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रविवार, 14 दिसंबर 2025

02-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा


अध्याय-02

(सदमा-उपन्यास)

रेल गाड़ी ऊटी स्टेशन को छोड़ अपने अगले गंतव्य की और जा रही थी। रात की नीरवता में वृक्ष भी कैसे साधु भाव को अपने में समेटे खड़े कितने गौरवशाली लग रहे थे। जब गाड़ी किसी पेड़ के पास से गुजरती तो वह वृक्ष पल के लिए लहरा कर कांप जाता। उस के उपर बैठ पक्षी पल भर के लिए अपनी आंखें तो खोलते परंतु वह जानते थे की अब इस वीरान काली रात में उनका कोई और ठोर-ठिकाना नहीं हो सकता। इसलिए वह खतरा महसूस करने पर भी अपने पंजों से उस डाल को पकड़ कर केवल बैठे रह जाते है। वह वहीं पर अडिग रहे थिर रहे जिस डाली पर अभी-अभी वह गहरी तंद्रा में सो रहे थे। परंतु पेड़ भी उस रेल की गति को अपने में समेट कर केवल झूम भर गया था। जिससे उसके उपर बैठे पक्षी डरे ना, जैसे वह एक मां के आँचल में हो। जब वह वृक्ष खुद नहीं डर रहा था, तो भला उस पर सहारा लिए उन पक्षियों डरने की क्या जरूरत है? जब तक आशियाना ही सुरक्षित है, तब उस पर रेन बसेरा करने वालों को भला क्यों भय-भीत होना चाहिए। ये सब पल में घटा और फिर वहां पर वही गहरी शांति लौट आई। पक्षी अपने को सुरक्षित समझ, परों को सुकेड़-समेट कर गहरी निंद्रा में लीन हो गये। ये सब देख कर पेड़ ही नहीं आस पास की पूरी प्रकृति एक गहरी श्वास ले कर फिर उसी मौन में लोट आई जो पल भर पहले उस वातावरण में फैला बिखरा था।

परंतु दूर कही किसी मोर की भय कांत पिहूं....पिहूं....वातावरण में एक नीरवता, एक क्रंदन भर रही थी। मोर के कान इस धरा पर सबसे ज्यादा संवेदन शील होते है। उसके कान महीन से महीन ध्वनि या कंपन की संवेदना को महसूस कर सकते है। चारों और शांति को चीरती रेल अपने गंतव्य की और बढ़ रही थी। ये बात उस में बैठा प्रत्येक प्राणी जानता था। चाहे वह सोया हुआ हो या जाग रहा हो। परंतु नहीं जानती थी तो वह रेशमी (नेहालता) उसका चेतन अचेतन एक द्वन्द्व में प्रवेश करता सा लग रहा था। क्योंकि वह अब रेशमी नहीं है वह तो अपने मां बाप की दुलारी नेहालता है। रेशमी तो दूर कहीं उस ऊटी की पहाड़ियों में पीछे रह गई। शायद नेहालता को अपने उस कान से सूने नाम की याद भी नहीं होगी। वह नाम तो आपूरित सा उसे मिला था।

गाड़ी के अंदर लगभग प्रत्येक व्यक्ति सो रहा था। परंतु नेहालता को न जाने क्यों नींद नहीं आ रही थी। उसका अचेतन कुछ यादों को लहरों की तरह से उपर चेतन मन पर फेंक रहा था। कौन था वह पागल सा आदमी। क्या वह मुझे देख कर ये सब कर रहा था परंतु क्यों मैं तो उसे जानती तक नहीं। मेला कुचेला, उसके सर से कैसे खून बह रहा था। कितना लाचार लग रहा था, वह इस तरह की हरकत क्यों कर रहा था? खाना मांगने के लिए इतनी मेहनत। शायद कोई और बात हो जिसे वह चिन्हित नहीं कर पाई हो। जरूर कोई और बात होगी। अब इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं था। और शायद उसके माता-पिता के पास भी नहीं हो। क्योंकि वह तो ऊटी में किसी को जानते तक नहीं। मैं ही कहां जानती थी ऊटी को परंतु यहां मैं आई कैसे। मन किया की एक बार मां को जगाकर पूंछ लूं परंतु चंद पल में ही दूसरा दृश्य मन पर अंकित हो गया। उसको देख कर एक समय तो उसके मन में आया था, की वह उतर कर उसकी मदद करें। परंतु दूसरे ही पल रेशमी ने अपनी माता जी की और देखा वह चुप रह गई। क्योंकि रेलगाड़ी के चलने का समय हो गया था। आदमी कितना बेबस है लाचार है किन बंधनों से बंधा है वह शायद क्यों खुद भी उन्हें नहीं जानता। कभी-कभी हमारा अचेतन हमें सब कह रहा सा दिखता है, परंतु हम कहां उसकी और ध्यान दे पाते है। या उसे महसूस कर पाते है।

इसलिए उसने गाड़ी से नीचे उतरने का अपना इरादा छोड़ दिया। परंतु पागल से दिखने वाले उस आदमी की वह हरकतें उसके चित से उतर नहीं रही होती। ये आपके या हमारे सब के साथ जीवन में भी कभी न कभी जरूर घटना घटी होगी। आप किसी आदमी से मिले हो। अभी-अभी पहली बार आप उसे देख रहे हो। परंतु आपका अचेतन न जाने क्यों यह जानता है। की आप तो उससे परिचित है। आप तो उसे न जाने कब से जानते हो। उसका उठना बैठना, बोलना कितना परिचित सा भला-भला सा जाना पहचाना सा लगता है। परंतु ये सब जो गुजर रहा होता है। उस सब को आपका चेतन मन अब नहीं पहचान पा रहा है। आपका मन उस समय अवाक सा मंत्र मुग्ध केवल दर्शक बना देखता भर रह जाता है। रेलगाड़ी में सब सो गये थे परंतु नींद न जाने रेशमी से कितनी दूर चली गई थी। वह बहार के धुंधले दृश्य देखते हुए भी कहां देख पा रही थी। एक तो रात का धुंधलका दूसरा उसका चित तो कहीं और तैर रहा था।

इस सब के बीच सोचते-सोचते कब वह भी सो गई उसे पता ही नहीं चला। अचानक उसकी आंखें बाहर के शोर के कारण खुली। अभी-अभी कोई नया स्टेशन आया था। उसके पापा ने उसे उठते हुए देख कर कहां की बेटा उठो और मुँह हाथ धो कर चाय पी लेते है। वह समझ नहीं पा रही थी वहां कहां है। परंतु वह उठती है। मंजन कर हाथ मुँह धो कर अपनी सीट पर आ जाती है। तब तक चाय तैयार होती है। वह चाय पी रही होती है परंतु उसे पता नहीं चल रहा होता है, की वह कहां है। तब वह अपने पापा की और देखती है और कहती है पापा आप और हम यहां कैसे आये। मम्मी क्यों नहीं आई। जब की उनकी मम्मी श्याम उनके साथ ही तो थी। अभी वह बाथरूम गई हुई थी। इतनी देर में जब श्रीमति राजेश्वरी आ गई तो नेहालता उन्हें देख कर अचरज कर रही थी की मम्मी आप हमारे साथ है। मैं तो आप को भूल गई थी। तब उसके पापा उसे देख कर केवल मुस्कुरा देते है। परंतु उसके प्रश्न का उत्तर नहीं देते। बस एक प्रेम भरी निगाह से उसे निहारते रहते है। उनके होटों पर एक मधुर हंसी फैली बिखरी दिख रही थी। कुछ देर में फिर रेलगाड़ी अपनी गंतव्य की और फिर चल देती है।

खिड़की में बैठी नेहालता पीछे दौड़ते से दिखते हुए उन पेड़-पौधों को देख रही थी। देखने से पहले ही वह आंखों से कैसे पल में ओझल हो रहे थे। एक छाया चित्र की तरह से। ठीक इसी तरह से जीवन की घटना को वह एक तार-तन्मयता से नहीं जोड़ पा रही थी। वह सोच रही थी दूर वे जो वृक्ष दिखाई दे रहे है वह कैसे गोल-गोल घूम रहे है। परंतु जो पास के वृक्ष हैं वह किस तेजी से पीछे भागे जा रहे है। और दोनों खड़े इस पृथ्वी पर ही है। ऐसा क्यों दिखता है? क्या मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही नहीं है। हम अपने पास की घटनाओं को कहां घटने से पहले देख समझ पाते है। जीवन भी तो इसी गति से दौड़े चला जा रहा है। एक वृक्ष अभी अपने देखा नहीं की वह दूसरे ही पल उसकी आंखों से ओझल हो जाता है। मानो सब कुछ पीछे भागे जा रहे है। कितना विरोधा भास है चल हम रहे है,और चलता हुआ ये संसार लगता है। मन का जाल भी कैसा है। जब भी आप रेल गाड़ी में बैठे हो तो आपने पास खड़ी दूसरी रेल गाड़ी को देखा जरूर होगा। जब वह दूसरी रेल गाड़ी अचानक चलने लगती है। तो मन को कैसा भ्रम होता है की हमारी रेल गाड़ी चल पड़ी। रेशमी के जीवन भी करीब यहीं सब घट रहा था। जो ऊटी में हुए उस हादसे के बाद उस पर से गुजरा था। उसके अचेतन में वह सब सिंचित है। चाहे वह जानती है या नहीं। गुजरे हुए उस अचेतन पर वह छाया चित्र हम समझ या उसे जी नहीं पा रहे होते है। परंतु उस सब को भले जीये या समझ नहीं परंतु वह हमारे अचेतन की एक धरोहर तो होती ही है। लेकिन आपका मन बार-बार आपसे ये प्रश्न कर रहा होता की वह कैसे और क्यों इतनी दूर आ गई। कहां मुम्बई और कहां ये ऊटी।

ये प्रश्न उसके लिए अति प्रश्न बन गया है। उसका मन कुछ बैचेनी सी महसूस कर रहा था। जिन्हें हम अपना कहते है जिनके साथ हम सालों जीये है, प्रेम किया है लड़े है। कुछ दिन आप उन लोगों से अलग हो कर देखो वह कितने पराये-पराये से लगने लग जाते है। एक रास्ता जो सालों से आपका चिंहित है जिस पर आपके पैर तक उसे पहचानते है। एक-एक वृक्ष वो दीवारें, बिजली के खम्भे कितने आप को अपने से लगते थे। आप जब कुछ दिनों वहां से नहीं गुजरते तो कितने पराये-पराये से हो जाते है। उस पथ का एक-एक धूल कण आप के आ-वन जा-वन को चिंहित करता था। समय विछोह के कारण अनायास सब कुछ कैसा सहमा-सहमा सा लगता है। ठीक इसी तरह से नेहालता को अपने माता-पिता, अपना परिवार न जाने क्यों कितना दूर-दूर सा लग रहा था। ये बात वह किसी को न समझा सकती थी और न ही कह सकती थी। ये मन भी कैसा है। आप मिलते रहे तो प्रेम है आप मिलना बंद कर दे तो केवल यादों की चुंबन मात्र खड़ी रह जाती है। बस कुछ ही दिनों में वहां पर धूल धमास के सिवाय कुछ दिखाई नहीं देगा।

गाड़ी मुम्बई के स्टेशन पर पहुंच गई थी। कल तक वह स्टेशन कितना अपना सा लगाता था। आज वहां का रोनक मेला भी नेहालता को एक वीराना सा पराया-पराया सा लग रहा था। सब यात्री आपने गंतव्य तक पहुंच कर आपना सामान समेट रहे थे। परंतु नेहालता को लग रहा था वह उतरे या न उतरे। उस समय उनके पिता श्री जे. के. मल्होत्रा ने उसके इन विचारों को तोड़ा। बेटी कहां खोई हो अपना स्टेशन आ गया चलो। इतनी देर में कुली भी आ गया। वहां ड्राइवर के साथ नेहालता की कुछ सहेलियों भी उनका बड़ी बेसबरी से उनका इंतजार कर रही थी। नेहालता डरी सहमी सी गाड़ी से नीचे उतरने लगती है। हलांकि उसे खुद भी अब डरने को कोई कारण नजर नहीं आ रहा था। वहां पर सब उसके अपने थे। वह महीनों बाद अपने घर अपनों के बीच आ रही थी। परंतु अचेतन कहीं उन्हें चिह्नित भी कर के चिह्नित नहीं कर पा रहा था। उसकी मम्मी राजेश्वरी मल्होत्रा ने उसे इस तरह से खोए हुए देख कर, उसका हाथ पकड़ कर अपने गले लगा कर सटा लिया। बेटी ये सब तुम्हारे दोस्त है। तुम अब अपनों के बीच आ गई हो। अब तुम्हें डरने की क्या जरूरत है। परंतु सही में देखे तो वहां पर उसकी नेहालता नहीं थी। नेहालता को भी ये सब बड़ा अजीब लगा रहा था। क्या यही है वह नेहालता जो बाल पन से जिन यार दोस्तों के साथ वह खेली थी, लड़ती थी, झगड़ती थी। कितनी उछल कुछ करती थी। एक-एक जिद के लिए घंटों नाराज होकर बैठ जाती थी। आज जब वह मां उसके इतने पास है, उसका हाथ अपने हाथ में ले रही है। उसे गले लगा रही है। परंतु वह नहीं अपनों से हिल-मिल पा रही थी। वहां पर होते हुए भी उसकी वह सहेलियां अब कहां अपने पास नजर वह आ रही थी। नेहालता कहीं दूर अपने में खुद ही एक बंद सी महसूस कर रही थी। उसकी सहेलियां उसके शरीर को अपने शरीर से सटा जरूर रही थी, उसके गले लग रही थी। लेकिन उसकी उर्जा एक दूसरे में प्रवाहित नहीं हो रही थी। मानो वह किसी पत्थर के गले लग रहे है। उसकी सहेलियां ये सब देख कर अचरज जरूर कर रही थी। परंतु जानती है कि उस हादसे के बाद उसकी क्या हालत हो गई थी। कम से कम वह उन्हें चिन्हित तो कर रही थी। उनके नाम से परिचित तो थी। इतना भी क्या कम है। समय पा कर सब पहले जैसा हो जायेगा।

परंतु नेहालता अपनी मम्मी के गले लग कर केवल रो पड़ी जैसे सालों का बाँध जरा से एक लहर का इंतजार कर रहा था। और वह फफक पड़ी तब उसकी मां ने कहां बेटी सब ठीक हो जायेगा देख तुम अब अपने घर आ गई हो। देखों तुम्हें कौन-कौन लेने के लिए आया है। परस, प्रेम, नवीन , रमेश उसे देख कर मुस्कुरा रहे थे। तभी नेहालता का हाथ पकड़ उसकी सहेलियां स्टेशन से बहार की और चल दी। कुली ने सामान उठा लिया और जे. के. मल्होत्रा ने सब को आगाह किया की चलों अब घर पर बैठ कर आराम से बातें करेंगे।

नेहालता अपने दोस्तों के साथ गाड़ी में बैठी जबकि उसकी मां चाह रहा थी की वह उनके साथ आये। परंतु के. के. मल्होत्रा जी ने कहां की बच्चों के साथ जाने दो वह काफी दिन बाद मिल रहे है। उन से घुल मिल कर वह अपने पुराने हादसे को भूल जायेगी। सब यार दोस्त हंसी मजाक कर रहे थे। परंतु नेहालता केवल चुप बैठी थे। जो उसके स्वभाव के बिलकुल विपरीत था। वह तो हमेशा चहकती रहती थी। मोज मस्ती करती रहती थी। ये सब क्या हो गया। परंतु उसके यार दोस्त जानते थे की इतने दिन किसी अंजान देश वहां के लोगों में रहने पर कुछ दिन में वह स्वाभाविक रूप में आ जाये। गाड़ी उनके घर के सामने रूकी नेहालता ने दरवाजा खोला और जब सब सामान उतार रहे थे। वह बहार निकल कर अपने घर को देख रही थी। कैसा पराया-पराया से लग रहा था वह घर जिस में सालों रही थी। सच आज वह देख रही थी केवल देखना भर होकर। जिसे की हमें देखना कहना चाहिए वरना तो हम कहां देख पाते है। अपने परिचित को भी उड़ती नजर से देखते है। वह निहार रही थी अपने घर को। जैसे कोई छोटा बच्चा अपने चिर परिचित को दोबारा आपने पास देख कर मंत्र-मुग्ध सा हो जाता है। क्या यहीं मेरा घर है? हां सच ही कितना पराया-पराया सा लग रहा था उसे वो सब। परंतु कहीं-कहीं उस पर अपने पन के चितके जरूर नजर आ रहे थे।

वह जाने क्यों अपने ही घर के अंदर जाने से भी अचेतन में डर रही थी। तब उसके दोस्तों ने उसका हाथ पकड़ कर कहां की क्या सोच रही हो बाबा-यहीं है तुम्हारा प्यारा और न्यारा घर। सब अंदर जाने लगते है। परंतु रह गया नेहालता का मन वह उसके साथ नहीं चल रहा था या तो वह उससे आगे चल रह था या पीछे। वह उसे पकड़ कर अपने अंग संग रखना चाहती थी। ताकि उसका अकेला पन उसे न घेर सके। ये बात वह किसी को कह भी नहीं सकती थी। तब तो लोग उसे जरूर ही पागल समझेंगे।

और सब हिल मिल कर घर के अंदर चले गए। मानो सब गहमागहमी भाग दौड़ दरवाजे के बाहर खड़ी ताकती भर रह गई हो।

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