सखी री सुन प्रीतम रहा पुकार,
बोले ऐसी मीठी बोली,
हो ह्रदय के पार
सांसे भी अब करने लगी हे
ओशो-ओशो पुकार......!
तू चला था दृढ़ अविचल
उस पथ पर।
किन क्षणों ने आन उसने,
भर दिया था इक भरोसा,
हाथ पकड़ कर चल दिया संग
कहने लगा की नहीं अकेला
तू चला चल....तू चला चल।
मैं निडर-निष्कंप हो गया,
मार्ग आनंद उत्सव से भर गया।
गीत सब और गुंजायमान थे
कदम-कदम पर मधु बरस रहा था
भय न जाने कहां खो गया
मैंने अपने को पथ पर खो दिया
चल दिया पथ पर अकेला!
उस डगर जाते हुए सब
देखते सब रह गये थे,
पागल मुझे सब कह रहे थे।
ये क्यों भटकना चाहता है?
गुम नाम पथ पर चला जा रहा है
खो रहा है अपने को न जाने
क्या पता ये डगर कहां
किस और इसको ले जायेगी
लाख हम समझा रहे है
डरा रहे है मना रहे है!
मैं भर कर ह्रदय में प्रेम प्रीत को
कर दिया ह्रदय समर्पण,
एक साहस अचानक मन में भरा,
फिर झूम गा कर
वो डगर जो अंजान सी थी
अब वो कितनी अपनी लगे है
फिर मैं चला मदमस्त होकर,
उस डगर को चूम, छू कर
होश के वो दो कदम भी,
जीवन में उन्माद भर गये,
एक टूटे साज में वो,
राग और मधु गान दे गये।
गंतव्य हीन भटकने से अच्छे ,
होश के वो दो कदम थे
ऐ मुसाफिर थकना नहीं अब
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