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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

पद घूंघरू बांध--(प्रवचन--03)



मैं तो गिरधर के घर जाऊं—(प्रवचन—तीसरा)

सूत्र:

मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।
रैन पड़ै तब ही उठि जाऊं भोर भये उठि आऊं।
रैन-दिना बाके संग खेलूं ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊं।
जो पहिरावै सोई पहरूं, जो दे सोई खाऊं।
मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।
जहां बैठावे तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।


मीरा मगन भई हरि के गुण गाए।
सांप पिटारा राणा भेज्यो, मीरा हाथ दियो जाए।
न्हाय-धोए जब देखन लागी सालिगराम गई पाए।
जहर का प्याला राणा भेज्यो, अमृत दीन्ह बनाए।
न्हाय-धोए जब पीवन लागी, हो अमर अंचाए।
सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीरा सुलाए।
सांझ भई मीरा सोवण लागी, मानो फूल बिछाए।
मीरा के प्रभु सदा सहाई, राखे बिघन घटाए।
भजन भाव में मस्त डोलती, गिरधर पै बलि जाए।

नुष्य की खोज क्या है? मनुष्य की खोज है: अपने घर की खोज। यहां परदेश है। यहां सब वीराना है। अपना यहां कुछ भी नहीं। और यहां से जाना है। और जो थोड़ा-बहुत अपना मान लोगे, वह भी मौत छीन लेती है। यहां घर तो कोई कभी बना नहीं पाया। यहां तो घर उजड़ने को ही बनते हैं। यहां तो घर बन भी नहीं पाते कि उजड़ जाते हैं। यहां हम ही नहीं टिक पाते, तो हमारे बनाए घर कैसे टिकेंगे? यहां की गई मेहनत तो अकारथ जाती है।
आदमी की खोज उस घर की खोज है, जो मिले तो सदा के लिए मिल जाए।
आदमी की खोज उस घर की खोज है जो सच में घर हो, सराय न हो। यहां तो सब सरायें हैं, धर्मशालाएं हैं--बस रैनबसेरा है। सुबह हुई, चल पड़ना होगा। बहुत मोह मत लगा लेना। सराय से बहुत ममता बिठा लेना। यह छूट ही जाना है। यह छूटा ही हुआ है। तुमसे पहले बहुत लोग यहां ठहरे और गए; तुम भी उसी कतार में हो।
इसलिए चाहे यहां कितना ही धन हो, कितना ही पद हो, प्रतिष्ठा हो; फिर भी तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति यहां मिलती ही नहीं। तृप्ति का संसार से कोई संबंध ही नहीं है।
अक्सर ऐसा होता है कि गरीब को तो थोड़ी आशा भी रहती है, अमीर की आशा भी टूट जाती है। गरीब को तो लगता है कि एक मकान होगा अपना, तो शांति होगी। थोड़ा धन-संपत्ति होगी; सुविधा होगी; फिर सुख और चैन से रहेंगे। उसे यह पता ही नहीं है कि सुख-चैन यहां हो नहीं सकता। धर्मशाला में कैसा सुख-चैन? कब उठा लिए जाओगे...! आधी रात में पुकार लिए जाओगे! कब मौत का दूत द्वार पर खड़ा हो जाएगा और दस्तक देने लगेगा--कुछ भी तो नहीं कहा जा सकता! यहां चैन कैसे हो सकता है? बेचैनी यहां स्वाभाविक है।
फिर भी गरीब को थोड़ी आशा होती है। लगता है: मकान ठीक नहीं, कैसे चैन करूं? पास धन नहीं, कैसे सुखी होऊं? लेकिन अमीर तो बिलकुल निराश हो जाता है। धन भी है, पद भी, प्रतिष्ठा भी, महल भी, साम्राज्य भी, सब है--और उतना का उतना ही परदेश। परदेश रत्ती भर कम नहीं हुआ। और अब तो आशा भी करनी व्यर्थ है। जिससे आशा हो सकती थी वह तो है हाथ में।
तो धनी से ज्यादा निराश कोई भी नहीं होता।
जिनके पास है वे भी सुखी कहां हैं!
जिनके पास नहीं है, वे तो दुखी हैं--यह समझ में आता है; लेकिन जिनके पास है वे भी दुखी हैं--शायद और भी घने दुख में हैं।
आदमी सुख की तलाश करता है, लेकिन सुख शाश्वत में ही हो सकता है। इस सूत्र पर ध्यान करना। सुख शाश्वत का लक्षण है। क्षणभंगुर में सुख नहीं हो सकता। यह जो पानी के बबूले जैसा जीवन है, इसमें तुम कितने ही भ्रम पैदा करो और कितने ही सपने देखो, सुख नहीं हो सकता।
और तुम कैसे अपने को धोखा दोगे! तुम रोज देखते हो कोई चला, किसी की अरथी उठी। तुम रोज देखते हो किसी की चिता जली। तुम रोज देखते हो लोगों को गिरते--जो क्षण भर पहले तक ठीक थे, तुम जैसे थे, चलते थे, दौड़ते थे, वासनाओं से भरे थे, बड़ी महत्वाकांक्षाएं थीं--और अब धूल भरी रह गई मुंह में। तुम कैसे झुठलाओगे इस सत्य को? यह इतना चारों तरफ खुदा हुआ है। इस सत्य की सब तरफ प्रामाणिकता है।
रोज कोई मरता है। फूल वृक्ष से गिरता है, कि फल वृक्ष से गिरता है, कि आदमी पृथ्वी पर गिर जाता है। यहां हम भी ज्यादा देर नहीं हो सकते। लाख अपने मन को समझाएं, लाख अपने मन को बुझाएं, और कहें कि और मरते हैं, मैं थोड़े ही मरता हूं, सदा कोई और मरता है, मैं थोड़े ही मरता हूं, फिर मैं अपवाद हूं, कौन जाने मैं कभी न मरूं!--मगर कैसे तुम धोखा दोगे? इतने प्रमाणों के विपरीत तुम कैसे अपने को धोखा दोगे? सारे मरघट, सारे कब्रिस्तान प्रमाण हैं इस बात के कि यह जगह घर नहीं है।
जैसे ही यह खयाल बहुत स्पष्ट हो जाता है, कांटे की तरह चुभने लगता है प्राणों में कि यह हमारा घर नहीं--तब एक खोज शुरू होती है--असली घर की खोज।
मीरा कहती है: मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
वह असली घर परमात्मा का ही घर हो सकता है। परमात्मा यानी जो सदा है। आदमी यानी जो कभी था और कभी नहीं हो जाएगा। परमात्मा यानी जो सदा था, सदा है, सदा होगा। सातत्य! सनातनता! शाश्वतता! अनंतता जिसका स्वभाव है, वहीं विश्राम है। उसकी गोद में ही विश्राम है। फिर तुम उसे राम कहो, रहीम कहो--यह तुम्हारी मौज की बात। मीरा का नाम उसके लिए गिरधर है, गोपाल है। यह नाम का ही भेद है। नाम में बहुत मत उलझ जाना। मतलब की बात समझ लेना। आम का रस चूस लेना, गुठलियां गिनने मत बैठ जाना।
तुम किस तरह उसे पुकारते हो, यह तुम्हारी मौज--मगर पुकारो! पृथ्वी से जरा आंखें ऊपर उठाओ--आकाश की तरफ। प्यारे को खोजो।
और ऐसा नहीं है कि प्यारा बहुत दूर है। और ऐसा नहीं है कि तुम्हें बड़ी-बड़ी पहाड़ियां चढ़नी हैं, तब तुम्हें प्यारा मिलेगा। मजा तो यह है कि प्यारा बहुत करीब है। संसार बहुत दूर है, इसलिए किसी को नहीं मिल पाता। चलते हैं लोग, चलते हैं लोग--लगता है मिला, मिला, अब मिला, तब मिला--मिलता कभी नहीं। संसार कभी किसी को मिला? बस ऐसा ही लगता है जैसा दूर जमीन को छूता हुआ आकाश, क्षितिज: यह रहा! और थोड़े दौड़ लें, मिल जाएगा! लेकिन तुम जितना दौड़ते हो, क्षितिज भी उतना ही दौड़ जाता है। तुम्हारे और क्षितिज के बीच की दूरी सदा बराबर रहती है, वही की वही; एक ही अनुपात रहता है, उसमें फर्क नहीं पड़ता।
संसार कब किसको मिला है? संसार मिलता ही नहीं और मजा यह है कि संसार बड़ा पास मालूम होता है। और परमात्मा पास मालूम नहीं होता और मिल सकता है, क्योंकि पास है--इतना पास है, पास से भी पास है! तुम्हारे अंतरतम में बैठा है; शायद इसीलिए दिखाई भी नहीं पड़ता।
मछली को सागर कैसे दिखाई पड़े? उसी में पैदा होती है, उसी में लीन हो जाती है। आदमी को परमात्मा कैसे दिखाई पड़े? उसी में हम पैदा होते हैं, उसी में जीते, उसी में श्वास लेते, उसी में एक दिन लीन हो जाते हैं! हम उसकी ही तरंग हैं। हम उसकी ही वीणा पर उठे स्वर हैं। हम उसके ही फूल से उड़ी सुवास हैं। हम उसके ही दीये की किरण हैं। हमारा उससे तादात्म्य है। इसलिए भेद न होने के कारण देखना बहुत मुश्किल है।
भेद चाहिए दृश्य और द्रष्टा में, तभी देखना हो पाता है। कोई चीज तुम्हारी आंख के करीब ले आई जाए, तो फिर तुम न देख सकोगे।
और एक तो बात तुम जानते हो कि अपनी आंख को तुम कभी नहीं देख पाते। आंख, जिससे तुम सब देखते हो, अपने प्रति बिलकुल ही अपरिचित है। अगर आंख को देखना हो तो दर्पण में देखना पड़ता है। दर्पण में आंख दूर हो जाती है। प्रतिबिंब बनता है, प्रतिबिंब दूर हो जाता है। मगर आंख थोड़े ही देखते हो दर्पण में तुम; आंख की छाया देखते हो। आंख को तो अपनी किसी ने कभी देखा ही नहीं। क्योंकि देखना आंख की क्षमता है--इतनी करीब है कि उसको अलग कैसे रखोगे? और अलग रख दोगे तो फिर देखोगे किससे?
ऐसा ही परमात्मा है: तुम्हारे चैतन्य की क्षमता है। घर बहुत दूर नहीं है। शायद तुम घर की तरफ पीठ किए खड़े हो।
मीरा के इन वचनों को सुनना। ये वचन तुम्हारे हृदय के भी वचन किसी दिन बनें तो तुम्हारा सौभाग्य होगा। इन्हें तुम गीत, काव्य और भजन ही मत समझना। यह प्राणों की प्यास है। यह प्राणों की पुकार है। मीरा ने जो कहा है, यह उसके हृदय का भाव है। यह कोई दर्शनशास्त्र नहीं है। मीरा किसी सिद्धांत को सिद्ध करने नहीं चली है और न दुनिया को कोई धर्म देने चली है। मीरा तो अपनी प्यास की अभिव्यक्ति कर रही है।
इसलिए जिन लोगों को सच में ही प्यासे होना है, वे मीरा का हाथ पकड़ लें; वे उसकी भाव-भंगिमा में डूबें। वे उसके भाव को अपना भाव बना लें। गुनगुनाओ मीरा को। डुबकी लो उसमें।
मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
मीरा कहती है: मुझे तो अब एक ही घर याद आता है--परमात्मा का--वहीं मुझे जाना है। यहां से मुझे हटा लो। मुझे वापस बुला लो। यह निष्कासन बहुत हो गया। यह दंड काफी है। अब मुझे और दूर न रखो।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।
प्रेमी तो बहुत पाओगे; गली-कूचे मिलते हैं। प्रेमी तो बहुत पाओगे। लेकिन प्रेम टिकता कितनी देर? बड़े से बड़े प्रेमियों का प्रेम भी क्षणभंगुर है; बन भी नहीं पाता और बिखर जाता है। जो प्रेम बनता ही नहीं और बिखर जाता है--सपने जैसा है, पानी पर खिंची एक लकीर जैसा है, इस प्रेम में और कब तक जीवन को गंवाओगे? जन्मों-जन्मों से इसी के पीछे भाग रहे हो, प्रेमी को खोज रहे हो। मगर असली प्रेमी को नहीं खोजते। असली प्रेमी से क्या अर्थ है मीरा का?
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम...
क्यों कहती है कि गिरधर मेरे सच्चे प्यारे हैं? सच्चे यानी एक बार मिल गए तो मिल गए; फिर बिछुड़न नहीं होती; फिर विरह का कोई उपाय नहीं। यह जो विवाह है, एक बार हो गया तो इसमें फिर तलाक नहीं। इस पृथ्वी पर तो जितने विवाह होते हैं, सब में तलाक मौजूद ही रहता है; न भी दो तलाक, तो भी मौजूद रहता है; न भी दो कानूनी ढंग से, तो भी हो जाता है।
बहुत कठिन है इस जगत में प्रेम को थिर बनाना। क्योंकि जिस मन से हम प्रेम करते हैं, वही थिर नहीं है। दोनों व्यक्तियों के मन थिर नहीं हैं। दोनों व्यक्तियों के मन तूफान में हैं और दोनों थिर होने की सोच रहे हैं प्रेम में!
ध्यान में जो थिर नहीं हुए, वे प्रेम में कैसे थिर होंगे? एक थिर नहीं हो सका तो दो मिल कर कैसे थिर होंगे? एक ही काफी चंचल होता है, दो मिल कर चंचलता अनंतगुनी हो जाती है। टक्कर और टकराव!
प्रेमियों की सारी कथा संघर्ष की कथा है। लड़ाई-झगड़ा। बने रहें साथ तो भी, साथ कभी का टूट चुकता है। बने रहते हैं--और किन्हीं कारणों से: आर्थिक सुविधा है, परिवार है, बच्चे हैं, प्रतिष्ठा है, नाम है। जाएं तो जाएं भी कहां? उस सांचे प्रीतम की तो कोई खबर भी नहीं मिलती। उसका तो कुछ पता भी नहीं है। तो जो हाथ में है उसी को पकड़े रहो। कहते हैं समझदार लोग कि हाथ की आधी रोटी भी ठीक--सपने की पूरी रोटी से। तो वह पता नहीं सांचा प्रीतम, माना कि पूरी रोटी है और तृप्त कर देगा; लेकिन कहां है? उसका तो कुछ पता नहीं। तो पकड़े रहो जो भी आधा, बासा, जो भी टुकड़ा मिला। अज्ञात के भय से, अपरिचित के भय से, जो भी हाथ में है--उसे पकड़े रहो, जकड़े रहो, छोड़ मत दो!
इसलिए प्रेमियों में इतनीर् ईष्या पैदा हो जाती है। क्यों इतनीर् ईष्या प्रेमियों में पैदा हो जाती है? क्यों पत्नी पीछे पड़ी रहती है पति के कि कहीं किसी और से तो कोई लगाव नहीं बन जा रहा है? पति क्यों इतना घबड़ाया रहता है कि मेरी पत्नी कहीं किसी और के साथ तो संबंध नहीं बना लेगी? इतना भय क्या है? यह भय इसीलिए है कि यहां भरोसा हो ही नहीं सकता। पूरी संभावना यही है कि ऐसा होगा ही, पत्नी को भी पता है, पति को भी पता है। इस जगत में कोई चीज थिर तो होती नहीं, तो यह संबंध भी कैसे थिर होगा? इसकी हमें अंतसचेतना है: यहां कुछ भी शाश्वत नहीं है, यह संबंध भी कैसे शाश्वत होगा? तो भयभीत हम पहले से ही हैं। पहले से ही सुरक्षा कर रहे हैं कि बांध लेंर् ईष्या के जाल में।
पति-पत्नी एक-दूसरे पर पहरा देते रहते हैं। और जरा सा मौका उन्हें लगा कि दूसरा स्वतंत्र होने की कोशिश कर रहा है, कि अपनी पूरी शक्ति लगा देते हैं--उस स्वतंत्रता को नष्ट करने में। यह कैसा प्रेम हुआ, जो स्वतंत्रता की गर्दन दबा डालता हो, जो स्वतंत्रता को फांसी लगा देता हो?
सच्चा प्रेम तो स्वतंत्रता लाता है। सच्चे प्रेम में तो ईष्या की कोई झलक ही नहीं होती। सच्चे प्रेम में तो ईष्या की छाया भी नहीं होती। सच्चे प्रेम में तो श्रद्धा अनंत होती है। मगर सच्चा प्रेम सच्चे प्रीतम से ही हो सकता है। इन छायाओं से नहीं बन सकेगा। यहां कैसे भरोसा करो किसी पर! जिस पति पर तुमने भरोसा किया, जिस पत्नी पर तुमने भरोसा किया, उसकी सांस बंद हो जाए कल, जीवन खो जाए--क्या करोगे? और मन ऐसा चंचल है--आज तुमसे लगाव है, कल किसी और से हो जाए! मन इतना चंचल है! मन इतना क्षुद्र है! मन व्यर्थ में इतना उत्सुक है: कल कोई और धनी मिल जाए; कोई और सुंदर देह का व्यक्ति मिल जाए; कल कोई और रूपवान मिल जाए--तो बात खत्म हो गई।
परमात्मा से और रूपवान तो पाया नहीं जा सकता; और परमात्मा से और धनी भी नहीं पाया जा सकता। परमात्मा से और ऊपर तो कोई है नहीं। इसलिए परमात्मा के साथ जो प्रेम बन जाता है उसमें कोई प्रतिस्पर्धा, कोईर् ईष्या नहीं जन्मती।
और फिर परमात्मा के साथ, यह भी भय नहीं है कि वह तुम्हें छोड़ दे। तुम्हें पकड़े ही हुए है। तुम चाहे उसे पकड़ो या न पकड़ो--उसका हाथ तुम्हारे हाथ में है ही। तुम जब सोचते हो तुमने परमात्मा का ध्यान भी नहीं किया, विचार भी नहीं किया--तब भी वही तुम्हें सम्हाले हुए है। अन्यथा कौन तुम्हारे भीतर श्वास लेगा? कौन तुम्हारे खून को दौड़ाएगा रगों में? कौन तुम्हारे हृदय में धड़केगा? तुम चाहे उसे इनकार करो; परमात्मा ने तुम्हें इनकार कभी नहीं किया है। इसलिए जिस दिन तुम भी स्वीकार कर लोगे, वह तो स्वीकार किए ही है--जिस दिन ये दोनों स्वीकृतियां मिल जाएंगी, उसी दिन महामिलन हो जाता है।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।
और उसका रूप अनिर्वचनीय है। इस जगत में जो थोड़ा-बहुत रूप दिखाई पड़ता है, उसी का प्रतिबिंब है। इस जगत में जो थोड़ा-बहुत संगीत दिखाई पड़ता है, यह उसी के संगीत की प्रतिध्वनि है। किसी स्त्री के चेहरे पर कभी तुम्हें अगर रूप दिखाई पड़ा है, तो सावधानी बरतना, जरा गौर से देखना: वह रूप उसकी ही झलक है। किसी फूल में अगर सौंदर्य मालूम पड़ा है, जरा ध्यान से बैठ जाना फूल के पास, जरा गहरे में खोजना--और तुम पाओगे: वह सौंदर्य उसी का है। चांदत्तारों में, पर्वत-पहाड़ों में, सागरों-नदियों में, चारों तरफ जो हजार-हजार रूपों में प्रकट हो रहा है, वह उसी का रूप है। वह अरूप का ही रूप है। ये सब चेहरे उसी के हैं। ये सब रंग-ढंग उसी के हैं। ये सब अदाएं उसी की हैं।
एक बार सांचे प्रीतम से संबंध जुड़ने लगे और उसका रूप दिखाई पड़ने लगे तो फिर सभी रूप उसी में समाहित हो जाते हैं। जैसे सभी नदियां सागर में गिर जाती हैं, ऐसे सभी रूप उसी एक रूप में समा जाते हैं।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।
मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
इस जगत की पीड़ा यही है कि प्रेम की हमारे भीतर आकांक्षा तो है, और जगत में उसकी तृप्ति का कोई उपाय नहीं। इसलिए जितने प्रेमी इस जगत में कष्ट पाते हैं, दूसरे लोग नहीं पाते। दूसरे तो कठोर हैं। दूसरों ने तो पत्थर कर लिया है दिल। वे प्रेम की झंझट में ही नहीं पड़ते हैं। इसे समझना।
प्रेम उपद्रव है। क्योंकि प्रेम की प्यास है, और यहां कोई भी व्यवस्था नहीं है कि उसकी तृप्ति हो सके। परमात्मा ने वह आयोजन रखा है। प्रेम की प्यास दी है और प्रेम का कोई उपाय यहां तृप्त करने का दिया नहीं, ताकि तुम यहां भटक न जाओ; ताकि तुम घर लौट ही आओ; ताकि तुम्हें घर लौटना ही पड़े। प्यास तुम्हारे रोएं-रोएं में भर दी है।
इसलिए एक ऐसा आदमी खोजना कठिन है जो प्रेम पाकर आनंदित न होता हो। ऐसा आदमी खोजना कठिन है जो जाने-अनजाने प्रेम न पाना चाहता हो। छोटे से बच्चे से लेकर, दुधमुंहे बच्चे से लेकर मृत्यु-शय्या पर पड़े बूढ़े आदमी तक--सतत हम प्रेम के लिए टटोलते रहते हैं, खोजते रहते हैं: कहां से मिल जाए, कैसे मिल जाए। और यहां कभी मिलता नहीं। यह परमात्मा की बड़ी अनुकंपा है। प्रेम की प्यास दी है और प्रेम को तृप्त करने का कोई उपाय नहीं दिया है।
इसलिए एक न एक दिन टकरा-टकरा कर, भटक-भटक कर, द्वार-दीवालों को खटका-खटका कर यह बात समझ में आ ही जाती है कि अगर प्रेम को तृप्त करना है तो तृप्ति का उपाय परमात्मा में है, और कहीं नहीं। जिस दिन यह बोध होता है, उसी दिन व्यक्ति धार्मिक होता है। यहां तो प्रेम के नाम परर् ईष्या है, मोह है, मत्सर है। यहां तो प्रेम के नाम पर एक-दूसरे की हत्या है। यहां तो प्रेम के नाम पर गुलामी चलती है।
जैसे हवा में अपने को खोल दिया है इन फूलों ने
आकाश और किरणों और झोंकों को सौंप दिया है अपना रूप
और उन्होंने जैसे अपने में भर कर भी उन्हें छुआ नहीं है
ऐसा नहीं हो सकता क्या तुमसे मेरे प्रति?
नहीं हो सकता शायद, और इसी का रोना है
या ऐसा भी किसी दिन होना है?
तुम्हारे वातावरण में डाल दी है कितनी बार मैंने अपनी आत्मा
तुमने उसे या तो अपने अंक में ही नहीं लिया
या फिर इतना अधिक खींच लिया है, जितना तुम्हें न पा सकने पर
मैंने जीवन को छाती पर भींच लिया है
क्यों नहीं रह सकते हम परस्पर फूल और आकाश की तरह?
यह नहीं हो सकता शायद और इसी का रोना है
या ऐसा भी किसी दिन होना है?
देखा तुमने फूल और आकाश को? आकाश फूल पर कोई बंधन नहीं डालता। फूल आकाश से कुछ अपेक्षाएं नहीं रखता। आकाश फूल को अवसर देता है खिल जाने का। फूल अपना सब लुटा देता है--अपनी सारी निधि; जब खिल जाता है तो सारी सुवास आकाश को लुटा देता है। लेन-देन तो खूब होता है, लेकिन शर्तबंदी बिलकुल नहीं है। न तो फूल कहता है कि आकाश, तुम मेरे हुए; न आकाश कहता है कि फूल, तुम मेरे हुए। मेरेत्तेरे की बात ही नहीं उठती। मैंत्तू का भाव ही नहीं उठता।
इन पंक्तियों के लेखक ने आदमी के मन की गहरी बात कही है।
जैसे हवा में अपने को खोल दिया है इन फूलों ने
आकाश और किरणों और झोंकों को सौंप दिया है अपना रूप
और उन्होंने जैसे अपने में भर कर भी उन्हें छुआ नहीं है
ऐसा नहीं हो सकता क्या तुमसे मेरे प्रति?
नहीं हो सकता शायद, और इसी का रोना है
या ऐसा भी किसी दिन होना है?
प्रेमियों का रोना क्या है? व्यथा क्या है? पीड़ा क्या है? विडंबना क्या है? एक ही विडंबना है कि जिससे हम प्रेम करते हैं, वही जंजीरें बन जाता है। जिससे हम प्रेम करते हैं, कर भी नहीं पाते कि वही कारागृह बन जाता है। जिसे हम देने चले थे, हम देने का निवेदन भी नहीं करते कि वह मालकियत की घोषणा कर देता है। जिसे हमने पहले दिन अपने सहज आनंद से दिया था, वह दूसरे दिन अपेक्षा करता है--कानूनी अपेक्षा; मिलना ही चाहिए।
आकाश को आज फूल ने अपना रूप दिया है; कल सुबह आकाश आकर फूल के द्वार पर कहेगा नहीं: अब क्या हुआ तुम्हारा रूप? अब मुझे दो। कल दिया था, आज भी दो, और सदा देना। यह गठबंधन हो गया। नहीं दोगे तो उपद्रव है। न तो फूल ही कल आकर आकाश से कहता है कि कल मुझे खिलाया था; कल मुझे जगह दी थी; मुझे सन्मान से स्वीकारा था, सिंहासन दिया था--आज मैं मिट्टी में गिर रहा हूं, अब मुझे सम्हालो! आज मेरी पंखुड़ियां बिखरी जाती हैं। आज मैं मृत्यु की गोद में जा रहा हूं, मुझे बचाओ! अगर नहीं बचाते तो यह कैसा तुम्हारा प्रेम? नहीं कोई शर्त है। नहीं कोई आग्रह है।
न तो आकाश फूल को छूता, न फूल आकाश को छूता, और लेन-देन पूरा हो जाता है। फूल अपना सब निवेदन कर देता है आकाश को। आकाश अपनी सारी स्वतंत्रता दे देता है फूल को। दोनों एक-दूसरे की मुक्ति में सहयोगी हैं।
यही तो प्रेमी का रोना है। क्योंकि प्रेम की आकांक्षा, मूलतः, बहुत गहरे में स्वतंत्रता की आकांक्षा है। प्रेम बीज है मोक्ष का। लेकिन जैसे ही तुमने किसी को प्रेम किया, स्वतंत्रता गई; परतंत्र हुए। और परतंत्र हुए कि प्रेम मरा, क्योंकि प्रेम परतंत्रता में जी नहीं सकता। प्रेम को परतंत्रता में जिलाने की कोशिश ऐसे ही है जैसे आकाश को कोई डब्बों में बंद करना चाहे; सूरज की किरणों को कोई संदूकों में बंद करना चाहे, फूलों की सुवास को कोई मुट्ठियों में भींच लेना चाहे। यह नहीं हो सकता। यह अस्वाभाविक है। मगर यही प्रेमी करते हैं। और प्रेम के नाम पर फिर जंजीरें रह जाती हैं। बोझिल जंजीरें! मुंह में एक तिक्त और कड़वा स्वाद रह जाता है।
मगर इस जगत में यही हो सकता है। तुम जो मांग कर रहे हो कि न फूल आकाश को छुए, न आकाश फूल को छुए--यह तो सिर्फ परमात्मा के ही प्रेम में हो सकता है। इसलिए उसको मीरा ने सांचा प्रीतम कहा है। उसके प्रेम में कोई बंधन नहीं है। उसके प्रेम में परिपूर्ण स्वतंत्रता है। उसके प्रेम में तुम पर कोई सीमा नहीं लगती; तुम्हें कोई मर्यादा नहीं बांधनी होती। उसका प्रेम तुम्हें स्वीकार करता है--तुम जैसे हो वैसा ही। उसका प्रेम यह भी नहीं कहता कि तुम ऐसे होओगे तो मैं प्रेम करूंगा; तुम ऐसे नहीं होओगे तो मेरा प्रेम अवरुद्ध हो जाएगा।
इस जगत में तो सभी प्रेम सशर्त हैं। तुम जब भी किसी को प्रेम करते हो, तुम कहते हो: ऐसा करो, तो ही मेरा प्रेम मिलेगा; ऐसा नहीं किया तो मैं अपने प्रेम को रोक लूंगा। यह तो प्रेम न हुआ; यह तो सौदा हुआ; यह तो व्यवसाय हुआ।
प्रेम तो अबाध बहना चाहिए। उसके पीछे कोई और हेतु और कारण नहीं होना चाहिए।...मेरी मानोगे तो प्रेम दूंगा और मेरी नहीं मानोगे तो प्रेम छीन लूंगा--तो यह प्रेम नहीं था; यह तो केवल रिश्वत थी। यह तो केवल फुसलावा था। यह तो तुम्हें राजी करने के लिए...ऐसा ही था जैसे कि कोई कांटे में आटा लगा कर जल के किनारे बैठ जाता है--मछली को पकड़ने को। कोई मछली को आटा खिलाने के लिए नहीं बैठा है; आटे में कांटा छिपाया हुआ है। ऐसे ही तुम्हारे प्रेम में कांटा छिपा हुआ है। इसलिए मीरा कहती है: यह सांचा प्रेम नहीं है। यह सच्चा प्रेम नहीं है। इसमें भीतर तो कांटा है--जहर से भरा हुआ।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम...
परमात्मा आकाश जैसा विराट है। विराट से दोस्ती करोगे तो तुम भी विराट हो जाओगे; क्षुद्र से दोस्ती करोगे तो क्षुद्र हो जाओगे। दोस्ती सोच-समझ कर करना।
और अक्सर हम बड़े नासमझ हैं, हम बड़े क्षुद्र से दोस्ती कर लेते हैं। किसी ने धन से दोस्ती कर ली है; बस वह नोट ही गिनता रहता है। वह नोट को ही देखता रहता है। उसे सारे जगत का सौंदर्य नोट में समाया हुआ मालूम पड़ता है। किसी ने पद से दोस्ती कर ली है; वह दिन-रात एक ही चिंता में रहता है: कैसे और कुर्सी बड़ी हो जाए; थोड़ी और ऊंची हो जाए, थोड़ी और ऊंची हो जाए! सारी जिंदगी दांव पर लगा कर बस कुर्सी बड़ी कर लेता है। और तब कुर्सी सहित गिर जाता है कब्र में!
ये दोस्तियां तुमने बड़ी क्षुद्र से कर ली हैं। दोस्ती ही करनी तो कुछ विराट से करो; चरम से करो; परम से करो। वही अर्थ है:
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।
रैन पड़ै तब ही उठि जाऊं भोर भये उठि आऊं।
रैन दिना बाके संग खेलूं ज्यूं-त्यूं वाहि रिझाऊं।
मीरा कहती है कि दिन हो कि रात, बस एक ही समाया है हृदय में; सुबह हो कि सांझ, बस एक ही समाया है हृदय में। सांझ भी उसकी पूजा को उठ आती हूं। रात पड़ते ही उसकी याद से भर जाती हूं। उसके ही सपने आंखों में तैरते हैं। हृदय में उसकी ही रसधार बहती है। और सुबह उठते भी उसकी ही प्रभाती, उसी का नाम-स्मरण, रोआं-रोआं उसी की धुन से भरा है।
रैन पड़ै तब ही उठि जाऊं भोर भये उठि आऊं।
रैन दिना बाके संग खेलूं...
सुबह हो कि सांझ, दिन हो कि रात, एक खेल चल रहा है उस प्यारे के संग। जिन्होंने इस रस को कभी नहीं जाना, वे समझेंगे, पागलपन है। किसकी बातें हो रही हैं? यह मीरा किसके रस की बातें कर रही है? जिसने नहीं जाना है इस प्रेम को, उसके लिए ये बातें बिलकुल ही बेबूझ मालूम पड़ेंगी; बेबूझ ही नहीं, विक्षिप्त मालूम पड़ेंगी। लेकिन जिसने जाना है उसके लिए सारा जगत फीका हो जाता है।
निर्णय मत लेना बिना जाने। सुन कर ही निर्णय मत ले लेना। क्योंकि तुम भी अगर मीरा को पाओगे एकांत में बैठे हुए गिरधर-गोपाल से बातें करते, तो क्या सोचोगे? तुम सोचोगे: दिमाग इस स्त्री का खराब हुआ। यह किससे बातें कर रही है? कौन है यहां? कोई तो दिखाई नहीं पड़ता। यह सुबह से सांझ तक किसकी मस्ती में मस्त रहती है?
अदृश्य की मस्ती भी होती है और अदृश्य से भी संबंध बनते हैं। यह सच है कि अदृश्य से जो संबंध बनते हैं, वे दूसरों के सामने प्रमाणित नहीं किए जा सकते। मगर प्रमाणित करने की जरूरत किसे है। मीरा मस्त है। मीरा आनंदित है। और तुम दुखी हो।
मुझसे पूछते हो तो मैं तुम्हें एक कसौटी देता हूं। आनंद को तुम सत्य की कसौटी मानना; और कोई कसौटी मत मानना। जो आदमी दुखी हो, समझना कि असत्य में जी रहा है। और जो आदमी आनंद में मस्त हो, मग्न हो, समझना कि सत्य में जी रहा है। आनंद कसौटी है।
जैसे सर्राफ के घर जाते हो न, तो सोने को कसने का पत्थर होता है; अपने पत्थर पर उठ कर सोने को घिस लेता है। जैसे ही स्वर्ण-रेखा खिंच जाती उसकी कसौटी पर, समझ जाता है कि असली है या नकली; या कितना असली, कितना नकली।
आनंद कसौटी है। तुम अपने हर अनुभव को आनंद पर कस लेना। तुम बैठे अपनी पत्नी से बात कर रहे हो, कोई तुम्हें पागल नहीं कहेगा--क्योंकि पत्नी दिखाई पड़ती है; चित्र लिया जा सकता है, चार गवाह जुड़ाए जा सकते हैं। पत्नी तुमसे बात कर रही है। मगर सवाल यह है कि क्या तुम इस बात करते वक्त आनंदित हो? अगर आनंदित नहीं हो तो सारी दुनिया गवाही दे, कि पत्नी असली है, तुम असली हो और तुम्हारे बीच जो वार्ता हो रही है वह असली है--क्या सार! अगर नरक ही पैदा हो रहा है असली से तो क्या सार!
मीरा को पागल मत कहना; क्योंकि मीरा को अगर पागल कहा, तो तुम उस दिशा में जाने से अपने को रोक लोगे, भयभीत हो जाओगे। पागल तुम हो। पागल यानी जो दुखी है; और जिसने अपने दुख को ही वास्तविक मान रखा है। और जिसने वास्तविकता की ऐसी व्याख्या की है कि सिर्फ दुख ही वास्तविक मालूम होगा, और आनंद कभी वास्तविक नहीं मालूम होगा--वह बड़ी झंझट में पड़ जाएगा। उसने द्वार ही बंद कर दिए परमात्मा के।
थोड़ा-थोड़ा सरको अपने दुख से। अपनी तथाकथित वास्तविकता से थोड़ा-थोड़ा सरको। इसलिए ज्ञानियों ने इस संसार को माया कहा है, जो दिखाई पड़ता है; और परमात्मा को सत्य कहा है, जो दिखाई नहीं पड़ता। यह संसार तो है, चारों तरफ दिखाई पड़ रहा है; हर जगह टक्कर लग जाती है। परमात्मा तो कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा है। अजीब थे ये लोग भी जिन्होंने कहा कि परमात्मा सच है, जो दिखाई नहीं पड़ता; और जो दिखाई पड़ता है, वह झूठ है, माया है, सपना है। रात भी तो तुम्हें सपना दिखाई पड़ता है; दिखाई पड़ने में कोई कमी नहीं होती। सुबह उठ कर पाते हो कि सपना था। ऐसे ही एक दिन जब मौत आएगी द्वार पर, पाओगे कि सब सपना था, मगर तब बहुत देर हो जाएगी। उसके पहले थोड़ा अवसर का उपयोग कर लो।
आनंद को कसौटी समझो। अपने जीवन की हर अनुभूति को आनंद पर कसो कि इससे आनंद उपलब्ध हो रहा है? इससे मस्ती सघन हो रही है? इससे मगन भाव आ रहा है? अगर आ रहा है तो छोड़ो फिकर विज्ञान क्या कहता है। तुम ठीक राह पर हो। जैसे कोई बगीचे के करीब आता है तो धीरे-धीरे हवाएं ठंडी होने लगती हैं। बगीचा दिखाई भी न पड़ता हो, तो भी तुम अनुभव करते हो कि तुम ठीक दिशा में जा रहे हो; हवाएं ठंडी होने लगी हैं। फिर और करीब आते हो, अभी भी बगीचा दिखाई नहीं पड़ता; हो सकता है पहाड़ी की ओट में छिपा हो--लेकिन अब फूलों की गंध भी आने लगती है। तब तुम जानते हो कि निश्चित हम ठीक दिशा में हैं; यद्यपि अभी कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। और करीब आते हो तो पक्षियों के गीत सुनाई पड़ने लगते हैं; यद्यपि अभी कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। और करीब आते हो तो देखते हो कि दो आदमी पास से गुजर गए उस दिशा से आते हुए और उनके वस्त्रों में फूलों की सुवास थी; वे बगीचे से ही आते होंगे। और प्रमाण मिल रहा है।
जैसे-जैसे तुम्हारे जीवन में आनंद बढ़े, शांति बढ़े, मस्ती बढ़े, समाधि बढ़े--समझना कि परमात्मा की तरफ जा रहे हो। और अगर कभी किसी आदमी में ऐसी मस्ती और समाधि मिल जाए तो समझना कि परमात्मा के पास से आ रहा है। उसकी संगत करना, उसके पास बैठना।
...भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई। उसके साथ बिगड़ना। वह ले जाए जहां, वहां जाना।
रैन दिना बाके संग खेलूं ज्यूं-त्यूं वाहि रिझाऊं।
और मीरा कहती है: उसे रिझाती हूं, जैसे बनता है--जिस तरह भी बन जाता है। कभी रूठ जाती हूं, कभी रिझाती हूं, कभी नाराज हो जाती हूं; कभी प्रेम की बातें करती हूं; कभी फुसलाती हूं; कभी गीत गाती हूं।...ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊं!
इसलिए मैंने कहा कि भक्त का भाव बदलता रहता है मौसम की तरह।
तू मुझे बता कि क्या था तू मेरे बयां से पहले
तेरी थी तो क्या हकीकत थी मेरे गुमां से पहले
भक्त पूछता है भगवान से भी कि तू यह मत समझ कि हम ही तुझ पर निर्भर हैं; तू भी हम पर निर्भर है!
तू मुझे बता कि क्या था तू मेरे बयां से पहले,
मैंने जब तक तेरे संबंध में बात न की थी तो तू था ही क्या, यह बता!
तेरी थी तो क्या हकीकत थी मेरे गुमां से पहले,
और जब तक मैंने अपनी अनुभूति को स्वर न दिए थे, तेरे होने न होने में क्या था? यह बात सच है। जैसा मीरा ने गाया है गोपाल को, वैसा किसी ने गाया नहीं। मीरा के गाने के बाद गोपाल में जितना सत्य है उतना इसके पहले कभी भी नहीं था। अगर मीरा न होती तो गोपाल कुछ कमजोर होते; तो गोपाल कुछ दरिद्र होते। मीरा ने कुछ समृद्धि जोड़ी है।
ऐसा ही नहीं कि भक्त ही भगवान को कुछ देता है। भगवान देता है; भक्त देता है। यह लेन-देन दोनों तरफ से चलता है। यह आग दोनों तरफ लगती है। यह कोई प्रेम ऐसा नहीं है कि एकतरफा है, कि भक्त ही रोता रहता है; नहीं, भगवान भी रोता है। ऐसा होना ही चाहिए; नहीं तो प्रेम का कोई अर्थ ही न रह जाएगा।
तू मुझे बता कि क्या था तू मेरे बयां से पहले,
तेरी थी तो क्या हकीकत थी मेरे गुमां से पहले,
मिला राजे लामकां भी तो मकां की ही आगही से,
न शऊरे लामकां था कहीं भी मकां से पहले,
इसे मैंने ही बसाया इसे मैंने ही सजाया,
यह चमन चमन नहीं था तेरा बागवां से पहले,
न पता था बिजलियों को कोई अपनी मंजिलों का,
यूं ही बस भटक रही थीं मेरे आशियां से पहले,
तेरे जोहए लनतरानी को अयां किया था मैंने,
तेरा जल्वा कब था जल्वा मेरे इम्तहां से पहले,
हुआ है दर्दे दिल से पैदा ये तसब्बरे मुसर्रत,
ये निशाते जहां कहां थीं गमें जावदां से पहले,
न फुगाने नीम शब थी न दुआए सुबहगाही,
तेरा जिक्र तक नहीं था मेरी दास्तां से पहले।
भक्त कहता है: न कोई भजन था, न कोई कीर्तन था; न सुबह कोई प्रभाती करता था; न संध्या कोई तेरा गीत गाता था; न मंदिरों में कोई घंटियां बजती थीं, न दीप सजाए जाते थे, न धूप जलाई जाती थी, न पूजा के, आरती के थाल उतारे जाते थे।
न फुगाने नीम शब थी...
न तो संध्या को मंदिरों की घंटियां बजती थीं और संध्या की प्रार्थना या नमाज होती थी।
...न दुआए सुबहगाही
और न सुबह की कोई प्रार्थना थी।
तेरा जिक्र तक नहीं था मेरी दास्तां से पहले।
जब तक मेरी कहानी न घटी थी, तब तक तेरी किसी को खबर भी न थी, तेरा जिक्र भी नहीं था।
मेरे शौक-ए-बंदगी से बने दैर-औ-हरम सब,
तेरी सजदागाह कहां थी मेरे आस्तां से पहले,
भक्त कभी-कभी जूझता है और वह कहता है कि यह मैंने ही बनाए हैं--ये मंदिर और मस्जिद, ये गुरुद्वारे, ये गिरजे।
मेरे शौक-ए-बंदगी से बने दैर-औ-हरम सब
यह मेरा ही प्रेम है, यह मेरी ही पुकार है--जिसने ये सारे मंदिर-मस्जिद बनाए हैं।
तेरी सजदागाह कहां थी मेरे आस्तां से पहले
और जब तक मेरा माथा झुकने को नहीं था, तब तक कहां थी तेरी प्रतिमा और कहां था तेरा पूजा-स्थल। कहां था तू? तेरा होना मुझसे पहले नहीं हो सकता।
मेरे नक्शे पा से पैदा हुए जिंदगी के रस्ते,
मैं ही गामजन हुआ था यहां कारवां से पहले,
तेरा नाम तेरी हस्ती तेरी अस्ल तेरी सूरत,
ये तमाम लफ्जो मानी थे कहां बयां से पहले
मेरे कहने के पहले इन शब्दों में अर्थ ही क्या था!
भक्त कभी जूझता, कभी रूठता, कभी मनाता। भक्त सारी उन प्रक्रियाओं से गुजरता है जिनसे इस जगत में साधारणतः प्रेमी गुजरते हैं। फर्क, दो प्रेमियों के बीच जो घटनाएं घटती हैं उसमें और भगवान और भक्त के बीच में इतना ही है कि दो प्रेमियों के बीच थोड़े दिन घटती हैं; सुहागरात ज्यादा लंबी नहीं होती। क्षणभंगुर होती है; आई और गई। जल्दी ही रस-स्रोत सूख जाते हैं; एक-दूसरे के प्रति उदासी हो जाती है। झरने फिर नहीं बहते। फर्क इतना ही है: परमात्मा और भक्त के बीच झरना फिर सदा बहता है; एक दफा बहा तो बहा। यही तो अर्थ है सांचे प्रीतम का। शाश्वत प्रेमी है परमात्मा।
रैन दिना बाके संग खेलूं, ज्यूं-त्यूं वाहि रिझाऊं।
जो पहिरावै सोई पहरूं, जो दे सोई खाऊं।
भक्त कहता है: तेरी मर्जी, मेरा जीवन। तेरी मर्जी, मेरा अनुशासन।
जो पहिरावै सोई पहरूं, जो दे सोई खाऊं।
भक्त अपनी इच्छा हटा लेता है। प्रेमी अपनी इच्छा को हटा लेता है। इच्छा होगी तो प्रेम में कमी रह जाती है। इच्छा होगी तो अपने को थोप देने की आकांक्षा रह जाती है। इच्छा होगी तो हम अपनी मर्जी से कुछ करवाना चाहते हैं। नहीं, प्रेमी अपनी सारी मर्जी हटा लेता है।
जो पहिरावै सोई पहरूं, जो दे सोई खाऊं।
तो जो दे देता है भगवान, वही...।
मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।
और जैसे-जैसे यह प्रेम का संबंध गहरा होता है, यह संवाद सफल होता है; जैसे-जैसे भक्त का हृदय परमात्मा के करीब धड़कने लगता है; जैसे-जैसे भगवान की मूरत स्पष्ट होती है--वैसे-वैसे पता लगता है कि जन्मों-जन्मों में इसी को तो खोजा है। यह प्रीत पुरानी है। यह कोई नई खोज नहीं है। और जब हम किसी और को भी प्रेमी समझ लिए थे, तब भी हम इसी को खोज रहे थे, यह पता चलता है। जब तुम किसी पुरुष के प्रेम में पड़ गए थे; किसी स्त्री के प्रेम में पड़ गए थे; किसी बेटे के प्रेम में पड़ गए; किसी मां-पिता के प्रेम में पड़ गए; किसी दोस्त के प्रेम में पड़ गए--जिस दिन तुम परमात्मा से संबंध जोड़ पाओगे, उस दिन चकित होकर देखोगे कि उन सब संबंधों में तुमने वस्तुतः परमात्मा को ही खोजा था। और इसलिए वे कोई भी संबंध तृप्त न कर पाए; क्योंकि तुम खोजते थे परमात्मा को और खोजते कहीं और थे--खोजते थे संसार में। मांग तुम्हारी बड़ी थी। तलाशते थे बूंद में और खोजते थे सागर को। अतृप्त न होते तो क्या होता? असफल न होते तो क्या होता? खोजते थे हीरों को, तलाशते थे कंकड़-पत्थरों में। विषाद हाथ न लगता तो क्या होता? असफलता स्वाभाविक थी; निश्चित थी।
मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।
और यह मैं तुमसे कहना चाहता हूं: यह मीरा का ही अनुभव नहीं है; यह जिन्होंने जाना सभी का अनुभव है कि हमारा प्रेम एक ही है--वह परमात्मा है। हम उसी की तलाश कर रहे हैं। कभी गलत दिशा में, तो भी तलाश उसी की है। कभी ठीक दिशा में, तो भी तलाश उसी की है। हम कुछ और खोजते ही नहीं, हम कुछ और खोज ही नहीं सकते।
यहां तक भी मैं तुमसे कहना चाहूंगा कि जिन बातों में तुम कभी नहीं सोचते कि परमात्मा हो सकता है, उनमें भी हम उसी को खोजते हैं। एक आदमी पद को खोज रहा है। जब तुम जागोगे कभी तब तुम पाओगे कि पद में भी परम पद की ही खोज छिपी थी। पद में भी आकांक्षा यही थी कि वहां पहुंच जाऊं जहां से कोई गिरा न सके; वहां पहुंच जाऊं जहां गिरने का भय न रह जाए। वही आकांक्षा थी।
जब तुम धन को खोजते हो तब भी परमात्मा को खोजते हो, क्योंकि परमात्मा परम धन है। हालांकि धन में मिलेगा नहीं, लेकिन धन में उसी को तुम्हारी आकांक्षा है। जब तुम धन की इतनी वासना करते हो तो तुम्हारी मूल वासना है क्या?
गरीब आदमी को सीमा मालूम पड़ती है। आज गरीब आदमी ने एक राह से गुजरती कार देखी, वह नहीं खरीद सकता। सीमा आ गई। छाती मसोस कर रह गया। पैसे होते तो खरीद लेता। पैसे होते तो थोड़ी स्वतंत्रता होती। सीमा थोड़ी इतने करीब न होती।
धनी को क्या सुविधा है? धनी को यही सुविधा है कि उसकी जो मौज हो खरीद ले; जो चाहिए, वह पा ले। उसके पास जरा बड़ी रस्सी है। वह जरा लंबा घेरा ले सकता है। गरीब की फांसी बिलकुल लगी है; उसके पास रस्सी है ही नहीं। बस वहीं कोल्हू के बैल की तरह छोटे से घेरे में घूमता रहता है। किसी को सौ रुपये का घेरा है, तो सौ रुपये वाली रस्सी है, उसी के पास घूमता रहता है। किसी को हजार रुपये की सुविधा है, किसी को लाख रुपये की सुविधा है, किसी को करोड़ की सुविधा है--तो घेरा बड़ा हो गया।
धन की तलाश स्वतंत्रता की तलाश है। धन की तलाश शक्ति की तलाश है। और परमात्मा परम शक्ति है; परम स्वतंत्रता है। धन से मिलती नहीं है परम शक्ति, लेकिन तलाश तो वही है।
कोई स्त्री सुंदर रहना चाहती है; सदा जवान रहना चाहती है। स्त्रियां अपनी उम्र कम बताती हैं, ठहर ही जाती हैं एक उम्र पर, उसके आगे हटती ही नहीं। क्यों? क्या बात है? परम सौंदर्य की इच्छा है। शाश्वत सौंदर्य की इच्छा है। और कुछ भी नहीं। इस शरीर में यह घटने वाला नहीं है, तुम चाहे बढ़ो या न बढ़ो, उम्र तो बढ़ ही रही है। तुम चाहे कहो या न कहो, शरीर कहने लगेगा। तुम कितना ही छिपाने की कोशिश करो, कुछ छिपेगा नहीं; यह प्रकट होने ही वाला है। चेहरे की झुर्रियां कह देंगी, हाथ-पैर में आती कमजोरी कह देगी। यह तो हो ही जाने वाला है। कब तक छिपाओगे? कैसे छिपाओगे?
मगर आकांक्षा में समझो, आकांक्षा क्या है? आकांक्षा यही है: काश ऐसा हो सकता कि जीवन ऐसा होता कि जो सदा सुंदर और युवा होता! परमात्मा की ही खोज है, क्योंकि उसमें ही जीवन सदा सुंदर है, और शाश्वत है, और सदा युवा है। वहां समय नहीं है; इसलिए कोई बूढ़ा होने का उपाय नहीं है। वहां समय के पार आदमी निकल जाता है। और वहां शरीर भी नहीं है; इसलिए कमजोर होने का भी कोई उपाय नहीं है। और वहां शरीर की जरूरतें भी नहीं हैं; इसलिए कोई गरीब नहीं है, कोई अमीर नहीं है।
हम जीवन में जो भी खोजते हैं--अंतिम विश्लेषण में पाया जाता है कि वह सब परमात्मा की ही खोज है। हां, कुछ लोग गलत खोजते हैं, मगर फिर भी उनकी मंशा तो वही है। कुछ लोग सही खोजते हैं। मंशा में कोई भेद नहीं है।
मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।
और जब परमात्मा की थोड़ी-थोड़ी झलक मिलने लगेगी तो फिर पल भी उसके बिना रहना अच्छा न लगेगा। उसके बिना रहने में कोई अर्थ नहीं रह जाता।
तू पास नहीं मेरे तो कुछ पास नहीं है,
तेरी जो नहीं आस कोई आस नहीं है,
लब पर है हंसी तेरे तो सब कुछ है मुझे रास,
रंजीदा अगर तू है तो कुछ रास नहीं है,
तेरे लिए हूं चाके गरेबां को छुपाए,
दुनिया का तो कुछ इतना मुझे पास नहीं है,
सुन लेते हो तो हो जाती है तसल्ली मेरे दिल की,
रूदादे मोहब्बत मेरी कुछ खास नहीं है,
तुमसे नहीं बाबस्ता मेरी कौन सी उम्मीद
कहने को मुझे तुमसे कोई आस नहीं है।
धीरे-धीरे परमात्मा के पास जितने क्षण बीतते हैं, वे ही सार्थक रह जाते हैं, जो उसके बिना बीतते हैं--वे विषाद के, दुख के और नरक के क्षण हैं। जो उसके पास बीतते हैं, वे ही स्वर्गीय क्षण हैं।
तू पास नहीं मेरे तो कुछ पास नहीं है,
तेरी जो नहीं आस कोई आस नहीं है,
लब पर है हंसी तेरे तो सब कुछ है मुझे रास,
रंजीदा अगर तू है तो कुछ रास नहीं है,
सुन लेते हो तो हो जाती है तसल्ली मेरे दिल की,
रूदादे मोहब्बत मेरी कुछ खास नहीं है।
भक्त कहता है कि मेरी प्रेम की कहानी में कुछ खास मामला नहीं है--कि तुमसे कहूं, कि बार-बार तुम्हें सुनाऊं।
मीरा के इन भजनों में भी क्या खास है।...वही भक्त का पुराना भाव। वही प्रीत पुरानी। वे ही उपमाएं, वे ही प्रतीक, वे ही शब्द। खास क्या है?
रूदादे मोहब्बत मेरी कुछ खास नहीं है।
प्रेम की हो भी क्या सकती है कहानी! ढाई अक्षर में पूरी हो जाती है; कहानी कुछ खास हो भी क्या सकती है!
लेकिन--सुन लेते हो तो हो जाती है तसल्ली मेरे दिल की।
भक्त जब भगवान का भजन कर रहा होता है या भगवान की स्तुति करता है, उसकी प्रशंसा के गीत गाता है--तो इसलिए नहीं कि इस गीत से कुछ भगवान को रस आएगा; इसलिए भी नहीं कि कुछ कहने योग्य बात है। लेकिन बस--सुन लेते हो तो हो जाती है तसल्ली मेरे दिल की।
तुमसे नहीं बाबस्ता मेरी कौन सी उम्मीद,
और भक्त कहता है: तुमसे कहूं भी क्या! ऐसा क्या है जो तुम्हें पता नहीं? मेरी कौन सी आकांक्षा है, जो तुम्हें ज्ञात नहीं? कहने को तो कुछ भी नहीं है। कहने को मुझे तुमसे कोई आस नहीं है।
फिर भी भक्त कहता है। फिर भी भक्त रोता है। फिर भी भक्त नाचता है। भक्त उन सारे भावों से गुजरता है जिनसे प्रेमी गुजरते हैं। फर्क इतना ही है कि भक्त ने सांचे प्रेमी को पा लिया और प्रेमी झूठे प्रेमियों के सामने यह सब चर्चा-वार्ता चलाए जाते हैं।
झूठे प्रेमी से जागो, क्योंकि वही बाधा है। और जब मैं कहता हूं कि झूठे प्रेमी से जागो तो भूल कर भी यह मत समझना कि मैं कह रहा हूं कि घर-द्वार छोड़ कर भाग जाओ, कि पत्नी छोड़ दो, पति छोड़ दो, बच्चे छोड़ दो। नहीं, जब मैं कहता हूं झूठे प्रेमी से जागो, तो मेरा मतलब है: पत्नी में अब पत्नी मत देखो, परमात्मा देखना शुरू करो। पति में अब पति मत देखो, परमात्मा देखना शुरू करो। वह जो बच्चा तुम्हारे घर में पैदा हुआ है, उसमें परमात्मा तुम्हारे घर आया है। इस मेहमान की फिक्र करो। इस मेहमान को प्रेम दो और स्वतंत्रता दो। भागने की कहीं कोई जरूरत नहीं। सिर्फ दृष्टि बदलनी चाहिए।
जहां बैठावै तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।
जहां बैठावै तित ही बैठूं...
मीरा कहती है: अब तो वह जहां आज्ञा कर देता है वहीं। उसकी आज्ञा--बस मेरा जीवन है। जहां बिठा देता है वहां बैठ जाती हूं। जहां से उठा देता है वहां से उठ जाती हूं। अब मेरी अपने तरफ से कोई विचार और निर्णय की व्यवस्था नहीं रही। अब वह बात समाप्त हो गई है।
यही समर्पण-भाव है: जहां बिठा दे! और जिसने यह कला सीख ली, उसे इस जगत में फिर कोई अड़चन नहीं है। उसे कष्ट आते ही नहीं। कष्ट आते ही इसलिए हैं कि तुम उससे राजी नहीं होते। तुम्हारे भीतर वासना सरकती रहती है...कि मुझे ऐसी जगह बिठाओ, मुझे ऐसा बनाओ। और अगर वैसे तुम नहीं बन पाते तो नाराजगी पकड़ती है। नाराजगी पकड़ती है तो परमात्मा से संबंध टूट जाता है। क्रोध पकड़ता है, तो संबंध टूट जाता है।
एक आदमी ने मुझ से आकर कहा कि मेरा लड़का बीमार था और मैंने जाकर प्रार्थना की। हनुमानजी का भक्त था। और मैंने समय भी दे दिया उनको, अल्टीमेटम दे दिया। किसी फैक्टरी में काम करता था तो हड़ताली शब्द सीख गया होगा: अल्टीमेटम! अल्टीमेटम दे दिया हनुमानजी को, कि अगर पंद्रह दिन के भीतर लड़का ठीक नहीं हुआ तो बस समझ लेना, फिर मुझे पक्का हो जाएगा कि कोई भगवान इत्यादि नहीं है। सब बकवास है।
लड़का ठीक हो गया तो वह मेरे पास आया कि हनुमानजी ने मेरी लाज रख ली। मैंने कहा: तुम्हारी रखी लाज कि अपनी रखी? अल्टीमेटम तुमने दिया था कि हनुमानजी ने दिया था?
और मैंने कहा: अब दुबारा मत देना अल्टीमेटम, नहीं तो उनकी लाज बार-बार वे न रख पाएंगे। यह तो संयोग की बात कि लड़का बच गया। अब दुबारा भूल कर मत करना, नहीं तो नास्तिक हो जाओगे। यह तुम्हारी आस्तिकता बहुत कमजोर है। लड़का मर जाता तो? तो लड़का नहीं मरता, हनुमानजी मरते। तो लड़के की अरथी नहीं निकलती, हनुमानजी की अरथी निकलती। अब यह भूल कर तुम दुबारा मत करना।
उसने कहा: आप यह क्या कहते हैं? मुझे तो एक कुंजी हाथ लग गई।
तो मैंने कहा: तुम्हारी मर्जी। जल्दी ही तुम पाओगे कि झंझट में पड़े।
और दो महीने बाद वह आया। उसने कहा: आप ठीक कहते थे। सब श्रद्धा, आस्था नष्ट हो गई। मेरे बड़े लड़के की नौकरी नहीं लग रही थी, मैं अल्टीमेटम दे आया। पंद्रह दिन निकल गए, कुछ नहीं हुआ। फिर मैंने कहा कि चलो पंद्रह दिन और दो। वे पंद्रह दिन भी निकल गए, फिर भी कुछ नहीं हुआ। अब मुझे अश्रद्धा पैदा हो रही है।
मैंने कहा: भई पंद्रह दिन और दे। अब तू झंझट में तो पड़ेगा ही। क्योंकि अब तेरी एक वासना है; वह अगर परमात्मा पूरी करे तो उनका होना न होना, इसी पर निर्भर है।
यह कोई श्रद्धा थोड़े ही है; यह सुविधा है। यह तो तुम परमात्मा का भी उपयोग करने लगे।
नहीं, उठा ले परमात्मा तो भी राजी हो जाना। जैसा रखे वैसे से राजी होना। अपनी कोई शर्त ही न हो।
डा.शुक्ल यहां बैठे हैं। उसकी पत्नी चल बसी। उनका नाम मीरा था। उसे मैंने नाम मीरा दिया था। अब वे दुखी हैं; बेचैन हैं। स्वभावतः उन्होंने बहुत लगाव से अपनी पत्नी को रखा था, उनका बड़ा मोह था। अब पत्नी चली गई तो अब वे बिलकुल दीवाने हैं। अब वे कहते हैं: मैं अकेला कैसे रहूं? कोई बच्चा भी नहीं है; घर सूना है।
और वर्षों से दोनों साथ थे; अब बड़ी बेचैनी है, बड़ी तड़पन है। स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि परमात्मा की मर्जी थी, तो इसमें भी कुछ लाभ ही होगा; कुछ कल्याण ही होगा। कौन जाने परमात्मा ने इसीलिए मीरा को उठा लिया कि डा. अब चौंको, कब तक मीरा से उलझे रहोगे! अब गोपाल की सुध लो!...नहीं तो वे बिलकुल छाया बन गए थे। उन्हें लग रहा था कि सब ठीक हो गया है; इससे अन्यथा और क्या चाहिए। शायद इसीलिए मीरा को हटा लिया गया, ताकि यह जो प्रेम क्षणभंगुर में लग गया था, यह शाश्वत की तरफ उठे।
भक्त ऐसा ही सोचेगा। भक्त सदा मार्ग खोज लेगा कि प्रभु ने चाहा है तो कुछ अर्थ होगा। अगर प्रेमी को छीन लिया है तो इसीलिए छीना है कि अब एक नये प्रेम की शुरुआत हो; एक नये प्रेम का जन्म हो। देह तो गई। देह से प्रेम किया था, वह टूट गया; अब अदेही से प्रेम करो। अब ऐसे से प्रेम करो, जो कभी नहीं मरेगा। मरने वालों से तो बहुत प्रेम किया जन्मों-जन्मों में, और हर बार तकलीफ हुई; हर बार वही बेचैनी। यह कोई डाक्टर को पहली दफे थोड़े हो गई है; कितनी-कितनी बार नहीं हुई होगी!
चौंको! जागो! सजग हो जाओ! अब एक नये प्रेम की शुरुआत करो। एक नया प्रेम--जो शाश्वत से है; जिसकी कोई मृत्यु नहीं होती।
मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।
जहां बैठावे तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।
और यह भाव होना चाहिए कि बेच दे तो बिकने को राजी; ना-नूच जरा भी नहीं। नहीं उठेगी ही नहीं। बेच दे तो बिकने को राजी।
हालांकि लोग कहते हैं ऐसा। यहां मेरे पास आ जाते हैं। कहते हैं: हम बस आप जो कहेंगे वही करेंगे। आप जो आज्ञा देंगे वही करेंगे। तो मैं उनको कहता हूं कि ठीक है, अब घर वापस जाओ, ध्यान करो, पत्नी-बच्चे की फिकर करो।
वे मुझसे कहते हैं: अब हम कहीं जाने वाले नहीं। मैं उनसे कह रहा हूं: घर जाओ। वे मुझसे कहते हैं: अब हम कहीं नहीं जाएंगे। अब तो आप जो कहेंगे वही हम करेंगे। अब तो हमने आपके चरण पकड़ लिए, अब हम आपको छोड़ने वाले नहीं हैं।
मैं उनसे कह रहा हूं कि बाबा, अपने घर जाओ; तुम्हारे बच्चे हैं, पत्नी है। वे कहते हैं: अब! अब नहीं। अब तो समर्पण कर दिया।
उनकी समझ में यह बात नहीं आती, कि वे कह रहे हैं कि जो मैं कहूंगा वह करेंगे; और मैं कह रहा हूं: घर जाओ! नहीं; वे अभी बातचीत ही कर रहे हैं, कि जो आप कहेंगे वही करेंगे।
कभी-कभी किन्हीं मित्रों को यहां मैं आश्रम में ले लेता हूं। जब वे आश्रम में सम्मिलित होते हैं, तब वे कहते हैं: बस हमने सब आप पर छोड़ दिया--आप जो कहेंगे, जैसा आप कहेंगे! आप हमारा प्राण लें तो हम तैयार हैं।
प्राण-व्राण तो मैं लेता नहीं, क्योंकि कोई अदालत में फंसवाना है! मगर महीने दो महीने में भूल जाते हैं प्राण-व्राण की बात। फिर तो उनको जो काम दो वही नहीं जंचता, कि यह हमसे नहीं होता; हमें यह काम चाहिए। वह काम दे दो, दो-चार-आठ दिन में यह भी हमसे नहीं होता; इसमें हमें रस ही नहीं है।
फिर उनकी सब जरूरतें खड़ी होनी शुरू हो जाती हैं। उनको भोजन भी विशेष चाहिए; कमरा भी विशेष चाहिए। इतने से ज्यादा देर वे काम भी नहीं कर सकेंगे। वे घड़ी देख कर उठ जाते हैं। और भाव उनका यह है, कहते वे यही रहते हैं कि सब आप पर समर्पित कर दिया; आप जो कहेंगे सो हम करेंगे।
मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी प्रेयसी को पत्र लिखा, कि मेरा तुझसे प्रेम ऐसा है कि अगर आग भी बरसती हो तो भी मैं आऊंगा मिलने। अगर बाढ़ भी आ गई हो, प्रलय भी हो जाए तो भी तैर कर आ जाऊंगा मिलने।
और पुनश्च...नीचे लिखा था, कि अगर शनिवार को वर्षा न हुई तो जरूर आऊंगा। आग बरसे तो भी आ रहे थे, प्रलय आ जाए तो भी आ रहे थे! अब शनिवार को अगर वर्षा न हुई तो मिलने आएंगे। वह जो पुनश्च है, वही असली है।
जहां बैठावे तित ही बैठूं...
इसको खूब गहरे पकड़ो। यह सूत्र है क्रांति का। यह एक सूत्र पर्याप्त है; सारे शास्त्रों का सार इसमें है। सरल सा वचन है: जहां बैठावे तित ही बैठूं! मगर इसमें सब आ गया। इतना तुम कर लो तो फिर कुछ और करने को नहीं बचता। और क्या बचा?
...बेचैं तो बिक जाऊं।
मगर मीरा ने प्रमाण भी दिए अपने जीवन से। सब गंवाया गोपाल के लिए--प्रतिष्ठा, लोकलाज खोई--सम्मान, घर-द्वार, परिवार, सब तरह के अपमान सहे। सब गंवाया। बिकी। पूरी तरह बिकी। इसमें रत्ती भर भी धोखा नहीं दिया।
"पुनश्च' रखा ही नहीं। इसलिए पहुंची। इसीलिए पहुंच पाई परम पद को। बहुत थोड़ी स्त्रियां उस परम पद को पहुंची हैं, जिसको मीरा पहुंची। मगर इसी सूत्र में सारी बात छिपी है।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।
और मीरा कहती है कि एक बार तो क्या होगा? बार-बार बलि जाना चाहती हूं। एक बार निछावर करने से क्या हल होगा! बार-बार निछावर करना चाहती हूं; क्योंकि हर बार निछावर करती हूं और मोक्ष के द्वार खुलते हैं। हर बार निछावर करती हूं और स्वर्ग बरस जाता है। हर बार अपने को मिटाती हूं और अमृत की घनी वर्षा होती है।
राजी हो रजा पर तेरी
हुए मजबूर थे, हम मुख्तार बने,
ये हार हमारी हार है वो
जो जीत को भी शरमाती है।
राजी हो रजा पर तेरी, हुए मजबूर थे, हम मुख्तार बने। यह बड़ा उलटा वचन है। यह बड़ा विरोधाभासी वचन है। लेकिन धर्म का सारसूत्र हमेशा विरोधाभासी वचनों में होता है। यह वचन कहता है: राजी हो रजा पर तेरी, हुए मजबूर थे, हम मुख्तार बने। तेरी बात मानने को राजी क्या हो गए, उसके पहले तो हम बहुत मजबूर थे, असहाय थे; जब से तेरी बात मानने को राजी हुए, सब असहाय अवस्था चली गई--मुख्तार बने। तब से हम अपने मालिक हो गए। जब से तेरे गुलाम हुए, तब से अपने मालिक हो गए! जब तक अपनी मालकियत का वहम था, तब तक गुलाम थे। जब तक अपने को चलाने की कोशिश की, कहीं पहुंचे नहीं; सिर्फ लंगड़ाए। जब तक अपनी बात कहनी चाही, तब तक तुतलाए, हकलाए। और जब से सब तेरे ऊपर छोड़ दिया, तब से अपूर्व गीतों का जन्म हुआ है; मालकियत पैदा हुई है।
राजी हो रजा पर तेरी, हुए मजबूर थे, हम मुख्तार बने,
ये हार हमारी हार है वो, जो जीत को भी शरमाती है।
एक ऐसी हार भी है प्रेम की जो जीत से बड़ी है; विजय से बड़ी है। प्रेम में जो हारा सो जीता। प्रेम में जिसने जीतने की कोशिश की, वह प्रेम का शास्त्र ही नहीं समझा। वह तो प्रेम के दरवाजे में प्रवेश ही नहीं पा सकेगा। प्रेम में हार ही विजय का सूत्र है।
ये हार हमारी हार है वो, जो जीत को भी शरमाती है,
ये नूरे जोहदो तायत है, जो बिजली बन कर गिरता है,
इसियां की काली बदली तो रहमत की घटा बन जाती है।
अगर तुमने सोचा कि मैंने तप किया, तपश्चर्या की, व्रत, उपवास, नियम इत्यादि इत्यादि--तो यह तुम्हारा अहंकार ही बन जाएगा। और यह अहंकार तुम पर बिजली की तरह गिरेगा और तुम्हें नष्ट कर देगा।
ये नूरे जोहदो तायत है, जो बिजली बन कर गिरता है।
यह तुम्हारा अहंकार तुम्हें जला देगा, खाक कर देगा। यह तुम्हारा तप, यह तुम्हारा व्रत, यह तुम्हारी साधना और सिद्धियां काम नहीं आएंगी।
इसियां की काली बदली तो रहमत की घटा बन जाती है।
भक्त तो कहता है: मैं पापी हूं। कहां पुण्य। कैसा तप! कैसा व्रत! मेरी सामर्थ्य क्या!
जहां बैठावे तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।
मैं तो तेरा गुलाम; तेरी छाया; तेरा दास। अगर यह भाव हो तो...इसियां की काली बदली तो रहमत की घटा बन जाती है...तो पाप की काली बदली भी करुणा को बरसाने लगती है।...रहमत की घटा बन जाती है।
अहंकार मत निर्मित करना। और अहंकार कैसे निर्मित होता है?--मैं अपनी चला कर रहूंगा, अपनी करके रहूंगा। जब तक तुम्हें ऐसा खयाल है कि तुम्हें कुछ करके दिखाना है दुनिया में, कुछ होकर दिखाना है, ऐसा होना चाहिए--तब तक तुम अहंकारी हो। भक्त के जगत में अहंकार को कोई जगह नहीं है; संकल्प को कोई जगह नहीं है। सिर्फ समर्पण ही चाहिए--मात्र समर्पण।
जो चाहे दुनिया कहने दो, तुम अपना काम किए जाओ,
मय्यार जमाने के हिम्मत इंसान की आप बनाती है।
बख्शी है मुसलसल एक तड़प तो इतना एहसां और करो;
हम पर भी नजर वो हो जाए जो दोनों जहां गरमाती है।
बस इतनी प्रार्थना काफी है कि हम पर भी एक नजर कर लेना। हम राजी हैं। और अभी न करोगे तो कल भी हम प्रतीक्षा करते होंगे। और कल नहीं तो परसों भी। हमारा धैर्य तो है। निवेदन कर दिया है कि एक नजर हम पर भी करो--वह नजर जिससे दोनों दुनियाओं को प्राण मिलता है; जिससे यह लोक और परलोक दोनों का जीवन सम्हला हुआ है। एक नजर हम पर हो जाए!
मगर यह नजर उसी पर होती है जो...जहां बैठावे तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।...इस भाव से भर जाता है।
मीरा मगन भई हरि के गुण गाए।
और हरि के गुण तुम तभी गा सकते हो, जब यह भाव-दशा तुम्हारी निर्मित हो गई हो, जब यह समर्पण आ गया हो; नहीं तो तुकबंदी होगी। मीरा तभी गा सकी। फिर मीरा ने नहीं गाया; मीरा तो बांस की पोंगरी हो गई, बांसुरी हो गई--गाया कृष्ण ने ही। वही है गायक।
जहां बैठावे तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।
यहीं तो बांस की पोंगरी हो गए तुम। अब जो मर्जी--गाए तो गाए; न गाए तो न गाए।
मीरा मगन भई हरि के गुण गाए।
और तब एक मगनता आती है; एक तल्लीनता आती है; तब एक समाधि उतरती है।
पीए बगैर ही रहता हूं मस्त, मेरे लिए
ये जामो वादाओ पैमाना ओ सबू क्या है।
भक्त कहता है कि न तो मुझे सुराही चाहिए शराब की, न शराब को पीने के पात्र चाहिए; मुझे कुछ नहीं चाहिए--शराब भी नहीं चाहिए।
पीए बगैर ही रहता हूं मस्त, मेरे लिए
ये जामो वादाओ पैमाना ओ सबू क्या है।
मेरी निगाह में रक्सां है मौजे हुस्ने अजल,
जमाल जोहरा जबीना की आबरू क्या है।
मुझे अप्सराएं नहीं चाहिए, सुंदरियां नहीं चाहिए, क्योंकि मेरी आंखों में तो--
मेरी निगाह में रक्सां है मौजे हुस्ने अजल,
वह जो अनंत का सौंदर्य है, वह मेरी आंखों में नाच रहा है। गोपाल नचा रहा है आंखों में! अब मुझे कोई अप्सरा और कोई सुंदरी नहीं चाहिए।
मेरी निगाह में रक्सां है मौजे हुस्ने अजल,
जमाल जोहरा जबीना की आबरू क्या है,
मेरे खयाल से तखलीक है बहारों की,
मैं जानता हूं ये अफ्सूं रंगो बू क्या है।
और अब फूलों में क्या खुशबू है? और अब बहारों में क्या रखा है? अब तो बहारों का बनाने वाला मेरे भीतर बसा है।
मेरे खयाल से तखलीक है बहारों की,
मैं जानता हूं ये अफ्सूं रंगो बू क्या है,
मेरे सकूत के पर्दों से राग उठते हैं
तिलस्म हुस्ने बयां सहरे गुफ्तगू क्या है
मेरे सकूत के पर्दों से राग उठते हैं!
जब तुम्हारा अहंकार गया, तो सकूत, तो शांति आई। सब उपद्रव अहंकार का है। यह सब तूत्तू, मैं-मैं जो तुम्हारे भीतर मची है, अहंकार की है। यह जो युद्ध तुम्हारे भीतर चल रहा है सतत, अहंकार का है।
मेरे सकूत के पर्दों से राग उठते हैं,
तिलस्म हुस्ने बयां सहरे गुफ्तगू क्या है।
वह जो सुबह हवा दौड़ती है वृक्षों से, सुगंधों से भरी हुई, और वृक्षों में सरसराती है और गीत गाती है--वह कुछ भी नहीं है--जिस दिन तुम शून्य हो गए और तुम्हारे भीतर से परमात्मा के स्वर दौड़ने लगते हैं।
मेरे ही शौके तमाशा का इक करश्मा है,
हजूमें जल्वाए अनवार चार-सू क्या है,
बिनाए जीस्त हूं अस्ले निशात है मुझसे,
मेरा ही खेल है तूफाने आरजू क्या है,
मेरे ही कदमों से मिलता है मंजिलों का पता,
ये देख जौके सफर शौके जुस्तजू क्या है,
मेरा मकाने फना है सकून, पर्दाए गैब,
बस इक जहूरे खुदी शौरशे नमूं क्या है,
भक्त का लक्ष्य क्या है? भक्त का लक्ष्य है: परम शून्य हो जाना--फना हो जाना।
मेरा मकाने फना है सकून, पर्दाए गैब।
मिट जाना! वहीं असली जादू है। वहीं तिलिस्मों का तिलिस्म है। वहीं रहस्यों का रहस्य है। जहां तुम मिटे वहां परमात्मा हुआ। जब भक्त मिट जाता है तो जो गीत उठते हैं उनकी मस्ती बड़ी अनूठी है।
मीरा मगन भई हरि के गुण गाए।
सांप पिटारा राणा भेज्यो, मीरा हाथ दियो जाए।
मस्ती ऐसी थी जैसे शराबी की। शराबी की क्या मस्ती उस मुकाबले! सांप में भी सांप दिखाई नहीं पड़ा। सांप भेज दिया है राणा ने। परिवार दुखी हो रहा है। मीरा की मस्ती कष्ट का कारण बन गई है। धर्मगुरु, पंडित, पुरोहित जा-जा कर राणा को शिकायत कर रहे हैं, कि अब कुछ करना पड़ेगा; यह तुम्हारी इज्जत-आबरू का सवाल है। ये पंडित-पुरोहित कबीर के भी खिलाफ थे। ये पंडित-पुरोहित रैदास के भी खिलाफ थे। ये पंडित-पुरोहित जीसस के भी खिलाफ थे, बुद्ध के भी खिलाफ थे; लेकिन मीरा के ये बहुत ही ज्यादा खिलाफ थे। उसका कारण है कि कबीर जुलाहे थे, नाराजगी इस बात से थी कि वे शूद्र हैं। रैदास चमार थे; नाराजगी इससे थी कि वे शूद्र हैं। बुद्ध ऐसा बातें कह रहे थे जो कि हिंदू संस्कार और परंपरा के विपरीत थीं। महावीर नग्न खड़े हो गए थे, जो कि पंडितों को लगता था अशोभन है। मगर मीरा के साथ तो बात और भी गहरी हो गई। गहरी बात इसलिए हो गई कि मीरा स्त्री भी थी।
पुरुषों ने पुरुषों को तो किसी तरह बरदाश्त भी कर लिया; लेकिन स्त्री को बर्दाश्त करना और भी मुश्किल है। पुरुष का अहंकार यह मान ही नहीं सकता कि स्त्री और परमात्मा को पा ले! पुरुषों के रहते और स्त्री परमात्मा को पा ले! जैनों ने अपने शास्त्रों में निषेध ही कर दिया है कि कोई स्त्री, स्त्री-पर्याय से मोक्ष नहीं जा सकती। और मजा यह है कि ये ही स्त्रियां जैन मुनियों के वचन सुनती रहती हैं; ये ही उनको पालती हैं।
उन सबको निकाल भगाओ! उनसे कहो कि ये शास्त्र बदलो! यह स्त्रियों का अपमान है।
मगर मजा यह है कि मंदिरों में तुम्हें पुरुष शायद ही कभी दिखाई पड़ते हों। औसत अनुपात चार स्त्रियां और एक पुरुष, ऐसा रहता है; और वह एक भी ऐसे ही आ गया है; कोई दब्बू पुरुष होगा, पत्नी के साथ चला आया, या कुछ मामला। कुछ मंदिर से उसको लेना-देना नहीं है। पत्नी आती थी तो क्या करें! और पत्नी ने कहा कि चलना पड़ेगा, तो चले आए हैं, ठीक है। या किसी और कारण से आ गया होगा।
और ये शास्त्र दोहराते रहते हैं कि स्त्री का मोक्ष नहीं। देखते हैं, जैन-साधु "पुरुष' हो तो चाहे वह नया दीक्षित हो, तो भी पुरानी दीक्षित स्त्री साध्वी को उसे झुक कर नमस्कार करना पड़ता है। क्यों? वह "स्त्री' है। वह चाहे बीस साल पुरानी दीक्षित हो, तो भी नये दीक्षित पुरुष के सामने भी उसको झुकना पड़ता है।
और मजा ऐसा है कि स्त्री साध्वियों में थोड़ी साधुता शायद मिल भी जाए, पुरुष साधुओं में कुछ नहीं दिखाई पड़ता। क्योंकि स्त्री में एक सौम्यता है। बेईमानी की कमी है। पाखंड की कमी है। स्त्री जब साध्वी होती है तो वह पूरी तरह से हो जाती है। पुरुष तो और भी हिसाब से होता है--न मालूम कौन-कौन से हिसाब उसके हैं! बड़ा गणित बिठाता है। और पहुंच जाने के बाद भी उसका गणित जारी रहता है। उसकी राजनीति जारी रहती है। संघ का मुखिया कैसे हो जाए! फलां कैसे हो जाए! ढिकां कैसे हो जाए! आचार्य-पद पर कैसे बैठ जाए। यह सब राजनीति चलती रहती है।
मगर जैन शास्त्र कहते हैं: स्त्री का मोक्ष नहीं स्त्री-पर्याय से। यह स्त्री देह का बड़ा अपमान हुआ। और यह ऐसे लोग कहें जो अध्यात्मवादी हैं, वे भी देह को इतना मूल्य दें--यह बात समझ में नहीं आती। आत्मा न तो स्त्री होती है, न पुरुष होती है। लेकिन यह सदा से उपद्रव रहा है। सारे धर्मों ने स्त्रियों का अपमान किया है।
तो तुम सोच सकते हो कि मीरा को कैसी अड़चन का सामना नहीं करना पड़ा होगा! और सबसे बड़ी कठिनाई तो यह है कि पुरुष तो मीरा के खिलाफ रहे ही होंगे; स्त्रियां बहुत खिलाफ रही होंगी। स्त्रियों में एक जन्मजात वैमनस्य है दूसरी स्त्रियों के प्रति।
अभी कल ही जो प्रश्न था न, कि किसी देवी ने लिखा है वह, महाशोध का ग्रंथ मीरा के खिलाफ; किसी देवता को नहीं सूझी। देवी को अखरा होगा। स्त्रियां तो बड़ीर् ईष्यालु हैं एक-दूसरे के प्रति। स्त्रियां जितनी खोज-बीन करती हैं एक-दूसरी स्त्रियों के खिलाफ, उतना पुरुष नहीं करते। और पुरुषों को इतना रस भी नहीं है इसमें...कि ठीक है। मगर स्त्रियां तो पूरा जीवन लगाए रखती हैं: कौन गलत हो रहा है, कहां क्या गलती हो रही है, कौन की स्त्री क्या गलती कर रही है! सारा रस ही इसमें है उनके जीवन का। तो पुरुषों ने खिलाफत की होगी, क्योंकि मीरा स्त्री थी। स्त्रियों ने खिलाफत की होगी, क्योंकि मीरा स्त्री थी। मीरा को बहुत कष्ट दिए होंगे। मीरा टिक न सकी। राजस्थान छोड़ना पड़ा। मथुरा-वृंदावन गई; फिर वहां से भी भागना पड़ा।...भागती रही।
हमने अब तक इस जगत में जो लोग भी परमात्मा के प्रेम में पूरे डूबे हैं, उनके साथ बड़ा दर्ुव्यवहार किया है। हमारे अहंकार को चोट पड़ती है।
गरेबां चाक भी होगा फुगां तक बात आ पहुंची,
वहां तक जा ही पहुंचेगी जो यां तक बात आ पहुंची,
मिटा कर अपनी हस्ती तुझको आखिर पा ही लूंगा मैं,
जलेंगे बालो पर भी आशियां तक बात आ पहुंची,
बनाया था जलाने ही को आखिर आशियां अपना,
चमन में शुक्र है बर्केत्तपां तक बात आ पहुंची,
शरीके कारवां हूं मैं गुबारे कारवां होकर,
मेरे मिटने की मीरे कारवां तक बात आ पहुंची,
मुझे जो मुस्कुरा कर अपने हाथों जाम बख्शा था,
इनायत थी मगर अब दास्तां तक बात आ पहुंची,
चमन वालो उठो आराइशे महफिल का वक्त आया,
खिजां से अब बहारे बेखिजां तक बात आ पहुंची,
सजाएदार हो तजवीज अब मेरे लिए शायद,
जो कह बैठा हूं मैं पीरे मुगां तक बात आ पहुंची।
जब किसी के भीतर से अनलहक का नाद होता है, अहं ब्रह्मास्मि का नाद होता है...
चमन वालो उठो आरइशे महफिल का वक्त आया,
खिजां से अब बहारे बेखिजां तक बात आ पहुंची।
जब कोई उस मोक्ष की खबर लाता है--जहां कभी कोई पतझड़ नहीं आता, जहां वसंत शाश्वत है--जब कोई उस परम आनंद की खबर लाता है, उस परम नृत्य की खबर लाता है, जब किसी के पैरों में थोड़ी सी भनक उस नृत्य की होती है और किसी के कंठ में थोड़ी आवाज उस संगीत की होती है, और जब किसी की आंखों में से परमात्मा थोड़ा झांकता है--तो अड़चन शुरू होती है।
सजाएदार हो तजवीज अब मेरे लिए शायद
अब शायद वही मेरे लिए भी इंतजाम होगा जो मंसूर के लिए हुआ था; शायद अब सूली लगेगी।
जो कह बैठा हूं मैं पीरे मुगां तब बात आ पहुंची।
वह पंडित-पुरोहितों तब बात पहुंच गई है। वह जो मैं कह चुका।
जो कह बैठा हूं मैं पीरे मुगां तक बात आ पहुंची।
वह पहुंच गई है लोगों तक। अब जल्दी ही वही होने वाला है, जो मंसूर के लिए हुआ था--वही जो जीसस के लिए, वही जो सुकरात के लिए।
मीरा ने ऐसे अनूठे वचन कहे, प्यार से ऐसे गदगद, ऐसे मधुरस से भरे--मगर हमने क्या दिया उत्तर में? हमने पत्थर फेंके, हमने गालियां दीं। हमने इस अदभुत स्त्री को गांव-गांव भटकाया, सताया। अड़चन कई तरह की थी। सबसे बड़ी अड़चन तो यह थी कि वह स्त्री थी। और स्त्री ने ऐसी उदघोषणा इसके पहले इस देश में कभी नहीं की थी। प्यारे को पा लेने की ऐसी खबर अगर पहले कभी घटी भी होगी स्त्रियों को तो वे चुप्पी मार कर बैठ गई थीं; उन्होंने कभी घोषणा नहीं की थी। क्योंकि कौन उनकी मानेगा। कौन उनका भरोसा करेगा! लेकिन मीरा हिम्मतवर थी। क्षत्राणी थी। छोड़ दी होगी फिक्र। कूद पड़ी। जो हुआ था, कहने लगी। जैसा हुआ था वैसा कहने लगी। नाचने लगी गांव-गांव।
महावीर के नग्न खड़े होने से भी जो लोगों को चिंता नहीं हुई थी, उनको भी मीरा के नाचने से ज्यादा चिंता हुई। वे बड़े हैरानी में पड़ गए। तो राणा ने सांप का पिटारा भेजा।
सांप पिटारा राणा भेज्यो, मीरा हाथ दियो जाए।
वह तो मस्त होगी।
तुमने कभी देखा, छोटे बच्चे हैं--सांप मिल जाए तो उसे भी पकड़ लें! और एक और आश्चर्य की बात है कि बच्चे अगर सांप को पकड़ लें तो सांप शायद ही काटे। वह बच्चे का भोलापन, वह दोस्ताना--सांप की भी समझ में आता है।
तुमने देखा, शराबी कभी-कभी सांप को पकड़ लें, नशे में बैठे हैं--वह मस्ती सांप की भी समझ में आती है। तो यह तो शराब परमात्मा की थी। और यह तो जो भोलापन था, परमात्मा से उतरा हुआ था। अगर सांप इसे समझा तो कुछ आश्चर्य नहीं है।
हम जब भी किसी को छूते हैं तो हमारी तरंगें शरीर की, खबर देती हैं--हमारे भाव की।
तुमने देखा, तुम्हारा कोई हाथ पकड़ता है तो तुमने खयाल किया कि अलग-अलग लोगों के हाथ से अलग-अलग तरंगों का अनुभव होता है! कोई अगर प्रेम से पकड़ता है तो और तरह की ऊष्मा, गर्मी--तुममें बहती हुई, उसकी जीवन-ऊर्जा तुममें प्रवेश करती हुई! कोई आदमी ऐसे ही पकड़ लेता है उपचार से तो ठंडा, मुर्दा हाथ! और वह जल्दी में है छुड़ाने की कि कब झंझट मिटे; एक उपचार था, पूरा कर दिया। या कोई आदमी दुश्मनी से पकड़ता है।...तो तुमने फर्क देखा?
शायद तुमने खयाल न किया हो, क्योंकि लोग बहुत संवेदनहीन हो गए हैं। लेकिन अगर थोड़ा ही खयाल करोगे तो तुम समझ जाओगे: हर बात में फर्क होता है। अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि वृक्षों तक को तरंगों का पता चलता है। अगर कोई कुल्हाड़ी लेकर वृक्ष को काटने आता है तो वृक्ष के प्राण कंप जाते हैं। इसको अब नापने के उपाय हैं। जैसे आदमी के हृदय पर कार्डियोग्राम लगा देते हैं--ऐसा ही कार्डियोग्राम वृक्ष से भी लग सकता है। पश्चिम में काफी शोध हो रही है। और जब कोई माली पानी की बाल्टी लेकर उंडेलने आता है तो वही वृक्ष आनंदित हो जाता है, पुलकित हो जाता है। अभी न तो कुल्हाड़ी जो लाया है, उसने काटा है वृक्ष; और न जो पानी ले आया है, उसने पानी डाला है। पानी डालने के बाद अगर वृक्ष आनंदित होता तो भी हम समझते कि चलो पानी डालने से हो रहा है, ठीक है; तृप्ति मिली होगी, प्यासा रहा होगा, जड़ें सूख रही होंगी। मगर पानी को आते ही देख कर, वृक्ष मस्त हो जाता है। आकाश में घिरे बादलों को देख कर, मोर ही नहीं नाचते, वृक्ष भी नाचते हैं। अब इसके वैज्ञानिक प्रमाण हैं।
तो कुछ आश्चर्य नहीं कि मीरा की वह मस्ती, वह मगन भाव सांप को समझ में आ गया हो।
सांप पिटारा राणा भेज्यो, मीरा हाथ दियो जाए।
न्हाय-धोए जब देखन लागी सालिगराम गई पाए।
तो सांप तो मिला नहीं मीरा को। मीरा को सांप मिल ही नहीं सकता। जिसके मन में परमात्मा बस गया है, उसे सभी जगह सालिगराम ही मिलेगा। उसे जगह-जगह परमात्मा की ही छवि मिलेगी।
जहर का प्याला राणा भेज्यो, अमृत दीन्ह बनाए।
वह कहती है: हे प्रभु, तुम्हारी लीला, कि भेजा तो था, सुनते हैं, जहर...
न्हाय-धोए जब देखन लागी, हो अमर अंचाए।
--लेकिन तुमने क्या चमत्कार किया कि जहर अमृत हो गया!
सब दृष्टि की बात है--कैसे तुम लेते हो! यहां अगर तुम ठीक से लो, सदभाव से लो तो कांटे भी फूल हो जाते हैं; और दुर्भाव से लो तो फूल भी कांटे हो जाते हैं। प्रेम से लो तो गालियां भी गीत की तरह बरसती हैं; और प्रेम से न लो तो गीत भी गालियों की तरह हो जाते हैं। सब दृष्टि की बात है। दृष्टि ही सृष्टि है।
सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीरा सुलाए।
कहते हैं कि राणा ने एक ऐसी सेज बनवाई, जिसमें कांटे ही कांटे थे, और इच्छा यह थी--जहरीले कांटे थे, जहर-बुझाए कांटे थे--कि जब मीरा उन पर सोएगी तो रात कांटे उसमें चुभ जाएंगे--उसके सारे शरीर में--और जहर व्याप्त हो जाएगा।
सूल सेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीरा सुलाए।
सांझ भई मीरा सोवण लागी, मानो फूल बिछाए।
वे कांटे फूल हो गए जैसे! मानो फूल बिछाए!
जीवन में अगर हमने परमात्मा का साथ पकड़ लिया तो हमारे लिए दुख समाप्त हो गए। इतना ही सार-अर्थ है इस बात का। ऐसा वस्तुतः हुआ या नहीं, इसमें मत पड़ना। इतना ही सार-अर्थ है: कि इस जगत में परमात्मा के प्यारे को कांटे होते ही नहीं; फूल ही फूल हैं।
मीरा के प्रभु सदा सहाई, राखे बिघन घटाए।
भजन भाव में मस्त डोलती, गिरधर पै बलि जाए।
मीरा कहती है: तुम मेरे विघ्न-बाधाएं काटते चले जाते हो। मेरी कोई पात्रता नहीं है।
मगर और क्या पात्रता होती है? यही तो पात्रता है कि जहां बैठावे तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं। बस यही एक पात्रता है। मीरा ने इसे पूरा कर दिया था। तुम इस पात्रता को पूरा कर दो तो परमात्मा तुम्हें अपने अमृत से भर दे--अभी और यहीं। जिस दिन तुम पूरी कर दोगे यह बात, उसी दिन भर जाओगे। मगर यही कठिन लगता है...कैसे छोड़ें? कैसे सब उस पर छोड़ दें?
हमें यह भ्रांति है कि हम अपने जीवन के नियंता हैं। हमें यह भ्रांति है कि हम न सम्हालेंगे तो कौन सम्हालेगा!
और बड़ा मजा है कि क्या सम्हाल रहे हो तुम? जन्म हुआ तुम्हारा, यह तुमने तय किया था? फिर तुमने सांस लेनी शुरू कर दी, यह तुमने ली थी? फिर एक दिन सांस बंद हो जाएगी; तुम लेना भी चाहो तो न ले सकोगे।
मुल्ला नसरुद्दीन से कोई पूछ रहा था, कि आपकी ज्यादा लंबी उम्र का क्या राज है? मैं भी रहना चाहता हूं ज्यादा दिन तक दुनिया में, मैं क्या करूं?
मुल्ला ने कहा: कुछ नहीं। सांस लेते रहना। बस सांस भर बंद मत करना। कुछ भी हो जाए, सांस तुम लेते रहना।
मगर कैसे लोगे सांस? जब मौत आ जाएगी तो क्या करोगे? जो सांस बाहर गई, बाहर गई, और नहीं आई, तो फिर क्या करोगे? अपनी सांस पर भी तो हक नहीं है, और किस बात पर हक होगा?
लेकिन हमको भ्रांति है कि हम नियंता हैं; अगर हमने अपनी व्यवस्था न की तो सब बिखर जाएगा। तुम्हारी व्यवस्था के कारण बिखर रहा है। तुम कृपा करो और व्यवस्था से हट जाओ! और तुम कह दो उसी को कि तू सम्हाल! जहां बिठाएगा बैठ जाएंगे। जो खिलाएगा खा लेंगे! जो पिलाएगा पी लेंगे! तेरी जैसी मर्जी! तेरी मर्जी से हम राजी हैं।
ऐसा कहते ही तुम अचानक पाओगे: सब व्यवस्था बैठने लगी। तुम नाहक ही बोझ लिए चल रहे हो। तुम सब बोझ उस पर छोड़ दो। तुम निर्भार हो सकते हो।
आज के सूत्र का सार यही है कि तुम निर्भार हो जाओ तो तुम्हारे जीवन में मस्ती आ जाए।
भजन भाव में मस्त डोलती...
अब रही नहीं कोई चिंता। व्यवस्था न रही, नियंता न रहे, कर्ता न रहे--तो चिंता न रही। और तभी--
भजन भाव में मस्त डोलती, गिरधर पै बलि जाए।
और यही मार्ग है अपने असली घर तक पहुंचने का।
मैं तो गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हारो सांचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं।
रैन पड़ै तब ही उठि जाऊं, भोर भये उठि आऊं।
रैन दिना बाके संग खेलूं, ज्यूं-त्यूं वाहि रिझाऊं।
जो पहिरावै सोई पहरूं, जो दे सोई खाऊं।
मेरी उनकी प्रीत पुराणी, उन बिन पल न रहाऊं।
जहां बैठावे तित ही बैठूं, बेचैं तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊं।
मैं तो गिरधर के घर जाऊं!

आज इतना ही