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सोमवार, 23 मार्च 2026

28-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-28

(सदमा - उपन्यास)

धर ये खबर सून कर सोनी बहुत खुश हुई की नेहालता आ रही है। उसने जाते हुए भी पेंटल के मुख से जो सूना था। ये सब बाते जान कर उसे एक उम्मीद थी। की जरूर ये लड़की अपने अंदर एक साहास रखती है। इनमें एक संकल्प है, इतना साहास कम ही व्यक्तियों में पाया जाता है। कौन भला दूसरे की आग में अपना हाथ जलाना चाहेगा। देखना मेरा मन कहता है कि एक दिन ये जरूर अपने लक्ष्य को पा लेगी। जब मन प्रसन्न होता है तो मानव का तन भी कैसा उड़ान भरने लग जाता है। मानो वह आनंद उत्सव के पंखों पर बैठ कर उड़ रहा है। उस लड़की (नेहलता) की तारीफ कर के जब पेंटल उसे फोन पर बता रहे थे तो उसे कोई जलन नहीं हो रही थी। उन दोनों का प्रेम कैसा अनूठा और विचित्र था। न जानते हुए भी एक दूसरे को कितना अधिक जान गए थे। एक ही मिलन में कैसे प्यास बूझ गई थी सोनी की जैसे स्वाती की एक बूंद का इंतजार सागर किनारे वह सीप कर रही थी। की जैसे ही स्वाती की वो बूंद आये और वह पूर्ण हो अपने को तृप्त पाये। और मोती बनने तक नीचे सागर की तलहटी में चली जाये। एक खामोश गहरी नींद में। इसी सब का नाम तृप्ति है जहां होता है केवल मिलन का अनुभव व रसा स्वाद जो उसे गहरे-और गहरे खिंचता ही रहता है। सोनी का मन गुनगुना रहा था.....

जब से साजन मोह अंग लगाया, तन मन की प्यास बुझाई।

आनंद उत्सव आँगन  उतरा,  नव जीवन न ली अंगडाई।

जहाज का टिकट ले कर जितनी देर में नेहालता पहुंचे, उससे कुछ ही देर पहले उनके पिता घर पहुंचे थे। सब ने पहले हाथ मूंह धोकर खाना खाया। फिर सब लोग जब कुछ विश्राम के बाद श्याम को उठे तो सबका मन भारी था। परंतु नेहालता को अपने अंदर कुछ नया पन लग रहा था। कि वह किसी अंजाने पथ पर जा रही है। जहां आपका अपना जानने वाला कोई नहीं है, आप उस परिवार का एक सदस्य बनने जा रही हो बिना किसी नाते रिश्ते के। जिसे उसके माता पिता से स्वीकार किया है। ये उनके लिए बहुत बड़ी बात है।

नेहालता के जाने से उसके माता-पिता का कलेजा तो जरूर अधर हो रहा था। अकेली बेटी जो अभी-अभी एक भयंकर बीमारी से बहार भी नहीं निकली थी। उसे इस तरह से इतनी दूर भेजने का उनका मन जारा भी नहीं था। परंतु जो बात उनकी बेटी ने कही उसे सामने वह मूक बन कर रह गये। की ये जीवन पिता जी उन्हीं व्यक्ति का दिया हुआ है। आप दोनों ने मुझे ये सुंदर शरीर दिया परंतु आप खूद देखो क्या में बीमारी की हालत में किसी लायक थी। क्या आपकी बेटी को उस व्यक्ति ने नव जीवन नहीं दिया है। उसने अपने जीवन की जरा भी परवाह नहीं की। अगर मैं ठीक नहीं भी होती तो अगर पहले पुलिस आ जाती तो वह जरूर जेल में चला गया होता। जब की उस बेचारे का कोई कसूर नहीं होता। उसने तो मुझे उस दलदल से बचाया है। जिस में जाकर कोई लोट ही नहीं सकता। एक जन्म ही नहीं उसने एक विकृति होती चेतना को बचा लिया। पता नहीं आपकी बेटी वहां कितना भोगती। आपको कभी पता भी नहीं चलता। आप तो कम से कम मुझे शायद ही कभी ढूंढ पाते। जीते जी जीवन नर्क हो जाता आपकी बेटी का।

खेर अब तो जो भी परमात्मा ने किया है वह सही और अच्छा किया है। और आगे भी वह अच्छा ही करेगा। हम अगर अच्छा सोचते है तो अच्छा ही होता है। जरूर इसमें परमात्मा की कुछ मर्जी होती है। अब आप देखों मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी, की आप मुझे अकेले इतनी दूर भेज देंगे। परंतु आप दोनों के मन में किस ने ये बात डाली जो आप मुझे वहां भेजने के लिए तैयार हो गए। सच आप दिल पर हाथ रख कर कहे की आप अपनी इच्छा से मुझे भेज रहे हो। एक प्रकार से आप भी जानते है वहां जाना कितना जोखिम का कार्य है। फिर भी आप मुझे भेज रहे है। परंतु हमारे साथ कोई तीसरी शक्ति है। जो कार्य हम करने के लिए जा रहे है। वह बिना किसी स्वार्थ के लालच के है। इसलिए उसमें परमात्मा का वास होता है। राजेश्वरी मल्होत्रा और श्री मल्होत्रा बेटी की ये बाते सुन कर अचरज कर रहे थे। जैसे कोई बहुत बड़ा और ज्ञानी उनके सामने बैठा है। उन्हें यकीन नहीं आ रहा था, की कल तक जो केवल अल्हड़ सी नेहालता अचानक आज इतनी समझदार हो गई। एक तरह से तो उन्हें अंदर से अपने बेटी पर गर्व भी हो रहा था। और एक खुशी की लहर भी उनके मन पर दौड़ रही थी। परंतु कहीं मोह भी था की उनके दिल का टूकड़ा उनसे दूर जा रहा है। पाँच बजे जब सब ने चाय पी तब नेहालता ने एक बार फिर से सार सामान जो वह साथ ले जा रही थी। अपने काका गिरधारी लाल के साथ एक बार फिर से चेक कर लिया की कुछ भूल तो नहीं गई हूं। क्योंकि फिर सुबह तो समय नहीं मिलेगा। सुबह पांच बजे की फ्लाइट है। इसलिए यहां से तीन बजे तो निकलना होगा। ड्राइवर को भी बोल दिया की जल्दी से गाड़ी को निकाल कर चेक कर ले।।

सब के मन में एक खुशी एक उमंग के साथ एक दर्द भी था। परंतु अंदर कोइ तीसरी शक्ति उन्हें एक साहास दे रही थी। रात का खाना खा कर सब जल्दी ही सोने चले गये क्योंकि सुबह तो जल्दी ही जाना है। उधर नेहालता ने पेंटल को फोन कर के बता दिया की कल की टिकट मिल गई है। इसलिए सुबह ही पांच बजे की फ्लाइट से वह मद्रास (चेन्नई) जा रही है। तब पेंटल ने कहां की मैं भी कोशिश करूंगा आपको छोड़ने आने के लिए। नेहालता ने कहा की आप इतनी जल्दी कैसे आयेंगे। आप नाहक परेशान होंगे। मैं आराम से चली जाऊंगी। परंतु उधर पेंटल को लग रहा था। की अगर वह किसी तरह से एक बार फिर वह नेहालता या उनके माता पिता से मिल लेगा तो उनको थोड़ा साहास होगा।

इसलिए उसने भी तैयारी कर ली की वह भी नेहालता को छोड़ने के लिए जायेगा। और वह इतने सुबह उठ कर सही समय पर एयरपोर्ट पर पहुंच गया। उसे अंदर से एक झिझक भी लग रही थी। की एक अकेली लड़की को इतनी दूर भेज रहा है। परंतु वह जानता था उस को इस समय दफ्तर से छूटी मिलनी बहुत कठिन थी। परंतु पेंटल नेहालता के माता पिता से भी थोड़ा झिझक रहा था। परंतु उसके व्यवहार को देख कर वह बहुत ही खुश था। वह अपनी लाड़ली का इस तरह से भेज रहे थे जैसे कोई वीर सैनिक रणक्षेत्र में जा रहा हो। तब पेंटल ने श्री मल्होत्रा के पैर छू कर कहां की आप बहुत ही महान है। जो अपनी लड़की को इस अदम्य कार्य के लिए भेज रहे हो। परंतु आप मेरा विश्वास कीजिए की आपकी लड़की को कुछ भी नहीं होगा। मेरा दोस्त देवता समान है और नानी के ह्रदय में अति प्रेम है। आपकी लड़की वहाँ पर कोई दूख नहीं उठायेगी मैं यह आपका वचन देता हूं। क्योंकि आप जानते है मैं वहां पर दो-तीन महीने अपने दोस्त के साथ रह कर आया हूं। इसलिए मैं जानता हूं कि सोम प्रकाश "सोमू" एक दम से शांत है। उसका व्यवहार एक दम से शांत है। वह क्रोध नहीं करता। इसलिए वह कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करेगा जिससे नेहालता को कोई चोट पहुंचे।

तब भी राजेश्वरी मल्होत्रा ने कहां की बेटा फिर भी वह अपने होश में नहीं है। अगर कुछ ऊंच नीच हो गई तो हम किस को मुख दिखलाएंगे। तब पेंटल ने गर्दन नीच कर के कहां की माता जी आप नाहक परेशान हो रही है। आप जरा सोचो नेहालता जी कितने दिन तक सोम प्रकाश जी के साथ रही तब तो उसे कोई होश नहीं था। माना की नेहालता का व्यवहार एक 8-9 साल के बच्चे जैसा था। परंतु आप सोचो उसका शरीर तो 23 वर्ष का जवान था। तब उस समय कौन उनके बीच था। यह पिता के समान उनके साथ सोती माता के समान उनके साथ खेलती या दोस्त के समान उनसे लड़ती थी। मेरा दोस्त लाखों में एक है। आपने कभी सोचा पिता जी ( मल्होत्रा जी से) की उसे नहलाना कपड़े पहनाना, खाना खिलाना। आदि का कार्य कौन करता होगा। आपकी बेटी को उसने एक बच्चे की तरह से रखा जैसे कोई पिता अपनी बेटी को रखता है। रात जब वह सोती थी तो एक बच्चे के समान कई बार जिद भी करती थी की मुझे डर लगता है। मैं तो आपके पास सोना चाहती हूं। तब आप सोचिए वहां कौन था उनके बीच। परंतु मेरा दोस्त बहुत भोला और सच्चे मन का इंसान है। आप जरा भी चिंता ने करें। और कुछ दिनों की ही तो बात है फिर हम सब चलेंगे। मुझे दफ्तर से छूटी नहीं मिल रही नहीं तो क्या मैं अपनी बहन (नेहालता) को कभी अकेली जाने देता। श्री मति मल्होत्रा की आंखों में पानी आ गया। नहीं बेटा हमारा कहने का मतलब यह नहीं है। हम जानते है। हम महसूस कर सकते है कि की हमारी लड़की को आपके दोस्त ने कितना प्रेम दिया होगा। शायद हमसे भी ज्यादा अगर सही मायने में आप देखे तो हम भी इतना प्रेम उस हालत में नेहालता को नहीं कर पाये वरना क्या वह उस डा0 के पास भेजते अपनी लाड़ली को। ये तो परमात्मा ने आप और आपके दोस्त ने देवता का कार्य कर हमारी बेटी को नव जीवन दिया है। इस जीवन का कुछ हिस्सा अगर उस पुण्य आत्मा के कुछ आ जाये तो हम अपने को बहुत भाग्यशाली समझेंगे।

इन सब बातों से सबका मन कुछ हलका हुआ। नेहालता भी ये सब बड़े ध्यान से सून रही थी। पेंटल की बाते। की वह कितना प्रेम और विश्वास अपने दोस्त पर करता है। इससे उसके मन में जारा बहुत अगर डर था तो वह भी पल में खत्म हो गया। एक बहुत ही अच्छे माहोल में नेहालता को बिदाई दी गई । पेंटल समझा रहा था की एयरपोर्ट से निकल कर गाड़ी कर लेना और घर का पता तो तुमने अच्छे से सम्हाल कर रख लिया है। और वो फोन नम्बर जो मैंने सोनी का दिया था। वह भी, है न आपके पास। नहीं है तो अच्छे से चेक कर लो। तब नेहालता ने सब बैग में चेक कर लिया। अगर वहां पर जाकर कोई पता ढूंढने में दिक्कत आये तो आप सोनी जी को फोन कर देना वह आपकी पूरी मदद करेगी। और गाड़ी में घबराना नहीं कुछ खाने का सामान भी साथ ले लेना क्योंकि मद्रास (चेन्नई) से कम से कम दस घंटे का रास्ता है।

तब नेहालता ने कहां की हां गाड़ी जब पहाड़ी इलाकों में घूम कर चढ़ती है तो मुझे चक्कर आने लग जाते है। इसलिए मैं उसके लिए दवाई भी ले ली है। और साथ में एक नींबू भी रख लिया है। इतनी देर में घोषणा हो गई और नेहालता सब को छोड़ कर जहाज की और चल दि। सब उसे जाते हुए और जहाज पर चढ़ते हुए देखते रहे। कुछ ही देर में जहाज धीर से मुड़ा और रन वे पर दौड़ने लगा और उसने अपने पंख फैला कर हवा में उड़ान भरी। देखते ही देखते वह आंखों से ओझल हो गया। विज्ञान भी कहां से कहां पहुंच गया है। अभी पल भर पहले आदमी जमीन पर था अब नभ में यात्रा कर रहा है। और सब भारी कदमों से एयरपोर्ट से बहार निकलने लगे। तब मल्होत्रा ने पेंटल की और देख कर कहां की आप कैसे जायेगें। आप हमारे साथ चलों रास्ते में हम आपको रेलवे स्टेशन तक छोड़ते हुए चले जायेगें।

तब तीनों गाड़ी में बैठ कर चल दिया। अभी सुबह ही थी। सड़कों पर अधिक भीड़ भाड़ नहीं हुई थी। कुछ गिने चुने लोग ही समुंदर के किनारे सेर कर रहे थे। कुछ पार्क में घूम कर सुबह की ताजा हवा का आनंद ले रहे थे। एक आध गाड़ी ही कभी-कभार सड़क से गुजर रही थी। सुबह की हवा में ठंडक के साथ ताजगी थी समाई थी। परंतु कही मन के किसी कोने में एक दर्द भी जमा हुआ था। नेहालता की बिदाई का। इसलिए पेंटल ने सोचा की अभी तो दफ्तर जाने में काफी देर है। तो क्यों न यहीं उतर का समुंदर किनारे कुछ सैर की जाये। तब उसने ड्राइवर को कहा की आप गाड़ी यहीं साइड़ में लगा दीजिए। मल्होत्रा जी ने कहां की यहां क्यों उतर रहे हो स्टेशन तो अभी काफी दूर है।

पेंटल के कहां की पापा जी अभी तो दफ्तर जाने में काफी समय है। तो सोच रहा हूं कुछ समय यहां समुंदर किनारे सैर कर ली जाये। और उसने दोनों के पैर छुए और बिदाई ली। गाड़ी आगे बढ़ गई तब मल्होत्रा जी ने कहा की लड़का बहुत नेक दिल और सभ्य है। इसका दोस्त भी जरूर इसी तरह का होना चाहिए। क्योंकि समान लोगों में ही मित्रता लम्बी चलती है, और ठहरती है। समुंदर पास ही था। पेंटल जाकर एक चट्टान जो सागर तट के पास ही थी वही पर बैठ गया। दूर से आती हुई लहरे कैसे एक मधुर शोर कर रही थी। कैसे सागर उसांस ले रहा था, लगता था की समुंदर स्वांस ले रहा है। क्या जल भी जीवित और मृत हो सकता। ऐसे ही ये विचार उसके मन में उठा। जिसके बारे में उसने इससे पहले कभी सोचा भी नहीं था। तो ये सब विचार क्या हमारे सब खूद के होते है या वातावरण या चित दिशा वहां पर तैरते विचारों को पकड़ लेता है। क्यों अंदर देखने से नहीं लगता था की ये विचार खुद उसके है। या मानो समुंदर से तरता हुआ विचार उसके पास से हवा के झोंके की तरह से गुजर गया और वह उस में सरा बोर हो गया। फिर आज वह बहुत खुश था की अब एक उम्मीद थी की उसका दोस्त ठीक हो जायेगा।

उसने जैसा सोचा था काम उससे भी आसान हो गया। क्योंकि उसने नहीं सोचा था की वह नेहालता को मना पायेगा। की वह उसके दोस्त के पास जाये। परंतु ये तो उसके मन में था की वह अधिक नहीं तो एक बार उसकी हालत तो जरूर देख कर आये। और वह जानता था की अगर वह वहां चली जाती है तो मेरे दोस्त की हालत देख कर वापस आना उसके लिए कठिन होगा। परंतु अगर वह किसी तरह से आ भी जाती है। तो एक भ्रम सदा के लिए खत्म हो जाता की वह लड़की आती और सोम प्रकाश ठीक हो जाता। जिसके मन में प्रेम नहीं, दया भाव या संवेदना नहीं वह आदमी तो खूद ही एक पत्थर है। वह किसी तरह से दूसरे पत्थर को कैसे पिघला सकता है। उसके लिए एक तरलता चाहिए। जल की तरह से की वह धीरे-धीरे अपने स्पर्श से उस कठोर से कठोर पत्थर को भी रेत बना देता है।

न जाने कितनी देर वह ये सब सोचता रहा। दूर समुंदर से लहरे आती हुई दिखाई दे रही थी। और वह जब किनारे के पास जैसे-जैसे आती थी उनका आकार बड़ा हो जाता था। दूर से तो कितनी शांत आती दिख रही होती थी। मानो कोई लहर है ही नहीं एक शांति अपने में समेटे कोई पतली सी लकीर आ रही है। परंतु जब वह किनारे से टरकती तो कैसे छपाक से आवाज कर के छिटक जाती। मानो अपने आने का एहसास और ताकत किनारों को दिखा रही हो।


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