी नहीं आती। आप दोनो ने मुझे इतने लाड़ प्यार से पाला है। ये आपका सोचना एक दम से सही है। परंतु मुझे न जाने क्यों लगता है। कि मां मेरे साथ होगी तो मैं वो सब नहीं कर पाऊंगी जिससे वह आदमी ठीक हो जाये। और दूसरा आप सब यहां परेशान होगे। मां की तबीयत वैसे भी ठीक नहीं रहती। और वहाँ का मौसम भी कुछ नमी भरा है। जो मां के दमे के लिए हानि कारक है। फिर वहां पर उस लड़के की नानी भी तो है, जिस के साथ में वो लड़का रहता है। और उसके स्कूल के मालिक भी मेरा सहयोग करेंगे। फिर पेंटल जी को जैसे ही छूटी मिलेगी जरूर वहां मेरी मदद के लिए आ जायेगे। चाहो ता दो चार दिन के लिए आप मम्मी के साथ आ सकते हो।

तब तुम ने आपना निर्णय ले लिया है, तो हम क्या कह सकते है। परंतु हमें अंदर से डर लग रहा है की इतना बड़ा संकल्प तू कैसे उठा सकेगी। तब नेहालता ने उठ कर अपने पिता के गले में हाथ डाल कर कहा की देखना अब मैं बड़ी और समझदार हो गई हूं। जो मैंने धार लिया उस पर खरी उतरूंगी आप दोनों मुझे आर्शीवाद दे। आप मेरी चिंता न करना पेंटल ने मुझे वहां के बारे में सब बतला दिया है। वहां पर जो नानी जी है वह बहुत ही भली महिला है उसके आगे पीछे भी कोई नहीं है। वह उस लड़के को अपने बेटे की तरह से मानती है। पेंटल अभी वहां तीन महीने रह कर आया है। अब वह चल फिर सकता है। क्योंकि आपको या हम को पता नहीं की उसकी एक टाँग में फ्रैक्चर भी आ गया था। अब प्लास्टर खोल दिया है।

चलों तुम नेक काम के लिए जा रही हो परंतु हमें यहां तुम्हारी हमेशा चिता बनी ही रहेगी। क्योंकि कभी तुम इतने दिन हम लोगों से अलग नहीं हुई हो। वो अगर कुछ महीने जब तुम यहां से गायब हो गई थी। हम जानते है वो एक-एक दिन किस तरह से गुजर रहे थे। इतनी देर से श्रीमती मल्होत्रा पिता बेटी की ये वार्तालाप सून रही थी। कुछ कह नहीं रही थी। बीच में उसने टोकना अच्छा भी नहीं था। तब कहने लगी नहीं बेटी तुम जिस विश्वास से कह रही हो। और जिसे अपना लक्ष्य बना रही हो। उसमें देखना तुम जरूर कामयाब होगी। परमात्मा तुम्हारे साथ है। तुम सच्ची हो। और सच्चाई के मार्ग पर चल रही हो। सच कहूं तो अब तुम्हारे इस साहस और संकल्प को देख कर मुझे गर्व हो रहा की तुम मेरी बेटी हो।

और वह रो पड़ी मां को इस तरह से रोता देख कर नेहालता ने कहां की नहीं मां तुम मत रोओ। मैं कोई दूर नहीं जा रही जब आप को दोनों का मन करें तो आ जा सकते हो। और हो सकता है, हम उस लड़के को ही यहां पर ले आये और यहां पर किसी अच्छे मनोवैज्ञानिक को दिखला कर उसे ठीक किया जा सकता है। परंतु इन सब बातों का तो वहां पर जाकर वहां पर रह कर ही पता लगाया जा सकता है।

तब श्रीमती मल्होत्रा ने कहां की वह फिर खाने के लिए तुम क्या करोगी। तुम्हें तो बनाना आता नहीं। इस बात की चिता मुझे अधिक परेशान कर रही है। तब नेहालता ने कहां की कुछ चीजें तो इन दिनों में काका से सीख ली है। देखा नहीं रात का सांबर मैंने ही तो बनाया है आप को पता भी नहीं चला। मैं गिरधारी काका के साथ मिल कर धीरे-धीरे कुछ चीजें बनाना जान गई हूं।

फिर वहां जो नानी है वह भी तो मेरी मां के समान ही है। उससे भी तो मदद ही मिलेगी। इन सब बातों के करते हुए रात काफी हो गई। दूर आसमान पर चाँद आधा चमक रहा था। तारे भी जुगनू की तरह उसके आस पास खेलते से लग रहे थे। दूर झींगुरों की अविरल ताने अपने गीत गाये जा रही थी। कैसा विचित्र है ये मन हमारा जब हम तन्मय हो कर एक बात कर रहे होते है तो न ये झींगुरों की कर्षक आवाज तब भी आ रही थी। केवल एक दूसरे के काने में ये जा नहीं रही थी। वहां पर केवल एक दूसरे के शब्द ही सुनाई दे रहे थे। मन का कार्य भी कितना विचित्र है। क्योंकि वह अनेक आयामों में कार्य करता है।

हवा में थोड़ी ठंडक भी हो गई। परंतु सब के मन हल्के थे। बातें आपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चूकी थी। बस एक दो बातें थी वह सुबह की जा सकती है। और जितनी जल्दी यहां से जाया जाए उतना ही भला होगा। तब नेहालता ने कहां की पापा एक तो मैं कल या परसों ही जाना चाहूंगी। और आप मेरे खाते में कुछ पैसे डाल देना कुछ नगद अपने साथ ले जाऊंगी।

तब श्रीमती मल्होत्रा ने कहा इतनी जल्दी क्या। कुछ दिन बाद नहीं जा सकती। तब नेहालता ने कहां नहीं मां उस व्यक्ति पर एक-एक दिन कितने भारी गुजर रहें होंगे। कहां नहीं जा सकता। जब कार्य करना ही है तो अब उसे और क्यों टाला जाये।


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