(सदमा - उपन्यास)
उन
दोनों को इसी तरह से छोड़ कर नेहालता को अचानक कुछ याद आया। कितनी देर से नानी
गायब है। वह उन्हें पुकारती हुई अंदर गई, की
नानी-नानी तुम कहां हो। नेहालता की आवाज सुन कर नानी ने आवाज दी की मैं यहां हूं, बेटा क्या काम था?
हरिप्रसाद जो अभी सोम प्रकाश के चरणों में कुर्सी के पास लेटा था, नेहालता को जाते देख कर उसके साथ हो लिया। नानी किचन में खाना बनाने की
तैयारी कर रही थी। तब नेहालता ने कहां की आप रहने दो मैं ये सब कर लुंगी। तब नानी
ने कहां की बेटा आपका जितना अधिक समय सोम प्रकाश के साथ गुजरेगा वह उसके लिए उतना
ही अच्छा होगा। तब अचानक नानी ने हरिप्रसाद को खड़े हुए देखा और नाराज होने के भाव
से कहां की शैतान कहां था। दो दिन से क्या तुझे पता नहीं था की नेहालता आने वाली
है। से सब सुन का हरि प्रसाद ने अपनी पूछ हिला कर नानी की बात को जवाब दिया। नानी
ने नेहालता को कहां की इसके लिए दूध और रोटी रखी है। आप थोड़ा सा दूध गर्म कर के
उसमें रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े तोड़ कर के इसे दे दो। मेरे हाथ में सब्जी है वह
जल जायेगी। किचन में बहुत मधुर खुशबु आ रही थी। तब नेहा ने कहा की नानी क्या बना
रही हो। तब नानी ने कहां की बेटा लाला चौलाई की सब्जी बना रही हूं। साथ में रोटी
और छाछ हो जायेगी।
नेहा लता ने दूध को थोड़ा गर्म किया और उस में रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े कर के डाल रही थी। ये सब पास में बैठा हरिप्रसाद बड़े गोर से देख रहा था की ये सब मेरे लिए हो रहा है। और जब नेहालता ने उसके सामने रखा तो खुश होकर वह उसे खाने लगा।
तब नानी ने कहां की नेहालता ये पागल दो दिन से न जाने कहां गायब था। और इस बीच नेहालता खाना बनाने में नानी की मदद करने लगी। सब्जी बस अब बनने वाली ही थी। तब नानी ने कहां की नेहा लता थोड़ा सोम प्रकाश को टहला लाती तो अच्छा होता। परंतु तुम तो यहां के रास्तों से अनभिग हो। चलों हम सब चलते है। क्योंकि वैद्य जी ने कहां था की जितना ये चलेगे। उतना ही इनके लिए ठीक होगा। और हवा पानी के साथ दवा अपना अधिक प्रभाव दिखलायेगी।घर का दरवाजा बंध
कर के नानी और नेहा लता सोम प्रकाश के पास आई और कहने लगी की चलों थोड़ा टहल कर
आते है। तब सोम प्रकाश को एक पतली सी चादर औढ़नें के लिए दे दी। धूप काफी तेज थी।
परंतु ऊंचे विशाल वृक्षों के बीच से गुजरने में ठंडक लग रही थी। तब नानी ने कहां
की मैं तो ज्यादा दूर तक इसे नहीं ले जा सकती बस उस वृक्ष तक जाकर वहाँ कुछ देर के
लिए विश्राम कर के हम वापस आ जाती हूं। तुम आ गई हो तो कुछ और दूर यानि कभी-कभी
झील तक भी ले जा सकती हो। सुबह श्याम को ही नहीं दिन में भी झील का सौंदर्य उतना
ही अपूर्व होता है। तब वह हरिप्रसाद भी उनके साथ ही था। वह अपनी पूस्तेनी कानूनी
कार्यवाही करता साथ चल रहा था। सोम प्रकाश नेहा लता का हाथ पकड़े चल रहा था। नानी
अपना डोगा लिए संग-संग चल रही थी। उस विशाल वृक्ष के पास पहुंच कर नानी एक पत्थर
पर बैठने के लिए कहने लगी तब नेहा लता ने कहां की नानी आप अब घर जा सकती हो। मैंने
रास्ता देख लिया है। फिर हरी प्रसाद भी तो हमारे साथ है।
कुछ और आगे तक नेहा
लता सोम प्रकाश को ले जाना चाहती थी। परंतु नानी वही पत्थर पर बैठ गई। अभी मोड़ के
मुड़ने के बाद करीब आधा मील और चलना होता तब जाकर झील आती। परंतु उससे छूकर आती
हवा ये अहसास करा रही थी कि आप पास कहीं न कहीं पानी है। ऊंचे सफेदे के वृक्ष के
बीच से गुजरती हवा कैसे किलकारी मारती एक अल्हड़ सी प्रतीत हो रही थी। उसके पतले
लम्बे पत्ते कैसे झूमते नाचते से प्रतीत हो रहे थे। हरिप्रसाद कभी सोम प्रकाश के
पास आता तो पल भर में नानी के पास वापस चला जाता, जो
उसके लिए एक विपरीत कार्य था। उसे लगता था की दोनों की रक्षा करना उसका कार्य है।
अब नानी तो इतने पीछे रह गई। और ये लोग है की आगे-आगे चले ही जा रहे है। वह अब
किसी को न रोक कर अपनी चौकसी को चार चौकस किए हुए इधर उधर भाग कर निभा रहा था। कुछ
और आगे चलने पर नेहालता ने सोम प्रकाश से पूछा की झील कितनी दूर है। तब सोम प्रकाश
ने कहां की वह तो अभी कुछ दूरी पर है। नेहालता को लगा की हम आपस में बात कर सकते
है।
तब नेहालता ने सोम
प्रकाश से कहां की तुम तो बचपन में यहां आते होगे। और क्या तुम अकेले आ जाते थे।
तब सोम प्रकाश ने एक बार नेहा लता को देखा और कहां की हां आ जाता था। तुम क्या उस
झील में नहाते भी थे। तब सोम प्रकाश ने कहां हां नहाता था। उसका पानी तो बहुत ठंडा
होता होगा। तुम्हें तैरना कब सीखा....बातों में बात निकालने का मार्ग नेहा लता को
मिल गया। कुछ दूरी पर बड़े विशाल पत्थर थे। अपने अंदर एक नीलिमा समाये बहुत सुंदर
लग रहे थे। साथ ही उनका चिकना बदन और भी लुभावना लग रहा था। तब नेहा लता ने पूछा
की तुम जब बच्चे थे तो इन पत्थरों पर चढ़ जाते होगे। सोम प्रकाश ने अचरज से नेहा
लेता की और देखा फिर कहां हां परंतु मैं तो आज भी चढ़ सकता हूं। परंतु तुम कौन हो।
पहले हमारे घर में तो नहीं रहती थी। इस प्रश्न के लिए नेहालता तैयार नहीं थी।
नेहालता ने कहां की
तुम मुझे नहीं पहचानते। परंतु मैं तो आपके साथ इस घर में कई महीनों रही थी। हम
साथ-साथ खाते थे। बंदर का खेल करते थे। आपको कुछ याद आया। तब अधिक जोर देने पर सोम
प्रकाश ने कहा की नहीं कुछ याद नहीं आ रहा है। तो क्या तुम नानी को जानते हो। तब सोम
प्रकाश ने कहां की हां नानी तो मेरी मां है। उसने ही मुझे पाला है। और क्या तुम इस
को...हरिप्रसाद की और इशारा कर कहां की इसे पहचानते हो। और सोम प्रकाश ने कहां की
हां ये हमारा हरी प्रसाद है। तब तुम सब को पहचानते हो परंतु मुझे नहीं पहचानते।
मैं ही तो हरी प्रसाद को लेकर आई थी। परंतु ये सब बहुत विरोधाभाषी था। सोम प्रकाश सब
को पहचान रहा था परंतु केवल नेहालता को नहीं पहचान रहा था। ऐसा कैसे हो सकता है।
ये एक अजीब बात नेहा लता को लगी। तो अब क्या किया जा सकता है।
वह सोचते-सोचते जब
वह दोनों आगे बढ़ रहे थे तो सामने एक बैठने लायक पत्थरों की श्रृंखला दिखाई दि और नेहा
लता ने सोम प्रकाश को कहां की वहां चल कर बैठते है। और वह दोनों एक पत्थर पर जाकर
बैठ गए। सामने जो पर्वत श्रृंखला दिखलाई दे रही थी। वह एक अद्भुत सौंदर्य अपने में
लिये खडी थी। वहां से बैठ कर उन पहाड़ों का नजारा देखने ही बनता था। दूर तक जहां
तक नजर जाती थी। केवल हरियाली का ही साम्राज्य था। नेहालता ने गहरी श्वास ली जो
उसके फेफड़ो में गहरे उतर गई। इतनी स्वच्छ हवा तो इससे पहले उसने बॉम्बे (मुम्बई)
में महसूस नहीं की थी। उसे एक उम्मीद थी की इस हवा पानी के और संग साथ के कारण सोम
प्रकाश जल्दी ही पहले की तरह से स्वास्थ्य हो जायेंगे।
लेकिन धूप होने पर
भी हवा में कुछ ठंडक थी। इसलिए वह ज्यादा देर वहां नहीं बैठ पाये क्योंकि नानी भी
उनके साथ थी। और वह पीछे बैठ कर उनका इंतजार कर रही होगी। यहीं सब सोच कर नेहालता
ने कहा की अब हम चले। नानी वहां हमारा इंतजार कर रही होगी। सोम प्रकाश अब किसी बात
का विरोध नहीं करता था। इस बात से उसे विश्वास था की जरूर समय लगेगा लेकिन सोम
प्रकाश को आराम आ जायेगा। सामने ही झाडियों में हरिप्रसाद अपनी कानूनी कार्यवाही
करता हुआ घूम रहा था। जब नेहालता ने उसे आवाज दी तो वह भाग कर उनके पास आकर बैठ
गया। तब नेहा लता ने कहां की पागल तू थक गया। अब तो घर चलने का समय हो गया है। और
मानो वह नेहालता की बात समझ कर खड़ा हो गया और उनके आगे-आगे चलने ही नहीं लगा, तेज भाग कर वह नानी के पास पहुंच गया। इस से नानी समझ गई की वो लोग भी अब
इधर ही आ रहे है। और वह अपने चश्मे को सम्हाले हुए कूलती-करहाती उठने की कोशिश
करने लगी। है राम....और अपने चिर परिचित अंदाज में डंडे को टेकती हुई घर की और चल
दी क्योंकि वह तो जानती थी कि इस उम्र में वह तेज नहीं चल सकती है। और वो लोग
कितना भी आराम से चले उसकी इस चाल के चलते तो घर तक अवश्य ही पकड़ लेंगे।
इतनी देन में एक
कार उनसे कुछ आगे जाकर रूकी। जिसमें से एक महिला निकली। जो देखने में अति सुंदर
थी। बनाव सिंगार और चाल चलन से भी सभ्य लग रही थी। लेकिन नेहा लता उन्हें नहीं
पहचानती थी। परंतु सोम प्रकाश तो उन्हें पहचानते थे। तब नेहा लता ने पूछा की कौन
है ये महिला क्या तुम इन्हें पहचानते हो। तब सोम प्रकाश ने हां में गर्दन हिला कर
कहां की हां। इतनी देर में वह महिला पास पहुंच कर दोनों हाथ जोड़ कर नेहालता को
प्रणाम करने लगी। नेहा को कुछ झिझक भी हुई की वह मुझसे अधिक बड़ी है। फिर भी पहले
प्रणाम कर रही है। नेहा लता ने आगे बढ़ कर उनका स्वागत किया की। मैंने आपको पहचाना
नहीं। तब सोनी ने कहा की हम इस से पहले एक दूसरे से आमने सामने नहीं मिले है परंतु
परिचय एक दूसरे का आपस आदान प्रदान होता ही रहा है।
मेरा नाम सोनी है।
मैं इनके स्कूल के प्राचार्य या प्रिंसिपल की पत्नी हूं। तब नेहालता ने कहा अरे
मुझे माफ करना मुझे तो आपकी एक झलक देख कर ही समझ जाना चाहिए था। क्योंकि पेंटल जी
ने आपके विषय में मुझे सब कुछ बतला रखा है। और मेरे पास आपका पता व फोन नम्बर भी
था। अगर मुझे कोई परेशानी हो तो आप इनकी मदद ले सकती हो। परंतु यहां आने पर कोई
परेशानी नहीं हुई फिर देर रात तो में आई ही थी। और देर से सो कर उठी बस चाय पीकर
हम यहां घूमने चले आये। आपके बारे में सोचने बस फुरसत ही नहीं मिली। परंतु आपने
अच्छा किया आप आ गई। आप से मिल कर सच ही मुझे बहुत अच्छा लगा। मानो में आपको सालों
क्या जन्मों से परिचित हूं। आप मुझे अपने परिवार की एक सदस्य सी लग रही है। ऐसे ही
ठीक नानी को देख कर मुझे लगा था।
इतनी देर में वो शैतान
हरि प्रसाद गाड़ी को देख कर नानी के पास से भाग कर वापस आया और सोनी के कंधों पर
पैर रख कर खड़ा हो गया। तब सोनी ने कहां की यह श्याम से ही मुझे परेशान कर रहा था।
वहां से भागने के लिए परंतु रात होने के कारण मैंने इसे नहीं निकलने दिया इस ने
रात को कुछ खाया भी नहीं। एक दम सुबह होते ही जैसे ही इसे खोला ये वहां से नौ दो
ग्यारह हो गया। मैं तभी समझ गई थी की ये आपसे मिलने आया है। परंतु आप तो इसे नहीं
पहचाना होगा। क्योंकि उस समय तो यह बहुत छोटा था,
परंतु ये आपको पहचान लेगा। और सोनी ने सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर कहां मास्टर जी
आप कैसे हो देखो आप कितने भाग्य शाली है आपसे मिलने के लिए हजारों मील दूर से कोई
आया है। और आप उसके साथ ऐसे चल रहे हो की आप एक दूसरे को पहचानते ही नहीं। इस बात
पर सब हंस दिये परंतु हरिप्रसाद सब को भौंक कर आगाह कर रहा था की हंसने की बात
नहीं जल्दी से घर चलो।
उसकी ये बात सुन कर
सोम प्रकाश कुछ मुस्कुराया। उसकी मुस्कुराहट में भी कोई खिला पन नहीं था। बस एक
प्रतिछवि मात्र बन खुशी की लहर चेहरे पर आ गई सी लगती थी। सोनी ने कहां की चलों
कार में बैठो। ये बात सून का हरिप्रसाद तो कार की और लपका। और दरवाजे के पास जाकर
खड़ा हो गया। ड्राइवर ने जैसे ही दरवाजा खोला वह तो सीट पर चढ़ कर ऐसे बैठ गया
मानो कार उसके ही लिए आई है। तब नेहा ने कहां की नहीं दीदी आप चलों मैं इन्हें
लेकर आती हूं। स्वामी जी ने इन्हें चलने के लिए कहां है। की कम से कम दो-चार मील
अगर वह चल सकेगा तो इनके शरीर में खून का प्रवाह तेज होगा। और मस्तिष्क को अधिक आक्सीजन
मिलेगी। जिससे इनके मस्तिष्क में बारीक स्नायु तंत्र अधिक सजग होगा। आप चलो बस हम
आपके पीछे-पीछे आ रहे है। देखो उस शैतान को वह तो कार में जाकर बैठ भी गया। हां
आगे शायद आपको आगे नानी जी मिलेगी उन्हें बिठा लेना। वह भी हमारे साथ ही आई परंतु थक
जाने के कारण रास्ते में ही वह बैठ गई थी।
नानी का नाम सुन कर
सोनी अति प्रसन्न हुई और कहने लगी की आप लोग भी जल्दी से आना। मैं नानी को लेकर घर
चलती हूं। और सोनी को चलते हुए देख कर उसके शरीर की बनावट को देख कर नेहालता को लगा
की जरूर ये गर्भ से है। सच सोनी के चेहरे का सौंदर्य अभूतपूर्व था,
वह भी दो तलो का। मानो एक चेहरे पर कोई दूसरा मुखौटा चढ़ा दिया गया
हो। ये बात अचानक उसके मस्तिष्क में आई। न उसने आज से पहले कभी पढ़ी थी और किसी से
बात करने का तो मतलब ही नहीं था। और इतनी सी उम्र में इस तरह की यार दोस्त बात भी
नहीं करते, और शायद इस विषय में न ही वे सब जानते है। उसकी
चाल में भी एक गर्व-गौरव एक गरिमा थी। जिस देख कर अचानक उसके मन में आया की हो न
हो इनको जरूर गर्भ में लड़का ही होगा। और वह सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर सड़क
किनारे से बचाते हुए आगे बढ़ने लगी। कहीं-कहीं सड़क टूट जाने से उनमें अधिक गढ़े
हो गए थे। जिनमें बरसात का पानी जमा हो कर सूख गया था।
सोम प्रकाश जाती
हुई सोनी को देख रहा था। और एक और वह नेहालता को भी देख रहा था। और समझने की कोशिश
कर रहा था की ये कौन है। और हम क्यों साथ सच चल रहे है। थोड़ा दूर चलने पर ही सोनी
को नानी जाती हुई दिखाई दे गई। उसने ड्राइवर को कहां की नानी के पास जाकर गाडी साइड़
में लगा देना। गाड़ी साइड़ में लग जाने के बाद सोनी नीचे उतरी और नानी के चरण
स्पर्श किए और कहां की वह गाडी में चले तब नानी ने उसकी और देखा और कहां सदा खुशी
रहो। परंतु बेटा पीछे सोम प्रकाश और....नानी इतना ही कह पाई थी की बात सोनी ने
पूरी कर कहां की हां मैं उन से मल कर ही आ रही हूं। नेहालता सोम प्रकाश को घूमती
हुई लेकर आ रही है। कह रही थी की इनका घूमना इनके लिए अच्छा है इसलिए मैंने जिद्द
नहीं की। परंतु आप तो चलों गाड़ी में बैठो नहीं तो अधिक थक जाओगी।
तब नानी कार की और
बढ़ी तो देखा की हरी प्रसाद तो पहले ही गाड़ी में सज़ा हुआ है। तब नानी हंसी की ये
राजा तो गजब का है। इसे तो कार में बैठने का आनंद आ गया। और नानी आगे की शीट पर
ड्राइवर के साथ बैठ गई क्योंकि पीछे तो वह शैतान हरिप्रसाद बैठा हुआ था। घर अधिक दूर
नहीं था पाँच मिनट में ही घर पहुंच गए। इसलिए शायद नेहालता ने मना कर दिया था की
इतना तो कम से सोम प्रकाश को रोज घूमना ही चाहिए। एक दो दिन में जब वह सब रास्तों
को पहचान लेगी तो सुबह श्याम दोनों समय भी घूमाने के लिए लाया जा सकता है। यूं
एकांत में सोम प्रकाश के साथ उसे भी अच्छा लगे रहा था। ये सुहाना मौसम और इतने
सुंदर रास्ते उसे शहर में कहां मिलने वाले थे और वो दिन के दोपहर में।

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