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सोमवार, 11 जुलाई 2016

पद घुंघरू बांध--(प्रवचन--05)

      पद घुंघरू बांध(प्रवचन—पांचवां)  
पद घुंघरू बांध मीरा नाची रे
सूत्र:

माई री मैं तो लियो गोबिन्दो मोल।
कोई कहै छाने कोई कहै चौड़े लियो री वजंता ढोल।
कोई कहै मुंहगो कोई कहै सुंहगो लियो री तराजू तोल।
कोई कहै कारो कोई कहै गोरो, लियो री अमोलिक मोल।
याही कूं सब लोग जाणत हैं, लियो री आंखी खोल।
मीरा को प्रभु दरसण दीज्यो, पूरब जनम के कौल।


मैं गोविन्द गुण गाणा।
राजा रूठै नगरी राखै, हरि रूठया कहं जाणा।
राणा भेजा जहर पियाला, इमरत करि पी जाणा।
डिबिया में भेज्या ज भुजंगम, सालिगराम करि जाणा।
मीरा तो अब प्रेम दीवानी, सांवलिया वर पाणा।

पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे।
मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।
लोग कहैं मीरा भई बावरी, सास कहैं कुलनासी रे।
विष का प्याला राणाजी भेज्यां, पीवत मीरा हांसी रे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिले अविनासी रे।


रमात्मा की खोज में तो बहुत लोग निकलते हैं, लेकिन खोज नहीं पाते, क्योंकि मूल्य चुकाने की तैयारी नहीं होती; मुफ्त पाना चाहते हैं; बिना कुछ दिए पाना चाहते हैं; जरा सी भी आंच न आए, और पाना चाहते हैं; एक कांटा पैर में न चुभे, और पाना चाहते हैं। इसलिए पाने की आकांक्षा भी होती है, फिर भी हाथ कुछ नहीं लगता है। और जब हाथ न लगे तो आदमी का अहंकार बहुत कुशल है। जब परमात्मा हाथ नहीं लगता तो फिर उनका तर्क वही होता है जो लोमड़ी का तर्क: जब अंगूर हाथ नहीं लगते, लोमड़ी कहती है खट्टे हैं।
जब परमात्मा हाथ नहीं लगता तो लोग सोचने लगते हैं परमात्मा है ही नहीं—होता तो हाथ लगता।
लोग नास्तिक बन जाते हैं। आस्तिक बनने के लिए कोई कीमत नहीं चुकाई। और जब बिना कीमत चुकाए परमात्मा की कोई खबर नहीं मिलती तो नास्तिक बन जाते हैं।
जब भी मैं किसी नास्तिक को देखता हूं तो मैं हारे हुए आस्तिक को पाता हूं। किसी जन्म में, किसी यात्रा में उसने बड़ी कोशिश की होगी; मगर कोशिश ऐसी रही होगी कि अपने को बचा कर की होगी। पूजा का थाल सजाया होगा। पूजा के थाल में दीया जलाया होगा; लेकिन अपने को नहीं जलाया। और तुम्हारा पूजा का थाल व्यर्थ है, अगर तुम्हीं उसमें नहीं जल रहे हो। फूल चढ़ाए होंगे; लेकिन वे फूल अपने प्राणों के नहीं थे, वे किन्हीं वृक्षों पर खिले फूल थे। स्वयं में खिले फूलों को जो चढ़ाता है—वही पाता है। गीत भी गुनगुनाया होगा, भजन भी किया होगा, कीर्तन में भी सम्मिलित हुए होओगे; लेकिन उस कीर्तन में तुम्हारे अपने स्वर नहीं थे; सब उधार था, बासा था। औपचारिकता थी; हार्दिकता नहीं थी; दीवानापन नहीं था।
और जब तक प्रेम पागल न हो, तब तक प्रेम ही नहीं; पागल होकर ही प्रेम का पद पाता है। प्रेम बिना पागलपन के घृणा से भी बदतर है, क्योंकि थोथा और नपुंसक होगा। घृणा में तो कुछ बल होता है। और जब नहीं मिलता परमात्मा तो विषाद की उन घड़ियों में मन अपने को यही समझा कर सांत्वना देता है कि होता तो मिलता; है ही नहीं। फिर एक इनकार पैदा होता है। एक नास्तिकता का जन्म होता है। फिर आदमी यही कहे चला जाता है कि ईश्वर है ही नहीं; प्रमाण कहां है?
प्रमाण का प्रश्न ही नहीं है। मूल्य जिसके पास है उसके लिए प्रमाण है। जो देने को राजी है वह पाएगा। और देना भी ऐसा नहीं है कि थोड़ा—बहुत देने से चल जाए—पूरा ही पूरा देना होगा। क्योंकि परमात्मा अखंड है; उसके टुकड़े नहीं हो सकते। ऐसा नहीं है कि हम आधा देते हैं तो थोड़ा सा परमात्मा मिल जाए; कि जितना हम देते हैं उतना मिल जाए। परमात्मा के खंड नहीं हो सकते। तो तुम जब तक अखंड ही समर्पित न होओगे, तब तक उसे न पाओगे। तुम्हारी समग्रता ही चढ़नी चाहिए। शहीद हुए बिना परमात्मा को कोई पाता नहीं।
इसलिए सूफी फकीरों ने शहादत शब्द के दो अर्थ लिए हैं—और बड़े मूल्यवान अर्थ हैं। शहादत का एक तो अर्थ होता है: जो शहीद हो गया; और एक अर्थ होता है: जो परमात्मा का साक्षी हो गया। शहादत का अर्थ होता है: साक्षी। और दोनों बातें जुड़ी हैं। दोनों एक ही घटना के हिस्से हैं, पहलू हैं। जो परमात्मा के चरणों में शहीद हो गया, वही उसका गवाह होता है; वही उसका साक्षी होता है; वही उसे देख पाता है। जो मिटता है वही देख पाता है। जिसने अपने को बचाया वह कितना ही दौड़े, कितना ही शोरगुल मचाए—सब व्यर्थ है। वह कितना ही तर्क करे, विचार करे; पूजा, विधि—विधान करे; तंत्र—मंत्र, योग में उलझे—सब व्यर्थ है, सब असार जाएगा।
एक ही बात करने जैसी है—वह है: अपने सारे प्राणों को उसके चरणों में समर्पित कर देना। और निश्चित ही अभी उसका हमें पता नहीं है। इसलिए जो व्यक्ति अज्ञात के प्रति समर्पण कर सकता है, वही उसे पा सकता है। मिल जाए परमात्मा फिर तो समर्पण करना बहुत आसान है। लेकिन अड़चन यही है कि मिलता तब है, जब समर्पण हो जाए। तो समर्पण तो जुआरी ही कर सकते हैं। जिन्हें लाभ इत्यादि की चिंता है, जो हिसाब—किताब कर रहे हैं—भक्ति का मार्ग उनके लिए नहीं। यह तो हिम्मतवर दुस्साहसियों का मार्ग है।
आज के सूत्र इसी दुस्साहस की तरफ खबर देने वाले सूत्र हैं।
माई री मैं तो लियो गोबिन्दो मोल।
मीरा कहती है: मैंने तो खरीद लिया गोविंद को।
कैसे खरीदा मीरा ने? कोई कैसे खरीदता है परमात्मा को? मिट कर खरीदा। अपने को गंवा कर पाया। अपनी गर्दन रख दी वहां उसके चरणों में। बस वही बाधा थी।
तुम्हारा सिर ही बाधा है। तुम्हारा अहंकार ही बाधा है। उसी को चढ़ा दिया, तो परमात्मा तुम्हारा हो जाता है।
फिर देखता हूं तो तेरा रूप नजर आता है
और सुनता हूं तो तेरी आवाज सुनता हूं
देखता हूं तो तेरा रूप नजर आता है
और सुनता हूं तो आवाज तेरी सुनता हूं
सोचता हूं तो फकत याद तेरी आती है
जिक्र करता हूं तो मैं जिक्र तेरा करता हूं
खामशी मेरी तेरा नगमाये खाबीदा है
मेरी आवाज? जो तू कहता है मैं कहता हूं
जां तो जां, जिस्म भी रोशन है तेरी लौ से मेरा
तेरे ही नूर से मैं शमा सिफ्त जलता हूं
भूख लगती है तो लगती है तेरे प्यार की भूख
चरण अमृत से ही मैं प्यास बुझा सकता हूं।
इधर तुम मिटे कि क्रांति हुई। तुम ही पर्दे की तरह पड़े हो अपनी आंख पर।
लोग पूछते हैं कि परमात्मा पर पर्दा क्यों है? परमात्मा पर पर्दा है ही नहीं। परमात्मा बेपर्दा है। परमात्मा नग्न खड़ा है। तुम्हारी आंख पर पर्दा है। तुम्हारी आंख पर जाली है। तुमने आंख पर पत्थर के चश्मे लगा रखे हैं। धारणाएं, सिद्धांत, शास्त्र, मंदिर—मस्जिद, पंडित—पुरोहित—सब तुम्हारी आंखों में भर गए हैं। और उनकी वजह से परमात्मा के लिए प्रवेश की कोई जगह नहीं है। तुम्हारी आंखें अतिशय से भरी हुई हैं। यह गर्दन झुके। यह सिर चढ़े।
तो फिर देखता हूं तो तेरा रूप नजर आता है।
फिर जहां तुम देखोगे—आंख खोलोगे तो वही; आंख बंद करोगे तो वही।
और सुनता हूं तो आवाज तेरी सुनता हूं।
फिर पक्षियों की चहचहाहट में और आकाश से गुजरते हुए बादलों की गड़गड़ाहट में और वृक्षों से सरकती हुई हवाओं की ध्वनि में और पानी के झर—झर में—सब तरफ उसी की आवाज है। उसके अतिरिक्त कोई है ही नहीं। यही आश्चर्य है कि कैसे हम उसे देखने से वंचित हैं! जो सब तरफ मौजूद है—वृक्षों की हरियाली में और आकाश की नीलिमा में और लोगों की आंखों में और लोगों के आंसुओं में और मुस्कुराहटों में—सब तरफ जो मौजूद है। मेरे बोलने में और तुम्हारे सुनने में जो मौजूद है। इधर तुम्हें घेरे हुए है। तुम जहां रहो सदा तुम्हें घेरे हुए है। और आंख बंद करो तो भीतर भी वही है।
सोचता हूं तो फकत तेरी याद आती है
जिक्र करता हूं तो मैं जिक्र तेरा करता हूं।
फिर तुम जो बोलोगे वह उसी का नाम है। जो बोलूं सो हरि—कथा! फिर तुम जो बोलोगे, वही उसकी कथा है। अभी भी तुम जो बोल रहे हो, वह उसकी ही कथा है; सिर्फ तुम पहचानते नहीं।
खामशी मेरी तेरा नगमाये खाबीदा है।
फिर तुम बोलोगे तो उसकी कथा और तुम चुप रहोगे तो भी उसका गीत तुम्हारे भीतर गूंजेगा—उसका अनाहत नाद!
मेरी आवाज? जो तू कहता है मैं कहता हूं।
फिर तुम्हारी कोई आवाज न रह जाएगी। यह ढंग है गोविन्द को मोल लेने का—जब तुम न रह जाओ; तुम्हारी आवाज न रह जाए; तुम्हारा अपना कुछ न रह जाए।
जां तो जां, जिस्म भी रौशन है तेरी लौ से मेरा
प्राणों की तो बात छोड़ो, मेरी देह भी तेरी ही ज्योति से दीप्त है।
जां तो जां, जिस्म भी रौशन है तेरी लौ से मेरा
तेरे ही नूर से मैं शमा सिफ्त जलता हूं।
और फिर तुम पहचानोगे कि तुम किसके नूर से जल रहे हो; कौन तुम्हारे इस मिट्टी के दीये में ज्योति बना है; यह तुम्हारी चेतना क्या है; यह तुम्हारा होश क्या है; यह तुम्हारा बोध क्या है। यह परमात्मा की किरण है तुम्हारे भीतर। यह तुम्हारी देह में जो चमक रहा है, यह तुम्हारी आंख से जो झांक रहा है, यह जो मुझे सुन रहा है इस क्षण खामोशी से—वही है।
जां तो जां, जिस्म भी रौशन है तेरी लौ से मेरा
तेरे ही नूर से मैं शमा सिफ्त जलता हूं
भूख लगती है तो लगती है तेरे प्यार की भूख
चरण अमृत से ही मैं प्यास बुझा सकता हूं।
लेकिन यह क्रांति तभी घटती है गोविंद को मोल लेने की, जब तुम अपने को बेच दो।
माई री मैं तो लियो गोबिन्दो मोल।
किसी ने इतनी हिम्मत से इस तरह की बात नहीं की कि मैंने परमात्मा को खरीद लिया। यह तो दीवाने ही कह सकते हैं। यह तो बावरे ही कह सकते हैं। यह दुकानदारों की बातचीत नहीं है। यह तो दुस्साहसी ही कह सकते हैं। यह तो वे ही कह सकते हैं जिन्होंने अपने को समर्पित कर दिया और जिनके पास अहंकार का जरा सा भी स्वर नहीं बचा है।
कोई कहै छाने कोई कहै चौड़े...
कुछ लोग कहते हैं कि परमात्मा को पाना हो तो छिप—छिप कर पाना होता है। और कोई कहते हैं कि परमात्मा को पाना हो तो छिप—छिप कर कैसे पाओगे—मंदिर में, मस्जिद में! खुले आम, लोगों के बीच में पाना होता है। कुछ लोग कहते हैं कि परमात्मा को अंतरतम में पाना होता है—छिप—छिप कर। और कुछ लोग कहते हैं कि परमात्मा को इस विराट ब्रह्मांड में पाना होता है—खुलेआम।
कोई कहै छाने...कोई कहता है: छिप कर पाओ।
कोई कहै चौड़े...कोई कहता है: खुलेआम पाओ।
कोई कहता है: बाहर पाओ। कोई कहता है: भीतर पाओ।
दो तरह के धर्म हैं पृथ्वी पर—एक अंतर्मुखी और दूसरे बहिर्मुखी। अंतर्मुखी धर्म कहते हैं: आंख बंद करो, अपने भीतर जाओ; बाहर नहीं है प्रभु—भीतर है। जैन, बौद्ध अंतर्मुखी धर्म हैं। ईसाइयत, हिंदू, इस्लाम बहिर्मुखी धर्म हैं। परमात्मा सब तरफ मौजूद है। आंख खोलो—पूरी आंख खोलो। ठीक से आंख खोलो और उसे पा लो।
कोई कहै छाने कोई कहै चौड़े...
कोई कहता है: पास है परमात्मा, कहीं दूर नहीं जाना। कोई कहता है: दूर है परमात्मा, बड़ी यात्रा करनी होगी।
...लियो री वजंता ढोल।
और मीरा कहती है; मैंने न तो इसकी फिकर की कि छिप कर पाऊं—चोरी—चुपके, खामोशी में, मौन में, जंगल में भाग कर, पहाड़ में छिप कर, किसी गुफा में बैठ कर पाऊं उसे; न मैंने मंदिर—मस्जिद, जो व्यावहारिक, सामाजिक औपचारिक व्यवस्था है, उसमें परमात्मा को खोजा। मैंने तो ढोल बजा कर खोजा।
...लियो री वजंता ढोल।
न भीतर, न बाहर; मैंने तो ढोल बजा कर खोजा। न छिप कर, न चोरी; न सामाजिक औपचारिक व्यवस्था, विधि—विधान से। मैंने तो बड़े अनूठे ढंग से उसको पाया। मैंने तो भीतर जो पड़ी थी मृदंग, उसको बजा कर पाया।
खयाल रखना, इसमें एक बड़ी अदभुत बात मीरा कह रही है! जब भीतर का ढोल बजता है तो बजता तो भीतर है, लेकिन बाहर भी सुनाई पड़ता है। जब भीतर कोई गीत पैदा होता है तो बाहर प्रकट होता है। गीत के माध्यम से बहिर्मुखता अंतर्मुखता जुड़ जाती है। गीत सेतु बन जाता है—बाहर—भीतर को जोड़ देता है।
इसलिए मीरा कहती है: न तो मैंने बाहर परमात्मा को खोज कर पाया, न भीतर; मैंने तो इस ढंग से पाया कि बाहर—भीतर जुड़े थे। एक हो गए थे। न कुछ बाहर था, न कुछ भीतर था। एक ही था। वही भीतर था, वही बाहर था।
...लियो री वजंता ढोल।
और हम सब उस अपूर्व नाद को अपने भीतर लिए बैठे हैं। वही नाद बाहर भी बज रहा है। वही नाद तुम्हारे भीतर भी बज रहा है। एक ही नाद से सब जुड़ा है। लेकिन हम करीब—करीब मूर्च्छित हैं। हमें कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा है; न हमें कुछ दिखाई पड़ रहा है। हमारी सारी संवेदनशीलता जड़ हो गई है। और तुम्हारे तथाकथित धर्मगुरुओं ने तुम्हारी संवेदनशीलता को एकदम नष्ट कर दिया है। क्योंकि वे कहते हैं: स्वाद लेना मत। वे कहते हैं: प्रेम से स्पर्श करना मत। वे सिखाते हैं तुम्हें एक तरह की उदासी; एक तरह की संवेदन—शून्यता, जड़ता। वे सिखाते हैं इंद्रियों का मारना—धीरे—धीरे इंद्रियों को मार डालो। लेकिन जिसने अपनी इंद्रियां मार डालीं, वह खुद भी मर जाता है। क्योंकि इंद्रियों में तुम्हारी चेतना का आवास है।
ठीक—ठीक जागा हुआ व्यक्ति स्वाद नहीं लेता, यह बात गलत है। ठीक—ठीक जागा हुआ व्यक्ति ही ठीक स्वाद लेता है। उसका स्वाद बड़ा गहरा हो जाता है। महात्मा गांधी के आश्रम में अस्वाद व्रत था। मेरे आश्रम में स्वाद व्रत है। गांधीजी के आश्रम में भोजन में स्वाद लेना पाप था। इस स्वाद से बचाने के लिए वे साथ में नीम की चटनी भी रखवा देते थे, ताकि अगर कहीं बीच—बीच में स्वाद आने लगे, थोड़ा नीम की चटनी मुंह में डाल लो। नीम की कोई चटनी होती है? लेकिन यह जीभ को मारने का ढंग है।
पश्चिम का एक बड़ा विचारक लुई फिशर गांधी को मिलने आया था। भोजन करने बैठे, तो उसकी थाली में भी नीम की चटनी रखवा दी। उसे तो कुछ पता नहीं, उसने और चीजें चखीं तो वह भी चखी। वह तो घबड़ा गया कि यह जहर किसलिए है! उसने पूछा तो गांधीजी ने समझाया होगा: अस्वाद व्रत। उसने सोचा कि अब मेजबान का अपमान करना तो ठीक नहीं। तो उसने सोचा कि बजाय पूरे भोजन को खराब करने के एकबारगी इस गोले को गटक ही जाओ, पानी पी लो, फिर बाकी भोजन ठीक से करो; नहीं तो यह तो पूरा भोजन खराब कर देगा। तो वह पूरा गोला गटक गया। और गांधी ने तत्क्षण कहा अपने रसोइए को: और लाओ! लुई फिशर को चटनी बहुत पसंद पड़ी है। उसने अपने संस्मरणों में लिखा है कि वह फिर चटनी बुला ली उन्होंने।
स्वाद मारा जा सकता है। जीभ को अगर जहरीली चीजें देते रहो, देते रहो, जीभ धीरे—धीरे संवेदन—शून्य हो जाएगी। संवेदन—शून्य जीभ हो जाएगी तो कुछ तुम्हारी आत्मा में भी जड़ हो जाएगा। आंखों को धीरे—धीरे इस तरह कर लो कि कुछ सौंदर्य न देखें, फूल न देखें, चांदत्तारे न देखें, सुंदर स्त्रियां, सुंदर पुरुष, सुंदर बच्चे—आंखों को धीरे—धीरे सौंदर्य से हटा लो। सूरदास ने इसलिए आंखें फोड़ ली थीं, कि सौंदर्य को देखने से कहीं वासना पैदा होने का डर बना रहता है। आंखें तो फोड़ लीं, लेकिन उसी के साथ आत्मा की एक क्षमता भी नष्ट हो जाएगी।
और यही आंखें जो स्त्रियों का सौंदर्य देखती हैं, यही तो परमात्मा का सौंदर्य भी देखेंगी। और यही जीभ जो भोजन का स्वाद लेती है, यही तो परमात्मा का स्वाद भी लेगी। और यही हाथ जो लोगों को छूते हैं, यही तो उसके भी चरणों का स्पर्श करेंगे।
इंद्रियों को मारना मत। इंद्रियों को जगाना है। इंद्रियों को पूरी त्वरा देनी है, तीव्रता देनी है, सघनता देनी है। इंद्रियों को प्रांजल करना है, स्वच्छ करना है, शुद्ध करना है। इंद्रियों को कुंवारा करना है। आंखें ऐसी हो जाएं शुद्ध कि जहां भी तुम देखो वहीं परमात्मा दिखाई पड़े।
यह फर्क समझ लेना तर्क का। यह विचार—भेद समझ लेना।
एक हैं जो डरते हैं कि कहीं सौंदर्य को देखा तो वासना न जग जाए। तो फिर आंख ही फोड़ लो। भोजन में स्वाद आया, तो कहीं ऐसा न हो कि भोजन—पटुता पैदा हो जाए! तो जीभ ही मार डालो। यह जीवन—निषेध है।
भक्त जीवन के प्रेम में है; जीवन के निषेध में नहीं। उसे कान बहरे नहीं करने हैं और आंखें अंधी नहीं करनी हैं। उसे जीवन के रस को इस तरह पहचानना है, इस तरह जीवन के रस से संबंध जोड़ना है, इतनी प्रगाढ़ता से—कि जहां रूप दिखाई पड़े वहां प्रार्थना पैदा हो। अभी रूप जहां दिखाई पड़ता है वहां वासना पैदा होती है—यह सच है। अब दो उपाय हैं; रूप देखो ही मत, ताकि वासना पैदा न हो; और दूसरा उपाय है कि रूप को इतनी गहराई से देखो कि हर रूप में उसी का रूप दिखाई पड़े, तो प्रार्थना पैदा हो।
भक्त रूप में परम रूप देखने लगता है; सौंदर्य में परम सौंदर्य देखने लगता है; हर ध्वनि में उसी का नाद सुनने लगता है। फिर आंखें फोड़ने की जरूरत नहीं रहती और कान फोड़ने की आवश्यकता नहीं रहती; इंद्रियों को मारने की जरूरत नहीं रहती। और ईश्वर ने जो भेंट दी है इंद्रियों की, वह अगर मारने के लिए ही होती तो दी ही न होती। इंद्रियों को मारने का अर्थ हुआ: तुमने उसकी भेंट इनकार कर दी। यह एक तरह की नास्तिकता है।
मैं गांधी को आस्तिक नहीं मानता। वह आस्तिकता बहुत ऊपरी है। आस्तिकता का तो अर्थ यह होता है: जो उसने दिया है, ठीक ही दिया होगा। हम शायद ठीक उपयोग न कर रहे हों, यह हो सकता है; मगर देने वाले की तरफ से भूल नहीं हो सकती।
तुम्हें कोई तलवार भेंट दे तो तुम चाहो तो किसी की हत्या भी कर सकते हो और चाहो तो किसी की होती हत्या बचा भी सकते हो। तलवार तो तटस्थ है। न तो तलवार कहती है हत्या करो और न तलवार कहती है कि किसी की हत्या होती हो तो बचाओ।
तुम्हें कोई धन दे तो तुम चाहो तो जहर खरीद लो, आत्महत्या कर लो अपनी; चाहो तो जीवन के लिए सहयोगी कुछ उपयोग कर लो। सब तुम पर निर्भर है। इंद्रियां भी उसी के लिए द्वार बन सकती हैं। और हर इंद्रिय प्रार्थना में संलग्न हो सकती है। और उसी को हम कलाकार कहेंगे जो सारी इंद्रियों को परमात्मा में संलग्न कर दे; जो आत्मा से ही न पुकारे, देह से भी पुकारे। परमात्मा की रोशनी प्राणों में ही न जगमगाए, रोएं—रोएं में जगमगाए। आत्मा तो उसमें डूबे ही डूबे, यह देह भी उसी में डूब जाए। तुम्हारे प्राण तो उसमें नहाएं ही नहाएं, तुम्हारा तन भी उसमें नहा ले। तुम्हारी श्वास—श्वास उसमें लिप्त हो जाए।
माई री मैं तो लियो गोबिन्दो मोल।
कोई कहै छाने कोई कहै चौड़े लियो री वजंता ढोल।
मीरा कहती है कि मैंने तो ये बंधी—बंधाई लकीरें नहीं सोचीं कि भीतर खोजें कि बाहर खोजें। मैंने तो ढोल बजा कर उसे ले लिया।
कौन से ढोल की यह बात कह रही है? अनाहत! वह जो अनाहत नाद है, वह जो भीतर छिपा हुआ नाद है—उस पर चोट करती है। उस पर टंकार करती है। उसकी टंकार होते ही नाद बाहर भी फैल जाता है।
एक कंकड़ तुमने कभी झील में फेंक कर देखा? जहां गिरता है वहां तो लहर उठती है; लेकिन फिर लहर फैलती चली जाती है। दूर—दूर किनारों तक लहरें ही लहरें हो जाती हैं।
परमात्मा का पहला संस्पर्श तो भीतर ही होता है, क्योंकि वहीं से हम उसके निकटतम हैं। इस वृक्ष में परमात्मा को देखोगे, यह तो जरा दूर हो गई बात; अगर अपने में नहीं देखा है अभी तक तो वृक्ष में कैसे देखोगे? चांदत्तारों में परमात्मा को देखोगे, और अपनी हृदय की धड़कन में उसे अभी सुना नहीं, इतने दूर से कैसे देखोगे? पहचान तो पास से ही शुरू करनी होती है। चलना तो वहां से पड़ता है जहां तुम हो।
...लियो री वजंता ढोल।
कोई कहै मुंहगो कोई कहै सुंहगो...
कोई कहता है कि परमात्मा बड़ा महंगो और कोई कहता है कि परमात्मा बड़ा सस्ता होता है। महंगा कहने वाले वे लोग हैं जो कहते हैं: शरीर को तपाओ; शरीर को गलाओ; इंद्रियों को काटो। सब सुख छोड़ो। अपने जीवन में पीड़ा ही को सजाओ; उसी की आराधना करो। घाव बनाओ किसी घाव को भरने मत दो। तपश्चर्या, उपवास, व्रत।
ये जो कृच्छ साधना वाले लोग हैं, जो अपने को सताने में रस लेते हैं, ये जो दुखदायी लोग हैं—वे कहते हैं: परमात्मा को पाना बहुत महंगा है, क्योंकि बड़े कष्ट से मिलेगा; हजार—हजार नरकों से गुजर कर मिलेगा।
और कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि बिलकुल सस्ता है। जैसे महर्षि महेश योगी। वे कहते हैं: बिलकुल सस्ता मामला है। एक दस मिनट सुबह मंत्र पढ़ लो, दस मिनट शाम मंत्र पढ़ लो—बात खत्म हो गई; और कुछ करना नहीं है। एक है जो कहता है: बहुत कठिन है। एक है जो कहता है कि अपने को बड़ा सताना पड़ेगा। दूसरा कहता है: कोई भी कठिनाई की बात नहीं है; तुम जैसे हो बिलकुल ठीक हो; बस जरा सी यह तरकीब इसमें जोड़ लो। एक नुस्खा है; इसका उपयोग कर लो, परमात्मा को पा लोगे। यह रहा ताबीज, यह बांध लो। यह रहा मंत्र, इसे दोहराने लगो। यह रहा मंदिर, रोज दो मिनट जाकर सिर पटक आना। यह रही मस्जिद, नमाज पढ़ लेना।
ये सस्ती बातें हैं। तुम्हें कुछ करना नहीं पड़ता। नमाज पढ़ने में तुम्हें क्या करना है! दो—चार दफे उठे—बैठे, थोड़ी कवायद की। मंदिर में गए, पत्थर की मूर्ति पर सिर झुका लिया। तुम्हें करना क्या पड़ता है! तुम जैसे हो वैसे के वैसे; जरा भी फर्क नहीं करना पड़ता। न तुम्हें अपना जीवन बदलना होता है; न अपने जीवन की शैली में कोई तरह की क्रांति लानी पड़ती है। कुछ करना ही नहीं होता। मंदिर गए; सिर पटका, भागे—जैसे थे वैसे ही अंदर गए, वैसे के वैसे वापस गए। तो मंदिर जाने वाले में और मंदिर न जाने वाले में कोई भेद देखते हो? दुकान पर दोनों को बैठे देख कर तुम यह पता लगा सकोगे कि कौन मंदिर जाता है, कौन नहीं जाता। हां, अगर तिलक इत्यादि लगा कर बैठा हो तो पता चल जाएगा। बाकी बस उतना ही पता चलने वाला है। तिलक न हो तो पता नहीं चलेगा। मगर तिलक से कोई परमात्मा पाने वाला है!
एक तरफ लोग हैं जिन्होंने एक अति कर दी है। वे कहते हैं: बड़ा कठिन है। दुकान पर रहते तो मिलेगा ही नहीं। घर में रहते तो मिलेगा ही नहीं। पत्नी, बच्चे छोड़ो, जंगल भागो, अपने को सताओ—गर्मी भी हो तो भी चारों तरफ धूनी रमा कर बैठे रहो, और ठंड भी हो तो नंगे खड़े रहो खुले आकाश के नीचे; बड़ी कठिनाई से मिलेगा। और एकाध जन्म की बात नहीं है; जन्मों—जन्मों तक मेहनत करनी होगी।
यह एक अति है। दूसरी अति है; वह कहती है: इस सबकी कोई जरूरत ही नहीं; तुम जैसे हो ठीक हो, वैसे ही। कुछ करना नहीं। यह माला ले लो; इसको रोज एक दफा घुमा लेना। जल्दी, देर—अबेर जैसे बने, इसको जल्दी घुमा लेना।
तिब्बती हैं उन्होंने तो प्रार्थना का चका बना रखा है। तो वे चके को घुमा देते हैं। चके पर प्रार्थना लिखी है। चका एक दफा घूम गया, एक प्रार्थना पूरी हो गई। ऐसा अपना काम भी करते रहते हैं; और जब मौका मिला तो एक धक्का मार दिया चके को, वह चका घूमता रहता है।
एक तिब्बती लामा मेरे पास मेहमान था। मैंने उससे कहा कि तुमको पता नहीं है, बिजली हो गई है; इसमें थोड़ा प्लग जोड़ कर इसको बिजली में लगा दो। यह अपने आप घूमता रहेगा, जैसा पंखा घूमता है। या पंखे पर ही लिख दो तुम्हारी प्रार्थना। चौबीस घंटे घूमता ही रहेगा; प्रार्थना ही प्रार्थना हो जाएगी; लाभ ही लाभ मिलेगा।
एक तरफ सस्ते उपाय खोजने वाले लोग हैं। राम नाम की चदरिया ओढ़ लो। तुम्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं; राम—राम लिखा ही हुआ है।
ये दोनों ही बातें गलत हैं, मीरा कहती है।
कोई कहै मुंहगो कोई कहै सुंहगो लियो री तराजू तोल।
मीरा कहती है: ये दोनों अतियां हैं। जहां तराजू समतौल हो जाता है ठीक मध्य में, न कठिन न सस्ता—न तो तपत्तपश्चर्या से मिलता है और न ऐसे बैठे—ठाले मंत्र जपने से मिलता है—जहां चित्त का तराजू समतौल हो जाता है; जहां अति नहीं रह जाती; जहां सम्यकत्व पैदा होता है; जहां समता आ जाती है; जहां समतुलता पैदा होती है। यह समझने की बात है: लियो री तराजू तोल।
तराजू में कभी एक पलड़ा भारी होता है तो दूसरा ऊपर उठ जाता है, एक जमीन से लग जाता है। कभी दूसरा पलड़ा भारी होता है तो वह जमीन से लग जाता है, पहला ऊपर उठ जाता है। लेकिन हर हालत में असंतुलन बना रहता है। जिसने समझा परमात्मा बहुत महंगा है, उसके जीवन में असंतुलन होगा। जिसने समझा बिलकुल सस्ता है, करना ही क्या है, एकाध दफा याद कर लेंगे, मरते वक्त भी याद कर लेंगे तो चल जाएगा। अजामिल ने मरते वक्त याद कर लिया और चल गया। और परमात्मा को याद भी नहीं किया था; अपने बेटे को बुला रहा था, जिस का नाम नारायण था—और चल गया।
एक तरफ ऐसे लोग हैं जो परमात्मा के नाम पर व्यर्थ की झंझटें खड़ी कर लेते हैं, जिनका परमात्मा से कुछ लेना—देना नहीं है। और दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं—जो कोई झंझट नहीं खड़ी करना चाहते; जो अपने में किसी तरह का भेद नहीं करना चाहते; जो कुछ भी चुकाने को तैयार नहीं हैं। ये दोनों अतियां हैं।
बुद्ध ने जिसको कहा है मध्यम मार्ग, मज्झिम निकाय—मीरा की भाषा में वही है: लियो री तराजू तोल। जहां तराजू समतुल हो जाता है। जहां चित्त अति नहीं करता।
और इस बात को समझना: जहां चित्त अति नहीं करता वहीं चित्त मिट जाता है। चित्त अति में ही जीता है।
एक राजकुमार बुद्ध के पास दीक्षित हुआ। श्रोण उसका नाम था। वह भोगी था, महाभोगी था। उसके भोग की कथाएं सारे देश में प्रचलित थीं। बुद्ध तक भी उसकी कथाएं बहुत बार पहुंची थीं। उसकी भोग ही भोग की जिंदगी थी। रात भर जागता था—नाच—गाना, शराब; और दिन भर सोता था। सीढ़ियां भी चढ़ता था तो नग्न स्त्रियां सीढ़ियों के दोनों तरफ खड़ी कर रखी थीं, रेलिंग बना रखी थी उसने नग्न स्त्रियों की। उनके कंधों पर हाथ रख कर वह ऊपर जाता। वह कभी महल के बाहर नहीं निकला था, गद्दियों से नीचे नहीं चला था। फूलों में ही जीया था; कांटों का उसे पता ही नहीं था।
फिर उसने बुद्ध को सुना। और लोग चमत्कृत हुए यही देख कर कि वह बुद्ध को सुनने आया पहले तो। और न केवल सुना, उसने तो खड़े होकर बुद्ध से प्रार्थना की कि मुझे दीक्षित करें; मैं भिक्षु होना चाहता हूं। लोगों को तो भरोसा ही नहीं आया। कहीं ऐसा तो नहीं कि ज्यादा पी गया है, कि अभी तक रात का खुमार नहीं उतरा है! उसके संगी—साथियों ने भी कहा कि आप क्या कह रहे हैं; सोच—समझ कर कह रहे हैं?
उसने कहा: मैं थक गया हूं, ऊब गया; देख लिया सब भोग। मैं दीक्षित होना चाहता हूं।
वह लौटा नहीं महल। वह संन्यस्त हो गया। बुद्ध के भिक्षुओं ने बुद्ध से पूछा कि यह बड़ी चमत्कार की घटना है। आपने क्या किया? क्या जादू किया इस आदमी पर?
बुद्ध ने कहा: मैंने कुछ नहीं किया। यह है अतिवादी। यह एक अति से दूसरी अति पर डोल गया है, पेंडुलम जैसे डोलता है। यह बड़ा खतरनाक आदमी है। एक अति से थक गया, अब दूसरी अति पर चला।
और उन्होंने कहा: कुछ देर देखो तब तुम समझोगे। पंद्रह दिन में सबको जाहिर हो गया। जो आदमी कभी गद्दियों से नीचे नहीं चला था, वह आदमी कांटों में चलने लगा। दूसरे भिक्षु तो पगडंडी पर चलते, बने हुए रास्ते पर चलते; वह कांटों में चलता। उसने पैर लहूलुहान कर लिए; पैरों में घाव हो गए। दूसरे भिक्षु तो धूप होती तो वृक्ष की छाया में बैठते; वह ठेठ धूप में ही खड़ा रहता। सर्दी होती तो दूसरे भिक्षु धूप में बैठते; वह जाकर छाया में बैठ जाता। वह उलटा ही करता। भिक्षु तो एक बार भोजन करते दिन में, वह दो—चार दिन भूखा रहता और एकाध बार दो—चार दिन में भोजन करता; बस सप्ताह में दो बार से ज्यादा भोजन न करता। सूख गया। सुंदर उसकी देह थी; काला पड़ गया। शरीर से सब मांस—मज्जा चली गई; हड्डी—हड्डी हो गया। तब बुद्ध ने उसके द्वार पर एक दिन दस्तक दी, जिस झोपड़े में वह ठहरा था। वह तो मरी हुई हालत में था बिलकुल।
बुद्ध ने उससे पूछा: श्रोण, मैं एक प्रश्न पूछने आया हूं। मैंने सुना है कि तू जब राजकुमार था तो तू वीणा बजाने में बड़ा कुशल था। मैं यह तेरे से पूछने आया हूं कि वीणा के तार अगर बहुत कसे हों तो वीणा बज सकती है?
उसने कहा: नहीं बजेगी; तार टूट जाएंगे।
और वीणा के तार अगर बहुत शिथिल हों तो वीणा बज सकती है?
उसने कहा: नहीं, तब भी नहीं बजेगी। बहुत शिथिल हों तो चोट ही पैदा नहीं होगी, स्वर पैदा नहीं होगा।
तो बुद्ध ने पूछा: वीणा कैसी होनी चाहिए कि संगीत पैदा हो?
तो श्रोण ने कहा: तार कसना बड़ी कला की बात है। तार ऐसी स्थिति में होने चाहिए कि न तो ज्यादा कसे, न ज्यादा ढीले। एक ऐसी स्थिति भी है तारों की, जब हम कह सकते हैं कि अब न तो ज्यादा कसे हैं, न ज्यादा ढीले हैं; न कसे हैं, न ढीले हैं—ठीक मध्य में, समतुल। और जब वीणा के तार ठीक मध्य में होते हैं, तभी महासंगीत पैदा होता है।
तो बुद्ध ने कहा: यही मैं निवेदन करने आया हूं कि जो नियम वीणा के संबंध में सही है, वही नियम जीवन के संबंध में भी सही है। जीवन की वीणा में भी संगीत तभी पैदा होता है, जब तार न तो बहुत कसे हों, न ढीले हों।
देख, तेरे तार बहुत ढीले थे। तब संगीत पैदा नहीं हुआ। और अब तूने तार बहुत कस लिए, अब तार टूटे जा रहे हैं, वीणा को फांसी लगी जा रही है, अब भी संगीत पैदा नहीं हो रहा है। तू एक मूढ़ता से दूसरी मूढ़ता पर चला गया।
और मन यही करता है। ज्यादा भोजन कर लिया तो मन उपवास करने का विचार करने लगता है कि चलो उपवास कर लें, कि उरली—कांचन चले जाएं। फिर दो—चार दिन उपवास कर लिया तो अब मन विचार करने लगता है कि क्या—क्या भोजन करें। भोजन ही भोजन के विचार आने लगते हैं। यही मन की अवस्था है। एक मूढ़ता से दूसरी मूढ़ता पर छलांग लगा लेता है; मगर बीच में कभी नहीं रुकता। तो या तो तुम्हें भोजन—भट्ट मिलेंगे या उपवास करने वाले लोग मिलेंगे; लेकिन सम्यक भोजन करने वाले लोग मुश्किल से मिलेंगे। सम्यक भोजन का अर्थ है: न तो जरा ज्यादा, न जरा कम।
वही कला है। वही जीवन की वीणा से संगीत को उत्पन्न करने का शास्त्र है। और यही जीवन के समस्त पहलुओं पर लागू है।
या तो कुछ लोग धन के पीछे दीवाने होते हैं, तो धन ही धन उनके मन में होता है। फिर एक दिन थक जाते हैं, तो धन छोड़ कर भागने लगते हैं; फिर त्याग ही त्याग उनके मन में होता है। ये दोनों ही बातें अतियां हैं। आदमी को समझ होनी चाहिए मध्य में ठहरने की। धन जीवन का लक्ष्य नहीं है, लेकिन जीवन का साधन जरूर है। साध्य बिलकुल नहीं, लेकिन साधन जरूर है। तो धन ही धन इकट्ठा करने में जीवन को जो गंवाता है, वह नासमझ है; और जो धन को छोड़ने में ही समझता है कि परमात्मा को पा लेगा, वह भी नासमझ है। न तो धन ही धन को पाने से कुछ होता है, न धन को छोड़ने से कुछ होता है। एक सम्यकत्व होना चाहिए। जितना जरूरी है, जितना जीवन की जरूरतों के लिए आवश्यक है, उतना कर लिया। और उतना सभी कर सकते हैं; क्योंकि जीवन की आवश्यकताएं बहुत थोड़ी हैं। जरूरी आवश्यकताएं तो बहुत थोड़ी हैं; गैर—जरूरी बहुत हैं।
तो मैं तुमसे यह नहीं कहता कि सारी आवश्यकताएं छोड़ दो, क्योंकि वह अति है। मैं तुमसे इतना ही कहता हूं: गैर—जरूरी छूट जाएं तो बस पर्याप्त। जो बिलकुल जरूरी है, उसे निश्चित पूरा करना है। उसे पूरा करने में कोई कठिनाई भी नहीं है। और दुनिया में अगर सभी लोग अपनी जरूरत की जरूरतें ही पूरी करें तो किसी को कमी न रह जाए। लेकिन कुछ लोग पागल हैं। वे जरूरत से ज्यादा इकट्ठा करते चले जाते हैं। उसी इकट्ठे करने में कुछ लोगों की जरूरत की जरूरतें भी पूरी नहीं होती फिर। फिर कलह है, संघर्ष है, वैमनस्य है, द्वंद्व है, हिंसा है।
दो अतियों के मध्य में ठहर जाना तराजू का तौल लेना है; दोनों पलड़े एक ही दशा में आ गए; तराजू का कांटा मध्य की सूचना देने लगा।
मध्य से ही द्वार है।
तो मीरा न तो तपस्वी है, न त्यागी है, न भोगी है। मीरा तो मध्य में ठहरी है। वही उसका सौंदर्य है। वही उसके संगीत का माधुर्य है। यह संगीत का माधुर्य उसके जीवन के माधुर्य से बहा है। यह उसके जीवन का ही स्वाद है, जो उसके संगीत में भी है।
माई री मैं तो लियो गोबिन्दो मोल।
मैंने परमात्मा को खरीद लिया—मीरा कहती है। हिम्मत का वक्तव्य है। किसी ने कभी कहा नहीं कि मैंने परमात्मा को खरीद लिया। और खरीदने की कला क्या है?
लियो री तराजू तोल।...लियो री वजंता ढोल।
कोई कहै कारो कोई कहै गोरो, लियो री अमोलिक मोल।
कोई कहते हैं परमात्मा ऐसा; कोई कहते हैं परमात्मा वैसा। सभी व्याख्या करते हैं। कोई कहता है काला; कोई कहता है गोरा। कोई कहता है निर्गुण; कोई कहता है सगुण। कोई कहता है इतने हाथ, इतने सिर; कोई कहता है इतने सिर, इतने हाथ। अलग—अलग व्याख्याएं हैं। कोई कहता है शून्य; कोई कहता है पूर्ण। ये सारी की सारी व्याख्याएं मनुष्य—निर्मित हैं और ये उनके द्वारा निर्मित हैं जिन्होंने जाना नहीं। जो जानते हैं वे कहते हैं: परमात्मा अव्याख्य है; उसकी कोई व्याख्या नहीं; उसका कोई निर्वचन नहीं; उसके संबंध में कुछ भी कहा नहीं जा सकता। उसे जाना तो जा सकता है, लेकिन जनाया नहीं जा सकता।
कोई कहै कारो कोई कहै गोरो...
मीरा यह कह रही है कि न तो वह गोरा है, न वह काला है; न वह ऐसा है, न वैसा है। वह तो बस अपने जैसा है। इसलिए उसे किसी व्याख्या में तुम न बांध सकोगे। तुम जो भी कहोगे वह सीमा हो जाएगी। और जो भी सीमा हो जाएगी वह उसे नहीं घेर पाएगी। वह असीम है।
...लियो री अमोलिक मोल।
मीरा कहती है: मैं इतना ही कह सकती हूं, उसके मूल्य आंकने का कोई उपाय नहीं; अमोलक है। उसको कसने की कोई कसौटी नहीं। और उसको तौलने का कोई तराजू नहीं। और तुम्हारे सारे शास्त्र और तुम्हारे सारे सिद्धांत दो कौड़ी के हैं। जो निर्गुण कहते हैं वे भी बकवास करते हैं; जो सगुण कहते हैं वे भी बकवास करते हैं। जहां विवाद है वहां बकवास है। और विवाद वहीं है जहां जाना नहीं गया है। जिसने जाना, वह तो जानने के कारण चुप हो जाता है। एकदम सन्नाटा हो जाता है। उससे तुम पूछो: परमात्मा कैसा है? तो वह कहेगा: मेरी आंख में झांक लो। वह कहेगा: मेरा हाथ पकड़ लो। वह कहेगा: मेरे पास थोड़ी देर चुप बैठो, शायद पता चल जाए; मगर मैं क्या कहूं परमात्मा कैसा है। कैसे कहा जा सकता है? परमात्मा बस परमात्मा जैसा है।
कोई कहै कारो कोई कहै गोरो, लियो री अमोलिक मोल।
वह अमूल्य है। कोई उपाय नहीं कि हम निर्धारण कर सकें कि कैसा है। जो जाने सो जाने। जो जाने वही जाने। और उधार जनाने की कोई व्यवस्था नहीं हो सकती। मैंने जाना तो मैं तुम्हें नहीं जना सकता। मैं लाख सिर पटकूं, मैं हजार विधि करूं—तुम सुन भी लोगे, फिर भी कुछ पकड़ में न आएगा। क्योंकि शब्द तो मेरे तुम्हारे पास तक पहुंच जाएंगे, लेकिन अर्थ कैसे पहुंचेगा! अर्थ तो अनुभव से आता है।
मैंने कहा गुलाब का फूल; तुमने सुना और अर्थ भी आ गया। क्यों? क्योंकि गुलाब का फूल तुमने देखा है; तुम्हें पता है गुलाब के फूल का। मैंने कहा गुलाब का फूल; गुलाब का फूल तुम्हारी दृष्टि में आ गया। अगर तुम जरा संवेदनशील व्यक्ति होओ तो तुम्हें गुलाब के फूल की सुगंध भी आने लगे। अगर तुम बहुत संवेदनशील व्यक्ति हो तो गुलाब का फूल बिलकुल यथार्थ होकर तुम्हारे हृदय में खड़ा हो जाए। मगर अगर तुमने गुलाब का फूल जाना ही नहीं, तुम किसी मरुस्थल से आते हो जहां गुलाब का फूल होता ही नहीं और मैंने कहा गुलाब का फूल—तब भी शब्द तो तुम्हारे कानों में पड़ेगा, क्योंकि शब्द मैंने कहा तो पड़ेगा ही; लेकिन तुम्हें कुछ साफ नहीं होगा कि मैं क्या कह रहा हूं। अर्थ प्रकट नहीं होगा।
शब्द से अर्थ नहीं होता; शब्द से, तुम्हारे भीतर अर्थ पड़ा हो, तो जग जाता है। अगर भीतर अर्थ न पड़ा हो तो शब्द कुछ भी नहीं कर सकता। शब्द खड़बड़ करके निकल जाता है।
अंधे आदमी से कहो: प्रकाश। सुनता है। बहरा तो है नहीं। सच तो यह है कि अंधे के कान बहुत अच्छे होते हैं आंख वालों से; क्योंकि अंधे की आंख तो होती नहीं, तो आंख की जो ऊर्जा है वह कान में ही संलग्न हो जाती है। और आंख में बड़ी ऊर्जा लगी है। अस्सी प्रतिशत ऊर्जा आंख से जा रही है। तो अस्सी प्रतिशत ऊर्जा बच जाती है; वह कान की तरफ मुड़ जाती है, क्योंकि नंबर दो की इंद्रिय कान है। तो जो ऊर्जा आंख से जाती थी, आंख से तो निकल नहीं सकती, वह अब कान से रास्ता खोजती है। वह द्वार बंद हो गया; दूसरा दरवाजा खोजती है। इसलिए अंधे की श्रवण—शक्ति तो बहुत गहरी हो जाती है। इसलिए अंधे कुशल संगीतज्ञ हो जाते हैं; क्योंकि उनकी संगीत की पकड़ गहरी हो जाती है। ध्वनि का शास्त्र उन्हें सरल हो जाता है।
दूर से आते आदमी की पगध्वनि सुन कर अंधा पहचान लेता है कौन आ रहा है; तुम नहीं पहचान सकोगे। आंख वाला नहीं पहचान सकता। आंख वाले ने कभी खयाल ही नहीं किया इस बात पर कि कोई आदमी चलता है तो उसकी आवाज कैसी होती है। लेकिन अंधा तो कान को ही आंख मानकर चलता है; आवाज ही उसकी जिंदगी है; आवाज ही उसका अनुभव है। तुम बोलते हो तो वह पहचान लेता है कौन बोल रहा है। जैसे हम चेहरे को पहचानते हैं कि कौन आ रहा है, तो चेहरा देख कर पहचान जाते हैं कि फलां आदमी आ रहा है—ऐसा अंधा ध्वनि को देखता है। चेहरे को तो नहीं देख सकता; स्वर सुन सकता है। तो अंधे के कान तो बहुत प्रगाढ़ रूप से संवेदनशील हो जाते हैं।
तो अगर मैं अंधे से कहूं प्रकाश तो वह तुमसे ज्यादा अच्छी तरह सुनता है, लेकिन इससे कुछ हल नहीं होता। कितनी ही अच्छी तरह सुने, प्रकाश का उसे कोई अनुभव नहीं है। उसके भीतर कोई भी अर्थ पैदा नहीं होगा। शब्द कोरा आएगा, कोरा चला जाएगा। शब्द खाली रहेगा, भर न पाएगा।
तुम उतना ही समझ सकते हो जितना तुमने जाना हो। परमात्मा को मैं तुम्हें जना सकता हूं अगर तुमने जाना हो; मगर तब तो जानने की कोई जरूरत नहीं। तुमने नहीं जाना है तो कोई उपाय नहीं। इतना ही बता सकता हूं कि मैंने कैसे जाना; मगर क्या जाना, उस संबंध में कुछ नहीं कहा जा सकता।
इसलिए समस्त ज्ञानियों के वचन विधि की बात करते हैं। कैसे जाना, क्या जाना—उस संबंध में चुप हैं। उस संबंध में कोई भी कुछ न कह सकेगा।
कोई कहै कारो कोई कहै गोरो, लियो री अमोलिक मोल।
मीरा कहती है: मैं इस झंझट में नहीं पड़ी कि काला है कि गोरा, निर्गुण कि सगुण; मैंने तो अमोलक को ही मोल ले लिया। मैं तो सीधी उसी की तरफ चली गई। मैं विवाद में न उलझी। मैं पंडितों—पुरोहितों, संप्रदायों के जाल में न पड़ी। मैंने, इसको मानूं कि उसको मानूं, इस तरह की झंझट में अपने मन को नहीं उलझाया। मैं तो सीधी उसी की तरफ चली गई। और जाने की विधि थी कि समतुल हुई। जाने की विधि थी कि मैंने भीतर के स्वर को जगाया। जाने की विधि थी कि भीतर जो पड़ी थी संभावना नाद की, उसे मैंने तलाशा।
मीरा स्वर से पहुंची है परमात्मा तक; इसलिए उसके स्वरों में इतनी मिठास है।
याही कूं सब लोग जाणत हैं, लियो री आंखी खोल।
और मीरा कहती है: सबके सामने मौजूद है वही। सबके बाहर—भीतर वही छाया है। सिर्फ इतनी ही अड़चन हो रही है कि लोग आंख ही नहीं खोल रहे हैं। मैंने आंखें खोलीं और पा लिया।
परमात्मा पर पर्दा नहीं है, जैसा मैंने तुमसे कहा; पर्दा आंख पर है। आंख खोलो और मिल जाता है।
...लियो री आंखी खोल।
दर्शनशास्त्र में जाने की जरूरत नहीं है। दर्शन की क्षमता जगाने की जरूरत है—देखने की क्षमता!
मेरे तसव्वर में मेरे दिल में मेरी नजर में समा रहे हैं
वो जो हर जल्वाए हसीं को बहारे रंगीं बना रहे हैं
वही बसे हैं सकूते लब में सकूने दिल में सरूरे जां में
वो बनके इक मौजे बेखुदी मुझको अपनी सूरत दिखा रहे हैं
मेरी खामोशी की लै वही है मेरी गजल का वही तरन्नम
वो पर्दाए साजे दिल भी खुद हैं वो इसपे नगमें भी गा रहे हैं।
वही हैं वीणा और वही हैं वादक। वही हैं जगाने वाले और वही हैं जागने वाले। जिस दिन जानोगे उस दिन पाओगे: परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।
मेरी खामोशी की लै वही है...
और जब तुम चुप होते हो तब वही तुम्हारे भीतर चुप है। और—
...मेरी गजल का वही तरन्नम
और जब तुम गाते हो गीत तो तुम्हारे गीत की धुन भी वही है, तरन्नम भी वही है।
वो पर्दाए साजे दिल भी खुद हैं...
वह जो दिल का साज है, जो दिल का वाद्य है, वह जो हृदय की वीणा है—वही है।
...वो इस पर नगमें भी गा रहे हैं।
और इसी पर गीत भी उठा रहे हैं; इसी पर गीत भी गा रहे हैं।
अयां है वो मेरी खल्वतों में निहां है वो अपनी जल्वतों में
ये खेल गैबो नमूं का यूं ही वो खेलते हैं खिला रहे हैं।
वही उस तरफ, वही इस तरफ—दोनों किनारे उनके। खेलने वाले वही, खिलाने वाले वही। खेल उनका।
कभी वो मेरी रगों में शोला कभी वो पलकों पे मेरी शबनम
कभी वो साहिल पे रक्स में हैं कभी वो तूफां उठा रहे हैं।
और यहां सब कुछ उन्हीं का है—अच्छा भी, बुरा भी; दिन भी, रात भी; जन्म भी, मृत्यु भी।
कभी वो मेरी रगों में शोला कभी वो पलकों पे मेरी शबनम
कभी आग की तरह भड़कते हैं तुम्हारे भीतर और कभी शबनम की तरह भी झरते हैं तुम्हारे भीतर।
कभी वो साहिल पे रक्स में हैं...
और कभी किनारे पर नाच रहे हैं, रास हो रहा है।
...कभी वो तूफां उठा रहे हैं।
और कभी आंधियां।
इस जीवन का सभी कुछ परमात्मामय है। बस एक बात चाहिए: लियो री आंखी खोल।
आंख न खुली हो तो हमें कुछ समझ में नहीं आता। आंख न खुली हो तो हम बड़े भेद कर लेते हैं। हम कहते हैं: यह अलग, वह अलग; हम हजार खंड कर लेते हैं। और यहां एक ही अखंड, अनवरत, एक का ही वास है।
कभी वो मेरी रगों में शोला कभी वो पलकों पे मेरी शबनम
कभी वो साहिल पे रक्स में हैं कभी वो तूफां उठा रहे हैं।
वही है कैफे निशाते हस्ती वही है सोजे गुदाजे हस्ती
कहीं बहाते हैं अश्के खूं वो कहीं खड़े मुस्कुरा रहे हैं
इधर खामोशी उधर खामोशी है गुफ्तगू फिर भी हो रही है
वो सुन रहे हैं बचश्मे खंदा बचश्मे नम हम सुना रहे हैं
जो मुस्कुराहट से उनकी उठती हैं नगमाए बेखुदी की मौजें
वही तो बनती हैं शेर मेरे जिन्हें वो खुद गुनगुना रहे हैं
वो बात जिसने जहान सारा है आशना इसको दिल ही दिल में
समझ के हम राजे नाशगुफ्ता जमाने भर से छुपा रहे हैं।
आंख से जरा सा पर्दा सरके और एक चमत्कार घटता है—एक चमत्कार कि परमात्मा के सिवाय और कुछ भी नहीं है। जब तक पर्दा पड़ा है, आदमी पूछता है: परमात्मा कहां है? जब पर्दा उठता है, आदमी पूछता है: परमात्मा के अतिरिक्त और तो कुछ नहीं है, और कुछ कहां है? परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ कहां है? जब तक पर्दा है तब तक आदमी पूछता है कि परमात्मा को कहां खोजूं। जब पर्दा उठता है तो आदमी पूछता है: ऐसी कोई जगह है जहां परमात्मा न हो? कहां परमात्मा को खोऊं? किस जगह?
नानक के साथ वही हुआ। मक्का में पैर करके सो गए सांझ—काबा के पत्थर की तरफ। पुरोहित नाराज हुए। पुरोहितों ने आकर नानक को कहा कि हमने तो सुना था कि तुम संत फकीर हो, यह क्या तुम्हारा दुरुव्यवहार? पैर और पवित्र काबा की तरफ?
तो नानक ने कहा: तुम मेरे पैर उस तरफ कर दो जहां परमात्मा न हो। मेरी बड़ी मुसीबत है। मैं भी नहीं चाहता कि परमात्मा की तरफ पैर करूं। लेकिन कहां करूं फिर? ऐसी कोई जगह है? तुम खुद ही मेरे पैरों को उस जगह कर दो।
कहानी बड़ी प्यारी है। यहां तक तो तथ्य मालूम होता है, इसके बाद काव्य है। मगर काव्य सूचक है, अर्थपूर्ण है। तथ्य न हो, मगर सत्य है। कहते हैं पुजारियों ने उनके पैर पकड़ कर काबा के विपरीत मोड़ दिए और काबा भी उसी तरफ मुड़ गया। यह काव्य है। तथ्य तो नहीं है, लेकिन मैं कहता हूं सत्य है। क्योंकि जहां भी पैर मोड़ोगे परमात्मा वहीं है, काबा वहीं है। यह काबा जो पत्थर है, यह न मुड़ा हो उस तरफ; मगर इस सत्य को कैसे झुठलाओगे कि जहां भी पैर मोड़ोगे वहीं परमात्मा है, वहीं काबा है, वहीं काशी, वहीं कैलाश। आंख पर पर्दा हो तो परमात्मा दिखता नहीं; आंख से पर्दा उठे तो उसके सिवाय कुछ और दिखता नहीं।
याही कूं सब लोग जाणत हैं...
और मीरा जो कह रही है, यह बात भी समझना। मीरा यह कह रही है कि यह बात सभी की आंखों के सामने है, सभी इसको जानते हैं; फिर भी अनजाने बने बैठे हैं। जो जागा है वह बड़ा चकित होता है कि तुम बैठे हो! परमात्मा सामने है और तुम पूछते हो परमात्मा कहां है! तुम्हें दिखाई क्यों नहीं पड़ रहा है? तुम्हारी आंखें भली—चंगी मालूम पड़ती हैं। तुम्हारे कान स्पष्ट मालूम पड़ते हैं; तुम्हें सुनाई क्यों नहीं पड़ रहा है? तुम्हारे हाथ जीवित हैं, तुम्हें छूता क्यों नहीं? तुम क्यों नहीं छू पाते? और वही है—सब तरफ वही है।
याही कूं सब लोग जाणत हैं...
मीरा कहती है: मेरे देखे तो सभी इसको जानते हैं; मगर चमत्कार है कि कैसे भुला रहे हैं! कैसे अपने को भटका रहे हैं! कैसे अपनी आंखों को बंद किए बैठे हैं!
मीरा को प्रभु दरसण दीज्यो, पूरब जनम के कौल।
यहां फिर मीरा याद करती है अपने पिछले जन्म की जब वह "ललिता' थी और कृष्ण से वचन लिया होगा कि मुझे आगे छोड़ मत देना। आगे भी मुझे मिलते रहना। मैं भूल भी जाऊं...मैं भूल सकती हूं—मैं नासमझ, अज्ञानी। तुम मत भूल जाना। आगे भी मैं भूल जाऊं तो मुझे भुला मत देना। मैं भूल जाऊं तो भी मुझे याद दिला देना।
तो मीरा उसी कौल की याद दिलाती है। कहती है: तुमने जो वचन दिया था, वह भूल तो नहीं गया है? वह याद है न?
मीरा को प्रभु दरसण दीज्यो, पूरब जनम के कौल।
यहां यह बात भी समझ लेनी जरूरी है कि मीरा यह नहीं कहती कि मेरा कोई अधिकार है, कि मेरी कोई सामर्थ्य है, कि मेरी कोई पात्रता है। मीरा इतना ही कहती है कि तुम अपने वचन का खयाल रखना। मैं अपात्र हूं, चलेगा; लेकिन तुम अपना वचन पूरा करना। तुम्हें अपने वचन का ध्यान है न!
और यह जो बात है, कई अर्थों में महत्वपूर्ण है। तुम भी न मालूम किन—किन जन्मों में, किन—किन सदगुरुओं के पास रहे होओगे और तुमने भी उनसे आश्वासन लिए होंगे, वचन लिए होंगे कि हमें याद करना, हमें भूल मत जाना।
लेकिन तुम यह बात भी भूल गए हो। इसकी तुम्हें कोई याद नहीं। और अगर आज किसी तरह परमात्मा तुम्हारी तरफ आने की कोशिश करे तो तुम हजार बाधाएं खड़ी करते हो; तुम हजार तरह की अड़चनें खड़ी करते हो। जिन्होंने भी तुम्हें वचन दिया था, वे हर हालत में वचन पूरा करेंगे। वे चाहे उसी देह में वापस न लौटें; वे किसी और देह से वचन पूरा करेंगे; वे किसी और के बहाने वचन पूरा करेंगे।
बुद्ध आज न हों, इससे क्या फर्क पड़ता है—तो रमण के बहाने पूरा करेंगे। महावीर आज न हों, तो क्या फर्क पड़ता है—रामकृष्ण के बहाने पूरा करेंगे। क्योंकि सत्य तो एक है और सत्य में जागा हुआ भी उस एक के साथ एक हो जाता है।
दो बुद्धों में कुछ भेद नहीं। देह अलग—अलग होगी; मगर बुद्ध का तो अर्थ ही यह है कि जो देह से छूट गया; जिसको देह के पार का पता चल गया। उस देह के पार तो कुछ भेद नहीं। यह मकान अलग है, पड़ोस का मकान अलग है—मकान की तरह अलग हैं; लेकिन दोनों मकान के भीतर जो आकाश भरा है, वह तो एक ही है।
शरीर अलग—अलग हैं; भीतर जो आत्माएं प्रविष्ट हो गई हैं वे तो आकाश की तरह हैं। दीवाल किसी की सोने की बनी होगी, किसी की मिट्टी की बनी होगी—इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। दीवाल के भीतर जो खाली जगह है, अवकाश है, आकाश है—वह तो एक ही है।
तो मीरा यह कह रही है और भक्त सदा यही कहते रहे हैं कि हमें तो याद भी नहीं है और हमारी तो पात्रता भी नहीं है; मगर तुम अपना वचन मत भूल जाना और तुम अपनी करुणा मत भूल जाना।
आरजूए बका नहीं बाकी
दिल में खौफे फना नहीं बाकी
जल्वागर हर तरफ है तू ही तू
कोई तेरे सिवा नहीं बाकी
आलमे रंगो बू नहीं कायम
हस्तिए मासबा नहीं बाकी
कारवां का पता न मंजिल का
राह गुम रहनुमा नहीं बाकी
भक्त तो कहता है: हमें कुछ भी पता नहीं है। कारवां का पता, न मंजिल का। हम कहां जा रहे हैं, क्यों जा रहे हैं, किसलिए जा रहे हैं—इसका भी कुछ पता नहीं। हम कहां से आ रहे हैं, क्यों आ रहे हैं, किसलिए आ रहे हैं—इसका भी हमें कुछ पता नहीं। हमें यह भी पता नहीं कि हम कौन हैं।
कारवां का पता न मंजिल का
राह गुम रहनुमा नहीं बाकी
रास्ते भी खो गए हैं, रास्ते को सुझाने वाला भी कोई नहीं।
खत्म किस्सा हुआ मनो तू का
कोई भी माजरा नहीं बाकी
हस्त ही हस्त का है इक एहसास
अब शऊरे फना नहीं बाकी
तुझसे मैंने तुझे जो मांग लिया
और कुछ इलतजा नहीं बाकी
तुझसे मैंने तुझे जो मांग लिया
और कुछ इलतजा नहीं बाकी।
भक्त कहता है: अब और कुछ मांगने को बचा भी नहीं।
तुझसे मैंने तुझे जो मांग लिया
और कुछ इलतजा नहीं बाकी
शौके दीदार तेजतर कर दे
और कोई दुआ नहीं बाकी।
भक्त कहता है: और जरा दिखाई पड़, और साफ दिखाई पड़! धुंधलके के बाहर आ, धुएं के बाहर आ! मेरी आंखों को और रोशन कर! मेरी आंखों को और खोल! मेरे पर्दे को और उठा।
शौके दीदार तेजतर कर दे
मेरी देखने की क्षमता को और चमका दे।
और कोई दुआ नहीं बाकी।
और मेरी कोई प्रार्थना नहीं है।
मीरा कहती है:
मीरा को प्रभु दरसण दीज्यो, पूरब जनम के कौल।
मेरी कोई सामर्थ्य नहीं, मेरी कोई पात्रता नहीं। अपनी बात का खयाल रखना, अपने वचन को मत भूल जाना।
मैं गोविन्द गुण गाणा।
राजा रूठै नगरी राखै, हरि रूठया कहं जाणा।
राणा भेजा जहर पियाला, इमरत करि पी जाणा।
डिबिया में भेज्या ज भुजंगम, सालिगराम करि जाणा।
मीरा तो अब प्रेम दीवानी, सांवलिया वर पाणा।
मैं गोविन्द गुण गाणा।
मीरा कहती है: मेरी सामर्थ्य इतनी, मेरी योग्यता इतनी कि मैं तुम्हारे गुण गा सकती हूं। मुझमें और कोई गुण नहीं है—तुम्हारे गुण गा सकती हूं; तुम्हारी स्तुति कर सकती हूं; तुम्हारे सामने नाच सकती हूं। यह नाच भी मेरा कोई बहुत कुशल नहीं—आड़ा—टेढ़ा है। यह मेरा आंगन भी कुछ साफ—सुथरा नहीं; इरछा—तिरछा है। ये मेरे गीत भी कोई बहुत गीत नहीं—बस हृदय के भाव हैं—अनगढ़। न इनमें मात्रा है, न छंद है, न काव्य के नियमों का कोई हिसाब है। मगर मैं और कुछ कर भी नहीं सकती; और कुछ करना मेरी सामर्थ्य में नहीं है। मैं तुम्हारे गुण गाती रहूंगी। मैं तुम्हारे गुण गा सकती हूं।
भक्तों ने परमात्मा के गुण गाने को बड़ी महत्वपूर्ण प्रक्रिया बनाया है। उसके गुण गाते—गाते तुम उसमें लीन हो जाते हो। उसके गुण गाते—गाते, उसकी याद करते—करते तुम मिटने लगते हो; वह होने लगता है। इसलिए भक्त कहते हैं: सत्संग। जहां चार दीवाने मिल बैठें, बात हो—परमात्मा की, उसके गुण की, उसके प्रेम की। चार लोग मस्ती में साथ—साथ डोलें, तो शायद पांचवां भी कुछ छींटे पा जाए! इतनी वर्षा जहां हो, वहां पांचवां भी बिलकुल बिना भीगे आ जाएगा—ऐसा कैसे हो सकता है! इसलिए भक्तों की जमात होती है—साध—संगत।
जिन्होंने थोड़ा सा पा लिया है, वे उसका गुण गाते हैं! जिन्होंने उतना भी नहीं पाया है, वे उसके गुण गाने में धीरे—धीरे डूबते हैं; एक—एक कदम आगे बढ़ते हैं।
मस्ती संक्रामक होती है। मीरा ने बहुत से लोगों को दीवाना किया; अब भी करती है। अब भी उसके वचन बल रखते हैं। और वचन बड़े सीधे—सादे हैं। अब यह कोई बहुत बड़ी कविता है?—
मैं गोविन्द गुण गाणा।
राजा रूठै नगरी राखै, हरि रूठया कहं जाणा।
राणा भेजा जहर पियाला, इमरत करि पी जाणा।
डिबिया में भेज्या ज भुजंगम, सालिगराम करि जाणा।
मीरा तो अब प्रेम दीवानी, सांवलिया वर पाणा।
यह कोई कविता है? इसमें काव्य जैसा क्या है? तुकबंदी भी कहनी मुश्किल होगी। मगर यह महाकाव्य है, कविता हो या न हो। शब्दों की चिंता ही मत करना; इसमें शब्दों से ज्यादा कुछ मौजूद है; शब्दों के बीच—बीच में मौजूद है। खाली जगह में खोजना। यह प्रभु के गुणों का गान है।
मीरा कहती है कि राजा रूठ जाए तो प्रजा कहीं छिपा ले। राजा नाराज हो जाए तो प्रजा कहीं अपने घर में छिपा ले।
राजा रूठै नगरी राखै, हरि रूठया कहं जाणा।
लेकिन तुम अगर रूठ गए तो कहां जाऊंगी? फिर तो कहीं कोई जगह छिपने को भी नहीं है। क्योंकि तुम तो सब जगह हो। तो तुम मत रूठ जाना। और मेरी कोई और कुशलता नहीं; सिर्फ तुम्हारे गुण गा सकती हूं। मुझसे रूठ मत जाना। मेरी पात्रता का कोई दावा नहीं है; न साधुता का कोई दावा है; न चरित्र का कोई दावा है; न पुण्य का कोई दावा है। मेरे पास कर्तृत्व के नाम पर कुछ भी नहीं, जो तुम्हारे सामने रख दूं। मेरे पास कोई प्रमाणपत्र नहीं है संसार के। लेकिन कुछ प्रमाणपत्र हैं मेरे पास कि तुमने कभी—कभी मुझे याद किया है। वे घड़ियां मुझे याद हैं—मीरा कहती है। जब राणा ने जहर का प्याला भेजा था तो मेरे कारण तो अमृत नहीं हो गया था; तुमने ही किया होगा।
राणा भेजा जहर पियाला, इमरत करि पी जाणा।
यह मेरे कारण तो नहीं हो सकता। मैं तो तुम्हारा गुण गाने वाली हूं। इससे ज्यादा मेरे पास कुछ है ही नहीं। तुमने ही कुछ किया होगा। मैं तुम्हें याद दिलाए देती हूं कि तुम आए होओगे; तुमने छुआ होगा जहर को; तुमने बदल दिया होगा जहर को।
भक्त की निर—अहंकारिता अदभुत है। भक्त अपने ऊपर कोई गुण लेता ही नहीं। सब गुण उसके हैं; सब दुर्गुण मेरे हैं—ऐसी भक्त की भाव—दशा है। भूल हो तो मेरी, ठीक हो तो उसकी। अगर मीरा जहर पीकर मर जाती, तो मीरा उसका गुण गाते ही मरती—कि मेरी कुछ भूल हुई होगी, इसलिए जहर असर कर गया। जहर अमृत हो गया, मीरा नहीं मरी, जहर से बच गई—तो भी गुण उसका है। हर हाल उसका गुण है। मारे तो उसका गुण है; जिलाए तो उसका गुण है।
राणा भेजा जहर पियाला, इमरत करि पी जाणा।
इसमें क्या खूबी है—मीरा कहती है। तुम पर भरोसा है, इसलिए अमृत समझ कर पी गई। तुम्हारा भरोसा काम कर गया। तुम्हारे ऊपर श्रद्धा काम कर गई।
जीसस के जीवन में उल्लेख है कि एक स्त्री भागी हुई आई और उसने पीछे से जीसस का पल्ला पकड़ लिया। जीसस ने लौट कर देखा। वह स्त्री बीमार थी वर्षों से। चंगी हो गई थी। स्वस्थ हो गई थी। वह स्त्री पैरों में झुकी और उसने कहा: बहुत—बहुत धन्यवाद! तुमने मुझे ठीक कर दिया।
जीसस ने कहा: क्षमा कर! ठीक करने वाला वही एक है। मैं कैसे ठीक करूंगा?
किसी ने जीसस से कहा कि तुम बड़े महात्मा हो, संत हो, सात्विक हो। जीसस ने कहा: नहीं। वही एक! अगर कुछ खूबी मुझमें दिखाई पड़ती हो तो उसकी ही कोई बात झलकती होगी। मेरी अपनी कोई खूबी क्या हो सकती है!
भक्त की यह सतत भाव—भंगिमा है।
राणा भेजा जहर पियाला, इमरत करि पी जाणा।
डिबिया में भेज्या ज भुजंगम, सालिगराम करि जाणा।
जिसको सब जगह परमात्मा दिखाई पड़ता हो, वह तो सर्प में भी परमात्मा को ही देखेगा। और तो कोई है ही नहीं। यह भी रूप उसी का है। वही आया है। और ऐसी भाव—दशा अगर प्रगाढ़ हो तो सर्प में भी वही है। है तो वही; सिर्फ हमारे पास आंख नहीं है श्रद्धा की कि हम देख सकें।
सांप को देख कर तुम घबड़ा जाते हो, भाग खड़े होते हो। अश्रद्धा पैदा हो गई, भय आ गया—तो सांप है। और तुमने देखा, कभी—कभी रस्सी में भी सांप दिख जाता है, फिर भय पैदा हो जाए तो! आदमी डरता हुआ अगर जा रहा है रास्ते से और किसी ने बता दिया कि जरा सम्हल कर जाना, उस रास्ते पर सांप इत्यादि होते हैं—तो वह पहले से विचार करते जा रहा है कि अब होते ही होंगे सांप, निकलते ही होंगे सांप। और एक रस्सी पड़ी दिखाई पड़ जाए अंधेरे में—भागे, गिर पड़ो, हाथ—पैर टूट जाएं। और वहां कोई सांप था नहीं। इस बात को समझना। सांप न हो तो भी आदमी हाथ—पैर तोड़ ले सकता है। सांप न हो तो भी आदमी घबड़ाहट में मर सकता है।
मैं एक घर में मेहमान था। उन मित्र को रात कोई चीज काट गई। देखा तो नहीं। बिस्तर पर सोए थे, बिस्तर पर ही काट गई। लेकिन पांव में निशान था। तो मैंने कहा: होगा चूहा इत्यादि, तुम फिकर छोड़ो। उन्होंने कहा: होगा; चूहे इस घर में हैं भी बहुत। सांप का तो खयाल भी न था, क्योंकि सांप उस घर में कभी दिखा भी नहीं था; चूहा ही हो सकता था। और लगता भी ऐसा था जैसे चूहे ने थोड़ी चमड़ी खींच ली हो। तीन दिन बीत गए, सब ठीक था; चौथे दिन एक सांप दिखाई पड़ गया घर में। बस वह सांप का क्या दिखाई पड़ना था, वे तो बेहोश हो गए। उनके मुंह से फसूकर निकलने लगा। मैंने उनकी पत्नी को कहा: यह तो गजब हो गया। अब कोई तीन दिन तक चूहा था तो सब ठीक चल रहा था। अब इतना तो पक्का ही है कि चाहे सांप ने ही काटा हो इनको, मगर तीन दिन से कोई गड़बड़ न हुई। तीन दिन के बाद थोड़े ही सांप का असर होता है?...मगर भाव—दशा! पकड़ गई मन में बात।
सूफी कहानी है: जुन्नैद एक गांव के बाहर ठहरा था और उसने देखा कि रात मौत गांव में आ रही है। तो उसने पूछा: कहां जाती है? तो उसने कहा: अब जाना पड़ रहा है गांव में; पांच सौ आदमियों को ले जाना है। मौत आ गई उनकी। उनका समय आ गया।
गांव में महामारी फैली थी। मौत भीतर गई। जब सात दिन बाद वापस लौटती थी, तो जुन्नैद ने फिर रोका कि रुक, मैं तो सोचता था कि कम से कम मौत झूठ न बोलेगी। क्योंकि आदमी झूठ बोलता है भय से; मौत के भय से ही झूठ बोलता है आदमी। मौत को किसका भय? तू किसलिए झूठ बोली? तूने कहा पांच सौ ले जाना है, और पांच हजार मर चुके हैं!
उसने कहा: मैं क्या करूं? मैं तो पांच सौ ही ले जा रही; साढ़े चार हजार अपने आप मर गए—घबड़ाहट में मर गए। उनको ले जाने का मेरे पास है ही नहीं, कोई लिस्ट भी नहीं है। पांच सौ मैंने मारे हैं; साढ़े चार हजार अपने आप मर गए। दूसरों को मरते देख कर मर गए।
यह रोज हो रहा है। यह कहानी अर्थपूर्ण है। बहुत कम लोग हैं जो दूसरों से प्रभावित नहीं हो जाते। और प्रभाव का परिणाम होने वाला है। क्योंकि अंततः तुम्हारे चित्त में जो भाव बनता है, उसका ही परिणाम है। अगर रस्सी सांप बन जाती है तुम्हारे भाव में, तो जहर चढ़ जाएगा। और अगर सांप भी रस्सी समझ ली जाए तुम्हारे भाव में तो जहर नहीं चढ़ेगा। यह तो साधारण मनोविज्ञान की बात है। लेकिन उस मनोविज्ञान के लिए तो क्या कहना—जिसको परमात्मा ही दिखाई पड़ता हो।
तो मीरा कहती है: लेकिन मेरी इसमें कुछ खूबी नहीं है। मैंने तो पिटारी खोली यही सोच कर कि आए होओगे तुम्हीं, क्योंकि सदा तुम्हीं आते हो। किसी शक्ल में आए होओगे! तो मैंने जल्दी से उठा लिया सांप को—सालिगराम समझ कर—कि अच्छे आए, भले आए, सिर आंखों पर। जहर आया था, मैंने समझा तुम्हीं ने भेजा होगा। राणा में भी तुम्हीं हो और जहर में भी तुम्हीं हो! सो अमृत हो गया! याद दिलाए देती हूं तुम्हें कि मेरे पास कुछ और नहीं, सिवाय तुम्हारे गुण गाने के। लेकिन कभी—कभी तुम गुण गाते—गाते भी मेरे पास आए हो किसी बहाने से। मुझे तुमने कभी—कभी धन्य किया है।
मीरा तो अब प्रेम दीवानी...
और तुम्हारे इन्हीं छोटे—छोटे उपकारों के कारण, इन छोटी—छोटी भेंटों के कारण मीरा प्रेम—दीवानी हो गई है। अब तो तुमने मुझे दीवाना कर दिया है। अब मुझे होश—हवास नहीं है।
...सांवलिया वर पाणा।
अब तो एक ही भाव है कि तुमसे कब मिल जाऊं, कब आलिंगन हो जाए। अब दूर—दूर से नहीं चलेगा। अब दोस्ती भर से नहीं चलेगा। अब तो कब तुमसे वरी जाऊं, कब तुम्हारे और मेरे बीच के सब फासले गिर जाएं, सब दूरियां गिर जाएं, कब मैं तुममें हो जाऊं और तुम मुझमें हो जाओ।
मीरा तो अब प्रेम दीवानी, सांवलिया वर पाणा।
पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे।
इसी दीवानगी में मीरा फिर नाचने लगी। इसी दीवानगी से नाच उठा। इसी दीवानगी से उसमें उत्सव उठा।
पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे।
मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।
और जहां प्रेम है वहां समर्पण है। जहां प्रेम है वहां द्वैत नहीं।
कोई तुम्हें दासी बनाए या दास बनाए, तब तो बगावत होती है, विद्रोह होता है; लेकिन तुम जब प्रेम में खुद ही दास या दासी बन जाते हो, तब बात ही अनूठी होती है। इन दोनों में बड़ा फर्क है। इन दोनों में जमीन—आसमान का फर्क है।
पति समझाता है पत्नी को कि मैं परमात्मा हूं और तू मेरी दासी है। और पत्नी जानती है कि दास कौन है! चिट्ठी—पत्री में दस्तखत भी करती है कि—आपकी दासी! लेकिन सभी को पता है कि मालिक कौन है।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन पत्नी से झगड़ रहा है और पत्नी कलछी लेकर उसे मारने दौड़ी। तो वह घबड़ा कर एक बिस्तर के नीचे घुस गया। बड़ा पलंग! उसमें पीछे जाकर बैठ गया दीवाल से सट कर। तभी किसी ने द्वार पर दस्तक दी। पत्नी ने जाकर दरवाजा खोला, तो दोत्तीन पड़ोस से महिलाएं उससे मिलने आई थीं। अब वह बड़ी घबड़ाई कि यह मुल्ला बैठा बिस्तर के नीचे। उसने उनको कहा कि जरा रुको, मैं अभी आई। मुल्ला से कहा कि जल्दी बाहर निकलो। मुल्ला ने कहा: नहीं निकलते! देखें कौन हमें निकाल सकता है! आज यह सिद्ध होना है कि कौन मालिक है इस घर में!
यह सिद्ध करने की तरकीब निकाली उसने कि नहीं निकलते। देखें कौन निकाल सकता है।
उसने कहा: धीरे बोलो पड़ोसनें आई हैं।
उसने कहा: सब आ जाएं और देख लें कि घर का मालिक कौन है!
यह जो पति और परमात्मा और उनकी मालकियत है—वह जबरदस्ती है। जबरदस्ती, इसलिए पत्नी उससे निरंतर संघर्ष में रहती है; निरंतर चेष्टा में लगी रहती है कि किसी तरह सिद्ध कर दे कि तुम मालिक नहीं हो, मैं मालिक हूं! पत्नी की कलह पैदा होती है उसी भाव से क्योंकि यह दासीपन जबरदस्ती थोपा गया है; व्यवस्था से थोपा गया है। लेकिन एक प्रेम का भी दासीपन होता है: ऊपर से कोई थोपता नहीं, भीतर से आता है। तब उसकी बड़ी अनूठी महिमा है। ऐसा नहीं कि जब प्रेम का दासीपन आता है तो तुम मालिक हो जाते हो और तुम्हें प्रेम करने वाली स्त्री दासी हो जाती है। नहीं, दोनों ही दास हो जाते हैं प्रेम के; कोई एक—दूसरे का दास थोड़े ही हो जाता है। और एक—दूसरे को पता भी नहीं चलता; कानोंकान खबर नहीं होती।
मीरा कहती है:
पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे।
मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।
नारायण ने बनाया नहीं है मुझे दास; मैं अपने आप हो गई हूं। यह प्रेम से फला है।
लोग कहै मीरा भई बावरी, सास कहै कुलनासी रे।
स्वाभाविक है, परिवार के लोगों को नहीं जमेगा। कैसे जमेगा! यहां जो मेरे साथ धीरे—धीरे बावरे हुए जा रहे हैं, उनको पता है कि घर के लोगों को कैसे जमेगा! घर के लोगों को अड़चन होगी।
मेरे एक मित्र ने पत्र लिया है कि जब से वे संन्यासी हो गए हैं, उनकी पत्नी को शक है कि वे पागल हो गए हैं। उनके बच्चों को भी शक है; बच्चे भी उनसे कहते हैं: डैडी, आपको क्या हो गया? पहले तो आप बिलकुल ठीक थे; अब आप यह क्या करते हो?
और वे ऐसी मस्ती में हैं कि वे नाचते हैं, गाते हैं। उनके घर भक्तों की जमात इकट्ठी होने लगी है। वहां एक नई घटना घट रही है। लेकिन परिवार के लोग समझाने—बुझाने में लगे हैं कि किसी तरह होश में आओ! यह क्या कर लिया? यह तुम्हें कौन सी सनक आ गई है? ऐसे तो तुम कभी न थे। पढ़े—लिखे आदमी हो, इज्जत—प्रतिष्ठा है। सब गंवा दोगे!
लेकिन एक ऐसी घड़ी आती है जब ऊपर का धन बरसना शुरू होता है तो यहां सब कुछ गंवाने को आदमी राजी हो जाता है। वह दूसरों को तो दिखाई नहीं पड़ता, अड़चन यह है। मीरा क्यों नाच रही है? उसे क्या मिल गया है, यह तो सास को दिखाई नहीं पड़ता। उसे तो इतना ही दिखाई पड़ता है कि यह क्या हुआ! यह क्या अभद्रता! राजघर की बहू सड़कों पर नाच रही है! सामान्यजनों की भीड़—भाड़ खड़ी देख रही है।
सास को तो इतना ही लगता है कि मेरी बहू और बाजार में नाचे! उसे यह तो दिखाई नहीं पड़ रहा है कि बहू उस भीड़ में नाच ही नहीं रही है। बहू के सामने भीड़ है ही नहीं। बहू के सामने कृष्ण ही खड़े हैं—बहुत रूपों में। ये गोपाल ही आए हैं अलग—अलग रूपों में। यह बाजार नहीं है; यह उन्हीं का खेल है। वही दुकानदार हैं, वही ग्राहक हैं। बहू को तो कृष्ण ही कृष्ण दिखाई पड़ रहे हैं। सारा संसार कृष्णमय हो गया है। लेकिन यह तो बहू की आंख की बात है। सास कैसे समझे! सास के पास तो यह आंख नहीं है। बहू को क्या मिला है, उसे पता नहीं। उसे भी क्षमा करना। उस पर नाराज मत होना।
अक्सर लोग सोचते हैं: सास दुष्ट रही होगी। ऐसा मत सोचना। गलत बात है। दुष्ट नहीं है; सामान्य है; साधारण है। ऐसी ही है जैसे लोग संसार में होते हैं। लोग सोचते हैं: यह राणा जो जहर भिजवाता है, देवर है मीरा का, यह आदमी शैतान है, कि इसके सिर में शैतान सवार हो गया है, कि यह ईश्वर का दुश्मन है, यह कृष्ण का विरोधी है? नहीं, ऐसी कुछ बात नहीं है। यह राणा भी कृष्णाष्टमी होती होगी तो मंदिर जाता होगा। इसके घर में कृष्ण को झूला झुलाया जाता होगा। इसके घर में भी कृष्ण की मूर्ति होगी। यह भी कभी दो फूल चढ़ा आता होगा। लेकिन बस यह औपचारिकता की बात है। यह सामान्य है; कोई शैतान नहीं है। लेकिन यह इसकी समझ के बाहर है कि एक प्रतिष्ठित कुल की बहू और बीच बाजार में निर्लज्ज होकर नाचे। उसको निर्लज्जता दिखाई पड़ेगी।
लोग कहै मीरा भई बावरी, सास कहै कुलनासी रे।
विष का प्याला राणाजी भेज्यां, पीवत मीरा हांसी रे।
और मीरा हंसती है। यह जहर का प्याला आया तो हंसती है। क्योंकि जिसका परमात्मा से संबंध जुड़ गया, अब उसके लिए जहर है ही नहीं, मौत ही नहीं है। उसके लिए अमृत ही अमृत है। अब मृत्यु घट ही नहीं सकती। मृत्यु तो घटती है अहंकार के कारण। जिसने अहंकार छोड़ ही दिया; अब उसके पास मरने को कुछ बचा नहीं। जो मरना था, वह तो त्याग ही दिया। अब जो मिट नहीं सकता, वही शेष रहा। तो हंसी होगी कि जहर किसको भेजते हो।
मंसूर ने यही कहा था अपने हत्यारों को, कि तुम मार किसे रहे हो! जिसे तुम मार रहे हो, वह तो मैं पहले ही छोड़ चुका। और जो मैं हूं उसे तुम मार नहीं सकते; उसे कोई नहीं मार सकता।
यही तो सिकंदर से एक हिंदू संन्यासी ने कहा था। जब सिकंदर ने कहा अगर मेरे साथ नहीं चलोगे तो गर्दन अलग कर दूंगा, उसने कहा: कर दो। मैं खुद ही पहले अलग कर चुका हूं, अब गर्दन है कहां? तुझे गर्दन दिखाई पड़ती है?
सिकंदर ने तलवार खींच ली। वह कोई तत्व चर्चा करने नहीं आया था। वह आदमी अपने ढंग का था। उसने कहा: अब ज्यादा बकवास की, गर्दन अलग कर दूंगा। वह फकीर हंसने लगा। उसने कहा: तू अलग कर ही दे। तू भी गिरते देखेगा गर्दन को, हम भी गिरते देखेंगे। गर्दन ही कटेगी; तू मुझे न काट सकेगा। नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि, मुझे कोई शस्त्र काट नहीं सकते; नैनं दहति पावकाः, मुझे कोई आग जला नहीं सकती। तू काट।
अगर सिकंदर किसी आदमी के सामने हार गया था, तो वह उसी फकीर के सामने। उसने तलवार वापस रख ली। इस आदमी को काटने में कोई अर्थ न था। यह डरता ही न था। यहां कोई मौत का कारण ही नहीं था इसके पास। काट कर खुद ही पछताना पड़ेगा कि ऐसे प्यारे आदमी को काट दिया। उसने बहुत लोग देखे थे। उसने लोग देखे थे, जो उसकी तलवार से भाग जाते, कंप जाते। उसने लोग देखे थे, जो उसकी तलवार देख कर अपनी तलवार निकाल लेते और जूझ जाते। मगर यह तीसरी तरह का आदमी था; न भागा, न जूझा, वहीं खड़ा हंसता रहा। और जब सिकंदर ने म्यान में तलवार डाल ली, उसने फिर कहा: अरे, इरादा बदल दिया क्या? काटोगे नहीं? जो कट सकता है, वह मैं नहीं हूं!
मीरा कहती है: विष का प्याला राणाजी भेज्या, पीवत मीरा हांसी रे।
मीरा हंसी। अब क्या जहर! अब क्या मृत्यु!
और जब लोगों ने कहा होगा: लोग कहै मीरा भई बावरी, तब भी मीरा हंसी होगी, तब भी हंसी होगी। लोगों को पता ही नहीं कि महाधन मिल गया! अमृत की वर्षा हो रही है! वसंत आया है! प्यारे का घर रोज—रोज करीब आता जा रहा है। और जब प्यारे का घर करीब—करीब आता जाता हो रोज—रोज तो पैर में घुंघरू न बांधोगे, नाचोगे न, तो करोगे क्या?
मगर वह प्यारे का घर तो किसी और को दिखाई नहीं पड़ता; वह मीरा को दिखाई पड़ रहा है। लोगों को तो सिर्फ उसके पैर में बंधे घुंघरू दिखाई पड़ रहे हैं। लोग तो इतना ही देख रहे हैं कि वह नाच रही है। लोग भीतर नहीं देख पा रहे हैं कि कौन उसे नचा रहा है। नचाने वाले को नहीं देख रहे हैं; सिर्फ नाच देख रहे हैं।
मीरा के सामने लोग तो दूर हो गए हैं, अर्थहीन हो गए हैं, धुंधले हो गए हैं—कृष्ण प्रगाढ़ होने लगे। और ये दोनों बातें एक साथ होती हैं: जैसे—जैसे प्रगाढ़ होता जाता है परमात्मा का अनुभव, वैसे—वैसे संसार माया होता जाता है। जैसे स्वप्न में किसी ने कुछ कहा, ऐसी बात हो जाती है।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिले अविनासी रे।
न तो दुनिया ही बदलती है न दुनिया वाले
फैज जल्वा से नजर अपनी बदल जाती है।
परमात्मा के अनुभव से न तो दुनिया बदलती है न दुनिया वाले, लेकिन उसके जल्वे को देख कर अपनी नजर बदल जाती है।
न तो दुनिया ही बदलती है न दुनिया वाले
फैज जल्वा से नजर अपनी बदल जाती है
न तअयुन है मकां को न जमां को है करार
जिंदगी कैफे मोहब्बत से सम्हल जाती है
बेखुदी में हमीं हो जाते हैं फितरत से बुलंद
ये नहीं होता कि फितरत ही बदल जाती है
दूर तक फैले हैं आफाक में गम के साए
जिंदगी चीर के इन सबको निकल जाती है
इश्के सद मेहरो दरकशां वो खुदी बनती है
शोलाए हुस्ने तजल्ली में जो ढल जाती है।
लोग नहीं बदलते, दुनिया नहीं बदलती; लेकिन जब तुम्हारी दृष्टि बदल जाती है तो सब बदल जाता है।
न तो दुनिया ही बदलती है न दुनिया वाले
फैज जल्वा से नजर अपनी बदल जाती है
अब जहर जहर नहीं दिखाई पड़ता और सांप सांप नहीं दिखाई पड़ता। और लोग कहते हैं पागल हो गई है, तो इसमें कुछ अपमान नहीं मालूम होता। और सास कहती है कि कुलनाशी है, इसमें भी कुछ चोट नहीं पड़ती। इससे कुछ घाव नहीं लगते।
न तअयुन है मकां को न जमां को है करार
जिंदगी कैफे मोहब्बत से सम्हल जाती है
फिर कोई चीज नहीं डिगाती, जब जिंदगी मोहब्बत से सम्हल जाती है। फिर कोई चीज नहीं हिलाती। फिर तूफान आएं, अंधड़ आएं, अपमान आएं, क्रोध आए लोगों का, वैमनस्यर्—ईष्या बरसे—कुछ भी नहीं होता।
जिंदगी कैफे मोहब्बत से सम्हल जाती है
बेखुदी में हमीं हो जाते हैं फितरत से बुलंद
ये नहीं होता कि फितरत ही बदल जाती है
जब आदमी बेखुद हो जाता है, परमात्मा में डूब जाता है, भूल जाता अपने को—तो प्रकृति से बड़ा हो जाता है। ऐसा नहीं कि प्रकृति बदल जाती है, लेकिन आदमी प्रकृति से बड़ा हो जाता है।
परमात्मा से जुड़ते ही तुम प्रकृति से बड़े हो जाते हो। मालिक से जुड़ गए, चित्रकार से जुड़ गए तो चित्र से बड़े हो गए। कवि से जुड़ गए तो काव्य से बड़े हो गए।
बेखुदी में हमीं हो जाते हैं फितरत से बुलंद
ये नहीं होता कि फितरत ही बदल जाती है
इश्के सद मेहरो दरकशां वो खुदी बनती है
शोलाए हुस्ने तजल्ली में जो ढल जाती है।
जिस दिन तुम अपनी छोटी सी ज्योति को उस परम ज्योति में मिला दोगे उस दिन सब बदल जाता है। तब जीवन के नियम तुम पर काम नहीं करते। तब कभी जहर अमृत हो जाता है और कभी सांप सालिगराम हो जाता है। तब जिंदगी के साधारण नियम तुम पर लागू नहीं होते। और ऐसा नहीं कि प्रकृति बदल जाती है; तुम ही बदल गए हो, इसलिए नियम लागू नहीं होते। प्रकृति तो जहां की तहां है, जैसी की तैसी है।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिले अविनासी रे।
और मीरा कहती है: यह जो मिलन है प्रभु का, सहज हो जाता है। इसके लिए कोई कृच्छ साधना नहीं करनी पड़ती। इसके लिए कोई जपत्तप, व्यर्थ की परेशानियां नहीं उठानी पड़तीं। यह सहज हो जाती है बात। क्यों?
सहज का मतलब यह मत समझ लेना कि सरलता से हो जाती है। सहज का अर्थ सरल नहीं होता। सहज का अर्थ स्वाभाविक होता है। सहज का अर्थ होता है: यह तुम्हारा स्वभाव ही है कि तुम परमात्मा के साथ एक हो सकते हो। जब तक तुमने तय किया नहीं होना है, तब तक रुके हो; जिस दिन तुमने ढील डाल दी, अपने अवरोध हटा दिए, द्वार—दरवाजे खोल दिए—सहज हो जाती है।
जैसे सुबह सूरज बाहर निकला है और तुम दरवाजे बंद किए भीतर बैठे हो और आंखें बंद किए हो—अंधेरी रात है तुम्हारे लिए, अमावस है। सूरज बाहर निकला है। मामला बिलकुल सहज है। तुम दरवाजा खोल दो, सूरज भीतर आ जाए। तुम आंख खोल दो, सूरज के दर्शन हो जाएं। सरल नहीं है इसका अर्थ। क्योंकि अगर आंख बंद करने में तुम्हारा कुछ न्यस्त स्वार्थ है, तो आंख खोलना आसान नहीं होगा। या अगर तुम आंखें जन्मों—जन्मों से बंद किए हो तो आज एकदम से आंख खोलना आसान नहीं होगा। और दरवाजे अगर तुमने कभी खोले ही नहीं हैं तो शायद वे अब तक दीवाल हो चुके होंगे; शायद उनको खोलना इतना आसान न हो।
समझना सहज का अर्थ सरल नहीं होता; सस्ता नहीं होता। सहज का अर्थ होता है: स्वाभाविक है यह। ईश्वर से दूर होना अस्वाभाविक है। ईश्वर के पास होना स्वाभाविक है, क्योंकि ईश्वर हमारे प्राणों का प्राण है।
तेरे पास बैठके दो घड़ी तुझे हाले दिल है सुना लिया
मुझे अपना मान न मान तू, तुझे मैंने अपना बना लिया
मुझे अपना मान न मान तू, तुझे मैंने अपना बना लिया
तेरे पास बैठके दो घड़ी तुझे हाले दिल है सुना लिया
कई तेज गाम भटक गए कई बर्करो हुए लापता
तेरे आस्तां पै जो रुक गए उन्हें आके मंजिल ने पा लिया।
कई तेज गाम भटक गए...
कुछ लोग बड़ी तेज चाल चलने वाले थे, वे भटक गए—बड़े तपस्वी, बड़े संघर्ष वाले, बड़े संकल्प वाले!
कई तेज गाम भटक गए कई बर्करो हुए लापता
तेरे आस्तां पै जो रुक गए...
लेकिन जिन्होंने तेरे चरणों में सिर झुका दिया—
तेरे आस्तां पै जो रुक गए उन्हें आके मंजिल ने पा लिया।
उन्हें मंजिल तक नहीं जाना पड़ा। उन्हें खोजती हुई मंजिल आ गई। सहज का यही अर्थ है।
ये नजर का अपनी कसूर है कि हिजाबे जलवा की है खता
कोई एक किरन को तरस गया, कोई चांदनी में नहा लिया।
कुछ लोग हैं जो एक किरण को तरस रहे हैं और कोई हैं कि चांदनी में नहा रहे हैं। मामला क्या है? मामला कुछ भी नहीं है। जो सहज की गति से चलेगा वह चांदनी में नहा लेगा। जो चेष्टा करेगा, अपने को सिद्ध करने का प्रयास करेगा—वह एक—एक किरण को तरस जाएगा।
कई तेज गाम भटक गए कई बर्करो हुए लापता
तेरे आस्तां पै जो रुक गए उन्हें आके मंजिल ने पा लिया।
ये नजर का अपनी कसूर है कि हिजाबे जलवा की है खता
कोई एक किरन को तरस गया, कोई चांदनी में नहा लिया।
मेरे साथ होती न बेखुदी तो भटक गया होता मैं कहीं
मेरी लग्जिशों ने कदम कदम मुझे गुमराही से बचा लिया।
यह प्यारा है वचन, याद रखना! अगर मुझमें बेहोशी न होती, बेखुदी न होती; अगर मैं अपने को भूल कर तल्लीन होने का क्षमतावान न होता—तो कभी का भटक गया होता। यह मेरी बेखुदी ने और बेहोशी ने मुझे बचाया।
मेरे साथ होती न बेखुदी तो भटक गया होता मैं कहीं
मेरी लग्जिशों ने कदम कदम मुझे गुमराही से बचा लिया।
यह बेहोशी के कारण मैं जो लड़खड़ा—लड़खड़ा कर चल रहा हूं, इस लड़खड़ाने के कारण ही भटका नहीं, क्योंकि कई तेज गाम भटक गए!
भक्त कहता है: परमात्मा को पा लेना सहज है। परमात्मा खुद आता है। तुम पुकारो भर! तुम्हारी पुकार पूर्ण हो! तुम प्यासे भर होओ! तुम्हारी प्यास भर समग्र हो।
परमात्मा स्वभाव है; इसलिए सहज है। न तो सस्ता है, न महंगा; अमोलक है। न तो कुछ करने से मिलता है, न बैठे—ठाले मिलता है। कुछ तीसरी बात चाहिए। हृदय की गहन प्यास चाहिए। कृत्य का सवाल नहीं है और बैठे—ठाले भी नहीं मिलता है। बैठे—ठाले का अर्थ है: प्यास भी नहीं। और कृत्य का अर्थ है: बड़ा अहंकार है और बड़ा संकल्प है।
कई तेज गाम भटक गए कई बर्करो हुए लापता
तेरे आस्तां पै जो रुक गए उन्हें आके मंजिल ने पा लिया।
भक्त कहता है: परमात्मा तुम्हें खोज रहा है। तुम्हीं उसे खोज रहे हो, ऐसा नहीं है। इसलिए सहज है। अकेला आदमी खोजता तो पाता भी कैसे! कहीं भटक जाता लेकिन उसका हाथ भी तुम्हारी तरफ बढ़ा हुआ है। वह तुम्हें तलाश रहा है।
और उसी क्षण मिलन हो जाएगा, जिस क्षण तुम्हारी प्यास तुम्हारे पूरे प्राणों को सुलगा देगी। एक भभक! एक लपट!—कि रोआं—रोआं उसमें सम्मिलित हो जाएगा। कण—कण उसमें समाहित हो जाएगा। तुम प्यास से अलग न बचोगे—तुम प्यास ही हो जाओगे। ऐसी प्रार्थना, ऐसी प्यास, ऐसी पुकार—बस इतना पर्याप्त है।
रोओ उसके लिए—वही प्रार्थना है।
पुकारो उसके लिए—वही साधना है।

आज इतना ही।