ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि
9 फरवरी, 1973
हे
उपाध्याय, निर्णय
हो चुका है, मैं ज्ञान
पाने के लिए
प्यासा हूं।
अब आपने गुहय
मार्ग पर पड़े
आवरण को हटा
दिया है और
महायान की
शिक्षा भी दे
दी है। आपका
सेवक आपसे
मार्गदर्शन
के लिए तत्पर
है।
यह
शुभ है, श्रावक
तैयारी कर, क्योंकि
तुझे अकेला
यात्रा पर
जाना होगा। गुरु
केवल
मार्ग-निर्देश
कर सकता है।
मार्ग तो सबके
लिए एक है, लेकिन
यात्रियों के
गंतव्य पर
पहुंचने के साधन
अलग-अलग
होंगे।
ओ
अजित-हृदय, तू
किसको चुनता है?
चक्षु-सिद्धांत
के समतान
अर्थात
चतुर्मुखी
ध्यान को या
छः पारअमताओं
के बीच से तू
अपनी राह
बनाएगा, जो
सदगुण के
पवित्र द्वार
हैं और जो
ज्ञान के सप्तम
चरण बोधि और
प्रज्ञा को
उपलब्ध कराते
हैं?




