पुष्प खिलता बीज से ही,
क्या बीज ही उसकी गति है?
कष्ट, कंटक, कोपलों में, उत्ताप पाकर वह मुस्कराया।
बन कली मधुमास की जब, चहक कर उत्सव
मनाया।
भ्रमरों की गुंज के संग, मधुरता का कोई गीत गाया।
तपती धारा की उष्णता में, साहस
कब उसने गंवाया।
मेघ की गर्जन को सुन कर, न वो सहमा न घबराया।
लाख दमकी दामिनी भी, देखो कहां वह डरता पाया।
देख पतझड़ की विरह को, विकल हो
वह थरथराया।
मौत भी है इस जगत में, एहसास
पहली बार है आया।
तब वह समझा जग की पीड़ा, न हंसा न रो ही पाया।
विकट है वर्तुल जगत का, ने इसे
कोई समझ ही पाया।
पूर्ण होने की ललक में, बीज-बीज में फिर आ समाया।
फिर खिलेगा बीज से वो, बीज ही उसकी परिणति है
पुष्प खिलता बीज से ही, क्या
बीज ही उसकी गति है?
ओशो की मधुशाला
मनसा-मोहनी दसघरा
.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें