लिखें को पढ़ते ही रहे,
अनलिखे सब छूटे।।
सुरों को साधते ही रहे,
निःशब्द हमसे रूठे।।
जीवन भर पीते रहे हम,
हुए कलश न रीते।
मंत्र को रटते ही रहे,
मौन खड़े रहे पीछे।।
पत्तों को सिंचते ही रहे,
रहे वृक्ष सब सूखे।।
मन भरने का भ्रम बना था
पर रहे अंत तक रिते।।
चढ़े चले हर रोज नई मंजिल,
पर खड़े मिल वहीं नीचे।
जीवन भर हम बचे मौत से,
वो
मुस्कराती खड़ी थी पीछे।।
मंजिल-मंजिल की रटन लगा कर
कभी चले हम इरछे-तिरछे।
न चलना था चलने का उपाय
इस ठौर कभी न हम बैठ।
मनसा मोहनी दसघरा
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