बिना ध्यान जैसे जीवन सूना, प्रीत
बिना हे सूने नयना।
राही बिना यूं पथ है सूना, पीर
बिना क्या दिल का होना।
1-जीवन उलझा मकड़ जाल सा, कौन राह के कांटे चुनता।
2-सांस अटक गई हिचकयों से, तेरे
बिना अब क्या है जीना।
3-मधु छलकती हो जब छम-छम, प्यालों
में भी क्या है पीना।
4-गीत बनेगा कैसे प्रियतम, बनो न जब तक खुद ही वीणा।
5-उलझे जीवन इन धागों से, अब
क्या जीवन को फिर बुनना।
6-तार वीणा के टूट गये सब, तू बस
मौन की ही भाषा सुनना।
7-आना जाना भ्रम जाल था, मत जीवन
के सपने चुनना।
8-कौने पुकार रहा था अब तक, यहीं
भ्रम बस देते रहना।
9-देख रहे है पथ-पर निस दिन, नित-नित
धुंधले होते नयना।
10-शब्द बन गई मन की उलझन, बिना
शब्द की अब है सुनना।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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