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बुधवार, 25 मार्च 2026

29-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-29

(सदमा - उपन्यास)

हाज अपने निर्धारित समय से मद्रास (चेन्नई) पहुंच गया था। नेहा लता ने अपना पर्स और एक हेंडबैग हाथ में उठा लिया और जहाज की सीढ़ियों से उतर कर उस और चल दी जहां पर सभी मुसाफिर बेल्ट से अपने सामान लेने के लिए चले जा रहे थे। जिस की अभी घोषणा हुई थी की कहां पर आपका सामान आने वाला था। सीढ़ियों उतर कर कुछ ही दूरी पर बेल्ट थी जिस पर उसका सामान आ गया और ट्रॉली में ले कर वह बाहर की और चल दी। बाहर अनेक गाड़ी वाले खड़े थे सवारियों का इंतजार कर रहे थे। कुछ लोगों ने नेहा लता को घेर लिया। एक तो उनकी भाषा भी नेहालता को समझ नहीं आ रही थी। फिर भी उसने ऐसा दिखलाया की वह यहां का चप्पा-चप्पा जानती है। सब गाड़ीवान जाने के उससे आग्रह कर रह थे। परंतु जैसे ही उसने ऊटी जाने का नाम लिया तो लगभग सभी वहां के तितर-बितर हो गए। मात्र एक नौजवन ही वहां पर बचा। और वह कहने लगा की मेम साहब वह तो काफी दूर है। और रास्ता भी बहुत कठिन है। कुछ और देर बात कर नेहालता ने उसे वह पता बतलाया की तुम मुझे वहां पहुंचा दो। लड़का देखने में काफी समझदार लग रहा था। आखिर कार मोल भाव कर वह ऊटी जाने के लिए तैयार हो गया। परंतु जो पता नेहालता बतला रही थी वह उस पते के विषय में कुछ अधिक नहीं जानता था। हां वह कितनी ही बार सवारियों को लेकर ऊटी गया था। पर इस पते को वह नहीं जानता। लेकिन वहां जाकर खोजा जा सकता है। भाड़े के साथ समय भी अधिक लग रहा था। सो उसे वहां पहुंचते-पहुंचते श्याम हो जायेगी। तब वह रात को वही रुकेगा। कुछ अधिक पैसे देने से उस नौजवन युवक के चलने की बात बन गई वरना तो और कोई तो गाड़ी वाला जाने को तैयार ही नहीं था।

सफर काफी लम्बा और थका देने वाला भी था। और उस पर एक अकेली महिला। परंतु नेहालता एक हिम्मतवर लड़की थी। गाड़ी ऊटी की और चल दी। वहां से जाने के तीन मार्ग थे परंतु ड्राइवर ने पुदुचेरी वाला रास्ता चुना। क्योंकि वह बहुत साफ सुथरा और अति प्राचीन था। नील गिरी की सुंदर पहाड़ियों के बीच बसा ऊटी अति रमणीय स्थान है जिसे अंग्रेजों ने ग्रीष्म काल में अपनी राजधानी बनाया करते थे। रास्ते काफी सुंदर थे। सड़क के दोनों और इमली के वृक्ष लगे थे। चार पाँच घंटे चलने के बाद ड्राइवर एक साफ सुथरे होटल के सामने गाडी को रोका और कहां की मेम साहब आप कुछ देर विश्राम कर ले और चाहों तो जल पान या खाना भी खा सकती है। यहां हमारे प्रदेश के खाने का स्वाद आपको मिलेगा। परंतु नेहालता कुछ डरती थी की कहीं खाना खाने के बाद उसे उलटी तो नहीं आ जायेगी। इसलिए उसने अंदर जा कर एक नींबू पानी और कुछ चावल और सांबर का आग्रह दिया। सब खाना एक दम से सुस्वाद था। इतना स्वादिष्ट सांबर उसने इससे पहले कभी नहीं खाया था। सच जिस देश का जो भोजन होता है वह उस में अति निपुण हो जाते है। हम तो मात्र उनकी नकल ही तो करते है। उसके बाद उसने एक पानी की बोतल ली। और कुछ देर होटल के सामने घूमती रही। फिर जब कार में बैठी तो एक उलटी की गोली भी उसने खा ली।

कुछ देर घूमने के बार उसके पैर को कुछ आराम मिला क्योंकि वह करीब छ: साल घंटे से वह बैठे-बैठे ही तो सफर कर रही थी।

इतनी देर में ड्राइवर भी खाना खा कर बाहर आ गया और पूछने लगा मेम साहब अब चले। और नेहालता गाड़ी में जाकर बैठ गई। क्योंकि अधिक देर करने से पहुंचते-पहुंचते रात हो जायेगी फिर उसका वह स्थान जाना पहचाना भी नहीं है। उसे वहां पर जाकर स्थानीय पता भी पूछना होगा। और साथ में एक अकेली महिला है इसलिए वह ड्राइवर भी चाह रहा था कि सूर्य अस्त से पहले वह अपने गन्तव्य तक पहुंच ही जाये तो दोनो के लिए बेहतर होगा। ड्राइवर गाड़ी काफी अच्छे से चला रहा था। रास्ते में चार बजे के बाद एक जगह फिर रूक कर ड्राइवर ने कॉफी पीने के लिए आग्रह किया। उस के बाद वह आगे चले दिये। नील गिरी पर्वत माला जब शुरू हुई तो वहां की हरियाली देखते ही बनती थी। पहाड़ी की रानी सच ही बहुत ही सुंदर अपने अंदर समेटे थी। उसके घुमावदार रास्ते अति दुर्गम थे। जो प्रत्येक गाड़ी चलाने वाला वहाँ पर नहीं चला सकता। फिर भी कभी-कभी एक दम से गाड़ी जब सड़क के किनारे से गुजरती तो नेहालता अपनी आंखें बंध कर लेती।

ऊटी का मार्ग सच ही सांप सीढ़ी की ही तरह से दुर्लभ व दुर्गम था। नेहालता सोच रही थी वह इससे भी पहले तो ऊटी आ चूकी है। परंतु इस बारे में वह कुछ भी नहीं जानती। कैसे वह इतनी दूर से यहां तक का सफर किया होगा। और अगर में बीमार थी तो उसे जरूर डर लगा होगा। वह इतना तो जानता था कि मुझे कहां से लेकर आया था। फिर मेरा भी तो भरोसा नहीं किया जा सकता था। क्योंकि मैं उसे जानती ही कितना थी। परंतु सोम प्रकाश ने सच ही बहुत साहस का कार्य किया था। यही सब सोच विचार नेहालता के मन में आ जा रहे थे। दूर पहाड़ी की चोटी पर सफेद बादल कैसे तैरते जा रहे थे। कभी-कभी जब अधिक बादल यहां से गुजर रहे होते थे तो एक दम सड़क पर छांव आ जाती थी। प्रकृति का खेल भी कितना लयवद्यिता में समरस चलता रहता है। उसमें जरा भी विधन नहीं होता है। हम लाख चाह कर भी एक काम को दोबारा उसी तरह से करना चाहे परंतु नहीं कर पाते। प्रकृति का समय किस डोर से बंधा एक नियम की लय पर चलता सा लगता है। परंतु पीछे कोई भी करता नहीं दिखता। धीरे-धीरे जैसे-जैसे उंचाई बढ़ती जा रही थी पेड़ भी बड़े होते जा रहे थे। कितना लयबद्ध, सुर युक्त खेल है प्रकृति का सब समय पर अपना कार्य करती सी दिखती है। समय पर बरसात होती है, समय पर ठंड पड़ती है, समय पर उनमें फल फूल आ जाते है।

देखो मानव चित भी कैसा है देखने में क्या बदलता है वही का वही आदमी होता है। अगर उसका चित बदल जाता है, तो वह सब कुछ बदल जाता है। जैसे पल-पल प्रकृति में मौसम बदलते रहते है। तो क्या हम एक चित है। या मन का एक का प्रभाव हमारे जीवन में दिन प्रति दिन बदलता रहता है। जीवन अपने में कितना रहस्य समाए चलता है, जिसके के विषय में हम कितना कम जानते है। और हम करते है परमात्मा के बनने की बात उसे पाने की बात। तब फिर हमें आपने बारे में ही अ ब स तक पता नहीं है, तो उसे कैसे जान सकते है। जिसका पता ठिकाना या रूप आकार का ही हमें नहीं पता। शायद कुछ लोगों ने पाया होगा। परंतु है अति विकट मार्ग। एक साहसी ही चल सकता है। इस सरल से दिखने वाले विकट मार्ग पर। कुछ ही देर में जंगल का मार्ग खत्म हो रहा था। कहीं-कहीं मकान दिखाई देने लगे थे। अभी सूर्य अस्त नहीं हुआ था। परंतु उसके पीत रंग ने पूरे अंबर में फैलना शुरू कर दिया था। नेहालता ने पूछा ड्राइवर को क्या हम पहुंच गए है। तब ड्राइवर ने कहां की हां मेम साहब हम पहुंचने वाले है। आगे जब कोई बाजार नजर आयेगा तो में वहां उतर कर उस पते के बार में पूछ कर ही आगे चलूंगा। नाहक परेशान होने से तो कहीं अच्छा है आप चार आदमियों से पूछताछ कर ले।

कुछ ही देर में चार पाँच घरों का एक गांव सा नजर आया। जिसके किनारे गाड़ी रोक कर ड्राइवर वहां बैठे लोगों से वो वह लिख हुआ पता पूछने लगा। लोग वहां के काफी सरल और ईमानदार थे। और फिर ड्राइवर तो उनकी भाषा भी जनता था। इसलिए वह तो उनका अपना ही हो गया था। जिससे उसे पता समझने में कोई खास कठिनाई नहीं हुई। ड्राइवर ने आकर कहां की आप चिंता ने कर हम अब कुछ ही देर में अपने घर पहुंचने वाले है। बस आगे चल कर एक झील आयेगी। उसके दाय और एक बड़ा सा बाजार होगा। जो मेरा देखा हुआ है। बस उसी के पास से एक कच्ची सड़क है। जिसपर ये गांव है। परंतु आप इतनी दूर से यहां आई है तो क्या आपका यहां कोई रिश्ते दार है। तब नेहालता उसकी इस बात से गर्दन हिला कर केवल हंस दी। की हां मेरा एक रिश्ते दार है वह बीमार हो गया है। इस सब को सून कर में इतनी दूर से आई हूं।

भारत में अगर आपने किसी से एक बात भर कर ली तो आपको अपनी पूरी की पूरी जन्म कुंडलिनी बतलानी ही होगी। क्या बीमार है। कब से है, कैसे हुई और आपका उसका इलाज भी बिना मांगे मिल जायेगा। ड्राइवर ने रास्ता अच्छे से समझ लिया था। ऊटी कोई खास बड़ी जगह तो है नहीं। बस अंग्रेजों का गर्मियों एक विश्राम स्थल आप इसे कह सकते है। वहां की सुरमई श्यामे और ताजा हवा। आपके जीवन में नवीन ताजगी भर देगी। समुद्र तल से 2,637 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह नील गिरि पर्वत की सबसे ऊंची चोटी है। ऊटी, नील गिरि पहाड़ियों में बसा एक सुरमय हिल स्टेशन, अपनी असली प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। हरियाली और सुहावने मौसम से लदी इस रिजर्व टाउन को 'हिल स्टेशनों की रानी' कहा जाता है। आश्चर्यजनक नज़ारों, विशाल चाय के बेगानों और शांत झीलों से लेकर झरने और भव्य बगीचों तक, आपको पल में अपना बना लेते है। यूकेलिप्टस के विशाल और घने पेड़ों से घिरी ऊटी झील का सौंदर्य तो देखते ही बनता है। और चार कदम चलने पर आपको एक छोटा परंतु सुंदर झरना जो आपके विचलित मन को पल में शांत कर देगा। जिसका नाम खूबसूरत पाइकारा वाटरफॉल है। पानी पहले एक कुंड में गिराता है उसके बाद सहज और सरलता से वह झील में समा जाता है।

बाजार से कुछ दूरी पर चलने पर एक छोटा सा रास्ता सड़क के दाई और कट रहा था। यहीं पर ड्राइवर ने गाड़ी को कुछ मंदा किया और दाय बाए देख कर उस पर चल दिया। नेहालता रास्ते को समझने की कोशिश कर रही थी। अगर वह वहां कई महीनों तक रही थी। तो शायद वह जगह वह मकान उसे कुछ याद आ जाये। कुछ ही दूरी पर खपरैल नुमा कई मकान दिखाई दिए। वह एक छोटा सा कस्बा था। जिसमें कुछ लोग ही रहते थे। जिन लोगों ने खेती की जमीन के पास ही अपने रहने के लिए मकान बना रखे थे। वही से गुजरते एक पुरूष से जो साइकिल पर जा रहा था गाड़ी रोक कर ड्राइवर ने पूछा। तब उसने उँगली के इसारे से उसे बतला दिया कि तुम सही स्थान पर आ गए हो। बस कुछ कदम पर ही वह जगह है जहां तुम्हें जाना है।

परंतु नेहालता को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। कि वह जिस मकान का पता लिए इतनी दूर से आ रही है उसे कौन लोग मिलेंगे। वह तो उनको जानती तक नहीं थी। बस पाँच मिनट और चलने के बाद ड्राइवर ने गाड़ी को रोक दिया वहां एक बहुत खूला मैदान था। जहां खूब हरियाली थी। उसने इशारे से कहां की मेम साहब जिस घर का पता आप ने लिखा है वह वो सामने है। मैं आप का सामान निकला देता हूं। नेहालता को अंदर से एक भय भी लग रहा था। परंतु जब इतनी दूर तक वह आ गई तो अब क्या किया जा सकता है। उस भय का सामना तो करना ही होगा। ड्राइवर ने इतनी देर में सामान निकाला। नेहालता वह खड़ी हुई सोच रही थी, कि कैसे आगे चले। इतनी देर में वह देखती क्या है कि जिस घर में उसे जाना था, वहाँ से एक बुर्जग महिला आती हुई दिखाई दी। आंखों पर नजर का चश्मा। सफेद साड़ी और ठोड़ी पर एक मोटा सा मस्सा था।

वह महिला पास आकर खड़ी हो गई। और पूछने लगी बेटी मैं सोम प्रकाश की नानी हूं तुम ने मुझे पता नहीं पहचाना की नहीं परंतु मैंने तो तुम्हें पल में ही पहचान लिया था। और ड्राइवर को कहा की तुम सामान को ले कर उधर की और चलो। और उसने नेहालता का हाथ पकड़ कर कहां की बेटी घबराओ मत मैं तुम्हारे साथ हूं। तुम इतनी दूर से हमारे लिए आई हो यहां तुम्हें किसी बात की कोई परेशानी नहीं होगी। और नेहालता एक अबोध बालक की तरह धीरे-धीरे घर की और चल दी। सूर्य पहाड़ों के पीछे छिपने के लिए लालायित हो रहा था। अंबर जो अभी स्वर्ण रंगों से नहाया हुआ था अब उसमें पीत के अंदर नारंगी रंग घुलने लगे थे। नेहालता समझने की कोशिश कर रही थी कि क्या वह सच ही यहां इतने दिन तक रही है। तब उसे कुछ भी याद क्यों नहीं आ रहा था। असल में वह नई जगह और नये लोगों को देख कर कुछ घबरा भी अधिक रही थी। जबकि उन्हीं लोगों के साथ हमारा मन साल भर रहा हो चाहे, फिर वह समय पाकर कितने अपरिचित से लग रहे थे।

दूर पक्षी अपने घर जाने के लिए लम्बी-लम्बी उड़ाने भर रहे थे। उधर नेहालता भी अपनी मंजिल पर पहुंच गई थी। इसलिए उसने एक गहरी श्वास ली जिसे चेन की श्वास कहा गया। देखा आपने जो श्वास आपकी नाभी को छू जाती है। वह आपको कितनी शांति, अभय और एक निर्भयता प्रदान करती है। इतनी देर में ड्राइवर ने उसकी तंद्रा को तोड़ा। की मेम साहब आप अपने सामान को चेक कर लो कहीं कुछ रह तो नहीं गया है। मैं फिर एक बार गाड़ी को अच्छे से चेक कर के आता हूं। तब नेहा लता को अपने होने का पता चला। और उसने पर्स से पैसे निकाल कर उस ड्राइवर को दिए। ड्राइवर ने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया। तब नेहालता ने पूछा की तुम अब रात को तो वापस नहीं जाओगे। इतना लम्बा सफर तय कर के आये हो। उसने कहां की नहीं मेम साहब अब तो रात का खाना खा कर कुछ विश्राम करूंगा गाड़ी भी तो काफी थक गई है। यह भी कुछ विश्राम करेगी। कल सुबह जल्दी ही उठ कर चल दूंगा। नेहालता बार-बार यह कहना चाह रही थी। कि वह चाहे तो यहीं रूक सकता है। परंतु उसे झिझक हो रही थी उसका अपना ही ठोर ठिकाना अभी नहीं है।

उसने कुछ अधिक पैसे ड्राइवर को दे दिये थे। जिसे वह गिन कर वापस दे रहा था। मेम साहब आपने कुछ अधिक पैसे दे दिये, जितने की बात हुई थी ये उससे कुछ अधिक है। तब नेहालता ने कहां की नहीं मैंने जान पूछ कर दिये है। ये सब में अपनी खुशी से कर रही हूं। और तुम आराम से गाड़ी चलना। आपके साथ ये कुछ घंटो का लम्बा सफर बहुत ही अच्छा गुजरा। आप बहुत अच्छी गाड़ी चलते हो। मुझे तो भय लग रहा था। परंतु आप का संग बहुत सुंदर रहा। अपना ख्याल रखना। न जाने अब हम कभी मिले ने मिले। इस सब व्यवहार को नानी देख रही थी उसे ये सब बहुत अच्छा लग रहा था। उसने तो नेहालता का कोई दूसरा ही रूप देखा था। और ड्राइवर हाथ जोड़ कर धन्यवाद का भाव अपने ह्रदय में समेटे चला गया।


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