तुम थे तो
इक गीत था
अब तो सून है साज मेरे
राग तड़प रहे है सीने में
अब तुम बता गाऊं कैसे।
जिस तन लागे वो तन जाने
मन तो करता नित नये बहाने।
अपने अपनों को ही ढूंढ रहे है
जग में अपना किसको माने।
है तुझसा जो वही तुझे जाने
बाकी तो भ्रम के ताने
रोज सिमटता रोज बिखरता,
जित देखो तू वहीं छिटकता
सब के ह्रदय में तू बसता,
दीवाना कह जग हम पे हंसता।
पर दीवाना मन न मानें……
हिमालय की शैल-चोटियों पर
और हम फिर से देखे वो उन्मुक्त नव-नभ
ऋतु, बदली ऋतु, बदलती है
धरा बदल गया निशा नित ये अंबर
कब बदलेगा मेरा जीवन
युगों-युगों यूंहीं चलता आया
बदलती है धरा बदला ये अंबर
कब बदलेगा मेरा जीवन
फिर युगों-युगों यूंहीं चलता
कहां रुकेगा, कहां है मंजिल
इसकी चिंता कौन करे अब
मनसा-मोहनी दसघरा
(ओशो की मधुशाला)
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