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रविवार, 29 मार्च 2026

31-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-31

(सदमा - उपन्यास)

सुबह नेहालता काफी देर तक सोती रही। क्योंकि वह एक लम्बा सफर तय कर के आई थी। नानी ने भी उसे नहीं उठाया था। परंतु सोम प्रकाश जल्दी ही उठ गया था। इसलिए वह सामने खुले आँगन में नानी के साथ घूम रहा था। वह बार-बार कमरे के अंदर की और देखना चाह रहा था। ये सब नानी देख रही थी की शायद उसे नेहालता के आने का कुछ भान तो जरूर है। इसलिए उसे लगता होगा की अगर वह आई थी तो अब कहां है। देर से नेहालता उठी तब सोम प्रकाश और नानी को सामने आँगन में घूमते हुए देख कर कुछ झेप गई। अपने अंतस में ही सोचती रही की मैं कितनी देर तक सोती रही। तब नानी मेरे बारे में क्या सोचेगी। वह उठ कर सीधी नानी के पास पहुंची और कहने लगी की आपने मुझे उठाया क्यों नहीं नानी जी। तब नानी ने कहा की यहां कौन काम पड़ा था। कल सफर में तुम बहुत थक गई थी, इसलिए मैंने सोचा की सोने से तुम्हें कुछ तो आराम ही मिलेगा। अब तुम सोम प्रकाश के साथ घूमो मैं चाय बना कर लती हूं। तब नेहा लता ने कहा की नहीं नानी मैं बनाती हूं चाय। तब नानी हंसी और कहने लगी आज आप मेरे हाथ की चाय पिंजिए फिर बाद मैं तुम्हारे हाथ की चाय पिया करूंगी।

और नेहालता सोम प्रकाश के साथ घूमने लगी। नेहालता सोच रही थी की बात कहां से शुरू की जाये। वो दोनो एक प्रकार से तो एक दूसरे को जानते थे, परंतु फिर भी कहां जानते थे। मानो ये रिसता कितना अजीब था जानते हुए भी न जानना।

धूप के साथ हवा में अभी भी ठंडक थी। सामने पहाड़ी पर छोटे-छोटे बादल तैर रहे थे। जो देखने में बहुत सुंदर लग रहे थे। दूर जो सफेदे के विशाल वृक्ष थे वो मानो पहाड़ों और बादलों से अपनी उंचाई का मुकाबला करना चाह रहे थे। इतने विशाल सफेदे के वृक्ष नेहालता ने आज से पहले कहीं नहीं देखे थे। देखे थे हिमालय में देव दार, चीढ़, शुरू के विशाल वृक्ष, परंतु यहां पर इस उंचाई पर इन सफेदे के वृक्षों की विशालता देखते ही बनती थी। हवा जब उनके पत्तों से टकरा कर गुजरती थी तो कैसी सर-सर की मधुर आवाज गुंजती थी वातावरण में। दो तीन चक्कर ही उन लोगों ने लगाये थे। एक दम से अनबोले। इतनी देर में नानी ने आवाज दी की आ जाओ बच्चों चाय तैयार है।

नेहालता ने चाय कप में ढाली और सोम प्रकाश के हाथ में दी। एक बार उसने चाय को दूसरी बार उसने नेहालता को देखा। उसकी आंखों के साथ उसका मस्तिष्क उसे पहचानने की कोशिश कर रहा था। फिर सब चाय पीने लग गये। चाय सच ही नानी ने बहुत स्वाद बनाई थी। हर कार्य में आदमी की अपनी छाप होती है। आप को वही सामान वही सब दे दिया जाये परंतु प्रेम और भाव और बनाने का तौर तरीका उसके स्वाद को बदल देगा। नेहा लता ने पूछा की नानी ये स्नान कर लेते है खुद से। हां बेटी पानी गर्म कर के बाल्टी में डाल देती हूं। ये नहा लेते। परंतु इतनी अच्छे से नहीं नहा पाते मैं कई बार कहती हूं कि मैं नहला देती हूं परंतु ये मना कर देते है। चाय पीने के बाद नेहालता अंदर गई और एक तेल की शीशी ले कर आई। उसने कहां की नाना आप पानी गर्म कर दो। इतनी देर में इनके सर में तेल लगा देती है। एक तो इनके बाल कितनी रूखे हो गए है। दूसरा ये बादाम का तेल है इससे मस्तिष्क को थोड़ी ठंडक मिलेगी। से सब देख कर नानी की आंखों में पानी भर आय। और वह बर्तन उठा कर अंदर चली गई।

नेहालता ने तेल की शीशी सामने टेबल पर रख कर उससे थोड़ा सा तेल हथेली के बीच में रख कर सोम प्रकाश के सर बीचों-बीच लगना शुरू किया जहां पर सहस्रार चक्र होता है। यानि की अध्यात्म की भाषा में सातवां चक्र। सोम प्रकाश ने नेहालता का हाथ पकड़ लिया। कि रहने दो नेहा लता ने कहां की इससे आपके सर में जो भारी पन रहता है। उससे आपको आराम मिलेगा। तब सोम प्रकाश ने कोई विरोध नहीं किया। और अपने सर को कुर्सी से टीका कर लेट गये और अपनी आंखें बंद कर ली। नेहालता की उंगलियां सोम प्रकाश के सर के एक-एक पौर को, बालो की जड़ों पर तेल लगा रही थी। उसकी छुअन में एक प्रेम था एक अपना पन था। जिससे सोम प्रकाश को बहुत ही अच्छा लग रहा था। कितनी देर तक वह मालिश करती रही। उपर से धूप सोने पर सुहागा का कार्य कर रही थी। सोम प्रकाश की आंखें बद हो रही थी। वह एक गहरी निंद्रा में प्रवेश कर रहा था। आज वह पहली बार किसी अपने की छुअन को महसूस कर रहा था। जो मानो उसकी शुष्क जमीन पर प्रेम की बारिश का कार्य कर रही थी। नेहा लता की उंगलियों के माध्यम से प्रेम की एक सीतलता उसके तन में प्रवेश कर रही थी।

कितना सुखद लग रहा था, सोम प्रकाश को। ये उसके चेहरे से ही महसूस हो रहा था। उसके चेहरे पर एक शांति फैल रही थी। कितनी दिनों से पूरे शरीर में एक दर्द, एक तनाव भरता ही जा रहा था। किसी भी मार्ग से निष्कासित हो ही नहीं रहा था। प्रेम भी एक चमत्कार है। प्राणी को जो सबसे अनमोल मिला है, परमात्मा की और से वह प्रेम है। शायद प्रेम में ही परमात्मा ने अपने को समाहित कर लिया है। जहां प्रेम है वहां परमात्मा का वास होगा ही। ये दोनो युग पथ ही समझो। आज पहली बार नेहा लता को पता चला की प्रेम पाना और प्रेम देने में क्या विभेद है। वह अब तक केवल प्रेम पाती ही रही। माता-पिता से बचपन से आज तक उसे प्रेम केवल उपहार स्वरूप मिला। उसे उसको बाटने का मोका ही नहीं मिला। अभी उसके जीवन में कोई ऐसा पुरूष भी प्रवेश नहीं कर पाया जिस पर वह प्रेम की वर्षा कर सके।

सच ही वह प्रेम में बहते-बहुत सजीव हो रही थी। ये आप उसके कार्य से ही महसूस होता देख सकते हो। उसकी उंगलियां तो सोम प्रकाश के सर पर उसके चेहरे की भ्रूणीय, माथे पर पलकों पर, गर्दन पर कार्य कर रही थी परंतु उसके चेहरे पर एक प्रेम की अपूर्व वर्षा हो रही थी। सोम प्रकाश अपनी आंखों बंद किए हुए इसमें सरा बोर हो रहा था। नानी दूर से ये सब देख रही थी। परंतु उसे ये सब बहुत अच्छा लग रहा है। वह सोच रही है। मेरा बेटा कितना भाग्य शाली है। जो उस पर ये प्रेम की महिमा बरस रही है। उसे नाना के वे दिन याद आ गए। उनके जमाने में प्रेम को आदान-प्रदान करने के तोर तरीके थोड़ा भिन्न थे। समय बदलता है । आदमी का मन बदलता है। वह विकसित होता है। वह परिपक्व भी होता है। इस सब के कारण उसमें एक साहास आ जाता है। उस पर समाज का दबाव कम होना शुरू होता है। परंतु ये सब कुछ सब के लिए नहीं है। प्रेम पथ था तो उस युग में भी परंतु उसका मार्ग थोड़ा भिन्न था। जिस तरह से नाना नानी को प्रेम करते थे। सब आस पड़ोसी उनके इस प्रेम को देख कर ईशा महसूस करते थे।

सास के गुजर जाने के बाद तो वह और भी साहसी हो गए थे। आँगन में बैठ कर उसके बालों में कैसे तेल लगाने लग जाते थे। खूद नानी को थोड़ी झिझक आती थी। की मर्द होकर तुम ये किस तरह का कार्य कर रहे हो। तब नाना हंसते की मर्द तो मैं हूं परंतु ये किसने कहा की मर्द सर में तेल नहीं लगा सकता। मैं अपनी मां के सर पर भी लगता था। हां सेना में जब बंदूक हाथ में होती थी तो यही हाथ वहां पर मर्द कहलाने का कार्य करते थे। स्थान भिन्न तो कार्य भी भिन्न सच ही वह जरा भी झिझक महसूस नहीं करते थे। वो दोनों कितनी दूर तक शहर करने के लिए चले जाते थे। जबकि आस पड़ोस की कोई पति पत्नी ऐसा करने का साहास नहीं दिखा पाते थे।

कितनी देर नानी खड़ी नेहालता को सोम प्रकाश के सर में तेल लगाते देखती रही। अचानक उसे ख्याल आया कि उधर जो उसने नहाने का पानी बाल्टी में डाला है वह तो ठंडा हो चूका होगा। तब वह सचेत हो कर आवाज लगाती है कि बेटी पानी मैंने गर्म कर दिया है। सोम प्रकाश को ले आओ नहा कर फिर चाहे तो धूप में बैठ सकता है। नेहा लता ने एक बार सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर खड़ा किया वह उसके साथ एक बच्चे की तरह से चल दिया। तब वह उसे स्नान घर में ले जाकर उसके कपड़े उतारने लगी। तब उसने मना कर दिया और कहां की तुम बहार जाओ। आज पहली बार उसने सोम प्रकाश की आवाज सूनी थी। और वह कपड़े उतार कर स्नान करने लग गया। अचानक बहार खड़ी नेहा लता को कुछ याद आया की हमारा हरी प्रसाद कहां पर है। तो वह सामने खड़ा उसे देख रहा था। कुछ देर तक तो हरिप्रसाद उसे एक टक ऐसे ही देखता रहा फिर अचानक वह तेजी से भागा और अगले दोनों पेर नेहालता के कंधे पर रख कर खड़ा हो गया। और अपनी शेतानियत से उसने अपनी जीभ नेहा लेता के मुख में डाल दी। इस सब के लिए नेहा लता तैयार नहीं थी। और फिर मारे खुशी के वह रो-रो कर इधर उधर दौड़ने लग गया। अपनी खुशी को दर्शाने के लिए कि अच्छा किया तुम आ गई। कि इतने दिन से तुम कहां चली गई थी। मैं तुम्हें कहां-कहां तक ढूंढ कर आया था। परंतु तुम तो मुझे कहीं नहीं मिली।

ये सब इतनी जल्दी हुआ की नेहा लता को कुछ समझ नहीं आ रहा था। की कल से वह यहां पर आई हुई है। तो ये पागल हरिप्रसाद कहां था। तब हरिप्रसाद आकर नेहा लता के पैरों में लेट-लेट कर उसे खुश करने की कोशिश और धन्यवाद भी दे रहा था की अच्छा हुआ तुम आ गई मैं तो कब से तुम्हारे आने का इंतजार कर रहा था। कुत्ता चाहे कितना ही बड़ा हो जाये उसका मन तो एक छोटा से बच्चा सा ही रहता है, एक प्रेम से भरी झील की तरह से। उसने जब वह फोटो देखी थी हरिप्रसाद की, तब तो वह बच्चा ही था, उसकी गोद में खेलता हुआ सोता हुआ भागता हुआ। और इन कुछ ही महीनों में वह तो पूर्ण कुत्ता बन गया था। सच पशुओं में कुत्ता भी अति विचित्र प्राणी है। हिंदु इस बात को जानते थे। और इसकी महानता के लिए इसे एक देवता के साथ जोड़ दिया ताकि समाज में इसे एक विशेष दर्जा इसे मिल सके। लोग इसे अपने अंग संग महसूस करें। शिव के एक गण यानि कि भैरव के साथ। सच ही कुत्ता अपने अंदर एक विशेष गुण समेटे हुए है। वह है प्रेम का। सभी पशुओ में कुत्ते में जल तत्व की प्रचुरता सबसे अधिक पाई जाती है। और जल तत्व ही प्रेम का सागर है। इसलिए कुत्ता आति प्रेम पूर्ण प्राणी है। सभी पशु पक्षियों में।

जिस मनुष्य में भी अगर जल तत्व अधिक है तो वह अति प्रेम पूर्ण होगा। इसलिए आपने देखा की जब आप जल के पास जाते हो तो मन को बहुत ही अच्छा लगता है। मन एक जल की तरह से है या यूं कह सकते है मन जल है, तरल है। इसलिए उसे तीनों आयामों में परिवर्तन किया जा सकता है। तरल, बर्फ या वाष्पी करण। नेहा लता अपने और हरिप्रसाद के प्रेम को जानती नहीं थी। शायद उसका अचेतन जरूर जानता हो। क्यों कि उनके तो घर पर कुत्ता नहीं था। इसलिए वह बचपन से ही कुत्ते से बहुत डरती थी। आप इस बात को गोर से देख ले की कुता पागल आदमी को जरूर भोंकेगा। और पागल आदमी भी कुत्ते को जरूर मारेगा। इसलिए नेहा लता हरिप्रसाद को देख कर अंदर कुछ भय भीत भी हुई। परंतु अपने इस भय को उसने अपने अंदर छुपा रही थी। अब यहां देखने वाला भी कोई नहीं था। और शोर मचाने से कुछ फायदा भी होने वाला नहीं था। इसलिए वह चुप ही रही। उसने अपने आप को हरिप्रसाद के हवाले कर दिया। शायद इस बात को हरि प्रसाद भी समझ गया। और वह अपनी मालकिन के चरणों में लेट कर आभार व्यक्ति करने लगा।

इस सब से नेहा लता को थोड़ी हिम्मत आई। कुछ देर इसी तरह से खड़ी रह कर उसने गहरी श्वास ली और फिर साहास कर वह नीचे बैठ गई और हरिप्रसाद के सर पर डरते-डरते हाथ फेरने लगी। हरि प्रसाद अपनी आंखें बंद कर के थिर हो कर लेट गया। इससे नेहा लता का डर कुछ कम हुआ और वह इसी तरह से उसके सर पर उसकी पीठ पर प्रेम से हाथ फेर कर सहलाती रही। तब उसकी आंखें अचानक बंद हो गई। वह अपने अंदर देख रही थी। की उसके मन का भय उसके हाथों के माध्यम से बाहर बहे जा रहा है। उसे अपने अंदर एक हल्का पन महसूस हो रहा था। आज से पहले उसने ऐसा चमत्कार नहीं देखा था। उसके तन का मन का तनाव एक दम से कम हो गया। अपने अंदर एक कांपती नेहा लता की बजाए एक थिर और शांत नेहा लता को महसूस कर रही थी। गजब का विज्ञान है। उसने कुत्ते के विषय में ये कभी सोचा भी नहीं था। उसे एक चाबी मिल गई जो उसके बंद द्वार खोल सकती है। जो उसने खुद अनुभव किया था उसे वह कैसे अस्वीकार कर सकती थी। तब उसने आंखें खोल कर देखा तो हरिप्रसाद अपने बदन को छोड़ कर किसी गहरी निंद्रा में प्रवेश कर गया था।

उसे लगा की अगर इसका संग साथ अपने और सोम प्रकाश के संग अधिक से अधिक किया जाये तो जरूर सोम प्रकाश के मन की जमी बर्फ भी जरूर पिघलेगी। तब उसने निर्णय ले लिया की वह अकेली नहीं है उसके साथ प्रकृति का प्रेम भी है, जो हमारे हर कदम पर उसके साथ है। इतनी देर में सोम प्रकाश नहा कर बाहर आ गये। अचानक हरिप्रसाद उठा और अपने मालिक की और चला। परंतु सोम प्रकाश ने उस और कोई ध्यान नहीं दिया और वह धूप में जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। तब हरिप्रसाद उनके पास खड़ा हो कर अपनी पूंछ हिला कर उनका ध्यान अपनी और खिंच रहा था। तब नेहालता उसके पास आई और सोम प्रकाश के बालों को तौलिया से सूखने लगी। और सोम प्रकाश को कहा की देखो हमारा हरी प्रसाद आपसे मिलने आया है। सोम प्रकाश ने एक बार नेहा लता को देख और उसकी आंखों में आंखें डाली। और दूसरा हाथ हरिप्रसाद के सर पर रख दिया। शायद काफी दिनों से हरि प्रसाद अपने मालिक के प्रेम के लिए तरह रहा था। वह वही मूर्तिवत खड़ा रहा। मानो वह कोई अमृत रस पी रहा हो। ये सब देखना एक नेहालता के लिए बहुत नया अनुभव था।

हरिप्रसाद सोम प्रकाश के संग को कई महीनों बाद पा रहा था। परंतु वह मूक प्राणी किसी को ये बात कह भी नहीं पा रहा था। परंतु अचानक आज नेहालता के आने से ये सब घट गया। जो हरिप्रसाद के ही लिए नहीं सोम प्रकाश के लिए भी उतना ही उत्तम था।


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