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रविवार, 17 जुलाई 2016

पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--10)



पद घुंघरू बांध—(प्रवचन—दसवां) 
फूल खिलता है—अपनी निजता से
प्रश्न—सार
1—परंपरा में भी फूल खिलते हैं और परंपरा के कारण भी फूल खिलते हैं। व्यवस्था या परंपरा तो मिटेगी नहीं; इसलिए उसमें कभी—कभी जान डालनी पड़ती है।...?
2—मेरा मन न धन में लगता है न यश में लगता है, लेकिन मैं यह भी नहीं जानता हूं कि मेरा मन कहां लगेगा?...
3—मैं जो पा रहा हूं, उसे अपने प्रियजनों को भी देना चाहता हूं, लेकिन कोई लेने को तैयार नहीं।...?
4—आप जैसे महान दाता के होते हुए भी मेरा भिक्षापात्र क्यों नहीं भरता?...


पहला प्रश्न: परंपरा में भी फूल खिले हैं और परंपरा के कारण भी फूल खिलते हैं। व्यवस्था कहें या परंपरा, वह तो मिटेगी नहीं; उसी में कभी—कभी जान डालनी पड़ती है। और तुलसीदास ने यही किया था। महाजन जो कुछ करते हैं, उसी से परंपरा आरंभ हो जाती है।...?
रंपरा में न तो कभी फूल खिलते हैं और न कभी खिल सकते हैं। परंपरा से किसी चीज का कभी कोई जन्म नहीं होता। यद्यपि जब फूल खिलते हैं तो परंपरा बनती है। इस भेद को ठीक से समझ लेना। जब भी फूल खिलेगा तो परंपरा बनेगी। जब भी कोई चलेगा तो पग—चिह्न बनते हैं। जब भी कोई बोलेगा तो शास्त्र बनेंगे। जब भी कोई सत्य का अनुभव करेगा तो संघ बनेगा। जब कहीं परमात्मा घटेगा तो लोग मधुमक्खियों की तरह उस शहद की तरफ दौड़ेंगे।
लेकिन परंपरा से सत्य का जन्म नहीं होता। परंपरा तो मुर्दा लकीर है। जब कोई जन्मता है तो फिर उसके बाद तो मृत्यु घटती है जरूर, लाश पड़ी रह जाती है: लेकिन लाशों से किसी का जन्म नहीं होता। जन्म तो मृत्यु में बदल जाता है। इसे स्मरण रखना।
बुद्ध पैदा हुए। जो कहा, वह अपूर्व था। सुन कर लोग मोहित हुए। सुन कर लोग आंदोलित हुए। सुन कर लोग प्रभावित हुए। बुद्ध को देख कर साथ चलने की आकांक्षा जगी, अभीप्सा जगी; लोग साथ चले। बुद्ध विदा हो गए। जो भीड़ चली थी; वह चलती ही रही। उस भीड़ के बाद और भीड़, और भीड़। क्योंकि जो बुद्ध के पास आए थे उनके बच्चे हुए, बच्चों के बच्चे हुए। परंपरा बनी। लेकिन जो लोग बुद्ध के पास आए थे वे बुद्ध को देख कर आए थे। बुद्ध के जादू ने उन्हें खींचा था। वह जो सत्य जगा था बुद्ध में, उसने उन्हें आकर्षित किया था। वह आंखों की लपट बुद्ध की उन्हें बुला लाई थी, लेकिन उनके बेटे होंगे, बेटियां होंगी, वे इसलिए मानेंगे कि बाप मानते थे, मां मानती थी। फिर बेटों के बेटे होंगे, वे इसलिए मानेंगे कि परिवार में माना जाता रहा है। अब वह बात नहीं रही। अब इस परंपरा में ये जो जड़ लकीरें छूटी रह गई हैं, इनमें कभी फूल नहीं खिलेंगे। और जब भी कभी कोई फूल खिलेगा तो यह परंपरा उसका विरोध करेगी।
कई बातें समझ लेने जैसी हैं।
पहली बात: जब किसी को सत्य का अनुभव होता है, शब्दों में कहते ही नब्बे प्रतिशत तो खो जाता है, दस प्रतिशत मुश्किल से बच पाता है। शब्द में कहते ही सत्य खोने लगता है। सत्य की छाया ही पड़ती है शब्द में। ऐसा ही जैसे सुबह का सूरज निकला और किसी ने एक तस्वीर बनाई—तस्वीर प्रतीक—मात्र है। तस्वीर का सूरज सूरज नहीं है; सिर्फ सूरज के लिए एक अंकन है। जैसे तुमने संगीत सुना और फिर संगीत को लिपिबद्ध करके कागज पर लिख लिया—वही राग, वही गीत—लेकिन कागज पर जो लिपिबद्ध संगीत है, वह संगीत नहीं है। उससे तुम नाचोगे नहीं।
ऐसा समझो कि कोई संगीतज्ञ बांसुरी बजाता था और सांप नाचने लगा। अब इस सांप के सामने तुम रख दो लिपिबद्ध कागज पर संगीत, इसे तुम धोखा न दे पाओगे। सिर्फ आदमियों को धोखा हो जाए, यह सांप धोखा नहीं खाएगा। यह सिर नहीं हिलाएगा। इस पर कोई परिणाम नहीं होगा तुम्हारे लिपिबद्ध करने से। और मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि लिपिबद्ध करने का कोई उपयोग नहीं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सुबह का सूरज निकले तो तस्वीर मत उतारना। लेकिन तस्वीर को सुबह का सूरज मत समझना।
तो जब कोई जागता है, जानता है, स्वभावतः शब्दों में कहेगा, और तो कहने का कोई उपाय नहीं। शब्द में कहते ही बात तस्वीर बन गई।
मैंने तुमसे कुछ कहा जब मैं कह रहा था, तब वह सत्य था; तुम तक पहुंचते—पहुंचते खो गया; बस एक तस्वीर रह गई, जिसमें अब कोई प्राण नहीं। लेकिन अगर तुमने मुझे शांति से सुना है तो शायद शब्द में लिपटी हुई मेरी अनुभूति थोड़ी सी तुम तक पहुंच जाए। अगर सहानुभूति से सुना है तो शायद थोड़ी सी लपट तुम तक पहुंच जाए। लेकिन तुम अपने बच्चों को कैसे यह लपट दे सकोगे? यह तो, पहली बात, तुम्हारे पास ही नहीं है। फिर ये बच्चे अपने बच्चों को कैसे दे सकेंगे? यह कठिन होता जाएगा। यह प्रतिपल कठिन होता जाता है।
पहले तो सत्य का अनुभव करने वाला जब बोलता है, तभी बहुत कुछ खो जाता है; फिर सुनने वाला जब सुनता है, तब बहुत कुछ खो जाता है। क्योंकि तुम सुनोगे, अपना मिला दोगे, कुछ घटा दोगे। कुछ का कुछ सुनोगे।
जिन मित्र ने प्रश्न किया है, उन्होंने भी कुछ का कुछ सुन लिया है। उन्होंने भी अपने पक्षपात की बेचैनी से पूछा है। तुलसीदास से लगाव होगा, जैसा कि सामान्यतया हिंदुओं का है। तो बेचैनी हुई होगी चित्त में। उस बेचैनी में जो भी उन्होंने सुना, चूक गए। उस बेचैनी में तुलसीदास महत्वपूर्ण हो गए; मैं जो कह रहा था, वह गैर—महत्वपूर्ण हो गया। उस बेचैनी में पुराना हिंदू—मन विवाद करने लगा।
संस्कार पुराने हैं; अतीत से आते हैं। मैं जो कह रहा हूं, बिलकुल नया है। नया जब भी अतीत से आती हुई धारा के विपरीत पड़ता है तो बहुत ही हिम्मतवर आदमी नये के साथ हो पाता है। कमजोर आदमी पुराने के साथ होगा, क्योंकि पुराने की साख है, प्रतिष्ठा है। और फिर कितने जन्मों से सुना है! फिर यह पूरा जीवन उसी से भरा है। पांडित्य बाधा बना होगा।
तुम समझ नहीं पाए कि मैंने क्या कहा। तुम समझ पाओगे भी नहीं तब तक जब तक तुम्हारे पक्षपात हैं। तुलसीदास से तुम्हारा कोई मिलना नहीं हुआ। मेरे सामने तुम मौजूद हो। तुलसीदास महाजन थे कि नहीं, यह सिर्फ तुम्हारी धारणा होगी। थे कि नहीं, इस संबंध में तुम निर्णय नहीं ले सकते। तुम्हें अभी सत्य का अनुभव भी नहीं हुआ है कि तुम तौल कर सको कि तुलसीदास को सत्य का अनुभव हुआ था या नहीं हुआ था। तुम्हारे पास क्या उपाय है तौल का? तुम्हारे पास कोई उपाय नहीं है।
और मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुलसीदास महाकवि नहीं थे। न तो मीरा वैसी कवि है और न कबीर वैसे कवि हैं। तुलसीदास महाकवि थे। लेकिन मैं कह रहा हूं: मीरा ने जाना और तुलसीदास ने नहीं जाना। कविता में माधुर्य है। उनकी कविता श्रेष्ठतम है; जैसे कालिदास; जैसे शेक्सपियर—उस कोटि की है।
मीरा या कबीर की कविता में क्या है? अपढ़! असंस्कृत! लेकिन फिर भी तुमसे मैं कहना चाहता हूं: कबीर ने जान कर कहा है। तुलसीदास ने मान कर कहा है। तुलसीदास परंपरा के अनुकूल हैं। जो चला आया है, जैसा चला आया है—उसे वैसा ही स्वीकार किया है। उसके परिपोषक हैं।
फर्क समझना।
जब जीसस ने कुछ कहा, जब भी सत्य कहा जाएगा तो नई परंपरा बनती है। तुलसीदास ने किसी नई परंपरा को जन्म नहीं दिया; पुरानी परंपरा को ही मजबूत किया। कबीर से नई परंपरा बनी। नानक से नई परंपरा बनी। बुद्ध से नई परंपरा बनेगी। जब भी सत्य का आविर्भाव होगा तो नई परंपरा बनेगी। हालांकि मैं तुम से कह रहा हूं यह परंपरा भी उतनी ही झूठी हो जाएगी जितनी पुरानी परंपरा थी; क्योंकि यह भी जब पुरानी होगी तो झूठी हो जाएगी। मैं तुमसे जो कह रहा हूं, इसकी भी परंपरा बन जाएगी; लेकिन परंपरा बनते—बनते झूठी हो जाएगी।
तुम्हारी अड़चन यह है कि तुम्हें ऐसा लगता है कि जो मैं कह रहा हूं अगर यही किताब में लिखा गया, बिलकुल यही लिखा गया, तो फिर कैसे झूठा हो जाएगा। फिर भी झूठा हो जाएगा। क्योंकि सत्य अनुभव में होता है; शब्द में नहीं होता। सत्य कहने वाले में होता है; कही गई बात में नहीं होता। मैं तुमसे जो कह रहा हूं, ऐसा का ऐसा तुम जाकर दोहरा देना, बिलकुल ऐसा का ऐसा, इसमें रत्ती भर फर्क मत करना—तो भी सत्य नहीं होगा। क्योंकि सत्य, मैं जो कह रहा था, मेरे अनुभव में जुड़ा था। तुम जो कह रहे हो, सुनी हुई बात कह रहे हो। तुम जो कह रहे हो, उधार बात कह रहे हो।
तुलसीदास उधार हैं, तुलसी में कोई क्रांति नहीं है। लकीर के फकीर हैं। इसलिए लोगों को जंचे। क्योंकि लोग भी लकीर के फकीर हैं। क्रांतिकारी इतने थोड़े ही जंचते हैं। क्रांति तो तिलमिलाती है।
तो दुनिया में दो तरह के महात्मा हैं। एक, जिनसे क्रांति का जन्म होता है; जिनसे सूत्रपात होता है किसी दीये का, कोई ज्योति जलती है। और दूसरे, जो पुराने दीयों की प्रतिष्ठा का सहारा लेकर प्रतिष्ठित होते हैं। दूसरों को मैं झूठे संत कहता हूं। और मैं जरा भी लीपा—पोती नहीं करना चाहता। जैसा देखता हूं वैसा ही तुमसे कहता हूं। तुम जरा अपने पक्षपात एक तरफ रख कर सोचना।
तुलसीदास वर्ण—व्यवस्था के पक्षपाती हैं; बुद्ध नहीं, कबीर नहीं, नानक नहीं। तुलसीदास—सब सड़ा—गला जैसा भी है, पुराना होना चाहिए—तो उसके पक्षपाती हैं। जरा भी काटने की, तोड़ने की हिम्मत नहीं है। पोषक हैं परंपरा के। इसलिए हिंदू—मन को खूब जमे। जमना ही चाहिए। जो तुम्हारा पोषण करे, जो तुम्हारी रक्षा करे, तुम्हारी धारणाओं को बचाए—वह जमना ही चाहिए। कबीर नहीं जमे। कबीर कोई घर न बना सके हिंदुओं में। कबीर की तो छोड़ दो; बुद्ध जैसा आदमी नहीं जमा! बुद्ध जैसा आदमी पृथ्वी पर मुश्किल से कभी होता है; हिंदू उससे भी चूक गए; उसको भी घर के बाहर कर दिया।
मगर यह सदा से होता रहा। यहूदियों ने जीसस से बड़ा बेटा पैदा नहीं किया और उसी को घर के बाहर कर दिया। क्यों? मोटे—छोटे धर्मगुरु भी स्वीकृत हैं; जीसस स्वीकृत नहीं हैं। वही स्वीकृत है जो पुराने का समर्थन करता है। जो पुराने का समर्थन नहीं करता, वह स्वीकृत नहीं हो सकता। वह तुम्हारी जड़ें हिला देता है। वह तुम्हारे पुराने भवनों को गिरा देता है। वह नई सुबह की बात करता है। उस नई सुबह तक थोड़े से हिम्मतवर लोग ही जा सकते हैं।
तो कबीर कहते हैं: जो घर बारै आपना...
तुलसी तुम्हारे पुराने घर में ही लीपा—पोती कर देते हैं, छपाई कर देते हैं, रंग बदल देते हैं, पुराना घर, उसी को साज—संवार देते हैं कि मजे से रहो, यह तो बड़ा प्यारा घर है, यह तो कितने महापुरुषों ने बनाया, इसको छोड़ कर कहां जाते हो!
और कबीर कहते हैं: जो घर बारै आपना, चले हमारे संग।
ये किस घर की बात कर रहे हैं? यह संस्कार, संस्कृति, सभ्यता, धर्मपुरातन का जो घर है, इसे जला दो, तो ही तुम आगे बढ़ पाओगे। अन्यथा यह धूल तुम्हारे दर्पण को घेरे ही रहेगी।
महाजन मैं उसे कहता हूं जो नये को अवतरित करता है; जो जगत में परमात्मा को फिर से लाता है। बाकी नेतागण हैं; महाजन कुछ भी नहीं। उनकी अपनी कलाएं हो सकती हैं, अपनी कुशलताएं हो सकती हैं। उनमें मुझे कोई संदेह नहीं—उनकी कला और कुशलता में। अगर काव्य की तरह सोचो तो तुलसीदास बड़े कवि हैं; लेकिन अगर अनुभव की तरह सोचो तो कोई अनुभव नहीं है, किसी तरह का अनुभव नहीं है। अनुभव होता तो हिंदू दुश्मन हो गए होते। वह कसौटी होती। अनुभव होता तो हिंदुओं ने त्याग दिया होता। वह कसौटी होती। अनुभव होता तो हिंदू दुश्मन की तरह पीछे पड़ गए होते। लेकिन हिंदू ने सिर आंखों पर लिया। वे हिंदू की जड़ता के सहयोगी थे।
जब भी सत्य होगा तो क्रांतिकारी होगा, बगावती होगा, विद्रोही होगा। होगा ही; क्योंकि तुम असत्य में जीते हो। जब भी सत्य आएगा, तो तुमसे टक्कर होगी। सत्य तुमसे टकराएगा। तुमसे टकराएगा, तो ही तुमको रूपांतरित कर सकता है।
इसलिए परंपरा में कभी फूल नहीं खिलते—कभी नहीं खिले। और जो फूल खिले हैं, उनका परंपरा से कोई संबंध नहीं है, वे अपने कारण खिले हैं; वे किसी परंपरा के कारण नहीं खिले हैं। तुम ऐसा नहीं कह सकते कि जीसस यहूदी परंपरा के फूल हैं। नहीं। यहूदी परंपरा तो स्वीकार ही नहीं करती; इसलिए तो ईसाइयत पैदा हुई। ये फूल उस परंपरा के नहीं हैं।
मेरे देखे जब भी कोई आदमी धर्म के अनुभव को उपलब्ध होता है तो वह परमात्मा का नया आविर्भाव है, नई तरंग है। उसका अतीत से कोई संबंध नहीं है। वह अतीत की पुनरुक्ति नहीं है। वह पीछे का दोहरावा नहीं है। हालांकि जिन्होंने भी अतीत में सत्य का अनुभव किया था, वही सत्य उसने अनुभव किया है; फिर भी मैं तुमसे कहता हूं: उनका दोहरावा नहीं है। उनसे कुछ लेना—देना नहीं है। बुद्ध न भी हुए होते तो भी मैं होता और ऐसा ही होता। बुद्ध हुए, तो भी ऐसा ही हूं। मैं बुद्ध की पुनरुक्ति नहीं हूं। कृष्ण न हुए होते तो भी बुद्ध होते। कृष्ण के होने न होने से बुद्ध के होने में कोई फर्क नहीं पड़ता। बुद्ध कोई कृष्ण के ही नये संस्कार नहीं हैं। हालांकि जो कृष्ण ने जाना वही बुद्ध ने जाना। यह भी खयाल में रख लेना। जो कृष्ण ने जाना वही बुद्ध ने जाना। जो बुद्ध ने जाना वही कबीर ने जाना। जो कबीर ने जाना वही मीरा ने जाना। इस जानने में जरा भी फर्क नहीं है। क्योंकि सत्य तो एक है; जब भी कोई जानेगा उसी को जानेगा। सत्य तो समयातीत है; उसका समय से कोई संबंध नहीं है। सत्य न नया है, न पुराना है। सत्य तो शाश्वत है। एक धम्मो सनंतनो! वह तो सदा से वही है। सदा एकरस है। जब भी कोई जानेगा तो उसी को जानेगा। लेकिन न तो बुद्ध ने कृष्ण की आंखों से जाना, न कबीर ने बुद्ध की आंखों से जाना। परंपरा का कोई संबंध नहीं। कबीर ने अपनी आंख खोली; बुद्ध ने अपनी आंख खोली। दोनों ने अपनी आंख खोल कर देखा।
तुलसीदास के पास अपनी आंख नहीं है। तुलसीदास के पास परंपरा की आंख है। परंपरा की आंख यानी अंधापन। परंपरा की आंख ही तब हम उपयोग करते हैं जब हमारे पास अपनी आंख नहीं होती। जब अपनी आंख होती है, तो हम अपनी आंख से देखते हैं; हम क्यों किसी और की आंख से देखें।
तुलसीदास ने ऐसे देखा जैसे हिंदू को देखना चाहिए। कबीर ने ऐसा देखा जैसा कबीर देख सकते हैं। फर्क खयाल में ले लेना। मंसूर ने ऐसे देखा जैसे मंसूर को देखना चाहिए; ऐसा नहीं जैसा मोहम्मद देखते हैं। हालांकि जो देखा वह वही है, जो मोहम्मद ने देखा; लेकिन देखा अपने ढंग से। निजता है, व्यक्तित्व है, अपना हस्ताक्षर है।
कबीर जो कहते हैं; यह इसमें कोई बुद्ध की गवाही नहीं है। ऐसा नहीं है कि बुद्ध ने कहा इसलिए यह ठीक है। कबीर कहते हैं: मैंने देखा, इसलिए ठीक है। मेरे देखे के कारण बुद्ध भी ठीक होते हैं। लेकिन बुद्ध के देखे के कारण मैं ठीक नहीं होता। इस फर्क को खयाल में लेना। यह फर्क बुनियादी है।
कोई कहता है मैं ठीक हूं, क्योंकि ऐसा ही मनुस्मृति में लिखा है। कोई कहता है मैं ठीक हूं, क्योंकि ऐसा ही कुरान में लिखा है। कोई कहता है मैं ठीक हूं, क्योंकि वेदों का भी यही उच्चार है; यह परंपरागत बात है। कोई कहता है मैं ठीक हूं, क्योंकि मैंने जाना। और वेद भी ठीक होने चाहिए क्योंकि जैसा मैंने जाना वैसा वेद में लिखा है। लेकिन अंततः निर्णायक मैं हूं; निर्णायक वेद नहीं हैं। वेद के कारण मैं सही नहीं हूं; मेरे कारण वेद सही हो तो हो; गलत हो जाए तो गलत हो जाए।
मेरे पास कोई आया। मैं नागपुर में मेहमान था, एक बौद्ध भिक्षु, बड़े प्रसिद्ध भिक्षु मुझे मिलने आए। उसके एक दिन पहले ही मैं एक सभा में बुद्ध पर कुछ बोला था। तो उन्होंने कहा: बात तो आपने बड़ी प्यारी कही, लेकिन शास्त्र में कहीं लिखी नहीं है। मैं जिंदगी भर हो गया बौद्ध शास्त्रों का अध्ययन करते, कभी कहीं मैंने यह बात पाई नहीं। बात तो आपने बिलकुल ठीक कही, लेकिन शास्त्र में नहीं लिखी है।
तो मैंने कहा: शास्त्र में लिख लेना। अगर बात ठीक है तो शास्त्र में नहीं लिखे होने से गलती नहीं हो जाती। अगर बात ठीक नहीं है, तो सभी शास्त्रों में लिखी हो तो भी ठीक नहीं हो जाती।
तो मैंने कहा कि तुम्हारी हिम्मत न पड़ती हो तो शास्त्र मेरे पास ले आना, मैं उसमें लिख दूंगा। तुम मेरी गवाही पर लिख लो।
तो थोड़े बेचैन हुए कि यह कैसे हो सकता है! उनको अड़चन वही हो रही है जो तुम्हें अड़चन हो रही है, कि यह कैसे हो सकता है! शास्त्र में कुछ कैसे बात जोड़ी जा सकती है।
शास्त्र पर हम रुक जाते हैं। और कोई शास्त्र परिपूर्ण नहीं है। कोई शास्त्र परिपूर्ण नहीं हो सकता। क्योंकि सत्य को पूरा का पूरा कहा ही नहीं जा सका है कभी। सागर बड़ा है; हम शब्दों में जो थोड़ी—बहुत बूंदें भर लाते हैं, उनसे सागर नहीं चुकता। मेरे बाद जो लोग होंगे, वे बहुत सी बातें कहेंगे, जो मैंने नहीं कही हैं। क्योंकि मनुष्य कुशल भी होता जाता है—सोचने में, विचारने में, शब्द में मनुष्य की क्षमता रोज बढ़ती जाती है। जो मैंने नहीं कहा, वह आने वाले लोग कहेंगे। तुम यह मत कहना उनसे कि यह हमारे शास्त्र में नहीं लिखा है। तुम्हारे शास्त्र में उतना लिखा है जितना मैंने कहा। लेकिन उसके बाद भी जानने वाले होते रहेंगे। और जो जानता हो उसकी मान लेना।
शास्त्र कभी भी निर्णायक नहीं हो सकता। निर्णायक तो शास्ता होता है—जिसने जाना। जिसकी आंखों में तुम्हें सत्य की झलक मिले, उसको पकड़ लेना। अगर तुम मुझे मान कर भी चल रहे होओ और तुम्हें किसी की आंख में सत्य की झलक मिले, तो किताब को जला देना, किताब को फेंक देना। किताब से कुछ लेना—देना नहीं है। यह सत्य का नया आविर्भाव हुआ।
लेकिन परंपरा इतनी हिम्मत नहीं कर सकती। परंपराएं बंद होने की जिद्द करती हैं। मोहम्मद के बाद मुसलमानों ने कह दिया कि अब आखिरी किताब आ गई भगवान के यहां से। क्यों? आखिरी क्यों आ गई? हिंदू कहते हैं: वेद में ही आखिरी किताब आ गई। अब आगे कोई जरूरत नहीं है। जैन कहते हैं: महावीर में तीर्थंकर पूरे हो गए; अब आगे कोई तीर्थंकर नहीं होगा। सभी धर्म अपनी परंपरा को बंद कर लेना चाहते हैं। बंद इसलिए कर लेना चाहते हैं कि खतरा है: कल नये संस्करण होंगे, नया सत्य अवतरित होगा, फिर हमारे शास्त्रों का क्या होगा! शास्त्रों की प्रतिष्ठा बनी रहे, इसके लिए आगे का द्वार बंद कर देते हैं।
पच्चीसवां तीर्थंकर नहीं हो सकता। क्यों? चौबीस पर क्यों अटक जाते हो? क्या कारण है? इसका तो मतलब यह हुआ कि चौबीसवें तीर्थंकर ने जो कहा, उससे आगे अब बात कभी न बढ़ेगी; उसमें कोई परिमार्जन न होगा; उसमें कोई सौंदर्य न बढ़ेगा; उसमें कुछ जोड़ा न जाएगा। तो फिर नये फूल कैसे खिलेंगे?
यह तो ऐसे ही हुआ कि जैसे एक वृक्ष ने कह दिया कि अब मेरे बाद कोई वृक्ष न होंगे, बस यह जो सूखा ठूंठ खड़ा रहेगा, यही वृक्ष है; अब तुम इसी की पूजा करते रहना। जीवन तो बहा जाता है और जीवन के बहने के साथ परमात्मा रोज बहा जाता है। और जीवन के बहने के साथ परमात्मा रोज नये रंग—रूप में आता है। रोज की भाषा में उतरता है। हर युग के अनुकूल अवतरित होता है। सत्य तो रुकता नहीं; वह शाश्वत आता रहता है। लेकिन शास्त्र रुक जाते हैं; शास्त्र जड़ हो जाते हैं।
तुलसीदास जड़ परंपरा के भक्त हैं।
परंपरा में फूल नहीं खिलते। फूलों को सदा परंपरा के विद्रोह में खिलना पड़ता है। परंपरा सदा नये फूलों को नष्ट करने की कोशिश करती है; नई अभिव्यक्तियों को रोकने की, अवरोध करने की चेष्टा चलती है, ताकि पुरानी अभिव्यक्ति प्रतिष्ठित रहे।
कहा तुमने: "परंपरा में भी फूल खिलते हैं।'
मैंने कभी सुना नहीं, कभी देखा नहीं। आज तक तो नहीं हुआ कि परंपरा में फूल खिले हों। जब भी फूल खिले हैं, परंपरा के बावजूद खिले हैं; परंपरा के कारण नहीं खिले। इसलिए तो इतने कम फूल खिलते हैं। नहीं तो दुनिया में बहुत फूल खिलें। अगर परंपराएं न हों तो फूल ही फूल खिलें। लेकिन खिलें कैसे? परंपरा खिलने नहीं देती।
हेनरी थॉरो विश्वविद्यालय से पढ़ कर वापस लौटा। एक बुजुर्ग उससे मिलने आए और उन बुजुर्ग ने कहा: मैं बड़ा हैरान हूं, तुम विश्वविद्यालय से अपनी बुद्धि को बचा कर कैसे आ गए? क्योंकि अक्सर विश्वविद्यालय में बुद्धि तो नष्ट हो जाती है; कूड़ा—कर्कट भर जाता है। क्योंकि विश्वविद्यालय की सारी चेष्टा यही है कि तुम्हारा मन सूचनाओं से भर दिया जाए। तुम्हारे हृदय का तो कोई परिष्कार नहीं होता; तुम्हारी स्मृति प्रगाढ़ हो जाती है। तुम एक टेपरिकार्डर होकर लौट आते हो। बुद्धि की परीक्षा यह है विश्वविद्यालय में—कि तुम कितना पचाओ, यह परीक्षा नहीं है—कितना वमन कर सकते हो, यह परीक्षा है। पीए जाओ ज्ञान और उतारते जाओ परीक्षा में, परीक्षा में उलटी करो; सब किताब पर फैला दो। कितनी कुशलता से तुम उलटी कर देते हो, यह तुम्हारी परीक्षा है बुद्धि की। यह कोई बुद्धि की परीक्षा हुई? याददाश्त बुद्धि की परीक्षा है? याददाश्त तो बुद्धि की परीक्षा नहीं। याददाश्त तो पुराने की होती है। बुद्धि की परीक्षा तो नये के अनुभव से होनी चाहिए। कुछ नया लाओ जगत में। बुद्धि की परीक्षा सृजनात्मक होनी चाहिए, क्रिएटिव होनी चाहिए। तुम कुछ नया देखो, नया सुनो, नया बनाओ। बुद्धि तो नये का अन्वेषण करती है। स्मृति पुराने को संगृहीत करती है। लेकिन बुद्धि की तो कोई परीक्षा नहीं है।
उस बूढ़े ने कहा कि तुम कैसे बच कर आ गए?
मेरा भी यही अनुभव है। जब भी बच्चे स्कूल भेजे जाते हैं, तब तो उनमें प्रतिभा सभी में होती है; मगर जब तक लौटते हैं तब तक शायद एकाध की बचती है। बच जाए, सौभाग्य। प्रतिभा का बच जाना अपवाद है। क्योंकि पच्चीस साल पड़े हैं पंडित पीछे; सब तरह का जाल उन्होंने फैला रखा है; सब कुंजियां उन्होंने हाथ में ले रखी हैं। वे तोड़—मरोड़ डालते हैं, प्रतिभा को नष्ट कर देते हैं। प्रतिभा की जगह स्मृति को पकड़ा देते हैं। इसलिए तुम पाओगे कि जिंदगी में तुम्हारे विश्वविद्यालय से आए हुए प्रथम वर्ग के विद्यार्थी और गोल्डमेडलिस्ट और इत्यादि जिंदगी में खो जाते हैं। जिंदगी में उनका कोई पता नहीं चलता। जिंदगी उनको गोल्डमेडल नहीं देती।
आइंस्टीन मैट्रिक में फेल हो गया था—और गणित में ही! कोई सोच भी नहीं सकता था कि गणित में यह आदमी इस पृथ्वी का सबसे बड़ा गणितज्ञ होगा। गणित में! और फेल हो जाने का कारण यही था कि प्रतिभा थी। प्रतिभा के साथ झंझट है। जैसे प्रतिभाशाली आदमी हर बात में सोचता है नये का...।
अब तुम अगर कोई साधारण विद्यार्थी से पूछो कि दो और दो कितने होते हैं, वह कहेगा, चार होते हैं। बस इतना ही परीक्षक जानना चाहता है कि दो और दो चार होते हैं। यह भी कोई प्रतिभा है कि दो और दो चार होते हैं! यह विद्यार्थी ने लिख दिया तो उत्तीर्ण हो गया। आइंस्टीन को शक है इस पर कि दो और दो चार जरूरी नहीं है कि हों—दो और दो तीन भी हो सकते हैं; दो और दो पांच भी हो सकते हैं। तुम कहोगे: यह कैसे हो सकता है?
यह आइंस्टीन की प्रतिभा को समझोगे तो खयाल में आना शुरू होगा। आइंस्टीन कहता है: दो और दो चार होने में कोई अनिवार्यता नहीं है। यह तो केवल आदमी की मजबूरी है कि उसने अपनी अंगुलियों के हिसाब से आंकड़े बनाए हैं। दस का आंकड़ा बना लिया—दस अंगुलियों की वजह से। अतीत से आदमी अंगुलियों पर गिनता रहा। अभी भी जंगल का आदमी अंगुलियों पर गिनता है। अभी भी छोटे बच्चे अंगुली पर गिनते हैं।
कल ही रात एक छोटे से संन्यासी "अभिषेका' से मैं पूछ रहा था कि स्कूल में कितने बच्चे हैं? उसने जल्दी से दस अंगुलियां बता दीं। गिनती तो उसको है नहीं, लेकिन उसने दस अंगुलियां बता दीं। दस से गिनते हैं, इसलिए दुनिया भर के गणित में "दस' आंकड़ा हो गया—एक से दस तक की संख्या होती है। फिर तो सब उसी की पुनरुक्ति होती है—ग्यारह, बारह, फिर करोड़, शंख, महाशंख—वह सब उसी की पुनरुक्ति है। असली आंकड़े तो दस हैं—दस अंगुलियों के कारण हैं।
आइंस्टीन कहता है कि दस का आंकड़ा कोई अनिवार्यता नहीं है। यह तो एक सांयोगिक बात है कि आदमी के पास दस अंगुलियां हैं। समझो किसी आदमी को दुर्घटना हो गई और चार अंगुलियां खराब हो गईं, छह ही अंगुलियां बचीं तो? या ऐसा समझो कि आदमी को दस की जगह बारह अंगुलियां होतीं, या ऐसा समझो कि आदमी को दो ही अंगुलियां होतीं, तो गणित बिलकुल गया होता, सारी दुनिया का गणित बदल जाता।
आइंस्टीन कहता है: दस की संख्या हो तो दो और दो चार होते हैं। लेकिन समझो कि तीन ही की संख्या है, तीन से ज्यादा संख्या नहीं है। एक, दो, तीन; फिर आता है दस, ग्यारह, बारह, तेरह; फिर आता है बीस, क्योंकि तीन के ही आंकड़े हैं। और आइंस्टीन कहता है: तीन के आंकड़े से ही सारी समस्याएं हल हो जाती हैं तो दस के आंकड़े मानना क्यों? तो अगर तीन का ही आंकड़ा हो—एक, दो, तीन—तो दो और दो चार तो हो ही नहीं सकते, क्योंकि चार का तो आंकड़ा ही नहीं है। तो दो और दो कितने होंगे? दो और दो दस होंगे। क्योंकि तीन के बाद आएगा: दस। और आइंस्टीन ने सारे सवाल तीन के आंकड़ों से ही हल कर दिए। वह कहता है कि इससे ज्यादा की मानने की कोई जरूरत नहीं है।
एक दूसरे गणितज्ञ लीबनिज ने तो कहा कि तीन भी व्यर्थ हैं; दो काफी हैं। एक और दो, बस इससे काम चल जाएगा। और विज्ञान का यह सिद्धांत है कि जितने कम से चल जाए उतने से चलाना चाहिए, ज्यादा बढ़ाने की कोई व्यर्थ उलझन क्यों खड़ी करनी? एक से काम नहीं चल सकता; यह बात सच है; लेकिन दो से काम चल जाता है। लीबनिज ने सारे गणित के सवाल दो के आंकड़े से हल कर दिए। तब तो अड़चन हो जाएगी।
तो इस विद्यार्थी को गणित में पास होना बहुत मुश्किल है, क्योंकि वह इस तरह की झंझटें बता रहा है कि दो और दो चार भी हो सकते हैं, न भी हों; दो और दो दस भी हो सकते हैं। वह जो कुटा—पिटाया हुआ शिक्षक है, बुद्धिहीन, जिसके पास प्रतिभा नहीं है, वह बरदाश्त नहीं कर सकेगा। वह तो इसे उत्तीर्ण ही नहीं होने देगा।
आइंस्टीन मैट्रिक में फेल हुआ। फेल होने को राजी हुआ, लेकिन अपनी प्रतिभा गंवाने को राजी नहीं हुआ। अधिक लोग प्रतिभा गंवाने को राजी हो जाते हैं, अनुत्तीर्ण होने को राजी नहीं होते। तो आइंस्टीन बचा कर आ गया अपनी प्रतिभा को।
दुनिया में सारे बच्चे प्रतिभा लेकर पैदा होते हैं, लेकिन शिक्षा, संस्कार, समाज प्रतिभा नष्ट करने वाले हैं। पच्चीस साल काफी समय होता है। पच्चीस साल बहुत बड़ा समय है। आदमी अगर पचहत्तर साल जीएगा तो एक तिहाई समय तो विश्वविद्यालय ले लेता है। जिंदगी का एक तिहाई! और परिणाम क्या है? जो लोग विश्वविद्यालय से निकलते हैं, लेकर क्या आते हैं? बस थोड़ी सी स्मृति की कुशलता लेकर आते हैं; इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।
वैसी ही हालत परमात्म—अनुभव की है। प्रत्येक व्यक्ति परमात्मा का अनुभव करने की क्षमता लेकर पैदा होता है। फूल खिलने की क्षमता लेकर पैदा होता है। लेकिन फूल खिल नहीं पाते; परंपराएं मार डालती हैं। परंपराओं का बोझ भारी है। परंपराएं कहती हैं: ऐसे जीओ, ऐसे उठो, ऐसे बैठो, ऐसा करो। परंपरा तुम्हें तुम्हीं होने का मौका ही नहीं देती। परंपरा कहती है: तुम किसी और जैसे होओ। परंपरा कहती है: विवेकानंद बनो। अब तुम्हारा क्या कसूर है? क्यों तुम विवेकानंद बनो? छोटे बच्चों से कहा जा रहा है कि तुम महात्मा गांधी बनो। इनका क्या कसूर है? ये क्यों महात्मा गांधी बनें? यह भारी अपमान है कि किसी से कहो कि तुम विवेकानंद बनो, महात्मा गांधी बनो, कि शंकराचार्य बनो। यह अपमान है। प्रत्येक व्यक्ति यहां स्वयं होने को पैदा हुआ है। कोई और वह बने क्यों? अगर परमात्मा को विवेकानंद ही बनाने थे तो वे फोर्ड की तरह कोई कंपनी खोल देते—एसेंबली लाइन से बस विवेकानंद, विवेकानंद, चले आ रहे हैं! भर दो दुनिया को विवेकानंद से! एक सी कारें हीं, एक सी कारें! दुनिया बड़ी बेरौनक हो जाए। परमात्मा यह भूल नहीं करता।
परमात्मा एक आदमी को एक ही बार पैदा करता है, दुबारा नहीं दोहराता, परमात्मा पुनरुक्ति नहीं करता। परमात्मा कार्बनकापी में विश्वास ही नहीं करता; सब मूल लीपियां ही भेजता है। मगर इस दुनिया में कार्बनकापी पर विश्वास करने वाले लोग हैं; वे मूल पर भरोसा ही नहीं करते। वे सब मूलों को मिटा देना चाहते हैं।
उनकी बुद्धि वही है, जैसा मैंने एक सरकारी आफिसर के संबंध में सुनी है। एक सरकारी आफिसर के जिम्मे रेकार्ड थे पचास सालों के। और वे रेकार्ड बहुत हो गए थे; उनको रखने की भी जगह नहीं थी। और रेकार्ड बढ़ते ही जाते हैं। आखिर सभी अधिकारियों ने मिल कर तय किया कि ये रेकार्ड अब नष्ट करने होंगे, बहुत हो गए पुराने, दस साल पुराने बचा लो, बाकी जाने दो। मगर जैसी आफिसरों की बुद्धि होती है—बुद्धि कहना भी ठीक नहीं उसे। तो प्रधान ने जो सूचना भेजी क्लर्कों को वह यह थी कि ऐसा निर्णय किया गया है कि दस साल के पूर्व के जो रेकार्ड हैं, अब उनकी कोई जरूरत नहीं है, वे नष्ट कर दिए जाएं, लेकिन नष्ट करने के पहले उनकी कार्बनकापी कर ली जाए, ताकि वक्त पड़े काम आए।
सभी इसी तरह जाता है सरकारी आफिस में तो। हर चीज की कापी होनी चाहिए; एक भी नहीं पांच—पांच सात—सात कापियां होनी चाहिए। तो पुरानी आदत। नष्ट करना है। इसलिए नष्ट कर रहे हैं कि जगह नहीं रखने की। अब कापी कर लोगे तो वह उतनी की उतनी जगह कापी घेर लेंगी।
लेकिन तुम अपने बच्चे को कहते हो कि बेटा ऐसे बनो, बेटा ऐसे बनो, बेटा ऐसे बनो! तुम अपमान कर रहे हो उसका। तुम परमात्मा का अपमान कर रहे हो। वह जैसा है वैसा ही बनने को परमात्मा ने उसे भेजा है।
परंपरा मारती है। परंपरा काटती है। परंपरा बरदाश्त नहीं करती।
एक सूफी कहानी है कि एक सम्राट के महल पर एक अजनबी पक्षी आकर बैठ गया, जो उसने कभी नहीं देखा था। उनके देश में नहीं होता था, परदेशी था। उसे बड़ी हैरानी हुई। वह बड़ा बेचैन हुआ। उसने पक्षी को पकड़वाया और कैंची उठा कर पंख काट दिए उसके, क्योंकि ऐसे पंख होने नहीं चाहिए। ऐसे पंख उसके देश में होते नहीं थे। इतने बड़े पंख! उसने देखे थे छोटे—छोटे पंखों वाले पक्षी। उसने उसके पंख काट दिए। हालांकि वह उसकी सेवा कर रहा है। उसकी चोंच भी बड़ी लंबी थी, उसने उसकी चोंच भी कटवा दी। वह पक्षी चीख रहा है, चिल्ला रहा है; मगर राजा उसकी सेवा कर रहा है। वह यही सोच रहा है कि उसको ढंग पर ला रहा है।
यही हो रहा है। जब तुम किसी बच्चे को ढंग पर ला रहे हो, तुम कर क्या रहे हो? पंख काट रहे हो उसके कि तेरे पंख विवेकानंद जैसे नहीं हैं; तेरी चोंच बुद्ध जैसी नहीं है, तुझे हम काट—पीट कर बिलकुल ठीक बना देंगे।...पक्षी मर गया!
आदमी बेशर्म है, बच जाता है। सब तरह कट—पिट जाता है, फिर भी बच जाता है। सब तरफ से छांट देते हो उसको, उसकी सारी आत्मा नष्ट हो जाती है, फिर भी घिसटता रहता है।
कहां फूल है? तुम किसी माली को पूछो जाकर। अगर एक माली एक हजार वृक्ष लगाए और कभी एक वृक्ष में एकाध फूल आए, इसको तुम कुछ माली कहोगे कि यह माली है? तुम इसको कहोगे, यह फूल दिखता है इसकी नजर से बच कर आ गया, नहीं तो आता कैसे? हजार पौधे लगाए, एक—एक पौधे में हजारों फूल लगने चाहिए; वे तो लगे ही नहीं कभी, एक पौधे में एक फूल लगा है। तुम जाकर इसका गुणगान करोगे कि आप बड़े भारी माली हैं, आप बड़े कुशल हैं, आप बड़े कलाकार हैं? कैसा गजब कि एक फूल आ गया। इस माली की कोई प्रशंसा नहीं करेगा। हमें यही शक होगा कि ऐसा होता है हो सकता है कि माली की नजर चूक गई। हजार पौधे थे, फिकर में दूसरों की रहा होगा। जहां—जहां फिकर रही, वहां तो फूल आ ही नहीं सके; यह जरा कुछ नजर से ओझल रह गई बात। यह कोना कुछ अपरिचित रह गया, तो फूल खिल गया।
इतने आदमी पैदा होते हैं, इसमें फूल लगते कहां है? इस परमात्मा को तुम माली कहोगे? मगर इसमें परमात्मा का कसूर नहीं है। परमात्मा तो हरेक को इसी क्षमता से भेजता है कि तुम्हारे भीतर बुद्धत्व का प्रकाश हो; तुम्हारे भीतर मोक्ष उतरे। मगर आस—पास के लोग उतरने नहीं देते। इसके पहले कि मोक्ष उतरे, वे सब तरह के कारागृह निर्मित कर देते हैं।
परंपरा है क्या? एक कारागृह है! अतीत से आई हुई जंजीरें तुम्हें पहना दी जाती हैं। हालांकि पहनाने वाले कहते हैं कि ये आभूषण हैं। इस मंदिर जाओ, यह किताब पढ़ो, यह मंत्र जपो, इस तरह का तिलक लगाओ; कि तुम हिंदू हो, कि तुम मुसलमान, कि ब्राह्मण, कि शूद्र—सब तुम्हें समझा दिया जाता है कि तुम कौन हो। और तुम्हें जरा भी पता नहीं कि तुम कौन हो! और सब तुम्हें बता दिया गया है। असली सवाल तुमने पूछा ही नहीं मैं कौन हूं? इसके पहले कि तुम पूछो, बताने वाले, उत्तर देने वाले तैयार हैं। वे कहते हैं: तुम हिंदू हो, पूछने की जरूरत क्या, हम तो बता रहे हैं! तुम ब्राह्मण हो, कि तुम यह हो कि तुम वह हो और जिंदगी ऐसे ही बीत जाती है इन्हीं उधार व्यर्थ बातों के साथ और तुम सदा दूसरा बनने की कोशिश में लगे रहते हो।
फूल खिलता है—स्वयं की ऊर्जा से। फूल खिलता है—निजता से। और ध्यान रखना: तुममें जो फूल खिलेगा, वह पहले कभी नहीं खिला था—उस तरह का फूल। और फिर उस तरह का फूल दुबारा कभी नहीं खिलेगा। परमात्मा पुनरुक्ति करता ही नहीं।
तो तुम्हारे ऊपर एक बड़ी जिम्मेवारी है। परमात्मा ने तुम्हारे ऊपर बड़ा भरोसा किया है। तुम्हें एक बड़ी क्षमता दी है कि तुम खिलना। लेकिन तुम्हीं जैसे!
मैं फिर इसे दोहरा दूं: तुम जैसा फूल न पहले कभी उसने पैदा किया था, न कभी पैदा करेगा। तुम नहीं खिले तो यह फूल बिना खिला ही रह जाएगा। तुमने, परमात्मा ने तुम्हें जो दिया था, जो संपदा दी थी, उसको अस्वीकार कर दिया।
और हालांकि मैं तुमसे यह भी कह दूं कि कोई भी फूल खिले, खिलने का आनंद एक जैसा है। बुद्ध का फूल खिलता है, कबीर का फूल खिलता है, क्राइस्ट का फूल खिलता है कि जरथुस्त्र का—ये अलग—अलग फूल हैं। बुद्ध का रंग अलग, ढंग अलग—साफ ही है। कृष्ण का रंग अलग, ढंग अलग। क्राइस्ट का रंग अलग, ढंग अलग। ये फूल बिलकुल अलग—अलग हैं। कोई चंपा है, कोई चमेली है, कोई गुलाब है, कोई कमल है। ये बिलकुल अलग—अलग हैं। फिर भी एक बात खयाल रखना: जब भी कोई फूल खिलता है तो जो खिलने की स्थिति है, वह बिलकुल एक जैसी है। चाहे गेंदे का फूल खिले और चाहे गुलाब का—खिलावट एक जैसी है। खिलने का आनंद एक जैसा है।
मीरा नाची और बुद्ध शांत वृक्ष के नीचे बैठे रहे। यह बुद्ध के खिलने का ढंग है—शांत बैठे रहना। यह मीरा के खिलने का ढंग है—नाचना। महावीर नग्न खड़े रहे—यह उनके खिलने का ढंग है। कृष्ण ने बांसुरी बजाई—यह उनके खिलने का ढंग है। लेकिन कृष्ण की बांसुरी में वही स्वर है, जो महावीर की निर्दोष नग्नता में है। बुद्ध के पैरों पर घुंघरू नहीं बंधे हैं, लेकिन जो सुन सकता है उसे सुनाई पड़ेंगे। वही घुंघरू जो मीरा के पैरों पर बंधे सुनाई पड़ रहे हैं!
जगत में फूल अलग—अलग ढंग के हैं, लेकिन खिलावट एक है। कोई फूल परंपरावादी नहीं होता। यहां परंपरा बन ही नहीं सकती। तुम जैसा आदमी ही पहले नहीं हुआ, परंपरा बनेगी कैसे?
असली धार्मिक दृष्टि सदा व्यक्तिवादी होती है, परंपरावादी नहीं। परंपरावाद राजनीति है, धर्म नहीं।
तुलसीदास हिंदू—राजनीति के साथ जमे; पसंद पड़े, घर—घर विराजमान हो गए। इससे कुछ अंतर नहीं पड़ता। लेकिन मेरी बात तुम खयाल में ले लेना।
तुम पूछते हो: "परंपरा में भी फूल खिलते हैं और परंपरा के कारण भी फूल खिलते हैं।'
नहीं, कभी नहीं! परंपरा में कभी फूल नहीं खिले और परंपरा के कारण ही तो फूल खिल नहीं पाते। तुम पूछते हो कि परंपरा के कारण! परंपरा के बावजूद कभी—कभी खिल जाते हैं। परंपरा कभी—कभी चूक जाती है। कुछ बगावती लोग पैदा हो जाते हैं और परंपरा में नहीं अटते और कोई रास्ता निकाल कर छिटक जाते हैं; निकल जाते हैं चक्कर से। घेरा तो उन पर भी डाला जाता है, मगर वे कोई द्वार—दरवाजा खोज लेते हैं और कारागृह के बाहर हो जाते हैं। जो भी कारागृह के बाहर हो जाता है, वह तुम्हें भी पुकारता है कि आ जाओ बाहर।
वही मैं कर रहा हूं। तुमसे कह रहा हूं: आओ बाहर! मगर तुम कहते हो कि हम तुलसीदासजी को पकड़े बैठे हैं! हम कैसे बाहर आएं!
"व्यवस्था कहें या परंपरा, वह तो मिटेगी नहीं।'
वह मैं भी जानता हूं कि नहीं मिटेगी, क्योंकि आदमी की जड़ता नहीं मिटती। जड़ता मिट जाए तो व्यवस्था भी मिट जाए, परंपरा भी मिट जाए। नहीं मिटेगी, क्योंकि आदमी का अंधापन नहीं मिटता। नहीं मिटेगी, क्योंकि आदमी की मूढ़ता नहीं मिटती। वह सब मूढ़ता के कारण बची है।
अस्पताल कैसे मिटेंगे जब तक बीमारी न मिटे? मंदिर—मस्जिद कैसे मिटेंगे, जब तक आदमी की जड़ता न मिटे। तब तक हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन कैसे मिटेंगे? धार्मिक आदमी पैदा नहीं हो पा रहा इन्हीं की वजह से। हिंदू, मुसलमान, ईसाई, जैन—इनके कारण धार्मिक आदमी पैदा नहीं हो पाता। क्योंकि धार्मिक आदमी का कोई विशेषण नहीं हो सकता। धार्मिक आदमी विशेषण—शून्य होगा; उसकी कोई सीमा नहीं हो सकती। उस पर कोई लेबल नहीं लगाया जा सकता। धार्मिक आदमी परम स्वतंत्रता है। उसका नामकरण भी नहीं हो सकता। धार्मिक आदमी बस धार्मिक होता है।
और तुम कहते हो: "व्यवस्था कहें या परंपरा, वह तो मिटेगी नहीं और उसमें कभी—कभी जान डालनी पड़ती है।'
मुर्दों में कभी तुमने जान डाल कर देखी? हालांकि यह सच है कि मुर्दा भी कल तक सांस लेता था। मैं यह नहीं कह रहा कि कल तक नहीं लेता था। तुम्हारे पिताजी चल बसे, अब फूंको उनकी नाक में सांस, फूंकते रहो। इसमें तुम भी मरोगे, अगर यह ज्यादा देर तक किया। ज्यादा देर में यही संभावना है कि पिताजी तुममें कहीं सांस न फूंक दें, क्योंकि मुर्दा पड़ा—पड़ा आखिर परेशान हो जाए कि बहुत हो गया, क्या आदमी मरने भी नहीं देता।
ऐसा हुआ, मुल्ला नसरुद्दीन गया था अपने पशुओं के डाक्टर के पास। कहने लगा, मेरे गधे की हालत खराब है। तो उसने कहा: तुम ऐसा करो, यह दवा ले जाओ। और दवा के साथ—साथ उसने एक बांस की पोंगरी भी दे दी। तो उसने मुल्ला ने कहा: करना क्या इसमें? तो उसने कहा: दवा को पोंगरी में डाल देना, पोंगरी गधे के मुंह में लगा देना और जोर से फूंक मार देना—तो दवा उसके अंदर चली जाएगी।
ठीक। मुल्ला गया। कोई दो घंटे बाद आया; पागल हो रहा था बिलकुल। एकदम पकड़ लिया डाक्टर को कि गर्दन दबा दूंगा तुम्हारी।
वह बोला: भई, बात क्या हो गई, तुम इतने पागल क्यों हुए जा रहे हो?
उसने कहा: गधे ने पहले फूंक मार दी! आग लगी जा रही है पूरे शरीर में!
अब गधे तो गधे!
मुर्दों के साथ दोस्ती मत करना। कभी कोई शैतान मुर्दा मिल गया और सांस मार दी, तो गए काम से।
मुर्दों को कौन जिला पाता है। और तुम कहते हो: "परंपरा में कभी—कभी जान डालनी पड़ती है।'
जान डालने की जरूरत ही क्या है? जो मर गए सो मर गए। जो मर गया सो मर गया। जब परमात्मा ने उसे छोड़ दिया तो तुम क्या जान डाल पाओगे?
परंपरा का मतलब यह होता है: अब लकीर रह गई, सांप तो चला गया। पग—चिह्न रह गए रेत पर; यात्री तो जा चुका। अब तुम बैठे उन्हीं पग—चिह्नों की पूजा कर रहे हो, फूल लगा रहे हो, उदबत्ती लगा रहे हो। करते रहो पूजा। इसमें तुम भी मरोगे। इससे उन पद—चिन्हों में प्राण नहीं आ सकते। इससे तुम जड़ हो जाओगे।
मुर्दों से दोस्ती सोच—समझ कर करना, क्योंकि जिससे दोस्ती करोगे वैसे ही हो जाओगे। इसलिए तो लोग इतने मुर्दा हो गए हैं। लिए बैठे हैं मुर्दों को। जब जीसस भी तुम्हारे सामने खड़े हों, तब भी तुम अब्राहम की बात करते हो। जब बुद्ध तुम्हारे सामने खड़े हों, तब तुम कृष्ण की बात करते। और जब कृष्ण तुम्हारे सामने खड़े होते हैं, तब भी तुम किसी और की बात करते हो। तुम जीवित को देखते ही नहीं। तुम्हारी आंख पीछे की तरफ अटक गई है। तुम चलते आगे की तरफ देखते पीछे की तरफ। इसलिए तुम्हारे जीवन में दुर्घटनाएं ही दुर्घटनाएं हैं।
जैसे कोई आदमी कार को चलाता हो, देखे पीछे और चलाए...कार तो आगे ही चलेगी। और कार में तो रिवर्स गेयर भी होता है; जिंदगी में वह भी नहीं है। जिंदगी बिलकुल आगे ही जाती है। उसमें रिवर्स गेयर है ही नहीं। पहली कार जो फोर्ड ने बनाई थी, उसमें नहीं था रिवर्स गेयर। वह बिलकुल जिंदगी जैसी कार थी। वह तो पीछे समझ में आई। पहली कार बनाई तो उसे खयाल भी नहीं था रिवर्स गेयर का। वह तो फिर पीछे समझ में आया कि यह तो बड़ी झंझट की बात है। घर लौटना हो तो कई मील का चक्कर लगाओ! तो उसने रिवर्स गेयर डाल दिया। भगवान ने अभी तक रिवर्स गेयर नहीं डाला जिंदगी में। क्योंकि पीछे भगवान लौटना ही नहीं चाहता और लौटने भी नहीं देना चाहता।
जो गया सो गया। जो बीता सो बीता। अब उस पर क्या जाना! अब वहां धूल उड़ती रह गई है। आगे है विकास। आगे है गति। आगे है जीवन; पीछे नहीं।
परंपरा यानी पीछे। जहां से तुम गुजर गए वहां के दृश्य पकड़े बैठे हो।
और तुम पूछते हो कि "परंपरा में कभी—कभी जान भी डालनी पड़ती है।'
किसलिए? तुम्हारे पास जान जरूरत से ज्यादा है, जो परंपरा में डालने पड़े हो? अपने लायक ही तो जान है नहीं। जान वैसे ही तो कम है। जल भी तो नहीं रही जान; धुंधिया रही है। लपट भी तो नहीं पकड़ती; धुआं—धुआं निकलता है। पहले अपने में तो जान डाल लो; परंपरा में जान डाल कर क्या करोगे? तुम जीओ। तुम्हारा फूल बने।
तो मैं तुमसे कह दूं: जब भी कोई आदमी जीता है ठीक से तो परंपरा बनती है, निश्चित। क्योंकि दूसरे लोग मूढ़ हैं, इसलिए बन जाती है। नहीं तो बनने की कोई जरूरत नहीं है, कोई कारण नहीं है। मूढ़ता न हो तो परंपरा बनेगी ही नहीं।
तुम जीओ—जाग कर जीओ। प्राण अपने में जगाओ। तुम्हारा फूल खिले। तुम्हारा फूल खिले, औरों को भी खिलने की सुध आए। तुम जब चले जाओगे अगर लोग नासमझ होंगे तो वे तुम्हारी याददाश्तों को संजो कर रख लेंगे और उनकी पूजा करेंगे। और उनकी पूजा के कारण उस समय जो असली फूल खिल रहे होंगे, उनको न देखेंगे। इस कारण बड़ी हानि हुई है।
मैं तुमसे कहना चाहता हूं: तुम्हें जितना लाभ मुझसे लेना हो ले लो; लेकिन मैं जब चला जाऊं तो मुझे चले जाने देना, फिर मुझे पकड़ कर मत बैठे रहना। क्योंकि मुझे पकड़ कर बैठे रहोगे तो उस समय जो फूल खिले होंगे, वे तुम्हें दिखाई न पड़ेंगे।
आदमी बड़ा अजीब है! जब तक मैं मौजूद हूं, फायदा न लेगा; जब मैं चला जाऊंगा, तब वह पकड़ कर बैठ जाएगा। तब कोई फायदा हो नहीं सकता। जब तुम्हें कोई जीता—जागता हुआ दीया मिल जाए तो करो सत्संग। उसके पास जाओ। उसकी लपट से लपट के राज सीखो। उसकी आंखों से आंखें मिलाओ। उसके शून्य से दोस्ती गांठो। मैत्री का हाथ बढ़ाओ, उसका हाथ पकड़ो। यह बिलकुल ठीक है। इसका उपयोग करो। इस अवसर का उपयोग करो। यह झरोखा जो खुला है परमात्मा पर, इसमें तुम भी झांक लो—शायद तुम्हें भी चांदत्तारे दिख जाएं और उनकी पुकार आ जाए और तुम भी चल पड़ो। लेकिन जब यह आदमी चला जाए तो धन्यवादपूर्वक इसे विस्मरण कर देना। नहीं तो इसकी याद ही तुम्हें अड़चन डालेगी। तब जो दूसरी खिड़कियां खुलेंगी, तुम कहोगे: हम उन खिड़कियों से नहीं देख सकते, हम तो अपनी खिड़की पर बैठे हुए हैं! और यह खिड़की बंद हो चुकी। यह खिड़की गई। यह जब थी तब थी। हम तो अपनी खिड़की पर बैठे हैं। हम तो अपनी परंपरा में जान डाल रहे हैं!
तुम जान अपने में नहीं डाल पाते, परंपरा में क्या डालोगे? और जिस व्यक्ति को स्वयं सत्य मिल गया है, वह परंपरा के सत्यों में क्यों जान डाले? उसके पास जीवन—सत्य है, वही क्यों न दे दे?
तुलसीदास परंपरा में जान डालने की कोशिश करते हैं। सफल तो कोई कभी हो नहीं पाता—हो नहीं सकता। कबीर नई ज्योति जलाते हैं। मीरा नई ज्योति जलाती है। मेरे देखे कबीर और मीरा और नानक वह करते हैं जो करना चाहिए। तुलसीदास तो ब्राह्मणवाद, पंडितवाद, पुरोहितवाद और हिंदू—अहंकार के परिपोषक हैं। यह परिपोषण इतने ढंग से हुआ है कि अगर तुम पूरी रामायण पढ़ोगे तो तुम जरा हैरान होने लगोगे: इसको धर्मग्रंथ कहना भी कि नहीं कहना! तुम्हें भी दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि तुम्हारी भी धारणाएं वही की वही हैं।
अब जैसे समझो। सीधी—सीधी बातें दिखाई पड़ती हैं। राम के पिता दशरथ लंपट मालूम होते हैं। एक जवान लड़की से शादी कर ली, उसको वचन दे दिया है। उस वचन की पूर्ति के लिए अपने बेटे को अकारण, बिना किसी कारण के, बिना किसी न्यायसंगत कारण के जंगल भेज देते हैं। और यह बेटा चुपचाप इसे स्वीकार कर लेता है, क्योंकि बाप की आज्ञा है। गलत आज्ञा बाप की माननी या नहीं, यह सवाल है। कबीर कहेंगे: आज्ञा गलत हो तो बाप नहीं, बाप के बाप की हो तो भी नहीं मानना। आज्ञा ठीक हो तो दुश्मन की हो तो भी माननी। बात तो सीधी ऐसी होनी चाहिए। इससे क्या फर्क पड़ता है, किसने दी? यह आदमी गलत है। यह दशरथ कोई ढंग का आदमी नहीं मालूम होता। इसको कोई न्याय—बोध भी नहीं है। इसकी आज्ञा माननी क्यों? सिर्फ इसलिए कि बाप है? मगर परंपरागत जो आदमी है, वह इसका सम्मान करता है, क्योंकि उसकी यह धारणा है: बाप की आज्ञा हर हालत में माननी है। क्यों? अतीत की आज्ञा हर हालत में माननी है। अनुभवी गलत भी कहे तो भी मानना और गैर—अनुभवी ठीक भी कहे तो भी न मानना। ये परंपरा की आधारशिलाएं हैं। इस पर पूरी रामायण खड़ी है। आधारशिला यह है।
अगर मैं लिखूं तो राम को जंगल नहीं जाने दूंगा। क्यों? कैसे जंगल जाने दूंगा? ये दशरथ चले जाएं और ले जाएं अपनी स्त्री को भी। इनको जंगल जाना हो, मजे से चले जाएं। राम का जंगल जाने के लिए राजी होना गलत के लिए झुकना है। इसको मैं सदधर्म नहीं कहता। इसमें क्रांति नहीं है—नपुंसकता है। मेरे लिए इसमें कोई बड़ी आदर की बात नहीं मालूम होती। इसमें मुझे कोई सम्मान नहीं मालूम होता। हां, अगर बाप ने ठीक बात कही थी तो जरूर माननी थी। मगर बात ठीक और गलत के कारण मानी जानी चाहिए या नहीं मानी जानी चाहिए; लेकिन बाप कोई आधार नहीं बनता है।
यह जो वृत्ति है राम की, यह हिंदुओं को खूब जंची। यह हिंदू पुराणपंथियों को खूब जंची। पुरानी जो मुर्दा, मरने वाली पीढ़ी है, उसको खूब जंची। नई पीढ़ी को जाल में बांध रखने का यह अच्छा उपाय हो गया कि राम जैसे बनो! मगर कोई यह नहीं देख रहा कि राम जैसा बनना दशरथ की गलत मनोदशा को सहयोग देना है। राम को बगावत करनी चाहिए, राम को विद्रोह करना चाहिए। तो राम की कथा दकियानूसी है। उसमें मूल आधार ही रूढ़िगत है।...रघुकुल रीति सदा चली आई!
कुल की रीति से क्या लेना—देना है? प्रत्येक व्यक्ति के पास अपनी रीति होनी चाहिए। जिसके पास अपनी रीति है, उसी के पास आत्मा है। कुल की रीति में क्या रखा है?
तुम्हारा पड़ोसी तुम्हारे बाप से लड़ रहा हो और तुम देख रहे कि तुम्हारे बाप गलत हैं और झूठ बोल रहे हैं—तो तुम्हें किसका साथ देना चाहिए? तुलसीदास कहेंगे: अपने बाप का, क्योंकि वे तुम्हारे बाप हैं। यह भी कोई बात हुई? अगर पड़ोसी का लड़ना ठीक है तो तुम्हें पड़ोसी के साथ खड़े होना चाहिए और बाप से जूझना चाहिए कि आप गलत हो। पक्ष तो सत्य का होना चाहिए, सुंदर का होना चाहिए। यह पक्षपात पिता का होना कारणभूत नहीं हो सकता है जीवन के निर्धारण में। लेकिन इसको हिंदुओं ने खूब सम्मान दिया, मर्यादा पुरुषोत्तम कहा।
राम की पूरी कथा अगर बहुत विचार से तुम देखोगे तो बहुत चकित होओगे। और मैं ऐसा नहीं कहता कि ऐसा हुआ होगा। मगर जिन्होंने कथा लिखी है उन्होंने यही लिखा है। कुछ भी हुआ होगा, उसको आधार बना कर एक रूढ़िगत जड़ परंपरा को थोपने की व्यवस्था की।
राम ने फिर यही सीता के साथ किया—उसे जंगल भेज दिया—जो बाप ने किया था। यह जंगल भेजने की आदत! यह छूटती ही नहीं। फिर हिंदू इसका भी सम्मान करते हैं कि सीता ने ना—नुच न की; वह चुपचाप जंगल चली गई, क्योंकि पति की आज्ञा है! पति परमात्मा! उसकी आज्ञा माननी पड़ेगी! यह जाल है। यह स्त्रियों को फंसाने का जाल है। पति की आज्ञा क्यों? गलत हो तो भी? सीता को इनकार करना चाहिए। यह भी कोई बात हुई कि कोई धोबी कह दे कि उसकी स्त्री रात भर घर के बाहर रह गई, तो वह कह दे कि मैं कोई राम नहीं हूं कि स्त्री इतने वर्षों तक रावण के घर रह गई और ले आए, अब तू मेरे घर में नहीं रुक सकती! इससे राम को चोट लग गई। चोट ही लगी थी तो सीता को लेकर जंगल चले जाते, दोनों जंगल चले जाते। चोट लगी तो यह कि सीता को जंगल भेज दिया; खुद राजमहल में ही रहे आए। यह भी खूब रहा! कष्ट सीता को मिल रहा है; मर्यादा—पुरुषोत्तम वे हो रहे हैं!
मगर स्त्री के साथ व्यवहार ऐसा हुआ है—संपत्ति की तरह—जहां चाहे बिठा दो, जहां चाहे फेंक दो। और गर्भवती स्त्री को भेज दिया, फिर भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। जरा भी सोच—विचार न किया। राज्य छोड़ देते। राज्य नहीं छूटा। प्रेम—पात्र को छोड़ दिया। लेकिन यह स्त्रियों के लिए शिक्षा है इसमें कि ऐसा स्त्रियों को करना चाहिए। पहले शिक्षा थी कि बेटों को कैसा करना चाहिए; अब शिक्षा आती है कि स्त्रियों को कैसा करना चाहिए: चुपचाप आज्ञा पति की माननी चाहिए।
सीता को रावण के चंगुल से छुड़ा कर आए तो उसकी अग्नि—परीक्षा ली। इतना भरोसा राम को सीता पर नहीं है! लेकिन सीता ने कुछ नहीं कहा कि महाराज आप भी...। अब मैं जा ही रही हूं अग्नि में, आप भी आ जाइए, दोनों की परीक्षा हो जाए—क्योंकि मैं भी अकेली थी वहां, आप भी यहां अकेले थे।
और शबरी इत्यादि की कहानियां उसको भी तो आई होंगी।
क्योंकि खोजियों का खयाल है कि शबरी से राम का प्रेम था, उस किताबें लिखी गई हैं। बड़ी शोध की गई है। क्योंकि अक्सर जब बहुत प्रेम होता है, इतना प्रेम हो, तभी कोई एक—दूसरे की जूठी चीज खा सकता है, नहीं तो खा नहीं सकता। राम शबरी के जूठे बेर खा गए। यह सिर्फ प्रेमी ही कर सकते हैं; प्रेमी में ही चलती हैं ये बातें। ऐसा आधा कौर खा लिया, आधा खिला दिया—ये बहुत प्रेम में ही चलती हैं। तो गहरा प्रेम था, क्या पता!
आखिर सीता भी कह सकती है कि आप भी आ जाइए, संग—साथ अच्छा रहेगा! लेकिन सीता ने अग्नि—परीक्षा के लिए कोई आग्रह नहीं किया। नहीं हिंदू ये शिक्षा देना चाहते हैं कि स्त्री की ही परीक्षा ली जा सकती है, पुरुष की नहीं। पुरुष पुरुष है। गलत हो सकती है तो स्त्री; पुरुष कभी गलत नहीं होता। और मर्द बच्चा कुछ भी करे।
यह सब मूढ़ताओं का परिपोषण है। और चूंकि यह परिपोषण पंडित—पुरोहित और समाज के ठेकेदारों को लाभपूर्ण था, इसलिए राम की कथा को खूब प्रचारित किया गया। तुलसी उनके हाथ में एजेंट हैं। मैं उनको कोई महाजन नहीं कहता।

दूसरा प्रश्न: मेरा मन न धन में लगता है न यश में; लेकिन मैं यह भी नहीं जानता हूं कि मेरा मन कहां लगेगा। आप कुछ कहें।

च्छा ही है कि मन न धन में लगता न यश में। यह तड़प की पहली शुरुआत। यह निषेधात्मक धर्म का आरंभ। पहले ऐसा ही होता है कि जिसमें कल तक लगता था उसमें अब नहीं लगता। स्वभावतः एक खालीपन छूट जाता है। कल तक धन में उलझे थे, पद में उलझे थे, दौड़—धूप थी, आपाधापी थी, मन व्यस्त था, लगे थे कहीं; अब अचानक वहां नहीं लगता, तो एक खालीपन आ जाता है कि अब कहां जाएं, अब क्या करें, अब कहां लगाएं। बेचैनी होती है। उसी बेचैनी से प्रश्न उठा है।
इस बेचैन क्षण का ठीक उपयोग हो सकता है, गलत उपयोग भी हो सकता है। जब पद में न लगे मन, धन में न लगे मन, तो आदमी या तो शराब पीने लगता है कि अब कहीं मन नहीं लगता, तो अब मन को डुबाओ, भुलाओ; पी लो शराब और भूल जाओ सब दुनिया को थोड़ी देर के लिए, विस्मृत हो जाए सब। वह गलत रास्ता हो जाएगा। दूसरा है—परमात्मा के प्रेम की शराब पीने लगता है। पहली शराब शरीर को भी नष्ट कर देगी, मन को भी नष्ट कर देगी और कहीं ले जाएगी नहीं। दूसरी शराब बेहोश भी करती है, होश भी लाती है। यह घड़ी बड़ी बहुमूल्य है तुम्हारी। अगर पद और धन में मन नहीं लग रहा है तो एक बड़ा अवसर है। इसका उपयोग कर लो। इस क्षण को परमात्मा की खोज बनाओ।
और मन किसी का भी सदा के लिए पद और धन में नहीं लग सकता, क्योंकि मन अंततः तो परमात्मा में ही लग सकता है; उससे छोटे में नहीं लग सकता। मन की आत्यंतिक आकांक्षा परम को पाने की है; क्षुद्र को पाने की नहीं। इसलिए तो क्षुद्र को तुम कितना ही पाओ, तृप्ति नहीं होती। दस हजार थे, तब तृप्ति नहीं; दस लाख हो गए, तब तृप्ति नहीं; दस करोड़ हो गए, तब तृप्ति नहीं। मन कहता है: नहीं, इससे कुछ भी नहीं होगा। मन कहता है: जब तक पूरा न मिले...! मीरा कहती है: मैंने पूरा वर पाया! मैंने पूरा प्यारा पाया! कबीर कहते हैं: कहै कबीर मैं पूरा पाया!
उस पूरे को पाए बिना तृप्ति नहीं होगी। मन में वह बीज है। मन उसी की जाने—अनजाने तलाश कर रहा है। कभी—कभी गलत दिशाओं में करता है, फिर थक जाता है; समझ आती है, फिर ठीक दिशाओं को खोजने लगता है।
तो तुम्हारे जीवन में एक क्रांति का एक क्षण आया है। इसका सम्यक उपयोग करो, अन्यथा इससे चूक जा सकते हो। फिर कहीं तो लगाओगे ही मन। कहीं तो भुलाओगे ही। कुछ तो करोगे ही। और नहीं तो फिर बेमन से सरकते रहोगे, बोझ ढोते रहोगे जिंदगी का। जिंदगी में काव्य न रह जाएगा। जिंदगी एक बोझिल बात हो जाएगी—एक उदास घटना हो जाएगी। फिर मौत की प्रतीक्षा ही रहेगी कि कब आए और कब छुटकारा मिले, कब इस झंझट से छूटें।
जीवन झंझट हो जाती है, अगर कोई रस न रहे। पद और धन में रस न रहा अर्थात संसार में रस न रहा, क्योंकि वहां दो ही चीजें हैं—पद और धन; यश और धन। बस वही दो चीजें हैं।
एक चीनी सम्राट अपने महल पर खड़ा था और उसने सागर में चलते बहुत से जहाज देखे। उसने अपने बूढ़े वजीर से पूछा: कितने जहाज चल रहे हैं? कितने होंगे संख्या में, कुछ अंदाज कर सकते हो? उस बूढ़े वजीर ने कहा कि मेरी आंखें ऐसे कमजोर हो गईं, लेकिन अगर आप मुझसे पूछते हो तो दो ही जहाज हैं।
सम्राट ने कहा: दो! सैकड़ों दिखाई पड़ रहे हैं।
उसने कहा: लेकिन मेरे हिसाब से सिर्फ दो ही हैं। जिंदगी भर का अनुभव यह कहता है—या तो लोग धन खोजते हैं या लोग यश खोजते हैं। बस ये दो ही जहाज हैं—धन के यात्रियों के जहाज और यश के यात्रियों के जहाज। फिर कितने ही जहाज हों, वह फिर विस्तार की बात है, मगर जहाज दो ही हैं। अगर यह दोनों जहाज तुम्हें व्यर्थ हुए तो अब परम जहाज को पकड़ो। नानक ने कहा है: नानक नाम जहाज, यह जो नाम का जहाज है उसको पकड़ो। अब परमात्मा को पकड़ो।
मुझे दर्दे दिल की है जुस्तजू मुझे चश्मेतर की तलाश है
मुझे सोजो साजे हयात की गमे मोतवर की तलाश है
जिन्हें शौके जलबाए बाम हैं उन्हें हों नसीब बुलंदियां
मेरा सर जहां से न उठ सके मुझे ऐसे दर की तलाश है
जिन्हें बिजलियों की है आरजू उन्हें शोलगी मिले बर्फ की
मुझे आशियां की है जुस्तजू मुझे बालो पर की तलाश है
जिन्हें जौके कैफो सरूर है वो गरीक मस्तियों हाल हों
मेरे दिल को साकिए मयकदा तेरी इक नजर की तलाश है
है जुनूने सैरे फलक जिन्हें उन्हें राहे कहकशां मिले
मुझे तेरे दर की तलाश है तेरी रहगुजर की तलाश है
है तलाशे लालो गुहर जिन्हें मिलें उन्हें बहरो बर की ये दौलतें
मुझे नक्शे पा की तेरे तलब तेरे खाके दर की तलाश है
जो खुदा के जोया हैं अर्श पर वो खुदा से जाके हों हमसखुन
जिसे ढूंढता फिरे खुद खुदा मुझे उस बशर की तलाश है।
अब तुम्हारी जिंदगी में एक क्रांति का क्षण आया। सौभाग्य का क्षण है यह। इसे अहोभाग्य समझो। अब तुम उसकी खोज में निकलो, जिसकी खोज असली खोज है।
मुझे दर्दे दिल की है जुस्तजू...
अब दिल की पीड़ा खोजो। अब हृदय के प्रेम को खोजो।
...मुझे चश्मेतर की तलाश है
अब उस झरने को खोजो जिसे पीकर तृप्ति हो जाती है; जिसे पीकर सब प्यास बुझ जाती है; जिसे पीने के बाद फिर कोई प्यास नहीं बचती; जिसे पा लेने के बाद फिर कुछ पाने को नहीं बचता।
मुझे सोजो साजे हयात की गमे मोतवर की तलाश है
अब खोजो उस संगीत को, जहां डूब जाओ, विसर्जित हो जाओ; जहां संगीत ही बचे, तुम न बचो। और वैसा संगीत तुम्हारे भीतर पड़ा है। अब बाहर की खोज खत्म हो गई। अगर धन और यश में रस नहीं रहा, तो अब आंख बंद करो; अब भीतर की यात्रा शुरू हो।
जिन्हें शौके जलबाए बाम हैं उन्हें हों नसीब बुलंदियां
मेरा सर जहां से न उठ सके मुझे ऐसे दर की तलाश है।
अब उस घर को खोजो। उस जगह को खोजो जहां एक बार सर झुक गया तो झुक गया, फिर उठ न सके; फिर उठने की कोई जरूरत न रहे; जहां विश्राम है; जहां अंतिम विश्राम आ जाता है, पड़ाव आ जाता है। बहुत रह लिए धर्मशालाओं में, अब घर खोजो।
जिन्हें बिजलियों की है आरजू उन्हें शोलगी मिले बर्फ की
मुझे आशियां की है जुस्तजू मुझे बालो पर की तलाश है।
अब पंख खोजो, जो तुम्हें उड़ा कर ले चलें अनंत की तरफ। बहुत सरक लिए जमीन पर, क्षुद्र में बहुत ज्यादा भटक लिए—अब विराट को खोजो।
जिन्हें जौके कैफो सरूर है वो गरीक मस्तियों हाल हों
मेरे दिल को साकिए मयकदा तेरी इक नजर की तलाश है।
अब उस आंख खोजो जिस आंख को मैं एक दफा झांक लेने पर अमृत बरस जाता है; जहां से ऐसी शराब मिलती है कि उसमें जो डोला सो डोला, डोलता ही रहा—समय के बाहर, सारी परिस्थितियों से मुक्त होकर; जहां होश भी है और जहां बेहोशी भी है; जहां दोनों साथ—साथ हैं; जहां बेहोशी का आनंद पूर्ण है और जहां होश का आनंद भी पूर्ण है।
मेरे दिल को साकिये मयकदा तेरी इक नजर की तलाश है।
वह परमात्मा की एक आंख भर तुम्हें मिल जाए। और वह आंख दूर भी नहीं। और वह आंख तुम्हें खोज रही है। मगर तुम उस आंख से आंख नहीं मिलाते। तुम आंख बचाते हो।
है जनूने सैरे फलक जिन्हें उन्हें राहे कहकशां मिले
मुझे तेरे दर की तलाश है तेरी रहगुजर की तलाश है।
अब परमात्मा के द्वार की, अब परमात्मा के मार्ग की चिंता करो। और तुमने अगर चिंता की तो एक अपूर्व घटना भी घटती है।
है तलाशे लालो गुहर जिन्हें मिलें उन्हें बहरो बर की ये दौलतें
मुझे नक्शे पा की तेरे तलब तेरे खाके दर की तलाश है।
मुझे तेरे पग—चिह्नों की, तेरे द्वार पर पड़ी धूल की...वही मेरा स्वर्ण है, वही मेरी संपदा है।
जो खुदा के जोया हैं अर्श पर वो खुदा से जाके हों हमसखुन
जिसे ढूंढता फिरे खुद खुदा मुझे उस बशर की तलाश है।
और मुझे ऐसी पात्रता दो कि अगर मैं तुम्हें न खोज पाऊं तो तुम मुझे खोज लो। मुझे ऐसा निर्दोष भाव दो, मुझे ऐसी अ—मनी दशा दो, मुझे ऐसी समाधि दो कि शायद मैं तुम्हें न खोज पाऊं। मेरे हाथ छोटे हैं। मेरे पैर छोटे हैं। मेरी तुमसे कोई पहचान भी नहीं। तुम्हें खोजूंगा भी तो कहां खोजूंगा? मुझे तुम्हारा पता—ठिकाना भी मालूम नहीं है। चलूंगा भी तो किस तरफ चलूंगा? मुझे ऐसी क्षमता दो कि अगर मैं तुम्हें न खोज पाऊं तो तुम तो कम से कम मुझे खोज लो।
भक्त जानता है कि मेरी अपात्रता गहन है, मैं कैसे खोज पाऊंगा! इसलिए भक्त कहता है: तुम्हीं मुझे खोज लो।
मगर जिस दिन तुम्हारी प्यास पूरी है और तुम्हारी पुकार पूरी है और तुम्हारे प्राणों में एक ही धुन रह गई है, एक ही धुन बजती है—उस प्यारे की—उस दिन वह तुम्हें जरूर खोजता हुआ आ जाता है।
तुम पूछते हो: "मेरा मन न धन में लगता है न यश में।'
शुभ है। शुभ घड़ी है। तुम सौभाग्यशाली हो। बहुत कम लोग इतने सौभाग्यशाली होते हैं।
"लेकिन मैं यह भी नहीं जानता हूं कि मेरा मन कहां लगेगा।'
मैं जानता हूं कि कहां लगेगा। क्योंकि वही एक जगह है—जहां सभी का मन लगने वाला है। देर—अबेर, आज नहीं कल; कल नहीं परसों; इस जनम में नहीं, अगले जनम में; अगले जनम में नहीं तो और अगले जनम में—मगर एक ही जगह है जहां मन लग सकता है। और कहीं से भी नहीं शांति मिलेगी। हां, थोड़ी—बहुत देर को भुला लो, भटका लो, समझा लो—और बात है। किसी की देह के सौंदर्य में थोड़ी देर भटक सकते हो, धन की खुशी में थोड़ी देर भूल सकते हो, पद की प्रतिष्ठा में थोड़ी देर के लिए मजा आ जाए—मगर बस यह सब क्षणभंगुर है। ये पानी के बबूले हैं; बन भी नहीं पाते और मिट जाते हैं। इनमें मन लगे तो लगे कैसे? इनमें मन लगता ही नहीं। और यह अच्छा है कि परमात्मा ने ऐसी व्यवस्था की है कि हमारा मन इनमें लग नहीं पाता। अगर लग जाता तो परमात्मा की खोज ही नहीं हो सकती थी।
परमात्मा ने तुम्हें पूरा तैयार करके भेजा है। उसके लिए तैयार करके भेजा है। तुम्हें एक ऐसी आकांक्षा दी है कि इस जगत में कोई चीज उसे तृप्त नहीं कर पाएगी, ताकि अंततः तुम भटक कर खोजते—खोजते असली दरवाजे पर पहुंच जाओ।
अब उसी गुरुद्वारे की पुकार आई है। अब उठो, साहस करो और चलो।

तीसरा प्रश्न: मैं जो पा रहा हूं, उसे अपने प्रियजनों को भी देना चाहता हूं, लेकिन कोई लेने को तैयार नहीं है।

* ऐसी अड़चन आती है। मैं ही दे रहा हूं, तुम लेने को तैयार हो? कौन लेने को तैयार है! लेना महंगा धंधा है। यह लेना सस्ती बात नहीं है। क्योंकि लेने में सिर्फ लेना ही होता तो कोई भी ले लेता, लेने में कुछ गंवाना भी पड़ता है। और जो गंवाना पड़ता है, उसे लोग जकड़े हुए हैं, जोर से पकड़े हुए हैं। बामुश्किल उसे पाया है।
जब तुम किसी से कहते हो: ले लो, परमात्मा ले लो, वह कहता है: भाई क्षमा भी करो। अभी बामुश्किल तो मकान बनाया है; अभी बामुश्किल दुकान जमाई है; अभी बामुश्किल थोड़ा धन इकट्ठा किया है; बैंक में अभी—अभी तो खाता खुला है—अभी तुम जरा रुको, अभी नहीं। लेंगे, अभी तो जिंदगी है, अभी जवान हैं। अभी तुम कहां की बेसुरी बात उठा दिए। परमात्मा—यह तो बूढ़ों की बात है; यह तो जब आदमी मरने लगता है तब स्मरण कर लेता है। अभी हम कहां लेंगे!
परमात्मा की बात लोग सुनना भी नहीं चाहते। नहीं सुनना चाहते इसलिए कि वह सौदा महंगा है; वह खतरनाक मामला है। वह बात कहीं कान में पड़ जाए तो फिर कुछ करना पड़ेगा। फिर तुम ऐसे ही बैठे न रह जाओगे; फिर तुम्हें कुछ बदलाहट करनी होगी। वह परमात्मा का नाम भी तुम्हारे भीतर गूंजने लगे तो तुम्हारी जिंदगी में क्रांति होनी शुरू हो जाएगी; तुम्हें पता भी न चलेगा। तुम्हें पता भी न चलेगा कब क्रांति होने लगी।
कल ही काठमांडू से आए एक मित्र ने संन्यास लिया। उन्हें नाम मैंने दिया: भरतयोगी। वे पूछने लगे कि अब मैं क्या करूं, कैसे अपनी जीवन—शैली बदलूं? विचारशील व्यक्ति हैं। मैंने उनसे कहा: तुम जीवन—शैली बदलने की फिकर ही मत करो, तुम सिर्फ ध्यान में लगो। तुम सिर्फ ध्यान में मस्त होओ। वही मस्ती सारी जीवन—शैली को बदल देगी।
जीसस ने कहा है: सीक यी फर्स्ट दि किंग्डम ऑफ गॉड, दैन ऑल एल्स शैल बी ऐडिड अनटू यू। पहले खोजो प्रभु का राज्य, फिर सब अपने आप आ जाएगा।
तो न मैं तुमसे कहता हूं, आचरण बदलो। क्योंकि मैं जानता हूं, तुम आचरण कैसे बदलोगे? धन की खोज जारी है, तुम आचरण कैसे बदलोगे? धन चोरी से मिलता है, बेईमानी से मिलता है। धन की खोज जारी है और तुम आचरण बदलना चाहते हो। आचरण बदलोगे तो धन न मिलेगा। धन पाना चाहते हो तो आचरण कैसे बदलोगे? ज्यादा से ज्यादा पाखंड कर सकते हो, ऊपर—ऊपर दिखाने लगो कि सज्जन हो गए और भीतर—भीतर सब चलता रहे। मुख में राम, बगल में छुरी—ऐसा हो जाएगा। वही तो हुआ है तथाकथित धार्मिकों के जीवन में। पद की खोज चल रही है। सत्ता चाहते हो। कैसे दिल्ली पहुंच जाएं, इसका नशा चढ़ा है। अब तुमसे मैं कहूं आचरण बदल लो; तुम कहोगे: अभी जरा ठहरो। एक दफे पद पर पहुंच जाऊं, फिर बदल लूंगा। मगर पहले पद पर तो पहुंच जाने दो। नहीं तो गए काम से! आचरण बदला तो पद पर कैसे पहुंचेंगे! वहां तो धक्कमधुक्का करोगे तो ही पहुंच सकोगे वहां सज्जन तो पहुंच ही नहीं पाते। वहां तो जो हर हालत में पहुंचने के लिए पागल हैं: जो सिर देकर घुस जाते हैं; कुछ भी हो, मगर पहुंच कर ही रहना है। वहां तो जो सबसे ज्यादा पागल हैं, वे पहुंच पाते हैं। वहां जिनमें थोड़ी—बहुत समझ—बूझ है, वे नहीं पहुंच पाते। कैसे पहुंचेंगे? क्योंकि समझ—बूझ ही बाधा बन जाती है। वे देखते हैं सारी व्यर्थता; इतना उपद्रव, इसमें सार क्या है। वे किनारे पर ही खड़े रह जाते हैं। मूढ़ सिर देकर घुस जाते हैं।
राजधानियों में विक्षिप्त ही पहुंच पाते हैं। जिनमें थोड़ी सोच—समझ है, वे तो कभी रास्ते के किनारे खड़े हो जाएंगे। वे कहेंगे: जाओ, जिनको जाना है जाओ, मुझे छोड़ो, मुझे बख्शो। क्योंकि वहां सिवाय मार—पिटाई के और कुछ भी नहीं है; खींचातानी के कुछ नहीं है। पद पर बैठो तो लोग तुम्हारी टांगें खींच रहे हैं। पद पर न बैठो तो तुम दूसरों की टांगें खींच रहे हो। मगर खींचा—खिंचाई जारी रहती है। इसमें कोई फर्क पड़ता ही नहीं।
सच तो यह है कि पद पर बैठ कर जितनी मुश्किल हो जाती है उतनी पद पर बैठने के पहले कभी भी नहीं थी; न हो तो तुम मोरारजी भाई से पूछ लो। पद पर जब तक नहीं हो, तब तक ठीक है, धक्कमधुक्की कर रहे हो, ठीक है। कुछ खोने को तो है नहीं, मिलेगा कुछ तो मिल जाएगा; नहीं मिला तो कुछ खोने को तो है नहीं। लेकिन एक दफे पद पर पहुंच गए, फिर अड़चन होती है; अब खोने का डर पैदा होता है। क्योंकि अब खींच रहे हैं लोग। और ऐसा नहीं है कि दुश्मन खींचते हैं; दुश्मन तो दूर हैं, वे जो मित्र, जो पास हैं, वे ही असली खींचतान करते हैं। एक तरफ जगजीवनराम खींचेंगे, एक तरफ चरणसिंह खींचेंगे। क्योंकि वे करीब हैं, कुर्सी के इतने करीब हैं कि वे क्यों न बैठें। ऊपर—ऊपर दोस्ती चलती है, भीतर—भीतर दुश्मनी चलती है।
राजनीति में, कहते हैं, कोई किसी का दोस्त नहीं होता। राजनीति में कोई किसी का दोस्त हो ही नहीं सकता। वहां दोस्ती संभव ही नहीं है। वहां तो सब दुश्मन हैं। जिनको दोस्त कहो, वह भी दुश्मन है। जिनको दुश्मन कहो, वे तो हैं ही। वहां हर आदमी अपने अहंकार की तृप्ति में लगा है, दोस्ती हो कैसे सकती है?
तो जो पद की तरफ भाग रहा है उससे कहो कि तुम अपना आचरण ठीक कर लो, वह कहेगा: आप कहां की बातें कर रहे हो! मेरी जिंदगी की यात्रा खराब करवा देंगे! क्योंकि आचरण ठीक हुआ कि फिर यह यात्रा नहीं हो सकती।
दुराचरण गति है राजनीति में। वहां जितना क्रूर, जितना कठोर, जितना दुष्ट, जितना हिंसक, जितना आक्रामक चित्त हो—उतनी ही आसानी है। शांत आदमी तो दूर खड़ा रह जाएगा। गुबार उड़ती रह जाएगी, कारवां निकल जाएगा। शांत आदमी पहुंच ही नहीं पाएगा उस भीड़—भड़क्के में।
तो मैं तुमसे न तो कहता आचरण बदलने को, क्योंकि मैं तुम्हें जानता हूं कि तुम यह न कर सकोगे। मैं तुमसे यह भी नहीं कहता कि तुम पद छोड़ दो, धन छोड़ दो; क्योंकि यह तुमसे बहुत जरूरत से ज्यादा मांगना हो जाएगा। मैं तुम्हें कुछ और ही बात कहता हूं। मैं कहता हूं: तुम ध्यान में डुबकी लो, थोड़ा ध्यान का स्वाद लो। ध्यान का स्वाद आए तो धन का स्वाद फीका हो जाता है। ध्यान का स्वाद आए तो पद का स्वाद फीका हो जाता है। इधर ध्यान का स्वाद बढ़ने लगता है, उधर पुराने स्वाद फीके होने लगते हैं। और जब पुराने स्वाद फीके होने लगते हैं तो पुराने स्वादों के कारण जो आचरण था वह अपने आप खंडहर होने लगता है। उसे बदलना नहीं पड़ता। यह रसायन है आध्यात्मिक जीवन का। यह उसका सार—विज्ञान है।
तो तुम जो पा रहे हो उसे तुम एकदम से दूसरों को देना चाहोगे, वे लेने को राजी न होंगे। अभी उनको उस तरह की संपत्ति चाहिए ही नहीं। इसलिए अकारण चेष्टा न करना। नहीं तो लोग तुमसे ऊबेंगे। लोग तुमसे बचने लगेंगे। तुम्हें देख लेंगे तो दूसरी गली में निकल जाएंगे जल्दी से कि यह भय्या आ रहा! यह कुछ ज्ञान देगा। अभी हमको ज्ञान चाहिए नहीं।
नहीं, इस तरह तुम सलाह बिना मांगी देना भी मत। तुम आनंदित होओ। बजाए इसके कि तुम उपदेश दो, आनंदित होओ। तुम्हारा आनंद ही तुम्हारा उपदेश बनेगा। शांत हो जाओ, मग्न हो जाओ।
पद घुंघरू बांध मीरा नाची रे।
नाचो! हां, जिसको तुम्हारा नाच रुच जाएगा, वह आकर तुमसे पूछेगा कि ऐसा नाच का ढंग मुझे भी...। ऐसा नाच मेरे जीवन में कैसे हो सकेगा? यह शांति तुम्हें कहां मिली? ये तुम्हारी आंखें मानसरोवर जैसी झील कहां बनीं? यह तुम्हारा हृदय, कहां पाया? मुझे भी उस खदान के पास ले चलो। या मुझे भी वह राह बता दो। मुझे भी इशारा दे दो। मुझे भी नक्शा दे दो।
जब कोई आकर तुमसे पूछे तो देना, नहीं तो मत देना। बिना मांगी सलाह देना व्यर्थ है, कोई लेता नहीं। हां, कोई मांगता हो तो जरूर देना।
तुम्हारी तकलीफ भी मैं समझता हूं। जब आनंद मिलना शुरू होता है तो बंटना चाहता है। और जो तुमसे मांगने आए, यह भी जरूरी नहीं है कि वह तुम्हारी माने ही। क्योंकि हो सकता है तुम्हारे आनंद को देख कर लोभ में पड़ गया हो और पूछे कि कहां मिला; लेकिन जब देखे कि लंबा मार्ग है, पहाड़ों की यात्रा है, चढ़ाई है और बहुत कुछ दांव पर लगाना होगा—तो कहेगा कि धन्यवाद, आपने सलाह दी, बात ठीक है। कभी जरूरत होगी तो उपयोग कर लूंगा। तो दुखी मत हो जाना।
इस दुनिया में हजार में से नौ सौ निन्यानबे तो पूछेंगे ही नहीं, क्योंकि वे ऐसी झंझटों में पड़ना ही नहीं चाहते। वे बच कर निकल जाते हैं। वह जो एक पूछेगा, वह भी मानेगा या नहीं मानेगा, यह पक्का नहीं है। तुम उंडेल देना अपना हृदय उस पर, लेकिन यह अपेक्षा मत रखना कि वह माने; नहीं तो तुम अकारण दुखी होओगे।
और दूसरे को सुख देने गए और खुद दुखी हो गए—तो बात ही खराब हो गई। चिकित्सा करने गए थे और खुद बीमार पड़ गए—ऐसी झंझट में न पड़ना। अपेक्षा मत रखना। अपेक्षा रखना ही मत। कोई माने, उसकी मर्जी; न माने, उसकी मर्जी। मान ले तो ऐसा मत सोचना कि मैंने कोई बड़ा काम किया, नहीं तो उससे अहंकार मजबूत होने लगेगा। न माने तो यह मत सोचना कि उसने तुम्हें दुत्कार दिया। इसकी तुम फिकर ही मत करना। तुम तो फूल की तरह खिलना। कोई सुवास ले ले, ठीक; कोई न ले ठीक। कोई राह से गुजरे ठीक; कोई न गुजरे तो ठीक। फूल कहां फिकर करता है! फूल अपनी सुवास बांटता रहता है। ले ले, उसकी मर्जी; न ले, उसकी मर्जी। जो ले उसका धन्यवाद, जो न ले उसका धन्यवाद।
मेरी निगाह में हुशियार हैं वो दीवाने
जो जानबूझ के खुद ही बने अनजाने
ये शहरवाले भला उनकी शान क्या जानें
जो बस्तियों को भी शर्मा रहे हैं वीराने
वो वक्फ रखते हैं अपने लिए ही राजे हयात
जो लौ का जुज्व कभी बन सके न परवाने
तेरी नजर से जो देखा तो कोई गैर न था
मेरी नजर में तो अपने थे और बेगाने
यही थी तेरी रजा इक सदा लगा के चले
अब इससे क्या मेरी कोई माने या न माने
कोई भी आज हमें पूछता नहीं इक दिन
जबाने खल्क पै होंगे हमारे अफसाने।
तुम फिकर न करना। अगर परमात्मा ने तुम्हें भीतर से आवाज दी कि दे दो इसे, जो तुम्हें मिला है उसकी इसे खबर दे दो, और यह आदमी तुम्हारे द्वार पर पूछने आया है—तो ठीक।
यही थी तेरी रजा इक सदा लगा के चले
अब इससे क्या मेरी कोई माने या न माने।
कोई माने न माने, इस चिंता में जरा भी न पड़ना। नहीं तो दूसरे को तो दे ही न पाओगे; खुद जो पाया है वह भी खो जा सकता है।

आखिरी प्रश्न: आप जैसे महान दाता के सामने होते हुए भी मेरा भिक्षापात्र क्यों नहीं भरता है?

* भिक्षापात्र कभी भरता ही नहीं। तुम भिखारी की तरह मेरे पास आओ ही नहीं। यहां सम्राटों का काम है। भिक्षापात्र फेंको। मैं थोड़े ही तुम्हें कुछ दे रहा हूं। तुम्हारे भीतर जो पड़ा है, उसको जगाना है; भिक्षापात्र की कोई जरूरत नहीं। भिक्षापात्र तो तब होता है, जब दूसरे से कुछ लेना हो। मैं तो जो तुम्हारे पास है, वही तुम्हें दे रहा हूं और तुम्हारे पास जो नहीं है, वही तुमसे ले रहा हूं। तुम्हारे पास जो कूड़ा—कर्कट तुमने इकट्ठा कर लिया है, जो वस्तुतः तुम्हारी संपत्ति नहीं है, वह छीन रहा हूं। और तुम्हें वही दे रहा हूं जो हीरा तुम्हारे भीतर पड़ा है। मैं तुम्हें कुछ अलग से नहीं दे रहा हूं। मैं कुछ तुम्हें अपने भीतर से नहीं दे रहा हूं। तुम्हारी ही तुम्हें याद दिला रहा हूं।
तो अगर भिक्षापात्र लेकर आओगे तो खाली रह जाओगे क्योंकि बात ही गलत हो गई। यहां काम सम्राटों का है। यहां मांगने मत आओ, यहां जागने आओ। मांग की बात ही गलत है। अपने को भिखारी मान लेने में ही भूल हो जाती है। वही तो तुमने संसार में किया; अपने को भिखारी समझा—कभी धन मांगा, कभी पद मांगा, कभी यश मांगा—वहां भी भीख मांगते रहे; अब यहां भी आ गए, मगर भिक्षापात्र साथ ही ले आए।
यह भीख मांगने की आदत छोड़ो। परमात्मा यहां किसी को भिखारी बना कर भेजता ही नहीं। परमात्मा सम्राट से कम किसी को बनाता ही नहीं। यहां सभी को सम्राट की तरह भेजता है; फिर तुम अपनी भूल से भिखारी हो जाओ, यह तुम्हारी मर्जी।
भिक्षापात्र तोड़ो! जला डालो! भिक्षापात्र कभी किसी का नहीं भरा है। क्योंकि भिखारी का मन ही नहीं भर सकता। वह भिखारी के मन की क्षमता नहीं।
एक भिखारी ने एक सम्राट के द्वार पर दस्तक दी थी—भिक्षापात्र सामने कर दिया था। सम्राट ने कहा: क्या चाहते हो? भिखारी ने कहा: कुछ भी दें, चलेगा। एक शर्त है: मेरा पूरा पात्र भर दें। सम्राट ने कहा: यह भी कोई शर्त हुई? तू किसके सामने खड़ा है, यह तुझे पता है? तू सम्राट के सामने खड़ा है। किस चीज से भर दूं? भिखारी ने कहा: कूड़े—कर्कट से भी भरो, चलेगा, लेकिन भर दो। खाली—खाली से बहुत तंग आ गया हूं। भरता ही नहीं।
सम्राट भी मौज में था। और इस भिखारी ने बड़ी चुनौती दे दी और यह आदमी कुछ अजीब मालूम होता था। आंख में इसके कुछ पलट थी। देह में इसके कुछ ज्योति थी। साधारण भिखारी नहीं मालूम होता था। असल में सम्राट थोड़ा फीका लग रहा था। उसने अपने वजीरों को कहा कि लाओ हीरे—जवाहरातों से इसका पात्र भरो। मुझसे कभी किसी ने यह चुनौती दी भी न थी।
हीरे—जवाहरातों से पात्र भरा जाने लगा, तब सम्राट समझा कि चूक हो गई। वह पात्र भरे ही न। हीरे—जवाहरात उसमें गिरें और खो जाएं। वह खाली का खाली रहे। मगर सम्राट भी जिद्दी था। उसने कहा: चाहे सारा खजाना खाली हो जाए, चाहे मेरी सारी संपदा, सारा राज्य चला जाए, मगर इसका पात्र भरना है। मैं सम्राटों से नहीं हारा, आज भिखारी से नहीं हारूंगा।
मगर जो सम्राटों से नहीं हारा था, सांझ होते—होते भिखारी से हार जाना पड़ा। सारे खजाने खाली हो गए। भिक्षापात्र खाली का खाली था। सम्राट उस भिखारी के पैर में पड़ गया। उसने कहा: मुझे शक पहले हुआ था। जब मैंने तेरी आंखें देखी थीं और तेरी ज्योति देखी थी, तब भी मैं थोड़ा डरा था। उसी से चुनौती भी ले ली थी कि तुझे नीचा दिखाना है। मगर मुझे क्षमा कर। इतना ही कह दे कि इस तेरे भिक्षापात्र का राज क्या है। यह तो जादुई मालूम होता है। हम भर—भर कर थके जा रहे हैं, इसमें कुछ पता ही नहीं चलता; यह खोता जाता है।
वह फकीर हंसा। उसने कहा: यह भिक्षापात्र साधारण भिक्षापात्र नहीं है। जादू इसमें कुछ नहीं है। इसे मैंने आदमी के भिखारी—मन से बनाया है। यह आदमी का भिखारी—मन है। यह कभी नहीं भरता। यह सिकंदर का नहीं भरता। यह नेपोलियन का नहीं भरता। यह रॉकफेलर का नहीं भरता। यह बिरला का नहीं भरता। यह किसी का नहीं भरता। यह भरता ही नहीं। भरना इसका लक्षण नहीं है।
तुम मेरे पास आओ—भिखारी होकर न आओ। मैं तुम्हारा भिक्षापात्र नहीं भरूंगा। मैं उस सम्राट जैसा नासमझ नहीं हूं। तुम मुझे चुनौती भी दो तो भी नहीं।
पूछने वाले का इरादा यही है।
पूछता है: "आप जैसे महान दाता...!'
मुझको फुसलाने की कोशिश चल रही है। इस तरह की बात यहां काम नहीं आएगी। मैं दाता हूं ही नहीं। यहां देने का सवाल नहीं है, तुम्हारे पास पड़ा है, सिर्फ तुम्हें याद दिलानी है। मैं तुम्हें याद दिलाने की क्षमता दे सकता हूं; स्मरण दिला सकता हूं। सुधि आ जाए, सुरति आ जाए—बस हो गई बात। मगर जो तुम पाओगे वह तुम्हारा है; वह किसी और का नहीं है।
तो तुम कहते हो: "आप जैसे महान दाता के सामने होते हुए भी मेरा भिक्षापात्र क्यों नहीं भरता है?'
तुम भिखारी हो तो तुम्हारा भिखारीपन मुझे दाता बनाने की चेष्टा में लगा है। मैं चाहता हूं: तुम्हारा भिखारीपन छूट जाए। तुम चाहते हो: मैं दाता हो जाऊं।
मैं दाता नहीं हूं। दाता होने की बात ही मूढ़तापूर्ण है। तुम सब परमात्मा के रूप हो। तुम्हारे पास कमी क्या है, जो तुम किसी से मांगो या किसी को दाता कहो? न यहां कोई दाता है, न यहां कोई भिखारी है; यहां एक ही है। जो तुममें बैठा है, वही मुझमें बैठा है। तुम मुझे धोखा न दे पाओगे। तुम्हारी चुनौतियां यहां कुछ काम न करेंगी।
यह पूछा है "कुसुम' ने। होशियार है बहुत। वह सोचती है, इस तरह शायद मैं उसका पात्र भर दूं। पात्र जब तक तेरे हाथ में है कुसुम, तब तक तू न भर सकेगी। तू पात्र फेंक दे। पात्र के फेंकते ही पता चलेगी कि भीतर तो सब भरा ही हुआ है। यह पात्र पर नजर अटकी है, यही उलझन है।
जहाने शौक की नाकामीओ तही दस्ती
हमारी कमनजरी के सिवा और कुछ नहीं।
यह हमारा खाली हाथ हमारी दृष्टि की कमी है, और कुछ भी नहीं।
जहाने शौक की नाकामीओ तही दस्ती
यह हमारा खाली होना, खाली हाथ—
हमारी कमनजरी के सिवा और कुछ नहीं
ये दर्दे हिज्र ये बेचारगी ये महरूमी
दुआ की बेअसरी के सिवा कुछ और नहीं।
हमारी प्रार्थना कमजोर है, इसलिए हमें मांगना पड़ता है। प्रार्थना मांग नहीं है, ध्यान रखना। जिस प्रार्थना में मांग है, वह कमजोर है। प्रार्थना तो सिर्फ अहोभाव है; आनंद—भाव है। प्रार्थना धन्यवाद है—इस बात का कि परमात्मा ने जितना दिया, वह जरूरत से ज्यादा है; पहले ही जरूरत से ज्यादा है। उसने पहले ही इतना दिया है कि जो चुक न सके। उसने न चुकने वाला दिया है।
ये दर्दे हिज्र ये बेचारगी ये महरूमी
यह हमारा दुख, यह हमारी कमजोरी, यह हमारी असहाय अवस्था—
दुआ की बेअसरी के सिवा कुछ और नहीं।
हमें प्रार्थना करनी नहीं आई अभी तक, इसीलिए।
गरूरे इल्मो फखरे अकलो दानिशो फन
जहूरे बेखबरी के सिवा कुछ और नहीं।
और हमारा तथाकथित ज्ञान, पांडित्य हमारी गहरी अज्ञानता के सिवा कुछ और नहीं। क्योंकि हम ज्ञान को पकड़ने चलते हैं—इसी आशा में कि हमने मान रखा है कि हम अज्ञानी हैं; ज्ञान को पकड़ लेंगे तो ज्ञानी हो जाएंगे। हम सोचते हैं खूब शब्द इकट्ठे कर लेंगे तो ज्ञानी हो जाएंगे; सिक्के इकट्ठे कर लेंगे तो धनी हो जाएंगे; पुण्य इकट्ठा कर लेंगे तो पुण्यात्मा हो जाएंगे।
नहीं, यह धारणा गलत है। तुम पुण्यात्मा हो; इकट्ठा करना बंद करो। तुम ज्ञानी हो; ज्ञान इकट्ठा करना बंद करो। तुम धनी हो; तुम धन की मांग बंद करो। तुम सारी मांग छोड़ कर एक बार अपने को देख तो लो! एक बार, सिर्फ एक बार अपने पर नजर तो डाल लो! और सब हो जाएगा।
हिजाबे रंगे खुदी हो कि बेखुदी का जमाल
बशर की दीदावरी के सिवा कुछ और नहीं।
या तो इस दुनिया का सारा रंग—बिरंगापन, ये फूल, ये पत्ते, ये चांदत्तारे, यह सारे जगत का सौंदर्य—वह जो मीरा कहती है कि राणा, तेरा देश बड़ा प्यारा—रंगरूड़ो देशलड़ो—तेरा देशलड़ा बहुत रंगरूड़ा, बड़ा रंगीन, लेकिन तेरे देश में साध नहीं, साधु नहीं, इसलिए मेरा मन नहीं रमता, मुझे नहीं भाता, कुछ कमी है। तो चाहे बाहर का रंग, यह बाहर का सौंदर्य हो और चाहे तुम्हारे भीतर जब शांति और आनंद के फूल खिलते हों, वे हों, अंतिम निष्कर्ष में...
हिजाबे रंगे खुदी हो कि बेखुदी का जमाल
इस दुनिया का सौंदर्य हो या कि आत्म—विस्मृत जब तुम हो गए हो, समाधि में खो गए हो, तब का जमाल हो...
बशर की दीदावरी के सिवा कुछ और नहीं
...सब आंख का ही खेल है। बस आंख चाहिए। जिसके पास बाहर ठीक से आंख, देखने की क्षमता है, वह परम सौंदर्य को देख लेता है। जिसके भीतर देखने की क्षमता है, वह भीतर परम सौंदर्य को देख लेता है। असली बात आंख की है। असली बात दृष्टि की है।
तुम भिखारी नहीं हो।
और यही मेरे संन्यास का संदेश है कि तुम भिखारी नहीं हो। तुम मालिक हो। तुम साहिब हो। इस वचन को याद में रखना:
वो नगमा जो हुआ तखलीक कोहसारों में
जवां हुआ जो हिमाला के पाकगारों में
लतीफ जिसका तरन्नुम है आबशारों में
रवां दवां है जो गंगो—जमन के धारों में
जगाओ नगमाए संन्यास को ओम् तत् सत् ओम्
जिसे जहान की अलाइशें न छू सकें
जनों पिसर की कोई बंदिशें न छू सकें
जमानों जर की जिसे ख्वाहिशें न छू सकें
हसूले मरतबा की काविशें न छू सकें
वो पाक नगमाए संन्यास ओम् तत् सत् ओम्
बस एक ओम् को अपनाओ ओम् तत् सत् ओम्
बस ओम् में ही समा जाओ ओम् तत् सत् ओम्
तुम अपनी अस्ले खुदी पाओ ओम् तत् सत् ओम्
जन्म मरन से निकल जाओ ओम् तत् सत् ओम्
लगाओ नाराए संन्यास ओम् तत् सत् ओम्!
संन्यास तुम्हें भिखारी बनाने को नहीं। इसलिए बुद्ध का प्यारा शब्द भिक्षु मैंने नहीं चुना संन्यासी के लिए—स्वामी चुना। भिक्षु भी प्यारा शब्द है, लेकिन भिखारी से मेल खाता है। तो कहीं भ्रांति न हो, इसलिए स्वामी चुना।
स्वामी तुम हो। मालिक तुम हो। सम्राट तुम हो। साहिब तुम हो।
तोड़ो भिक्षापात्र। आग लगा दो भिक्षापात्रों में। मांगना बंद करो—और तुम पाओगे कि जो भी तुम चाहते थे, वह सदा से मिला हुआ है।

आज इतना ही।