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सोमवार, 20 अप्रैल 2026

43-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-43

(सदमा - उपन्यास)

गाड़ी अस्पताल के गेट पर रूकी ही थी की नानी सोनी को ले कर अंदर चल दी। और ड्राइवर को कहां की जाओ सोम प्रकाश हर को घर तक छोड़ आओ। और फिर सीधा वापस आ जाना न जाने कब किस चीज की जरूरत पड़ जाये। सोनी को स्ट्रेचर पर लिटा दिया और श्री देवधर करकरे ने सारी कागजी कार्यवाही पूरी कर ली। और सोनी को अंदर आपरेशन रूम में ले गए। नानी उसके साथ ही थी। डाक्टर ने आकर देखा और एक दो इंजेक्शन लगाये और उसका ब्लड प्रेशर चेक किया सब ठीक था। तब उसने नानी को कहां की अभी तो कुछ देर है। लेकिन नानी तो देख रही थी बच्चे के आगमन की तैयारी प्रकृति ने पूरी कर दी है। और नानी ने नर्स को बतलाया की आप जरा डाक्टर को संदेश भेजे। सोनी के चेहरे पर जरा भी भय नहीं था। न ही वह दर्द से उत्पात मचा रही थी। ये सब देख कर नर्स या नानी बहुत बैचेन थे। इस तरह का व्यवहार आज कल बच्चे होने में दिखाई नहीं देता महिलाएं बहुत शोर और उत्पात मचाती है।

सोनी को ज्यादा छटपटाना नहीं पड़ा केवल एक घंटे में ही एक पुत्र रतन का जन्म हो गया। इस बात से सार स्टाफ खुश था। सालों बाद इस तरह की साधारण डिलीवरी हुई है। इतनी देर में ड्राइवर राम दास भी आ गया। और श्री देवधर करकरे जी ने उन्हें पैसे देते हुए कहां की पाँच किलों मिठाई ले आओ। राम दास ने कहां मालिक कौन सी तब देवधर जी ने कहां की कोई बर्फी या पेड़े जो भी ताजा हो। और नानी को धन्यवाद देते हुए देवधर जी कहां की आप के साथ होने से मुझे बहुत हिम्मत मिली। वरना तो मैं घबराता ही रहता था की न जाने कैसे सब पूरा होगा।

और सोनी के लिए आधा किलों दूध में चाय की पत्ती डलवाकर एक थरमस में भर कर नानी के पास पहुंच गई। तब सोनी के पास ही बच्चा लेटा हाथ पैर चला रहा था। उसके चेहरे पर एक मासूम सी खुशी थी। आज सोनी का रंग रूप आभा देखते ही बनती थी। नानी ने अपनी आंखों से काजल का कुछ रंग उसके दायें माथे पर एक टीका लगा दिया। कि किसी की नजर ने जग जाये। और एक काला डोरा उसके हाथ पर बाँध दिया। लाख मना करने पर भी नानी नहीं मानी और सोनी को वह दूध पीना ही पड़ा। बेटी अब मन मार कर भी तुम्हें कुछ ऐसा भी खाना होगा जो तुम्हारे लिए नहीं इस नन्हे के लिए हो। जब तुम दूध नहीं पीओगी तो दूध कहां से उतरेगा।

और सच ही कुछ ही देर में सोनी बच्चे को दूध पिलाने लगी थी। इसी समय अचानक नर्स ने आकर कहां की, नानी आप लोगों का कमरा तैयार हो गया है। आप अपने कमरे में चलों। सोनी को एक अलग कमरा मिल गया। नर्स ने बच्चे को अपनी गोद में लिया और नानी ने सोनी का हाथ पकड़ कर कमरे तक ले जाने में सहायता की। तब नानी ने कहां की बेटा अब यहां आराम है। अब तुम बच्चे को दूध पिला दो। ये बाते वह दोनों कर ही रही थी की इतनी देर में श्री देवधर जी ने आकर नानी को कहां की आप थक गई है तो, आप कुछ देर के लिए आराम कर लो। मैं ड्राइवर को कहता हूं की वह आप को घर पर छोड़ कर आ जायेगा। यहां का तो काम सारा हो ही गया है। परंतु नानी ने कहां आप कैसी बाते करते बेटा जी। अभी तो मेरा काम शुरू ही हुआ है। ऐसा करो हम दोनो की यहां पर एक साथ जरूरत नहीं है। रात आप ड्राइवर को लेकर घर जाओ सुबह आ जाना मैं रात भर बेटी के साथ रहती हूं। सुबह जब ड्राइवर आये तो नेहा लता और सोम प्रकाश को भी ये खुश खबरी भिजवा देना। इस उम्र में बेटा नींद ही कितनी आती है। कुछ देर के लिए यहीं सोफे पर आंखें बंद कर लेट जाऊंगी। सो नानी की बात को देवधर जी टाल नहीं सकते। परंतु आज नानी का प्रेम और अपना पन देख कर उन्हें अपनी मां की याद आ गई। की आदमी का कभी-कभी ऐसा समय भी जीवन में आता है, जहां पर अपनों की बहुत याद आती है। चाहे वह खुशी का हो या गम का ही क्यों न हो। उस समय मां की ममता कैसे सामने ही आकर छत्र छाया बन कर खड़ी हो जाती है। इस तरह से नानी को साथ खड़ा देख कर देवधर जी को लगा की आज मेरी मां फिर मेरे सामने आकर ढाल बन कर मेरे और सोनी के बीच आ गई है। न चाहते हुए भी देवधर जी नानी की आज्ञा मान कर भरे मन से घर की और चला गया। उसने ड्राइवर राम लाल को कहां की जब सुबह उठ कर सोम प्रकाश के यहां जाये तो कुछ मिठाई और ये खबर सोम प्रकार और नहा लता के घर पहुंच देना। तुम लोग भी आपस में मिठाई को बांट कर खा लेना। नहीं तो खराब हो जायेगी। बच जाये तो अड़ोस पड़ोस में बांट देना। देवधर जी बात में हां में हां मिलाकर ड्राइवर ने गर्दन हिला दी। आज बिस्तरे में पहुंच कर देवधर जी सोच रहे थे की जीवन क्या है कल तक मैं इन लोगों को कितना जानता था। आज कितने अपने हो गए है। कल तक मात्र सोम प्रकाश मेरे यहां स्कूल में नौकरी करता था।

आज सब बदल गया और मानो वह एक परिवार का हिस्सा बन गये है। ये सार परिवर्तन सोनी के व्यवहार के कारण आया है। और उसने एक गहरी स्वांस ली और सोने की कोशिश करने लगे। कुछ देर मन में विचार इधर उधर डोले और अचानक वह कब नींद के आगोश में चले गए उन्हें पता ही नहीं चला।

सुबह ड्राइवर राम दास उठ कर चाय आदि पी कर राम लाल को बची मिठाई दे कर वह सोम प्रकाश और नेहा लता के घर की और चल दिया। क्योंकि हो सकता है उन्हें फिक्र हो की नानी रात भी। एक तो आई नहीं फिर सोम प्रकाश की तबीयत भी कुछ खास अच्छी नहीं है। दूसरा नेहा लता यहां किसी को जानती भी नहीं है। उस की कार को देखते ही हरिप्रसाद तो सबसे पहले भौंकता हुआ उसके पास पहुंच गया। और लगा राम दास को प्यार करने जैसे की न जाने कितने जन्मों बाद वह दोनों मिले है। पशु का ये अविचल प्रेम कितना भोला और अपना पन लिए होता है। इतनी सरलता मनुष्य में कभी नहीं आ सकती क्योंकि मनुष्य का मन जटिल है वह विचारों का एक पुंज है। जहां एक क्षण में हजारों विचारों का रेला चलता ही रहता है। परंतु पशु के पास मन तो होता है। परंतु कुछ अलसाया सा इसलिए वह एक सीमा के बहार नहीं जा सकता।

शायद हरिप्रसाद के भौंकने की आवाज सून कर सोम प्रकाश जी जाग गए और चादर ओढ़े हुए ये देखने के लिए बाहर आये की कौन आया इस समय। शायद वह रात की बात नींद के कारण भूल ही गए थे, की नानी नहीं आई थी। तब राम दास ने नमस्ते करते हुए मिठाई का डिब्बा उन्हें देते हुए कहां की मेम साहब कहां है। तब सोम प्रकाश को लगा की कौन मेम साहब क्या यह नानी को मेम साहब कह रहा है। वह नेहा लता को भूल गए थे। गहरी नींद और दवा का अभी भी उस पर प्रभावित था। सब बाते इस समय सोम प्रकाश को अटपटी सी नजर आ रही थी। ये सब राम दास भी समझ रहा था की जो वह कह रहा वह सोम प्रकाश जी को समझ में नहीं आ रहा था। उन लोगों की बाते सून कर नेहा लता भी बहार निकल कर आई की कौन इतनी सुबह आ गया है। तब उसने देखा की अरे राम दास आओ। इतनी सुबह कैसे। नानी कैसी है।

तब राम दास ने कहा की नानी एक दम से ठीक है। और सोनी मेम साहब के यहां पर लड़का हुआ है। इसलिए नानी तो रात भर उनके ही पास है। अब आप के पास से होकर मैं वहां जा रहा हूं। तब नेहा लता ने कहां की रूक अभी चाय बनाती हूं। हम भी पी लेंगे और नानी के लिए भी ले जाना। राम दास ने मिठाई का डब्बा नेहा लता को दिया उसने खुशी से ले जाकर किचन में रखकर चाय बनाने लगी। और तीनों वहां बैठ कर चाय पीने लगे तब हरी प्रसाद जी अपने दूध का आनंद ले रहे थे। वह सब को चाय पीते हुए ऐसे देख रहा था की क्या तुम लोग चाय पीते हो हम तो भइ दूध ही पीते है। चाहे फिर तुम कुछ भी कहो। और राम दास ने चाय पीने के बाद कहां की मेम दीदी अब में चलता हूं। हो सकता है नानी श्याम तक वही पर रहे। और नेहा लता ने चाय का थरमस उसके हाथ में दे दिया और कहां की सोनी जी को कहना की हम इस खबर से बहुत खुश है। अपना ख्याल रखना। और नानी को बोलना की यहां की फिक्र मत करना तुम अच्छे से सब बतला देना की वहां सब ठीक से है। और तब हरिप्रसाद ने मानो बात को बीच में ही भंग करते हुए कहां की मेरा भी हाल बतला देना की हरि प्रसाद भी मस्त है। और वह दौड़ता हुआ राम दास को कार तक छोड़ने के लिए गया। तब नेहा लता ने आवाज दी की हरि प्रसाद हमारे पास आओ और वह नेहा लता की आवाज सून कर उसकी और दौड़ लिया मानो वह सब समझ रहा है। कि मेरा यहां रहना कितना जरूरी है।

चाय ले कर जब राम दास अस्पताल में पहुंचा तो नानी ने पूछा की वहां सब ठीक है। और घर का हाल चाल जान कर उन्हें बड़ी राहत हुई और चाय को कपों में डाल कर सोनी को दी और खुद भी पीने लगी और पूछने लगी की राम दास तू क्या चाय पीकर आया है या तुझे भी दूं। तब राम दास ने कहां की नहीं मैं वहीं पी कर आया हूं। मेम दीदी ने और सोम प्रकाश ने अपने पास बिठा कर चाय पिलाई है। वहां सब पर ठीक है। आप अब घर चलोगी या यहीं....। तब नानी ने कहां की एक बार घर जाकर आती हूं पहले श्री देवधर जी को आ जाने दो। फिर घर जाकर कुछ कपड़े ले आती हूं । और ये बात सून कर ड्राइवर चला गया करीब एक घंटे बाद श्री देवधर जी आये और नानी को कहने लगे की आप अब घर जाओ मैं तो हूं ही। आप श्याम को ही आना चाहो तो आ जाना नहीं तो अगर थक गई तो कोई दिक्कत नहीं यहां पर एक नर्स तो है ही। तब नानी ने कहां की नर्स तो है परंतु अपने घर से भी कोई हो तो अच्छा होगा। और नानी ने सोनी के सर पर हाथ फेरते हुए कहां की मैं आती हूं तुम अपना ख्याल रखना।

इस तरह से सोनी को केवल तीन दिन ही में अस्पताल से छूटी मिल गई। क्योंकि सब सामान्य था, अब कोई परेशानी की बात नहीं थी। इसलिए वह घर पर चली गई। क्योंकि जच्चा और बच्चा दोनो तंदुरुस्त थे। बच्चे के आने से घर में एक रोनक आ गई थी। क्योंकि एक बात ये थी श्री देवधर जी की उम्र अब काफी हो गई थी इसलिए लोगों के मन में ये शक था की इनके यहां कोई संतान होनी असंभव है। पहली बीबी को मरे करीब पंद्रह सा गुजर गए और उसके बाद श्री देवधर जी ने सोनी से जो बहुत कम उम्र की थी से शादी की। परंतु अंत भला सो भला अब सब का मुख बंद हो गया। एक दो दिन बाद सोनी ने पेंटल को फोन पर कहां की मैं मां बन गई हूं। और बच्चा बहुत सुंदर और स्वस्थ है। इस बात को सुनकर पेंटल के मन को कैसा महसूस हुआ होगा हम इस बात का अंदाज लगा सकते है। परंतु वह चाह कर भी उसे अपना नाम नहीं दे सकता। परंतु उसे इस बात की तसल्ली थी की सोनी और बच्चा ठीक है।

इस बात को लेकर जब पेंटल मन में विचार आते तो उसे बड़ा अजीब भी लगता क्या ये सब प्रकृति का ही एक नियम है। या फिर किसी पूर्व के नियोजित आदान प्रदान का। क्योंकि कुछ बाते ऐसी होती है जिसे आप बुद्धि से न तो समझ सकते हो और न ही उस रहस्य को सुलझा सकते हो। यहीं बात बार-बार उसके मन में आती की हमारा इस में कोई हाथ नहीं था। प्रकृति की चाल में हम चले है। तब क्या इसलिए सब ठीक हो रहा है। क्योंकि इतने दिनों के बाद भी उन दोनों ने मिलने से प्रेम कम नहीं होकर अति गहरा हो रहा था। मिलना प्रेम का अभिन्न अंग नहीं है। आज का नौजवन सोचता है की मिलने से ही प्रेम बढ़ता है। प्रेम ही एक ऐसा बिंदु है जो अपने अंदर भी प्रकृति के गहरे रहस्य समेटे चलता है। जैसे कोई कला, संगीत, चित्र कला या ध्यान जब बीज अंकुरित हो उठता है तो आप उससे भिन्न नहीं रह सकते। आप अगर बहार से उसे छोड़ भी दोगे तो वह आपके अंतस में विकास करता ही रहता है। ऐसा कितने लोगों ने महसूस किया होगा। की वह किसी कार्य को छोड़ देते है, या किसी कारण से छूट जाता है। जैसे की आपने कई सालों तक संगीत नहीं बजाया। और आप किसी कारण से उस से हट गए तो क्या जहां अपने उसे छोड़ा है, वह उस तल पर ही आपको नहीं मिलेगा। परंतु कितना विचित्र रहस्य है की नहीं आपके अंतस की सुरति बढ़ती ही रहेगी। उत्तम और सुंदर जो सूक्ष्म है अपने अंदर सहज और सरलता से विकसित होता ही रहेगा। परंतु जो लोग उसे बहार से मस्तिष्क से जानना चाहते है उस पर ये नियम कार्य नहीं करता। इसी तरह से प्रेम ध्यान भी जब किसी साधक के अंकुरित हो उठता है तो आपके अंतस में रेंगता ही रहता है। अपने अंदर एक मधुरता लिए।

सोनी और पेंटल का एक मिलन और उसके बाद दोनो का अलग हो जाना ये भी एक रहस्य समेटे है अपने में। तब आप उसे वासना या मन की चाल बाजी नहीं कह सकते है। अगर आप बार-बार मन के कारण उसे भोगते है तो ये आपके मन का खेल तब प्रकृति अपना मुख उस और से मोड़ लेती है। और तब ये आपके मन की एक चालबाजी है। और तब आप को प्रकृति आपके हाल पर छोड़ देती है। तब वह एक केवल वासना ही है, वहां पर केवल वास करती है। अब वहां पर प्रेम नहीं रह सकता है। वहां केवल एक दुर्गंध है वासना की मन की चालबाजी की वह एक अवैध संबंध है। आपने प्रकृति की मधुर ध्वनि को नहीं समझा और आप अपने मन के जाल में उलझ गए। परंतु यहां एक दम विरोधाभास था। दोनों में एक अनजाना और अचानक खिंचाव हुआ जब की दोनो नहीं चाहते थे। और न ही एक दूसरे को जानते थे। परंतु प्रकृति ने उन्हें मिलाया। दोनो भिन्न स्वभाव और भिन्न कारण से मिले परंतु दोनो का जीवन ही नहीं आस पास भी कैसा सुरमई माहोल हो गया।

अगर आज यहां पर भी वासना की गंध होती तो कभी यहां इतनी सुंदर सुगंध होती। यहां पर एक तनाव एक विरोधाभास ही दिखाई देता। परंतु पेंटल के मन ने अगर जरा सी चाल बाजी उठी थी, फिर भी तो सोनी थिर रही। जब की सोनी के मन में अगर हम बहार से देख रहे थे तो अधिक वासना नजर आ रही थी। वह अधिक प्यासी थी। परंतु पेंटल तो इधर उधर जाकर अपनी मन की वासना को पूरी भी कर लेता था। परंतु सोनी तो लाचार थी। उसने जो कोशिश भी की तो प्रकृति ने उसका सहयोग नहीं दिया। सोम प्रकाश के साथ अवैध संबंध बनाना चाहती थी। परंतु सोम प्रकाश एक दूसरे स्वभाव का लड़का था। जब की देखने में पेंटल अधिक चंचल दिखलाई दे रहा है। और दोनों के मिलने से एक उतंग बेल प्रेम की चढ़ी जिस पर आज सुंदर पुष्प भी खिल गया। यहीं है मौन प्रकृति की ध्वनि जिसे हम न तो शब्दों में बांध सकते है और ने किसी को कह सकते है। कहते ही शब्द झूठे हो जाते है। लगता न ही कहता तो कितना भला था। और समझने की गति प्रेम के उस छोर से शुरू होती है। और फिर प्रेम एक सागर बन जाता है।

कितने कम भाग्य शाली है जो इस प्रेम सागर के अंदर डूब पाते है। उसमें गहरे उतर पाते है। पेंटल के मन में एक ऐसी खुशी थी, जिसे उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। जिसमें एक शीतलता थी, एक मदहोशी थी एक खुमार था। एक प्रेम का परितोष था। एक अंतस की शांति थी। जिस की उसने कभी कल्पना नहीं की। तो क्या ये उसके प्रारंभ कर्म का फल था। यही है नियम जो आज हम जिसे कर्म करते है वह आने वाले समय में या जन्म में संस्कार बन जाते है। यहीं भारतीय दर्शन का सार है। जिसे केवल अंतस में जाकर समझा या पिया जा सकता है। ये कोई बौद्धिक विचार नहीं है। जो की मस्तिष्क की खुजली मात्र हो।

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