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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--08)



पद घुंघरू बाँध—(प्रवचन—आठवां )
दमन नहीं—ऊर्ध्वगमन

प्रश्न—सार:
1—आमतौर से समझा जाता है कि धार्मिक बनने के लिए इंद्रियों को वश में रखना अनिवार्य है। आप कहते हैं कि इंद्रिय—दमन भक्ति का लक्षण नहीं।...?
2—कुछ दिनों से यहां प्रेम की ध्वनि सुन रहे थे, लेकिन आश्रम के वातावरण में वह कहीं भी सुनाई न पड़ती थी। वीणा के प्रत्युत्तर के बाद बाहर आनंद और प्रेम का अनोखा वातावरण छा गया। क्या कोई अपूर्व घटना घट गई या ये हमारी आंखों के गुण—दोष थे?
3—मैं आपके पास आया तो मेरी आंखें खुलीं, लेकिन तब से लोग मुझे अंधा कहने लगे।...?
4—"ललिता' से "मीरा' तक की यात्रा में साढ़े चार हजार साल का समय लग गया। भगवान, क्या प्रेम का मार्ग इतना ज्यादा कठिन और लंबा है?


पहला प्रश्न: आमतौर से समझा जाता है कि धार्मिक बनने के लिए इंद्रियों को वश में रखना अनिवार्य है। आप कहते हैं—इंद्रिय—दमन भक्ति का लक्षण नहीं है। आप कहते हैं—प्रेम मुक्ति है और भक्ति मोक्ष है। भेद समझ में नहीं आया। कृपया मुक्ति और मोक्ष का और प्रेम और भक्ति का भेद बताएं।

क बात सदा ध्यान में रखना: जो आमतौर से समझा जाता है, वह आमतौर से गलत होता है। भीड़ के पास सत्य नहीं है—कभी नहीं रहा। सत्य सदा व्यक्तियों में घटता है—और उनमें ही घटता है जो अपूर्व रूप से अपनी पात्रता निर्मित करते हैं। विरले व्यक्तियों में घटता है। भीड़ तो कामचलाऊ बातों को मान कर चलती रहती है। भीड़ तो उधार को मान कर चलती रहती है। भीड़ तो झूठे पर भरोसा रखती है।
इसलिए दुनिया में सभी भीड़ों के अलग—अलग नाम हैं। किसी भीड़ को हम कहते हैं: हिंदू; किसी भीड़ को हम कहते हैं: मुसलमान; किसी भीड़ को हम कहते हैं: ईसाई। जीसस के पास सत्य था; ईसाइयत के पास नहीं। कृष्ण के पास सत्य था; हिंदू के पास नहीं। हिंदू तो कृष्ण को मान लिया है; कृष्ण ने जो कहा, उसे स्वीकार कर लिया है। हिंदू ने स्वयं अनुभव नहीं किया। स्वयं अनुभव करे तो कृष्ण हो जाए। दूसरे का मान ले तो हिंदू हो जाता है, मुसलमान, ईसाई, जैन, बौद्ध।
और ध्यान रखना: जो सत्य स्वयं नहीं जाना है, वह सत्य नहीं हो सकता। मेरा जाना हुआ मेरा है। मैं तुम्हें कहूं, तुम सुन भी लो, शब्द से, बुद्धि से समझ भी लो—फिर भी तुम्हारे लिए सत्य नहीं होगा। तुम्हारे लिए तो शब्द मात्र होंगे; शास्त्र मात्र होगा। तुम्हारे लिए सिद्धांत मात्र होगा, सत्य नहीं। सत्य तो प्राणों की गहराई में अनुभव हो तभी होता है। तुम्हारे लिए बात उधार होगी।
जैसे किसी ने प्रेम किया और उसने तुम्हें प्रेम की बातें कहीं, तुमने सुनीं, समझी भी; फिर भी क्या तुम प्रेम समझ जाओगे? प्रेम तो अनुभव है। तुम तोते की तरह दोहराने लगोगे उन बातों को। तोते बन जाओगे, पंडित बन जाओगे। सभी पंडित तोते होते हैं। थोड़ी—बहुत तुम्हारे पास सूचनाओं की संपदा हो जाएगी। तुम्हारे अहंकार में थोड़े आभूषण लग जाएंगे। लेकिन तुम्हें प्रेम का अनुभव होगा?
जल के संबंध में लाख पढ़ो, लाख सुनो; जब तक पीया न हो तब तक जल का गुण समझ में न आएगा। और ध्यान रखना: पीने पर भी तभी समझ में आएगा जब गहरी प्यास हो। अगर प्यास न हो और कोई जबरदस्ती तुम्हें जल पिला दे तो तुम्हें वह तृप्ति अनुभव नहीं होगी। क्योंकि तृप्ति के पहले प्यास चाहिए। तृप्ति जल से नहीं होती, ध्यान रखना। तृप्ति तो प्यास की त्वरा से होती है। जल तो माध्यम बनता है; लेकिन उसके पहले प्यास चाहिए।
मैं तुम में सत्य डाल दूं, तो भी तुम्हारे जीवन में कहीं कुछ परिणाम नहीं होगा। तुम प्यासे ही न थे। प्यासे न थे तो जल कैसे अनुभव में आए? हां, जल का शास्त्र समझ में आ सकता है।
दुनिया में सत्य विरलों को उपलब्ध होता है। और ऐसा नहीं है कि सत्य ने कोई शर्त लगा रखी है कि विरलों को ही उपलब्ध होएंगे। सत्य सभी को उपलब्ध हो सकता है—लेकिन विरले ही प्यासे होते हैं। सत्य कभी भी संपदा हो सकती है। सत्य सभी का अधिकार है—जन्मसिद्ध अधिकार है; स्वरूपसिद्ध अधिकार है। लेकिन दावा करोगे, तब न! घोषणा करोगे, तब न! दांव पर लगाओगे अपने को, तब न!
तो आमतौर से जो माना जाता है, वह तो समझ लेना कि आमतौर से गलत ही होगा। भीड़ क्या मानती है, इसमें बहुत मत उलझ जाना। भीड़ को कुछ भी पता नहीं है। भीड़ ने मानने की चिंता भी नहीं ली है; खोज भी नहीं की है। भीड़ ने तो औपचारिक रूप से मान लिया है। हिंदू घर में पैदा हुए तो भीड़ हिंदू हो गई। ईसाई घर में पैदा हुए तो भीड़ ईसाई हो गई। जिस भीड़ में तुमने अपने को पाया, वही तुम हो गए। मंदिर की तरफ जाती थी तो मंदिर चले गए; मस्जिद जाती थी तो मस्जिद चले गए। यह धार्मिक होने का उपाय नहीं है।
धर्म तो स्वेच्छा से चुनना होता है।
समझो। तुम यहां मेरे पास बैठे हो, यह चुनाव है; क्योंकि यहां तुम किसी भीड़ के कारण नहीं आ गए हो। कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, कोई जैन है, कोई पारसी है, कोई यहूदी है, कोई सिक्ख है। भीड़ें तो उनकी अलग थीं। यहां तुम किसी परिवार में पैदा होने के कारण नहीं आ गए हो; किसी संस्कार के कारण नहीं आ गए हो। यहां तुम्हारी तलाश तुम्हें लाई है। और इस तलाश के लिए तुम्हें मूल्य चुकाना पड़ेगा। अगर तुम ईसाई हो तो ईसाई तुम पर नाराज होंगे। अगर हिंदू हो तो हिंदू नाराज होंगे। तुम जिस भीड़ को छोड़ कर यहां आ गए हो मुझे सुनने, वही भीड़ तुम पर नाराज होगी। भीड़ बाधाएं खड़ी करेगी। और भीड़ बड़ी बाधाएं खड़ी कर सकती है, क्योंकि रहना तो भीड़ के साथ है। दुकान उनके साथ करनी है, बाजार उनके साथ करना है, काम उनके साथ करना है, शादी—विवाह उनके साथ करना है, जीना उनके साथ, मरना उनके साथ—तो भीड़ हजार उपद्रव खड़े कर सकती है।
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं: हमें संन्यास लेना है; लेकिन जरा बेटी की शादी हो जाए; क्योंकि अगर शादी न हुई और हमने संन्यास ले लिया तो अड़चनें आ जाएंगी, शादी करना मुश्किल हो जाएगा। और किसी तरह खोज भी लिया वर तो बारात में कोई सम्मिलित न होगा। एक दफा यह लड़की की शादी हो जाए तो फिर मैं संन्यास लेने के लिए तैयार हूं।
लेकिन कहीं इतनी आसानी से हल होते हैं? लड़की की शादी हो जाएगी; पत्नी बीमार पड़ी है, कल मर जाएगी तो? अरथी में भी लोग सम्मिलित होने वाले नहीं हैं। अरथी पड़ी रहेगी और कोई वहां पर न आएगा। तो घबड़ाहट होगी। अपमान अनुभव होता है, परेशानी होती है, अड़चन होती है। सुख—दुख में आदमी चाहता है कोई साथ हो। लड़की की शादी कर दोगे; कल लड़की का बच्चा होने वाला है, उसकी भी शादी करनी पड़ेगी। चीजें कहीं समाप्त थोड़े ही होती हैं। इस दुनिया में कहीं पूर्णविराम आता है क्या कभी? यहां पूर्णविराम आता ही नहीं। ऐसा थोड़े ही है। वे सिर्फ फिल्मों में आते हैं—दि एंड! यहां नहीं आता। जिंदगी में कभी आता ही नहीं। यहां न कुछ शुरू होता है न कुछ अंत होता है—सदा बीच में। तुम भी आए, तब भी कहानी चल रही थी। मंच पर अभिनय चल रहा था। जनता बैठी थी। तुम जब आए, तब भी सब चल रहा था। तुम्हें पता नहीं, आगे काफी चल चुका था। तुम चले जाओगे, तब भी सब चलता रहेगा। यह कहानी बंद होती नहीं। यह सिलसिला है। यह अनंत सिलसिला है। इसमें तुम अगर यह सोचते हो कि जब पूर्णविराम आ जाएगा; सब कर लिया, जो करना था, अब भीड़ पर निर्भर रहने की कोई जरूरत न रही—तब भी कम से कम तुम मरोगे! तुम्हें मरना होगा! और वह भी मन में चिंता पकड़ती है कि मर जाऊंगा तो म्युनिसिपल के आदमी ले जाएंगे; कोई भीड़ साथ नहीं देगी।
आदमी मरने के पहले भी मरने का भी विचार करता है कि अरथी में कौन—कौन सम्मिलित होंगे। तुमने कभी सोचा इस पर कि नहीं? कितनी भीड़—भाड़ रहेगी? अखबारों में क्या छपेगा? लोग क्या कहेंगे? मरने के बाद लोग प्रशंसा में कुछ कहेंगे कि नहीं?
अमरीका में एक आदमी हुआ: रॉबर्ट रिप्ले। मरने के पहले उसने...। वह आदमी जिंदगी भर से अपने ढंग का आदमी था। अनूठे काम करने की उसे आदत थी। तो उसने अनूठे ढंग से मरना चाहा। उसने अपने सेक्रेटरियों को बुलाया और उनको कहा कि देखो, खबर कर दो अखबारों को कि मैं मर गया। डाक्टर तो कहते हैं कि चौबीस घंटे से ज्यादा बच नहीं सकूंगा।
तो उन्होंने कहा: लेकिन अभी आप जिंदा हैं, अखबारों में खबर करने की अभी क्या जरूरत है? जब आप मरेंगे तब करेंगे।
तो उसने कहा: तुम पागल हो...! मैं पढ़ लेना चाहता हूं कि मेरे मरने के बाद लोग क्या कहेंगे, क्या लिखेंगे! और मैं दुनिया का पहला आदमी होना चाहता हूं, जिसने अपने मरने की खबर पढ़ी! मरने का भी मैं उपयोग कर लेना चाहता हूं।
बात तो उनको भी जंची। उन्होंने सूचना कर दी अखबारों को। अखबारों में खबरें छप गईं, ऐडिटोरियल निकले। वह आदमी प्रसिद्ध था; जीवन भर का खोजी था; उसने अनूठी बातें खोजी थीं। उसकी बहुत सी किताबें हैं; अगर कभी तुमने देखी हों, उसकी किताबों का नाम एक ही है: बिलीव इट ऑर नॉट! मानो या न मानो। उसने ऐसे तथ्य खोजे हैं जो माने नहीं जा सकते। लेकिन वे तथ्य हैं। वे सभी वैज्ञानिक अर्थों में तथ्य हैं। ऐतिहासिक हैं। लेकिन एकदम से भरोसा नहीं आता। यही जिंदगी भर उसका काम था।
उसके पास एक मछली थी जो उलटा तैरती थी। वह अकेली मछली थी दुनिया में। सभी मछलियां उलटा नहीं तैरतीं; मगर उसके पास एक मछली थी जो उलटी तैरती थी।
ऐसी उसने बहुत सी चीजें इकट्ठी की थीं सारी दुनिया में घूम—घूम कर। अनूठा खोजी था।
मैं जबलपुर रहा वर्षों तक। जबलपुर के पास ही एक खजूर का वृक्ष था, जो किसी ने कभी मुझे नहीं कहा। जब मैं पढ़ा तो रॉबर्ट रिप्ले की किताब में पढ़ा कि जबलपुर के पास इतनी मील दूर तक फलां जगह एक खजूर का वृक्ष है, जिसमें दो फुनगे हैं। खजूर के वृक्ष में एक ही होता है। शाखाएं नहीं होतीं खजूर के वृक्ष में। वह अकेला वृक्ष है सारी पृथ्वी पर। जब उसकी किताब पढ़ी, तब मैं गया खोजने। मिला मुझे, वह वृक्ष था वहां। मगर वह उसके संबंध में कैसे पता लगाया था, क्या किया था! वह जिंदगी भर खोजता रहा है, इसी तरह की चीजें, जो अनूठी हों, विरली हों।
तो उसने कहा: मेरी मौत भी विरली होनी चाहिए। चौबीस घंटे पहले खबर दे दी, मर गया। अखबारों में संपादकीय छपे, चित्र छपे, प्रशंसाएं छपीं, स्तुतियां छपीं। वे दूसरे दिन उसने सब पढ़ीं और फोटोग्राफर को बुला कर कहा कि इनको पढ़ते हुए मेरे चित्र निकाल लो; अब ये चित्र छाप दो कि यह आदमी इतिहास का पहला आदमी है, जिसने अपनी मौत की खबर खुद पढ़ी। अब मैं निश्चिंतता से मर सकता हूं, क्योंकि सब ठीक है, कहीं कोई गड़बड़ नहीं है।
मरने पर कोई किसी के खिलाफ बोलता भी नहीं। इतनी दया लोग करते हैं। जिंदगी भर तो खिलाफ बोले; फिर पश्चात्ताप करते हैं। जिंदगी में कौन किसके पक्ष में बोलता है! मरने पर कोई खिलाफ नहीं बोलता। लोग कहते हैं: अब तो बेचारा मर गया! अब जैसा भी था।
मरे हुए आदमी को सभी कहते हैं स्वर्गीय हो गया। वे चाहे नरक में जाएं, इससे कोई मतलब नहीं है। सभी तो स्वर्ग नहीं जाते होंगे। दिल्ली में जो मरते हैं, उनके संबंध में अखबार कहता है: स्वर्गीय हो गए! दिल्ली में मरने वाला आदमी स्वर्ग जाए, इसकी संभावना बहुत कम है। फिर नरक कौन जाएगा? फिर नरक का क्या होगा?
मरने के बाद तो लोग प्रशंसा ही करते हैं। यह भी पश्चात्ताप है कि अब जिंदगी भर तो बेचारे की खींचात्तान की, जिंदगी भर तो सताया, निंदा की; अब मरते वक्त तो शांति दे दो। अब तो मर ही गया! अब तो झंझट मिट ही गई! अब तो इसकी प्रशंसा करने में कुछ हर्ज नहीं है।
वाल्तेयर और रूसो में बड़ा विरोध था फ्रांस में। जब वाल्तेयर मरा और रूसो को किसी ने आकर खबर दी कि सुना आपने, वाल्तेयर मर गया! तो रूसो ने पता है, क्या कहा? कहा कि ही वाज़ ए ग्रेट मैन, प्रोवाइडेड ही इज़ रियली डेड। वे एक महान व्यक्ति थे, अगर सच में ही मर गए हों। मगर सच में ही मर गए हों! यह पक्का हो तो मैं कह सकता हूं कि महान व्यक्ति थे। अगर जिंदा हों तो पुराना झगड़ा जारी है।
जिंदगी में कभी कुछ अंत तो आता नहीं। और सभी कुछ अंत भी आ जाए, जैसा होता नहीं, तो भी तुम्हें अपने मरने का सोचना पड़ेगा कि कोई कफन चढ़ाएगा, कोई अरथी में जाएगा, कोई ठीक से दफना देगा! कुत्ते की मौत तो नहीं हो जाएगी?
तो यहां अंत है ही नहीं; यहां सिलसिला जारी रहता है। भीड़ से जब तुम आते हो मेरी तरफ, तो तुम्हें यह सब जोखिम लेनी पड़ती है। यह जोखिम पुरानी है। जिन लोगों ने क्राइस्ट को चुना था, उन्होंने भी यह जोखिम ली थी। और जिन्होंने कृष्ण को चुना उन्होंने भी जोखिम ली थी। जिन्होंने कबीर को चुना उन्होंने भी जोखिम ली थी। जिन्होंने नानक को चुना उन्होंने भी जोखिम ली थी। यह जोखिम सनातन है। यह धार्मिक व्यक्ति को लेनी ही पड़ती है।
और जब भी कृष्ण या क्राइस्ट बोलेंगे तो ध्यान रखना, वे इस लिहाज से नहीं बोलते कि लोग क्या मानते हैं। लोग क्या मानते हैं, इस हिसाब से तो राजनीतिज्ञ बोलता है। राजनीतिज्ञ वही बोलता है जो लोग मानते हैं। राजनीतिज्ञ पहले पता लगाता है कि लोग मानते क्या हैं, लोगों की धारणा क्या है? जो लोग सुनना चाहते हैं राजनीतिज्ञ वही बोलता है; उसे और बढ़ा—चढ़ा कर बोलता है। लोगों के विपरीत राजनीतिज्ञ नहीं बोलता, क्योंकि लोगों से मत लेना है। राजनीतिज्ञ तो लोगों पर निर्भर है।
जिसको तुम नेता कहते हो, वह अपने अनुयायियों का भी अनुयायी होता है। वह उन्हीं की तरफ देख कर चलता है।
मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन अपने गधे पर बैठ कर भागा जा रहा था। बाजार से निकला तो लोगों ने पूछा: अरे! कहां जा रहे हो? नसरुद्दीन। उसने कहा: मुझसे मत पूछो, इस गधे से पूछो। उन्होंने पूछा: हम समझे नहीं कि गधे से क्यों पूछो! उसने कहा कि मैं बहुत इसको चलाने की कोशिश करके हार चुका; हर जगह उपद्रव खड़ा कर देता है; बीच बाजार में अटक जाएगा, टस से मस नहीं होगा; भीड़ लग जाती है। तो मैंने एक राज सीख लिया: यह जिस तरफ जाता है, मैं उसी तरफ जाने देता हूं। इसमें कम से कम अपनी मालकियत तो कायम रहती है। लोगों को यह तो लगता है कि नसरुद्दीन का गधा बिलकुल आज्ञाकारी है। इससे किसी को कानोंकान खबर नहीं होती कि मेरे और इसके बीच कुछ झंझट है।
ऐसा ही नेता होता है। नेता पहले देख लेता है: अनुयायी कहां जा रहे हैं? किस तरफ झंडा ऊंचा कर रहे हैं। वह झट से उन्हीं के आगे खड़ा हो जाता है। इतनी वह कुशलता जानता है कि झंडा किसी तरफ ऊंचा हो रहा हो, उसे आगे खड़ा हो जाना है। बस वह भीड़—भाड़ में पीछे खड़ा नहीं होता; भीड़ के आगे खड़ा हो जाता है। भीड़ पूरब जाए तो वह पूरब जाता है। भीड़ पश्चिम जाए तो वह पश्चिम जाता है। भीड़ कहती है कि गरीबी हटाओ, तो वह और जोर से चिल्लाता है कि गरीबी हटाओ। भीड़ कहती है कि समाजवाद लाओ, तो वह कहता है: यही तो लाना है, समाजवाद लाओ! मगर कुछ भी हो, मैं आगे हूं! जो भीड़ कहती है, उसको वह और जोर से कहता है। और कुशल राजनेता उसे कहते हैं, जो भीड़ में बदलते हुए मौसम को पहचान ले; समय के पहले पहचान ले। नहीं तो चूक जाएगा; कोई दूसरा चिल्लाने लगेगा आगे खड़े होकर।
तुम चले जा रहे हो। तुमने पीछे लौट कर नहीं देखा। ऐसा ही इंदिरा का हुआ न! चली गई, चली गई, चली गई; पीछे लौट कर देखा ही नहीं कि भीड़ आ रही है कि नहीं आ रही है। जब देखा तो भीड़ जा चुकी थी। तब वहां कोई भी नहीं था। पुलिस के आफिसर थे, कलेक्टर—कमिश्नर थे, सी.बी.आई. के लोग थे—सब तरह के और चमचे थे, वे थे। लेकिन जनता जा चुकी थी। देर हो गई। चूक हो गई।
बीच—बीच में लौट कर देखना पड़ता है नेता को कि जनता आ रही है कि नहीं, जनता किधर जा रही है? जल्दी से हट कर उसी के आगे हो जाना है। जनता को यह भ्रम बना रहता है कि नेता आगे है; हमारे साथ है।
संत कोई नेता नहीं है। तुम्हें क्या अच्छा लगता है, वह नहीं बोलता; जो है वह बोलता है। इस फर्क को खयाल में ले लेना। जैसा है वैसा बोलता है। जैसा है वैसा का वैसा बोलता है—तुम्हें रुचे न रुचे; तुम्हें मीठा लगे, तुम्हें कड़वा लगे। बहुत संभावना तो है कि कड़वा लगेगा। क्योंकि तुम्हें जो चीज मीठी लग रही है, वह जहर है। और तुम जन्मों से उसके आदी हो गए हो।
जब कोई तुम्हें तुम्हारी आदतों से जगाता है तो पीड़ा होती है। सुबह तुम बड़ी गहरी नींद में सो रहे हो, बड़े मजे के सपने देख रहे हो—और हिलाने लगता है कि उठो! और यह भी हो सकता है कि रात तुम कह कर सोए होओ कि सुबह मुझे उठा देना, कि मुझे ट्रेन पकड़नी है कि मुझे किसी काम पर जाना है। तुम्हारे ही कहने के कारण कोई आदमी तुम्हें सुबह उठा रहा हो, तो भी दुश्मन मालूम पड़ता है; तो भी लगता है कि यह दुष्ट कहां से आ गया, कि इसको जरा भी अकल नहीं है, कि अभी एक करवट तो और ले लेने दे! तुम खुद कहते हो, तो भी जगाने वाला दुश्मन मालूम पड़ता है। और संतों से तो तुमने कभी कहा नहीं कि जगाओ। और यह तुम्हारी नींद बड़ी पुरानी है और वे तुम्हें झकझोरे डालते हैं। वे तुम्हें हिलाते हैं। वे कहते हैं: उठो! वे तुम्हें चोट करते हैं। तुम मधुर सपना देख रहे थे। तुम महल देख रहे थे सोने का। तुम देख रहे थे सुंदर स्त्रियां। तुम देख रहे थे अप्सराएं। तुम स्वर्ग में विराजमान थे। तुम सिंहासन पर बैठे थे; देवी—देवता तुम्हारे चारों तरफ नाच रहे थे और तुम्हारे यशोगान कर रहे थे। और ये सज्जन आ गए और ये तुम्हें हिलाने लगे कि उठो कि यह सब सपना है, कि जागो!
संत से तुम सदा नाराज होओगे। जो संत से राजी हो जाए, वह संत हो गया। भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई।
मीरा कहती है: भगत देख राजी हुई! भगत को देख कर जो राजी हो जाए, वह भगत। संत को देख कर जो राजी हो जाए, वह संत।
संत बहुत नहीं हैं। तुम्हें अड़चनें हैं। तुम सत्य तो जानना ही नहीं चाहते, क्योंकि तुम जीते झूठ में हो।
फ्रेड्रिक नीत्शे ने कहा है कि लोग मर जाएंगे, अगर उनके झूठ छीन लिए जाएं। लोग झूठों के सहारे जीते हैं। झूठों से उनकी जिंदगी में चिकनाई बनी रहती है; लुब्रीकेंट हैं झूठ।
कोई स्त्री तुमसे कह देती है: तुमसे सुंदर पुरुष कोई भी नहीं! अब यह सरासर झूठ है। इतनी बड़ी पृथ्वी पर तुमसे सुंदर कोई पुरुष नहीं! और इस स्त्री ने ऐसे जाने कितने पुरुष हैं, देखे कितने पुरुष हैं अभी? कोई परीक्षा हुई है? कोई ओलंपिक हुआ है? कोई चुनाव हुआ है, कहीं तय हुआ है कि कौन आदमी सबसे ज्यादा सुंदर है? नहीं, लेकिन तुम भी फिकर नहीं करते, हालांकि तुम भी जानते हो कि यह सरासर झूठ है। मगर यह मानने जैसा लगता है।
तुम किसी स्त्री से कहते हो कि तुझसे मुझे जितना प्रेम है, किसी से न कभी था न कभी होगा और जनम—जनम यह टिकेगा, यह अमर है। यह झूठ है। झूठ इसलिए है कि यही बात तुम और स्त्रियों से भी पहले कह चुके हो। और झूठ इसलिए है कि यही बात बहुत संभव है कि तुम और स्त्रियों से आगे भी कहोगे। और झूठ इसलिए है कि यही बात और पुरुषों ने भी इस स्त्री से पहले कही है, तब भी इसने माना था। और झूठ इसलिए है कि क्षणभंगुर मन से शाश्वत प्रेम हो कैसे सकेगा? मन ही क्षणभंगुर है। आज जो स्त्री सुंदर लग रही है, कल हो सकता है दो कौड़ी की मालूम होने लगे।
अक्सर ऐसा हो जाता है: स्त्री मिल जाए तो दो कौड़ी की हो जाती है; न मिले तो प्रेम कायम रहता है। धन्यभागी थे मजनू कि स्त्री नहीं मिली; मिल जाती तो सिर फोड़ते। कहीं बैठे बाजार में चना बेचते होते। बाल—बच्चे पालते। तो नहीं मिली, तो मजा कर रहे हैं; तो लैला—लैला चिल्ला रहे हैं।
एक आदमी एक पागलखाने में गया। उसने एक कोठरी में एक आदमी को सिर पीटते देखा। और एक तस्वीर हाथ में लिए छाती से लगाया है और आंखों से आंसुओं की जलधार बह रही है। तो पूछा उस आदमी ने कि इस पागल को क्या हुआ? उसने कहा कि देखते नहीं वह तसवीर! इस स्त्री के पीछे दीवाना था। वह इसे मिली नहीं।
बात समझ में आ गई कि रो रहा है, दुखी हो रहा है। इसी के पीछे पागल हो गया। उसके सामने की कोठरी में एक दूसरा आदमी था। वह अपने कपड़े फाड़ रहा था और दीवालों को घूंसे मार रहा था और सिर पटक रहा था जमीन पर और बाल नोंच रहा था। पूछा: इसको क्या हो गया? उसने कहा: इसकी मत पूछो। जो स्त्री उसको नहीं मिली, वह इसको मिल गई। यह उस स्त्री के मिलने की वजह से पागल हो गया।
जो आज इस क्षण में लगता है, वह एक क्षण बाद टिकेगा? जो इस क्षण की प्रतीति है, वह इस क्षण की प्रतीति है; वह कल के क्षण में भी होगी, पक्का नहीं है। मगर आदमी झूठ पसंद करता है। झूठ प्यारे लगते हैं। झूठ में खुशामद है। झूठ फुसलाते हैं। सच में चोट होती है।
यूनान के बहुत बड़े विचारक प्लेटो ने अपने भविष्य के राज्य में कवियों को प्रवेश नहीं दिया है। उसने आयोजना की है कि उसके रिपब्लिक में, उसको जो भविष्य का कल्पना का कल्पना का राज्य है, उसका जो राम—राज्य है—उसमें कवियों को कोई जगह नहीं होगी। कवि बड़े नाराज थे। और लोगों ने पूछा भी प्लेटो से कि यह बात क्या है? कवियों से ऐसी क्या नाराजगी है? और सब होंगे, कवि क्यों नहीं होंगे?
तो प्लेटो ने कहा: कवियों के कारण झूठ चलता है। और मेरे राज्य में झूठ नहीं चाहिए; सच चाहिए। अब और सपने नहीं, अब यथार्थ चाहिए।
लेकिन प्लेटो का राज्य कभी बनेगा नहीं। नीत्शे ज्यादा सही बात कह रहा है कि लोग झूठ में ही जीते हैं; लोग झूठ नहीं छोड़ सकते। झूठ हट जाए तो उनकी गाड़ी ठहर जाए। झूठ हट जाए तो जीने योग्य कारण ही न रह जाए।
कोई इस झूठ में जीता है कि धन मिल जाएगा तो बड़ा सुख होगा। यह झूठ है। किसी को कभी धन मिलने से सुख नहीं हुआ। सारी बातें इस पक्ष में गवाह देती हैं कि किसी आदमी को धन मिलने से सुख नहीं हुआ। मगर फिर भी यह झूठ चलता है कि धन मिल जाएगा तो सुख होगा; पद मिल जाएगा तो सुख होगा। किसी को कभी नहीं मिला। पूरा मनुष्य—जाति का इतिहास निरपवाद रूप से सिद्ध करता है कि पद मिलने से किसी को सुख नहीं मिला। नहीं तो बुद्ध सिंहासन छोड़ कर जाते क्यों? नहीं तो महावीर राजमहल छोड़ जंगलों में क्यों भटकते? पद से मिलता होता सुख, सुगम हो गई होती बात; तब तो सिकंदर और नेपोलियन और चंगीजखां और नादिरशाह और स्टैलिन सभी बुद्धपुरुष हो जाते। मगर नहीं, पद से कहीं सुख नहीं मिलता। पर झूठ जारी है। झूठ हमारे रग—रग, रेशे—रेशे में प्रविष्ट हो गया है। आदमी की भीड़ झूठ से जीती है।
संत को कहना है वही—जो है, जैसा, है; वैसे का वैसा। पत्थर को पत्थर, गुलाब को गुलाब। जैसा है वैसा। फिर चोट लगे तो लगे; न लगे तो न लगे। जिसको नहीं लगेगी चोट, या तो वह बहरा है या जाग गया। जिसको चोट लगेगी, उसे लगनी ही चाहिए, क्योंकि चोट ही जगाएगी, नहीं तो वह जागेगा कैसे।
मैं तो वही कहता हूं जैसा है। उसमें रत्ती भर फर्क नहीं करना चाहता हूं।
मैंने सुना, एक गांव में एक महात्मा आए। प्रवचन दे रहे थे तो सामने ही एक महिला अपने बच्चे को लिए बैठी थी, वह बच्चा बड़ी गड़बड़ कर रहा था। अब बच्चे को तो कुछ मतलब ही नहीं महात्मा से। कभी कुछ कहता, कभी कुछ कहता। महात्मा भी परेशान हो रहे थे। उनका प्रवचन भी ठीक से नहीं चल पाता था—उस बच्चे के कारण। वह महिला उसे बार—बार डांटती—डपटती, दबाती, मगर वह फिर—फिर उठ कर खड़ा हो जाता, कुछ फिर कहता। आखिर महात्मा के बरदाश्त के बाहर हो गई; जब बच्चे ने यह कहा कि मुझे पेशाब लगी है। मां ने उसको कहा: चुप रह, चुप रह! मगर वह काहे को चुप रहे! वह बोला कि मुझे जोर से पेशाब लगी है।
बच्चे भी होते हैं, वे भी अपना रास्ता निकाल लेते हैं कि अब तुम उनको दबा भी नहीं सकते। अभी कभी आइसक्रीम मांग रहा था थोड़ी देर पहले चलो समझा—बुझा दिया कि शाम को दे देंगे, मगर अब पेशाब लगी तो अब शाम को थोड़े ही। उसने भी तरकीब निकाली। आखिर बच्चों में भी बुद्धि तो है ही। उसने भी बाधा खड़ी कर दी। उसने कहा: अब ऐसी चीज लगी है कि अब इसे इसी वक्त होना चाहिए।
आखिर महात्मा से नहीं रहा गया। महात्मा ने कहा कि सुन देवी, बच्चे में संस्कार नहीं है। तू बड़े घर की है, प्रतिष्ठित कुल तेरा, समृद्ध है; बच्चे को कुछ संस्कार दे। सत्संग में, मंदिर में इस तरह के शब्द बोले जाते हैं? पेशाब!
तो महिला ने कहा: मैं इसको और कौन सा शब्द सिखाऊं?
तो उन्होंने कहा कि कुछ भी सिखा दे, कोई भी एक प्रतीक शब्द। समझो कि इसको कह दे कि मुझे गाना गाना है। जब भी इसको पेशाब लगे, यह कह दे गाना गाना है, किसी को पता भी न चलेगा, तू अपने ले गई बाहर। मगर यह क्या कि बीच में खड़ा होकर वह कर रहा है! और उधर ब्रह्म—चर्चा चल रही है और इसको पेशाब लगी है।
महिला को भी बात तो जंची। उसने जाकर बच्चे को खूब समझाया—बुझाया। वह बच्चा राजी भी हो गया। घर में भी उससे कहा: तू इसी का अभ्यास कर, नहीं तो एकदम से सत्संग में कैसे अभ्यास करेगा! तो घर में भी वह इसी का अभ्यास करता। कभी भी जाता तो कहता गाना गाना है। फिर तीन महीने बाद झंझट हुई। संयोग की बात कि महात्मा फिर आए गांव। उसी महिला के घर मेहमान हुए। रात को, संयोग, कोई पड़ोसी बीमार हो गया बहुत और महिला को जाना पड़ा। वह बच्चा अकेला सोने को राजी नहीं था तो उसने कहा कि महात्मा के पास सो जाओ। तो महात्माजी के पास सुला गई और चली गई। रात के कोई दो बजे होंगे। महात्माजी की बड़ी तोंद लयबद्ध नीचे—ऊपर हो रही थी और उनकी नाक से सातों स्वर एक साथ निकल रहे थे। वे बड़े मस्त थे अपनी नींद में। तभी उस बच्चे ने उनको हिलाया और कहा कि महात्माजी, महात्माजी! गाना—गाना है!
महात्मा ने कहा: हद्द हो गई! धत तेरे की! आधी रात गाना गाना है? यह भी कोई बात हुई? सो जा चुपचाप!
महात्मा जोर से दबकाए उसको तो वह थोड़ी देर तो पड़ा रहा; लेकिन जब गाना गाना ही है तो वह पड़ा भी कैसे रहे! उसने फिर थोड़ी देर बाद जब उनका फिर स्वर जमने लगा और तोंद फिर हिलने लगी और आवाज फिर निकलने लगी, बच्चे ने फिर उनको हिलाया और कहा कि महात्माजी, गाना गाना ही पड़ेगा।
महात्मा ने कहा: तू सोने देगा रात भर कि नहीं? यह किस तरह का गाना? दिन में गाना! चुपचाप सो जा, नहीं तो दो चपातें लगा दूंगा।
अब महात्मा ने चपातों की बात कही तो वह बेचारा चुप रह गया; लेकिन अब वह चुप रहे भी कैसे, गाना गाना ही था। फिर उसने महात्मा को हिलाया। थोड़ी देर बाद उसने कहा: महात्माजी, सुबह तक रुक नहीं सकता, अभी गाऊंगा!
महात्मा ने कहा: मोहल्ले—पड़ोस के लोगों को भी जगा देगा। अच्छी झंझट तेरी मां मेरे पीछे लगा गई! यह कोई...। तू चुपचाप सो जा। गाना कोई ऐसी चीज थोड़े ही है कि अभी इतनी जरूरी होगी कि अभी ही गाए।
बच्चे ने कहा: महात्माजी, गा लेने दो; नहीं तो गाना बिस्तर में ही निकल जाएगा।
वे महात्मा बहुत घबड़ा गए कि गाना बिस्तर में निकल जाए...! तो उन्होंने कहा कि देख, शोरगुल मचेगा, पास—पड़ोस के लोग...। कहां का तेरा गाना, क्या तेरा गाना! तू मेरे कान में चुपचाप गा दे और फिर सो जा।
बच्चे ने कहा: फिर मत कहना आप! उसने गा दिया। गुन—गुना गुन—गुना गाना! जब गा दिया तब महात्मा को बोध आया। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मैं, बात जैसी है, उसको वैसी ही कह देना पसंद करता हूं। इधर गोल—गोल बातें खोजने से कोई सार नहीं है; उससे झंझटें बढ़ती हैं। तुम्हारे पास काफी झूठ वैसे ही इकट्ठे हो गए हैं। उन झूठों को तोड़ डालना है।
इन सारे झूठों में सबसे बड़ा झूठ है कि इंद्रियों को वश में रखना अनिवार्य है धर्म के लिए। यह सबसे बड़ा बुनियादी झूठ है। परमात्मा इंद्रियां देता है और महात्मा सिखाते हैं कि इंद्रियों को नष्ट कैसे करो! जार्ज गुरजिएफ कहता था कि मेरे अनुभव में एक बात बड़ी अजीब आई है कि महात्मा परमात्मा के विपरीत मालूम पड़ते हैं।
इस बात में बड़ा मूल्य है। परमात्मा इंद्रियां देता है और महात्मा कहते हैं: इंद्रियों का दमन करो। यह बात जंचती नहीं। यह धार्मिक नहीं हो सकती। इंद्रियों को परिशुद्ध करो; दमन नहीं। इंद्रियों का निखार करो; परिष्कार करो। आंखों को इतना उज्ज्वल बनाओ कि जहां भी, जो भी दिखाई पड़े, परमात्मा ही अनुभव हो। कानों को इतना शुद्ध करो कि जो स्वर भी सुनाई पड़े, वह उसी के अनाहतनाद का अंग हो। प्रेम को ऐसा परिपूर्ण करो कि जिस पर भी प्रेम डालो, वही तुम्हारा कृष्ण हो जाए।
तो मैं इंद्रियों के दमन के पक्ष में नहीं हूं। जो पक्ष में हैं, वे धार्मिक नहीं हैं। लेकिन इंद्रियों के दमन करने की बात लोगों को जंची। जंची इसलिए कि दमन करने से अहंकार को मजा आता है। किसी को भी दबाओ तो अहंकार को मजा आता है। दूसरे को दबाओ तो भी मजा आता है। अपने को दबाओ तो भी मजा आता है। अहंकार को मजा ही दबाने में आता है। किसी की छाती पर बैठ जाओ तो मजा आता है; अपनी ही छाती पर बैठ जाओ तो भी मजा आता है। अहंकार संघर्ष से जीता है। तो या तो दूसरों से लड़ो और दूसरों को हराओ। मगर दूसरों से लड़ना हमेशा संभव नहीं होता और महंगी भी बात है—तो अपने से ही लड़ो, अपने को ही दबाओ। या तो दूसरों को जीतो या अपने को जीतो—मगर जीतो जरूर। जहां जीत है वहां अहंकार को मजा आता है कि मैं कुछ हूं, मैं कुछ खास, विशिष्ट।
तो इंद्रियों को दबाने की बात अहंकारियों को खूब जमी। और समाज को भी यह बात जमी, क्योंकि जो इंद्रियों को दबाने में लग जाता है, वह समाज के लिए सहयोगी हो जाता है; वह दूसरों को नहीं दबाता। नहीं तो वह दूसरों को दबाएगा। दबाने का कहीं उसे रस है तो दबाने का रस वह निकालेगा। अगर अपने को दबाने लगे तो समाज सुविधा में हो जाती है। उस आदमी से झंझट मिटी। वह अब दूसरे को नहीं दबाता। वह पड़ोसियों को नहीं सताता। वह किसी दूसरे को नीचा नहीं दिखाना चाहता। वह अपने ही साथ जूझ रहा है। वह अपने ही दाएं—बाएं हाथ को लड़ा रहा है। वह अंधेरे में अपनी ही छाया से लड़ रहा है, वह जाने उसका काम जाने।
समाज कहती है: यह सज्जन आदमी है। दुर्जन समाज उसे कहती है जो दूसरों को दबाता है; उसको कहती है गुंडा, जो दूसरों को दबाता है—दुष्ट! जो अपने को दबाता है, उसको कहती है साधु। मगर दोनों के पीछे राज क्या है। बात तो एक ही है। दबाने का रस ही अहंकार है। और जब तक दबाना है तब तक तुम समर्पण न कर सकोगे। क्योंकि दबाना संकल्प है।
परमात्मा के चरणों में तो सब छोड़ देना है—सहज भाव से; इतने परिपूर्ण भाव से कि वे जैसा रखे वैसे रहेंगे। जैसे मीरा कहती है: जहां उठाता, उठ जाते; बैठाता, बैठ जाते; जो करवाता, करते। कर्ता वह है। हम मात्र निमित्त। हम उपकरण मात्र।
अर्जुन ने वही बात कृष्ण से गीता में पूछी है। अर्जुन बनना चाहता है संकल्पवान। वह कहता है: यह सब मैं छोड़ कर जाता हूं। इसमें क्या रखा है? जंगल में चला जाऊंगा, संन्यासी हो जाऊंगा। अपने आत्मज्ञान की खोज में लगूंगा। चित्त को शांत करूंगा। इस युद्ध में क्या रखा है? इसमें लोग कटेंगे, मरेंगे, यह मैं नहीं करना चाहता हूं।
लेकिन "मैं नहीं करना चाहता हूं', इसमें कर्ता का भाव है। कृष्ण उसे यही समझाते हैं। पूरी गीता इस एक सूत्र पर घूमती है, इस एक कील पर घूमता है गीता का चाक कि तू निमित्त है; तू कर्ता नहीं है, यह भ्रांति तू छोड़। करने वाला परमात्मा है। वह जो करवाए। अगर उसने तुझे युद्ध में ला खड़ा किया है तो ठीक, यही मर्जी। होने दे। तू बीच में अड़ मत। तू सिर्फ द्वार खोल दे। परमात्मा को तेरे से उतरने दे और जो उसे करना है, कर। क्योंकि मैं तुझसे कहता हूं अर्जुन कि जो मरने वाले हैं, वे मर ही गए हैं। जो मरेंगे वे मर ही चुके हैं। मैं उन्हें देख रहा हूं। वे मुर्दे हैं। सिर्फ कोई धक्का देने वाला चाहिए और उनकी लाशें गिर जाएंगी। अगर तू धक्का न देगा तो कोई और धक्का देगा। मौत तो होने ही वाली है। यह तेरे कारण नहीं हो रही है। तू अपने को कारण मान कर अहंकार को मत भर। तू अपने को कर्ता मान ही मत, उपकरण मात्र हो जा।
जो बात कृष्ण बहिर्युद्ध के लिए कहते हैं, वही मैं तुमसे कहना चाहता हूं—तुम्हारे पूरे जीवन के युद्ध के लिए: तुम चेष्टा मत करो, कर्ता मत बनो। तुम सहज उसके हाथ में छोड़ दो। उसने आंखें रूप देखने को दी हैं, तो जरूर रूप में कुछ छिपा है, तो तुम रूप को गौर से देखो। तुम प्रगाढ़ता से देखो। तुम रूप में गहरे डुबकी लगाओ। तुम रूप की तलहटी में जाओ और तुम अरूप को छिपा पाओगे। अगर देह प्यारी लगती है तो और गहरे उतरो; देह के भीतर तुम मन का सौंदर्य पाओगे। और गहरे उतरो; मन के भीतर तुम आत्मा का सौंदर्य पाओगे। और गहरे उतरो; और हर आत्मा के भीतर तुम परमात्मा का सौंदर्य पाओगे।
यह जो देह पर थोड़ी सी झलक दिखाई पड़ती है—आभा, सौंदर्य, महिमा—यह आती भीतर से ही है। यह झलक अंतर की ही है। तुम इस छाया में मत अटक जाओ। तुम इसके मूलस्रोत को खोजो। जैसे झील में चांद बना, सुंदर लगता है; लेकिन झील में चांद है नहीं, चांद तो आकाश में है; झील में तो प्रतिबिंब है। जो आदमी झील में डुबकी मार जाए चांद को खोजने के लिए, वह नासमझ है; वह कभी चांद तक नहीं पहुंचेगा। अब ये जो लोग चांद पर गए, अगर झीलों में उतरते तो चांद पर कभी नहीं पहुंचते। कैसे पहुंचते? प्रतिबिंब में तो कोई खोज नहीं हो सकती। प्रतिबिंब में अंततः हाथ में राख लगती है—राख भी नहीं लगती; कोरे खाली हाथ रह जाते हैं।
तो जिस आदमी ने शरीर में सौंदर्य को देखा और शरीर में ही खोजने चला गया, उसने भूल की; वह झील में डुबकी मारने लगा और चांद ऊपर है। और झील में खोजा—बीना और नहीं पाया चांद को। बाहर निकल कर उसने कहा कि चांद है ही नहीं—यह दूसरी भूल है। पहली भूल भोगी की भूल थी कि शरीर में सौंदर्य खोजने गया। दूसरी भूल तुम्हारे तथाकथित त्यागी की भूल है। वह कहता है: सौंदर्य है ही नहीं; मैंने खोज कर देखा, वहां कुछ भी नहीं है।
मैं तुमसे कहता हूं: दोनों गलत हैं। आंखें ऊपर उठाओ। अगर झील में सौंदर्य है तो कहीं से आता होगा। झील में नहीं मिलता है खोजने से, तो जरूर प्रतिबिंब होगा; इसलिए नहीं मिलता; दिखता तो है, मिलता नहीं। दर्पण के सामने खड़े हो, तुम दिखाई पड़ते हो; मगर अब दर्पण को तोड़ कर खोजने जाओगे वहां कुछ नहीं पाओगे।
जब भी कहीं कोई चीज दिखाई पड़े और खोजने पर मिले न, तो एक बात सिद्ध हो जाती है कि वह प्रतिबिंब था, रिफ्लेक्शन था। मगर प्रतिबिंब होने के लिए बिंब तो होना ही चाहिए, नहीं तो प्रतिबिंब कैसे होगा? झील में चांद देखा, तो आकाश में चांद चाहिए। और शरीर में सौंदर्य दिखा, तो सौंदर्य कहीं तो चाहिए ही; नहीं तो शरीर में भी कैसे दिखाई पड़ेगा? शरीर में खोजने से नहीं मिला, यह बात सच है। भोगी गलत सिद्ध हुआ। अब त्यागी कहता है कि हम शरीर को छोड़ कर जा रहे हैं; हम शरीर के दुश्मन हो गए हैं, अब हम कभी झील में न झांकेंगे, अब हम झील से भाग रहे हैं; अब हम ऐसी जगह जा रहे हैं जहां झील होगी नहीं, हम रेगिस्तान जा रहे हैं; हम तो अब रेगिस्तान में बैठेंगे जहां जल हो ही नहीं, क्योंकि जल बड़ा धोखेबाज है। मगर यह दूसरी भूल हो गई।
चांद है। झील में नहीं है, यह सच; मगर चांद कहीं है। आकाश में है। आंखें ऊपर उठाओ।
इस जगत में जो भी सौंदर्य है, परमात्मा का है—उसका ही प्रतिफलन। इस जगत में जो भी संगीत है, अनाहतनाद का है—उसका प्रतिफलन।
इसलिए मैं इंद्रिय—विरोधी नहीं हूं। इंद्रियों बेचारियों का क्या कसूर? इनको फोड़ने से कुछ भी न होगा। इनको जड़ कर डालने से कुछ भी न होगा। इनको तुम काट भी डालो तो भी तुम्हारी वासना न जाएगी, क्योंकि वासना तो भ्रांति का नाम है; इंद्रियों से उसका कोई संबंध नहीं है।
तुम क्या सोचते हो बुद्ध की आंखें तुमसे कम देखती हैं? तुमसे बहुत ज्यादा देखती हैं। गहरा देखती हैं। पारदर्शी हो गई हैं। एक्सरे उपलब्ध हो गया उन आंखों को। आर—पार देखती हैं। अब कोई चीज उनके बीच में बाधा नहीं बनती। बुद्ध अंधे थोड़े ही हैं। बुद्ध आंख वाले हैं।
बुद्ध ने कहा है कि मुझमें और तुममें फर्क इतना ही है: तुम भी आंख वाले हो, मैं भी आंख वाला हूं; तुम आंख बंद किए बैठे हो, मैंने आंख खोल कर देखा। बस इतना ही फर्क है।
तुम कहते हो: "आमतौर से समझा जाता है कि धार्मिक बनने के लिए इंद्रियों को वश में रखना अनिवार्य है।'
जरा भी नहीं। चैतन्य को जगाओ—इंद्रियां अपने से वश में हो जाती हैं। इंद्रियों को वश में करने से चैतन्य नहीं जमता। जागरूक बनो। प्रेम और ध्यान को उमगाओ—और इंद्रियां वश में हो जाती हैं। सभी इंद्रियां उसी परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाती हैं। क्योंकि सभी तरफ से उसी की खबर आती है। सभी इंगित उसी की तरफ तीर बने हुए हैं।
आप कहते हैं: "इंद्रिय—दमन भक्ति का लक्षण नहीं है।'
हो ही नहीं सकता। भक्त तो आह्लादित होता है; सारी इंद्रियों के साथ नाचता है परमात्मा के सामने। भक्त की तो सारी इंद्रियां संवेदनशील हो जाती हैं।
तुम जरा मीरा की सोचो, जो ऐसे प्यारे गीत गा सकी। इसकी इंद्रियां बड़ी संवेदनशील रही होंगी। यह जगत के सौंदर्य को नहीं देखती थी, ऐसा नहीं है। कल के गीत में देखा, राणा को कहती है: तेरा देश रंगरूड़ो। बड़ा रंगीन है, बड़ा सुंदर है; लेकिन मेरा मन तेरे देश में नहीं लगता, क्योंकि राणा तेरे देश में साधु नहीं है। सौंदर्य है, लेकिन ऊपर—ऊपर, भीतर का सौंदर्य नहीं है। साधु नहीं है। देह का सौंदर्य है; आत्मा का सौंदर्य नहीं है। इसलिए मेरा मन तेरे देश में नहीं भाता। तेरा देश बुरा है ऐसा नहीं। तेरा देश बड़ा प्यारा है, मगर कुछ चीज की कमी है। मंदिर सुंदर है लेकिन मूर्ति नहीं है। मंदिर प्यारा है, संगमरमर का है; लेकिन मंदिर का राजा मौजूद नहीं है। तेरे देश में साध नहीं है। इसलिए मन नहीं भाता। इसलिए मैं उधर लौट कर नहीं आती। बाहर—बाहर सब कुछ है; भीतर—भीतर सब खाली है।
थाली सोने की है; भोजन उसमें बिलकुल नहीं है। क्या करोगे ऐसी थाली का? देह सुंदर है और आत्मा कुरूप है? क्या करोगे ऐसी देह का? लेकिन ध्यान रखना: इसमें देह का कोई कसूर नहीं है। देह अगर कुरूप है तो इसीलिए कुरूप है कि भीतर सुंदर आत्मा को जन्माने में तुम असफल हो गए।
भीतर जगाओ सौंदर्य को—और तुम एक चमत्कार देखोगे! तुम एक चमत्कार देखोगे कि जैसे—जैसे भीतर ध्यान, जैसे—जैसे भीतर भक्ति, जैसे—जैसे भीतर प्रेम का आविर्भाव होता है, वैसे—वैसे देह पर भी सौंदर्य की आभा छाने लगती है। देह में एक नवीन प्रकाश आ जाता है; एक नई चमक आ जाती है! अलौकिक! इस पृथ्वी की नहीं, परलोक की!
तो दमन तो लक्षण नहीं है। ऊर्ध्वगमन लक्षण है भक्ति का। इंद्रियों को उठाना है परमात्मा की तरफ। इंद्रियां नीचे की तरफ न बहती जाएं, पदार्थ की तरफ; इंद्रियां उठने लगें। इंद्रियों को पंख लगें। उड़ें इंद्रियां आकाश की तरफ। फिर बड़ी प्यारी हैं, अदभुत हैं। जिन आंखों ने संसार में भटकाया है यही आंखें परमात्मा में रमा देंगी। और जिन कानों ने संसार के शोरगुल में तुम्हें उलझाया है, यही कान तुम्हें अनाहत के नाद से भी भर देंगे।
यही सीढ़ी जो नीचे ले जाती है, ऊपर ले जाती है—सीढ़ी तो एक ही होती है। सीढ़ी मत तोड़ डालना; नहीं तो पीछे पछताओगे। इस बात को कभी खयाल किया, इस छोटे से तथ्य को कभी विचार किया कि जिस सीढ़ी से तुम नीचे आते हो, उसी से ऊपर जाते हो! चूंकि यह सीढ़ी नीचे ले जाती है, इसको जला मत डालना। नहीं तो ऊपर कैसे जाओगे फिर? फिर ऊपर कभी न जा सकोगे। दिशा बदलो अपनी। नीचे मत जाओ, ऊपर चलो; मगर सीढ़ी तो यही है।
यही इंद्रियां उस परम का द्वार बन जाती हैं और यही इंद्रियां उस परम के लिए दीवार भी बन जाती हैं। तुम इनको द्वार बनाओ, दीवाल न बनाओ—यह समझ में आता है। लेकिन इनके दमन से यह नहीं होगा। इनके शुद्धिकरण से यह होगा। इनको निखारो। और संवेदनशील बनो। जब फूल को देखो तो और भरपूर देखो—ऐसे डूब कर देखो कि उस घड़ी में फूल के अतिरिक्त कुछ भी न रह जाए और तुम्हें अचानक लगेगा कि फूल के पास ही पास कहीं परमात्मा की ध्वनि भी है।
यह जो मैं कह रहा हूं, यह कोई विश्वास करने की बात नहीं। करो और देखो; यह तो सीधा प्रयोग है। मैं जो भी कहता हूं, सब प्रयोग है। मैं जो भी कहता हूं, वैज्ञानिक है। करना चाहो तो करके देख ले सकते हो।
कोई वीणा बजा रहा है, तुम सुन रहे हो। और गहरे सुनो। सुनते—सुनते मस्त हो जाओ। ऐसे सुनो कि डूब जाओ। और अचानक तुम पाओगे कि बाहर की वीणा तो बजती ही रही; भीतर की वीणा बजनी शुरू हो गई। बाहर की वीणा की संगत में भीतर की पड़ी हुई सूनी वीणा पर कुछ स्वर कंपने लगे।
संगीतवादक कहते हैं कि अगर एक ही कमरे में, खाली कमरे में एक वीणा कोने में रख दी जाए और दूसरा संगीतज्ञ, कुशल संगीतज्ञ हो, वह दूसरी वीणा को बजाए, तो तुम चकित होकर देखोगे कि वह जो वीणा कोने में रखी है, उसके तार कंपने लगते हैं, उसमें प्रति—संवाद पैदा हो जाता है। जब एक वीणा के तार नाचने लगते हैं तो दूसरी वीणा भी बिना अंगुलियों के तारों को कंपाने लगती है। वह जो कंपन पूरे भवन में भर जाएगा, वह वीणा के तार भी पकड़ लेंगे।
और ऐसी ही घटना घटती है साध—संगत में। किसी की वीणा बज रही है...वह तो मीरा कहती है कि इसलिए वहां मेरा मन नहीं भाता, वहां साधु नहीं है, वहां कोई वीणा को बजाने वाले नहीं हैं—जिनकी वीणा सुन कर मेरी वीणा बज उठे।
संगति का और क्या अर्थ होता है? सत्संग का और क्या अर्थ होता है? किसी की वीणा बज उठी है, तुम अपनी वीणा लेकर उसके पास बैठ गए। तुम्हें पता नहीं कि कैसे वीणा के तार छुओ। तुम्हें यह भी पता नहीं कि वे तार कहां हैं। तुम्हें अपनी अंगुलियों का भी कोई भरोसा नहीं। तुमने संगीत कभी सीखा नहीं। तुम्हें स्वरों का कोई ज्ञान नहीं, कोई फिकर नहीं। जिसकी वीणा बज रही, उसके पास बैठ जाओ। बैठो कुछ दिन। बैठो कुछ समय। बजने दो उसकी वीणा। एक दिन अचानक तुम पाओगे: तुम्हारे भीतर कुछ कंपा; कुछ कंपन हुआ; कोई लहर समा गई। अचानक तुम पाओगे कि बाहर की वीणा तो बज ही रही है, भीतर कुछ बजने लगा।
यही संवाद है जो गुरु और शिष्य के बीच फलित होता है। यही दान है जो गुरु से शिष्य को मिलता है, यह कोई वस्तु नहीं जो है हाथोंहाथ दी जाती है। यह तो एक संस्पर्श है। यह तो बड़ा अदृश्य संस्पर्श है—चुपचाप हो जाता है; किसी और को पता भी नहीं चलता; कानोंकान किसी को खबर नहीं होती। कोई चीज आती, न कोई चीज जाती। गुरु से कोई चीज निकल कर शिष्य में नहीं जाती। मगर गुरु के बीच कुछ कंपता है, नाचता है—और उसी नाच में शिष्य के भीतर कुछ नाचने लगता है।
कार्ल गुस्ताव जुंग ने—पश्चिम के एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक ने—उसके लिए एक ठीक—ठीक शब्द खोजा है। वह शब्द को कहता है: सिन्क्रानिसिटी, सह—संवेदनशीलता; संवाद। कुछ यहां घट रहा है, कुछ दूसरी जगह घटने लगता है—ठीक उसके संवाद में। और दोनों के बीच कोई सेतु भी नहीं है। कार्य—कारण का कोई संबंध नहीं है।
ऐसा नहीं है कि गुरु—शिष्य को ज्ञान दे देता है, ऐसा नहीं है। ऐसा होता, तब तो एक गुरु सारी दुनिया को ज्ञान दे देता। और ऐसा भी नहीं है कि शिष्य ज्ञान ले लेता है। लेने—देने की बात ही नहीं होती। शिष्य केवल खुले मन से बैठ जाता है; हृदय को खोल कर बैठ जाता है। शिष्य सिर्फ अपने को असुरक्षित छोड़ देता है, वह कहता है: तुम्हारी राजी में मेरी रजा है। इधर मैं बैठा हूं। इधर मैं तुम्हारे पास हूं।
हमारे पास जो शब्द हैं कुछ, बड़े मूल्यवान हैं। उनमें एक शब्द है: उपासना। उपासना का अर्थ होता है: पास बैठना। उप+आसन। गुरु के पास बैठ गए: उपासना। यही अर्थ उपनिषद का भी होता है। उपनिषद का अर्थ होता है: गुरु के पास बैठ गए। और यही अर्थ उपवास का भी होता है कि गुरु के पास बैठ गए।
भूखे मरने से उपवास नहीं होता, लेकिन किसी गुरु के पास बैठे—बैठे भूख की याद न आए तो उपवास। भोजन भूल जाए, तन की सुध भूल जाए—यह मतलब। गुरु के पास बैठे—बैठे तन की सुध न आए तो उपवास। और गुरु के पास बैठे—बैठे दोनों के तालमेल हो जाएं—तो उपनिषद। वहीं उपनिषद का जन्म होता है। वहीं सत्य का आविर्भाव होता है। और यही उपासना है, यही प्रार्थना है, यही पूजा है।
इंद्रियों को जगाओ। इंद्रियों को जीवन दो। जड़ मत करो: संवेदनशील करो। इंद्रियों को नाचने दो। इंद्रियों को रक्स में आने दो, नाच में आने दो। इंद्रियां जब अपनी परिपूर्णता पर होंगी, वहीं से छलांग लगती है।
इंद्रियां परमात्मा ने ऐसे ही नहीं दे दी हैं। इसलिए नहीं दे दी हैं कि इनको तोड़ो—फोड़ो।
दुनिया में दो तरह के लोग हैं जो इंद्रियों के दुश्मन हैं। एक भोगी, वे इनको नष्ट कर देते हैं। वे नष्ट कर देते हैं क्षुद्र में। क्षुद्र का स्वाद लेते—लेते विराट के स्वाद की क्षमता समाप्त हो जाती है।
और तथाकथित त्यागी, वे भी इनके दुश्मन हैं; वे भी इनको नष्ट कर देते हैं।
अब कोई आदमी कांटों पर लेटा हुआ है। वह क्या कर रहा है? वह यह कर रहा है कि स्पर्श की क्षमता समाप्त हो जाए; शरीर जड़ हो जाए। एक आदमी धूप में खड़ा हुआ है। वह धूप में खड़े होकर क्या कर रहा है? वह यह कर रहा है कि चमड़ा मोटा हो जाए। मोटी चमड़ी कहते हैं न! जिसमें बुद्धि कम होती है उसको कहते हैं: मोटी चमड़ी! मोटी चमड़ी हो जाए, चीजों का परिणाम न हो, संवेदनशीलता खो जाए। मगर यह कोई क्रांति नहीं है।
किसी को तुम गाली दो और उसको समझ में न आए कि तुमने गाली दी और वह उत्तर न दे और हंसता हुआ चला जाए—इसको तुम कोई संतत्व तो नहीं कहोगे! यह मोटी चमड़ी। इनकी अकल में ही न आई कि गाली थी। इनको समझने में वक्त लगता है। इन्होंने सुन भी ली, फिर भी पकड़ में न आई, तो उनको तुम बुद्धू कहोगे, बुद्ध तो नहीं।
बुद्ध भी गाली से प्रभावित नहीं होते हैं, लेकिन उसका कारण यह नहीं कि वे बुद्धू हो गए हैं। उसका कारण यह है कि समझ इतनी हो गई कि अब तुम पर दया आती है; गाली देने वाले पर दया आती है। ऐसा नहीं कि गाली समझ में नहीं आती। मगर ये दोनों तरकीबें काम में लाई जा सकती हैं। या तो इतना बुद्धत्व पैदा करो, इतना बोध कि गाली समझ में आए और जो गाली दे रहा है उस पर दया आए, करुणा आए कि बेचारा। और तुम्हें कोई चोट न लगे, क्योंकि तुम्हारे बुद्धत्व में कैसे चोट लग सकती है। इसकी गाली इसने दी, इसका काम; तुम्हें क्या लेना—देना! यह तुम्हारी समस्या ही नहीं है। तुम्हारी शांति अखंडित रहेगी। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि वह जो जड़ बुद्धि आदमी है, जिसको किसी ने गाली दी तो वह समझा ही नहीं, अपना हंसता चला गया। यह भी बचने की सस्ती तरकीब है।
और अक्सर त्यागी ने यही किया है: वह अपनी क्षमताओं को तोड़ लेता है, जड़ कर लेता है।
मैं इंद्रिय—जागरण के पक्ष में हूं, इंद्रिय—दमन के नहीं। क्योंकि इंद्रियों को पंख देना है; उन्हें परमात्मा तक उड़ने की क्षमता देना है। इन्हीं इंद्रियों के सहारे तुम संसार में आए हो—इसी सीढ़ी से उतर कर; अब इसी सीढ़ी पर चढ़ कर परमात्मा तक जाना है। तोड़ मत देना, नहीं तो पछताओगे बहुत। तोड़ना बहुत आसान है, फिर जोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है।
आप कहते हैं: प्रेम मुक्ति है और भक्ति मोक्ष है। भेद समझ में नहीं आया।
भेद थोड़ा सूक्ष्म है। ऐसे कठिन नहीं है; सीधा—साफ है। जब मैंने कहा: प्रेम मुक्ति है—तो मैंने कहा कि प्रेम से मोक्ष का स्वाद मिलता है। मुक्ति यानी मोक्ष का स्वाद, झलक। रोशनी आती है, खो जाती है। बिजली कौंधती है, एक क्षण को सब रोशन हो जाता है; फिर अंधेरा छा जाता है।
प्रेम में झलकें आती हैं। प्रेम में झलकें ही आ सकती हैं। बूंदाबांदी होती है; बाढ़ नहीं आती। मोक्ष का अर्थ है: बाढ़ आ गई—और ऐसी बाढ़ कि फिर कभी न जाएगी। मुक्ति खूब—खूब आती गई, आती गई, आती गई, मुक्ति का अंबार लग गया—तो मोक्ष। मोक्ष का मतलब इतना ही होता है कि अब ऐसी मुक्ति आ गई जो कभी न जाएगी। अब यह कोई अनुभव नहीं रहा; यह तुम्हारा स्वभाव बन गया। जब अनुभव तब मुक्ति। जब तुम्हारा स्वभाव बन गया, तब मोक्ष। जिससे तुम पतित न हो सको, फिर मोक्ष।
तो प्रेम से तो झलक मिलती है मुक्ति की और भक्ति से मोक्ष। प्रेम का मतलब होता है: एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से प्रेम। मनुष्य का मनुष्य से प्रेम—मनुष्य की भांति। भक्ति का अर्थ होता है: मनुष्य का परमात्मा से प्रेम।
दो मनुष्य एक ही तल पर होते हैं। तुमने किसी स्त्री को चाहा, तुमने किसी पुरुष को चाहा—अपने बेटे को, अपनी बेटी को, पत्नी को, मित्र को, किसी को चाहा—यह चाहत भी थोड़ी—थोड़ी झलकें लाएगी, क्योंकि यह भी प्रेम है। इसमें भी कभी—कभी तुम्हें बड़ी शांति मिलेगी, बड़ा आह्लाद होगा। मगर कभी—कभी। फिर विषाद। ऊंचाइयां आएंगी, खाइयां भी आएंगी। ऊंचे शिखर भी छुओगे कभी, तब लगेगा कि सब मिल गया, और जब खाई आएगी, अंधेरी अमावस रात आएगी, और पूर्णिमा खो जाएगी तो लगेगा सब खो गया। प्रेम में तुम्हें दोनों घटनाएं घटती रहेंगी।
जब तक प्रेम इतना गहरा न हो जाए कि जिससे तुम्हें प्रेम है उसमें कृष्ण दिखाई पड़ने लगे, तब तक मुक्ति की झलकें मिलेंगी। जिस दिन परमात्मा का अनुभव होने लगेगा, प्रेम भक्ति हो गई। भक्ति का अर्थ है: प्रेम ने भगवान को खोज लिया। प्रेम टटोलता है; भक्ति ने पा लिया। प्रेम अंधेरे में टटोलता है। मिलेगा दरवाजा; मगर टटोलना है प्रेम में। इसलिए प्रेम में बड़ा विषाद भी है। क्योंकि तुम जिसको भी प्रेम करते हो, इसी आशा में करते हो कि मिल गया प्यारा और फिर—फिर तुम पाते हो कि नहीं मिला; नहीं, कुछ कमी रह गई। फिर कुछ अड़चन रह गई। बात उतनी ऊंची नहीं गई जितना सोचा था। सपनों के अनुकूल सिद्ध न हुई। तो हर बार प्रेम में विषाद भी होता है। हर बार किसी को प्रेम करके तुम पाते हो: कुछ रिक्त हो गए; कुछ खाली हो गए। कुछ छूंछा—छूंछा हाथ में लगता है। सोचा था बहुत, हुआ बहुत कम। निकले थे सागर खोजने, बूंद हाथ लगी। अपेक्षा सागर की थी और बूंद हाथ लगी—तो निश्चित विषाद होता है।
इसलिए प्रेमी सुख में भी होते हैं और बड़े दुख में भी होते हैं।
भक्ति में खोजने गए थे बूंद और मिल गया सागर: आह्लाद अपरिसीम होता है। तुमने जितना सोचा भी नहीं था, उतना मिल गया। तुम तो सोचोगे भी कैसे! सागर तुमने देखा नहीं है, सोचोगे भी कैसे! परमात्मा तुमने देखा नहीं है, सोचोगे भी कैसे! तुम तो कुछ गए थे थोड़ा सा लेने, मगर वहां आकाश टूट पड़ा। तुम सम्हाल न सको, इतना मिला। तुम बांध न सको, इतना बरसा। तुम्हारी गठरी छोटी पड़ गई—तो भक्ति।
प्रेम जब सीमाओं से मुक्त हो जाता है तो भक्ति हो जाता है। और जब तुम्हारा प्रेम—पात्र सीमाओं से मुक्त हो जाता है तो भगवान हो जाता है।
भक्ति से मोक्ष; प्रेम से मुक्ति।

दूसरा प्रश्न: कुछ दिनों से हम यहां प्रेम की ध्वनि सुन रहे थे, लेकिन आश्रम के वातावरण में वह कहीं भी सुनाई नहीं पड़ती थी। "वीणा' के प्रत्युत्तर के बाद बाहर आनंद और प्रेम का एक अनोखा वातावरण छा गया। क्या कोई अपूर्व घटना घटी या ये हमारी आंखों के गुण—दोष थे?

पूछा है चितरंजन ने।
अनोखी घटना घटी—निश्चित घटी। और अनोखी घटना घटी, इसलिए दृष्टि भी बदल गई। ये दोनों बातें अलग—अलग नहीं हैं—एक साथ हैं।
पूछा है कि "क्या कोई अपूर्व घटना घटी या ये हमारी आंखों के गुण—दोष थे?'
अपूर्व घटना घटी और वही तुम्हारे आंखों के गुण—दोष को बहा ले गई। बाढ़ आई प्रेम की और कचरा बह गया।
अपूर्व घटना कभी भी घट सकती है। अपूर्व घटना का घटने के लिए कोई समय नियत नहीं है। किसी भी क्षण में तुम अगर मेरे प्रति खुले हो गए तो घट जाएगी। "वीणा' को उत्तर देते समय तुम्हारा हृदय मेरी तरफ खुल गया। पहले तुम सम्हाले—सम्हाले चल रहे थे, अपने को रोके—रोके चल रहे थे।
"चितरंजन' को मुझसे लगाव है; प्रेम है, गहरा प्रेम है—तो आते हैं। लेकिन एक अड़चन है। वह अड़चन बहुत मित्रों को है; वह भी समझ लेनी चाहिए। पिछले सात वर्षों से मैं कहीं गया नहीं। उसके पहले पंद्रह वर्षों तक निरंतर पूरे देश में घूमता था। तो मेरे बहुत घर थे, हर गांव में मेरे घर थे। जहां ठहरता वहीं मेरा घर था। जैसे पूना आता तो "सोहन' का घर मेरा घर था। बड़ौदा जाता तो "वीणा' का घर मेरा घर था। लुधियाना जाता तो "कुसुम' का घर मेरा घर था। ऐसे बहुत मेरे घर थे। स्वभावतः जिनके घर में मैं ठहरता था, वे मेरे बहुत निकट होने का मौका पाए थे; चौबीस घंटे मेरे पास थे। मेरे साथ सोते, मेरे साथ उठते, मेरे साथ बात करते। फिर एक अड़चन हुई, मैंने सब जगह जाना बंद कर दिया। अब जिन्होंने मुझे बहुत निकट से जाना है, जिनके घर मैं रुका हूं, रहा हूं, जिनके परिवार के एक सदस्य की तरह रहा हूं—वे जब इस आश्रम में आते हैं तो उनको अड़चन होती है। उनकी अपेक्षाएं वही होती हैं कि वे फिर मेरे पास उसी तरफ चौबीस घंटे बैठें; मेरे लिए भोजन तैयार करें; मेरे कपड़े धोएं; मेरी सेवा करें। आकांक्षा में कहीं कोई गलती भी नहीं है; आकांक्षा बिलकुल ठीक है। लेकिन अगर यह हो तो मेरा भोजन फिर पकेगा ही नहीं। कितने लोग पकाएंगे, वीणा! फिर भोजन नहीं पकने वाला। फिर कपड़े मेरे धुलेंगे नहीं; कपड़े लौटेंगे ही नहीं। जिसके हाथ लग गए, वही ले जाएगा। फिर वह सम्हाल कर रखेगा, लौटाना क्या है!
अब यह एक बिलकुल दूसरे ढंग की व्यवस्था है यहां। इसलिए जो मेरे बहुत निकट थे, उनको थोड़ी अड़चन होती है। वे आते हैं; प्रेम है मुझसे तो आते हैं। लेकिन उनको लगता है दूरी—दूरी। उनको लगता है कि मिलना है तो समय लेना पड़ेगा। मैं उनके घर में ठहरा था; मिलने का कोई सवाल ही नहीं था। उनको खयाल ही नहीं कि दूसरे उनसे समय लेते थे; अब उनको समय लेना पड़ता है तो अड़चन होती है। अड़चन बिलकुल स्वाभाविक है। चोट भी लगती है कि हम और समय लें! फिर समय में किसी को तीन दिन बाद समय मिलेगा, किसी को चार दिन बाद समय मिलेगा। तो और भी अड़चन होती है।
तो जब मैं उनके घर ठहरता था, उनको आधी रात बात करनी हो तो वे आधी रात मुझे उठा कर बात कर लेते थे। अब उन्हें चार दिन रुकना पड़ेगा तो अस्मिता को चोट भी लगती है।
मगर समझना होगा। यह काम की व्यवस्था बदली है। मैं जब पंद्रह वर्ष घूम रहा था, तब तो केवल संदेश पहुंचा रहा था, लोगों तक खबर पहुंचा रहा था कि किसी को अगर कभी प्यास हो तो आ जाना। वह अलग प्रक्रिया थी काम की। वह प्राथमिक चरण था। अब सारी दुनिया से प्यासे लोग आ रहे हैं। अब तुम्हें खयाल से सोचना पड़ेगा। अब तुम्हें हिसाब—व्यवस्था रखनी पड़ेगी।
अगर प्रत्येक व्यक्ति जब आए उसी वक्त उसको मिलना हो तो यहां रोज मिलने के लिए पांच सौ लोग होंगे, हजार लोग होंगे। दो हजार लोग होंगे, मिलना असंभव हो जाएगा। हालांकि तुम्हें लगता है कि तुम अभी मिलो; लेकिन अगर तुम्हीं अकेले होते तो ठीक था, कोई अड़चन न थी। और बहुत हैं जिनको ऐसा ही लगता है। तो फिर मिलना ही नहीं हो पाएगा। अगर मिलना संभव रखना है जारी, तो कुछ व्यवस्था देनी होगी; नहीं तो मिलने का कोई उपाय नहीं रह जाएगा।
सारी दुनिया से लोग आ रहे हैं, इस सबका खयाल रख कर आश्रम को एक ढांचा लेना जरूरी है। जो बिना ढांचे के मुझसे मिले हैं उनको अड़चन होगी। मगर अगर उनका मुझ पर प्रेम है तो वह अड़चन गल जाएगी। वह अड़चन जाएगी ही, क्योंकि वे समझेंगे। आखिर "सोहन' को तकलीफ होती है; "वीणा' को तकलीफ होती है; "चितरंजन' को तकलीफ होती है; "चंद्रकांत' को तकलीफ होती है—सभी को तकलीफ होती है। मगर धीरे—धीरे समझ आती है। प्रेम है तो समझ आएगी ही। यह समझ में आ जाएगी बात कि कारण क्या है।
आश्रम तुम्हें बाधा नहीं डाल रहा है; सिर्फ आश्रम मेरे लिए सुविधा जुटा रहा है। नहीं तो बहुत अड़चन हो जाएगी। वे जो पंद्रह वर्ष मेरे थे, अगर वैसा ही मैं जारी रखूं तो काम बिलकुल नहीं हो पाएगा। और अब काम करना है। अब मुझे लोगों की जिंदगी बदलनी है। अब सिर्फ बातचीत करने से नहीं होने वाला, अब कुछ काम करना है। काम करना है तो उसकी व्यवस्था होनी चाहिए। व्यवस्था अड़चन लाती है।
अभी "मीरा' रो रही है वहां सामने बैठी। उसने पत्र लिख कर पूछा है कि पिछली दफे मैं आई दर्शन में, आपने मेरी तरफ देखा ही नहीं! अब मेरे पास दो आंखें हैं और देखने को मुझे अब बहुत लोग हैं। गलत कहती है कि मैंने नहीं देखा। मैंने जरूर देखा। जरा आंख के कोने से देखा था। मुझे याद है आई थी और यह भी मुझे याद है कि उसे लगा होगा कि मैंने नहीं देखा। लेकिन अपेक्षा उसकी भी समझ में आती है। मुझे देखा क्यों नहीं? मेरी तरफ ध्यान क्यों नहीं दिया?
अब तुम मेरी तरफ ध्यान दो; कब तक मेरे ध्यान को तुम अपनी तरफ खींचते रहोगे? मैंने तुम्हें काफी ध्यान दिया। वह इसी आशा में दिया था कि एक दिन तुम मुझे ध्यान दोगे। मैं तुम्हें ध्यान दूं, इससे बहुत तुम्हें लाभ नहीं होगा। तुम मुझे ध्यान दो तो लाभ होगा। इस रूपांतर को समझोगे तो अड़चन न होगी।
तो "चितरंजन' को अड़चन रही होगी। अपने को रोके—रोके रहे होंगे, आश्रम से अपने को अलग—अलग जाना होगा; भिन्न—भिन्न माना होगा। आश्रम में जो लोग व्यवस्था करते हैं, वे दुश्मन की तरह दिखाई पड़े होंगे कि हर जगह खड़े हुए हैं लोग कि अंदर नहीं जाने देते, रोकते हैं, यह क्या मामला है। लेकिन जब मेरी बात सुनते हुए उनका हृदय मेरी तरफ खुला, प्रेम का थोड़ा संस्पर्श हुआ, तो आंख बदल गई होगी; तब समझ में आया होगा कि आश्रम सिर्फ मेरे लिए व्यवस्था दे रहा है।
और व्यवस्था कठोर होनी चाहिए तो ही हो सकती है।
तुमने देखा नारियल की गिरी के ऊपर मजबूत खोल होती है! वह मजबूत खोल नारियल की दुश्मन नहीं है; वह जो भीतर नारियल है उसको बचाने के लिए व्यवस्था है।
उन पंद्रह वर्षों के तुम मेरे संस्मरण सुनोगे तो बहुत हैरान होओगे। दिनों बीत जाते जब मैं सो ही नहीं पाता था। सोने का उपाय ही नहीं था, क्योंकि आज मैं इस घर में था, कलकत्ते में था, दूसरे दिन बंबई था, तीसरे दिन अमृतसर था। तो जिनके घर बंबई में रात भर ठहरा हुआ हूं, वे मुझे सोने कैसे दें! वे कहें कि आप फिर सो लेना; जब सो लेना आपको जहां सोना हो; हमें तो आप एक दिन मिलते हैं साल भर में, हम नहीं सोने देंगे! रास्ते में ट्रेन में लोग चढ़ जाते, आधी रात चढ़ जाते, मुझे उठा लेते: सत्संग करना है!
शारदाग्राम में मैं रात सोया। कोई दो बजे रात एक आदमी चुपचाप कमरे में घुस आया। उसने मेरे पैर दाबने शुरू कर दिए। मैंने पूछा: भाई, तू करता क्या है? उसने कहा: सेवा कर रहा हूं।
तू मुझे सो लेने दे। दिन भर का मैं थका—मांदा हूं।
उसने कहा कि आपकी आप जानो, मैं चार दिन से सेवा करने की उत्सुकता किए बैठा हूं लेकिन मुझे वे प्रेमचंद घुसने नहीं देते।
प्रेमचंद वहां मेरी फिकर करते थे। तब तक प्रेमचंद, वे भी सो रहे थे बगल के कमरे में, उन्होंने अपना नाम सुना तो वे उठ कर आ गए। उसने कहा: लो वे आ गए। फिर मेरी...आपको बोलने की जरूरत ही क्या थी? आप चुपचाप पड़े रहते! मैं सेवा कर लेता, चला जाता।
ट्रेन में लोग आधी रात डब्बे में आ जाते। वे कहते: हमें सेवा करनी है, पैर दबाने हैं।
उनका भी कसूर नहीं है। उनका भी प्रेम है। कैसे प्रेम को प्रकट करें! लेकिन उनको इसकी कोई फिकर नहीं है कि उनका प्रेम जिस ढंग से प्रकट कर रहे हैं, वह सेवा नहीं हो रही, वह कुसेवा हुई जा रही है।
लोगों के घर मैं रहता, वे जबरदस्ती मुझे खिलाते। जो चीज मुझे नहीं खानी है वह खानी पड़ती। मैं उनको कहता भी कि यह नुकसान करेगी। नहीं सुना उन्होंने। पंद्रह साल में मेरे शरीर को बुरी तरह खराब कर दिया। मगर उन्होंने प्रेम से ही किया था। उन्होंने कोई दुश्मनी से नहीं किया था। उनकी समझ के बाहर थी बात। उनको मैं कहता भी तो वे मानते नहीं, वे कहते, अब एक दिन खा लेने में क्या होगा। लेकिन यह मुझे रोज का सवाल था। इतना थोड़ा और खा लेंगे तो क्या हर्जा है?
सुबह एक घर में चाय पीना पड़ता, दूसरे घर में दोपहर भोजन करना पड़ता; तीसरे घर चाय पीनी पड़ती; चौथे वक्त शाम को किसी और के घर भोजन करना पड़ता। जिसके घर भोजन करता, एक ही बार करता, तो वह तो अपना पूरा दिल खोल कर भोजन करवाता। करीब—करीब हालत ऐसी हो जाती कि जब तक मैं नाराज न हो जाऊं तब तक वे मुझे छोड़ते ही नहीं। जबरदस्ती!
वह पंद्रह साल तक एक व्यवस्था थी। जरूरी था कि मैं जाऊं लोगों तक। खबर पहुंचा दी है। खबर पहुंचाते समय बहुत लोगों से मेरे निकट संबंध बने, प्रेम के नाते बने। अब जब वे आते हैं और यहां व्यवस्था का जाल देखते, तो उनको अड़चन होती है। उन्हें स्वीकार करना पड़ेगा व्यवस्था का जाल। और यह तो अभी कुछ भी नहीं है। यह तो शुरुआत है व्यवस्था की, क्योंकि हजारों लोग आने वाले हैं। अभी तुम्हें तीन—चार दिन बाद समय मिलता है मिलने का; कभी महीने भर बाद मिले तो भी स्वीकार करना पड़ेगा। और इतना प्रेम तो होना चाहिए कि मैं सभी के काम आ सकूं।
और अब जो काम है—वह काम है। अब मैं चाहता हूं: जिस व्यक्ति से मैं बात कर रहा हूं, उस व्यक्ति के साथ पूरा का पूरा तल्लीन होकर बात कर सकूं; दस मिनट कर सकूं, लेकिन पूरा तल्लीन होकर कर सकूं। चाहे तुम्हें मैं दस घंटे नहीं दे पाऊं। दस मिनट दे पाऊं; लेकिन अब मैं दस मिनट पूरी तरह देना चाहता हूं। दस मिनट में मैं तुम्हें आर—पार होना चाहता हूं। दस मिनट में मैं तुम्हारी पूरी समस्या को आत्मसात कर लेना चाहता हूं। दस मिनट में मैं तुम्हें पूरे जीवन की व्यवस्था दे देना चाहता हूं।
तो जरूरी है कि यहां हजार आदमी इकट्ठे मुझे मिलने न आ जाएं, नहीं तो वे न सुनने देंगे, न बात करने देंगे; न वे किसी की समझने देंगे, न किसी को समझाने देंगे। उनके लिए व्यवस्था करनी ही पड़ेगी।
और यह तो सिर्फ शुरुआत है। अब जो नया रूप होगा इस परिवार का, वह बहुत बड़ा होने वाला है। तो तुम्हें धीरे—धीरे दूसरों पर भी दया रख कर अपने दावे, अपनी अपेक्षाएं छोड़ देनी पड़ेंगी।
और मैं जानता हूं: जिनका मुझसे प्रेम है, वे छोड़ ही देंगे, देर—अबेर। "चितरंजन' कितनी देर तक इस बात को लेकर चल सकते थे; यह छूटनी ही थी, यह छूट गई। अब इसे दुबारा सिर मत उठाने देना। इसको जाने ही देना। और यह दृष्टि बदलेगी तो तुम्हें यह पूरा का पूरा आश्रम तुम्हें अपना घर मालूम पड़ेगा। यह तुम्हारा घर है।
और यहां जितने लोग काम में लगे हैं, सदा ध्यान रखना कि वे मेरे काम में लगे हैं। अगर कभी तुम्हें कुछ अड़चन भी देते मालूम पड़ते हैं तो वे मेरे लिए दे रहे होंगे, इसको खयाल में रखना। उन पर नाराज मत होना और उनके प्रति एक शत्रुता का भाव मत ले लेना।
यहां जो भी हो रहा है, वह मेरे इशारे से हो रहा है। यहां कुछ भी मेरी जानकारी के बाहर नहीं हो रहा है।
और एक बात तो स्वाभाविक है कि जैसा प्रेम तुम मुझसे पा सकते हो, वैसा प्रेम आफिस में जो व्यक्ति तुम्हें मिलने का समय देगा उससे नहीं पा सकते; वह मैं नहीं हूं। यह तो ठीक ही है। जैसा प्रेम तुम मुझसे पा सकते हो वैसा द्वार पर खड़े द्वारपाल से नहीं पा सकोगे; वह मैं नहीं हूं। यह तो ठीक ही है। उससे अपेक्षा भी यह करोगे तो गलत अपेक्षा हो जाएगी। तुम जरूरत से ज्यादा उससे मांग रहे हो। वह जितना कर सकता है उतना कर रहा है। लेकिन एक बात उसके मस्तिष्क में साफ है: उसे मेरा ध्यान है कि मैं क्या चाहता हूं; कैसे चाहता हूं, कैसे हो, उसे उसका ध्यान है, वह उसी को ध्यान में रख कर कर रहा है।
मगर लोग अपने ढंग के होते हैं। छोटी—छोटी बात में जिद्द पकड़ लेंगे। अहंकार के बड़े सूक्ष्म रास्ते हैं। कोई आदमी दस मिनट लेट द्वार पर पहुंचेगा; वह कहता है कि मुझे भीतर जाने दो। न आने दिया जाए भीतर तो उसे दुख हो जाता है, उसे कठिनाई हो जाती है। और उसे कठिनाई होनी बिलकुल स्वाभाविक है। अगर मैं उसके घर में ठहरा हूं तो उसे कठिनाई होनी स्वाभाविक है। वह एक भाव ले कर आता है कि वह मेरे बहुत निकट है। और है भी मेरे निकट। मगर अहंकार बीच में सिर उठा सकता है।
उस अहंकार को जाने देना। तुम समझना कि अगर वह तुम्हें रोक रहा है तो मेरे कारण रोक रहा होगा। अगर कोई अड़चन खड़ी की जा रही है, तो उसे स्वीकार कर लेना। और जैसे—जैसे स्वीकार भाव आएगा, वैसे—वैसे ही तुम इस बढ़ते परिवार के हिस्से आसानी से बन जाओगे। तब मैं अकेला था; अब मेरा बड़ा परिवार है। तब मैं अकेला था; मेरे और तुम्हारे बीच कोई भी नहीं था। अब मेरे तुम्हारे बीच एक बड़ा परिवार है। इस परिवार को ध्यान में रखना जरूरी है। और मैं चाहता हूं कि यह परिवार हो, क्योंकि इसके बिना काम नहीं हो सकता।
अब समझो, एक ही सांझ को मेरे पास कोई जर्मन होता है, कोई फ्रेंच होता है, कोई इटालियन होता है, कोई बेल्जीयन होता है, कोई जापानी होता है, कोई रशियन होता है—इन सबके अनुवाद करने वाले लोगों की व्यवस्था करनी होती है कि इनका अनुवाद हो; नहीं तो अनुवाद न हो तो ये मुझसे बात ही नहीं कर पाएंगे, मैं इनसे कुछ कह नहीं पाऊंगा।
जब मैं तुमसे सीधे बात करता हूं तो एक बात है। मगर एक अनुवादक बीच में खड़ा हो जाता है। अब उसको तुम दो ढंग से देख सकते हो। या तो तुम देख सकते हो कि यह आदमी बीच में क्यों, यह बाधा डाल रहा है! हम सीधी बात क्यों नहीं करें? मगर सीधी बात करें कैसे? यह आदमी बाधा नहीं डाल रहा है। यह आदमी सहयोगी बनने की कोशिश कर रहा है, हालांकि बीच में खड़ा तो हो गया। तुम अगर सीधे मुझसे बात करते तो एक बात होती; जो मैं कहूंगा, उसका यह अनुवाद करेगा। अनुवाद में कुछ तो भूल—चूक होने वाली है। अनुवाद अनुवाद ही होगा। मेरा बल तो उसमें से खो जाएगा। मेरी मौजूदगी उसमें से कम हो जाएगी। फिर यह कुछ अपनी जोड़ेगा, कुछ घटा भी देगा, क्योंकि आखिर इसकी भी अपनी सीमाएं हैं। मगर फिर भी ध्यान रखना कि यह सहयोग के लिए ही है।
वह दरवाजे पर जो खड़ा है, आफिस में जो बैठा है—वे सब सहयोग के लिए ही हैं। जितना बड़ा काम होगा...और यह काम बड़ा होने वाला है। ये गैरिक वस्त्र सारी पृथ्वी के कोने—कोने तक फैलने वाले हैं। पहली दफा एक अंतर्राष्ट्रीय परिवार पैदा हो रहा है; ऐसा कभी नहीं हुआ था। तो जितना बड़ा परिवार होगा, उतनी जिम्मेदारी हो जाती है। तुम्हारी भी "चितरंजन' जिम्मेवारी हो जाती है। इसको सहयोग दो। अहंकार को बीच से हटाओ।
अच्छा हुआ। अहंकार थोड़ा गला। आंख थोड़ी बदली।
झुकाई कदमों से जब से तेरे खुदी मैंने
तो पाई जिंदगी में एक नई खुशी मैंने।
वह जो खुदी है, अहंकार है, वह जरा झुक जाए!
झुकाई कदमों में जब से तेरे खुदी मैंने
तो पाई जिंदगी में एक नई खुशी मैंने
न लुत्फ जुर्रते इंकार में रहा बाकी
तो फिर से सीखे हैं आदाबे बंदगी मैंने।
वह जो इनकार करने में, न कहने में...। अहंकार हमेशा न कहने में मजा पाता है। अहंकार हां कहना ही नहीं चाहता। अहंकार नहीं कहता है; नहीं पर ही जीता है। नहीं भोजन है अहंकार का। हां कहा और अहंकार मरा।
"हां' जहर है अहंकार के लिए। "नहीं' अमृत है अहंकार के लिए।
न लुत्फ जुर्रते इंकार में रहा बाकी
तो फिर से सीखे हैं आदाबे बंदगी मैंने।
मुझे बहुत लोगों ने बहुत ढंग से प्रेम किया है। उनको बार—बार बंदगी के नये—नये ढंग सीखने होंगे, क्योंकि मैं बदलता जाता हूं, व्यवस्था बदलती जाती है। अगर उन्होंने जिद्द की कि हम पुराने ढंग से ही बंदगी करेंगे, तो उनका ही नुकसान है। उन्हें बंदगी के नये आदाब, नई शैली सीखनी पड़ेगी।
गमे जहां का असर दिल पे अब नहीं होता
बदल दिया है अब एहसासे जिंदगी मैंने
दिखाई देते थे चारों तरफ मुझे अगयार
रखी थी मुफ्त में ले सबसे दुश्मनी मैंने।
सब तरफ दुश्मन दिखाई पड़ते थे।
दिखाई देते थे चारों तरफ मुझे अगयार
...पराए। "चितरंजन' ऐसे ही देख रहे होंगे; सब दुश्मन हैं, जो बाधा डाल रहे हैं मेरे और उनके बीच में।
दिखाई देते थे चारों तरफ मुझे अगयार
रखी थी मुफ्त में ले सबसे दुश्मनी मैंने।
वह मेरे प्रेम की उन पर वर्षा हुई, वे बह गए, धुल गए, नहा गए। तब आंखें खोल कर उन्होंने देखा: यहां कोई दुश्मन नहीं है। कुछ अपूर्व घटा। उसी अपूर्व के कारण दृष्टि भी बदली।
तेरी नजर से जो देखा तो सब हुए अपने
जहां में चारों तरफ पाई दोस्ती मैंने।
मेरी नजर से देखो। मेरी नजर तुम्हारी नजर बने!
तेरी नजर से जो देखा तो सब हुए अपने
जहां में चारों तरफ पाई दोस्ती मैंने
हंसी—खुशी में गमे इश्क को न भूला मैं
गमे जहां को सहा है हंसी—खुशी मैंने
ये पा के वादा कि अपनाओगे मुझे आखिर
तुम्हारे दर्द में होने न दी कमी मैंने।
यह वादा मेरी तरफ से है कि तुम पा लोगे। तुम वह पा लोगे जो मैंने पाया है। लेकिन बीच—बीच में छोटी—छोटी बाधाएं मत खड़ी करो। उन्हें जाने दो। उन्हें विदा करो। तुम यहां मिटो, तो ही तुम मेरे साथ हो पाओगे। तुम्हारा मिटना ही मेरे साथ होने का एकमात्र उपाय है।

तीसरा प्रश्न: मैं आपके पास आया तो मेरी आंखें खुलीं, लेकिन मुझे लोग तब से अंधा कहने लगे हैं। मैं धीरे—धीरे जाग रहा हूं और लोग कहते हैं कि मैं गुमराह हो गया हूं। जो कभी मेरी सलाह मांगते थे, वे ही अब मुझे बिना मांगे सलाह देने चले आते हैं। मैं क्या करूं?

तुम और अंधे हो जाओ। तुम और गुमराह हो जाओ। तुम इतने गुमराह हो जाओ कि तुम्हें यह भी याद न रहे कि कौन क्या कह रहा है! तुम इतने अंधे हो जाओ कि तुम्हें ये और लोग दिखाई भी न पड़ें। तुम इतने बहरे हो जाओ कि इनकी सलाह भी तुम्हें सुनाई न पड़े। अब जब हुए ही हो पागल तो अब कंजूसी क्या करनी! लोग हंसेंगे, हंसने दो, तुम भी हंसो।
अगर तुम हंस दिए अहवाले—दिल पर, क्या ताज्जुब है
कि मैं खुद भी बमुश्किल जब्त करता हूं हंसी अपनी
अगर तुम हंस दिए अहवाले—दिल पर, क्या ताज्जुब है!
अगर लोग हंसते हैं तो कुछ आश्चर्य मत करना। कभी—कभी खुद भी हंसना। कभी—कभी खुद भी देखना: क्या से क्या हो गया! क्या थे और क्या हो गए!
भले—चंगे आदमी थे; पागल हो गए, संन्यासी हो गए। सुध—बुध वाले आदमी थे। तभी तो लोग तुमसे सलाह मांगने आते रहे होंगे। ज्ञानी समझते होंगे। अज्ञानी हो गए। अब लोग, वे ही लोग सलाह देने चले आते हैं।
कि मैं खुद भी बमुश्किल जब्त करता हूं हंसी अपनी
हुई हैं बारिशें संगे मलामत की बहुत लेकिन
जहे वजए—जुनूं कायम है शौरीदासरी अपनी।
पत्थर तो बहुत गिरेंगे तुम्हारे सिरों पर।
हुई हैं बारिशें संगे मलामत की बहुत लेकिन
मेरे साथ जुड़े हो तो ये सस्ता सौदा नहीं; पत्थर तो बहुत पड़ेंगे ही सिर पर। लेकिन अगर तुमने मेरे साथ जुड़ने का आनंद समझा तो तुम उन पत्थरों को भी आनंद से सह लोगे। तुम्हें वे गालियां भी फूल जैसी हो जाएंगी। वे कांटे भी तुम्हें चुभेंगे नहीं। पीड़ा में भी एक माधुर्य होगा।
हुई हैं बारिशें संगे मलामत की बहुत लेकिन
जगह—जगह पत्थर की वर्षा होगी, जगह—जगह गालियां पड़ेंगी, जगह—जगह लोग अपमान की बातें कहेंगे।
जहे बजए—जुनूं कायम है शौरीदासरी अपनी
लेकिन तुम अपना पागलपन कायम रखना। तुम अपना दीवानापन कायम रखना।
तुम पूछते हो: "मैं क्या करूं?'
मैं कहता हूं: दीवानापन मजबूत करो। ऐसा मजबूत करो कि सारी दुनिया भी उसे मिटा न पाए।
जहां वालों का क्या है वो तो दीवाना समझते हैं
मुझे कुछ अक्ल से अपने भी बेगाना समझते हैं
अजब अंदाज से मेरे सकूते लब पे हंसते हैं
जो सच्ची बात कहता हूं तो अफसाना समझते हैं
बहारे जावेदां इसमें जमाले दो जहां इसमें
मेरी दुनिया को फिर भी लोग दीवाना समझते हैं।
बहारे जावेदां इसमें...
तुम एक ऐसी बहार से भरते जा रहे, एक ऐसे बसंत से, जो शाश्वत है।
बहारे जावेदां इसमें...
एक ऐसी बहार तुम्हें दे रहा हूं जो कभी मिटेगी नहीं; जिसमें फूल खिलते हैं तो मुर्झाने को नहीं; जिसमें पत्ते आते हैं तो गिर जाने को नहीं।
बहारे जावेदां इसमें जमाले दो जहां इसमें
और दोनों दुनियाओं का—इस लोक का और परलोक का—सारा रस इसमें है, सारी ज्योति इसमें हैं, सारा प्राण इसमें है।
मेरी दुनिया को फिर भी लोग दीवाना समझते हैं
लेकिन फिर भी लोग तो तुम्हें पागल ही समझेंगे। लोग तुम्हें पागल इसलिए समझते हैं कि लोग अपने को पागल नहीं समझना चाहते। और कोई कारण नहीं है। क्योंकि दो बातों में एक की हो सकती है। या तो तुम पागल हो, या फिर वे पागल हैं। कौन अपने को पागल समझना चाहता है। फिर उनकी भीड़ है, उनकी बहुसंख्या है। अगर मत लिया जाएगा तो वे ही निर्णायक होंगे, तुम तो पागल ही होओगे। वे अपनी रक्षा कर रहे हैं।
सच तो यह है, मेरा निरीक्षण यही है कि लोग जब भी तुम्हें पागल कहें तो उसका कारण इतना ही होता है कि उन्हें भी आकर्षण पैदा हो रहा है। वे जब तुम्हें सलाह देने आने लगें तो समझना कि उनमें रस जग रहा है, उनमें जिज्ञासा आ रही है। वे घबड़ा रहे हैं। वे इंतजाम कर रहे हैं, अपनी व्यवस्था कर रहे हैं कि तुम गलत हो। क्योंकि उन्हें डर पैदा हो रहा है कि कहीं तुम ठीक न होओ। नहीं फिर हमारा क्या होगा!
तुम्हारे ठीक होने की बात उनके लिए खतरे की सूचना है। वे सब आयोजन करेंगे तुम्हें गलत सिद्ध करने का। उन्हें करने दो। उन्हें बेचारों को अपनी सुरक्षा करने दो; इसका हक उन्हें है। कोई अपनी सुरक्षा करना चाहे, करे। जब वे तुम्हें दीवाना कहते हैं तो असल में वे यह कह रहे हैं कि हम बुद्धिमान हैं; इतना सीधा कहते नहीं क्योंकि अहंकार इस तरह की सीधी भाषा नहीं बोलता। अहंकार कहता है: तुम पागल हो। मगर अहंकार कहना यह चाहता था कि हम होशियार हैं। बस इतना ही कहना चाहता था; तुम्हारे पागल होने से कुछ प्रयोजन नहीं। तुम से क्या लेना—देना। तुम पागल भी हो जाओ तो क्या लेना—देना है।
तुमने खयाल किया, जब कोई आदमी असली में पागल हो जाता है, तब उसे कोई सलाह देने नहीं जाता; क्योंकि उसको क्या सलाह देनी, वह तो पागल है ही! लेकिन जब कोई संन्यस्त हो जाए या धार्मिक हो जाए या परमात्मा की मस्ती में लग जाए, या मीरा जैसा लोकलाज खो दे—तब लोग सलाह देते हैं। क्योंकि वे जानते हैं भीतर से कि पागल तो नहीं है। सच तो यह है कि उनको शक होने लगता है अपनी बुद्धिमानी पर कि कहीं ऐसा तो नहीं, यह आदमी रस पा रहा और हम चूके जा रहे हैं! इसकी आंखों में कुछ झलक दिखाई पड़ती है—तो या तो पागलपन की होनी चाहिए, या किसी अनुभव की। या तो परमात्मा की थोड़ी—थोड़ी किरण इसमें उतरने लगी है और या फिर ये सज्जन अपना दिमाग खो बैठे। दो में से एक ही बात हो सकती है।
इस दुनिया में या तो पागल हंसते हैं या परमहंस हंसते हैं; बाकी तो सब रोते हैं। जब कोई आदमी हंसता है तो शक पैदा होता है यह कि परमहंस या पागल। अब किसी को परमहंस मानने में बड़ी अड़चन होती है। लोग बड़ी मुश्किल से मानते हैं। सदियां हो जाती हैं, मर जाता है आदमी, तब कहीं मानते हैं। मानते—मानते वक्त लग जाता है, तब मानते हैं। एकदम से नहीं मान लेते, क्योंकि दूसरे को परमहंस मानना, मतलब फिर झुकाओ इसके चरणों में अपना सिर। पागल मानते हैं।
हर परमहंस पहले पागल माना जाता है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हर पागल परमहंस है। मगर हर परमहंस पागल माना जाता है।
बहारे जावेदां इसमें जमाले दो जहां इसमें
मेरी दुनिया को फिर भी लोग दीवाना समझते हैं
शऊरे फिक्र की मैं हर बुलंदी से गुजर आया
मुझे ये अकल वाले फिर भी दीवाना समझते हैं।
तुम्हें मैं, बुद्धि जहां तक ले जा सकती है, वहां तक ले जा रहा हूं और उसके पार भी। मेरी बातें, बुद्धि की जो भी संभावना हो सकती है, उसके विपरीत नहीं है, उसके आगे की हैं। मैं बुद्धि का विरोधी नहीं हूं; मैं बुद्धि का पूरा उपयोग करना चाहता हूं। बुद्धि भी परमात्मा की दी हुई है; उसका पूरा उपयोग करो। बस उसमें अटक मत जाना। उसके पार भी बहुत कुछ है। बुद्धि के ऊपर भी बहुत कुछ है। मगर बुद्धि के ऊपर भी जा सकोगे तभी, जब बुद्धि से जाओगे। बुद्धि से जाओ। बुद्धि का उपयोग कर लो। बनाओ सीढ़ी बुद्धि की। मगर बुद्धि को अंत मत समझ लेना। अस्तित्व बुद्धि से बहुत बड़ा है। बुद्धि उसका छोटा सा अंश है।
शऊरे फिक्र की मैं हर बुलंदी से गुजर आया
मुझे ये अकल वाले फिर भी दीवाना समझते हैं
कभी का शामिले शोला हूं अहले महफिल क्यों
हयाते नौ को मेरी मर्गे परवाना समझते हैं
हुआ मुझको अबूरे वुसअते अक्लो खिरद हासिल
मगर सब मुझको दीवाने का दीवाना समझते हैं।
तुम समाधि भी पा लोगे तो भी लोग तुम्हें पागल ही समझेंगे, दीवाना ही समझेंगे। तुम बुद्धि की आखिरी ऊंचाई के पार निकल जाओगे...।
हुआ मुझको अबूरे वुसअते अक्लो खिरद हासिल
तुम्हें बुद्धि के पार जो विराट आकाश है—ऊंचाइयों का, विशालताओं का—वह भी मिल जाए, तो भी लोग तो तुम्हें पागल ही समझेंगे।
मगर सब मुझको दीवाने का दीवाना समझते हैं
निगाहे मस्ते साकी ने किया है बेनियाजे मय
मुझे मयकश अभी पाबंदे पैमाना समझते हैं
अभी तक देख ले थामे हुए हैं होश का दामन
इशारों को तेरे हम पीरे मयखाना समझते हैं।
यह तो मधुशाला है। यहां तो शराब ढाली जा रही है। ये शब्द नहीं हैं, जो मैं तुमसे बोल रहा हूं; यह शराब है। और यह सिद्धांत नहीं है जो मैं तुम्हें सिखा रहा हूं; यह सत्य है।
मैं तुम्हें ज्ञानी बनाने की कोशिश नहीं कर रहा हूं। तुम्हारे साथ मैं ऐसा व्यवहार नहीं कर रहा हूं जैसा शिक्षक विद्यार्थी के साथ करता है। मैं तुम्हारे साथ वह व्यवहार कर रहा हूं जो गुरु शिष्य के साथ करता है।
फर्क क्या है?
शिक्षक समझाता है, सूचनाएं देता है; विद्यार्थी सूचनाएं इकट्ठी करता है, परीक्षा देता है। गुरु सूचनाएं नहीं देता; अपने हृदय को उंड़ेलता है। शिष्य अपने पात्र को खोलता है और भरता है। और परीक्षा किसी विश्वविद्यालय में नहीं होती। परीक्षा तो परमात्मा के सामने है फिर। परीक्षा तो फिर पूरा जीवन है।
अगर तुम मुझसे पूछते हो तो मैं कहूंगा: अच्छा हो रहा है कि लोग तुम्हें दीवाना समझने लगे! चलो कुछ तो हुआ! शुरुआत तो हुई! कदम ठीक रास्ते पर पड़ने लगे। जब लड़खड़ाने लगो तो समझना कि कदम ठीक रास्ते पर पड़ने लगे। जब डोलने लगो तो समझना कि कदम ठीक रास्ते पर पड़ने लगे।

आखिरी प्रश्न: आपने कहा कि मीरा कृष्ण के समय में ललिता नामक गोपी रह चुकी थी। "ललिता' से मीरा तक की यात्रा में साढ़े चार हजार वर्ष का समय लग गया। भगवान, क्या प्रेम का मार्ग इतना ज्यादा कठिन और इतना ज्यादा लंबा है?

तो कठिन है, न लंबा है। और साढ़े चार हजार साल कोई लंबाई नहीं। साढ़े चार हजार साल कुछ भी नहीं है। इस अस्तित्व की अनंतता को देखो, यहां साढ़े चार हजार साल में क्या मतलब होता है! एक क्षण जैसे!
हिंदू शास्त्र एक सृष्टि से एक प्रलय तक को ब्रह्मा का एक दिन कहते हैं—चौबीस घंटे। अगर चौबीस घंटे का ऐसा हिसाब रखो तो कृष्ण और ललिता के बीच क्या फर्क पड़ा? आंख की पलक भी नहीं झपी! पल नहीं बीता।
लेकिन तुम्हारी बात मेरी समझ में आती है। साढ़े चार हजार साल तुम्हें बहुत लगते हैं। सत्तर साल की उम्र के हिसाब से सोचते हो। तुम्हारा पैमाना छोटा है, इसलिए बहुत बड़े लगते हैं। अस्तित्व का पैमाना बहुत बड़ा है। कुछ भी नहीं हुआ। साढ़े चार हजार साल में भी मिल जाए परमात्मा तो बिना चले मिल गया; बिना उठे मिल गया; बैठे—बैठे मिल गया।
खयाल रखना कि कितना ही चलने के बाद परमात्मा मिले तो भी जल्दी मिला। क्योंकि अनंत है यह यात्रा और कठिनाई कुछ खास नहीं है, कठिनाई छोटी सी है। बड़ी छोटी सी!
ललिता में कुछ अहंकार रह गया होगा—साढ़े चार हजार साल लग गए गलाने में। नहीं तो ललिता उसी समय राधा बन जाती। थोड़ी अटक रह गई होगी। थोड़ी दूरी रह गई होगी। थोड़ा फासला रह गया होगा। साढ़े चार हजार साल लग गए—उसी फासले को काटने—काटने—काटने में। मगर फिर भी कोई ज्यादा देरी नहीं हो गई। तुम में से भी बहुत कृष्ण के समय में रहे होंगे। ऐसा थोड़े ही है कि तुम नये हो कुछ। यहां नया तो कोई भी नहीं। यहां सब बड़े—बड़े प्राचीन लोग बैठे हैं।
जब मैं तुम्हारे पीछे झांकता हूं, तुमसे कहता नहीं, क्योंकि तुम घबड़ाओगे। जब मैं तुम्हारी पूरी कथा को देखता हूं तो तुम कितने लंबे हो, कितने पुराने, कितना जीए हो! और फिर भी अभी वहीं के वहीं! अभी ललिता भी नहीं बने, अभी मीरा बनना तो दूर। ललिता तो बनो। फिर किसी दिन मीरा भी बन सकते हो।
और सवाल यह नहीं है कि कितनी देर लगी यह ललिता और मीरा में। एक क्षण में हो सकती है बात। सवाल इतना ही है कि तुम कितने जल्दी अपने अहंकार को खोने को तैयार हो।
और अहंकार बड़ा कुशल है तर्क देने में, समझाने में। वह कहता है: अभी इतनी जल्दी न करो, थोड़ा सोच—समझ से काम लो।
अब देखते हैं "चितरंजन' की तैयारी हो रही है संन्यास की—मगर थोड़ा सोच—समझ से काम ले रहे हैं। थोड़ा रोक रहा है। ललिता बनने का मौका आ रहा है, चूके जा रहे हैं। फिर मत कहना। फिर पीछे मत कहना।
ललिता को भी बहुत मौके आए होंगे उस समय, चूकती गई होगी। कभी छोटी—छोटी बातों ने अड़चन डाल दी होगी। कभी यही बात अड़चन की हो गई होगी कि राधा कृष्ण के इतने करीब क्यों, मैं इतने करीब क्यों नहीं? कभी यही बात अड़चन बन गई होगी। कभी यही बात अड़चन बन गई होगी कि कृष्ण राधा का हाथ जिस मस्ती से पकड़ कर नाचते हैं, मेरे हाथ में जब हाथ देते हैं तो थोड़ा ठंडा मालूम पड़ता है; उतनी गर्मी नहीं मालूम पड़ती।
मगर कृष्ण के हाथ में गर्मी उतनी ही होती है। वह हाथ न ठंडा होता है न गरम। वह हाथ एक जैसा है—सदा एकरस। वहां प्रेम एक सा है। तुम जितना ले लेते हो उतना मिलता है। ललिता उतना नहीं ले पाई होगी। उतनी जगह खाली नहीं होगी, हाथ ठंडा लगेगा। हाथ ठंडा लगेगा तो ललिता और अकड़ जाएगी। और उसी अकड़ के कारण हाथ और ठंडा होता जाएगा। ऐसी कोई छोटी—मोटी बात अटक गई होगी।
छोटी ही बातें अटका लेती हैं। परमात्मा और तुम्हारे बीच बड़ी बातें हैं भी क्या! हो भी क्या सकती है बड़ी बात! आदमी छोटा है; उसकी बातें सब छोटी हैं। परमात्मा बड़ा है; उसकी सब बातें बड़ी हैं। परमात्मा बाधा नहीं डाल रहा है; इसलिए कोई बड़ी बात बाधा नहीं डाल सकती। छोटी—छोटी बातें हैं। बड़ी छोटी—छोटी बातें हैं।

रहे फना पे कदम अब बढ़ा रहा हूं मैं
तमाम उम्र की बिगड़ी बना रहा हूं मैं
रविस रविस को सजाया था जिस गुलिस्तां की
उसी के शाखो—सजर को जला रहा हूं मैं
जो हार बनाया था हाथों से अपने खिस्त बा खिस्त
उसी को खाक में अक्सर मिला रहा हूं मैं
बड़े ही शौक से जो आशियां बनाया था
उसे खुद अपने ही हाथों जला रहा हूं मैं
दुआएं मेरी चली हैं कबूल होने को
कि खुद—ब—खुद तेरे कदमों में आ रहा हूं मैं।

अहंकार की अड़चन यही है कि जो घर ईंट—ईंट रख कर बनाया था, वह खुद ही गिराना पड़ता है।
रहे फना पे कदम अब बढ़ा रहा हूं मैं
रहे फना पर—मिटने के मार्ग पर।
आत्मघात है संन्यास। आत्मघात है भक्ति।

रहे फना पे कदम अब बढ़ा रहा हूं मैं
तमाम उम्र की बिगड़ी बना रहा हूं मैं।

और मजा यह है कि अहंकार को बनाने में जितना समय गया, वह उम्र को बिगाड़ने में ही गया। उसको, अहंकार को बिगाड़ो, तो बिगड़ी बनती है।
रविस रविस को सजाया था जिस गुलिस्तां की
जिस बगीचे में एक—एक पौधा लगाया, एक—एक फूल सम्हाला था—उसी के शाखो शजर को जला रहा हूं मैं।
फिर घड़ी आती है, तब उसी के एक—एक पत्ते, एक—एक फूल, एक—एक वृक्ष, एक—एक शाखा को जला देना पड़ता है। अपने हाथों! यही अड़चन है। अहंकार हमने ही बनाया, फिर मिटाते वक्त अड़चन होती है।
जो हार बनाया था हाथों से अपने खिस्त—बा—खिस्त
ईंट पर ईंट रख कर...फूल पर फूल रख कर जो हार बनाया था...
उसी को खाक में अक्सर मिला रहा हूं मैं
बड़े ही शौक से जो आशियां बनाया था
वह जो घर अहंकार का बनाया था, नीड़! उसे खुद अपने ही हाथों जला रहा हूं मैं।
यह करना ही होता है। यही साधना है। बस यही! और यह जिस दिन पूरी हो जाए, उसी दिन सिद्धि उतर आती है।
दुआएं मेरी चली हैं कबूल होने को
कि खुद—ब—खुद तेरे कदमों में आ रहा हूं मैं।

आज इतना ही।