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शनिवार, 12 सितंबर 2026

60 - बिना ध्यान जैसे जीवन सूना - (कविता) - ओशो की मधुशाला

60 - बिना ध्यान जैसे जीवन सूना - (कविता) - मनसा- मोहनी 

बिना ध्यान जैसे जीवन सूना, प्रीत बिना हे सूने नयना।

राही बिना यूं पथ है सूना, पीर बिना क्या दिल का होना।

1-जीवन उलझा मकड़ जाल सा, कौन राह के कांटे चुनता।

2-सांस अटक गई हिचकयों से, तेरे बिना अब क्या है जीना।

3-मधु छलकती हो जब छम-छम, प्यालों में भी क्या है पीना।

4-गीत बनेगा कैसे प्रियतम, बनो न जब तक खुद ही वीणा।

5-उलझे जीवन इन धागों से, अब क्या जीवन को फिर बुनना।

6-तार वीणा के टूट गये सब, तू बस मौन की ही भाषा सुनना।

7-आना जाना भ्रम जाल था, मत जीवन के सपने चुनना।

8-कौने पुकार रहा था अब तक, यहीं भ्रम बस देते रहना।

9-देख रहे है पथ-पर निस दिन, नित-नित धुंधले होते नयना।

10-शब्द बन गई मन की उलझन, बिना शब्द की अब है सुनना।

(ओशो की मधुशाला) 

मनसा-मोहनी दसघरा 


 

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