उन टूटे बिखरे सपनों को तुम, फिर
जीवित कर जाते हो।
अब आने कि कोई आस नहीं,पर तुम
याद बहुत आते हो।
सूने जीवन के खाली कोने में,
तेरी याद का झोंका आता है।
सूने पड़े इस मन आँगन में, फिर अपना
पन छा जाता है।
तेरी बातों की वो गुंज अभी-भी,
हर ओर जहां पर पाती है।
तेरी सांसों की वो महक मुझे, मेरे दिल को बहुत सताती है।
दिल रोता है, न सोता है, बस तड़प-तड़प कर कहता है।
कहीं दूर पपीहा गाता है जब, तब
तुम मुझे तड़पाते हो।
तुम याद बहुत आते हो.....
कितने सपने थे जीवन के, जो टूट-टूट
कर बिखर गये।
अतृप्ति के इस सागर में, तुम
तृप्ति की गागर भर गये।
कभी कहते थे हम करो तुम, हम उसी
पल आ जायेंगे।
जीवन के बिखरे राग को हम, फिर आकर
तुम्हें सुनायेंगे।
हम आस लगाये बैठे है, तेरे यादों
की छुअन छू जायेंगे।
क्यों रह-रह कर हमको दर्द नया नित जीवन में भर जाते
हो।
न पूरे होते इस जग के जीवन के सूने पन में
तुम कोई मधुरस-रस भर जाते हो
तुम सामने आ जाओ, बस तेरा ही
चित्र बनाऊँ।
तुम स्वप्न में आओ तो, कोई गीत
तुम्हें सुनाऊं।
दूर कहीं जब तुम हो, बस राग विरह
का बजाऊं।।
ओशो की मधुशाला
मनसा-मोहनी दसघरा
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