घुट-घुट कर रोने से भी क्या, दर्द
तेरा बह जायेगा।
यूं आँखों से आंसू बहकर, वह न
मोती बन पायेगा।
सावन के आने से भी क्या, बसंत
नहीं शरमाता है।
पात-पात को छू लेने से, इक नई आस
को लाता है।
उन रात के काले सायों में, भोर
किरण जब पाता है।
सूने मन के बाद कहीं जब,आनंद
उत्सव भर जाता है।
चार कदम बस और चाला चल, तभी
किनारा आयेगा।
यूं आंखों से आंसू बहकर, वह न मोती बन पायेगा।।
घुट-घुट कर रोने से भी क्या, दर्द
तेरा बह जायेगा।
यूं आँखों से आंसू बहकर, वह न मोती बन पायेगा।
पाना-खोना, पल-पल, छल-छल, ये आती जाती छाया है।
सपनों से तू जाग जरा अब, ये
धुंधली होती ही माया है।
आँख खोल के देख तो ले, क्या खोया
और क्या पाया है।
अब तोड़ जरा ये मोह के बंधन, कोई
अपना न पराया है।
धरा धूल पर कदम बढ़ा,फिर फैली सीतलता
की छाया है।
बस एक कदम तुम ओर बढ़ा लो, वो
हाथ थामने आया है।
ध्यान दीप जला अब पथ पर, वो
मार्ग तुझे दिखलायेगा।
यूं आंखों से आंसू बहकर, वह न मोती बन पायेगा।।
घुट-घुट कर रोने से भी क्या, दर्द
तेरा बह जायेगा।
यूं आँखों से आंसू बहकर, वह न
मोती बन पायेगा।
नई सुबह अब पास खड़ी, उसे बढ़ कर
गले लगाना है।
युगों-युगों के बाद कहीं, इस माह
यान का आना है।
टूटे बिखरे इस जीवन से, एक नई
राह को पाना है।
चलना है एक राह पकड़ बस, नहीं
भटक तुम पायेगा।
कुछ कांटों के लगने से न, अब कहां
ठहर तुम पायेगा।
यूं आँखों से आंसू बहकर, वो न
मोती बन पायेगा ।
घुट-घुट कर रोने से भी क्या, दर्द
तेरा बह जायेगा।
यूं आँखों से आंसू बहकर, वह न
मोती बन पायेगा।
ओशो की मधुशाला
मनसा-मोेहनी दसघरा
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