(सदमा - उपन्यास)
नानी का तीन चार कमरों का मकान था। कुछ पुराना जरूर था परंतु बना बहुत सुंदर था। नेहालता ने एक बार नानी की और देखा फिर उनकी और से अस्वस्थ हो कर जानना चाहा की जो व्यक्ति सामने है क्या वहीं सोम प्रकाश है। नानी ने धीरे से गर्दन हिला दी। हाँ बेटी वही है सोम प्रकाश। नानी की आंखों में आंसू थे, न जाने वह खुशी के या सोम प्रकाश की इस हालत के कारण या लड़की का साहस देख कर। नेहालता आगे बढ़ी अब सोम प्रकाश को पास से उसे कुछ नजदीक से देखना चाहती थी। की क्या ये वहीं महान व्यक्ति है, जिसने मुझे नया जीवन दिया है। और आज कितना लाचार हो कर एक कुर्सी पर मूर्तिवत बैठा है। सोम प्रकाश सामने ही एक कुर्सी पर बैठा उसे देख रहा था। उसकी आंखों में एक अंजाना सा भय एक रहस्य साफ दिखाई दे रहा था। न जाने वह कुछ सोच रहा था, या नहीं परंतु उसके चेहरे पर सब भाव एक दम से थिर थे। मानो वह कोई शिला बन गया है। हम पत्थर की मूर्ति में भी उसके चेहरे पर भाव अंकित कर देते है। परंतु सोम प्रकाश का चेहरा एक दम सपाट मैदान सा लग रहा था। क्या कोई मनुष्य बिना विचार के जी सकता है। हम इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते। तब तक आपने किसी निर्विचार को जीवित नहीं देखा होगा। परंतु निर्विचार और विक्षिप्त में दिन रात का फर्क है। जैसे शांत नदी जो चल तो रही है परंतु उपर से खड़ी लग रही है। परंतु एक शांत झील जो मात्र दर्पण बन जाती है। जबकि आप एक विचार भाव हिन चेहरे को देख कर भयभीत हो उठोगे। आप उसका संग साथ नहीं रह सकेंगे।
नेहालता ने इससे
पहले इस तरह से जीवन को कभी नहीं देखा था। लाड़ प्यार से बिना किसी दुःख दर्द के
पली-पोसी एक लाड़ली सी गुड़िया थी नेहालता। सामने ही एक सुंदर नौजवान बैठा था।
जिसने अपने बदन को एक चादर से ढक रखा था। कुर्सी पर बैठा हुआ वह नेहालता को केवल
बिना किसी भाव के देखे जा रहा था।
कितना विरोधाभास है
ये जीवन,
कल तक जब नेहालता होश में नहीं थी तो वह सोम प्रकाश को जानती थी।
उसके साथ हिलती मिलती खेलती थी। और आज जब वह होश में है तो उस प्राणी को जानती तक
नहीं है। दूसरी और सोम प्रकाश जब होश में था तो नेहालता को जानता था उसकी प्रत्येक
जरूरत का ख्याल रखता था। उसे लाड़ प्यार देता था और आज एक पत्थर की तरह से उसे यूं
देख रहा है। जैसे वह उसे जानता तक नहीं है। यहीं बुद्धि है यही तन है तो क्या बदल
गया मनुष्य में केवल मन का तल। नेहालता उसे गोर से खड़ी हो कर देखती रही। कुछ देर
बाद अचानक उसका रोना फूट गया। और वह पास खड़ी नानी के कंधे पर सर रख का फफक पड़ी
की नानी ये मेरे कारण हुआ है। इसमें मेरा कुछ भी कसूर नहीं है। मैंने ये सब जान
बूझ कर नहीं किया। सच ही मैं इन्हें आज भी नहीं पहचान पा रही हूं। और न ही आप को
की मैं यहाँ पर कभी रही थी। आप मेरी बात का विश्वास कर के मुझे माफ कर दे।
नानी ने उसकी पीठ
पर हाथ फेरते हुए कहा की नहीं बेटा छोटा मन नहीं करते। मैं हूं न आपके साथ और उपर
परमात्मा देख रहा है। आप कितने सच्चे ह्रदय की है। नहीं तो क्या ये बात सून कर आप
हजारों मील दूर यूं ही चली आती। हमारी और से तुम्हारे प्रति मन एक दम से साफ है, ये तो तकदीर का खेल है। ये सोम प्रकाश है ही इतना अभागा। बचपन में ही मां
बाप को खो दिया। मुझे यूं ही भटकता हुआ मिल गया। हमारे तो बेटा कोई संतान नहीं थी।
ये उस समय कम से पाँच साल का होगा। इसके कपड़े फटे हुए थे। कई दिन से कुछ नहीं
खाया था। मैं बाजार से सामान खरीद कर घर आ रही थी। उस समय तेरे नाना भी जीवित थे।
मैंने इसे रोते हुए देखा तो मैं इसके पास चली गई और पूछा की तुम रो क्या रहे हो।
तब उसने मेरी और देखा जैसे की हमारा जन्म का ही नाता है। और मैंने उसका हाथ पकड़
कर कहां की चल घर चल। और वह उठ कर मेरे साथ हो लिया।
बहुत दूख सहे है
इसने कितनी ही मेहनत कर के पढ़ाई पूरी की उसके बाद स्कूल में अध्यापक लग गया। अब
सब ठीक चल रहा था। वरना तो तेरे नाना के गुजर जाने के बाद तो हम दाने-दाने को तरस
गए थे। परंतु जिस दिन ये तुझे अपने साथ लेकर आया था मैं समझ गई थी। की कोई न कोई मुसीबत
जरूर आने वाली है। मैं तुझे पहले दिन ही देख कर समझ गई थे की तेरे साथ कोई हादसा
हुआ है। जिससे तुम अपनी याद दाश्त भूल गई हो। और तुम हो किसी बड़े घर की बेटी। अगर
तुम्हारे माता पिता या पुलिस जब तुम्हें ढूंढती हुई हमारे पास आयेगी तो हम क्या
जवाब देंगे। परंतु इसने उस खतरे को जानते हुए भी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा था। और
देखा सच ही ऐसा हुआ। पुलिस आई और तुम घर पर नहीं थी अगर तुम घर पर होती तो तुम तो
इसकी कोई मदद नहीं कर सकती थी। तब तो इसे जेल में ही जाना होता।
परंतु परमात्मा की
मर्जी की तुम ठीक हो गई। और तुम्हारे पिता ने अपना पुलिस केस वापस ले लिया। तब
जाकर मेरी सांस में सांस आई थी। परंतु तुम तो चल गई और जब मैंने इसे अस्पताल में
पहली बार देखने के लिए गई थी तो एकदम से अचेत था। परंतु इसके बाद पेंटल आ गया बेटी
उसने बहुत मदद की हमारी। वरना मैं इस उम्र में कैसे उठा बिठा सकती थी। क्योंकि
इसके पैर में भी फ्रैक्चर आ गया था। लेकिन अब ये कम से कम चल फिर सकता है। परंतु न
जाने क्यों यह तुम्हारा इस तरह से एक दम से जाना सहन नहीं कर सका। बेटी ये
तुम्हारे विछोह का एक ‘सदमा’
है। अब तुम ही इसे इस दलदल से बहार निकाल कर ला सकती है। एक प्रकार ये इस बेचारे
को एक नव जीवन दे सकती हो। नेहा लता नानी की बाते खड़ी हुई सूने जा रही थी और वह
रोए ही जा रही थी। नानी देख रही थी की यह लड़की बहुत ही भावुक है। तब अपने आप से
ही कहने लगी की मैं भी कैसी पागल हूं जो तुझे रूलाएं जा रही हूं।
तब नेहालता ने कहां
नहीं नाना आपकी बातों से नहीं रो रही बस ये तो मेरे से कुछ बह रहा है,
बस इसे पिघल जाने जो, बस इसे बह जाने दो। मेरे
अंतस में कुछ सुलग रहा है। मानो मेरा दम घुट रहा है। या फिर मैं फट जाऊंगी ये सब
मुझसे सहन नहीं हो रहा है। परंतु आपकी बात सून कर मुझे बहुत ही अच्छा लगा। तब नानी
ने कहां की बाते करने को तो बहुत समय है। पहले तुम नहा धो कर कपड़े बदल ले और फिर
साथ बैठ कर खाना खायेंगे। और बाते भी करेंगे। नेहालता आगे
बढ़ी और सोम प्रकाश की कुर्सी जिस पर वह बैठा था, उस के एक दम सामने बैठ कर
उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। और कहने लगी तुम मुझे पहचानते हो। मैं तुम्हारी "रेशमी"। सोम प्रकाश निर्जीव आंखों से वह केवल निहारता ही रहा। जैसे
शांत झील में एक कंकर फेंकी जाये और वह अचानक अनंत में डूब जाये बिना छपाक के।
वहां पर कुछ नहीं हो। एक भी लहर जहां उत्पात नहीं कर रही हो। ऐसे मनुष्य से या ऐसे
जल से हमेशा हमें डर लगता है। जैसे बिन भौंकने वाले कुत्ते से, शांत जल से और गंभीर औरत से हमेशा सावधान रहना जरूरी है। ठीक इसी तरह से नेहा
लता को उनमें कोई भाव नहीं दिखाई दिया था। लेकिन नेहालता के छूने से मानो उसके
हाथों में एक सजीवता का प्रवेश हुआ। उसका अचेतन मानो कुलबुला उठा जिस पर न नेहालता
का जोर था और न सोम प्रकाश का। बस एक प्रेम का स्नेह का बहाव था जो उस ठोस दीवार
को छू रहा था।
कितनी
ही देर तक नेहालता सोम प्रकाश आंखों में बैठी यूं ही झांकती रही। उधर सोम प्रकाश भी
भाव रहित नेहालता को देख रहा था। इस सब को देख कर नेहालता को अंदर से एक उम्मीद की
किरण दिखाई दी। उसे उस गहरे अंधकार में भी उतरने के लिए कुछ मार्ग दिखाई दिया। वह सोम
प्रकाश के हाथ को अपने हाथ में लिए हुए इसी तरह से सहलाती रही और कहती रहीं सोमू
याद करो मैं ही तुम्हारी ‘’रेशमी’’ तुम्हारे सामने हूं। जरा पहचानो तो सही में
कितनी दूर से तुम्हारे पास आई हूं। कल तक तो तुम मुझे बुला रहे थे ढूंढ रहे थे, अब जब मैं तुम्हारे सामने हूं तो मुझ से बात तक नहीं कर रहे हो। और वह रो
पड़ी नानी ने उसके सर पर हाथ फेरा और कहा की बेटी इस तरह से दिल को छोटा नहीं
करते। देखना एक दिन तुम्हारी तपस्या जरूर रंग लायेगी। पहले तुम अंदर जाकर नहा लो।
मैंने गर्म पानी की बाल्टी भर कर रखी है। और अपने बदलने के कपड़े निकाल कर दूसरे
पहने लो।
नहाने के बाद उसे
अच्छा लग रहा था। जो उसको सफर की थकान के साथ सर भारी हो रहा था। वह चक्कर भी कुछ
कम महसूस हो रहे तब नानी ने कहां की बेटा खाना तो एक दम से तैयार है। रास्ते में न
जाने तुने कुछ खाया या नहीं। परंतु मैं मानती हूं की खाना खाने के बाद तुम्हें
अच्छा लगेगा। चाय या कॉफी अगर खाने के बाद पी जायेगी तो सही होगा। अब अगर आप पहले चाय
पी लोगी तो भूख मर जायेगी। नेहा लता ने हां में सर हिला दिया। और नानी के साथ किचन
में चली गई नानी ने लाख मना किया की तुम सोम प्रकाश के पास बैठो में खाना परोस कर
लाती हूं। परंतु ये सब नेहालता को अच्छा नहीं लग रहा था। उसने नानी के साथ मिल कर
खाना परोसा और एक थाली सोम प्रकाश के लिए ले कर चली गई। और एक स्टूल उसके सामने कर
के खाना रख दिया। इतनी देर में नानी उसकी थाली भी लिए आ रही थी। तब नेहालता ने कहा
की नानी मैं आ ही रही थी, आप क्यों परेशान हो रही है।
तब नानी ने कहां की इसमें क्या परेशानी है। बेटा ये शरीर जितना चलता फिरता रहे
उतना ही ठीक है। ये रुका नहीं की सड़ने लग जाता है। देखा नहीं तुमने जल को नदी का
जल कितना स्वच्छ और निर्मल रहता है। और पोखरों और तालाबों में कैसे सड़ जाता है।
नानी की इस बात के सामने नेहालता के पास कोई जवाब नहीं था। और वह थाली ले कर सोम
प्रकाश के सामने की कुर्सी पर बैठ गई इतनी देर में नानी भी अपना खाना ले कर आ गई।
सोम प्रकाश एक बार
खाने को और कभी नानी को और कभी नेहालता को देख रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था की
क्या किया जाये। तब नानी ने कहां की ये तुम्हारी ‘’रेशमी’’
है। खेर तुम खाना खाओ। तब नेहालता ने कहां की नानी ये खुद से खाना
खा लेते है या आप को खिलाना होता है। तब नानी ने कहां की पहले तो खिलाना होता था।
पेंटल या में इसे खिलाते थे। परंतु अब तो ये खूद से खा लेते है। धीरे-धीरे जब हम
पूछते है की सब्जी कैसी बनी तो गर्दन भी हिला देते है। की इनकी देखने-सुनने की
इंद्री के साथ स्वाद की इंद्री भी धीरे-धीरे सचेत हो रही है। ये इसके लिए बीमार के
लिए अच्छा है। हम एक ही इंद्री से नहीं सचेत होते। खाने और देखने की इंद्री हमारी
अति महत्वपूर्ण है। और नानी के कहने के बाद सोम प्रकाश ने खाना शुरू किया।
ये सब देख कर दोनों
को बहुत राहत मिली। की कम से कम खाना तो सोम प्रकाश खूद से ही खा रहा है। क्योंकि
जिस शरीर में मन है। उसे तो पहले स्वस्थ होना चाहिए। अगर आपका तन बीमार है तो आपका
मन भी जरूर कुछ ने कुछ बीमार होगा ही। इसलिए पहला कदम तन का होता है। आपका तन
स्वास्थ्य तो आप धीरे-धीरे मन के मंदिर तक जा सकते है। सब ने चाव से खान खाया। और ना-ना
करते नेहालता ने कॉफी बनाई। और सब बाहर बैठ कर काफी पीने लगे। खिले अंबर में रात
को जितने तारे आसमान पर नेहालता ने आज देखे वह उस तरह का आसमान इससे पहले उसने कभी
नहीं देखा था। उसका ह्रदय एक दम गद्द-गद्द हो रहा था। नानी ये तारे हमारे शहर में
तो दिखाई ही नहीं देते। तब सोम प्रकाश एक टक केवल नेहालता को निहार रहा था। नेहा
लता बीच में उठी और उसकी चादर जो कंधों के नीचे सरक गई थी उठे ठीक करने लग गई।
क्योंकि जैसे-जैसे रात गहरी होती जा रहा थी ठंड भी आपना आँचल पसार रही थी। जब वो
लोग काफी पीने के लिए बाहर आये थे इतनी ठंड नहीं थी।
तब नानी ने कहां की
बहुत देर हो गई। और तुम थकी हुई भी बहुत हो चलों अब अंदर चल कर सोते है। नानी ने
एक कमरा नेहालता के लिए तैयार कर रखा था। वह खुद सोम प्रकाश के पास दूसरी चारपाई
बिछा कर सोती थी। की रात को अगर जरूरत पड़े तो वह उसकी मदद कर सकती है। तब नेहा
लता ने कहां की नानी मैं इनके पास सो जाती हूं। आप कमरे में आराम करो। तब नानी ने
कहां की नहीं बेटी तुम हमारी मेहमान हो। तुम्हारे माता पिता ने किस विश्वास से तुम्हें
यहां भेजा है। वह कितने महान है ये में नहीं जानती परंतु वह बहुत ही दुर्लभ
व्यक्तित्व के व्यक्ति है। किस प्रेम और विश्वास से तुम्हें भेजा है। मुझे गर्व है
तुम पर ही नहीं उन पर भी। फिर रात को मुझे नींद भी तो कम ही आती है। क्योंकि बेटा
इस उम्र में नींद ही कितनी चाहिए। मुश्किल से तीन-चार घंटे के बस। इसलिए मैं इसके
उठने बैठने का ख्याल रख लूंगी आप थकी हो इसलिए एकांत कमरे जाकर सो जाओ।
तुम आराम से इस अंदर
वाले कमरे को अंदर से बंद भी कर लेना। ताकी ठंडी हवा अंदर ने आये। तुम्हारे यहां
तो इतनी शारदी नहीं पड़ी होगी इसलिए मौसम के बदलने पर शरीर परेशान हो जाता है। इसलिए
एक दो दिन तुम्हें खास ख्याल रखना होगा वरना तुम्हें बुखार आदी आ सकता है। से सब
सून कर नेहालता को अच्छा लगा की नानी उसका कितना ख्याल रख रही है। और चीजों के
विषय में भी कितना कुछ ये लोग जानते है। तब नानी ने कहां की देखो वह हिरणी तारों
का झुंड है। हम जब जवान थे हमारे पास तो घड़ी नहीं होती थी। इसलिए हम तो इन तारो
से ही समय को जानते थे। ये सप्तऋषि मंडल जब वहां पहुंच जायेगा जब करीब रात के चार
बज जाते है। ये सब नेहा लता के लिए नया था। परंतु उसे अच्छा लगा रहा था।
और देख उत्तर की और
जो वह तारा है ना वही धुव्र तारा है। इस समय करीब रात के दस बजे होंगे। और जब सुबह
में चार बजे इन तारों को देखती हूं तो ये झुमका तो डूबने की तैयारी कर रहा होता
है। ये हिरणी भी उतार की और होती है। और सप्त ऋषि सर पर पहुंच गया होता है। परंतु
ये धुव्र अडिग यहीं खड़ा रहता है। कितना चमत्कार है। पृथ्वी अपनी धूरी पर चक्कर
लगा रही है, फिर सूर्य का चक्कर भी लगा रही है। सब
कुछ बदलता है, चारे चांद, इसी को समय
का नाम दिया है। परंतु नहीं बदलता तो ये धुव्र तारा है जो अपने ही स्थान पर अडिग
रहाता है। कैसा रहस्य है। इस विषय में तो नेहालता ने कभी इस तरह से नहीं सोचा बस
किताब में पढ़ लिया उतर में एक तारा है जिसका नाम धुव्र तारा है वह अडिग रहता है।
उस इस तरह तो उसे इतिहास के मास्टर ने भी नहीं पढ़ाया।
ये सब सून कर
नेहालता को लगा की जिन्हें हम अनपढ़ और गंवार समझते है। वो तो उस रहस्य को जानते
है। जिस के विषय में हम किताबी पढ़े लिखे केवल तोते मात्र है। आज पहली बार उसे लगा
की वह कुछ भी नहीं जानती। नानी तुम इतना सब कैसे जानती हो। तब नानी ने कहा की एक
तो जरूर आविष्कार करती है। दूसरा हमने अपने मात पिता से ये सब जाना जो हमारे जीवन
का एक अंग था। जो हमारी जरूरत भी थी। तुम किताबों से जानती है। वे मृत होती है। तब
उनका ज्ञान जब तक अनुभव न बन जाये वह थोथा ही रहता है। इस अचरज को आपने ह्रदय में
समाये हुए नेहा लता ने सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर उससे बिदा ली। नानी ने चाय-काफी
के कप आदि उठाये और उनके साथ चल दी। नेहालता ने सोम प्रकाश को उसके बिस्तरे पर
लिटा कर उसे कम्बल उढ़ा दिया। और उसे चारों और से अच्छे से दबा दिया ताकी ठंडी हवा
अंदर प्रवेश न कर सके। और सोम प्रकाश को गुड नाईट कहकर नानी से इजाजत लेने के लिए
किचन की और चल दी। वहां से रात पीने के लिए एक लोटा पानी और गिलास लेते हुए अपने
कमरे में चली गई। जहां पर एक सुंदर सा बिस्तरा लगा था। चाहे वह घर की तरह से
मुलायम नहीं था। परंतु साफ-सुथरा अवश्य ही था। जिस पर वह जाकर लेट गई।
बिस्तरे में लेट कर
कुछ देर वह सोचती रही, नानी के विषय में और तारों
के विषय में। बाहर झींगुर की मधुर तान के साथ पक्षियों के गीत भी कभी-कभी गुंज
उठते थे। सुबह वह कहां थी और रात होते न होते वह कहां एक अंजाने से प्रदेश में पहुंच
गई। मार्ग की सब बाते उसके चित पर एक छाया चित्र की भाँति आ रहे थे जा रहे थे। वह
उसे एक आनंद भाव से देख रही थी उन का विरोध नहीं कर रही थी। इस लिए मन पर कोई लहर
या बेचनी नहीं उठ रही थी। ये सब सोचते-सोचते, दूर छत को
देखते-देखते, न जाने कब उसे नींद आ गई। और नेहालता एक गहरी
नींद में प्रवेश कर गई।
बहार अब भी तारे
यूं ही चमक रहे थे। दूर कभी-कभी किसी टिटहरी पक्षी की कर्कश नाद
वातावरण को क्षण भर के लिए मोन कर जाता था। परंतु झींगुर है की उस अविरलता को पल
भर में ही लयवद कर देते थे।

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