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शुक्रवार, 23 मई 2014

समाधि के सप्‍त द्वार(ब्‍लावट्स्‍की)-प्रवचन--01

स्‍त्रोतापन्‍न बनपहला प्रवचन

ध्यान-शिविर, आनंद-शिला,
अंबरनाथ; रात्रि 9 फरवरी, 1973

हे उपाध्याय, निर्णय हो चुका है, मैं ज्ञान पाने के लिए प्यासा हूं। अब आपने गुहय मार्ग पर पड़े आवरण को हटा दिया है और महायान की शिक्षा भी दे दी है। आपका सेवक आपसे मार्गदर्शन के लिए तत्पर है।
यह शुभ है, श्रावक तैयारी कर, क्योंकि तुझे अकेला यात्रा पर जाना होगा। गुरु केवल मार्ग-निर्देश कर सकता है। मार्ग तो सबके लिए एक है, लेकिन यात्रियों के गंतव्य पर पहुंचने के साधन अलग-अलग होंगे।
ओ अजित-हृदय, तू किसको चुनता है? चक्षु-सिद्धांत के समतान अर्थात चतुर्मुखी ध्यान को या छः पारअमताओं के बीच से तू अपनी राह बनाएगा, जो सदगुण के पवित्र द्वार हैं और जो ज्ञान के सप्तम चरण बोधि और प्रज्ञा को उपलब्ध कराते हैं?

समाधि के सप्‍त द्वार (ब्‍लावट्स्‍की) --ओशो

समाधि के सप्‍त द्वार
(ब्‍लावट्स्‍की)
ओशो

ब्‍लावट्स्‍की की यह पुस्‍तक समाधि के सप्‍त द्वार वेद, बाइबिल, कुरान, महावीर, बुद्ध के वचनों की हैसियत की है।
मैंने इस पुस्‍तक को जानकर चुना। क्‍योंकि इधर दो सौ वर्षो में ऐसी न के बराबर पुस्‍तकें है, जिनकी हैसियत बेद, कुरान बइबिल, धम्‍मपद, गीता और  उपनिषद की हो। इन थोड़ी दो—चार पुस्‍तकों में यह पुस्‍तक है समाधि के सप्‍त द्वार।
और यह पुस्‍तक आपके लिए जीवन की आमूल क्रांति सिद्ध हो सकती है।
इस पुस्‍तक का किसी धर्म से भी कोई संबंध नहीं  है—इसलिए भी मैंने चुना है—न यह हिंदू है न यह मुसलमान है, न यह ईसाई है। यह पुस्‍तक शुद्ध धर्म है।

ब्‍लावट्स्‍की की यह किताब साधारण नहीं है। उसने इसे लिखा नहीं, उसने सुना और देखा है। यह उसकी कृति नहीं है। वरन आकाश में जो अनंत—अनंत बुद्धो की छाप छूट गयी है। उसका प्रतिबिंब है।

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--08

प्रेम है द्वार—प्रवचन—आठवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
प्रश्‍नसार:

1—महावीर ने आत्‍मा को समय क्‍यों कहा? समय और आत्‍मा में क्‍या संबंध है?

2—पत्‍नी मूर्ति पूजक। पति का ध्‍यान के लिए आग्रह तथा मूर्ति पूजा को व्‍यर्थ बताना। उदाहरण में पत्‍नी द्वारा मीरा जैसी मूर्तिपूजक का प्रमाण पति का निरूतर होना। यथार्थता पर प्रकाश डालने के लिए भगवान से निवेदन।

3—किसी का सहारा पकड़ने, किसी के प्रेम के साये में बैठने का ख्‍याल; लेकिन वैसा न होने पर भी संतोष ही  कि कम से कम अपना दुःख और किसी की उपेक्षा तो साथ है। ऐसा क्‍यो?

गीता दर्शन--(भाग--2) प्रवचन--056

काम से राम तक (अध्याय—5) प्रवचन—अठाईसवां


शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्
कामक्रोधोद्भवं वेगंयुक्तः स सुखी नरः।। 23।।

जो मनुष्य शरीर के नाश होने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है, अर्थात काम-क्रोध को जिसने सदा के लिए जीत लिया है, वह मनुष्य इस लोक में योगी है और वही सुखी है।

जीवन में काम और क्रोध के वेग को जिस पुरुष ने जीत लिया, वह इस लोक में योगी है, परलोक में मुक्त है, वही आनंद को भी उपलब्ध है।
काम से अर्थ है, दूसरे से सुख लेने की आकांक्षा। जहां भी दूसरे से सुख लेने की आकांक्षा है, वहीं काम है।
काम बड़ी विराट घटना है। काम सिर्फ यौन नहीं है, सेक्स नहीं है; काम विराट घटना है। यौन भी काम के विराट जाल का छोटा-सा हिस्सा है।

गुरुवार, 22 मई 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--07

ध्‍यान का दीप जला लो!—प्रवचन—सातवां
जिन सूत्र--(भाग--2)
सूत्र:

सीह—गय—वसहमियपसु, मारूदसुरूवहिमंदरिदुं—मणि।
खिदीउरगंवरसरिसा, परम—पय—विमग्‍गया साहू।। 96।।

बुद्धे परिनिव्‍वुडे चरे, गाम गए नगरेसंजए
संतिमग्‍गंबूहए,समयं गोयम! मा पमायए।। 97।।

ण हु जिणे अज्‍ज दिस्‍सई, बहुमए दिस्‍सई मग्‍गदेसिए
संपइनेयाउए पहे, समयं गोयम! मा पमायए।। 98।।

भावो हि पढमलिंगं,दव्‍वलिंगंजाण परम तथं
भावो कारणभूदो, गुणदोसाणं जिणा विंति।। 99।।


भावविसुद्धिणिमित्‍तं, बाहिरगंथस्‍स कीरए चाओ
बाहिरचाओ विहओ, अब्‍भंतरगंथजुत्‍तस्‍स।। 100।।

देहादिसंगहिओ, माणकसाएहिं सयलपरिचत्‍तो
अप्‍पा अप्‍पमि रओ,भावलिंगी हवे साहू।। 101।।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--60)

प्रभु—मंदिर यह देह री—प्रवचन—पंद्रहवां

दिनांक 10 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

पहला प्रश्न :

अष्टावक्र—गीता में जीवन—मुक्त की चर्चा कई बार हुई है। जीवन—मुक्त पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

 न जैसा है वैसी ही मृत्यु होगी। जो उस पार है वैसा ही इस पार होना पडेगा। जैसे तुम यहां हो वैसे ही वहां हो सकोगे। क्योंकि तुम एक सिलसिला हो, एक तारतम्य हो। ऐसा मत सोचना कि मृत्यु के इस पार तो अंधेरे में जीयोगे और मृत्यु के उस पार प्रकाश में। जो यहां नहीं हो सका, वह केवल शरीर छूट जाने से नहीं हो जायेगा। तुम तुम ही रहोगे। मौत से कुछ भेद नहीं पड़ता है। तुम आनंदित थे जीवन में, तो मृत्यु के पार भी आनंदित रहोगे; फुत्यु के मध्य भी आनंदित रहोगे। तुम दुखी थे तो मृत्यु तुम्हें सुख न दे पायेगी। अगर तुम जीवन में नर्क में हो तो जीवन के पार भी नर्क ही तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा। इसे तुम ठीक से समझ लो।

बुधवार, 21 मई 2014

गीता दर्शन--(भाग--2) प्रवचन--055

अकंप चेतना—(अध्याय—5) प्रवचन—सताईसवां


प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः।। 20।।

और जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्वेगवान न हो, ऐसा स्थिर बुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है।


प्रिय को जो प्रिय समझकर आकर्षित न होता हो; अप्रिय को अप्रिय समझकर जो विकर्षित न होता हो; जो न मोहित होता हो, न विराग से भर जाता हो; जो न तो किसी के द्वारा खींचा जा सके और न किसी के द्वारा विपरीत गति में डाला जा सके--ऐसे स्वयं में ठहर गए व्यक्तित्व को, ऐसी स्वयं में ठहर गई बुद्धि को कृष्ण कहते हैं, सच्चिदानंद परमात्मा की स्थिति में सदा ही निवास मिल जाता है।
इसमें दोत्तीन बातें समझ लेने जैसी हैं।

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--06

करना है संसार, होना है धर्म—प्रवचन—छठवां
जिन सूत्र--(भाग--2) 
प्रश्‍नसार:

1—भगवान श्री के पास आते ही बुद्धि ह्रदय में व शब्‍द मौन में रूपांतरित। और सुनते समय ह्रदयका आंसू बनकर बहना। घर लौटने पर यह अवस्‍था बनी रहेगी। संदेह, कैसे स्‍थित हो यह अवस्‍था?

2—आपके पास संन्‍यास लेने आया हूं, कल घर से पत्र मिला है कि मेरे गैरिक वस्‍त्र पहनते ही मेरे माता—पिता आत्‍महत्‍या कर लेंगे। वे कम शिक्षित है, उन्‍हें समझाना भी कठिन है। क्‍या करूं, कृपया बताएं?

3—मा योग लक्ष्‍मी के वक्‍तव्‍य पर एक मित्र की बेचैनी।

4—सभी प्रश्‍न गिर गये। उत्‍तर की भूख प्‍यास, चाह नहीं। आगे क्‍या? सुख—प्राप्‍ति, महासुख—प्राप्‍ति की एक झलक के बाद आगे क्‍या?

मंगलवार, 20 मई 2014

गीता दर्शन--(भाग--2) प्रवचन--054

तीन सूत्र--आत्म-ज्ञान के लिए—(अध्याय-5) प्रवचन—छब्बीसवां



ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्।। 16।।

परंतु जिनका वह अंतःकरण का अज्ञान, आत्मज्ञान द्वारा नाश हो गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानंदघन परमात्मा को प्रकाशता है।


गत एक रहस्य है। रहस्य इसलिए कि इस जगत में अंधकार, जो कि नहीं है, प्रकाश को ढंक लेता है, जो कि है। इस जगत में मृत्यु, जो कि नहीं है, जीवन को धोखा दे देती है, कि है।
जीवन है, और मृत्यु नहीं है। प्रकाश है, और अंधकार नहीं है। फिर भी, अंधकार प्रकाश को ढंके हुए मालूम पड़ता है। फिर भी रोज-रोज जीवन मरता हुआ दिखाई पड़ता है। इसलिए कहता हूं, जीवन एक रहस्य, एक मिस्ट्री है। और उस रहस्य का मूल इसी पहेली में है।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--59)

साक्षी स्‍वाद है संन्‍यास का—प्रवचन—चौदहवां

दिनांक 9 दिसंबर, 1976
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

अष्‍टावक्र उवाच:

क्व मोह: क्‍व न वा विश्वं क्‍व ध्यानं क्‍व मुक्तता।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रांतस्य महात्मन:।। 110।!
येन विश्वमिदं दुष्टं स नास्तीति करोति वै।
निर्वासन: किं कुस्ते यश्यब्रयि न यश्यति।। 111।।
येन दूष्‍टं परं ब्रह्म सोउहं ब्रह्मेति चितयेत्।
किं चिंतयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न यश्यति।। 112।।
दुष्टो येनात्मविक्षेयो निरोधं कुस्ले त्वसौ।
उदारस्तु न विक्षिक्त: साथ्याभावात्करोति किम्।। 113।।
धीरो लोकवियर्यस्तो वर्तमानोउपि लोकवत्।
न समाथि न विक्षेप न लेपं स्वस्थ पश्यति।। 114।।
भावाभावविहीनो यस्तुप्तो निर्वासनो बध:।
नैव किंचिक्ततं तेन लोकद्वष्ट्या विकुर्वता।। 115।।
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रह:।
यदा यत्कर्त्तुमायाति तकृत्वा तिष्ठत: सुखम्।। 116।।

जिन सूत्र--(भाग-2) प्रवचन--05


जीवन ही है गुरु—प्रवचन—पांचवां
जिन सूत्र--(भाग-2)
सारसूत्र:
सुवहुं पि सुयमहीयं किं काहिइ चरणविप्पहीणस्स
अंधस्स जह पलित्ता, दीवसयसहस्सकोडी वि ।। 90।।

थोवम्‍मि सिक्‍खिदे जिणइ, बहुसुदं जो चरित्‍तसंपुण्‍णो
जो पुण चरित्‍तहीणो, किं तस्‍स सुदेण बहुएण।। 91।।

णिच्‍छयणयस्‍स एवं, अप्‍पा उप्‍पमि अप्‍पमें सुरदो
सो होदि हुसुचरित्‍तो, जोई सो लहइ णिव्‍वाणं।। 92।।

जं जाणिऊण जोई, परिहारं कुणइ पुण्‍णपावाणं
तं चारित्‍तं भणियं, अवियप्‍पं कम्‍मरहिएहिं।। 93।।

अब्‍भंतरसोधीए, बाहिरसोधी वि होदि णियमेण
अब्‍भंतरदोसेण हु, कुणदि णरो बाहिरे दोसे।। 94।।

सोमवार, 19 मई 2014

गीता दर्शन--(भाग--2) प्रवचन--053

माया अर्थात सम्मोहन—(अध्याय-5) प्रवचन—पच्‍चीसवां



कर्तृत्वंकर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः
कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।। 14।।

और परमेश्वर भी भूतप्राणियों के न कर्तापन को और न कर्मों को तथा न कर्मों के फल के संयोग को वास्तव में रचता है। किंतु परमात्मा के सकाश से प्रकृति ही बर्तती है, अर्थात गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं।


रमात्मा स्रष्टा तो है, लेकिन कर्ता नहीं है। इस सूत्र में कृष्ण ने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है, परमात्मा स्रष्टा तो है, लेकिन कर्ता नहीं है। कर्ता इसलिए नहीं कि परमात्मा को यह स्मरण भी नहीं है--स्मरण हो भी नहीं सकता है--कि मैं हूं। मैं का खयाल ही तू के विरोध में पैदा होता है। तू हो, तो ही मैं पैदा होता है। परमात्मा के लिए तू जैसा अस्तित्व में कुछ भी नहीं है। इसलिए मैं का कोई खयाल परमात्मा को पैदा नहीं हो सकता है।

जिनसूत्र--(भाग--2) प्रवचन--04

किनारा भीतर है—(भाग-2)  प्रवचन—चौथा
जिनसूत्र--(भाग--2) 
प्रश्‍नसार:

1—प्रश्‍नकर्ता के ख्‍याल में, भगवान का एक ही बात अनेक—अनेक ढंगों से कहना, पर सुनते समय उसे लगना जैसे पहली बार सुनता हो। और इतना आनंद मिलना कि वापिस घर लौटने का मन न होना। क्‍या करूं, मैं क्‍या करूं कि आपको सुनता ही रहूं।

2—घर से चले थे, अनेकों प्रश्‍न से धिरे थे कल के प्रवचन में अचानक सारे प्रश्‍न गायब हो गये। ऐसा क्‍यो और कैसे हुआ।

3—भगवान का प्रवचन सुनते समय आंखों का बंद होने लगना कानों का बहरा होने लगना और चेष्‍टा से भी स्‍थिति का न सँभालना। इधर जी की चाह कि जब परमात्‍मा समक्ष है तो उसे निहारता ही रहूं, वचनामृत रस पान करता ही रहूं, कैसे होश पूर्वक सुनना हो—भक्‍त की पूकार......

जिनसूत्र--(भाग--2) प्रवचन--03


ज्ञान है परमयोग—प्रवचन—तीसरा
जिनसूत्र--(भाग--2)
सूत्र:

जेण तच्‍चं विवुज्‍झेज्‍ज, जेण चितं णिरूज्‍झदि
जेण अत्‍ता विसुज्‍झेज्‍ज, तं णाणं जिणसासणे।। 85।।

जेण रागा विरज्‍जेज्‍ज, जेण सेए सु रज्‍जदि
जेण मित्‍ती पभावेज्‍ज, तं णाणं जिणसासणे।। 86।।

जे पस्‍सदि अप्‍पाणं, अबद्धपुट्ठं अणन्‍नमविसेसं
अपदेससुत्‍तमज्‍झं, पस्‍सदि जिणसासणं सव्‍वं।। 87।।

जो अप्‍पाणं जाणदि, असुइसरीरादु तच्‍चदो भिन्‍नं
जाणगरूवसरूवं, सो सत्‍थं जाणदे सव्‍वं।। 88।।

एदम्‍हि रदो णिच्‍चं, संतुट्ठो होहि णिच्‍चमेदिम्‍हि
एदेण होहि तित्‍तो, होहिदि तुह उत्तमं सोक्‍खं।। 89।।

रविवार, 18 मई 2014

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--58)

संन्‍यास—सहज होने की प्रक्रिया—प्रवचन—तैरहवां  
दिनांक 8 दिसंबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार:

पहला प्रश्न :

आपने संन्यास देते ही मुक्त करने की बात कही, लेकिन मुक्त होते ही संन्यासी का जीवन आमूल रूप से परिवर्तित क्यों नहीं हो पाता है? हालत ऐसी है कि संन्यास के बाद भी वह अपनी पुरानी मनोदशा में ही जीता है। कभी—कभी तो सामान्य सतह से भी नीचे गिर जाता है। मुक्ति का सुवास उसे तत्‍क्षण एक ईमानदार महामानव क्यों नहीं बना पाता? क्या इससे 'संचित' का संकेत नहीं मिलता कि सब कुछ पूर्व—कर्म से बंधा है, नीयत है?

हली बात मैंने कहा, मैं संन्यास देते ही तुम्हें मुक्त कर देता हूं;
मैंने यह नहीं कहा कि तुम मुक्त हो जाते हो। मेरे मुक्त करने से तुम कैसे मुक्त हो जाओगे? मेरी घोषणा के साथ जब तक तुम्हारा सहयोग न हो, तुम मुक्त न हो पाओगे। तुमने अगर अपने बंधनों में ही प्रेम बना रखा है और जंजीरें तुम्हें आभूषण मालूम होने लगी हैं

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--02

यात्रा का प्रारंभ आपने ही घर से—प्रवचन—दूसरा
जिन-सूत्र-भाग-2 
प्रश्‍न सार:

1—संन्‍यास लेकर साधना करना, संन्‍यास न लेकर साधना करना—दोनों स्‍थितियों में आपके मार्ग का ही अनुसरण है। फिर संन्‍यास से विशेष फर्क क्‍या है?

2—आपने कहा आँख आक्रमण होती है। लेकिन आपकी आंखों में तो प्रेम का सागर दिखाता है, और जी करता है उन्‍हें निहारता ही रहूं। क्‍या आँख को कान—जैसा ग्राहक बनाया जा सकता है।

3—क्‍या स्‍वाद को भी परमात्‍मा—अनुभूति का साधन बनाया जा सकता है?

4—भगवान का प्रवचन सुनते हुए उनकी आवाज से ह्रदय व कर्ण—तंतुओं पर एक अजीब तरह का कंपन। तब से साधारण ध्‍वनियों से भी अजीब कंपन व आनंद की लहर पैदा होना। क्‍या बुद्ध—पुरूषों के स्‍वर में विशेष कुछ? साथ ही भगवान की अपस्‍थिति में एक आनंददायक गंध का मिलना। वहीं गंध कभी ध्‍यान में व आश्रम में अन्‍यत्र भी मिलना। क्‍या काल—विशेष की गंध विशेष भी होती है?

5—आप कहते, संन्‍यास सत्‍य का बोध है। क्‍या संन्‍यास के लिए गैरिक वस्‍त्र व माला अनिवार्य? क्‍या कोई बिना दीक्षा लिये आपके बताए मार्ग पर नहीं चल सकता?

शनिवार, 17 मई 2014

जिन सूत्र--(भाग--2) प्रवचन--01

जिन सूत्र (महावीर)—(भाग—2)

ओशो

सत्‍य के द्वार की कुंजी: सम्‍यक—श्रवण—प्रवचन—पहला

सोच्‍चा जाणइ कल्‍लाणं, सोच्‍चा जाणइ पावणं
उभयं पि जाणए सोच्‍चा, जं छेपं तं सम्‍मायरे।। 81।।

णाणाssणत्‍तीए पुणो, दंसणतवनियमसंयमे ठिच्‍चा
विहरइ विसुज्‍झमाणी, जावज्‍जीवं पि निवकंपो।। 82।।

जह जह सुयभोगाहइ, अइसयरसपसरसंजुयमपुव्‍वं
तह तह पल्‍हाइ मुणी, नवनवसेवेगसद्धाओ।। 83।।

सूई जहा सुसुत्‍ता,नस्‍सइ कयवरम्‍मि पडिआ वि।
जीवो वि तह ससुत्‍तो,नस्‍सइ गओ वि संसारे।। 84।।

गीता दर्शन--(भाग--2) प्रवचन--052

अहंकार की छाया है ममत्व— (अध्याय-5) प्रवचन—चौबीसवां


कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये।। 11।।

इसलिए निष्काम कर्मयोगी ममत्व बुद्धिरहित केवल इंद्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।


मत्व बुद्धि को त्यागकर अंतःकरण की शुद्धि के लिए, जो जानते हैं, वे पुरुष शरीर, मन, इंद्रियों से काम करते हैं।
इस संबंध में दोत्तीन बातें खयाल में ले लेनी चाहिए।
एक, मनुष्य ने जो भी किया है अनंत जीवन में, आज तक, इस घड़ी तक, उस कर्म का एक बड़ा जाल है। और आज ही मैं सब करना बंद कर दूं, तो भी मेरे पिछले अतीत जन्मों के कर्मों का जाल टूट नहीं जाता है। उसका मोमेंटम है। जैसे मैं साइकिल चला रहा हूं। पैडल बंद कर दिए हैं, अब नहीं चला रहा हूं, लेकिन साइकिल चली जा रही है--मोमेंटम है।