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सोमवार, 18 मई 2026

05-तुम हो एक अंधकार — कविता - (ओशो की मधुशाला)

 05-तुम हो एक अंधकार — (कविता) 

कुछ दीवारें दे रही थी

एक रूप और आकर का भ्रम मुझे

थक गया उस बंटवारे से एक दिन

गिरा दिया मैंने उसे एक रात के अंधेरे में

जो एक पकड़ थी मेरे होने की मेरे अहं की

जो चिपक गई थी

जन्म-जन्म मेरे संग साथ

वहीं मैं मेरा छिपा रहा था मेरे होने को

दूर किसी कोने में अहंकार बन कर

उसके होने की पूर्णता मुझे कह रही थी

देखो यहीं तो पूर्ण होना

जिसे तुम ढूंढ रहे हो जन्म-जन्म

की तूं है एक रूप आकार,

जो भर देती था मुझमें एक गुरूर

उस होनी-अनहोनी सा अब

मोड़ लिया मुख इक मोड़ पर जाकर

जो दिखा रहा था मुझे

रूप बसंत का भ्रम

भर रहा था एक अभिशापित गर्वित गर्व का भान

उस चेहरे को हमने तोड़ दियाछोड़ दिया।

उस दर्पण के उस छोर पर

उस अभिशापित का बोझ क्‍यों ढोना

फिर वो चाहे सुंदर ही क्‍यों न हो

खुद जो तुम्‍हें रोके मार्ग से

और भटकाए मुझे बार-बार

वह नहीं चाहिए मुझ प्रिय भी

मैं जी लूंगी एक अंजान अपरिचित गली में

एक अंधेरी सरस सरिता में

जो सीतलता देगी मुझे मेरे होने में

एक समस्वरता को लिए

उस कालिमा में नहीं है कोई रूप

शायद यही है पूर्ण होने का एक किनारे

फिर कैसे हो सकता है

उस दूसरे छोर पर प्रकाश

इस नीरव गर्वित अंधकार के पार

जो दे सके तुझे कोई रूप

तुम खुद ही प्रकाश का भ्रम हो

परंतु मैं जानता हूं

ऐसा नहीं है

तुम खुद हो एक अंधकार

वो निराकार।

जो सब आकार देता है

देता है अनंत रूप आकार।

-मनसा-मोहनी दसघरा 

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